Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 71–80

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 71–80

पृष्ठ 71

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 71 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मणं पहले सूर्य से होता है - बाद में अङ्गिराम्रों से होता है अतएव श्रादित्य यज्ञ को ' अद्यसुत्या ' कहा जाता है । प्राङ्गिरस यज्ञ को श्वःसुत्या कहा जाता है - इसी अभिप्राय से कहते हैं-" त ( अङ्गिरसः ) एतेन सद्यः क्रियाः ( सद्यः की यज्ञेन ) अङ्गिरसः प्रादि-त्यानयाजयन् । स सद्यःकीः ( नाम यज्ञः ) " ॥१७ ॥

यज्ञान्त में दक्षिणा दी जाती है । अङ्गिरस लोग आदित्यों के ऋत्विक् बने थे प्रतएव उन्हें दक्षिणा देना आवश्यक था । उन श्रादित्यों ने सद्यःक्री यज्ञ करवाने वाले अङ्गिराओं के लिए ' वाक् ' ( अनुष्टुप् ) को दक्षिणा रूपेण प्रदान किया । श्रङ्गिरात्रों को वाक् ही दक्षिणा में दी । वाक् कितने प्रकार की होती है? परमेष्ठिमण्डल की वाक् का नाम ' स्व ' है । स्वयम्भू मण्डल की वाक् का नाम ' सुत्या ' वाक् - किंवा ' देवा ' वाक् है । परमेष्ठिमण्डल की वाक् का नाम - आम्भृणी वाक् है - सूर्य्यमण्डल की वाक् का नाम बृहती वाक् है । इसे ही स्वरवाक् भी कहते हैं एवं पृथिवी की वाक् का नाम अनुष्टुप् वाक् हैं । यह अनुष्टुप मर्त्यवाक् है । बृहती प्रमृतवाक् है । यह अनुष्टुपवाक् भी असल में उसी सूर्य्य से आती है । आकाश का नाम वाक् है । यह आकाश मर्त्य - अमृत भेदेन दो प्रकार का है । मत्यकाशस्वरूपा वाक् अनुष्टुप् कहलाती है - अमृताकाशस्वरूपा वाक् बृहती कहलाती है । अमृतावाक् से देवता उत्पन्न होते हैं - मर्त्याकाश से भूत पैदा होते हैं । दोनों इसी सूर्य्य प्रजापति की वस्तु हैं । यह सूर्य्यं प्रजापति पृथिवी में मर्त्याकाश प्रदान करता है । पृथिवी की जो अनुष्टुप् वाक् है वह भी सूर्य्य की ही वाक् है परन्तु यह मर्त्य है । इसकी स्थिति बिना अमृतावाक् के नहीं रहती । मर्त्या वाक् भूतस्वरूप है - अमृता-वाक् देवस्वरूप है | बिना देवता के भूत रद्दी चीज है- बिना देवता के भूत सत्ता नहीं रह सकती प्रतएव अनुष्टुप् के अलावा उस बृहती अमृतावाक् का भी इस पृथिवी से सम्बन्ध रहता है । उसी वाक् से पृथिवी स्थित है । पृथिवी चित्या पिण्ड है । यदि इसका आधार चितेनिधेय - सौरी वाक् जिसे कि हम सूर्य्या ही कहेंगे नहीं हो तो पृथिवी के अभी टुकड़े - टुकड़े उड़ जाएँ । पृथिवी में अनुष्टुपवाक् के साथ ही सौरी अमृता बृहती वाक् भी है । उसी से पार्थिवाङ्गिरसों की महिमा रोदसी त्रिलोकी में व्यक्त हो रही है । अमृत भाग ही तो अमृताहुति हीं तो २१ अहर्गण तक जाता है । बस, इसी विज्ञान को बतलाने के लिए नीचे का सारा प्रपञ्च श्रादित्यों ने अङ्गिरात्रों को वाक् दक्षिणा दी अर्थात् अनुष्टुप् वाक् देना चाहा परन्तु अङ्गिराओं ने उसे ग्रहण नहीं किया । वास्तव में बात सच है । श्रङ्गिरा अमृत प्रारण का नाम है । अनुष्टुप् वाक् का सम्बन्ध इनसे नहीं होता - पार्थिव मर्त्यपिण्ड से होता है-" तेभ्यो ( सद्यःक्री यज्ञ याजकेभ्यः ) वाचं दक्षिरणामानयन् । तां न प्रत्यगृह्णन् ” । उन्होंने वाक् दक्षिणा को अस्वीकार करते हुए आदित्यों से कहा- यदि हम वाक् दक्षिणा को स्वीकार कर लेंगे तो हम सर्वथा हीन हो जाएँगे अर्थात् इस वाक् से हमारी कोई उन्नति नहीं हो सकती । [ ५३ ]

