Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 631–640
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 631–640
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तृतीय काण्ड ( ० ) शतपथ ब्राह्मरण सुत्या ब्राह्मण " तके - श्रा एव मैत्रावरुणचमसे वसतीवरर्नयन्ति ( मैत्रावरुणचमसे एव आनयन्ति ) । श्रा मैत्रावरुणचमसाद् वसतीवरीषु ( नयन्तीतिशेषः ) । यश्चासौ पूर्वेद्युराहृतो यज्ञस्य रसो, यश्चाद्याहृतः तमेवैतदुभयं संसृजाम- इति वदन्तः ” । परन्तु याज्ञवल्क्य इस तैत्तिरीय मत का खण्डन करते हुए कहते हैं कि ऐसा कभी नहीं करना चाहिए । थोड़ी देर के बाद श्राघवनीय पात्र में इन दोनों पानियों को मिलाया जाएगा - बस उसी समय ये दोनों यज्ञ - रस मिल जाएँगे । पीछे से आग्नीध्र में, आधवनीय में, दोनों को मिलाता है । ऐसा करता हुआ वह दोनों को मिला देता है । तात्पर्य यही है कि आधवनीय में पानी मिलाना यह तो उन्हें भी अभिमत है । एवं वह मेल केवल यज्ञ - रसों को मिलाने के लिए कहा जाता है । ऐसी अवस्था में यदि यहाँ भी पानियों को मिलाया जाएगा तो आधवनीय में मिलाना यातयाम ( व्यर्थ ) हो जाएगा एवं पद्धति का उल्लंघन होगा | अतः यहाँ पर केवल चमसों को ही मिलाना उचित है । इससे दोनों काम हो जाते हैं । यहाँ पर इनका सम्बन्ध भी हो जाता है एवं आधवनीय में दोनों का मिलाना यातयाम भी नहीं होता । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" तदु तथा न कुर्य्यात् यद्वा श्राधवनीये समवनयति तदेवैष ( यज्ञरसः ) उभयो यज्ञस्य रसः सं सृज्यते ( संगतो भवति ) " । इसके अनन्तर ( होतृचमस और मैत्रावरुण चमस के संगत होने के अनन्तर ) आग्नीध्र के हाथ में रक्खा हुआ जो होतृचमस है उसे अध्वर्यु ले लेता है एवं उसमें पहले दिन लाये हुए वसतीवरी का ग्रहण करता है अर्थात् वसतीवरी घट में रक्खे हुए पानी को होतृचमस में ले लेता है -" होतृचमसे बसतीवरीगृह्णाति - ( अध्वर्युः ) " । होतृचमस में क्यों लेता है? इसका उत्तर देते हैं कि निग्राभ्या में डालने के लिए वसतीवरी ग्रहण करता है - " निग्राभ्याभ्यः ” । यहाँ पर आग्नीध्र चात्वाल के ऊपर - ऊपर इन दोनों चमसों को क्यों मिलाता है? इसका कारण बतलाते हैं-" तद्यदुपर्युपरि चात्वालं संस्पर्श यति " ( तदुच्यते ) । इसी चात्वाल से भुवन स्वर्गवासी देवता द्युलोक गये थे । बस, इसके ऊपर इन यज्ञ - रस रूप पानियों को ऊपर - ऊपर मिलाता हुआ आग्नीघ्र यजमान के लिए स्वर्ग की सीढियाँ लगाता है - यजमान के स्वर्ग 1 जाने के मार्ग को प्रशस्त करता है-" तो वै देवा दिवमुपदक्रामन् । तद्यजमानमेवैतत् स्वयं पन्थानमनु संख्यापयति ( सम्यक् प्रख्यापयति ) " । [ ६१७ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण " तस्मात् उपर्युपरि चात्वालं संस्पर्शयति- इति शेषः " ॥३० ॥
