Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 621–630
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 621–630
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तृतीय काण्ड ( ० ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण जब यज्ञ का सार भाग निकल कर गन्धर्वो के अधिकार में चला गया तो देवताओं ने विचार किया कि " लो, अब तक तो असुर राक्षसों का ही डर था, परन्तु अब अपने ही ये गन्धर्व ही - राक्षस और असुर बन बैठे | अब अपन ऐसा कौन सा उपाय करें जिससे कि नाशरहित - निरुपद्रव स्थान में - इस यज्ञ -रस को वापस ले आएँ " । आग्नेयप्राण का नाम देवता है- प्राप्यप्राण का नाम असुर है- एवं सौम्य प्रारण का नाम गन्धर्व है । अग्नि और पानी की शत्रुता है । एक भाव से - मित्रता भी है परन्तु यज्ञ - भाव से शत्रुता है । अग्नि प्रकाशी है - पानी तमः स्वरूप है । अग्नि विशकालन - धर्मा है - पानी संयोगधर्म्मा है । सोम अग्नि का मित्र है । अग्नि सोम की तो ऐसी मित्रता है कि न अग्नि सोम के बिना रह सकता है । एवं न सोम अग्नि के बिना रह सकता है । अतएव श्रुति कहती है-" अग्निर्जागार तमृचः कामयन्ते श्रग्निर्जागार तमु सामानि यन्ति । अग्निर्जागर तमयं सोम ग्राह तवाहमस्मि सख्ये न्योकाः " इति ॥ ( ऋग्वेद मं ० ५।४४।१५ ) यदि अग्नि में सोम न आए तो अग्नि मर जाए । ग्रग्नि अन्नाद है - सोम अन्न है, अग्नि भोक्ता है-सोम भोग्य है । भोक्ता की सत्ता भोग्य पर निर्भर है । अग्नि का जो भाग सोममय पानी में चला जाता है - वह एक प्रकार का सोम ही बन जाता है । वही यज्ञ का सार भाग है । १७ ( सतरह ) के ऊपर रहने वाला सोम ही तो यज्ञ का सार भाग है । बिना उसके पार्थिव सप्तदशस्थ प्राग्नेय प्राण की सत्ता रह नहीं सकती । जो यज्ञ - रस १७ ( सतरह ) से ऊपर चला गया है - वह जब - इसमें वापस आता है तभी पार्थिव श्राग्नेय प्राण - देवताओं की स्थिति रहती है । यदि यज्ञ रस ( सोम ) न आए, तो यज्ञ ही न हो । यज्ञ न तो पार्थिव प्राणाग्नि की स्थिति ही न रहे । गन्धर्व प्राण एक प्रकार का विच्छेदक प्राण है । जब गन्धर्व -प्राण - संगीत - लड़कपन - ये का प्रवेश जाता है तो और किसी काम में तबियत नहीं लगती । चाञ्चल्य इसी गन्धर्व - प्राण की महिमा हैं । इसके आए बाद और किसी काम में मन नहीं लगता । जो यज्ञ - रस गन्धर्वों में चला जाता है, वह अब देवताओं से नहीं मिल पाता । प्रर्थात् सोम - प्राण - स्वरूप - गन्धर्व चूँकि विच्छेदक हैं, अतएव पार्थिव अग्नि में उस यज्ञ - स्वरूप सोम की आहुति नहीं हो सकती । सोम अग्नि में मिल नहीं सकता । इसी विज्ञान का अलङ्कार रूप से वर्णन करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं-" ते ह देवा ऊचुः - इयसु न्वेवेह नाष्ट्रा यदिमे गन्धर्वाः कथं विमभये-नाष्ट्रे यज्ञस्य - रसमाहरेम इति " || १ ९ || पार्थिवाग्निमय प्रारण- देवताओं में - १७ ( सतरह ) से ऊपर रहने वाला सोम - स्वरूप यज्ञ रस, विच्छेदक गन्धर्व - प्राण के कारण इनमें बहुत न हुआ यही तात्पर्य है । आखिर देवता, देवता थे- उन्होंने इसका मार्ग ढूंढ निकाला । देवताओं ने विचार किया कि गन्धर्व योषित् - काम हैं । वे स्त्रियों को ज्यादा चाहते हैं । अतः अपन इस यज्ञ रस को लेने मय पत्नियों के चलें । स्वभाव ही से स्त्रैण गन्धर्व - स्त्रियों को देखते ही उस सोममय यज्ञ - रस को छोड़ देंगे एवं स्त्रियों की [ ६०७ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ९ ) १ ' सुत्या ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण ( शत ० ब्रा ० १४ । ६ । ७ । १ ) [ ६०८ ] तरफ झुक जाएँगे । बस, उधर वे उनमें फंसे रहेंगे - इधर अपन ऐसे निरुपद्रव स्थान में यज्ञ - रस का श्राहरण कर लेंगे । यह निश्चय करके देवता मय पत्नियों के यज्ञ - रस लेने गए । पत्नियों को देखते ही गन्धर्व उधर झुक गए एवं मौका पा कर देवताओं ने उस निरुपद्रवस्थान में से यज्ञ रस का आहरण कर लिया । कई - कई प्राणों