Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 591–600

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 591–600

पृष्ठ 591

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तृतीय काण्ड ( श्र ० 8 ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण प्रद्भिरम्मत समोषधीभिरोषधीरिति यश्चासौ पूर्वेद्युराहृतो यज्ञस्य रसो यश्चा-द्याहृतस्तमेवैतदुभयं संसृजति ॥ २ ९ ॥ तद्वैके । ऐव मैत्रावरुरणचमसे वसतीवरीर्नयन्त्या मैत्रावरुणचमसाद्वसती-diy चासौ पूर्वेद्युराहृतो यज्ञस्य रसो यश्चाद्याहृतस्तमेवैतदुभयं संसृजाम इति वदन्तस्तदु तथा न कुर्याद्यद्वाऽप्राधवनीये समवनयति तदेवैष उभयो यज्ञस्य रसः संसृज्यतेऽथ होतृचमसे वसतीवरीगृह्णाति निग्राभ्याभ्यस्तद्यदुपर्युपरि चात्वालं संस्पर्शयत्यतो वै देवा दिवमुपोदकामंस्तद्यजमानमेवैतत्स्वयं पन्थानमनुसंख्या-पयति ॥३० ॥

तप्रायन्ति । तं होता पृच्छत्यध्वर्योऽवेरपाऽइत्यविदोऽपाऽइत्येवैतदाह तं प्रत्याहोते व नन्नमुरित्यविदमथो मेग्नंसतेत्येवैतदाह ॥ ३१ ॥

स यद्यग्निष्टोमः स्यात् । यदि प्रचरण्यां संस्रवः परिशिष्टोऽलं होमाय स्यात्तं जुहुयाद्यद्यु नालं होमाय स्यादपरं चतुर्गृहीतमाज्यं गृहीत्वा जुहोति यमग्ने पृत्सु मर्त्यमवा वाजेषु यं जुनाः । स यन्ता शश्वतीरिषः स्वाहेत्याग्नेया जुहोत्य-निर्वाग्निष्टोमस्तदग्नावग्निष्टोमं प्रतिष्ठापयति मर्त्तवत्या पुरुषसम्मितो वा-श्रग्निष्टोम एवं जुहुयाद्यद्यग्निष्टोमः स्यात् ॥३२ ॥

यद्युक्थ्यः स्यात् । मध्यमं परिधिमुपस्पृशेत्त्रयः परिधयस्त्रीण्युक्थान्येतैरु हि तहि यज्ञः प्रतितिष्ठति यद्युऽप्रतिरात्रो वा षोडशी वा स्यान्नैव जुहुयान्न मध्यमं परिधिमुपस्पृशेत्समुद्येव तूष्णीमेत्य प्रपद्येत तद्यथायथं यज्ञक्रतून्व्यावर्त्त-यति || ३३ || अयुङ्गा युङ्गा एकधना भवन्ति । त्रयो वा पञ्च वा पञ्च वा सप्त वा सप्त वा नव वा नव वैकादश वैकादशं वा त्रयोदश वा त्रयोदश वा पञ्चदश वा द्वन्द्वमह मिथुनं प्रजननमथ य एष एकोऽतिरिच्यते स यजमानस्य श्रियमभ्यतिरिच्यते स वाइएषां सधनं यो यजमानस्य श्रियमभ्यतिरिच्यते तद्य-देषां सधनं तस्मादेकधना नाम || ३४ || [ ५७७ ]

पृष्ठ 592

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण [ अनुवाद ] वसतीवरी को उत्तरावेदि के उत्तर में विद्यमान प्राग्नीध्रीय वेदि पर रख दिया गया । यहीं पर सुत्या के पूर्व दिन का काम समाप्त हो गया । अग्निष्टोमयाग हीनया कहलाता है । प्रत्येक यज्ञ में दीक्षा, सुत्या व उपसत् ये तीन कर्म होते है । इनमें दीक्षा - कर्म समाप्त हो गया । सुत्याङ्गसम्बन्धी पशुयाग भी समाप्त हो चुका । अब सवनीय पशु - कर्म होना है । इसके पहले दिन सूर्यास्त से पूर्व वसतीवरी जल को ला कर उसका यज्ञ से सम्बन्ध करा कर आग्नीध्रीय वेदि पर रख दिया गया है । दूसरे दिन प्रातःकाल ही नित्य-कर्म से निवृत्त होकर जिस स्थान पर वसतीवरी जल रखा गया है, उस आग्नीध्र स्थान के पास आ जाते हैं और वहाँ से उत्तरावेदि के पास ना कर उस घृत को उत्तरावेदि पर रख देते हैं ॥१ ॥

