Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 601–610

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 601–610

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तृतीय काण्ड ( अ ० ) शतपथ ब्राह्मण [ ५८७ ] सुत्या ब्राह्मण रहने वाली आग्नीध्रीय वेदि पर यह अग्निष्टोम ग्रहीन यज्ञ ( एक तीन कर्म होते हैं । पहले दिन सम्मित है इसीलिए मर्तवती ऋचा से आहुति दी जाती है । इस प्रकार यदि अग्निष्टोम यज्ञ है तो उपर्युक्त आग्नेयी ऋचा का उच्चारण करते हुए प्राज्य की आहुति देनी चाहिए || ३२ || यदि उक्थ्यस्तोम हो तो अग्नि के तीनों ओर पूर्व, दक्षिण, उत्तर में लगी हुई जो कामी ( श्रीपर्णी की बनी हुई ) तीन परिधियाँ हैं उनमें मध्यम परिधि अर्थात् पूर्व की ओर की परिधि का स्पर्श मात्र कर ले । मध्यम परिधि का स्पर्श इसलिए किया जाता है वह परिधि दोनों के मध्य में होने से केन्द्रभूत परिधि है । उसका स्पर्श करने से तीनों परिधियों का गतार्थ हो जाता है । उक्थ्यस्तोम से पूर्व अग्निष्टोम व प्रत्यग्निष्टोम ये दो संस्थाएँ हैं । उत्तरवर्ती उक्थ्यस्तोम करने वाले को पूर्व की दोनों संस्थानों को करना आवश्यक है । इस प्रकार उक्थ्यस्तोम में अग्निष्टोम प्रत्याग्निष्टोम व उक्थ्य ये तीन उक्थ हो जाते हैं । श्रग्नि की परिधियाँ तीन हैं । ये तीनों परिधियाँ तीन उक्थ हैं । इन तीनों परि-धियों के स्पर्श से त्रिसंस्थ यज्ञ प्रतिष्ठित हो जाता है । यदि अतिरात्र स्तोम अथवा षोडशी स्तोम करना हो तो न आहुति दे और न मध्यम परिधि का स्पर्श करे, किन्तु ' यमग्ने पृत्सु ' इत्यादि मन्त्र का उच्चारण कर चुपचाप ( तूष्णीं ) देवयजन में आ जाना चाहिए । इस प्रकार अनिष्टोमादि यज्ञों के भेद करता हुआ अध्वर्यु श्रग्निष्टोमादि यज्ञों को परस्पर विभक्त करता है ॥ ३३ ॥

यज्ञों में एकघना घट प्रयुग्म संख्या वाले होते हैं अर्थात् ३ से ले कर १५ संख्या वाले होते हैं । अग्निष्टोम व अत्यग्निष्टोम में तीन हों या पाँच हों । अग्निष्टोम व प्रत्यग्निष्टोम में ' एक ही व्यवस्था होती है । अतः दोनों में ३ या ५ प्रयुग्म घट होने चाहिएँ । उक्थ्यस्तोम ५ या ७ । षोडशीस्तोम में ७ या है । वाजपेयस्तोम में 8 या ११ । प्रतिरात्र में ११ या १३ । प्राप्तोर्यामस्तोम में १३ या १५ होने चाहिएँ । पूर्व के छहों स्तोमों में द्वन्द्व - सम्पत्ति विद्यमान है । क्यों कि द्वन्द्व ही मिथुन है और मिथुन ही प्रजनन सम्पत्ति का कारण है । ३ से ले कर १५ तक २, ४, ६, ८, १०, १२, १४ ये द्वन्द्व हैं । इनसे एकधना पानी में दिव्या-प्रजनन शक्ति आती है और द्वन्द्व के अतिरिक्त जो ३, ५, ७, ६, ११, १३, १५ में द्वन्द्व-सम्पत्ति के बाद १, १ संख्या बच जाती है, वह यजमान की श्री सम्पत्ति है क्यों कि अति-रिक्त सम्पत्ति ही धन कहलाती है । इस यजमान - लक्ष्मी रूप अतिरिक्त एकधन के कारण ही इन ३, ५, ७, ६, ११, १३, १५ घटों को एकधना कहा जाता है || ३४ || [ विज्ञान भाष्य ] वसतीवरी को उत्तरावेदि के उत्तर में रख दिया गया । बस - सुत्त्या वाले पहले दिन इतना ही काम होता है । दिन का काम ) कहलाता है । प्रत्येक यज्ञ में दीक्षा, सुत्या, उपसत् - ये दीक्षा होती है - दूसरे दिन उपसत् होता है एवं तीसरे दिन उपसत् होता है - इस प्रकार प्रत्येक यज्ञ त्रिपर्वा होता है । इन तीनों में से दीक्षाकर्म्म समाप्त हो चुका एवं सुत्याङ्ग सम्बन्धी पशु - याग भी समाप्त हो

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तृतीय काण्ड ( ० 8 ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण चुका । अब सवनाय पशु - कर्म होगा । इसके पहले दिन सायंकाल से अर्थात् सूर्यास्त से पहले पहले वस-तीवरी पानी ले पाते हैं एवं उसका सारे यज्ञ से सम्बन्ध कराने के बाद उसे आग्नीध्रीय पर रख देते हैं । बस, पहले दिन इतना ही काम किया जाता है । पानी को रख कर सब ऋत्विक् “ सदोमण्डप " में आराम करने के लिए जाते हैं । हविर्वेदि के प्राहवनीय से पूर्व “ सदोमण्डप " है । उससे पूर्व हविर्धान मण्डप है | उससे पूर्व उत्तरावेदि है । उससे पूर्व यूप है । बस, हविर्वेदी के गार्हपत्य से यूप तक ही यज्ञ वितत रहता है । इसमें जो सदोमण्डप है - उसमें सारे ऋत्विक् आराम करते हैं- भोजन भी इसी में करते हैं- सोते भी इसी में हैं एवं ठाली वक्त में भी यहीं बैठ कर गपशप किया करते हैं । सदोमण्डप में ही यह सब काम क्यों करते हैं? १ जिस दिन वसतीवरी पानी लाया गया है - उसके दूसरे दिन प्रातःकाल ही सवन- प्रातरनुवाकादि कर्म होते हैं । अतएव अध्वर्यु सदोमण्डप में सोते हुए उन ऋत्विजों को और दिनों की अपेक्षा जल्दी ही उठा लेता है । उन्हें प्रपर रात्रि में चौथे याम में ( ३ बजे ) जगा देता है । ताकि वे प्रातरनुवाकादि कर्म्म के लिए सम्बद्ध हो जाएँ । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" तान् ( सदोमण्डपस्थान् - ऋत्विजः ) सम्प्रबोधयन्ति ( अध्वर्यु - -यज- 2 मानः ) " । जगाने के साथ ही सब ऋत्विक् उठ खड़े होते हैं, एवं उठते ही पानी का स्पर्श करते हैं - प्रर्थात् पानी से अपना सम्बन्ध करते हैं । अर्थात् नित्य कर्मों से स्नानादि से निवृत्त होते हैं । इस प्रकार नित्य-कर्मों से निवृत्त हो कर वे सब लोग जिस स्थान पर वसतीवरी पानी रक्खा हुआ है - उस स्थान पर आते हैं-" ase उपस्पृश्य प्राग्नीध्रमुपसमायन्ति " । इस प्राग्नीधीय वेदि पर ही घृत भी रक्खा रहता है । वे ऋत्विक् लोग आग्नीध्रीय के पास श्र कर उस घृत को उठा लेते है । एवं वहाँ से वापस उत्तरावेदि के पास श्रा जाते हैं- एवं वहाँ पर आकर उस घृत को उत्तरावेदि के ऊपर रख देते हैं-" ताज्यानि गृह्णते । गृहीत्वाज्यान्यायन्ति । आसाद्याज्यानि " ॥१ ॥

