Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 611–620

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 611–620

पृष्ठ 611

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 611 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

/ तृतीय काण्ड ( ० 8 ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मणं जाता है तो फिर छन्द - रूप प्रातर्य्यावारण के लिए भी देवेभ्यः यही कहना चाहिए । परन्तु ऐसा कभी नहीं बोलना चाहिए कि छन्द ही प्रातर्य्यावाण है एवं छन्द ही अनुयाज है । ऐसी अवस्था में प्रातरनुवाक में भी " देवेभ्यः " यही बोला जाएगा तो इनमें अनुयाज देवता भी शामिल हो जाएंगे जो कि अभिप्रेत नहीं हैं | इसलिए - " देवेभ्यः प्रेष्य देवान् यज " - इसी से अनुयाजाचरण करते हैं । इसी भेद के लिए यहाँ पर -" देवेभ्यः प्रातर्य्यावभ्येऽनुब्रू हि " नहीं बोलना चाहिए-" तदु हैक प्राहु: - देवेभ्योऽनुब्रूहि - इति । तदु तथा न ब्रूयात् । छन्दांसि वै देवाः - प्रातर्य्यावारणः । छन्दांस्यनुयाजाः । देवेभ्यः प्रेष्य देवान् यजेति वा अनुया जैश्चरन्ति । तस्मादु ब्रूयाद् देवेभ्यः प्रातर्यावभ्योऽनुब्रू होत्येव " ॥९ ॥

प्रकृत में जो समिधाधान किया जाता है - वह प्रातरनुवाक का ही अंश है । इससे छन्दो देवता का ही समिन्धन किया जाता है । अध्वर्यु - जो कि समिधाधान करता है - उससे छन्दों का ही समिन्धन करता है - छन्द देवताओं को उद्दीप्त करता है । एवं जो होता प्रातरनुवाक करता है अर्थात् अनुवाक्या मन्त्र बोलता है - वह इन मन्त्रों से छन्दों को ही श्राप्यायित करता है । तात्पर्य यही है कि यहाँ पर जो समि-धाधान और अनुवाक्या - दो काम होते हैं - उनका केवल प्रातर्य्यावारण छन्दों से ही सम्बन्ध है । समिन्धन छन्दों का ही होता है एवं प्राप्यायन भी छन्दों का ही होता है और प्रारण - देवताओं का इससे कोई सम्बन्ध नहीं है । इसी अभिप्राय से कहते हैं--" अथ यत् समिधमभ्यादधाति - छन्दांस्येवैतत् समिन्धे । अथ यद् यद्धोता प्रातरनुवाकमन्वाह छन्दांस्येवैतत् - पुनराप्याययति " । उन्हें आप्यायित करके प्रयातयाम बनाते हैं । अन्तर्य्याम - बहिर्याम उपयाम - उद्याम एवं यात-याम - इस तरह याम भागों में विभक्त है । जो पदार्थ गत रस हो जाता है जिसका सार भाग निकल जाता है - जिसे कि लोक में " भूकस " कहते हैं वही वैदिक भाषा में " यातयाम " कहलाता है । देवता इन छन्दों पर सवार हो कर स्वर्ग में जाया करते हैं । प्राण - देवता बिना गायत्र्यादि छन्दों के एक क्षण भी नहीं रह सकते । छन्द ही तो देवता का स्वरूप है । जैसे सवारी के काम में लिया हुआ घोड़ा यातयाम हो जाता है - थक जाता है - फिर चलने में असमर्थ हो जाता है - तथैव देवताओं को स्वर्ग पहुंचाने के कारण इन छन्दों का सार भाग निकल जाता है । आज यजमान को इन्हीं सात ग्रहोरात्र वृत्तों द्वारा द्युलोक में अपना यज्ञ वितत करना है । किन्तु छन्द यातयाम हो रहे हैं । बस इसीलिए इनके लिए प्रातरनुवाक - क किया जाता है । इससे छन्द फिर प्रयातयाम हो जाते हैं । यज्ञ वहन करने में फिर समर्थ हो जाते हैं । कदाचित् कहो कि यहाँ पर जितने भी कर्म्म होते हैं - वे सब देवताओं के लिए ही होते । अनु-वाक्या - याज्या वषट्कार जो कुछ होता है, इन्हीं के लिए होता है । छन्द तो देवतात्रों के अनुगत रहते हैं । ऐसी अवस्था में इस अनुवाक कर्म से भी देवताओं की हा तृप्ति होगी, फिर छन्दों का प्राप्यायन क्यों कर हुआ? प्रश्न वास्तव में ठीक है परन्तु जरा बुद्धि पर जोर दिया जाए तो इस प्रश्न का उत्तर [ ५६७ ]

पृष्ठ 612

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 612 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( अ ० है ) शतपथ ब्राह्मणं सुत्या ब्राह्मणं मिल जाता है । देव - कर्म में शस्त्र, स्तोत्र एवं ग्रह- तीन काम होते हैं । ऋक् से शस्त्र होता है, साम से स्तोत्र होता है एवं यजु से ग्रह होता है । इन तीनों से किया हुआ जो कर्म है उसका देवताओं के साथ सम्बन्ध होता है । यदि ये तीनों नहीं किए जाते हैं तो फिर छन्दों का ही प्राप्यायन होता है । यहाँ पर इस प्रातरनुवाक कर्म में न स्तोत्र करते हैं - न शंसन ( शस्त्र ) करते हैं । ऐसी अवस्था में कृत अनुवाक् से छन्दों का ही प्राप्यायन करता है - उन्हें अयातयाम बनाता है । एवं प्रयातयाम छन्दों से यज्ञ को वितत करता है । बस, छन्द प्राप्यायनार्थ ही होता प्रातरनुवाक करता है - यही सब का निष्कर्ष है -" प्रयातयामानि करोति । यातयामानि वै देवैश्छन्दांसि । ( कथं तदुच्यते ) छन्दोभिहि देवा: स्वर्ग लोकं समाश्नुवत । न वाऽग्रत्र स्तुवते । न शंसन्ति । तत्