तदनन्तर हविर्धानमण्डपस्थ शकट में रखे हुए सोम राजा को शकट से नीचे उतारते हैं । इस सोमलता की प्रादेशमात्र ( १०३ अङ्गुल ) की पूलियाँ बना कर हविर्धानमण्डपस्थ शकटों में रख दी जाती हैं । उन पर वस्त्र बाँध कर ग्रन्थि - बन्धन कर दिया जाता है । शकट से उतार कर सोम को कृष्णमृगचर्म पर रख दिया जाता है । दक्षिण हविर्धान शकट से सोमलता को नीचे कृष्णमृगचर्म पर रखना उसे प्रतिष्ठाच्युत करना नहीं अपितु अपनी वास्त-विक स्वप्रतिष्ठा भूमि पर प्रतिष्ठित करना है । प्रतिष्ठा स्वप्रतिष्ठा तथा पर - प्रतिष्ठा भेद से दो प्रकार की है । शकट सोम की पर प्रतिष्ठा है तथा जिस भूमि में वह सोमलता उत्पन्न हुई है, वह उसकी स्वप्रतिष्ठा है । सभी उत्पत्तिशील पदार्थों की स्वप्रतिष्ठा भूमि ही है । प्रकृतियज्ञ की तरह आज इस सोम के द्युलोक में पहुँचाना है । अत: प्रथम इस सोम को पृथिवी - प्रतिष्ठा पर प्रतिष्ठित कर वहीं से द्युलोक को भेजना चाहिए । प्रकृतियाग की भाँति ही इस वैधयज्ञ में पृथिवी पर इस सोम को रख कर पृथिवी से ही उत्पन्न करता है तथा वहीं से इसे द्युलोक तक वितत करता है ॥ २ ॥

शकट के दोनों और दो ईषा - दण्ड रहते हैं । इन दोनों ईषा - दण्डों के बीच से सोम की पूलियों को शकट से उतारना चाहिए, क्यों कि यह शकट यज्ञ - साधन सोम का आश्रय होने से यज्ञ कहलाता है । उन दोनों के बीच में हो कर सोम को नीचे उतारने से सोम यज्ञ से भूत नहीं होता है । शकट के नीचे ही पास में उपरव पर रखी हुई शिला पर चार पत्थर रखे रहते हैं । शकट से उतरे हुए सोम को इन पत्थरों ( ग्रावाओं ) के बीच रखना चाहिए । सोम, क्षत्र प्रर्थात् राजा है और ग्रावा ( पत्थर ) उसकी प्रजा हैं । अतः उन ग्रावारूप पत्थरों के बीच सोम को रखता हुआ अध्वर्यु सोम को ग्रावारूप प्रजा का अधिष्ठाता बनाता है, प्रजा का राजा के सम्मुख अभिवादनशील बनाता है ॥ ३ ॥

वह अध्वर्यु - ' हृदे त्वा मनसे त्वा दिवे त्वा सूर्याय त्वा ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ उस सोम को शकट से उतारता है । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि हृदय स्थित मन के द्वारा ही यजमान उस काम को चाहता है जिसकी कामना के लिए वह यजन करता है । [ ५७८ ]

पृष्ठ 593

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तृतीय काण्ड ( प्र ० 2 ) शतपथ ब्राह्मणं सुत्या ब्राह्मण तात्पर्य यह है कि यजमान दिव्यात्म - निर्माणरूप कामना के लिए यजन करता है और वह मन हृदय में प्रतिष्ठित रहता है- ' हृत्प्रतिष्ठं यद्जरं जविष्ठं तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु इस मन्त्र में मन को हृत्प्रतिष्ठ बतलाया गया है । इसलिए हृत्प्रतिष्ठ मन के लिए सोम को शकट से नीचे उतारता है ॥४ ॥

इस मन्त्रांश की व्याख्या के पश्चात् - ' दिवे त्वा सूर्याय त्वा ' इस मन्त्रशेष की व्याख्या इस fuser में की जा रही है । द्युलोक के लिए तथा सूर्य के लिए सोम को शकट से उतारा जाता है क्योंकि इस सोम रस की आहुति द्युलोकस्थ सौर प्रारणों को आप्यायित करती है । सौर प्रारण ही देवता हैं तथा उनका स्थान द्युलोक है । सौर प्राण और सूर्य का अभेद मान कर सौर प्रारणदेवताओं के लिए यह कह दिया है कि सूर्य के लिए सोम को शकट से उतारता है । पश्चात् फिर - ' ऊर्ध्वमिममध्वरं दिवि देवेषु होत्रा यच्छ ' इस मन्त्रशेष का उच्चारण करता है । अर्थात् हे सोम! इस यज्ञ को द्युलोक में पहुँचा दीजिए और यज्ञकर्ता ऋत्विजों को देव-ता में प्रतिष्ठित कर दीजिए || ५ || पश्चात् मन्त्र के अवशिष्ट चतुर्थभाग - ' सोम राजन् विश्वारुचां प्रजा उपावरोह ' का उच्चारण करता है । हे सोम राजा! आप इन सारी प्रजानों पर आधिपत्य के लिए शकट • से उतरिए ॥ ६ ॥