इस प्रकार घृत को रख कर तदनन्तर हविर्धानमण्डपस्थ शकट में रक्खे हुए सोम राजा को शकट से नीचे उतारते हैं । श्रागत सोमवेलड़ियों के प्रादेशमात्र खण्ड कर उनकी एक - एक पूली बना ली जाती है - एवं - उन सब पूलियों को हविर्धानमण्डपस्थ शकटों में रख दिया जाता है । ऊपर से कपड़ा बाँध कर गाँठ लगा दी जाती है । दक्षिण हविर्धान से दक्षिण में उस शकट से बिलकुल भिड़ा हुआ ही उपरव होता है । वे उपरव इन्द्रियस्थानीय होने के कारण कुल चार होते हैं जिनका कि विस्तृत विवेचन उपरव ब्राह्मण में कर दिया गया है । उस उपरव पर सिल्ला रक्खी रहती है एवं सिल्ला के नीचे पहले मृगचर्म्स बिछा १. इसका विस्तृत विवेचन " सदोब्राह्मण " नामक प्रकरण में देखना चाहिए । [ ५८८ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० e ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण दिया जाता है । शिला के ऊपर सोम कूटने के लिए चार पत्थर रहते हैं । शकट से सोम को कृष्ण मृगचर्म पर रख दिया जाता है एवं उन पत्थरों से उसे कूट कर उसका रस निकाला जाता है । अब थोड़ी देर बाद सोमाविषव होने वाला है - अतएव श्रध्वर्यु हविर्धान से सोम को उतार कर नीचे मृगच पर उसे प्रतिष्ठित करता है । सोम यज्ञ - स्वरूप है । श्राज यह शकट में प्रतिष्ठित है । ऐसी अवस्था में उसे नीचे गिराना उसे प्रतिष्ठा से च्युत करना है । कोई यह न समझ ले - इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यह पृथिवी प्रतिष्ठा स्वरूप है । प्रतिष्ठा दो प्रकार की है - ( १ ) एक स्वप्रतिष्ठा ( २ ) एक पर प्रतिष्ठा । टेबिल पर रखी हुई पुस्तक की जो अपनी प्रतिष्ठा है जिसके कारण पुस्तक - पुस्तक-स्वरूप में विद्यमान है - वह स्वप्रतिष्ठा कहलाती है एवं पुस्तक टेबिल पर प्रतिष्ठित है । यदि टेबिल हटा दी जाए तो पुस्तक भी नीचे गिर जाए । यह प्रतिष्ठा पर प्रतिष्ठा है । टेबिल की जो पुस्तक में प्रतिष्ठा है - वह पर प्रतिष्ठा है एवं अपनी स्वरूप - रक्षिणी प्रतिष्ठा स्वप्रतिष्ठा है । इसी प्रकार टेबिल में भी अपनी प्रतिष्ठा स्वप्रतिष्ठा है । पृथिवी की प्रतिष्ठा पर प्रतिष्ठा है । इस प्रकार संसार के यच्च यावत् पदार्थों में दोनों प्रतिष्ठा रहती हैं । दोनों में स्वप्रतिष्ठा ही असली प्रतिष्ठा है । यह असली प्रतिष्ठा पृथिवी ही है । पार्थिव प्रजाओं की जन्मदात्री प्रतिष्ठा यही पृथिवी प्रतिष्ठा है । यदि पृथिवी-प्रतिष्ठा न होती तो सोमादि पार्थिव पदार्थों की प्रतिष्ठा का कहीं पता भी न लगता । यह प्रतिष्ठा प्रजाओं की जनू ( जन्मदात्री ) प्रतिष्ठा है । इसी प्रतिष्ठा से सब प्रतिष्ठित हैं । शकट तो सोम की पर-प्रतिष्ठा है । असली प्रतिष्ठा माता पृथिवी ही है । माता की क्रोड ही तो सच्ची प्रतिष्ठा है । आज सोम को नीचे गिराया नहीं जाता अपितु वास्तविकी प्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित किया जाता है । अपि च इस सोम को प्राहुति द्वारा प्रकृतियज्ञवत् द्युलोक में पहुँचाना है । प्रकृतियज्ञ में सोम पृथिवी से द्युलोक में जाता है । न कि शकट से पार्थिव प्रारण सम्बद्ध सोम ही द्यु में जाता है । द्यु का पृथिवी से सम्बन्ध है न कि शकट से । " यद्वै देवा अकुर्वंस्तत् करवारिण " के अनुसार इस सोम को पृथिवी से ही भेजना उचित है । अतएव पहले इसे पृथिवी प्रतिष्ठा पर ही प्रतिष्ठित करना चाहिए । इसी अभिप्राय को लक्ष्य में रख भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-" इयं वै प्रतिष्ठा जून: ( जन्मदात्री - जन्मभूमिः ) आसां ( उत्पत्तिम-तीनां सर्वासां परिदृश्यमानानां जड़चेतन प्रजानां ) प्रजानाम् । प्रतिष्ठां अभि - उपावहरति " । प्रतिष्ठा की ओर उसे उतारते हैं न कि उलटा उसे नीचे गिराते हैं । उसी पूर्वोक्त प्रकृति के विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहते हैं-ऐसा करता हुय्रा ऋत्विक् इस सोम को पृथिवी से ही उत्पन्न करता है एवं इसी पृथिवी से इसे द्युलोक तक वितत करता है - प्रर्थात् प्रकृति में सोम पृथिवी से ही उत्पन्न होता है एवं वहीं से द्युलोक की ओर जाता है । अतः यहाँ भी नीचे पृथिवी पर रखना पृथिवी से ही उत्पन्न करना है एवं वहीं से उसे लोक तक वितत करना है----[ ५८६ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण " तं ( सोमम् ) अस्यै ( अस्याः सकाशात् ) तनुते ( विस्तारितवान् भवति ) तमस्यै जनयति ( उत्पादितवांश्च भवति ) ” । शकट के दोनों ओर दो दण्ड रहते हैं । जहाँ पर गाड़ीवान बैठता है - उसके दोनों ओर से शकट के अन्त तक दो लम्बी लकड़ियाँ रहती हैं । एवं वे आगे - आगे सिकुड़ती जाती हैं । यहाँ तक कि वे अन्त में दोनों एक हो जाती हैं । इन दोनों लकड़ियों को ' ईषा ' कहा जाता है । इनके बीच में खाली जगह रहती है । बस उन सोम की पूलियों को उन इषाओं के बीच में हो कर ही जमीन पर पर डालनी चाहिए । जैसे अनाज वगैरः उतारा जाता है वैसे सोम को हर्गिज नहीं उतारना चाहिए अपितु उन दोनों के बीच में हो कर उतारना चाहिए । कारण इसका यही है कि यह शकट यज्ञ स्वरूप है । शकट को यज्ञ - साधक-त्वात् यज्ञ कहते हैं । यह यज्ञ इसी शकट पर प्रतिष्ठित रहता है । श्रतएव श्राधाराधेयाभेदविक्षया हम इस शकट को यज्ञ कहने के लिए तय्यार हैं । श्रपिच वेद में शकट के भी मन्त्र मिलते हैं । यज्ञ - पद्धति में पाकट शामिल है, इसलिए भी शकट को यज्ञ कहा जाता है । जैसा कि श्रुति कहती है-" यज्ञो वामनः । यज्ञो हि वामनः । तस्मादनस एव यजूंषि सन्ति न कौष्ठस्य न कुम्भ्यै " । ( शत ० ब्रा ० १1१/२/७ ) श्राज सोम यज्ञरूप इसी शकट पर प्रतिष्ठित है । ऐसी अवस्था में इसे अनाज वगैर: की तरह उतारना यज्ञ से पृथक् करना है । अतएव इसे वैसे न उतार कर दोनों ईषों के बीच में से उतारना चाहिए । ऐसा करने से यह सोम यज्ञ के बाहर नहीं होगी । अपितु यज्ञ रूप दोनों ईषानों के बीच में जाने से यज्ञ के बीच में ही रहेगा --" अन्तरेणेषेऽउपावहरति । यज्ञो वाऽग्रनः । तन्वेव यज्ञान्न बहिर्धा करोति " । हमने बतलाया था कि शकट के नीचे ही पास में उपरव पर रक्खी हुई शिला पर सोमाभिषवार्थ चार पत्थर ( लोढी ) रक्खे रहते हैं । उतरे हुए सोम को उन पत्थरों के बीच में रखना चाहिए । ऐसा करने से वह सोम पत्थरों के सम्मुख हो जाता है । इस प्रकार रखने की आवश्यकता क्या है? इसका उत्तर यही है कि सोम क्षत्र है- श्रर्थात् राजा है - इसीलिए " सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा " यह कहा जाता है एवं ग्रावा ( पत्थर ) उस सोम की प्रजा है । सोम घन - तरल - विरल भेदेन तीन प्रकार का होता है । इनमें से जो घनसोम होता है - वही पाषाण बनता है । पत्थर घनसोम का साक्षात् स्वरूप है । सोम किन - किन पदार्थों का निर्माण करता है - यह निम्न श्रुतियों से स्पष्ट हो जाता है-" after ओषधीः सोम विश्वास्त्वमपो अजनयस्त्वं गाः । त्वमानवन्तरिक्षं त्वं ज्योतिषा वि तमो ववर्थ । ( ऋग्वेद मं. १।११।२२ ) [ ५६० ]