इतना काम करके ये सब लोग उत्तरावेदि के पास आ जाते हैं । ' तप्रायन्ति ' - इनके यहाँ आते ही होता उस अध्वर्यु से पूछता है-" ध्वर्यो अवेरपा इति " । इस मन्त्र का स्पष्टार्थ करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं - हे प्रध्वर्यो! तुमने पानी पी लिया अर्थात् तुमने यज्ञ - रस रूप निग्राभ्या पानी प्राप्त कर लिया-" श्रविदो s पा इत्येवैतदाह " । होता के यह पूछने पर श्रध्वर्यु उत्तर देता है- " नंनसु " ( हाँ पानी नम गये - हमारी ओर झुक गये अर्थात् मैंने पानी प्राप्त ही नहीं कर लिया अपितु वे तो अपने आप मेरी ओर झुक गये अर्थात् यज्ञ - रस अपने आप मिल गया - अपने ऊपर इससे अधिक देवताओं का अनुग्रह और क्या हो सकता है? " थो मेऽनंसत इत्येवैतदाह " ॥३१ ॥
यह ज्योतिष्टोम यज्ञ - ( १ ) अग्निष्टोम ( २ ) प्रत्यग्निष्टोम ( ३ ) उक्थ्य सोम ( ४ ) षोडशी स्तोम ( ५ ) प्रतिरात्र स्तोम ( ६ ) वाजपेयस्तोम ( ७ ) प्रपोर्य्याम स्तोम भेदेन " सप्तसंस्थ " होता है । अतएव " सप्तसंस्थो वै ज्योतिष्टोमः " यह कहा जाता है । इनमें श्रग्निष्टोम - प्रत्यग्निष्टोम - एक चीज है । इस प्रकार छः ही संस्था रह जाती हैं । इन छहों में कामचार है । परन्तु उत्तरोत्तर कर्म्मवाले को पहले के सब स्तोम करने पड़ते हैं । उक्थ्य वाले को प्रग्निष्टोम - प्रत्यग्निष्टोम भी करना पड़ेगा । षोडशी वाले को पूर्व के तीनों करने पड़ेंगे । सातों में यही संस्थाक्रम समझना चाहिए । यदि यह यज्ञ श्रग्निष्टोम संस्थ हो तो जिस प्रचरणी में चार बार घृत ले कर पानी में आहुति दी गई थी उस प्रचरणी में यदि उस घृत का थोड़ा सा ही बाकी बचा हो और यदि वह आहुति के लिए पर्याप्त हो तो निम्नलिखित मन्त्र बोलते हुए हवनीय में उसकी आहुति दे दें -" स यद्यग्निष्टोमः स्यात् यदि प्रचरण्यां संस्रवः परिशिष्टोऽलं होमाय स्यात् - तं जुहुयात् । यद्यु नालं होमाय स्यात् - अपरं चतुर्गृहीतमाज्यं गृहीत्वा जुहोति " । आहुति देने का मन्त्र यह है-" यमग्ने पृत्सु मर्त्यमवा वाजेषु यं जुनाः स यन्ता शाश्वतीरिषः स्वाहा " इति । ( वा ० सं ० ६।२६ ) अग्ने! युद्धों में जिस मनुष्य को प्राप बचाते हैं एवं अन्त में जिस मनुष्य को आप प्राप्त हुए हैं - वह मनुष्य अन्न को प्राप्त होता है । तात्पर्य्य यही है कि युद्ध में विजय भी अग्नि से ही होती है, अन्न-प्राप्ति भी अग्नि से ही होती है । जब तक शरीर में अग्नि रहता है तभी तक बल रहता है । जब तक [ ६१८ ]