छन्दांस्येवैतत् पुनराप्याययति । श्रयातयामानि करोति । तैरयातयामैर्यज्ञं तन्वते ।

तस्माद्धोता प्रातरनुवाकमन्वाह " ॥१० ॥

जैसे व्याकरणशास्त्र की परिभाषा भिन्न है, आयुर्वेद की परिभाषा भिन्न है, ज्योतिष की परि-भाषा भिन्न है - तथैव वेद की परिभाषा भी भिन्न ही है । परिभाषात्रों को जाने बिना तत्तच्छास्त्रों का ज्ञान होना कठिन ही नहीं अपितु असाध्य है । जो ' गुण ' शब्द सांख्य शास्त्र परिभाषा में सत्त्व- रज - तम का वाचक है वही गुण शब्द व्याकरण - शास्त्र में प्र - ए - थ्रो ' का वाचक बनता है । भला - जो ' गुण ' अ - ए - श्र को कहते हैं - यह नहीं जानता है, उसको व्याकरण के ' गुण ' शब्द का अर्थ क्यों कर हो सकता है? बस, यही बात प्राजकल वेद के अर्थ में भी प्रचलित है । वैदिक परिभाषाएँ लुप्त हो चुकी हैं । अतएव वैदिक शब्दों के मनमानी खींचातानी से अर्थ लगाए जा रहे हैं । कहीं श्रालम्भन का अर्थ स्पर्श करना सुना जाता है तो कहीं अग्निष्वात्तादि प्रारण पितरों का - क्रोधी पिता यह अर्थ सुना जाता है । कहना बुरा है परन्तु कहे बिना रहा भी नहीं जाता है । नहीं तो हम यहाँ तक कहने के लिए तय्यार हैं कि वेद का जो अर्थ उपलब्ध होता है - वह इसी परिभाषा ज्ञान के अभाव के कारण अर्थ नहीं, अनर्थ है । अस्तु प्रकृत में प्राज हमें एक शब्द ऐसा बतलाना है जो सांकेतिक है । जिसका प्रयोग किसी खास वक्त पर ही किया जाता है | वह शब्द है - ' अभिगर ' । इसी प्रकार प्रतिगर - अनुगर - उपगर इत्यादि अनेक शब्द आया करते हैं । इनमें से हमें प्रकृत में केवल अभिगर प्रतिगर इन दो शब्दों का अर्थ बतलाना है । जिस समय कोई राजा अपने अलौकिक गुणों के कारण प्रजा का प्यारा बन जाता है तो प्रजा अपनी एक सभा करती है, उसमें राजा को निमन्त्रित कर बुलाती है एवं वहाँ पर राजा की सेवा में मान - पत्र अर्पण करती है । बस, इस मान - पत्र का नाम ही " अभिगर " है । कोई ऐसी बात जो कि उत्तर की अपेक्षा रखती हो - वही श्रभिगर कहलाती है । परन्तु यह बात सामान्य बात नहीं अपितु सभा से ताल्लुक रखने वाली हो । सभा में, मनुष्य - संघ में, जो शास्त्रार्थ - प्रश्नोत्तर को छोड़ कर, उत्तर- सापेक्ष भाषण है, वही ' अभिगर ' कहलाता है । शास्त्रार्थ सम्बन्धी जो शब्द है - उसके लिए ' अभिगर ' शब्द नहीं प्राता - उसके लिए अन्य शब्द आता है । एक प्रकार से अभिनन्दन पत्र ( मान - पत्र की जो स्पीच ) है वहीं पर यह ' अभिगर ' शब्द रूढ़ है । अभि-नन्दन पत्र का जो उत्तर होता है - वह - " प्रतिगर " कहलाता है । अभिनन्दन पत्र उत्तर की -जवाब की— [ ५६८ ] '