' हृत्वा मन से त्वा ' इत्यादि मन्त्र का उच्चारण करते हुए अध्वर्यु सोमलता की प्रादेश-मात्र की पूलियों को नीचे उतार लेता है तथा वेष्ठित वस्त्र को खोल कर अध्वर्यु उस सोम की स्तुति करता है । उपस्थान - मन्त्र निम्नलिखित है- ' विश्वास्त्वां प्रजा उपावरोहन्तु ' । हे सोम! तुम्हारे साथ ये सारी प्रजाएँ उतरें । यह कथन अनुचित सा प्रतीत होता है क्यों कि सोम क्षत्र है, राजा है तथा प्रजा, परिचारक पुरुष की तरह गौरग है । ऐसी स्थिति में परि-चारक पुरुष प्रजा के अवरोहण के बिना ' सारी प्रजाओं की ओर आप उतरिए ' । यह कथन राजा में गौणता सिद्ध करने वाला होने से प्रयथायथ एवं पापवस्यस अर्थात् साधु साधु का मिश्रण है । अतः इस अनौचित्य के परिहार के लिए अध्वर्यु कहता है कि - ' विश्वास्त्वां प्रजा उपावरोहन्तु ' अर्थात् सारी प्रजाएँ प्रापकी ओर उतरें । इससे शकट से उतारे जाते हुए सोम के सामने सारी प्रजा श्राए । ऐसा कहने से, जो अनौचित्य था, उसका परिहार हो जाता है । और उसमें यथायथता श्रा जाती है । प्रत्येक कर्म में अनुवाक्या व याज्या दोनों होती हैं । अनुवाक्या होता करता है तथा याज्या अध्वर्यु । दोनों में अध्वर्युकृत याज्या कर्म प्रधान रहता है तथा होतृकृत अनुवाक्या याज्या का अङ्ग होता । किन्तु वसतीवरी ग्रहण के दूसरे दिन प्रातरनुवाक से व्यवहृत कर्म याज्या कर्म का अङ्ग न हो कर स्वतन्त्र कर्म होता है । प्रातरनुवाक कर्म कर्माङ्ग नहीं है अपि ' तु त्वङ्ग है । इसीलिए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि होता प्रातरनुवाक के लिए [ ५७६ ]

पृष्ठ 594

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण सूत्रोक्त नियत स्थान पर बैठ जाता है क्यों कि वह प्रातरनुवाक के लिए अनुवाक्या मन्त्र का उच्चारण करने वाला है ॥ ७ ॥

उस समय ग्रग्नि में समिदाधान करता हुआ अध्वर्यु होता के प्रति प्रातरनुवाक के लिए ' देवेभ्यः प्रातर्यावभ्योऽनुब्रूहि ' प्रर्थात् प्रातः काल रहने वाले देवताओं के लिए अनुवाक्या मन्त्र बोल ऐसा प्रैष करता है । प्रातः काल रहने वाले देवता प्रातर्यावा कहलाते हैं - जैसे अग्नि, उषा, अश्विनीकुमार, सविता आदि । प्रातर्यावा देवता तथा अनुयाज देवता दोनों ही छन्द कहलाते हैं । क्यों कि प्रातर्यावा देवताओं से प्रातः कालिक देवतात्रों के छन्द ही अभिप्रेत हैं । सर्वत्र प्रातर्यावा देवताओं के लिए प्रैष करते समय देवेभ्यः प्रातर्यावभ्योऽनुब्रूहि ' ऐसा कहा जाता है तथा अनुयाज देवताओं के प्रैष के समय ' देवेभ्यः प्रेष्य देवान् यज ' ऐसा कहा जाता 11511 यहाँ कतिपय कहते हैं कि छन्द ही प्रातर्यावा देवता हैं तथा छन्द ही अनुयाज हैं तो प्रातर्यावा देवताओं के लिए भी ' देवेभ्योऽनुब्रूहि ' ऐसा ही प्रैष करना चाहिए । किन्तु यह उचित नहीं है क्योंकि यदि प्रातरनुवाक में ' देवेभ्योऽनुब्रूहि ' ऐसा प्रेष किया जाएगा तो अनु-याजदेवता भी प्रातरनुवाक भी सम्मिलित हो जाएँगे, जो कि अभीष्ट नहीं है इसलिए ' देवेभ्यः प्रेष्य देवान् यज ' इस प्रकार से अनुयाज देवताओं के लिए कहा जाता है और प्रातर्यावा देव-तात्रों के लिए ' देवेभ्यः प्रातर्यावभ्योऽनुब्रूहि ' ऐसा ही प्रैष करना चाहिए ॥ ६ ॥

प्रातरनुवाक में जो समिदाधान किया जाता है इससे छन्दो- देवता का ही समिन्धन करता है । तथा होता जो प्रातरनुवाक करता है अर्थात् अनुवाक्या मन्त्र बोलता है वह इन छन्दों को प्रयातयाम बनाता है । अनुवाक्या मन्त्र से छन्दों को प्रयातयाम अर्थात् सारवान् बनाया जाता है । गतसार ( सार - रहित ) को यातयाम कहा जाता है । प्राणदेवता अग्न्यादि- गायत्र्यादि छन्दों पर सवार हो कर ही स्वर्ग में जाते हैं । ' छन्द प्राणदेवताओं को स्वर्ग में पहुँचाने के कारण यातयाम ( गतरस ) हो चुके हैं । आज यजमान को गायत्र्यादि । अहोरात्ररूप छन्दों के द्वारा द्युलोक तक अपना यज्ञ वितत करना है । अतः प्रातरनुवाक कर्म द्वारा इन छन्दों को पुनः प्राप्यायित कर प्रयातयाम बनाया जाता है । प्रश्न यह है कि प्रातरनुवाक में समिन्धन व अनुवाक्या के द्वारा भी देवताओं का ही श्राप्यायन होता है न कि छन्दों का । समाधान यही है कि देवकर्म में शास्त्र, स्तोत्र व ग्रह ये तीन कर्म होते हैं । ऋङ्मन्त्र से शास्त्र, साममन्त्र से स्तोत्र ( स्तुति ) तथा यजुर्मन्त्र से ग्रह होता है । यदि शस्त्रादि तीनों कर्म नहीं होते तो उस कर्म से देवताओं का श्राप्यायन न हो कर छन्दों का ही प्राप्यायन होता है । प्रातरनुवाक कर्म में न शस्त्र किया जाता है और न स्तोत्र-ऐसी स्थिति में प्रातरनुवाक कर्म छन्दों का ही प्राप्यायन करता है, उनको अयातयाम सार-वान् ) बनाता है ॥१० ॥