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तृतीय काण्ड ( ० 8 ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मरण बल रहता है, तभी तक आत्म रक्षा होती रहती है । इस प्रकार श्रात्म - रक्षा का साधन वस्तुतः अग्नि ही है । अन्न- सम्पत्ति भी इसी अग्नि की कृपा से ही मिलती है । जब तक बल रहता है तभी तक अनोपार्जन की शक्ति रहती है एवं अग्नि के परिपाक से ही भुक्त अन्न चरितार्थ होता है । जिस पर आपकी कृपा रहती है, वही सब कुछ प्राप्त कर सकता है । मन्त्र का यही तात्पर्य्यार्थ है । इस प्रकार यह अध्वर्यु श्राग्नेयी ऋचा से आहुति देता है । कारण इसका यही है कि अग्निष्टोम अग्निस्वरूप ही है । श्रतः श्रग्निष्टोम के लिए अग्नि में आहुति देता हुआ अग्निष्टोम को अपने स्व - स्थान में ही प्रतिष्ठित करता | अग्निष्टोम के लिए अग्नि में आहुति देना उसे अपने स्थान में प्रतिष्ठित करना है । अपिच - यह ऋचा मर्त्यवती है । अग्निष्टोम पुरुष से सम्मित है । यह अग्निष्टोम यज्ञपुरुष-सम्मित कैसे है? इसका विवेचन पूर्व के " यज्ञ पुरुष " ब्राह्मण में देखना चाहिए । चूँकि यज्ञ, पुरुष - सम्मित है । उसी के लिए आहुति दी जाती है । श्रतएव मर्त्यवती ऋचा से प्राहुति देते हैं । इस प्रकार यदि अग्निष्टोम हो तो प्रचरणी से - पूर्वोक्त प्रकारेण - पूर्वोक्त मन्त्र बोलते हुए अग्नि में चतुर्गृहीत प्राज्य की आहुति देनी चाहिए -" आग्नेया जुहोति । अग्निर्वाऽग्निष्टोमः । तदग्नावग्निष्टोमं प्रति-ष्ठापयति । मर्तवत्या ( जुहोतीति शेषः ) । पुरुषसंमितो वाऽश्रग्निष्टोमः । एवं जुहुयाद् यद्यग्निष्टोमः स्यात् ॥ ३२ ॥
यदि उक्थ्यस्तोम हो तो - अग्नि के तीनों ओर ( पूर्व, दक्षिण, उत्तर ) लगी हुई जो कामर्थ्यमयी ( श्रीपर्णीमयी ) तीन परिधियाँ हैं - उनमें से मध्य की पूर्व की ओर की परिधि का स्पर्श मात्र कर ले । तीनों में से बीच की केन्द्रीय परिधि है । केन्द्र के पकड़ने से तीनों पकड़ में प्रा जाती हैं । स्पर्श करना चाहिए एक बार और होना चाहिए तीनों का स्पर्श । यह हो नहीं सकता । अतः केन्द्रभूत मध्यमपरिधि का स्पर्श कर लेते हैं । इससे तीनों का स्पर्श गतार्थ हो जाता है-" यद्युक्थ्यः स्यात् - मध्यमं परिधिमुपस्पृशेत् " । अग्निष्टोम से ऊपर अत्यग्निष्टोम और अग्निष्टोम दो संस्था और होती हैं एवं उक्थ्यस्तोम वाले को पूर्व के भी दोनों करने पड़ते हैं । इस प्रकार उक्थ्यस्तोम - अग्निष्टोम अत्यग्निष्टोम ये तीन उक्थ हो जाते हैं । चूँकि परिधियाँ तीन हैं अतः इनके स्पर्श से त्रिसंस्थ यज्ञ प्रतिष्ठित हो जाता है । त्रिसंस्था को तीन पर प्रतिष्ठित करना उचित ही है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— “ परिधयः त्रीण्युक्थानि । एतै रु हि तहि यज्ञः प्रतितिष्ठति " । यदि अतिरात्र अथवा षोडशी हो तो न हवन करें न मध्यम परिधि का स्पर्श करें अपितु केवल " यमग्ने पृत्सु " यह मन्त्र बोल कर चुपचाप देव -यजन में आ जाए-“ अतिरात्रो वा षोडशी वा स्यान्नैव जुहुयान्न मध्यमं परिधिमुपस्पृ-शेत् । समुद्यैव ( यमग्ने पृत्सु - इति मन्त्रमुक्त्वैव ) तूष्णीमेत्य प्रपद्येत " । [ ६१६ ]
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तृतीय काण्ड ( ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण श्रयुङ्गा ( श्रयुग्मा ) एकधना भवन्ति -- ( षोडशिनीस्तोमे ) -३- सप्त वा नव वा-- ( वाजपेयस्तोमे ) -४ - नव वा एकादश वा-[ ६२० ] सुत्या ब्राह्मण १- श्रग्निष्टोमः २- प्रत्यग्निष्टोमः ३ - उक्थ्यस्तोमः ४- षोडशीस्तोमः ५- वाजपेयस्तोमः ६ - अतिरात्रस्तोमः ७- आप्तोय्र्याम स्तोमः इस प्रकार अग्निष्टोम - अत्यग्निष्टोम में मन्त्रपूर्वक अग्नि में आहुति देनी चाहिए - उपथ्य में-केवल परिधि का स्पर्श करना चाहिए । षोडशी अतिरात्र में केवल मन्त्र ही बोलना चाहिए । ऐसा भेद करता हुआ प्रध्वर्यु - अग्निष्टोम यज्ञों को परस्पर विभक्त करता है । " यज्ञ - संस्था की भेद - प्रतीति के लिए यह भेद किया जाता है " - यही तात्पर्य है-" तद्यथायथं यज्ञक्रतून् ( अनिष्टोमादिकान् ) व्यावर्तयति " ॥ ३३ ॥
जिन एकघना घटों का पूर्व में उल्लेख आया है - वे प्रयुग्म होते हैं । अर्थात् इस यज्ञ में कम से कम तीन घड़े आते हैं - ज्यादा से ज्यादा १५ ( पन्द्रह ) घड़े प्राते हैं । सप्तसंस्थ ज्योतिष्टोम में १५ ( पन्द्रह ) तक ही एकधना प्रनयन होता है । ये पन्द्रहों घड़े प्रयुग्म ( बेजोड़ ) होते हैं । तीन या पांच । पाँच या सात । सात या नौ नौ या ग्यारह । ग्यारह या तेरह । तेरह या पन्द्रह | अग्निष्टोम अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, प्रतिरात्रादि में भिन्न - भिन्न व्यवस्था समझनी चाहिए । अग्निष्टोम और प्रत्यग्निष्टोम दोनों में एक ही व्यवस्था समझनी चाहिए । प्रग्निष्टोम अत्यग्निष्टोम में या तो तीन घड़े हों या पाँच हों । यही नियम प्रत्यग्निष्टोम में है । एवं उक्थ्य में - पाँच हों या सात हों । षोडशी में सात या नौ हों । वाजपेय में नौ या ग्यारह हों । अतिरात्र में ग्यारह हों या तेरह हों । आप्तोय्र्याम में तेरह हों या पन्द्रह हों । बस, सातों में यह व्यवस्था समझनी चाहिए । इसी क्रम को