पृष्ठ 72

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 72 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण उन्नति तो दूर रही - उलटा पतन होता है । हमने आपको सोम दिया है । सोम अमृत है । अमृत सोम के सामने यह मर्त्या अनुष्टुप् वाक् तीन कौड़ी की चीज है । इससे तो हम उलटे अपनी पोजीशन से गिरते हैं । वास्तव में बात सच है । अङ्गिरा अमृत स्वरूप है । इनकी सत्ता के लिए धारा प्रवाह में बने रहने के लिए ' अमृत ' ही प्रपेक्षित है न कि मर्त्या अनुष्टुप् वाक् । " हास्यामहे यदि प्रतिग्रहीष्याम " इति । ' हतयज्ञमदक्षिणम् ' यह सिद्धान्त है । यज्ञ से यजमान नया देवात्मा बनता है । इस यज्ञ में ऋत्विग् लोग भी शामिल रहते हैं । इनकी श्रात्मा भी इस यज्ञ में शामिल है तो उस सौराग्नि की प्राहुति पहले इस अग्नि में होती है । हमारा निर्माण सोर अग्नि से ही होता है परन्तु डायरेक्ट ( प्रत्यक्ष ) न होकर जब वह अग्नि पृथिवी की चीज बन जाती है तब इससे हमारा निर्माण होता है । सौराग्नि का पहले पृथिवी से सम्बन्ध होता है । पृथिवी द्वारा हमारे से होता है । बस, इसी विज्ञान के अभिप्राय से कहते हैं-" सा देवानुपावर्त्यन्त्युवाच यद्व उपावर्तेय किं मे ततः स्यादिति । पूर्वा-मेव त्वाऽग्नेराहुतिः प्राप्स्यतीति " । यह सुन कर पृथिवी बड़ी ही प्रसन्न हो गई और प्रसन्न हो कर कहा हे देवताश्री! तुम मुझ से जो कुछ मांगोगे - तुम्हारी सारी कामनाएँ पूरी होंगी प्रर्थात् मैं तुम्हारी सारी कामनाएँ पूरी करूंगी । वास्तव में पृथिवी से ही सौर देवताओं की सारी कामनाएँ पूरी होती हैं । सौर रश्मियाँ चारों ओर चलती हैं । परन्तु पृथिवी पर आ कर ' टकरा जाती हैं जहां से आगे नहीं जा पातीं । बस इन पार्थिव रसों को चूस कर देवता वापस अपने प्रभव में चले जाते हैं । यदि पृथिवी न होती तो सारी रश्मियाँ सूर्य्यं से एकान्ततः दूर चली जातीं और उनका वापस प्रत्याक्रमण न होता परन्तु इसी पृथिवी के कारण देवता अपने स्थान " पर प्रतिष्ठित रहते हैं । देवताओं की समृद्धि का एकमात्र कारण पृथिवी है एवं यह सूर्य के चारों ओर ही परिक्रमा लगाती रहती है-" ग्रंथ हैषा देवानुवाच यां मया काञ्चाशिषमाशासिष्यध्वे सा वः सवा

समधिष्यतइति । सैवं देवानुपाववर्त " ॥२२ ॥

उत्तरावेदि में १७ वें स्थान पर बनाया हुआ जो ग्राहवनीय कुण्ड है उसमें प्रग्नि रखा जाता है । रखने के साथ ही उसमें प्राज्याहुति डाली जाती है । उत्तरवेदि के ऊपर रखी जाने वाली जो अग्नि है उसका आधार होता है उसमें पहले - पहल प्राज्य डाला जाता है - इसका कारण बतलाते हैं-" स यद्धार्यमाणेऽनौ ( उत्तरवेद्यां धार्यमाणेऽग्नौ ) उत्तरवेदि व्याघारयति ( घृतेनासि ) तस्य कारणमुच्यते - इति शेषः ” । प्रकृति - यज्ञ में सृष्टि के प्रारम्भ में देवताओं ने इससे कहा था कि हे वाक्! तुम्हारे में ही सबसे पहले प्राहुति दी जाएगी । बस, इसी प्रकृति के अनुसार निदानेन यागभूता उत्तरावेदि का सर्वप्रथम आज्याघार करते हैं । आज्याधार करना प्रकृतिवत् वाक् को सबसे पहले प्राहुति देना है । [ ५४ ]

पृष्ठ 73

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 73 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( अ ०५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मणं " सद्धार्यमाणेऽग्नौ उत्तरवेदि व्याधारयति; यदेवैनामदो देवाऽब्रुवन् पूर्वां त्वाऽग्नेराहुति: प्राप्स्यतीति । तदेवैनामेतत् पूर्वामग्नेराहुतिः प्राप्नोति । arrader निदानेन ( श्राहार्थ्यारोपेण ) " । इस उत्तरवेदि का उत्करण करते हैं अर्थात् मिट्टी लगा कर इसे ऊँची बनाते हैं इसका कारण यज्ञ की सर्वात्मकता मात्र । वाक् यज्ञस्वरूप है - जैसा कि दीक्षणीयेष्टि में बतलाया गया है एवं निंदा-न यह उत्तरावेदि वाक् है । इसे ऊँचा करना यज्ञ को ऊँचा करना है- समृद्ध करना है-" अथ यदुत्तरवेदिमुपकिरति ( तस्य कारणमुच्यते ) यज्ञस्यैव सर्वत्वाय । वाग्धि यज्ञः वागु ह्येषा " ॥ २३ ॥