[ ५८० ]

पृष्ठ 595

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तृतीय काण्ड ( श्र ० e ) शतपथ ब्राह्मण सुत्यां- ब्राह्मण सभी शास्त्रों में तत्तच्छास्त्रसंकलित पारिभाषिक शब्द होते हैं । जैसे सांख्य एवं न्याय दोनों ही शास्त्रों में ' गुण ' शब्द का प्रयोग होता है किन्तु सांख्यशास्त्र में सत्व, रज, तम इन द्रव्यों के लिए गुण शब्द का प्रयोग हुआ है तथा न्यायशास्त्र में द्रव्य के आश्रित रहने वाले रूप - रस- गन्धादि के लिए गुणशब्द का प्रयोग होता है । अतः तत्तच्छास्त्रसंकेतित अर्थ के परि-ज्ञान के बिना उन शास्त्रों के अर्थ का सम्यग्बोध नहीं हो सकता । उसी प्रकार वैदिक साहित्य में भी अभिगर प्रतिगर शब्द पारिभाषिक हैं । अभिगर शब्द ( मनुष्य समुदाय में ) उत्तरसापेक्ष भाषण में प्रयुक्त होता है तथा प्रतिगर शब्द उस भाषण केउत्तर में प्रयुक्त होता है | अभिगर के बाद भी प्रतिगर का होना विधेय है । यज्ञ - कर्म में अनुवाक्या व याज्या में दो कर्म होते हैं । अनुवाक्या पूर्वकर्म होने से अभिगर है तथा याज्या उत्तर - कर्म होने से प्रतिगर है । किन्तु यहाँ ध्वर्यु याज्या नहीं करता । अंतः यह प्रश्न उपस्थित हो जाता है कि होतृकृत प्रातरनुवाक में अनुवाक्या का प्रतिगर कौन है । उसका उत्तर देते हुए कहा है कि जिस समय होता प्रातरनुवाक करे उस समय अध्वर्यु दत्तचित्त हो कर उसे सुनता रहे । अध्वर्यु का यह तन्मनस्कता व्यापार ही उसका प्रतिगर है । किन्तु भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इसकी आवश्यकता नहीं, क्यों कि यहाँ होतृकृत प्रातरनुवाक कर्म याज्या का अंग नहीं है अपितु स्वतन्त्र कर्म है । अर्थात् याज्या प्रातरनुवाक का उत्तर कर्म नहीं है अतः प्रातरनुवाक के प्रतिगर का प्रश्न ही नहीं उठता । इसीलिए श्रौतसूत्रकार कात्यायन ने कहा है- ' प्रातरनुवाक जाग्रदुपासीताध्वर्युः स्वप्याद्वा ' ( का. श्रौ. सू. ६।१६ ) इति । जुहू और • उपभृत् दोनों स्र ुक् कहलाती हैं । इन दोनों से प्राहुति दी जाती है । आहुति देना अध्वर्यु का कार्य है । अतः ये दोनों अध्वर्यु के पास रहती हैं । किन्तु बीच - बीच में कभी अध्वर्यु को छोड़ कर अन्य ऋत्विजों को प्राहुति देनी पड़ती है । उसके लिए एक काष्ठ की बनी हुई स्र ुक् ( जुहू, उपभृत् ) होती है जिसे कि प्रचरणी स्र ुक् कहा जाता है । इस यज्ञ ' वसतीवरी, एकधना तथा निग्राभ्या ये तीन प्रकार के जल लाये जाते हैं । जिस तालाब से वसतीवरी जल लाया गया है उसी से एकधना पानी भी लाना चाहिए । एकधना पानी लाने से पूर्व ही प्रातःकाल होता -" प्रभूदुषा इन्द्रतमा मघोन्यजीजनत्सुविताय श्रवांसि । विदिवो देवी दुहिता दधात्यङ्गिरस्तमा सुकृते वसूनि ॥ ” ( ऋ. सं. ७ / ७६।३ ) इस मन्त्र से प्रातरनुवाक का परिधान करता है । जिस समय होता इस मन्त्र का उच्चारण करता है उस समय प्रचरणी नाम की स्रुक् से चार बार आाज्य ले कर आहुति दे देता है । अनुवाक्या तथा आहुति दोनों होता ही करता है । यह प्रचरणी अग्नि, आपः, ग्रावा, सविता इन चारों के लिए होती है अतः ध्रुवापात्र में से प्रचरणी स्रुक् में चार बार घृत ले राहुति देता है ॥ ११ ॥

[ ५८१ ]

पृष्ठ 596

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तृतीय काण्ड ( अ ० है ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या- ब्राह्मण जब यज्ञ का मस्तक कट गया तो छिन्नमस्तक वाले यज्ञ का रस बाहर निकल कर जल में प्रविष्ट हो गया । उस यज्ञ - रस को यज्ञ में सम्मिलित करने के लिए आज से पहले वसतीवरी पानी लाया जाता है और यज्ञ - रस को यज्ञ में सम्मिलित किया जाता है । एकधना पानी के आहरण के द्वारा अवशिष्ट यज्ञ रस को यज्ञ में सम्मिलित किया जाता है । किन्तु जब तक पशु होम न हो तब तक पानी नहीं लाया जा सकता । अतः पशुहोमाभाव में एकघना जाता जल का आहरण हो नहीं सकता । इसलिए पशुहोमस्थानीय प्रचरणी होम किया है ॥ १२ ॥