बत-लाते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं ---१ - त्रयो वा पञ्च वा - ( प्रग्निष्टोमे - अत्यग्निष्टोमे ) -२ - पञ्च वा सप्त वा - ( उक्थ्यस्तोमे ) -५ - एकादश वा त्रयोदश वा ( प्रतिरात्रस्तोमे ) -६- त्रयोदश वा पञ्चदश वा - ( प्राप्तोर्य्याम स्तोमे ) -सप्तसंस्थ ज्योतिष्टोम में पूर्व के छहों विभागों में द्वन्द्व - सम्पत्ति मौजूद है । सब में जोड़ा मौजूद है । चूंकि इस पानी का सोम से सम्बन्ध करा कर दिव्यात्म प्रजनन करना है । प्रजनन, द्वन्द्व पर ( जोड़े पर ) निर्भर है | अतएव - सब में जोड़ा रक्खा गया है-
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मणं सुत्या ब्राह्मण " द्वन्द्वमह मिथुनं प्रजननम् " । परन्तु सब युग्मों में एक - एक अलग बच जाता है, इसीलिए प्रयुङ्गा - प्रयुङ्गा - कहा है । तीन वाले में भी एक बच जाता है । पाँच वाले में भी एक बच जाता है । इस प्रकार छहों युग्मों में एक अलग बच जाता है । यह जो एक बचता है वह यजमान की श्री की ओर बचता है । और युग्म तो प्रजनन के काम में आ जाते हैं एवं जो एक बच जाता है - वह यजमान की संपत्ति है । बढ़े हुए द्रव्य के लिए ' धन ' -शब्द का प्रयोग आता है एवं कमी में " ऋण " का प्रयोग होता है । इस ऋण धन का विशद विवेचन पहले काण्ड में ( ऋणमुह वै जायते ) देखना चाहिए । चूँकि यह एक बच जाता है, अतः हम इसे यजमान IT " धन " कहने के लिए तय्यार हैं । इस प्रकार पूर्व के सारे युग्मों में यजमान की श्री स्वरूप एक - एक धन मौजूद है । सारे युग्मों में एक - एक धन मौजूद है । यह धन जो कि यजमान की श्री की ओर बचता है, पूर्व युग्मों का सघन है । यजमान एकधन है । सब में एकसार एक - एक धन मौजूद है । चूंकि यह इनका सधन है, समान रूपेणावस्थित एकधन है, अंतएव हम इन कलशों को " एकधना " कहने के लिए तय्यार हैं । इस अभिप्राय से कहते हैं--" अथ य एष एकोऽतिरिच्यते स यजमानस्य श्रियमभि ( अभिलक्ष्य ) अतिरिच्यते । स वा एषां सधनं - यो यजमानस्य श्रियमभ्यतिरिच्यते । तद्यदेषां धनं ( समानमेकमेव धनम् ) एकधना नाम ( अयुग्मसंख्याका उदकविशेषा तदाधारभूता घटाइच - एकधननामकाः सम्पन्नाः - इति भावः ) " । जरूरत से ज्यादा होना वृद्धि कहलाती है । प्रतएव " बढे सो पाये " यह कहा जाता है | चूँकि यहाँ प्रजनन करना है - प्रजनन में द्वन्द्व अपेक्षित है, अतः युग्म ही होना चाहिए था, परन्तु वृद्धि के लिए-श्रयुग्मता की गई है । ॥ इति सुत्याब्राह्मणं समाप्तम् ॥ ॥ इति नवमाध्याये तृतीयं ब्राह्मणं समाप्तम् ॥ [ ६२१ ]