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तृतीय काण्ड ( ० 8 ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण श्रद्रि में यही सोम है । सोम ही प्रद्रि बना हुआ है, अतएव हम इन पत्थरों को सोम की प्रजा कहने के लिए तय्यार हैं । सोम राजा है - पत्थर प्रजाहैं । इस प्रकार इन पत्थरों के बीच में सोम को रखता हुप्रा अध्वर्यु पत्थर रूप प्रजा के ऊपर उस सोम राजा को सवार करता है- अर्थात् राजा को प्रजा पर अधिष्ठाता बनाता है एवं बीच में रखने से सोम उस सारी प्रजा के सम्मुख हो जाता है । इससे विश ( प्रजा ) को ही राजा के सम्मुख अभिवादनशील बनाता । तात्पर्य यही है कि प्रकृति में अध्वर्यु वायु द्वारा यह सोम जिसके आत्मा में प्रविष्ट होता है - वह प्रजा पर हुकूमत करने वाला बनता है, क्योंकि जैसे बृहस्पति प्राण- देवता ब्रह्मवीर्य्यं के अधिष्ठाता हैं- विश्वेदेव विड्वी के अधिष्ठाता तथैव यह सोम क्षत्रवीर्य के अधिष्ठाता हैं । एवं प्रध्वर्यु वायु उसे प्रजा के सम्मुख कर देता हैं । यही कारण है कि राजा के चारों ओर प्रजा सम्मुख हो कर ही खड़ी रहती है । कोई भी प्रजा राजा को पीठ दे कर खड़ी नहीं हो सकती । यह पत्थर उसी सोम की प्रजा है । अतः प्रकृतिवत् सोम को इनके बीच में ही रखना चाहिए । इससे फल यही होता है कि यजमान प्रजा सदा यजमान की ओर श्रभिवादिनी ( अनु-कूल ) ही रहती है । इसी अभिप्राय से कहते हैं--" ग्रावसु सम्मुखेष्वधिनिदधाति । क्षत्रं वै सोमः । विशो ग्रावारणः । क्षत्र-मेवैतद् विश्यध्हति । तद्यत् सम्मुखा भवन्ति - विशमेवैतत् समुखां क्षत्रियमभि