का स्वभाव है कि वे निसर्गतः ही दूसरे की ओर झुक जाते हैं । उन प्राणों में से गन्धर्व - प्राण एक ऐसा प्राण है कि यह दूसरे प्राण पर फौरन कूद पड़ता है । प्राण अनन्त प्रकार के हैं । उन अनन्तों में से जो योषा प्रारण है, उसी पर गन्धर्व का आक्रमण होता है । सृष्टि निर्माता प्रारण, योषा और वृषा- इन दो भागों में विभक्त है । वृषाप्राण पुरुष कहलाता है, यही वेदान्त परिभाषा में केवल ' प्राण ' नाम से ही व्यवहृत होता है एवं योषा प्रारण स्त्री कहलाता है - इसे वेदांत दर्शन में ' रथि ' कहा जाता है । बस इस रयि और प्रारण के - वृषा और योषा के स्त्री और पुरुष के मेल से ही सारी सृष्टि का निर्माण होता है । सोम की घनावस्था को पानी कहते हैं - प्रतएव " योषा वा श्रपः । वृषाग्निः १ यह कहा जाता है । बस, इस अग्नि- सोमापरपर्य्यायक - योषा वृषा के मेल से ही सारा विश्व बना हुआ है । अतएव - " प्रग्नीषोमात्मकं जगत् " २ यह कहा जाता है । हमने बतलाया है कि - सौम्य प्राण का नाम गन्धर्व है । योषा सौम्य प्राण है- श्रतएव इस पर गन्धर्वप्राण उसी समय ग्रा कूदता है । स्त्रियों के आत्मा में चूंकि वही योषा प्रारण रहता है, अतएव उन्हें ' योषित् ' कहा जाता और यही कारण है कि स्त्रियों पर गन्धर्वो का आक्रमण होता रहता है । चन्द्रमा में रहने वाले - ब्राह्म- दैवत ऐन्द्र प्राजापत्य- गन्धर्व यज्ञ-राक्षस - पिशाच - इन आठ देवयोनियों में से गन्धर्व प्रारण - गन्धर्व देवता - स्त्रियों पर आक्रमण किया करते हैं । जब तक लड़की दो वर्ष की रहती है, तब तक उसमें सोम देवता का राज्य रहता है । परन्तु दो वर्ष के बाद सोम के उत्वण होते ही उसमें गन्धर्व देवता या कूदते हैं । अतएव -" सोमः प्रथमो - विविदे - गन्धर्वोविविदं उत्तरम् ” । यह कहा जाता है । स्त्रियों की ओर गन्धर्वों का झुकना प्रकृति - सिद्ध है । जब तक गन्धर्व अल्प मात्रा से प्रविष्ट होता रहता है तब तक तो स्त्री अपने आपे में रहती है, परन्तु जब अधिक मात्रा से वह श्री जाता है तो वह परायत्त हो जाती है । ऐसी अवस्था में वह बेहोश हो जाती है -प्रण्ड - बण्ड बोलने लगती है । यही ' भूतावेश ' कहलाता है । इसकी चिकित्सा भगवान् चरक ने " भूतोपशमनीयाध्याय " में लिखी है । ' भूतावेश ' कितने ही महानुभावों के हिसाब से कल्पनामात्र है । ऐसे महाशयों के लिए हमें कुछ नहीं कहना कहना केवल जिज्ञासुत्रों के लिए है श्रुति को ही प्रमाण मानने वाले महाशयों को श्रुति निम्नलिखित उद्धरण पर ध्यान देना चाहिए-" अथ हैनमुद्दालक आरूणिः पप्रच्छ - याज्ञवल्क्येति होवाच । मद्रेष्वव-साम । पतञ्जलस्य काप्यस्य गृहेषु यज्ञमधीयानाः । तस्यासीत् भार्या गन्धर्व-गृहीता । तमपृच्छाम - कोऽसीति । सोऽब्रवीत् - कबन्ध श्राथर्वरण - इति " । ' शत ० ब्रा ० २ | १ | १।४ ' । २ ' रामपूर्व ० उप ० ३।६ ' |
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1 तृतीय काण्ड ( अ ० ९ ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण अस्तु, सारे प्रपञ्च से हमें बतलाना यही है कि योषाप्राण पर गन्धर्व का आक्रमण स्वाभाविक है । चूंकि स्त्रियों में से योषा प्रारण निकला करता है अतएव इन पर गन्धर्व - प्रारण का झुकाव रहता है । क्या स्त्रियों के श्री क्या पुरुषों के शरीर में से प्रारण अनवरत निकला करता है - जिसे कि निकलते हुए चर्म-चक्षुओं से नहीं देखा जा सकता । यह प्रारण ३ ( तीन ) वर्ष तक अनुशयरूप से रहता है । आप जिस रास्ते से निकलेंगे - उस रास्ते में आपका प्राण जज्ब हो जाएगा एवं वह तीन वर्ष तक वहीं रहेगा । परमेश्वर की लीला विचित्र हैं - मनुष्य इस प्रारण के अनुशय को नहीं पहचान सकता - परन्तु कुत्ता पहचान जाता है | जिस रास्ते से चोर जाता है- कुत्ता उस रास्ते को पहचान लेता है - इसमें साधक वही प्रारणानुशय है । महाभारत काल में- एकलव्य नाम का भीलकुमार - द्रोणाचार्य्यं की प्रतिमा बना कर धनुर्विद्या का अभ्यास करता था । होते - होते वह अस्त्र - विद्या