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नवमाध्याये चतुर्थं ब्राह्मणम् ' अधिषवण - ब्राह्मणम् ' [ सूल ] प्रथाधिषवणे पर्युपविशन्ति । श्रथास्यां हिरण्यं बध्नीते द्वयं वाइदं न तृतीयमस्ति सत्यं चैवानृतं च सत्यमेव देवा अनृतं मनुष्या अग्निरेतसं वै हिरण्यं सत्येनां शूनुपस्पृशानि सत्येन सोमं पराहणानीति तस्माद्वा अस्यां हिरण्यं बध्नीते ॥१ ॥
अथ ग्रावारणमादत्ते । ते वाऽएतेऽश्ममया ग्रावाणो भवन्ति देवो वै सोमो दिवि हि सोमो वृत्रो वै सोम प्रासीत्तस्यैतच्छरीरं यद् गिरयो यदश्मानस्तच्छरी-रेवैनमेतत्समर्धयति कृत्स्नं करोति तस्मादश्ममया भवन्ति घ्नन्ति वाडएनमेत-द्यदभिषुण्वन्ति तमेतेन घ्नन्ति तथात उदेति तथा संजीवति तस्मादश्ममया ग्रावाणो भवन्ति ॥२ ॥
तमादत्ते । देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्या-माददे रावासीति सविता वै देवानां प्रसविता तत्सवितृप्रसूत एवैनमेतदादत्तेऽश्वि-नोर्बाहुभ्यामित्यश्विनावध्वर्यू तत्तयोरेव बाहुभ्यामादत्ते न स्वाभ्यां पूष्णो हस्ता-भ्यामिति पूषा भागदुधस्तत्तस्यैव हस्ताभ्यामादत्ते न स्वाभ्यां वस्त्रो वाऽएष तस्य न मनुष्यो भर्ता तमेताभिर्द्देवताभिरादत्ते ॥३ ॥
श्राददे रावासीति । यदा वाडएनमेतेनाभिषुण्वन्त्यथाहुतिर्भवति यदाहुति जुहोत्यथ दक्षिणा ददात्येतद्ध्येष द्वयं रासतऽग्राहुतीश्च दक्षिरणाश्च तस्मादाह रावासीति || ४ || गभीरमिममध्वरं कृधीति । श्रध्वरो वै यज्ञो महान्तमिमं यज्ञं कृधीत्येवैत-दाहेन्द्राय सुषूतममितीन्द्रो वै यज्ञस्य देवता तस्मादाहेन्द्रायेति सुषूतममिति सुसुत-ममित्यैवैतदाहोत्तमेन पविनेत्येष वाऽउत्तमः पविर्यत्सोमस्तस्मादाहोत्तमेन पविने-त्यूर्जस्वन्तं मधुमन्तं पयस्वन्तमिति रसवन्तमित्येवैतदाह यदाहोज्ज॑स्वन्तं मधुमन्तं पयस्वन्तमिति ॥ ५ ॥
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तृतीय काण्ड ( ० 8 ) शतपथ ब्राह्मण अधिवर ब्राह्मण अथ वाचं यच्छति । देवा ह वै यज्ञं तन्वानास्तेऽसुररक्षसेभ्य श्रासङ्गा-द्विभयां चक्रुस्ते होचुरुपांशु यजाम वाचं यच्छामेति तऽउपांश्वयजन्वाचम-यच्छन् || ६ || अथ निग्राभ्याहरति । तास्वेनं वाचयति निग्राभ्या स्थ देवश्रुतस्तर्प-यत मा मनो मे तर्पयत वाचं मे तर्पयत प्राणं में तर्पयत चक्षुर्भे तर्पयत श्रोत्रं मे तर्पयतात्मानं मे तर्पयत प्रजां में तर्पयत पशून्मे तर्पयत गरणान्मे तर्पयत गरगा मे मा वितृषन्निति रसो वाऽश्रापस्तास्वेवैतामाशिषमाशास्ते सर्वं च मग्रात्मानं तर्पयत प्रजांमे तर्पयत पशून्मे तर्पयत गरणान्मे तर्पयत गरगा मे मा वितृषन्निति स य एष उपांशुसवनः स विवस्वानादित्यो निदानेन सोऽस्यैष व्यानः ॥७ ॥