सोमयज्ञ के लिए जो महावेदि बनाई जाती है उस महावेदि से पूर्व की ओर एक उत्तरावेद और बनाई जाती है । जिस प्रकार महावेदि नाप कर बनाई जाती है तथैव यह उत्तरावेदि भी नाप कर ही बनाई जाती है । इसके नापने के लिए युग और शम्या ये दो चीजें होती हैं । जिसे भाषा में जूड़ा कहते हैं प्रथवा जुआ कहते हैं उसे ही ' युग ' कहते हैं एवं उस जूड़े के दोनों ओर जो कीले गड़े रहते हैं-जिनसे कि अश्व की अथवा बैल की ग्रीवा चर्म - पट्ट से बँधी रहती है उसी कील का नाम ' शम्या ' है । इस शम्या के २४-३२- ४८ ये तीन नाप होते हैं । भिन्न - भिन्न परिमाण की शम्या का उपयोग होता है । यहाँ पर जो वाक् अर्थात् पृथिवी अशान्त हो कर देवताओं से अलग हो गई थी वही निदानेन उत्तरा-वैदि है । उत्तरावेदि वाक् स्वरूप है । यही श्रश्व बन कर देवताओं के लिए हव्य वहन करती है अतएव . ' अश्वाने देववाहन ' यह कहा जाता है । यह अश्व अर्थात् याज्य युग और शम्या से ही युक्त हो कर हव्य वहन करता है | तात्पय्यं यह है कि अश्व बलीवर्दादि जुड़े और शम्या में मर्यादित हो कर ही हव्य को - ( पदार्थादि को ) वहन करते हैं । चूंकि यह उत्तरावेदि देवताओं के हवन ले जाने वाला अश्व है अतएव इसकी नाप युग और शम्या से ही होनी चाहिए । इसी अभिप्राय से कहते हैं उस उत्तरावेदि को युग और शम्या से नापते हैं प्रर्थात् युग और शम्या के परिमारण से उत्तरावेदि बनाते हैं-" तां वै युगशम्येन विमिमीते " । उत्तरावेदि के लिए जिस स्थान से मिट्टी लाई जाती है वह भी तादर्थ्यात् उत्तरावेदि ही है । जहाँ से उत्तरावेदि के लिए मिट्टी खोद कर लाई जाती है वहाँ भी सारा काम नाप से ही होता है । बस जहाँ से मिट्टी लाते हैं वहाँ तो शम्या से काम लेते हैं और जहाँ ( महावेदि में ) लाते हैं वहाँ युग से ही आहरण करते हैं एवं जहाँ से लाते हैं उस स्थान को शम्या से नापते हैं । " युगेन यत्र हरन्ति ( यत्र हरन्ति तत्र युगेन विमिमीते ) शम्यया यतो हरन्ति ( यतो हरन्ति तत्र शम्यया विमिमीते ) " । [ ५५ ]

पृष्ठ 74

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 74 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण वैदिनिर्माण ब्राह्मणं युग और शम्या से नापने की क्या आवश्यकता है? इसका उत्तर देते हुए कहते हैं - योजनार्थ जो अश्व है उसे योजक मनुष्य युग और शम्या से ही अच्छी तरह जोड़ते हैं अर्थात् घोड़े को जब गाड़ी में जाता जाता है । वहाँ युग और शम्या लगाई जाती है, तभी घोड़ा काबू में आता है । यह जो पृथिवी सृष्टि के प्रारम्भ में देवासुर संग्राम में क्रुद्ध होकर चली गई थी - श्राज यजमान हव्य वहन करने के लिए-उसी को इस यज्ञ में युक्त करता है । अश्व का युञ्जन युग और शम्या से ही होता है अतएव हमें भी निदानेन युग - शम्या से ही अश्व - स्वरूप उत्तरावेदि का निर्माण करना चाहिए-" युगशस्येन वै योग्यं ( योजनामश्वम् ) युञ्जन्ति ( लोके मनुष्याः ) सा देवादः ( देवासुरयोर्युद्धकाले ) सिंही भूत्वा शान्तेवाचरत्तदेवैनामेतद्यज्ञे युनक्ति " ॥२४ ॥

श्रादित्यों ने जब अङ्गिरात्रों को वाक् दक्षिणा देना चाहा तो अङ्गिरा इन्कार कर गए और कह दिया कि हम यह दक्षिणा नहीं ले सकते । अन्त में लाचार हो कर अङ्गिरात्रों के लिए सूर्य को दक्षिणा देना पड़ा | चूँकि अङ्गिरात्रों ने वाक् को नहीं लिया श्रतएव वाक् इन पर नाराज हो गई । इतना ही नहीं - इनका संहार करने लगी । इसी प्राकृतिक विज्ञान के श्राधार पर एक विशेष बात बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं - चूँकि इस वाक् दक्षिरणा ने सिंही बन कर देवताओं पर आक्रमण किया था श्रतएव मनुष्य को चाहिए कि वह निवृत्त दक्षिणा कभी न ' लें । तात्पर्य यही है- यदि कोई यजमान किसी को दक्षिणा मेंकुछ देना चाहे - और वह लेने वाला उसे लेने से इन्कार कर दे तो फिर उसे कोई भी न ले । कारण इसका यही है कि जब एक मनुष्य का आत्मा उसेपसन्द नहीं करता है - आत्मा बिना किसी कारण के ही ' हम इसे नहीं लेंगे ' यह नहीं कह बैठता है - इससे मालूम होता है कि अवश्य ही उस वस्तु में ' कुछ न कुछ दोष है । यदि उस दक्षिणा में कोई खराबी नहीं होती तो उसे लेने वाले के मुँह से ' हम नहीं लेते ' ये शब्द भी नहीं निकलते । अतएव निवृत्त दक्षिणा का - ( जिसे कि एक मनुष्य ने लेने से इन्कार कर दिया है ) प्रतिग्रहरण न करे क्यों कि उसमें दोष रहता है । बस, दोष के कारण ही वह दक्षिणा सिंही अनिष्टकारिणी बन कर - प्रतिग्रहणकर्त्ता के तेज को नष्ट कर डालती है । उसका श्रात्मा पतित हो जाता है-" तस्मान्निवृत्तदक्षिणां ( अन्येन परित्यक्तां दक्षिणाम् ) न प्रतिगृह्णीयात् । सिंही हैनं भूत्वा क्षिणोति " । निवृत्त दक्षिणा को दूसरा तो ले नहीं सकता ऐसी हालत में उसका क्या करना चाहिए- क्या अपने पास ही रख लेना चाहिए- इसका भी निषेध करते हुए कहते हैं- उसे साथ भी न रखे । उस दक्षिणा को अपने पास भी नहीं रखना चाहिए । यदि यजमान निवृत्त दक्षिणा को अपने पास रख लेता है तो वह सिंही बनकर प्रतिग्रहणकर्त्तावत् इसके श्रात्मा को भी क्षीण कर देती है अतः यजमान भी इसे अपने पास न रखे-[ ५६ ] ए.