पृष्ठ 613

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 613 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( अ ) शतपथ ब्राह्मण सुंत्या - ब्राह्मण अपेक्षा रखता है । बस, इसका जो जवाब है - वही " प्रतिगर " कहलाता है । शास्त्रार्थादि प्रश्नोत्तरों को एवं सामान्य व्यवहारादि को छोड़ कर यज्ञिय एवं सभासम्बन्धी उत्तर- सापेक्ष पहला भाषण - पहली स्पीच - ' प्रभिगर ' कहलाता है एवं उसका उत्तर ' प्रतिगर ' कहलाता है । यदि अभिगर का उत्तर त्रुटि पुरस्सर दिया जाता हैं तो फिर वह उत्तर ' प्रतिगर ' नहीं रहता -अपगर हो जाता है । आपने हमारे लिए जो कहा सो ठीक है परन्तु आपने यह बुराई की है - ऐसा उत्तर ' अपगर ' में शामिल हो जाता है । अतः सभ्यता के लिहाज से न अभिगर में दोषानुदर्शन होना चाहिए एवं न प्रतिगर में दोषानुदर्शन होना चाहिए । भारतवर्ष के सम्राट् महाराजा इन्द्र ने जब सारे दस्युयों का नाश कर डाला तो अन्त में सरस्वती नदी के पास बनी हुई विज्ञानशाला में ( जो कि सरस्वती नद से कुछ पश्चिम है ), जहाँ पर कि वशिष्ठ महर्षि रहते थे, इसी सरस्वती नदी के टीले पर - असुरों की लोहे की पुरी बनी हुई थी अतएव " सरस्वती घस्तृमावसीकः " यह कहा जाता है । इस सरस्वती के पास ही एक बड़ा भारी विज्ञान भवन बना हुआ था । इसी में वैज्ञानिक परीक्षाएँ हुआ करती थीं । इसी में भारतीय प्रायों ने कृतज्ञता प्रकाशित करने के लिए बड़ा भारी विजय - महोत्सव किया था । उस उत्सव में सारे महर्षि, सारे भारतीय राजा एवं सम्राट् इन्द्र पधारे थे । वहाँ पर विश्वामित्र, कुत्स, हिरण्यस्तूप सव्य, गृत्समद, वामदेव श्रादि प्रमुख महर्षियों ने इन्द्र की बड़े प्राडम्बरों के साथ स्तुति की है जिनसे कि ऋग्वेद के सूक्त के सूक्त भरे पड़े हैं । बस इसी स्तुति का नाम ' अभिगर ' है । इसके उत्तर में इन्द्र स्वयं भी बोले हैं एवं इनकी ओर से स्वर-परिणतिक देवमनुष्य ने लम्बा - चौड़ा उत्तर दिया है । बस यही ' अतिगर ' है । यह विजयमहोत्सव श्वेता-गिरि के पास स्थित एक विशिष्ट स्थान पर - जहाँ पर सरस्वती नदी है - मनाया गया था । सारे प्रपञ्च में प्रकृत में हमें केवल इतना ही बतलाना है कि जो वाक् - उत्तर की अपेक्षा रखती है, उसका नाम ' अभिगर ' है, एवं उसका उत्तर ' प्रतिगर ' है । यदि अभिगर का प्रतिगर नहीं किया जाता है ( यदि -अभिनन्दन पत्र का उत्तर नहीं दिया जाता है ) तो यह घोर असभ्यता होती है । अतएव सभ्यता की मर्यादा के लिहाज से उत्तर देना अर्थात् प्रतिगर करना अत्यावश्यक हो जाता है । यज्ञ - कर्म में अनु-वाक्या और याज्या- दो कर्म होते हैं । अनुवाक्या पहले होती है - याज्या बाद में होती है | अनुवाक्या होता करता है - याज्या अध्वर्यु करता है । अनुवाक्या एक प्रकार का अभिगर है - याज्या पाश्र्वाद्भाविनी एवं अनुवाक्या का उत्तर स्वरूप होने से ' प्रतिगर ' है । अनुवाक्या पूर्व कर्म है - याज्या उत्तर कर्म्म है | दोनों अविनाभूत हैं । जैसे अभिनन्दन के पश्चात् उसका उत्तर देना मर्यादा है - सभ्यता है - प्रीचित्य है, तथैव अनुवाक्या के बाद याज्या करना परम आवश्यक है । हमने बतलाया था कि यहाँ पर प्रातः काल ही होता प्रातरनुवाक करता है, परन्तु चूं कि यहाँ पर यही होता आहुति दे लेता है, अतएव अध्वर्यु को याज्या नहीं करनी पड़ती । अध्वर्यु अपने अन्य कामों में लगा रहता है । जिस समय होता प्रातरनुवाक ( अनुवाक्या ) करता है, उस समय अध्वर्यु याज्या नहीं करता । अनुवाक्या अभिगर है - याज्या प्रतिगर है । अभिगर - स्वरूप प्रातरनुवाक के बाद प्रतिगर - स्वरूप याज्या न होना सर्वथा अनुचित है! बस - इसी विप्र-तिपत्ति को लक्ष्य में रख कर एक महर्षि प्रश्न करते हैं-[ ५६६ ]