तमभिमिमीते । घ्नन्ति वाडएनमेतद्यदभिषुण्वन्ति तमेतेन घ्नम्ति तथात उदेति तथा संजीवति यद्वेव मिमीते तस्मान्मात्रा मनुष्येषु मात्रो यो चाप्यन्या मात्रा || ८ || समिमीते । इन्द्राय त्वा वसुमते रुद्रवतइतीन्द्रो वै यज्ञस्य देवता तस्मा-दाहेन्द्राय त्वेति वसुमते रुद्रवतइति तदिन्द्रमेवानु वसूंश्च रुद्रांश्चाभजतीन्द्राय त्वादित्यवतइति तदिन्द्रमेवान्वादित्यानाभजतीन्द्राय त्वाभिमातिघ्नऽइति सपत्नो वाभिमातिरिन्द्राय त्वा सपत्नघ्न ऽइत्येवैतदाह सोऽस्योद्धारो यथा श्रेष्ठस्योद्धार एवमस्यैषऋते देवेभ्यः ॥६ ॥
श्येनाय त्वा सोमभृतइति । तद्गायत्र्यै मिमीतेऽग्नये त्वा रायस्पोषद-इत्यग्निर्वै गायत्री तद्गायत्र्यै मिमीते स यद्गायत्री श्येनो भूत्वा दिवः सोममा-हरतेन सा श्येनः सोमभूत्तेनैवास्या एतद्वीर्येण द्वितीयं मिमीते ॥१० ॥
अथ यत्पञ्चकृत्वो मिमीते । संवत्सरसम्मितो वै यज्ञः पञ्च वाडऋतवः संवत्सरस्य तं पञ्चभिराप्नोति तस्मात्पञ्चकृत्वो मिमीते ॥११ ॥
तमभिमृशति । यत्ते सोम दिवि ज्योतिर्यत्पृथिव्यां यदुरावन्तरिक्षे । तेनास्मै यजमानायोरु राये कृध्यधि दात्रे वोच इति यत्र वाऽएषोऽग्रे देवानां [ ६२४ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण अधिषवण ब्राह्मण हविर्बभूव तद्धेक्षां चक्रेमैव सर्वेगेवात्मना देवानां हविर्भूवमिति स एतास्तिस्र-स्तनूरेषु लोकेषु विन्यधत्त || १२ || तद्वै देवा अस्पृण्वत । तेऽस्यैतेनैवैतास्तनूराप्नुवन्त्स कृत्स्न एवं देवानां हविरभवत्तथो एवास्यैष एतेनैवैतास्तनूराप्नोति स कृत्स्न एव देवानां हविर्भवति तस्मादेवमभिमृशति ॥१३ ॥
अथ निग्राभ्याभिरुपसृजति । आपो ह वै वृत्रं जघ्नुस्तेनैवैतद्वीर्येणापः स्यन्दन्ते तस्मादेनाः स्यन्दमाना न किञ्चन प्रतिधारयते ता ह स्वमेव वशं चेरुः मैनु वयं तिष्ठेहि याभिरस्माभिर्वृत्रो हत इति सर्वं वाऽइदमिन्द्राय तस्थान-मास यदिदं कि चापि योऽयं पवते ॥ १४ ॥
इन्द्रोऽब्रवीत । सर्वं वै मइदं तस्थानं यदिदं कि च तिष्ठध्वमेव मइति ता होचुः किं नस्ततः स्यादिति प्रथमभक्ष एव वः सोमस्य राज्ञ इति तथेति ता प्रस्माऽप्रतिष्ठन्त तास्तस्थाना उरसि न्यगृह्णीत तद्यदेना उरसि न्य-गृह्णीत तस्मान्निग्राभ्या नाम तथैवैता एतद्यजमान उरसि निगृह्णीते स प्रासामेष प्रथमभक्षः सोमस्य राज्ञो यन्निग्राभ्याभिरुपसृजति ॥ १५ ॥
स उपसृजति । श्वात्रा स्थ वृत्रतुर इति शिवा ह्यापस्तस्मादाह श्वात्रा स्थेति वृत्रतुर इति वृत्रं होता प्रघ्नन्नाधो गुर्ता अमृतस्य पत्नीरित्यमृता ह्यापस्ता देवीद्देवमं यज्ञं नयतेति नात्र तिरोहितमिवास्त्युपहूताः सोमस्य पिबतेति तदुप-हूता एव प्रथमभक्षं सोमस्य राज्ञो भक्षयन्ति ॥ १६ ॥