विवादन करोति । तस्मात् सम्मुखा भवन्ति ॥३ ॥

सोम को क्यों नीचे उतारा जाता है - कैसे उतारा जाता है - किधर से उतारा जाता है - कहाँ पर उतारा जाता है - इत्यादि विषयों की उत्पत्ति बतला दी गई । अब पद्धति बतलाते हैं । वह अध्वर्यु -" हृदे त्वा मनसे त्वा दिवे त्वा सूर्याय त्वा । ऊर्ध्वमिममध्वरं दिवि देवेषु होत्रा यच्छेति " ॥ ( बा ० स ० ६।२५ ) “ विश्वास्त्वं प्रजा उपावरोहन्तु " । यह मन्त्र बोलता हुआ उस सोम को शकट के नीचे उतारता है । ( वा ० सं ० ६।२६ ) मन्त्र के प्रत्येक का भाग का अर्थ किया जाता है । सबसे पहले - " हृदे त्वा मनसे त्वा " " यह कहा गया है । हे सोम! हृदय के लिए और मन के लिए मैं तुझे उतारता हूँ । हृदय, स्थान है एवं मन स्थानाधिष्ठाता है । हृदय में ही मन प्रतिष्ठित रहता है । अतएव -" हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु " । ( यजुर्वेद ३४।६ ) यह कहा जाता है । संसार में जो भी कुछ कामना उठती है - हृदयस्थ मन से ही उठती है । खाना - पीना सोना उठना - सब कुछ मन पर निर्भर है, यद्यपि इन्द्रियाँ ही सारा काम करती हैं, परन्तु बिना इस हृत्प्रतिष्ठ प्रज्ञा - मन के सब इन्द्रियाँ बेकार हैं । प्रतएव श्रुति कहती है-१. ' वा ० सं ० ६।२५ ' । [ ५६१ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० e ) शतपथ ब्राह्मण " न हि प्रज्ञापेता धीः काचन सिध्येत् " । ( कौ ० ब्रा ० उप ० ३।७ ) सुत्या ब्राह्मण इस सोम से उस आत्मा का हृदय और मन बनाया जाता है । इधर यजमान हृदय प्रतिष्ठ मन से ही उस काम की इच्छा करता है जिसके लिए कि वह यजन करता है प्रथात् - यज्ञ फल के लिए-दिव्यात्मा बनाने के लिए यजमान सोमाहुति देता है । दिव्यात्मा में हृदय और मन ही प्रधान हैं, अतएव हम कह सकते हैं कि सोम को हृदय के लिए एवं मन के लिए ही उतारा जाता है । अथवा यों समझना चाहिए कि यजमान स्वर्ग प्राप्ति कामना के लिए ही यजन करता है एवं उसी कामना को पूरी करने के लिए सोम उतारता है । कामना - हृदय प्रतिष्ठ मन का धर्म है । सारी कामनाएँ मन से ही उठती हैं । मन ही कामनाओं का उक्थ है । अतः स्वर्गप्राप्तिरूपा कामना के लिए इसे उतारना - कामना-प्रभव - हृदय प्रतिष्ठ मन के लिए ही उतारना है । बात वास्तव में सच है । मन में जो इच्छा हो रही हैं, उसे शान्त कर - मन की तृप्ति के लिए ही मन के इच्छाजनित क्षोभ को मिटाने के लिए ही तो सोम उतारा जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" स उपावहरति - हृदे त्वा मनसे त्वेति । यजमानस्यैतत्कामाय आह हृदयेन हि मनसा यजमानस्तं कामं कामयते यत्काम्या यजते । तस्मादाह हृदे त्वा मनसे त्वेति " ॥४ ॥

दूसरा भाग है - " दिवे त्वा सूर्य्याय त्वेति " हे सोमदेव! मैं आपको द्युलोक के लिए एवं सूर्य्यलोक के लिए उतारता हूँ । इस सोम की प्राहुति द्युलोकस्थ सौर प्रारणरूप विश्वेदेवताओं को तृप्त करती है । हम जो आहुति देते हैं, वह अन्न द्वारा विशकलित हो कर सौर प्राणों को श्राप्यायित करती है । सौर-प्राण का नाम ही देवता है । इसीलिए -" चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुमित्रस्य वरुणस्याग्नेः ” 1 ( ऋग्वेद सं ० १।११५।१ ) यह कहा जाता है । प्राण प्राणी सूर्य से अभिन्न हैं । ऐसी अवस्था में इन देवताओंों के लिए सोम को उतारना - सूर्य्य लोक के लिए ही उतारना है । अध्यात्मा में अव्यय के मन प्रारण वाक् रूप सृष्टि साक्षी-भाग से ही सारे विश्व का निर्माण होता है । अध्यात्म में भी वही मन प्राण वाक् हैं - प्रधिदैवत में भी वही मन प्रारण वाक् हैं । मन प्राण वाक् से उत्पन्न आध्यात्मिक पदार्थ वैश्वानर- तैजस - प्राज्ञ नाम से व्यव-हृत होते हैं । वैश्वानराग्नि वाक् है । तैजस - वायु प्राण है एवं प्राज्ञ इन्द्र मन है । अधिदैवत में ये ही तीनों पृथिवी अन्तरिक्ष वायु - सूर्य्य कहलाते हैं । पृथिवी, वाक् है - वायु, प्रारण है- सूर्य्य, मन है । इसीलिए सूर्य को " उद्गीथ " कहा जाता है । इधर प्रज्ञा मन हृदयाकाश में प्रतिष्ठित रहता है - उधर सूर्य्य - मन पुराणाकाश में प्रतिष्ठित रहता है । अध्यात्म की कामनाएँ हृदय प्रतिष्ठ मन से उठती हैं- अधिदैवत प्रजा-पति की कामनाएँ सूर्य्य - मन से उठती हैं । अध्यात्म इच्छा स्वर्ग प्राप्ति से मिटती है । सूर्य की तृप्ति आहुति से होती है । यहाँ पर जो सोमाहुति दी जाती है, उससे स्वर्ग भी मिल जाता है एवं सौर प्राण [ ५६२ ] J