प्रचरणी होमाहुति का दूसरा प्रयोजन यह है कि पानी में अवशिष्ट सविता जो यज्ञ देवताओं - रस है उसका इस प्राहुति से वह प्रस्तार करता है । वह जिन अग्नि, आपः, ग्रावा, के लिए आहुति देता है, वे यजमान के यज्ञ की ओर यज्ञ रस का झुकाव कर देते हैं । अतः यह आहुति देकर ही एकधना जल लाना चाहिए ॥ १३ ॥

वह होता - ' शृणोत्वग्निः समिधा हवं मे शृण्वन्त्वापो धिषणाश्च देवीः । श्रोता ग्रावाणो विदुषो न यज्ञं शृणोतु देवः सविता हवं मे स्वाहा ॥ ' इस मन्त्र से आहुति देता है । अर्थात् प्रज्वलित अग्नि, चेतनावती आपोदेवियाँ आप:, वागदेवियाँ, विद्वान् ग्रावा अर्थात् सोम देवता तथा अनुज्ञाप्रदाता सविता मेरे आह्वान प्रदान को सुनें । अर्थात् ये चारों देवता आहुति से तृप्त हो कर एकधना जल लाने में अनुमति एक-करें । इसी मन्त्र की व्याख्या करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि समित् से प्रज्वलित अग्नि ग्रावा धना पानी लाने के कार्य में अनुज्ञा प्रदान करे । पानी में चेतना प्रभासित होती है । से यहाँ महान् सोम का ग्रहरण है जो कि चेतना का अधिष्ठाता है । इसीलिए ' विदुषः ' यह - विशेषरण ग्रावा का दिया है । इसी प्रकार अनुज्ञा प्रदान करने वाला सविता देवता एकधना पानी के द्वारा अवशिष्ट यज्ञ रस को लाने की अनुज्ञा प्रदान करे । सविता से अनुज्ञा प्राप्त करके ही ऋत्विक् यज्ञ - रस की प्राप्ति हेतु एकधना पानी लाने के लिए जाता है ॥ १४ ॥

इसके बाद जिस स्थान से एकधना जल लाया जाता है उस स्थान पर जा कर बहते हुए जल में आहुति दी जाती है । प्रचरणी होम होता करता है किन्तु बहते हुए जल में प्राहुति अध्वर्यु देता है । प्रचरणी होम करने के बाद अध्वर्यु उस प्रचरणी स्रुक् में चार बार घृत कर एकधना पानी लाने के लिए वेदि से उत्तर दिशा की ओर जाता हुआ होता से निम्नलि- — खित प्रैष करता है - ' अप इष्य होत: ' इति । अर्थात् हे होता! पानी की ओर गमनोचित “ प्रदेवत्रा ब्रह्मणे गातुरेत्वपो अच्छा मनसो न प्रयुक्ति । महीं मित्रस्य वरुणस्य धासि पृथुज्यसे रीरधा सुवृक्तिम् ॥ ” ( ऋ. १०1३० ) इत्यादि प्रपोनप्त्रीय सूक्त का अनुवचन करो । ' अप इष्य होत: ' में इष्य का होने अर्थ इच्छा है | अनुवाक्यारूप मन्त्रवाक् परमेष्ठी से उत्पन्न होती है । परमेष्ठी से उत्पन्न [ ५८२ ]

पृष्ठ 597

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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण वाली यह पारमेष्ठ्या आम्भृणी मन्त्रवाक् यज्ञ - रूपा है । यह होता इस यज्ञ - रूपा वाक् से यज्ञ-को विस्तृत करता है तथा वाग् यज्ञ से यज्ञ - रस को अपने अधीन कर लेता है । एकधना जल जिस घट में रखा जाता है वह घट भी एकधना कहलाता है । मूल में ' एतानु चैवैतदनु-तिष्ठते ' ' नेदेनानन्तरा ' में जो एतान् इस पुल्लिङ्ग का प्रयोग हुआ है वहाँ एकधना पानी का ग्रहण न हो कर एकधना पानी वाले घटों का ग्रहरण है । ग्रर्थात् वायु में रहने वाला विनाशक सुर प्राण उन घटों के जल में प्रवेश कर उस यज्ञ - रस को दूषित न करे क्यों कि वज्र - रूप वाक् चारों ओर विस्तृत हो कर वायु में विद्यमान संक्रामक प्रासुर प्राण को नष्ट कर देती है । इसलिए होता इस अनुवाक्यामन्त्र का उच्चारण करता है ॥१५ ॥