में अर्जुन से भी अधिक निपुण हो गया । एक समय मय शिष्यों के द्रोणाचार्य्यं उसी वन में जा निकले । इनके पास एक कुत्ता था । वह कुत्ता मनुष्य की गन्ध पा कर ( उसी प्रारण की गन्ध पा कर ) आगे बढ़ता गया । बढ़ते - बढते वह वहाँ जा पहुंचा जहाँ पर कि एकलव्य निरन्तर बाण - वर्षा करके अपना अभ्यास बढ़ा रहा था । कुत्ता उसे देखते ही भौंकने लगा । इससे एक-लव्य के विद्याभ्यास में बाधा होने लगी । अतएव उसने चार - पाँच बारण मार कर कौशल से उसका मुंह सीं दिया । कुत्ता उसी समय वापस दौड़ पड़ा । बाद में द्रोणाचार्य्यं वहाँ आए और अर्जुन के विषय में की गई " तुम संसार के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनोगे " इस प्रतिज्ञा को निभाने के लिए गुरु - दक्षिणा में एकलव्य का अँगूठा ले लिया । अस्तु, इस प्रपञ्च से कहना यही है कि कुत्ता, प्रारण के अनुशय को पहचान लेता 1 इसी प्रकार बल असुर द्वारा गुम हुई बृहस्पति की गाय का पता भी इस प्राणानुशय के द्वारा इन्द्र की सरमा नाम की कुत्ती ने लगाया था । पता लग जाने पर इन्द्र ने उससे गाय छीन ली थी और वहीं उस बल असुर को मार गिराया था जिसके कि कारण इन्द्र आज भी " बलाराति ' कहलाते हैं । कहना यही है कि स्त्रियों में से जो एक प्राण निकला करता है - उस पर गन्धर्व - प्राण छा जाता है । स्त्रियों की प्राण- लहर में गन्धर्व कूद पड़ते । प्रकृति - यज्ञ में जो योषा प्राण भरा हुआ है वह गन्धर्वों से प्राक्रान्त रहता है- प्रतएव वह यज्ञ रस इनमें ( प्राण- देवताओं में ) प्राहुत होता रहता है । यदि योषा प्राण न रहता तो विघट्टक गन्धर्व - प्रारण के कारण यज्ञ रस इनमें न मिल पाता । इसी विज्ञान को पहचान कर भौमस्वर्गवासी देवतानों ने पानी में से रस लाने के लिए उस विच्छेदक गन्धर्व प्रारण को हटाने के लिए - स्त्रियों के साथ ही पानी लेने के लिए गमन किया था एवं ऐसा कर उन्होंने इस यज्ञ रस को प्राप्त कर लिया था । बस, इसी उभयविध कथा को लक्ष्य में रख कर याज्ञवल्क्य कहते हैं-" ते होचुः । योषित्कामा वै गन्धर्वाः । सहैव पत्नीभिरयाम । ते पत्नी-sda गन्धर्वा धिष्यन्ति ( काङ्क्षन्ति ) । प्रथैतमभयेऽनाष्ट्रे यज्ञस्य रसमाहरिष्याम इति ॥२० ॥
" ते सह पत्नीभिरीयुः । ते पत्नीष्वेव गन्धर्वा जगृधुः । श्रथैतमभयेऽनाष्ट्रे यज्ञस्य रसमाजहरुः " ॥२१ ॥
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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण प्रकृति - देवताओं की तरह भौमस्वर्गीय देवताओं ने पत्नियों को साथ ले कर एकधना की ओर गमन किया था । अतएव " यद्वै वा प्रकुर्वंस्तत् करवाणि " - इस घण्टाघोष के अनुसार आज यह यजमान भी पत्नियों के साथ ही एकधना पानी लेने जाता है । ऐसा करने से यज्ञ - रस के विच्छेदक गन्धर्व, इन पत्नियों की ओर झुक जाते हैं । उसी समय मौका पा कर उस अभय निरुपद्रव्य शान्त स्थान में यज्ञ - रस का आहरण कर लेता है । बस, पानी लाते समय पत्नी को साथ क्यों ले जाया जाता है - जब कि उसका कोई काम नहीं है " - इसकी यही उपपत्ति है— " तथो एवैष - एतत् सहैव पत्नीभिरेति । ते पत्नीष्वेव गन्धर्वा गृह्णन्ति प्रतमभयेनाष्ट्र यज्ञस्य रसमाहरन्ति " ॥ २२ ॥
इस प्रकार पत्नियों को साथ ले कर - यजमानादि - पानी के पास जा पहुँचे । पहुँचते ही जिस प्रच स्र में चतुर्गृहीत याज्य था, उससे पानी में आहुति देते हैं । यहाँ पर इस पानी में प्राहुति देने की क्यों व्यवस्था है? इसकी उपपत्ति बतलाते हैं । श्राज वह यज्ञ रस पानी में ऋत रूप से फैल रहा है-चारों ओर बिखर रहा है - एक जगह इकट्ठा नहीं है । यह घृत अग्नि स्वरूप है । इसीलिए तो " तेजो-बै घृतम् ” यह कहा जाता है । आप में रहने वाला यज्ञ - रस सोम - स्वरूप है । जैसे गन्धर्व - प्राण स्त्रियों की ओर प्रवरण हो जाता है- भुंक जाता है, तथैव सोम अग्नि की तरफ झुक जाता है - श्रग्नि की ओर सारा सोम आ जाता है । जिस समय अग्निरूप आज्य की प्राहुति दी जाती है, उस समय चारों