पृष्ठ 75

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 75 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( प्र ० ५ ) छः I शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मणं " नो हामा ( स्वात्मना सह ) कुर्वीत । सिही हैवैनं भूत्वा क्षिणोति " । पहले तो बतलाया था कि इसे कोई दूसरा न ले अब कहते हैं कि यदि कोई लेना चाहे तब भी न दे । जितना ही अनिष्ट इसे अपने पास रखने में होता है उतना ही दूसरे को देने से होता है । कारण इसका यही है कि यह निवृत्त दक्षिणा श्रात्मा का यज्ञ हैं । यावद् वित्तं तावदात्मा ' इस श्रुति प्रमाण से मानना पड़ता है कि दक्षिणा यज्ञ है । यदि इसे ( दक्षिणा को ) दूसरे को दिया जाता है तो अपने यज्ञ को दूसरे को दिया जाता है । यज्ञ को देना आत्मा को देना है प्रतएव यजमान को चाहिए कि न वह उसे अपने पास रखे और न दूसरे को दे-" नो हान्यस्मै दद्याद्यज्ञं तदन्यत्रात्मनः कुर्वीत " । बड़ी आफत है । अपने पास रख नहीं सकते, दूसरे को दे नहीं सकते - फिर क्या करें? इसका एक उपाय बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं इसलिए ऐसी अवस्था में यजमान को चाहिए कि जो इसका श्रात्मीय शत्रु है - उसके लिए यह निवृत्त दक्षिणा दे दे । अपने भाई - बन्धुनों में से ही जिसे कि यह प्रपना शत्रु समझता है - जिससे कि अनिष्ट की सम्भावना हो, उसे ही यह निवृत्त दक्षिणा दे दे । इससे दोनों काम हो जाते हैं । चूँकि यह इसे अपने पास नहीं रखता दे देता है इसलिए तो सिंही बनकर यह इसका कुछ नहीं बिगाड़ती है । जब पास में रहती तब न इसका अनिष्ट करती एवं चूँकि यह अपने आत्मीय जन को ही देता है - इससे दक्षिणा को श्रात्म - यज्ञ से बाहर नहीं करता है । आत्मीय को देना प्रात्मा ही को देना है | बस निवृत्त दक्षिणा की यही गति है । उसकी यही व्यवस्था है--" तस्माद्यो s स्यापि पाप ss व समानबन्धुः स्यात्तस्माऽएनां दद्यात् । स यद्ददाति तदेनं सिंही भूत्वा न क्षिणोति । यदु ( यत् पुनः ) समानबन्धवे ददाति

तदु नान्यत्रात्मनः कुरुते । एषो निवृत्तदक्षिरणायै ( या: ) प्रतिष्ठा " ॥२५ ॥

अब उत्तरावेदि बनाने के लिए ऋत्विक् शम्या और स्पय ( काष्ठ की तलवार ) लेता है । इस शम्या से ही नाप करनी चाहिए । चूँकि अब यह मिट्टी लाने वाला है अतएव शम्या और स्पय उठाता है-" अथ शम्याञ्च स्पयञ्चादत्ते " - इति । महावेद के उत्तर भाग में से उत्तरवेदि के लिए मिट्टी लाई जाती है । जहाँ से मिट्टी लाई जाती है वहाँ चौकोर गढ्ढा हो जाता है उसी का नाम ' चात्वाल ' है । यह चात्वाल किस जगह बनाना चाहिए - किस स्थान पर से मिट्टी लानी चाहिए - वही बतलाते हैं - हविर्वेदि से ३ विक्रम पूर्व की ओर संक्रमण किया जाता है एवं वहाँ पर एक शकु गाड़ दिया जाता है । इस वेदि का यही मन्तः पात कहलाता है । इस मध्य शङ्कु से ३६ विक्रम पूर्व आक्रमण कर वहाँ भी एक शकु गाड़ा जाता है । इसी का नाम पूर्वार्ध्य शकु है । इससे १२ विक्रम उत्तर में एक शकु और गाड़ा जाता है जिसे उत्तरांस [ ५७ ]