पृष्ठ 614

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 614 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण बतलाइए! इस यज्ञ में अभिगरस्वरूप ( प्रातरनुवाक कर्म्म का ) प्रतिगर कौन है? " तदाहुः कः प्रातरनुवाकस्य प्रतिगर इति " । इसका उत्तर देते हैं- जिस समय होता प्रातरनुवाक करे - उस समय प्रध्वर्यु को चाहिए कि वह उठ खड़ा हो एवं जा कर तब तक होता प्रातरनुवाक करता रहे, जब तक यह संयतात्मा बन कर इसकी ओर ध्यान रक्खे । बस, अध्वर्यु का तन्मनस्क होना प्रतिगर हो जाता है । तात्पर्य यही है कि जिस समय होता अनुवाक्या करे, उस समय अध्वर्यु को चाहिए वह दत्तमना हो कर तन्मनस्क ( न तु अन्यमन-क ) हो कर उस पर अपना ध्यान रक्खे, जिससे कि होता को यह मालूम हो जाए कि मेरे अनुवाक - कर्म्म पर अध्वर्यु का पूरा - पूरा ध्यान है । श्रध्वर्यु के इस व्यापार से प्रतिगर - संपत्ति श्रा जाती है । वास्तव में ठीक है । बाज मौके पर राजा अभिनन्दन पत्र का उत्तर नहीं देता है, केवल गौर से उसे सुन लेता है | बस - श्रभिनन्दन करने वाला मनुष्य " महाराज ने इस पर अपना पूरा ध्यान रक्खा है - वे इसमें बड़ा इन्ट्रेस्ट ले रहे थे " - यह मान कर उसी को अपना उत्तर ( प्रतिगर ) मान लेता है । यदि राजा जवाब न देने के साथ ही उपेक्षा का भाव भी रखता है तो यह असभ्यता कहलाने लगती है । ठीक इसी प्रकार अभिगर करते हुए होता के पास याज्या वगैरः न बोल कर अध्वर्यु का निद्रा - आलस्यादि छोड़ कर जो तन्मनस्क हो कर बैठा रहता है- वही- प्रतिगर हो जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" जाग्रद्वैवाध्वर्युरुपासीत । स यन्निमिषति स हैवास्य प्रतिगरः " । परन्तु भगवान् याज्ञवल्क्य इसका खण्डन करते हुए कहते हैं कि नहीं, निद्रा छोड़ कर प्रातरनुवाक करते समय अध्वर्यु को होता के पास बैठने की कोई आवश्यकता नहीं है । अध्वर्यु - कभी उसमें दत्तचित्त न हो । यदि उस समय नींद लेना चाहे तो यथेच्छ सोता रहे । उठ कर वहाँ योग देने की कोई आव-श्यकता नहीं है । बात वास्तव में ठीक है । अभिगर के लिए प्रतिगर होता है । यदि प्रातरनुवाक अभि-गर होता तो प्रतिगर की श्रावश्यकता थी । परन्तु यहाँ तो अनुवाक - कर्म्म याज्या का अंग नहीं है अपितु स्वतन्त्र कर्म्म है जैसा कि ब्राह्मण के प्रारम्भ में ही बतलाया गया है । जब याज्या उसका उत्तर- कर्म्म ही नहीं है - प्रातरनुवाक आहुति का अंग ही नहीं है तो न प्रातरनुवाक प्रभिगर है, न याज्या प्रतिगर है । अतः - अध्वर्यु को इसमें सहयोग देने की प्रतिगर करने की कोई आवश्यकता नहीं है । इसी भाव को लक्ष्य में रख कर कहते हैं-" तदु तथा न कुर्य्यात् । यदि निद्रायात्- ( निद्रामात्मन इच्छेत् ) अपि कामं स्वप्यात् " । और - दोनों । इन दोनों से ही ग्राहुति होती जुहू उपभृत् त्रक कहलाती है । प्राहुति का काम चूं कि अध्वर्यु का है, अतः वही इनको रखता है । परन्तु कभी - कभी बीच - बीच में होता आदि और - और ऋत्विजों को भी आहुति देनी पड़ती है - इस ऊपर के काम के लिए एक स्र ुचि अर्थात् काष्ठ - जुहू और रहती है । वे जुहू उपभृत तो सर्वथा नियत है कि प्रधान काम में ही काम आने वाले हैं । परन्तु [ ६०० ] ,

पृष्ठ 615

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 615 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) देते 1 ' शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण ( ऋग्वेद मं ० ७१७ ९ १३ ) ( तत्र ) प्रचरणीति स्रुग् [ ६०१ ] मुत्तरकात काम के लिए एक स्रक और बना ली जाती है । मुत्तफरकात में काम आने के कारण वह " प्रचरणी स्रक " कहलाती है । इस यज्ञ में - ' वसतीवरी - एकधना और निग्राभ्या ' - तीन प्रकार के पानी लाये जाते हैं । तीनों से पृथक् - पृथक् काम होता है । इन तीनों में से ' वसतीवरी ' पानी की इतिकर्तव्यता ' वसतीवरी ' ब्राह्मण में बतला दी गयी । अब इस ब्राह्मण में एकधना पानी की इतिकर्त्तव्यता बतलाते हैं । जिस स्थान से - जिस तालाब में से वसतीवरी पानी लाया गया उसी तालाब में से " एकधना " पानी लाया जाता है । एकधना पानी लाने से पहले प्रातः काल ही होता -" प्रभूदुषा इन्द्रतमा मघोन्यजीननत् सविताय श्रवांसि । वि दिवो देवी दुहिता दधात्यङ्गिरस्तमा सुकृते वसूनि " ॥ इस मन्त्र से प्रातरनुवाक का परिधान करता है अर्थात् प्रातरनुवाक्स्वरूप इस परिधानीया ऋचा का अनुवचन ( बोलना ) करता है । जिस समय होता यह मन्त्र बोलता है- परिधान करता है - उस समय जो प्रचरणी नाम की स्रक होती है उसमें चतुर्गृहीत आाज्य ले कर आहुति देता है । प्रातरनुवाक परि-धान एवं प्रचरणी- होम - दोनों काम होता ही करता है । अनुवाक्या भी होता ही करता है एवं आहुति भी होता ही देता है । अतएव याज्ञवल्क्य कहते हैं-" स यत्र होता प्रातरनुवाकं परिदधाति तत् ( भवति तस्यां चतुर्गृहीतमाज्यं गृहीत्वा जुहोति " ॥११ ॥

आहुति - प्रग्नि - प्राप - ग्रावा - सविता - इन चारों के लिए यह प्रचरणी होम होता है, अतएव चार बार ही घृत लिया जाता है । इस प्रकार ध्रुवा में से स्रक् में चतुर्गृहीत आज्य ले कर आहुति यह प्राहुति क्यों दी जाती है? -यह बतलाते हैं । जिस समय यज्ञ का मस्तक कट गया, तो कटे हुए मस्तक वाले उस यज्ञ का रस बह निकला । बह कर पानी में प्रविष्ट हो गया । चूँकि उसके बिना यह यज्ञ अधूरा रह जाता है, अतः उस बहे हुए रस को शामिल करने के लिए श्राज से पहले दिन वसतीवरी पानी ले आते हैं । परन्तु सर्वात्मना फिर भी यज्ञ रस नहीं श्राता, कुछ न कुछ पानी में रह ही जाता है । बस, वसतीवरी द्वारा लाए गए रस से जो पानी में यज्ञ - रस बच गया है, उसी की र आज यह होता जाता है अर्थात् आज जो एकधना पानी लाया जाता है वह परिशिष्ट यज्ञ -रस के लिए ही लाया जाता है । परन्तु पानी लाने में एक नियम है । जब तक पशु - होम न हो, तब तक पानी नहीं लाया जा सकता, अतएव वसतीवरी पानी वपा होम से बाद लाया जाता है । परन्तु चूँ कि एक-धना - पानी से पूर्व ही - अग्नीषोमीय पशु की आहुति हो चुकती है अतएव याज एकधना पानी लाने में विप्रतिपत्ति है । बस, पशु- होम स्थानीय ही यह प्रचरणी आहुति दी जाती है । पशु - होमाभाव में यज्ञ-