सोमयाग में १० चमसाध्वर्यु होते हैं । प्रकृतियाग में ये ग्राहवनीय, गार्हपत्य तथा प्राठ प्रकार की धिष्ण्याग्नियाँ इन नामों से व्यवहृत होते हैं । इनके पास एक- एक काष्ठ का चम्मच रहता है । इसीलिए ये अध्वर्यु चमसाध्वर्यु कहलाते हैं । चमसाध्वर्यु भिन्न - भिन्न देवता वाले हैं । इसी कारण इनके भिन्न - भिन्न नाम हैं । जैसे वरुरण सम्बन्धी चमसाध्वर्यु, ऐन्द्राग्न सम्बन्धी चमसाध्वर्यु श्रादि । इनमें मैत्रावरुणसम्बन्धी कार्य करने वाला जो चमसाध्वर्यु है उसे अध्वर्यु ' मैत्रावरुणस्य चमसाध्वर्यवेहि ' हे मैत्रावरुणसम्बन्धी चमसाध्वर्यु! आप भी पानी की ओर चलें, यह प्रैष करता है तथा नेष्टा ऋत्विक् से यह प्रैष करता है कि आप पैर धोने का जल लाने के लिए पत्नी को ले कर चलें । एकधना पानी लाने वाले परिकर्मी पुरुष एकधनी कहलाते हैं | उनसे भी अध्वर्यु एकधनी लोग आएँ, ऐसा प्रेष करता है । वसतीवरी पानी ला कर रात्रि को आग्नीधी वेदि पर रक्खा गया है । अब अध्वर्यु अग्नीध्र को आग्नीध्रीय वेदि पर रखे हुए वसतीवरी पानी को तथा होतृ चमस को ले कर चात्वाल पर बैठे रहने की और तब तक प्रतीक्षा करने की आज्ञा देता है जब तक कि एकधना पानी को ले कर न लौटें । उत्तरावे दि बनाने के लिए जिस गर्त से मिट्टी लाई जाती है उस गर्त को चात्वाल कहते हैं ॥१६ ॥

एकधना पानी लाने के लिए होता आदि चात्वाल व आग्नीध्रीय के बीच में हो कर उत्तर की ओर वेदि से निकलते हैं किन्तु वेदि से बाहर निकलने के बाद जिस दिशा में जल बहता रहता है उसी ओर पत्नियों के साथ चले जाते है ॥ १७ ॥

ऋत्विजों का पत्नियों के साथ एकधना जल लाने के लिए जाने का कारण बतलाते हैं कि जिस समय यज्ञ का मस्तक कट गया और उस छिन्नशिरस्क यज्ञ - पुरुष का रस प्रवाहित हो कर सोमरूप जल में प्रविष्ट हो गया, वहाँ उस समय सोमरूप जल में सोमरक्षक गन्धर्व बैठे थे । सोम भूत है और सौम्यप्रारण गन्धर्व है । भूत बिना प्राण के नहीं रह सकता जहाँ सोम भूत सत्ता है वहाँ उसका प्रालम्बन गन्धर्वप्रारण अवश्य रहता है । पृथिवी के १७ वें अहर्गण तक अमृताग्नि रहता है । १७ वें अहर्गण से ऊपर यज्ञ का रस सोममय पानी में प्रविष्ट हो गया है | अतः अग्नियज्ञ ( विष्णुयज्ञ ) की सत्ता २१ अहर्गण तक चली जाती है । इस-लिए १७ वें अहर्गण के बाद अग्निरूप यज्ञ का रस सोम में प्रविष्ट होने से उस पर सौम्य गन्धर्वप्राण का अधिकार हो जाता है ॥ १८ ॥

[ ५८३ ]

पृष्ठ 598

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तृतीय काण्ड ( श्र ० é ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या- ब्राह्मण आग्नेय देवताओं ने विचार किया कि ऐसा कौन सा उपाय करें, जिससे गन्धर्वों के अधिकार में गये हुए यज्ञ रस को नाशरहित निरुपद्रव अभयस्थान में वापस ले आएँ ॥१६ ॥

देवताओं ने विचार किया कि गन्धर्व स्त्रीप्रिय हैं । अतः यज्ञरस को लेने के लिए हम स्त्रियों के साथ चलें । तब स्वभाव से ही स्त्रेण गन्धर्व स्त्रियों को देखते ही उनमें आसक्त हो कर यज्ञरस को छोड़ देंगे और अवसर पा कर हम लोग निरुपद्रव स्थान में सोम को ले जाएँगे || २० || ऐसा विचार कर देवता पत्नियों के साथ यज्ञरस लाने के लिए गन्धर्वों के पास गए । पत्नियों को देखते ही गन्धर्व उनकी ओर आसक्त हो गये । अवसर पाकर देवताओं ने विनाशरहित निरुपद्रव स्थान में यज्ञरस का आहरण कर लिया ॥ २१ ॥

उसी प्रकार इस वैध मानुषयज्ञ में भी अध्वर्यु - ऋत्विक् गन्धर्वप्रारण के अधिकार में गये हुए यज्ञ को लाने के लिए पत्नियों के साथ जाते हैं । वे गन्धर्व स्त्री- कामी होने से स्त्रियों में श्रासक्त हो जाते हैं और वह यजमानादि विनाशरहित निरुपद्रव स्थान में यज्ञरस का आहरण कर लेते हैं ॥ २२ ॥