पृष्ठ 76

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 76 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण ( उत्तर कंधा ) कहते हैं । इसी को उत्तरार्ध्यं शङ्कु कहते हैं । इसी प्रकार एक शकु दक्षिण में होता है । इस प्रकार पूर्वार्द्ध भाग में उत्तरार्ध्य और दक्षिणार्ध्य दो शकु हो जाते हैं । एवमेव महावेदि के पश्चिम भाग में भी श्रोणी स्थानीय पश्चिमार्घ्यं - उत्तरार्ध्य - दक्षिणार्ध्य दो शङ्कु रहते । इन चारों में से पूर्वार्ध्य भाग वाला जो उत्तरार्ध्य शङ्कु है - उससे यह ऋत्विक् तीन विक्रम ( ६ पद ) पश्चिम की ओर परिक्रमरण करता एवं वहाँ तक एक निशान बना देता है-" तद् ( तत्र महावेद्याम् ) य एष पूर्वाद्धर्य उत्तराद्ध: शङ्कुर्भवति तस्मात् प्रत्यङ् प्रक्रामति त्रीन् विक्रमान् " इति । बस वही चात्वाल की मात्रा है, अर्थात् जैसे मध्यम शङ्कु से महावेदि का निर्माण किया गया था तथैव इस बिन्दु को केन्द्र मान कर चौकोर चात्वाल बनाना चाहिए । " तत् ( तत्र ) चात्वालं परिलिखति । सा चात्वालस्य मात्रा " । परन्तु भगवान् याज्ञवल्क्य इसका खण्डन करते हुए कहते हैं- ऐसा करने की कोई आवश्यकता नहीं । उत्तरार्ध्य शकु से तीन विक्रम पश्चिम से ही चात्वाल बनाने की कोई आवश्यकता नहीं है । उत्कर से आगे की ओर उत्तरार्ध्यं शङ्कु से पश्चिम - जहाँ ठीक समझें वहीं चात्वाल बना लें यज्ञ का जो कूड़ा होता है - इसके लिए महावेदि से उत्तर में एक खड्डा बनाया जाता है उसी को ' उत्कर ' कहते हैं । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि उत्कर से तो वह चात्वाल- पूर्व में ही होना चाहिए परन्तु उत्तरार्ध्य से तीन ही विक्रम पश्चिम में हो, इसकी कोई आवश्यकता नहीं है-" नात्र मात्रा s स्ति, यत्रैव स्वयं मनसा मान्येताग्रेणोत्करं तत् ( तत्र ) चात्वालं परिलिखेत् " ॥२६ ॥

अब चात्वाल का निर्माण करते हैं । वह श्रध्वर्यु महावेदि का जो प्रान्त भाग है उससे सटा कर उत्तरामुख करके उस शम्या को रखता है और वहाँ पर चात्वाल के लिए निशान बना देता है । जिस समय चात्वाल के लिए शम्या का निशान बनाता है - उस समय मन्त्र बोलता है - ' तप्तायनी मे s सि इति ' ( वा सं ० ५।६ ) । हे भूमे! आप मेरी तप्तायनी हो । दारिद्र्यादि दुःख से संतप्त जो पुरुष है वह इस पृथिवी पर चलता है । दुःखी का प्राश्रय यही भूमि है प्रतएव ' तप्तायनी मे s सि इति ' कहा है । इसी का स्पष्टीकरण करते हुए कहते हैं - तप्तायनी से इसी भूमि का ग्रहण समझना चाहिए । तप्त पुरुष इसी पर चलता है । और उसका दूसरा ठिकाना है ही कोनसा? " स वेद्यन्तात् । उदीचीं शम्यां निदधाति । स परिलिखति तप्तायनी मे s सि इति । इमामेवैतदाहास्यां हि तप्त एति " ॥२७ ॥

इसके बाद उस पश्चिम वाली उत्तराभिमुखी शम्या -रेखा से पूर्व की ओर उत्तरमुख करके शम्या रखता है । वहाँ भी उतना ही निशान बना देते हैं । तत्र मन्त्र बोलता है - ' वित्तायनी मेऽसि ' इति ( वा ० [ ५८ 1

पृष्ठ 77

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 77 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मणं सं ०५६ ) । संपत्तिशाली जो पुरुष है उसे ' विविदान ' कहते हैं । जैसे दुःखी मनुष्यों का सहारा यह पृथिवी है तथैव विविदानों का आश्रय भी यह पृथिवी है । सुखी और दुःखी दोनों का आश्रय यही है । इसी अभिप्राय से कहते हैं कि आप वित्तायनी हो । सुख - दुःख दोनों अवस्थाओं में हमारी रक्षा करने वाली आप ही हो - यही तात्पर्य है । जैसे तप्तायनी पृथिवी के लिए कहा गया है- वित्तायनी भी उसी के लिए कहा गया है । इसी अभिप्राय से कहते हैं--" इमामेवैतदाहास्यां हि विविदानः ( धनादिकं लब्धवान् पुरुषः ) एति " ॥२८ || इस प्रकार उत्तरभाव वेदि से सट कर उत्तर की ओर शम्या मात्र से रेखा खींच कर उसी वेदि के अन्त में पूर्व पश्चिम मुख कर दे । शम्या रखते श्रौर ' श्रवतान्मा नाथितात् ' ( वा ० सं ० ५।६ ) यह बोलते हुए वहाँ भी निशान बनाते हैं । हे भूमे! जो सुपर्णादिरूप संपत्ति है उससे मेरी रक्षा करो अर्थात् मैं कभी किसी से कुछ याञ्चा न करू - ऐसा श्राशीर्वाद दो । यही प्रार्थना इस भूमि से की जा रही है । इसी अभिप्राय से कहते हैं--" इमामेवैतदाह यत्र नाथै ( धनादिकं याचे ) तन्माऽवतात् ( तस्मात् त्वं मां रक्ष ) " - इति ॥२ ९ ॥ इसके अनन्तर उत्तर भाग में प्राची की ओर मुख करके - शम्या रखते हैं और उसी प्रकार उतनी ही दूर निम्नलिखित मन्त्र बोलते हुए निशान बना देते हैं - ' श्रवतान्मा व्यथितात् ' ( वा ० सं ० ५६ ) इति । व्यथा से - पीड़ा से मेरी रक्षा कीजिए । यह भी इसी भूमि के लिए कहा जा रहा है-" इमामेवैतदाह यत्र ( यस्मिन् विषये ) व्यथै ( लाभोपायमजानानो व्यथितः स्याम् ) तत् ( तत् सकाशात् ) मा प्रवतात् " - इति ॥३० ॥