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण भी आप्यायित हो जाते हैं । बस इन दो के लिए ही तो सोमाहुति होती है । यजमान का स्वर्ग जाना और सौर प्राणों का आप्यायन होना, सोम - यज्ञ के ये ही दो फल हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " दिवे त्वा सूर्य्याय त्वेति । देवलोकाय त्वेत्येवैतदाह - यदाह दिवे त्वेति । सूर्याय त्वेति - देवेभ्यस्त्वेत्येवैतदाह " । हुति से लोक भी श्राप्यायित होता है एवं लोक में रहने वाले प्राण देवता भी प्राप्यायित होते हैं । अतएव - " दिवे त्वा - सूर्य्याय त्वा " " यह कहा गया है । स्वर्ग से हृदंबल भी बढता है एवं मनोबल भी बढता है । दोनों में एक प्रकार का अतिशय उत्पन्न होता है, अतएव " हृदे त्वा मनसे त्वा ' बा १२ यह कहा है । मन्त्र का तीसरा पद है— " अध्वरं दिवि देवेषु होत्रा यच्छ " इति । हे सोम! आप इस सोम यज्ञ को द्युलोक में पहुंचा दीजिए एवं यज्ञकर्त्ता ऋत्विजों को देवताओं में पहुँचा दीजिए । श्राहुति से जो यज्ञात्मा बनता है - वही यजमान का दिव्यात्मा कहलाता है - वही स्वर्ग में जाता है । जाते हुए सोम से प्रार्थना की जाती है कि इस यज्ञ को और यज्ञकर्त्ताओंों को पृथिवीलोक से ऊपर जाते हुए प्राप द्युलोक में एवं देवताओं में प्रतिष्ठित कर दीजिए-" अध्वरो वै यज्ञः । ऊर्ध्वमिमं यज्ञं दिवि देवेषु होत्येवैतदाह " ॥५ ॥

मन्त्र का चौथा पद है-“ सोम राजन् विश्वास्त्वं प्रजा उपावरोह " इति । ( बा ० सं ० ६।२६ ) हे सोम राजन्! आप इन सारी प्रजानों पर उतरिए अर्थात् इन पर अपना आधिपत्य कायम कीजिए - प्रजा की ओर उतरिए - यही तात्पर्य है । इसी अभिप्राय से कहते हैं - वह अध्वर्यु " सोम राजन् विश्वास्तत्वं प्रजा उपावरोह " यह बोलता हुआ इन ग्रावरूप प्रजानों के प्राधिपत्य के लिए इन पर

राज्य करने के लिए - सोम को उतारता है ।

" तदेनमासां प्रजानामाधिपत्याय - उपावहरति ॥६ ॥

सोमवल्ली के श्रंशु एक वस्त्र में बँधे रहते हैं । उन्हें पूर्वोक्त मन्त्र से नीचे उतार लेते हैं । नीचे उतार कर उस वस्त्र ग्रन्थि को खोल कर उस सोम का उपस्थापन करते हैं - प्रर्थात् निम्नलिखित मन्त्र से प्रार्थना स्तुति करते हैं --१ ' वा ० सं ० ६।२५ ' । २' वा ० सं ० ६।२५ ' । [ ५६३ ]