पत्नियों को साथ में ले कर यजमानादि के एकधना पानी के पास पहुँचने के बाद अध्वर्यु प्रचरणी स्रुक् में चार बार घृत ले कर पानी में आहुति देता है । इस आहुति देने का कारण यह है कि यज्ञरस पानी में ऋत भाव से फैल रहा है । उसका न केन्द्र है और न वह पिण्डरूप है । अग्निरूप घृत की आहुति देते ही जल में सर्वत्र फैला हुआ यज्ञरस आहुति स्थान पर इकट्ठा हो जाता है । प्राहुति स्थान ही यज्ञरस का केन्द्र बन जाता है । अत: ' सहृदयं सशरीरं सत्यम् ' इस परिभाषा के अनुसार ऋत, यज्ञरस अब सत्य बन जाता है तथा आसानी से ग्रहण किया जा सकता है । सारे यज्ञरस के यज्ञ में आ जाने से यज्ञ की अकृत्स्नता भी जाती रहती है ॥ २३ ॥

ज में घृताहुति देने का दूसरा कारण बतलाते हैं कि घृत यज्ञसाधन होने से यज्ञरूप है । यज्ञरूप घृताहुति से यज्ञ के रस को विस्तृत करता है और यज्ञ को समृद्ध करता है । अपि च जिन पांनपात् देवताओं के लिए यह आहुति दी जाती है उनको इस आहुति से तृप्त करता है । तृप्त देवता यज्ञरस को यजमान के अधीन और अनुकूल कर देते है । इस प्रकार उपर्युक्त तीन फलों को लक्ष्य में रख कर जल में घृताहुति दी जाती है || २४ || वह अध्वर्यु आहुति प्रदान करता हुआ निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करता है— " देवीरापोऽश्रपान्नपापादिति यो व ऊर्मिर्हविष्य: इन्द्रियावान्मदिन्तमः । तं देवेभ्यो देवत्रा दत्त शुक्रपेभ्यो येषां भाग स्थ स्वाहा " ॥ इति भगवान् याज्ञवल्क्य खण्डशः मन्त्र की व्याख्या करते हैं । अपशब्द स्त्रीलिङ्ग है । अतः यह अब्देवता देवीस्वरूप है । इसी अभिप्राय से ' अपांनपाद् देवीराप: ' ऐसा कहा है | जब तक | ५८४ | ,

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण शरीर में पानी रहता है शरीर पात नहीं होता । श्रतः न पातयति इति नपात् ' इस व्युत्पत्ति से इसे ' अपां नपात् ' कहा है । ' यो व ऊर्मिर्हविष्यः ' का अर्थ बतला रहे हैं । हविष्य शब्द का अर्थ यज्ञिय है । अर्थात् जलतरङ्ग यज्ञिय है । मेघों से जो जल बरसता है उसकी तीन गतियाँ हैं । जल का कुछ भाग भूमि में कूप वापी आदि के रूप में है । दूसरा भाग जमीन पर बहता है । तीसरा भाग ऊपर की ओर चला जाता है । ऊर्ध्वगत जल देवताओं में प्राहुत होने से देव हवि कहलाता है । इन्द्रियवान् का अर्थ वीर्यवान् है । चूँकि ऊर्ध्वगत जल के हल्का होने से उसमें अधिक सत्त्व ( वीर्यं ) है । ' मदिन्तमः ' का अर्थ स्वादिष्ट है । ऊर्ध्वगत जल में पृथिवी का भाग न होने से वह अधिक स्वादु होता है । ' तं देवेभ्यो देवत्रा दत्त ' इस मन्त्रांश द्वारा आपोदेवी से प्रार्थना की गई है कि ऐसे यज्ञ रस को, जो कि देवताओं की वस्तु है, देवताओं के लिए दे दीजिए । मन्त्रगत ' शुक्रपेभ्यः ' में शुक्र का अर्थ सत्य है । सत्य सोम की तरह देवताओं का अन्न है । वे सत्य का पान करने वाले व रक्षा करने वाले हैं । वस्तुतः सत्य ही देवताओं का स्वरूप है । इसीलिए ' सत्यसंहिता वै देवाः ' यह कहा गया है । ऐसे देवताओं के लिए जो उनका भाग यज्ञरस है उसे प्रदान कीजिए ॥२५ ॥

इसके बाद मैत्रावरुण सम्बन्धी चमसाध्वर्यु मित्रवरुणदेवताक चमस के द्वारा इस घृताहुति को दूर हटा देता है । आहुति का अपसारण करता हुआ वह निम्नाङ्कित मन्त्र का उच्चारण करता है— ' कार्षिरसि ' अर्थात् हुत आाज्यपदार्थ! आप कर्षरण करने वाले के अन्न हैं । अग्निभुक्त ङ्गार की तरह प्राज्याहुति आपोदेवता से भुक्त हो कर निःसार बन जाती है । अतः यज्ञ से उसको अलग कर दिया जाता है । सोमाभिषव करते समय मैत्रावरुण चमस में स्थित एकधना पानी सोम में मिलाया जाता है । रेतोरूप सोम का यदि घृताहुति से सम्बन्ध हो जाएगा तो वज्ररूप घृताहुति से रेतोरूप सोम का नाश हो जाएगा और उसमें दिव्यात्म प्रजनन शक्ति नहीं रहेगी । अतः वज्ररूप प्राज्याहुति को मैत्रावरुण चमस से दूर करके ही सोम में एकधना पानी लेना चाहिए ॥२६ ॥

तदनन्तर ' समुद्रस्य त्वाक्षित्या उन्नयामि ' इस मन्त्र से जल में प्रक्षीणता का प्रधान करता है । स्थावरजङ्गमात्मक सभी पदार्थों में काम लेने पर भी पानी क्षीण नहीं होते हैं । एकघना घटों को परिकर्मी लाते हैं तथा पैर धोने के जल को पत्नियाँ लाती हैं ॥ २७ ॥