अथ प्रहरिष्यन् । यं द्विष्यात्तं मनसा ध्यायेदमुष्माऽग्रहं प्रहरामि न तुभ्य-- मिति यो न्वेवेमं मानुषं ब्राह्मणं हन्ति तं न्वेव परिचक्षतेऽथ किं य एतं देवो हि सोमो घ्नन्ति वाऽएनमेतद्यदभिषुण्वन्ति तमेतेन घ्नन्ति तथा त उदेति तथा संजी-वति तथाऽनेनस्यं भवति यद्यु न द्विष्यादपि तृणमेव मनसा ध्यायेत्तथोऽनेनस्यं भवति ॥ १७ ॥
स प्रहरति । मा भेर्मा संविक्था इति मा त्वं भैषीर्मा संविवथाऽअमुष्मा ग्रहं प्रहरामि न तुभ्यमित्येवैतदाहोर्जं धत्स्वेति रसं धत्स्वेत्येवैतदाह धिषणे [ ६२५ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण अधिषवण ब्राह्मण वीड्वी सती वीडयेथामूर्जं दधाथामितीमेऽएवैतत्फलकेऽश्राहुरित्यु है कऽप्राहुः किं नु तत्र योऽप्येते फलके भिन्द्यादिमे ह वै द्यावापृथिवीऽएतस्माद्वज्रादुद्यतात्सं रेजेते - तदाभ्यामेवैनमेतद्यावापृथिवीभ्यां शमयति तथेमे शान्तो न हिनस्त्यूर्जं दधाथा-मिति रसं दधाथामित्येवैतदाह पाप्मा हतो न सोम इति तदस्य सर्व पाप्मानं हन्ति ॥ १८ ॥
सवै त्रिरभिखोति । त्रिः सम्भरति चतुन्निग्राभमुपैति तद्दश दशाक्षरा विराड्वैराजः सोमस्तस्माद्दशकृत्वः सम्पादयति ॥ १ ९ ॥ or ग्राभपति । यत्र वाऽएषोऽग्रे देवानां हविर्बभूव तद्धेमा दिशो-ऽभिदध्यावाद्दिमिथुनेन प्रियेण धाम्ना संस्पृशेयेति तमेतद्देवा ग्राभिद्दिग्भि-मिथुनेन प्रियेण धाम्ना समस्पर्शयन्यन्निग्राभमुपायंस्त थोऽएवैनमेष एतदाद्दि-मथुन प्रियेण धाम्ना संस्पर्शयति यन्निग्राभमुपैति ॥ २० ॥
स उपैति । प्रागपागुदगधराक्सर्वतस्त्वा दिश आधावन्त्विति तदेनमाभि-faranga प्रियेण धाम्ना संस्पर्शयत्यम्ब निष्पर समरोविदामिति योषा arsar योषा दिशस्तस्मादाहाम्ब निष्परेति समरोविदामिति प्रजा वारीः सं प्रजा जानतामित्येवैतदाह तस्माद्यापि विदूरमिव प्रजा भवन्ति समेव ता जानते तस्मादाह समरीविदामिति ॥ २१ ॥
श्रथ यस्मात्सोमो नाम । यत्र वाऽएषोऽग्रे देवानां हविर्बभूव तद्धेक्षां चक्रे मैव सर्ववात्मना देवानां हविर्भूवमिति तस्य या जुष्टतमातनूरास तामपनिदधे तद्वै देवा अस्पृण्वत ते होचुरूपवैतां प्रबृहस्व सहैव न एतया हविरेधीति तां दूर-statu प्राबृहत स्वा वै मएषेति तस्मात्सोमो नाम || २२ || अथ यस्माद्यज्ञो नाम । घ्नन्ति वा एनमेतद्यदभिषुण्वन्ति तद्यदेनं तन्वते तदेनं जनयन्ति स तायमानो जायते स यञ्जायते तस्माद्यञ्जो यञ्जो ह वै नाम-तद्यद्यज्ञ इति ॥ २३ ॥
तत्रैतामपि वाचमुवाद । त्वमङ्ग प्रशंसिषो देवः शविष्ठ मर्त्यम् । न त्वदन्यो मघवन्नस्ति मडितेन्द्र ब्रवीमि ते वच इति मर्त्यो हैवैतद्भवन्नुवाच त्वमे-• वेतो जनयितासि नान्यस्त्वदिति || २४ || [ ६२६ ] '