पृष्ठ 608

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण " विश्वास्त्वां प्रजा उपावरोहन्तु " इति । ( वा ० सं ० ६।२६ ) तुम्हारे साथ - साथ सारी प्रजा की प्रतिष्ठा प्रजा से बहुत अधिक है । राजा भोक्ता है- प्रजा भोग्य है । भोग्य सामग्री राजा के पास आती है न कि राजा भोग्य सामग्री के पास जाता है । राजा स्वतन्त्र है, प्रजा परतन्त्र | प्रजा राजा के आश्रय में रहती है न कि राजा प्रजा के आश्रित रहता है । प्रजा राजा के पास आया करती है । जब राजा सवारी लगा कर निकलता है तो प्रजा अपने आप उसके अनुगत हो जाती है । प्रजा के साथ राजा नहीं फिरता फिरता रहता । हर हालत में राजा मुख्य है- प्रजा गोण है । प्रजा राजा के पास जाती है न कि राजा प्रजा के पास जाता है । ऐसी अवस्था में सोम को नीचे उतारते समय जो " सोम राजन् विश्वास्त्वं प्रजा छपावरोह " " ( हे सोम राजा! आप प्रजानों की ओर उतरिए एवं प्रजाओं की ओर प्राइए " ) यह कहना है - वह सर्वथा अनुचित है । ' ऐ राजाजी! आप प्रजा की ओर उतर आइए ' यह कहना - राजा के स्वरूप के सामने सर्वथा बुरा है । इन शब्दों से राजा पर प्रजा की हुकूमत झलकती है । प्रजा के लिए उतरिए - इसमें राजा विधेय पड़ जाता है - प्रजा उद्देश्य रहती है - ' जैसे किसी मामूली ओहदेदार को कहा जाता है कि अजी तुम प्रजा की सम्भाल करने | जैसे चौकीदार को कहा जाता है कि तुम प्रजा की रक्षा करने रात को गश्त देने आओ । बस ऐसा ही - हे सोम! प्रजा के लिए प्रजा की ओर उतरिये ' यह कहना है । इससे राजा गौण हो जाता है । एवं प्रजा मुख्य बन जाती है । श्रपिच - जब राजा उतरता है तो उस समय ' प्राइए ' यह नहीं कहा जाता । ' आइए - पधारिए ' ऐसे शब्द राजा की शान के खिलाफ हैं । अतएव " सोम राजन्! विश्वास्त्वं प्रभा उपावरोह " - यह कहता हुआ ग्रध्वर्यु - स्वरूप के विपरीत कहता है । स्वरूपानुकूल बोलना- यथायथ कह-लाता है । स्वरूप से विपरीत बोलना ' श्रयथायथ ' कहलाता है । क्योंकि सोम क्षत्र है अर्थात् राजा है । ऐसी अवस्था में " प्रजा की ओर उतरिए " यह कहना पापवस्यस ( श्रौंधा काम ) करना है । पाप बुरे काम को कहते हैं - वसीय श्रेष्ठ काम को कहते हैं । दोनों की खिचड़ी को " पापवस्यस " कहते हैं । जिसमें अच्छे - बुरे का विवेक नहीं है- जो साधारण तुच्छ व्यवहार है - वही ' पापवस्यस ' कहलाता है । लोक में जो लोग ऐसा पापवस्यस व्यवहार करते हैं - वे इसी कारण करते हैं । आधिदैविक यज्ञ में वास्तव में यह पापवस्यस भाव रहता है, तभी तो यहाँ ऐसा व्यवहार होता है - इसी श्रभिप्राय से कहते हैं-" प्रथानुसृज्य ( वेष्टितं वस्त्रं विसृज्य ) उपतिष्ठते ( प्रथियते ) - विश्वा-स्त्वां प्रजा उपावरोहन्तु । प्रयथायथमिव वा एतत् करोति यदाह विश्वास्त्वां प्रजा उपावरोह - इति । क्षत्रं वै सोमः । तत् पापवस्यसं करोति । तद्वेदमनु पाप-वयसं क्रियते " | कहना यही है कि सोम राजा के लिए " प्रजा की ओर उतरिए " ऐसा कहना सर्वथा बुरा है । एक प्रकार से उनका अपमान करना है । परन्तु कहे बिना काम भी नहीं चलता है क्यों कि वास्तव में १ ' वा ० सं ० ६२६ ' । [ ५६४ ]

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 609 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( ० ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण वे प्रजा पर ही तो उतरते हैं । बस उसी अगतिकगति से होने वाले अनुचित व्यवहार को क्षमा करने के लिए ही उतारने के बाद--" विश्वास्त्वां प्रजा उपावरोहन्तु " १ से उनका उपस्थापन किया जाता है । जिस समय राजा चलता है तो कहा जाता है - बढ़ी चले - प्रजा चलती चले । कहना राजा से है । परन्तु कहते हैं कि बढ़े चलो - चलते चलो । महाराजाधिराज की सवारी के साथ चलते चलो । बस " विश्वास्त्वां प्रजावरोहन्तु " का यही तात्पर्य है | अर्थ इसका ' आप उतर श्रानो - यही है । परन्तु इसी बात को सभ्यता के लिहाज से दूसरे शब्दों में कहते हैं - परोक्ष भाव से कहते हैं । इस प्रकार यहाँ पर यह अध्वर्यु - " विश्वास्त्वां प्रजा उपावरोहन्तु " - यह बोलता हुआ यथापूर्व-यथायथ करता है - अर्थात् स्वरूप योग्य व्यवहार करता है । ऐसा करता हुआ अध्वर्यु सोम राज सारी को प्रजा प्रजा के साथ नीचे उतारता है । यही कारण है कि जब राजा श्राने लगता है तो उसके साथ अपने - अपने स्थान से उठ खड़ी होती है- चल पड़ती है एवं राजा को अपने से ऊँचे सिंहासन तो पर बात बैठा कर आप स्वयं उसकी नीचे से उपासना किया करती है - अर्दली में चला करती है । प्रजा की दूर है - वर्णगुरु ब्राह्मण भी राजा के सिंहासन के नीचे ही खड़ा रहता है । श्रतएव श्रुति कहती है-“ तस्मात् ब्राह्मणः क्षत्रियमधस्तादुपास्ते राजसूये " इति । इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं-( बृहद ० प्रा ० उप ० १ | ४ | ११ ) " त्र ( उपस्थान मन्त्रे ) यथायथं करोति । यथापूर्वम् । यदाह विश्वास्त्वां प्रजा उपावरोहन्तु इति । तदेनमाभिः ( सू ) प्रजाभिः प्रत्यवरोहयति । तस्मादु क्षत्रियमायन्तं ( अवरोहन्तं ) इमाः प्रजा विशः प्रत्यवरोहन्ति । पश्चात् - ( राजा-नमुपरि कृत्वा ) तमधस्तादुपासते " । प्रत्येक कर्म में अनुवाक्या और याज्या दो काम होते हैं । अनुवाक्या होता पढ़ता है- याज्या अध्वर्यु करता है । दोनों में अध्वर्यु कृत याज्या कर्म्म प्रधान रहता है एवं अनुवाक्या, याज्या का अंग रहता है । परन्तु वसतीवरी ग्रहण के दूसरे दिन प्रातः काल होने वाला अतएव प्रातरनुवाक नाम से व्यवहृत कर्म है -- आहुति का याज्या कर्म का अंग न हो कर एक स्वतन्त्र कर्म होता है । प्रातरनुवाक कर्म्म कर्माङ्ग नहीं है - स्वतन्त्र कर्म्म है । और और कम्मों में अनुवाक्या कर्म्म आहुति का अङ्ग होता है बैठ परन्तु कर यहाँ आहुति अनुवाक्या का कर्म है । प्रातरनुवाक के लिए एक खास स्थान होता है । वहाँ पर वाला प्रातरनुदाक किया जाता है बस सूत्रीक्त स्थान में उपसन्न होता जिस समय प्रातरनुवाक बोलने होता है अर्थात् जब होता प्रातरनुवाक कर्म्म करने के लिए उद्यत होता है । १ ' वा ० सं ० ६।२६ ' | [ ५६५ ]