होतृचमसादि अन्य चमसों के रहने पर भी मैत्रावरुण चमस से जल ग्रहण करने का कारण बताते हैं । यज्ञ जब देवताओं को छोड़ कर चला गया था उस समय इस प्रपक्रान्त यज्ञ का देवताओं ने मैत्रावरुण नामक ऋत्विक् कृत आह्वान - वाक्यों से आह्वान करना चाहा । अतः पुरोरुचा के द्वारा उसका प्ररोचन किया । ' अग्निर्देवेद्ध: ' इत्यादि निवेदन - साधन निविद् वाक्यों से उसको निवेदन किया था । अतः मैत्रावरुरणचमस के द्वारा एकधना पानी का ग्रहण करता है || २८ ॥ [ ५८५ ]

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तृतीय काण्ड ( अ ० 8 ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण पानी लेने के लिए जाते समय अध्वर्यु द्वारा आग्नीध्र से कहे अनुसार आज आग्नीध्र वसतीवरी व होतृचमस के साथ चात्वाल पर उपस्थित रहता है और चात्वाल के ऊपर निम्नलिखित मन्त्र बोलता हुआ मैत्रावरुण चमस और वसतीवरी दोनों का परस्पर स्पर्श करववाता है – “ समापो अद्भिरम्मत समोषधीभिरोषधीः " इति । अर्थात् मैत्रावरुण चमस से गत जल होतृचमसजल के साथ तथा व्रीहादिरूप औषधियाँ व्रीहादिरूप प्रौषधियों संगत हों । आग्नीध्र होतृचमस में रक्खे हुए वसतीवरी पानी को मैत्रावरुण चमस में रक्खे हुए निग्राभ्या जल अर्थात् पहिले दिन लाये गए यज्ञ रस को आज लाये गये यज्ञ - रस से परस्पर मिलाना है ॥ २६ ॥

कतिपय याज्ञिक मैत्रावरुण चमस से वसतीवरी में लाते हैं । इस प्रकार दोनों वसतीवरी जल को लाते हैं तथा मैत्रावरुण चमस जलों का मेल कराते हैं न कि पात्रों का । किन्तु भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि मैत्रावरुण चमसपात्र तथा होतृ आधवनीय चमसपात्र काही परस्पर आग्नीध्र मेल कराता है । न कि पात्रस्थित जलों का । क्यों कि पात्र में वसतीवरी तथा निग्राभ्या जलों को मिलाते समय ही पहले दिन लाये हुए तथा आज लाये हुए यज्ञ रस का मेल हो जाता है । इसके अनन्तर आग्नीध्र के हाथ में स्थित होतृचमस को ध्वर्यु ले लेता है तथा उसमें पहले दिन लाये हुए वसतीवरी जल को निग्राभ्य जलों में डालने के लिए उसे ग्रहरण कर लेता है । क्यों कि चात्वाल से ही भुवन - स्वर्गवासी देवता द्युलोक में गये थे अतः इस चात्वाल पर ही पात्रस्थित दोनों जलों का संसर्ग करता हुआ अग्नीध्र यजमान के लिए स्वर्ग मार्ग को प्रकाशित करता है ॥ ३० ॥

पश्चात् अध्वर्यु आदि ऋत्विक् उत्तरावेदि के पास आते हैं । तब होता अध्वर्यु से पूछता है ' अध्वर्थी प्रवेरपा इति ' । अर्थात् हे अध्वर्यु! क्या तुमने यज्ञरस- रूप पानी प्राप्त कर लिया? अध्वर्यु उत्तर देता है कि ' नन्नमुः । अर्थात् पानी हमारी ओर झुक गए, अर्थात् यज्ञरस अपने आप मिल गया || ३१ || अग्निष्टोम प्रत्यग्निष्टोम, उक्थ्यस्तोम, षोडशीस्तोम, अग्निरापस्तोम, वाजपेयस्तोम, प्राप्तोर्यामस्तोम भेद से सप्तसंस्थ ज्योतिष्टोम में यदि अग्निष्टोम क्रतु हो तो जिस प्रचरणी में चार बार घृत ले कर पानी में आहुति दी गई थी यदि उस प्रचरणी में घृत का कुछ भाग अवशिष्ट हो और वह होम के लिए पर्याप्त हो तो उसकी तथा यदि पर्याप्त न हो तो चार बार और घृत ले कर उसकी, निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए आहवनीय में हुति दे देनी चाहिए- ' यमग्ने पृत्सु मर्त्यमवा वाजेषु यं जनाः । स यन्ता शश्वतीरिषः स्वाहा ' sa | अर्थात् नि! युद्धों में जिस मनुष्य को श्राप बचाते हैं तथा अन्न रूप में जिस मनुष्य को आप प्राप्त होते हैं वह मनुष्य युद्धों में विजय प्राप्त करता है तथा अन्न प्राप्त करता है । अग्निष्टोम अग्नि - स्वरूप ही है । अपिच यह ऋचा मर्तवती है तथा अग्निष्टोम पुरुष-सम्मित है । इसका निरूपण यज्ञपुरुष - ब्राह्मण में किया जा चुका है । क्यों कि यज्ञ, पुरुष-[ ५८६ ] A