ओर फैलाहुआ सोम - स्वरूप यज्ञ रस - इस प्राहुति - स्थान पर इकट्ठा हो जाता है । प्राहुति स्थान उस यज्ञ-रस का केन्द्र बन जाता है । सारा रस एक जगह आ जाता है । ऋत रस आहुति का केन्द्र कायम करता हुआ सभ्य बन जाता है । बस, इसी एक जगह इकट्ठे हुए रस को आसानी से निकाल लेते 1 यदि प्राहुति न दी जाती तो यज्ञ रस पकड़ में न आता एवं यज्ञ अधूरा ही रह जाता । अपि च- देवता सत्यरूप हैं, अत: उनके लिए सत्य द्रव्य ही देना उचित है । यह यज्ञ रस बिना प्राहुति के ऋत रहता है । बस, इसके ऋत - भाव को हटाने के लिए एवं संहत्य - सर्वात्मना सारे रस को लेने के लिए ही पानी में -घृत की प्राहुति दी जाती है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहते हैं -पानी में हुत इस आहुति का अनुसरण कर पानी में ऋत रूप से अनुप्रविष्ट यज्ञ - रस आहुति के भिमुख श्रा जाता है - प्राहुति के अनुगत हो जाता है । एक जगह इकट्ठे हुए इस रस को अलग छाँट कर निकाल लेते हैं । बस, प्राहुति देने का यही प्रयोजन है-" सो s पोऽभिजुहोति । एतां ह वाहुति हुतामेष यज्ञस्य रस उपसमै -ति । तां प्रत्युत्तिष्ठति । तमेवैतदाविष्कृत्य गृह्णाति ॥२३ ॥
श्रपि च जिसलिए यहाँ प्राहुति दी जाती है वह भी सुन लीजिए - प्रर्थात् श्राहुति देने का दूसरा प्रयोजन और भी है ----" यद्वैवैतामाहुति जुहोति - ( तदपि शृणु इतिशेषः ) " । [ ६१० ]
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तृतीय काण्ड ( ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण 1 [ ६११ ] सुत्या - त्राह्मण अध्वर्यु अपः प्रविष्ट इसी ( वा ० सं ० ६।२७ ) यह आज्य भी यज्ञ - साधकत्वात् यज्ञ ही है । इसकी आहुति देता हुआ ' आप ' यज्ञ रस को समृद्ध करता है यज्ञ को विस्तृत करता है । आज्य यज्ञ से । समृद्ध करके उस यज्ञ - रस को ( जोकि आहुति से एक जगह इकट्ठा गया है ) अपने अधीन करता है । इकट्ठे किए हुए रस को पानी से माँगता है - अर्थात् लेता है । इस प्रकार यज्ञ रस को समृद्ध बनाना ही इस प्राहुति का दूसरा फल है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" एतमेवैतद्यज्ञस्य रसमभिप्रस्तृणीते । तमारुन्धे । तमपो याचति " इति । जिन देवताओं के लिए इस आहुति का हवन करता है - वे देवता तृप्त हो जाते हैं - प्रर्थात् यह ग्राहुति - श्रपां नपात् नाम के पानी के देवता के लिए दी जाती है - इससे आपोदेवता प्रसन्न हो जाते हैं-एवं तृप्त हो कर यज्ञ - रस को, यजमान के लिए झुका देते हैं अर्थात् - आपोदेवता यज्ञ - रस को हमारे यज्ञ में शामिल होने में मदद पहुँचाते हैं । इस प्रकार तीन फलों को लक्ष्य में रख कर पानी में यह प्रति दी जाती है-“ याभ्य उ चैवैतां देवताभ्य आहुति जुहोति -ता एवैतत् प्रीणाति । ता अस्मै तृप्ताः प्रीता एतं यज्ञस्य रसं सन्नमन्ति ” ॥ २४ ॥
पानी में घृत की आहुति क्यों देनी चाहिए? - इसकी उपपत्ति बतला दी गई । अब पद्धति बत-लाते हैं-" देवीरापोऽम्रपानपाद्यो व ऊम्मिर्हविष्यऽइन्द्रियावान् मदिन्तमः । तं देवेभ्यो देवत्रा दत्त शुक्रपेभ्यो येषां भागस्थ स्वाहा " इति ॥ मन्त्र के प्रत्येक पद का अर्थ भगवान् याज्ञवल्क्य स्वयं करते हैं--यह पानी - देवीस्वरूप है । देवियाँ होती हैं, उनमें से एक यह प्रापो देवी भी है । ' आप ' स्त्रीलिङ्ग होने से देवियाँ हैं । योषारूप होने से देवियाँ हैं - अतएव " देवीरापः " यह कहा गया है । " देव्यां ह्याप-स्तस्मादाह देवीराप इति " । यह पानी प्रपांनपात् नाम से प्रसिद्ध है । जब तक शरीर में पानी रहता है । तभी तक शरीर नहीं गिरता है । पानीदार घोड़ा ही असली घोड़ा कहलाता है । जब शरीर का पानी निकल जाता है तो शरीर गिर जाता है । शरीर को यही पानी नहीं गिरने देता है, अतएव " न पातयति-शरीरम् " इस व्युत्पत्ति से हम इसे " अपां नपात् " कहने के तय्यार हैं । " यो व ऊमर्हविष्यि इति " । हविष्य का अर्थ है - यज्ञिय । संसार भर के जितने भी पानी हैं, सब त्रिपथगा हैं । जो पानी बरसता है, उसका एक हिस्सा तो जमीन के भीतर पैठ जाता है । कुए में - बावड़ी में जो पानी है - वह यही नीचे पैठा हुआ पानी है । पानी का कुछ हिस्सा जमीन पर सीधा बह जाता है ।