चात्वाल बना कर वहाँ से ( महावेदि में - उत्तरावेदि निर्माण के लिए ) मिट्टी ले जाता है । जहाँ ( उत्तरावेदि स्थान में ) मिट्टी ले जाता है - वहाँ पहले से ही आग्नीध्र मौजूद रहता है । यह मिट्टी मिट्टी नहीं हैं - वाक् है । अतएव इसकी पेशवाई में वहाँ ऋत्विक् को पहले से ही मौजूद रहना चाहिए | श्राग्नीध्र पहले से ही वहाँ रहता है " अथ हरति । यत्र ( उत्तरवेदि प्रदेशे ) हरति तत् ( तत्र ) अग्नीदुपसी-दति ( उपविशति आग्नीध्रः ) " । मिट्टी हरण करने वाला ऋत्विक् - अग्नि के नाम बोलता हुआ ही चात्वाल से मिट्टी लाता है अर्थात् अग्नि के नाम बोल कर ही - उत्तरवेदि के प्रदेश में मिट्टी लानी चाहिए-[ ५६ ]

पृष्ठ 78

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 78 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण " स वा अग्नीनामेव नामानि गृह्णन्हरति " । अग्नि का नाम लेकर मृदाहरण क्यों करना चाहिए - इसकी उपपत्ति बतलाते हैं— वेदिनिर्माण ब्राह्मण होम करने के लिए देवताओं ने जिन अग्नियों का होतृत्वेन प्रवरण किया अपना होता बनाया-वे अग्नि भाग गए । भाग कर वे इसी पृथिवी की ओर दौड़े । इन तीनों में से एक अग्नि इस पृथिवी के उस पार चले गए । सूर्य देवता हैं । ३३ देवता सूर्य में ही रहते हैं इसीलिए तो ' चित्रं देवानामुदगात् ' ( ऋग्वेद मं ० १।११५ । १ ) यह कहा जाता है । इसी सूर्य की अग्नि प्रवर्ग्य बन कर पृथिवी की वस्तु बन जाती है । सोराग्नि का नाम प्राणाग्नि है । यही प्राणाग्नि पृथिवी की वस्तु बन कर ' प्रपानाग्नि ' कहलाने लगती है । यह प्रपानाग्नि श्रर्थात् पार्थिवाग्नि घन तरल - विरल तीन अवस्थानों में परिणत होता है । ये तीनों ही पृथिवी की अग्नि हैं । प्रत्येक पिण्ड का जो अपना साहस्रमण्डल होता है - उसमें जो स्तोम भेदेन त्रिलोकी विभाग किया जाता है उसे स्तौम्य त्रिलोकी कहते हैं । यह स्तोम्य त्रिलोकी उस वस्तु की अपनी चीज है । संसार के यच्ययावत् पदार्थ अग्नीसोमात्मक है । इसमें जो अग्नि है वह घनादि से तीन स्वरूप में परिणत हो - तीन लोक का उत्पादक बन जाता है एवं चौथा सोमलोक कहलाता है । इसी District कहते हैं । इसी प्रापोलोक के लिए- ' श्रस्ति वै चतुर्थी देवलोक श्राप: ' ( कौ ० १८।२ ) । यह कहा जाता है । जो साहस्रमण्डल होता है उसमें ३३ अहर्गण होते हैं । ३३ में त्रिवृत् पञ्चदश-एकविंश - त्रयस्त्रिंश ये चार स्तोम होते हैं । यद्यपि होते हैं ६ स्तोम परन्तु प्रकृत में ४ ही स्तोमों का सम्बन्ध है । पृथिवी के त्रिवृत् स्तोम तक जो घन श्रग्नि रहता है - उसे अग्नि ही कहते हैं एवं पञ्चदश स्तोम तक अग्नि की तरलावस्था रहती है । इसे अग्नि न कह कार ' वायु ' कहते हैं एवं एकविंशस्तोम तक अग्नि की विरलावस्था रहती है, इसे ही प्रादित्य कहते हैं । इस प्रकार एक ही पार्थिवाग्नि श्रग्नि-वायु प्रादित्यस्वरूप में परिणत होकर २१ तक वितत हो जाता है । जो अग्निलोक है उसे ही ' पृथिवी लोक ' कहते हैं । वायु लोक को- ' अन्तरिक्ष लोक ' कहते हैं एवं आदित्यलोक को ' लोक ' कहते हैं । इसके बाद में जो ३३ तक रहने वाला सोम है - वह ' श्रापोलोक ' कहलाता है । इस प्रकार पृथिवी के ३३ तक-अपने प्रातिविक ४ लोक हो जाते हैं । इन चारों में जिसे हमने श्रापोलोक बतलाया है उसके अधिष्ठाता वरुण हैं । वरुण भी एक प्रकार का श्रग्नि है एवं त्रैलोक्याग्नि शुद्ध अग्नि । कहना इससे यही है कि इन चारों लोकों में हम श्रग्नि की सत्ता मान सकते हैं । वही पृथिवी का प्रति चार स्वरूपों में परिणत हो कर चारों लोकों में व्याप्त हो जाता । पानी में रहने वाला जो अग्नि है उसे ' श्राप्या ' कहते हैं । पानी के सम्बन्ध से ही ' प्राप्या ' कहते हैं । यद्यपि श्राप्या यह चौथा ही अग्नि है तथापि चूँकि त्रैलोक्य का अग्नि ही तो आप्या बनता है श्रतएव इन तीनों को भी श्राप्या कह दिया जाता है । इन तीनों का एकता, द्विता, त्रिता यह नाम रखा जाता है । एकता पृथिवी का अग्नि है एवं चौथा यही अग्नि । द्युलोक के अधिष्ठाता आदित्य हैं । इन १२ आदित्यों में से एक का नाम इन्द्र है । आप्या यह इन्द्र भी १४ प्रकार का है - जिसमें एक इंन्द्र रूप का अधिष्ठाता है । इसी के लिए ' इन्द्रो रूपाणि करीकुदचरत् —'रूपं रूपं मघवा वोभवीति ' ( ऋ. मं. ३५३१८ ) यह कहा जाता है । इसी इन्द्र के साथ [ ६० ]