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 610 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( ० ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण " उपसन्नो होता प्रातरनुवाकमनुवक्ष्यन् भवति " ॥७ ॥

उस समय अग्नि में समिधाधान करता हुआ अध्वर्यु होता के प्रति प्रातरनुवाक करने के लिए " देवेभ्यः प्रातर्यावभ्योऽनुब्र हि " - ( प्रातःकाल रहने वाले देवताओं के लिए - अनुवाक्या मन्त्र बोलो ) - यह ( प्रज्ञा ) करता है । यद्यपि प्रातरनुवाक होता ही करता है परन्तु वह बिना अध्वर्यु की आज्ञा के नहीं कर सकता । अतएव याज्ञवल्क्य कहते हैं-. " थ समिधमभ्यादधदाह । देवेभ्यः प्रातर्यावभ्योऽनुब्रूहि " इति । सातवीं कण्डिका में कहा है कि - " उपसभो होता प्रातरनुवाक्यमनुवक्ष्यन् भवति " एवं आठवीं कण्डिका के प्रारम्भ में ही कहते हैं- " श्रथ समिधमभ्यादधदाह देवेभ्यः " इति । इससे बतलाना यही है कि जिस समय होता तय्यार हो कर अपने स्थान में बैठ जाता है - बस, प्रातरनुवाक प्रेष के लिए यही समय उपयुक्त है— प्रातःकाल रहने वाले देवता ' प्रातर्यावाण ' कहलाते हैं एवं सायं काल रहने वाले देवता ' सायं यावानः ' कहलाते हैं । अग्नि - उषा - अश्विनीकुमार - यम - सविता - ये ' प्रातर्यावरण ' हैं । ये देवता प्रातःकाल रहते हैं एवं इन्द्र- छन्द - वृषाकपायी - इतने देवता ' सायं यावान ' कहलाते हैं । प्रातःकाल के ही यज्ञ में शामिल होने वाले देवता प्रातर्य्यावारण कहलाते हैं । प्रतर्यावारण देवता-और अनुयाज देवता दोनों ही ' छन्द ' कहलाते हैं क्योंकि प्रातर्य्यावारण देवता से यहाँ प्रातःकाल के देवताओं के छन्द ही अभिप्रेत हैं एवं जो अनुयाज हैं, वे भी छन्द ही कहलाते हैं, जबकि प्रातर्य्यावारण भी छन्द हैं एवं अनुयाज भी छन्द हैं- ऐसी अवस्था में यदि -" देवेभ्यः प्रेष्य देवान्यज " । यही कहा जाएगा तो प्रातार्थ्यावाण और अनुयाज सर्वत्र लागू देव शब्द के कारण यहाँ भी " छन्दो देवान् यज " - इस प्रेष से अनुयाज देवता छन्द भी शामिल हो जाएँगे जो कि प्रकृत में अभिप्रेत नहीं है । तात्पर्य यही है कि यहाँ अनुयाज छन्द अभिप्रेत नहीं है अपितु प्रातर्यावारण छन्द अभिप्रेत है । श्रतः सामान्य रूपेण " देवेभ्यः प्रेष्य " कहने पर अनुयाज देवता भी शामिल हो जाएँगे जो कि प्रकृत में अभिप्रेत नहीं है । अतः तद्व्यावृत्त्यर्थं " प्रातर्यावभ्यः " यही कहना चाहिए । यही कारण है कि जब प्रात-वाण देवताओं का यजन किया जाता है तो - " देवेभ्यः प्रातर्यावभ्योऽनुन हि " यह प्रैष करते हैं । एवं " देवेभ्यः प्रेष्य देवान् यज " इस प्रैष से अनुयाजों से व्यवहार करते हैं । " छन्दांसि वै देवाः प्रातर्यावारणः । छन्दांस्यनुयाजाः । देवेभ्यः प्रेष्य देवान् यजेति वा - अनुयाजैश्चरन्ति " ॥ ८ ॥

ऐसी प्रवस्था में बिना सोचे - समझे जो कितने ही यह पूर्वपक्ष प्रस्तुत करते हैं कि छन्द ही प्रात-वाण एवं छन्द ही अनुयाज हैं । ऐसी अवस्था में यदि अनुयाज के लिए " देवेभ्यः प्रेष्य " मात्र कहा [ ५६६ ] I