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तृतीय काण्ड ( ० 2 ) शतपथ ब्राह्मणं सुत्या ब्राह्मण एवं कुछ हिस्सा ऊपर की ओर चला जाता है । इन ऊपर गए हुए जल - करणों से ही वायु में तरी आ जाती है । इस प्रकार - ऊर्ध्व अधः- तिय्यं क् - पानी की ये तीन ही गति हैं । इन तीनों में से जो ऊपर जाने वाली लहर है - वही देवताओं में जाती है । यद्यपि ऊपर गया हुआ पानी पहले वायु में ही जाता है, तथापि बाद में वायु द्वारा सौर प्रारण - देवताओं में चला जाता है । श्रतएव - भारतीय विज्ञान कहता है-" अग्निर्वा इतो वृष्टिमुदीरयति मरुतः सृष्टां नयन्ति यदा खलु वा असावादित्यो न्यङ् रश्मिभिः पर्यावर्ततेऽथ वर्षति । " ( तै ० सं ० २ । ४ । १० । २ ) अग्नि द्वारा ऊपर की ओर प्रक्षिप्त पानी प्राठ ( ८ ) महीने तक सूर्य के गर्भ में रहता है-" सप्तार्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मरिण । ते धीतिभिर्मनसा ते विपश्चितः परिभुवः परि भवन्ति विश्वतः ॥। ” ( ऋग्वेद मं ० १।१६४ | ३६ ) सौर प्रारण का नाम ही देवता है । चूंकि ऊर्ध्व पानी को देवता चूस जाते हैं, अतएव हम इन पानियों को देवताओं की प्राहुति होने के कारण ' हविष्य ' अतएव - ' यज्ञिय ' कहने के लिए तय्यार हैं । यज्ञ में न अधोगत पानी की अपेक्षा है - न तिर्य्यगत पानी की अपेक्षा है क्यों कि दोनों ही प्रयज्ञिय 1 अपेक्षित हविष्य ऊर्ध्वगत यज्ञिय पानी ही है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" यो व ऊम्मिर्हविष्यः । यो व ऊम्मर्यज्ञिय इत्येवैतदाह " । इन्द्रियवान् मदिन्तम इति । इन्द्रियवान् से वीर्य्यवान् ही अभिप्रेत है । ऊपर गया हुआ पानी चूं कि हल्का होता है - श्रतएव इस प्रयज्ञिय पानी में अधिक सत्त्व रहता है । तभी इसे - " इन्द्रियवान् ” कहा है । श्रपि च- चाहे कैसा भी खारा पानी है - आकाश में जा कर वह भी मधुर एवं सुस्वादु हो जाता है । क्यों कि खारापना क्षार से होता है । क्षार पार्थिव पदार्थ है । ऊपर जाते हुए पानी का जो पार्थिव क्षार भाग है - उसे पृथिवी स्वाकर्षण शक्ति से स्वयं की प्रोर खींच लेती है एवं ऊपर मधुर रस ही रह जाता है । अतएव " मदिनाम: " कहा है । " तं देवेभ्यो देवत्रा दत्त " " इससे प्रापो देवी से याचना की गई है-कि हे प्रपो देवी! ऐसे यज्ञ रस को, जो कि देवताओं के अधीन है, अर्थात् देवताओं की वस्तु है - देवताओं के लिए दे दीजिए । वे देवता कैसे हैं? इसके लिए कहते हैं ' शुक्रयेभ्यः ' । संसार में यौगिक और मौलिक दो ही तत्त्व होते हैं । जो मौलिक तत्त्व है- शुद्धतत्त्व है - उसे " सत्य " कहा जाता है । यौगिक तत्त्व को ' यज्ञ ' कहते हैं । देवता सत्य है । इन देवताओं की जो परस्परा-हुति है - मौलिक तत्त्वों की जो आहुति है उससे यज्ञ तत्त्व उत्पन्न होता है । मौलिक ही - सत्य ही - आहुत हो कर यज्ञ बनता है । बस, श्राहूयजमान जो सत्य तत्त्व है उसका नाम - '- " शुक्र " हो जाता । यही सत्य आहूयमान हो कर सृष्टि रूप से - यज्ञरूप से उत्पन्न होता है, अतएव इसे ' शुक्र ' कहा जाता है । ' पुरुष का वीर्य्यं ही शुक्र कहलाता है ' यह बात नहीं है अपितु सृष्टिजनक ग्राहूयमान द्रव्य ही ' शुक्र ' कहलाता १ ' वा ० सं ० ६।२७ ' । [ ६१२ ]
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तृतीय काण्ड ( ० 8 ) प्रातपथ ब्राह्मण सुंत्या - ब्राह्मणं है । पुरुष का वीर्य्य भी चूँ कि आहूयमान हो कर पुत्रोत्पत्ति का कारण बनता है - प्रतएव उसे भी " शुक्र " कह दिया जाता है । वस्तुतः शुक्र- सत्य तत्त्व का नाम है । बस, सत्य ही देवताओं की खुराक है-सत्य ही देवताओं का स्वरूप है । जब तक सत्य है - देवता है । अतएव " शुक्रयेभ्यः " यह कहा गया है । इससे ' सत्ययेभ्यः ' - यही अभिप्रेत है । चूँकि यह यज्ञिय ऊर्ध्वरस इन्हीं की वस्तु है, अतएव ' एषां भाग स्थ ' यह कहा गया है । " हे आपो देवी! हे अपांनपात्! आपकी जो तीनों में ऊपर जाने वाली - हविष्य - ( यज्ञिय ) ऊम्मि है - अर्थात् प्रापका जो ऊर्ध्वगामी यज्ञ रस है - जो कि वीर्य्यवान् एवं स्वादिष्ट ऊर्मि है, उस रस को जो कि देवताओं की ही वस्तु है उनको दे दीजिए । आप ( अर्थात् आपका यज्ञिय रस ) जिन देवताओं का भाग है, उनके लिए ' स्वाहा ' है -" येषां भाग स्थ स्वाहा " ॥ २५ ॥ ( वा ० सं ० ६।२७ )