पृष्ठ 79

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 79 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मणे लोक में रहने वाले त्रता f अग्नि का घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है । वृत्र नाम है- अन्धकार का । इस अन्धकार को प्रकाश स्वरूप इन्द्र नष्ट कर देता है परन्तु इसमें अधिक महिमा त्रिता अग्नि की है । वृत्र तमोमय प्राण का नाम है एवं यह पानी में रहता है । असुर परमेष्ठिमण्डल की वस्तु है । परमेष्ठि आपोमय है । यह सूर्य्य के चारों प्रोर रहता है । यह प्रधान तमोमय प्राण सदा सूर्य्य पर श्राक्रमण किया करता है परन्तु सूर्य्यं अपनी रश्मियों से हर वक्त उस पानी को फाड़ कर फेंकता रहता है । यदि एक क्षण भी सौर - रश्मियाँ छपके देकर पानी को न फेंकें तो सारा रोदसी ब्रह्माण्ड आपोमय बन जाए । सूर्य्य की रश्मियों की जो गति है-उसके अधिष्ठाता इन्द्र हैं । प्रेरणा करना इन्द्र का काम है । इन्द्र जैसे रूप का अधिष्ठाता है - वैसे ही गति के अधिष्ठाता भी इन्द्र ही हैं श्रतएव इन्द्र ने असुरों को मारा - यह कहा जाता है; परन्तु ध्यान रहे -बिना त्रिता अग्नि की सहायता के खाली इन्द्र प्राप्य प्रधान तमोमय प्राण को नष्ट नहीं कर सकता । ताप अग्नि का धर्म है - प्रकाश इन्द्र का धर्म है । बिना ताप के पानी का प्रभाव शान्त नहीं हो सकता । पानी का शत्रु अग्नि है । प्रकाश से अन्धकार हट सकता है - पानी नष्ट नहीं हो सकता और असुरों का असली प्रारण पानी ही है अतएव इन्द्र को असुरों को मारने के लिए अग्नि की सहायता की अत्यन्त ही आवश्यकता है । इन्द्र द्युलोक में रहता है - द्युलोक में यही त्रिता अग्नि रहता है । इसी की सहायता से इन्द्र वृत्र को मारने में समर्थ होता है । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है-" चतुर्धा विहितो ह वाग्रेऽग्निरास । स यमग्रेऽग्निहोत्राय प्रावृणत स प्राधन्वद्यं द्वितीयं प्रावृणत स प्रवाधन्वद्यं तृतीयं प्रावृणत स प्रवाधन्वदथ यो s यमेतर्ह्यग्निः स भीषा निलिल्ये सोऽपः प्रविवेश तं देवा अनुविद्य सहसैवाद्भय आनिन्युः । तत श्राप्त्याः सम्बभूवुस्त्रितो द्वित एकतः । तऽइन्द्रेण सह चेरुः । स यत्र त्रिशीर्षाणं त्वाष्ट्रं विश्वरूपं जघान तस्य हैतेऽपि बध्यस्य विदाञ्चक्रुः शश्व-द्वैनं त्रित एव जघान । ( शत ० १ । २।३।१ - २ ) श्रुति कहती है कि जब इन्द्र ने त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप प्रसुर को मारा तो उस समय उसको मारने में ये तीनों अग्नि भी शामिल थे । इतना ही नहीं- इनमें जो त्रिता था उसी ने विश्वरूप को मारा । वास्तव में तीनों लोकों के अग्नि में इन्द्र शामिल रहता है । इन्द्र से कोई भी स्थान खाली नहीं है परन्तु इन्द्र के पास तीसरे द्युलोक का त्रिता अग्नि ही रहता है अतएव ' शश्वर्द्धनं त्रित एव जधान ' यह कहा जाता है । सूर्य देवताघन हैं - जैसा कि प्रकरण के प्रारम्भ में बतलाया है । इस सूर्य्यं से निकलने वाला जोन है वह देवताओं का होता नहीं बनता । सूर्य्य में जब अग्नि द्वारा सोमाहुति पड़ती है तभी सूर्य्य का अर्थात् देवताओं का यज्ञ होता है । अग्नि द्वारा आहुति पड़ती है अतएव अग्नि को होता कहा जाता है । सूर्य से प्रवर्ग्य बनकर तीनों लोकों में पृथिवी की वस्तु बनने वाले जो अग्नि - वायु - प्रादित्य स्वरूप एकता - द्विता - त्रिता अग्नि हैं- वे प्राहुति नहीं देते । ये तो देवताओंों अर्थात् सूर्य्यं को छोड़ कर - प्रवर्ग्य बन कर पृथिवी की वस्तु बन जाते हैं । पृथिवी की वस्तु बन कर अग्नि- वायु- प्रादित्य तीन स्वरूप धारण कर लेते हैं । तीनों में अग्नि- पृथिवी में अर्थात् त्रिवत् स्तोम में रह जाता है एवं वायु और आदित्य दोनों [ ६१ 1