पृष्ठ 616

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 616 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ० ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण रस हरण हो नहीं सकता है, अतः प्रचरणी आहुति दी जाती है । यह आहुति पशु - होम स्थानीय है । बस, प्रचरणी प्राहुति क्यों दी जाती हैं- इसका यही उत्तर है । इसी अभिप्राय से कहते हैं ----" यत्र वै यज्ञस्य शिरोऽच्छिद्यत । तस्य रसो द्रुत्वापः प्रविवेश । तमदः पूर्वेद्युर्वसतीवरीभिराहरति । अथ यो sa यज्ञस्य रसः परिशिष्ट: तमेवैत-दच्छैति " ॥१२ ॥

आहुति का यही प्रयोजन नहीं है, अपितु - जिस कारण से यह आहुति का हवन करता है - इसका कारण और भी है-' यत् ( यस्मात् कारणात् ) एव एतामाहुति जुहोति - ( तदुच्यते ) " । 1 पानी में बचा हुआ जो यज्ञ - रस है - इस प्राहुति से वह उसी का प्रस्तार करता है । रस को व्याप्त करता है अर्थात् प्राहुति द्वारा यज्ञ रस को अपने वश में कर लेता है, अपने यज्ञ में शामिल कर लेता है । इतना ही नहीं, अपितु जिन - अग्नि प्राप द्यावा - सविता - देवताओं के लिए यह प्राहुति देता है - उन देवताओं को इस श्राहुति से प्रसन्न करता है, वे देवता इस आहुति से तृप्त हो कर इस यजमान के लिए किंवा यजमान, यज्ञ के लिए इस यज्ञ - रस का सन्नमन कर देते है अर्थात् यज्ञ - रस को इसके यज्ञ की श्रोर का देते हैं । पानी में प्रविष्ट जिस यज्ञ - रस को लाया जाता है - वह अग्नि- सविता यावा और आप इन चार देवताओं के अधिकार में हैं । पानी की जो तरलता है - वही अग्नि है एवं सविता ही उसका प्रेरक है । आपो देवी भी पानी में है ही एवं ग्रावा से सोम देवता अभिप्रेत है । बिना इनको प्रसन्न किए यज्ञ -रस लेना असंभव है । यदि ले भी लिया जाए तो यज्ञ - फल मिलना असंभव है । अतः सर्वत्र व्याप्त इन प्राण - देवताओं की तृप्ति के लिए पहले यह प्रचरणी - होम आवश्यक है । इससे प्राण देवताओं का आप्या-यन हो जाता है एवं वातावरण शान्त हो जाता है । ऐसी अवस्था में यज्ञ रस इस यजमान के यज्ञ की और अपने - आप झुक जाता है । अतएव आहुति दे कर ही एकधना पानी लेने जाना चाहिए । इसी अभिप्राय से कहते हैं--" यद्वैवैतामाहुति जुहोति । एतमेवैतद्यज्ञस्य रसमभिप्रस्तृणीते ( रसस्य स्तरणं कृतवान् भवति ) । तमारुन्धे ( वशीकृतवान् भवति ) । ( प्राहुतेरिदमेव फलं न अपितु ) याभ्य उ चैवैतां देवताभ्य आहुति जुहोति - ता एवैतत् प्रीणा-ति । ता अस्यै तृप्ताः प्रीता एतं यज्ञस्य रसं सन्नमन्ति " || १३ || ' क्यों प्रचरणी - होम करना चाहिए? ' यह बतला दिया गया । अब पद्धति बतलाते हैं । वह होता निम्नलिखित मन्त्र से आहुति देता है-[ ६०२ ]

पृष्ठ 617

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 617 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या - ब्राह्मरण

" शृणोत्वग्निः समिधा हवं मे शृण्वन्त्वापो धिषरणाश्च देवीः ।

श्रोता ग्रावाणो विदुषो न यज्ञं शृणोतु देवः सविता हवं मे " इति ॥

( वाज ० सं ० ६।२६ ) समिधा स्वरूप अर्थात् प्रज्वलित अग्नि मेरी पुकार सुने एवं ज्ञानवती, चेतनावती, प्रापो देवी मेरी सुने । मेरे यज्ञ की ग्रावा देवता ( सोमदेवता ) विद्वानों की तरह सुनाई करे अर्थात् जैसे विद्वान् मनुष्य किसी काम में उपेक्षा नहीं करते हैं, तद्वत् यह ग्रावा इस यज्ञ को सुसंपन्न बनाने में उपेक्षा न करे एवं जो सविता देवता है, जिसके प्रसव के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता - वे मेरी पुकार सुने । मन्त्र का तात्पर्य बतलाते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि - अग्नि- आप- ग्रावा एवं सविता चारों ही इस आहुति से प्रसन्न हो कर मेरे इस एकधना पानी लाने के काम की जानें अर्थात् मुझे पानी के यज्ञ -रस लाने की आशा है । पानी में ही चेतना का आभास होता है, अतएव " धिषरणाश्च देवी: " यह कहा गया है एवं ग्रावा अर्थात् महान् सोम ही चेतना का श्रधिष्ठाता है - ज्ञान - मूर्ति की योनि महान् सोम ही है, अतएव -" श्रोता ग्रावाणो विदुषो न ( इव ) ', यह कहा है । सविता ही देवताओं के प्रसविता हैं । बस, " शृणोतुदेवः सविता हवं मे स्वाहा " यह कहता हुआ ऋत्विक् सविता से प्रसूत जो यज्ञ रस है - उसकी ओर जाता है ।