बस यह पूर्वोक्त मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु पानी में प्राहुति डाल देता है । इसके बाद पास में ही खड़ा हुआ मैत्रावरुण सम्बन्धी ' चमसाध्वर्यु ' मैत्रावरुण देवता के चमस से उस आहुति को ( आहुति घृत को ) अलग कर देता है । उस समय " कार्षीरसि " यह मन्त्र बोलता है । हुति! आप कर्षण करने वाले देवता को अन्न दो । एक कोयले को अग्नि में डाल दीजिए । थोड़ी देर में वह अग्नि उस कोयले को खा जाएगा । थोड़ी देर में कोयला श्रग्नियुक्त हो कर राख बन जाएगा । तो जिस प्रकार अङ्गार अग्नि द्वारा भुक्त हो जाता है- एवमेव यह प्राज्याहुति उस श्रापो देवता से मुक्त हो जाती है । प्राहुति के सार भाग को वह देवता चूस लेता है । अतएव इस आहुति को ' कषि: ' ( कृषेर्देव-तायाः ) कहा जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं--" यथा वाऽङ्गारोऽग्निना प्सातः स्यादेवमेषाहुतिरेतया देवतया प्साता भवति " । तात्पर्य का कहने का यही है कि जैसे अग्नि से युक्त कोयला निस्सार हो जाता है तथैव प्रापो-देवता से भुक्त होने के कारण यह प्राहुति भी सारहीना हो जाती है । तेल निकले हुए बादाम का भूकस है । ऐसे यातयाम ( गतरस ) पदार्थ का सम्बन्ध करना अपने यज्ञ को भी विरस बनाना है । अतएव इस आहुति को चमस से अलग हटा देना चाहिए, जिससे कि पानी में उसका अंश न श्रा जाए । अपिच - इस एकधना पानी से अभिषव करते समय इसे सोमराजा के साथ मिलाया जाता है । प्राज्य तेजो - रूप होने से वज्र है - प्राग्नेय है एवं सोम दिव्यात्मा पैदा करने वाला रेत है । ऐसी अवस्था में यदि प्राहुति घृत का सोम से सम्बन्ध हो जाएगा तो जैसे घुँघ्रा लगने से जो की उगने की शक्ति मारी जाती है तथैव सोम की प्रजनन शक्ति मारी जाएगी । इसलिए आहुति घृत को चमस से एकदम हटा कर ही एकधना पानी लेना चाहिए-" राजानं वा एताभिरद्भिरुपत्रक्ष्यन् ( संसर्गं करिष्यन् ) भवति । या एता मैत्रावरुणचमसे । वज्रो वाऽप्राज्यम् । रेतः सोमः । नेद् वज्रेणाज्येन रेतः सोमं हिनसानीति- तस्माद्वाऽश्रपप्लावयति " ॥२६ ॥
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण जिस जगह से पानी लाते हैं - उस स्थान में पहले घृत की आहुति देते हैं । तदनन्तर पानी पर से उस प्राहुत घृत को " होतृचमस " से हटाते हैं । जब सारा घृत हट जाता है तो केवल शुद्ध पानी घड़ों में लेते । इस पानी में घृत का जरा सा भी अंश नहीं रहना चाहिए, नहीं तो रेत सोम की प्रजनन भर शक्ति मारी जाएगी । इस प्रकार वह मैत्रावरुण सम्बन्धी चमसाध्वर्यु मैत्रावरुण चमस ( काष्ठ चम्मच ) से निम्नलिखित मन्त्र बोलता हुआ पानी लेता है-" समुद्रस्य त्वाक्षित्या उन्नयामि " - इति । ( वा ० सं ० ६।२८ ) हे श्राप! समुद्र की प्राक्षीति से आपको ऊँचे की ओर लेता । समुद्र में प्राक्षीति भाव रहता है । समुद्र एक ऐसी वस्तु है जो कभी घटती ही नहीं । समुच्चित पानी का ही नाम तो समुद्र है । यह श्रापोमय समुद्र सर्वथा अक्षय्य है । पानी का खजाना अटूट है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि स्थावरजंगमादि इतने कामों में काम आने पर भी कभी पानी कम नहीं होता । संसार में ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं जो बिना पानी के अपना स्वरूप रख सकता है । पानी ही के फेन बनते हैं - पानी ही उषा है । पानी ही सिकता बनती है- पानी ही शर्करा बनती है । लोहा - पत्थर - वृक्ष - मकान - बाग - वन - उप-वन - कृमि - कीट - मनुष्य पशु - पक्षी - इत्यादि सारी पार्थिव प्रजा - इसी पानी पर निर्भर है । सब को श्रात्म-रक्षार्थ - स्वस्वरूप - रक्षार्थ पानी की याञ्चा करनी पड़ती है । सारा जगत् आपोमय है । इस प्रकार जड़-चेतनमय अखिल विश्व निर्माण में खर्च होने पर भी पानी कम नहीं होता । इतना होने पर भी भौगोलिक स्थिति से पता चलता है कि संसार में रुपये में १२ आना पानी है और चार आना शेष सब कुछ हैं । भला ऐसे पानी की प्रक्षिति का कहना ही क्या है? पानी का भण्डार अटूट है - क्या हम यह नहीं कह सकते हैं? - अवश्य ही कह सकते हैं । ऐसी अवस्था में ' समुद्रस्याक्षित्यै " कहता हुआ अध्वर्यु अपने उठाए हुए पानी में अक्षिति को ही स्थापित करता है । पानी नहीं उठाता अपितु " अक्षिति " को उठाता है यज्ञ को अक्षय्य बनाने के लिए निग्राभ्यास्वरूप प्रक्षिति को ही उठाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं--" अथ गृह्णाति - ' समुद्रस्य त्वाक्षित्याऽउन्नयामि " इति । आपो वै समुद्रः । स्वेतदक्षित दधाति । तस्मादापडएतावति भोगे - भुज्यमाने ( सर्वे भुज्यमा-ने s पि ) नक्षीयन्ते " । होतृचमस से पानी उठाने के बाद एकधना घड़ों में पानी भरते हैं । इसके बाद पालेजन पानी पनियाँ उठाती हैं । हमने बतलाया था कि निग्रास्या पानी लाते समय पत्नियाँ भी साथ आती हैं । इन पत्नियों का काम है- ' पानेजन ' ले जाना । यज्ञ में आए हुए ब्राह्मणों के पाँव धोने के लिए एक खास पानी - नियत पानी होता है । उससे केवल निमन्त्रितों के पाँव मात्र धोए जाते हैं । इस पानी को " पान्नेजन " कहते हैं । जैसे एकधना पानी लाया जाता है तथैव पानेजन पानी भी यहीं से ले जाया जाता है । एकवना घड़ों को परिकर्मी ले चलते हैं एवं पान्तेजन पानी के घड़ों को पत्नियाँ ले चलती हैं । एकघना घड़ों में और पानेजन घड़ों में पानी मैत्रावरुण चमस से ही भरा जाता है । इस प्रकार मैत्रा -वरुण चमस से घड़ों को भर कर तय्यार कर लेते हैं--[ ६१४ ] }
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण
" तदन्वेकधनानुन्नयन्ति । तदनु पान्तेजनान् " ॥२७ ॥
हमने बतलाया था कि इस यज्ञ में १० ( दस ) चमस होते हैं । अब यहाँ पर प्रश्न होता है कि होतृ चमसादि अन्यान्य चमसों के होते हुए केवल " मैत्रावरुण चमस " से ही पानी क्यों लिया जाता है? -इसी का उत्तर देते हैं-" तत् ( तत्र ) यत् ( यस्मात् ) मैत्रावरुणचमसेन गृह्णाति " ( तदुच्यते ) । जिस समय देवताओं से यज्ञ उपक्रान्त हो गया - देवताओं को छोड़ कर चला गया, तो अपक्रान्त यज्ञ को देवताओं ने इस मैत्रावरुण नाम के ऋत्विक् द्वारा प्रेषों से बुलाना चाहा । पुरोरुचियों से उसे किया एवं निवेदन साधनों से निवेदन किया । खुश भोजनादि व्यवहार में बुलाना और खिलाना - निवेदन करना ये दो भाव रहते हैं । जिसे हम कोई वस्तु देना चाहते हैं, पहले उसे बुलाते हैं । बाद में वह वस्तु उसकी नजर करते हैं । बुलाए बाद - और देने से पहले बीच में उसे मीठी - मीठी बातों से खुश किया करते हैं । इस प्रकार तीन काम हो जाते हैं । बस - जो सबसे पहले उसे बुलाना है - वह तो " प्रेष " कहलाता है । एवं उसके आए बाद जो उसे खुश करने का मधुर भाषण है वह - ' पुरोरुक् ' कहलाता है एवं उसे वस्तु देना ' निवेदन ' कहलाता है । उदाह-रणार्थ- आप बाजार में सौदा खरीदने चलिए । बाजार में से आपको यदि कपड़ा खरीदना है तो कपड़े वाले की दुकान पर चलिए और उससे अच्छे से कपड़े की कीमत पूछिए । व्यापारी उसी समय कपड़ा निकाल कर कहता है कि लीजिए - यह ५ ( पाँच ) गज कपड़ा । परन्तु आपकी दृष्टि में उस कपड़े की वह कीमत बहुत अधिक है, अतः आप वहाँ से उठ कर दूसरी दुकान की ओर चलिए । जहाँ आपको दूर जाते देखा कि व्यापारी आवाज देगा - प्रजी - आइए! आइए!! देखिए - जरा कपड़े को तो देखिए । उसके ज्यादा चिल्लाने पर आप लोट आएँगे । आपके लौटते ही व्यापारी प्राप से बड़ी मीठी - मीठी बातें. करेगा और खुश कर वह आपको वह कपड़ा दे ही देगा । बस, बुलाना प्रेष है । खुश करना