पृष्ठ 80

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 80 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वैदिनिर्माण ब्राह्मणं इस पृथिवी के उस पार अर्थात् अन्तरिक्ष तथा द्यु में चले जाते हैं । इन तीनों अग्नियों के मेल से जो एक नया दिव्य वैश्वानर अग्नि उत्पन्न होता है, जो श्रङ्गिरा कहलाता है यही इन देवताओं का होता बनता हैं । जिस अङ्गिरा के लिए ' इत एत उदारुहन् ' ( सामवेद पू ० १११०१२ ) कहा जाता है - वही पृथिवी में से निकलकर सौर देवताओं में चान्द्रसोम की प्राहुति देता है । उत्तरावेदि में जिस अग्नि को स्थापित किया. जाएगा वही देवता का होता बनेगा । जिस समय यह होता बन, हव्य ले कर द्युलोक में जाएगा उस समय पूर्वोक्त तीनों श्रग्नि इसके बीच में पड़ेंगे । ऐसी अवस्था में यदि उन तीनों को इसमें शामिल न किया जाएगा तो तीनों ही इस जाते हुए होता अग्नि के मार्ग का अवरोध करेंगे । ऐसा न हो कि यह चौथा होता अग्नि इन तीनों की विद्युत से मिल जाए जिससे कि इसके मार्ग में बाधा पड़े अतएव इस यज्ञ में उन तीनों को भी शामिल करना श्रावश्यक है । अब प्रश्न यह रह जाता है कि वे प्रत्यक्ष तो दीखते नहीं फिर उन्हें शामिल कैसे करें - बस, इसका एक मात्र उत्तर है - निदान । वह मिट्टी अर्थात् पृथिवी ही उन तीनों का बीज है- मूल कारण है । एक इसी में है - दो इसकी पकड़ में रह कर अन्तरिक्ष श्रीर द्युलोक में रहते हैं तथा मिट्टी के हरण से तीनों का हरण हो जाता है अतएव मिट्टी लाते समय भागे हुए उन तीनों श्रग्नियों का नाम लेना आवश्यक है । हम मिट्टी नहीं लाते अपितु तीन अग्नियों को लाते हैं- ऐसी भावना के लिए तीनों का नाम लेते हुए चात्वाल में से उत्तरावेदि प्रदेश में मिट्टी लानी चाहिए । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहते हैं-सृष्टि के प्रारम्भ में सौर प्रारण देवताओं ने होम के लिए जिन श्रग्नियों का होतृत्वेन प्रवरण किया था वे भाग गए एवं भाग कर एक इस पृथिवी में जा घुसे - दो इसके उधर उस पार अर्थात् अन्तरिक्ष और द्यौं " जा घुसे । बस इसीलिए निदानेन अग्नि का नाम लेते हुए उन्हीं तीनों का हरण कर लेते हैं । मिट्टी में तीनों लोकों का अनि मौजूद है । अन्तरिक्ष का वायु भी इसमें है- द्युलोक का इन्द्र भी इसमें है अतएव इसे लाने से यज्ञ में तीनों अग्नि शामिल हो जाते हैं-" यान्वाऽअसून्देवाऽअग्रेऽग्नीन्होत्राय प्रावृरणत ते प्राधन्वंस्त इमा s एव पृथिवीरुपासर्पन्निमामहैव द्वेऽस्याः परे तेनैवैतन्निदानेन हरति ॥३१ ॥

} अग्नियों का नाम लेते हुए अग्नि का ग्रहण क्यों करना चाहिए इसकी उपपत्ति बतला दी गई अब पद्धति बतलाते हैं - वह अध्वर्यु उस स्फ्य से ( काष्ठ तलवार से ) उस मिट्टी को निम्नलिखित मन्त्र बोलते हुए खोदता है— " विदेदग्निर्नभो नामाग्नेऽअङ्गिरप्रायुना नाम्नेहीति " । हे नमो नाम के अङ्गिरा अग्ने! प्राप में नमो नाम का अग्नि शामिल हो और आयु नाम का जो अग्नि है - वह शामिल हो । इस प्रकार श्रायु नाम धारण करते हुए आप इस यज्ञ में पधारें । नमः अन्त-रिक्ष के अग्नि का नाम है । श्रायु- द्युलोक के अग्नि का नाम है । ' सूय्यं श्रात्मा जगतस्तस्थुषश्च ' ( यजुः सं ० १३।४६ ) । यह सिद्धान्त है । सूर्य्य ही आयु प्रकाशक है अतएव उस लोक के त्रिता अग्नि को ' आयु [ ६२ ।