सविता ने आज्ञा दे दी है, अतएव यह एकधना की ओर जाता है ।

" सवितृप्रसूत एवैतद्यज्ञस्य रसमच्छेति " इति ॥१४ ॥

जहाँ से एकधना पानी लाया जाया जाता है - उस स्थान पर उस बहते हुए पानी में आहुति और दी जाती है । प्रचरणी - होम - होता करता है परन्तु पानी में आहुति देना अध्वर्यु का काम है | प्रचरणी - होम यज्ञ शाला में किया जाता है एवं यह दूसरी आहुति यज्ञशाला से बाहर पानी में दी जाती है । इसी अभिप्राय से कहते हैं कि प्रचरणी स्रक् से चतुर्गृहीत आाज्य की आहुति देने के बाद अध्वर्यु उसी प्रचरणी में चार बार घृत लेता है । इस प्रकार चतुर्गृहीत श्राज्य ले कर - एकधना पानी लाने के लिए वेदि से उत्तर दिशा की ओर जाता हुआ होता से निम्नलिखित प्रेष करता है-- " श्रपइष्य होत ः " इति । हे होता! पानी की ओर गमनोचित - " प्रदेवत्रा ब्रह्मणे गातुरोचयो अच्छामनसोन प्रयुक्ति इत्यादि - श्रापोनप्त्रीय सूक्त का अनुवचन करो अर्थात् आपो देवी के लिए जो याज्या होने वाली है-उसके लिए अनुवाक्या करो । हे होता! पानी की ओर इच्छा करो अर्थात् श्रापो देवी से सम्बन्ध रखने वाली अनुवाक्या की ओर निगाह करो - अनुवाक्या पढ़ो - यही तात्पर्य्यं है-" श्रथापरं चतुर्गृहीतमाज्यं गृहीत्वा उदङ् प्रयत्नाह ( अध्वर्यु: ) प इष्य होतरिति । श्रप इच्छ होतरित्येवैतदाह " । श्रापोनप्त्रीय सूक्त का अनुवचन क्यों किया जाता है? - इसकी उपपत्ति बतलाते हैं--" तत् ( तत्र ) यदतो ( अस्मात् स्थानात् ) होतान्वाह - ( तदुच्यते ) " । [ ६०३ ]

पृष्ठ 618

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 618 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( अ ० 2 ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण वाक्या - मन्त्रवाक् है | मन्त्रवाक्- परमेष्ठी से उत्पन्न होती है । परमेष्ठी में रहने वाली क्रन्दसी-अम्भृणीवाक् ही - शब्द और अर्थ - उभयविध सृष्टि की जननी है । सम्पूर्ण यज्ञ का प्रभव वही - आम्भृणी पारमेष्ठ्य लोक है । वहाँ से उत्पन्न होने वाली यह मन्त्रवाक् भी यज्ञरूपा है । बस, इसे बोलता हुआ होता इसी यज्ञ रस को फैलाता है । यज्ञरूप वाक् से यज्ञ रस को विस्तृत करता है - बढ़ाता है एवं वाक्-लहर से - वाक् यज्ञ से उस यज्ञ रस को अपने अधीन कर लेता है । यह अनुवचन एकघना घटों की पानी वाले घट भी वसतीवरी कहलाते हैं तथैव । अतः जहाँ ' एतान् ' हो वहाँ तो ' एकधनान् घट ' - यह आप: ' - यह अर्थ समझना चाहिए । वह होता एक-और लक्ष्य करके किया जाता है । जैसे वसतीवरी एकधना पानी वाले घट भी एकधना कहलाते हैं समझना चाहिए । जहाँ एता: - हो वहाँ ' एकधना घना घटों के अनु ही अनुवाक्या मन्त्र बोलता है अर्थात् एकधना पानी लाने के लिए ही ये मन्त्र बोले जाते हैं । इससे जो इन- एकधना घटों को लाते समय बीच में नाशकं राक्षस लोग बिगाड़ न डालें । पानी को दूषित न कर डालें, श्रतएव यह मन्त्र बोलता है । तात्पर्य यही है कि वायु में एक प्रकार का उपद्रव करने वाला - अशान्ति करने वाला आसुर प्राण रहता है । वह असुर - प्राण वायु के सहारे सारे पदार्थों पर अपना आक्रमण कर उन्हें दूषित किया करता है । चूँकि वह वायुगत प्रासुर- प्राण प्रतिसूक्ष्म है, अतएव - वह चर्मचक्षु से नहीं दीख सकता । जिस समय एकधना घटों को लाया जाएगा उस समय उन राक्षसों का उसमें घुसने का डर रहता है । यदि वायुग आसुर भाव इनमें प्रविष्ट हो जाए तो यह पानी किसी काम का न रहे । बस, इसके प्रति-रोध के लिए ये वाक्या मन्त्र बोले जाते हैं । हम जो वाक् बोलते हैं वह नष्ट नहीं हो जाती --अपितु उसकी मूर्ति प्रकाश में कायम हो जाती । वे शब्द चारों ओर व्याप्त हो जाते हैं । खाली जगह में श्रासुर भावों को घुसने का मौका मिलता है । परन्तु जब वह स्थान अग्निवाक् भर जाता है तो असुर जहाँ के तहाँ ही स्तब्ध हो जाते हैं । वाक् से लहर का बनना - यद्यपि श्राँखों से नहीं दीखता --परन्तु विज्ञान दृष्टया मानना पड़ता है । इसी विज्ञान के अनुसार विज्ञान - प्रधान भारतवर्ष में जँभाई लेते समय चुटकी बजाने का नियम है । जँभाई - एक प्रकार का खराब जहरीली गैस है । महामारी - तपेदिक ( राज - यक्ष्मा ) - सिफलिस - गिनोरिया इत्यादि रोगों की तरह यह जहरीली गैस भी सांक्रामक है । इसका दूसरे के ऊपर इतना असर पड़ता हैं कि इसके धक्के से दूसरे का जहरीला गैस जाग पड़ता है एवं उसे भाई श्राने लगती है । जँभाई को देख कर जँभाई श्राना - इस का यही कारण है । इस सांक्रामिक भाव को रोकने के लिए चुटकी बजाई जाती है । यद्यपि बोलना चाहिए था, परन्तु जंभाई लेते समय बोला नहीं जाता, अतः चुटकी ही बजाई जाती है । उस शब्द से एक लहर होती है । वह लहर उस जहरीली गैस को आगे नहीं बढ़ने देती - प्रपितु वहीं सीमा बद्ध कर देती है । बस, यही बात यहाँ भी समझनी चाहिए । होता जो मन्त्र बोलता है - उससे वाक् - यज्ञ का प्रावाज का प्रस्तार होता है । सर्वत्र वाक् भर जाता है । आसुर प्रारण के लिए रास्ता रुक जाता है । बस, इसीलिए एकधना घटों को लाते हुए ' आपो-नत्रीय ' सूक्त पढ़ा जाता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहते हैं-" एतमेवैतद्यज्ञस्य रसमभिप्रस्तृणीते । तमारुन्धे । एतानु चैवैतदनु-तिष्ठते । नेदेनानन्तरा नाष्ट्रा रक्षांसि हिनसन्निति " ॥१५ ॥