पुरोरुक् है-कपड़ा देना निवेदन है । प्रकृति - यज्ञ में यज्ञ नाराज हो कर चला गया था । उसे मैत्रावरुण ने बुलाया । मैत्रावरुण ने प्रसन्न किया एवं मैत्रावरुण ने ही निवेदन किया । पूर्व कपाल का नाम मित्र है - पश्चिम-कपाल का नाम वरुण है । खगोल के - पूर्व - पश्चिम दो विभाग कर डालिए । ये ही दोनों मित्रावरुण हैं । इस खगोल में पार-मेष्ठ्य प्रापोमय यज्ञ प्राता रहता है । तेरह ( १३ ) देवता खगोल में व्याप्त रहते हैं । उस यज्ञ का सबसे पहले मैत्रावरुण रूप खगोल से ही सम्बन्ध होता है- बाद में देवताओं के पास आता है । अतएव इसी प्राकृतिक यज्ञानुसार यहाँ पर भी निग्राभ्या आप रूप यज्ञ को सबसे प्रथम मैत्रावरुण चमस से ही सम्बद्ध किया जाता है । बस और और चमसों से आप ग्रहण न कर मैत्रावरुण चमस से ही ग्रहण क्यों करते हैं? इसका यही उत्तर है-" यत्र वै देवेभ्यो यज्ञोऽपाक्रामत् तमेतद्देवाः प्रैषैरेव प्रेषमैच्छन् । पुरोरुग्भिः
प्रारोचयन् । निविद्भिर्न्यवेदयन् । तस्मान्मैत्रावरुणचमसेन गृह्णाति ॥२८ ॥
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण इस प्रकार मैत्रावरुण चमस - एकधना और पान्नेजन घड़ों को उठा कर श्रध्वर्यु आदि सबके सब यज्ञ शाला की ओर प्राते हैं- " तप्रायन्ति " | जिस समय ये लोग पानी लेने के लिए निकले थे, उस समय अध्वर्यु ने आग्नीध्र से कह दिया था कि श्राग्नीघ्र! जब हम पानी ले कर वापस लौट श्राएँ तो तुम चात्वाल पर वसतीवरी और होतृचमस दोनों को साथ ले कर हमें वहाँ तय्यार मिलना । तदनुसार आज श्राग्नीध्र होतृचमस और वसतीवरी के साथ वहाँ उपस्थित रहता है । दोनों को लिए हुए प्रत्युपस्थान करता है-" प्रत्युपतिष्ठते अग्नीचचात्वाले वसतीवरीभिश्च होतृचमसेन च इति " । निग्राभ्यादि पानी ले कर वहाँ पहुँच जाते हैं तो प्रतिप्रस्थाता और वसतीवरी को ( दोनों को ) - निम्नलिखित मन्त्र बोलता जब ये लोग मैत्रावरुण चमस एवं उस चात्वाल के ऊपर मैत्रावरुरण चमस को हुआ मिलता है- दोनों का परस्पर स्पर्श करवाता है । वह मन्त्र यह है— " समापोऽद्भिरम्मत समोषधीभिरोषधीः इति " । ( वा ० सं. ६ । २८ ) आग्नीध्र उस होतृचमस में रक्खे हुए वसतीवरी पानी को - मैत्रावरुण चमस में रक्खे हुए निग्राभ्या पानी से मिलाता है । वसतीवरी और निग्राभ्या दोनों को परस्पर मिलाता है - यही तात्पर्य है । मैत्रावरुण चमस वाले पानी होतृचमस वाले वसतीवरी पानियों से संगत हो गए एवं पानी से होते हुए औषधियों से मिल गए " - पानी ही चूंकि औषधियों का कारण है अतएव वसतीवरी से युक्त होना प्रौषधियों से युक्त होना भी कहा जा सकता है । इस प्रकार दोनों चमसों को मिला देते हैं । ऐसा करते हुए पूर्व के दिन ( यदि दिन में लाया गया ) जो वसतीवरी नाम का यज्ञ रस है, वह एवं आज लाया गया जो निग्राभ्या नाम का यज्ञ रस है- इन दोनों को मिलाते हैं - विभक्त यज्ञ रस को एक जगह करते हैं । इससे यज्ञ - रस में एक प्रकार का बल आ जाता है जो कि बल संघ - शक्ति नाम से प्रसिद्ध है --" यश्चासौ पूर्वेद्युराहृतो यज्ञस्य रसो, संसृजति ॥२ ॥
यश्चाद्याहृत स्तमेवैतदुभयं कितने ही आचार्य मैत्रावरुण चमस और होतृचमस- इन दोनों चमसों को मिलाने से ही यज्ञ - रसों का मिलना नहीं मानते, अपितु वे लोग होतृचमस में रक्खे हुए वसतीवरी पानी को - मैत्रावरुण चमस में ले जाते हैं एवं मैत्रावरुण चमस से ( निग्राभ्या ले कर उसे ) होतृचमस में रक्खे हुए वसतीवरी में जा कर मिलाते हैं । इस प्रकार चमसों को न मिला कर चमसगत पानी को मिलाते हैं । उसका थोड़ा पानी इस में डाल देते हैं एवं इसका थोड़ा सा पानी उसमें डाल देते हैं । इसकी उपपत्ति यह बतलाते हैं कि जो पहले दिन लाया हुआ ' यज्ञ - रस ' है एवं प्राज लाया हुआ यज्ञ रस है उन दोनों को हम मिलाते हैं । उनका कहना है कि यज्ञ - रसों को मिलाना चाहिए न कि पात्रों को । हृतः पानी का ही संगमन करना उचित है । इसी प्राचीन मत का उल्लेख करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-} [ ६१६