[ ६०४ ]

पृष्ठ 619

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 619 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ० ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण इस सोम यज्ञ में दस ( १० ) चमसाध्वर्यु होते हैं । प्राकृतिक यज्ञ में ये दसों ग्राहवनीय - गार्ह-पत्य एवं आठ ( ८ ) धिष्ण्याग्नि नाम से व्यवहृत होते हैं । इनके पास एक - एक काष्ठ का चम्मच रहता है । इस चम्मच के कारण एवं चमस का प्रयोग करने के कारण ये अध्वर्यु - " चमसाध्वर्यु " नाम से प्रसिद्ध हैं । ये दसों भिन्न - भिन्न देवताक हैं । कोई वरुण सम्बन्धी चरकाध्वर्यु है, कोई ' ऐन्द्राग्न ' सम्बन्धी चरका-ध्वर्यु है । उन सब में से जो मैत्रावरुण देवता सम्बन्धी कार्य करने वाला चमसाध्वर्यु है, उसको भी पानी लाते समय अध्वर्यु कहता हैं- " मैत्रावरुणस्य चमसाध्वर्यो! एहि " । हे मैत्रावरुण देवता सम्बन्धी चमसा-ध्वर्यु! आप भी पानी की ओर चलो । एवं जो नेष्टा नामका ऋत्विक् है - उससे कहते हैं कि हे नेष्टा! तुम पत्नी ( यजमानी ) को ले कर चलो एवं पानी लाने वाले प्रतएव एकधनी नाम के परिकर्मी पुरुष हैं-उनसे भी " एकधनी लोग चलें " यह प्रैष करता है । चमस से पानी पर डाली हुई घृताहुति हटाई जाती है | इसलिए चमसाध्वर्यु को प्रैष किया जाता है एवं एकधनि नाम के परिकम्मियों को पानी लाना है, श्रतः उन्हें भी प्रैष किया जाता है--" प्रथ सम्प्रेष्यति - मैत्रावरुणस्य चमसाध्वर्यो! एहि । नेष्ठः । पत्नीरुदा-नय । एकधनिनः! एत " । वसतीवरी पानी रात को -आग्नीध्रीय वेदि पर रक्खा गया था । अब आग्नीध्र को आज्ञा दी जाती है कि हे आग्नीध्र! पहले दिन गृहीत प्राग्नीध्रीय पर प्रतिष्ठित जो वसतीवरी प्राप है - उसे एवं होतृचमस ( पात्र विशेष ) को ले कर जब तक हम एकधना पानी ले कर लोट न आएँ, तब तक चात्वाल पर बैठे रहो एवं हमारी प्रतीक्षा करते रहो । उत्तमावेदि बनाने के लिए जिससे मिट्टी लाई जाती है, उस खड्डे का नाम चात्वाल पड़ा है । यह चात्वाल हविर्धान की सीध में होता है । उसी स्थान पर - मयवसती-वरी और होतृचमस के प्राग्नीध्र को बैठने को प्रैष किया जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं -" अग्नीत्! चात्वाले वसतीवरीभिः प्रत्युपतिष्ठासै । होतृचमसेन चेति " । यद्यपि - चमसाध्वर्यु - नेष्टा एकधनी अग्नीत् सबको अपने - अपने कर्म्म का खयाल है - सब सन्नद्ध हैं । उन्हें अपनी - अपनी ड्यूटी का पूरा खयाल है, तथापि स्मरण दिला देना- सावधान कर देना - चूँकि अच्छा होता है - अतः - " चमसाध्वर्यो एहि " - इत्यादि केवल संप्रेष मात्र है - विस्मृति- परिहारार्थं ही प्रेष किया गया है -" सम्प्रैष एवैषः " ॥१६ ॥

जल लेने के लिए वेदि के किस ओर किस मार्ग से जाना चाहिए - यह बतलाते | श्रध्वर्यु - होता-नेष्टा - एकधनी - श्राग्नीध्र इत्यादि सब को मिल कर चात्वाल से पश्चिम और प्राग्नीध्रीय से पूर्व अर्थात् दोनों के बीच में से हो कर उत्तर की ओर जाना चाहिए यही तात्पर्य्य है । " त उदञ्चो निष्क्रामन्ति - जघनेन चात्वालम्, अग्रेणाग्नीध्रम् " । [ ६०५ ]

पृष्ठ 620

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 620 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ० 8 ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या- ब्राह्मण चाहिए । परन्तु यहाँ तक तो दिग्- नियम है । वेदि से ऊपर की ओर ही बाहर वेदि से निकलना जिस दिशा की ओर जल वेद से बाहर निकले बाद दिग् नियम नहीं है । बाहर निकले रहता बाद है, उधर ही चले जाते हैं-बहता रहता है- वहीं चले जाते हैं - पूर्व - पश्चिम जिधर भी पानी " स ( ते ) यस्यां ततो दिशि प्रापो भवन्ति - तत् ( तत्र ) यन्ति ( निर्ग-मने एव उदनियमः - न तु पश्वादिति भावः ) " । लेने जाते हैं । यद्यपि पत्नियों यह ऋत्विक् इकल्ले नहीं जाते, अपितु पत्नियों के साथ पानी जाते हैं - इसकी उपपत्ति बत-का पानी लाने में कोई भी काम नहीं है- फिर भी क्यों पत्नियों के साथ लाते हैं-" ते वै सह पत्नीभिर्यन्ति । तद्यत् सह पत्नीभिर्यन्ति ” ( तदुच्यते ) ॥१७ ॥

- पुरुष का रस बह निकला । वह जिस समय यज्ञ का मस्तक कट गया तो छिन्नशिरस्क उस यज्ञ सोम पानी में गन्धर्व बैठे थे । जब बह कर पानी में ( सोमरूप पानी में ) प्रविष्ट हो गया । वहाँ उस अधिकार में कर लिया । यज्ञ - रस वहाँ पहुंचा तो उन गन्धर्वो ने उसे अपनी रक्षा में, अपने है । पृथिवी का ३३ वसतीवरी ब्राह्मण में बतलाया गया है कि पार्थिव पिण्ड श्रग्नीषोमात्मक ) से ऊपर ३३ ( तेतीस ) तक सोम ( तेतीस ) अहर्गण वाला जो वषट्कार - मण्डल है - उसके १७ ( इन सतरह पाँच अवयवों में विभक्त है । पाँचों के रहता है । सारा संसार स्वयम्भू - परमेष्ठी सूर्य्यं चन्द्रमा पृथिवी भी ऋषि - प्राण कहलाता । इसे ही परोरजा प्रारण भिन्न - भिन्न प्राण हैं । जो स्वयम्भू का प्राण है -हैं । चान्द्रप्राण गन्धर्व कह-कहते हैं एवं पारमेष्ठ्य प्रारण पितर कहलाते हैं और प्रारण देवता कहलाते सौम्य -गोला है । इसका जो श्रालम्बन लाते हैं एवं पार्थिवप्राण असुर कहलाते हैं । चन्द्रमा सोम का ही रहेंगे, क्यों कि सोम भूत मर्त्य प्राण है, वही गन्धर्व कहलाता है । सोम जहाँ रहेगा - गन्धर्व वहाँ अवश्य भूत और प्रारण दोनों लाजिममलजूम हैं-पदार्थ बिना अमृतालम्बन के एक सेकिण्ड भी नहीं रह सकता । गन्धर्व कहलाता है । जहाँ सोम दोनों अविनाभूत हैं । बस, सोम भूत का आलम्बन जो प्रारण है - वही सोमाख्यान ब्राह्मण में गन्धर्वों को रहेंगे - वहाँ गन्धर्व अवश्य ही रहेंगे । इसीलिए धिष्ण्याब्राह्मण में एवं है । १७ ( सतरह ) के बाद सोम - रक्षक बतलाया गया है । पृथिवी के १७ ( सतरह ) तक अग्नि रहता जो अग्नि है- वहीं यज्ञ का सोम रहता है । सोम में गन्धर्व - प्राण रहता है । पार्थिव सत्रह ( १७ प्रविष्ट ) वाला हो जाता है । प्रतएव प्रग्नियज्ञ रस है । यह रस १७ ( सतरह ) से ऊपर वाले सोममय पानी में कि विस्तृत विवेचन ( वसती-की, विष्णु यज्ञ की, सत्ता इक्कीसवें अहर्गण तक मान ली जाती है, जिसका पानी में चला जाता है । वहाँ जाते वरी ब्राह्मण ' में कर दिया गया है । यज्ञ रस अर्थात् पार्थिव यज्ञाग्नि लक्ष्य में रख कर कहते हैं । ही उस पर गन्धर्व - प्रारण की सत्ता हो जाती है । बस, इसी विज्ञान को

" यत्र वै यज्ञस्य ( अग्नेः ) शिरोऽच्छिद्यत - तस्य रसो द्रुत्वापः प्रविवेश ।

तमेते गन्धर्वाः सोमरक्षा जुगुपुः ( ररक्षुः ) " ॥१८ ॥

[ ६०६ ]