Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 641–650

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 641–650

पृष्ठ 641

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण अधिपवणं ब्राह्मण अथ निग्राभ्याभ्यो ग्रहान्विगृह्णते । आपो ह वै वृत्रं जघ्नुस्तेनैवैतद्वीर्ये -पापः स्यन्दन्ते स्यन्दमानानां वै वसतीवरीगृह्णाति वसतीवरीभ्यो निग्राभ्या निग्राभ्याभ्यो ग्रहान्विगृह्णते तेनैवैतद्वीर्येण ग्रहान्विगृह्णते होतृचमसाद्योषा वाड-ऋग्घोता योषायै वाऽइमाः प्रजाः प्रजायन्ते तदेनमतस्यै + योषायाऋचो होतुः प्रजनयति तस्माद्धोतृचमसात् ॥ २५ ॥

[ अनुवाद ] एकधना निग्राभ्या पानी लाने के बाद यजमान सहित सारे ऋत्विक् farm ( दारुमय फलकों ) पर बैठते हैं । काष्ठ का बना हुआ छोटे पायों का पट्टा कहलाता है । ये पाटे दो होते हैं - उत्तर की ओर तथा दूसरा उसके पास ही दक्षिण की ओर । उत्तर की ओर के पाटे पर अध्वर्यु और यजमान बैठते हैं तथा दूसरे पर होता, उद्गाता व ब्रह्मा तीनों ऋत्विक बैठते हैं । इसके बाद एक सुवर्ण की अंगूठी या सोने का टुकड़ा यजमान अपनी अनामिका अंगुली में बांधता है । इसका कारण बतलाते हुए भग-वान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि संसार में सत्य तथा अनृत दो ही पदार्थ हैं तीसरा कोई पदार्थ नहीं है । जो सदा एकरूप रहता है उसे सत्य तथा प्रतिक्षण परिवर्तनशील को अनृत कहते हैं । प्राणरूप देवता सदा एकरस होने से सत्य हैं । वे प्राण - देवता कभी अपनी नियति से च्युत नहीं होते । मनुष्यों का कोई भी कार्य सदा एकरूप नहीं होता । अतः उन्हें अनृत कहा है । यजमान मनुष्य होने से अनृत है और सोमवल्ली, जिसका कि अभिषव ( कूटना ) यजमान करेगा, वह देवता है क्योंकि तृतीय द्युलोकस्थ सोम ही सोमवल्ली के रूप में परि-त हुआ है । मनुष्य द्वारा देवता पर प्राघात के अनौचित्य के परिहार के लिए यजमान की मिलि के हिरण्य बांधा जाता है । जैसे सोम देवता हैं वैसे ही हिरण्य ( सुवर्ण ) भी देवता है । हिरण्य अग्नि का रेत है । इसीलिए ' अग्निरेतसं वा हिरण्यम् कहा है । सूर्य अग्निरूप है । सौर रश्मियाँ ही मृत् परमाणुओं में बद्ध हो कर सुवर्ण बनती हैं । तैत्तिरीय संहिता में हिरण्य को आप् ( जल ) का रेत बतलाया है- " आपो वरुणस्य पत्नय श्रासन् ता अग्निरभ्यध्यायत् । ताः समभवत् । शहारे तस्य ) परापततु । तद्धिरण्यमभवत् " इति । ( त सं ० ५/५/४११, शत० ब्रा ० सायरा अतः यजमान की अनामिका अंगुलि में बाँध लेने पर सोमदेवता का अभिषव सुवर्ण रूप अग्नि देवता के द्वारा हो जाता है । सत्य के द्वारा सत्य का अभिषव होने में कोई अनौचित्य नहीं है । अतः यजमान की अनामिका अंगुलि से हिरण्य बाँधा जाता है ॥ १ ॥

सोमवल्ली की पूलियों को कूटने के लिए हविधनिमण्डप में रखे हुए दक्षिण हविर्धान शकट के दक्षिण भाग में खोदे हुए चार गर्त, जिन्हें उपरव कहते हैं, उन पर रखी हुई शिला पर चार ग्रावा ( पाषाण ) रखे रहते हैं । उन ग्रावानों से शिला पर सोम कूटा जाता है । अतः सोम को कूटने के लिए यजमान उन ग्रावाओं ( पाषाणों ) को लेता है । ये [ ६२७ ]

पृष्ठ 642

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण अधिषवरण ब्राह्मण प्रस्तरमय होते हैं । परमेष्ठी सोम ही सूर्य से नीचे अन्तरिक्ष में व्याप्त है । परमेष्ठीरूप तृतीय लोक की वस्तु होने से सोम को देवता कहा जाता है । जैसे अग्नि विकासधर्मा है, उसी प्रकार सोम सङ्कोचधर्मा है और उसकी भी अग्नि की भाँति ही घन, तरल, विरल भेद तीन अवस्थाएँ हैं । घनसोम को वृत्र कहा जाता है । वृत्र सोम पदार्थ के परमाणुओं का चारों ओर से संवरण कर उस पर प्राक्रान्ता हो कर उसे घन ( ठोस ) बना डालता है । पदार्थ को करने के कारण ही इसे वृत्र कहते हैं । अतः वृत्रसोममय पत्थर से सोम को कूटना वल्ली - सोम को समृद्ध करना है; सोम की अकृत्स्नता को दूर कर उसमें कृत्स्नता प्रदान करना है । पाषाणमयी ग्रावा के द्वारा सोम का अभिषव उस सोमवल्ली का एक प्रकार से वध है । अभिषव के द्वारा मृत सोम को वृत्रसोममय पाषारण से कूट कर उसे जीवित करना है । अतः अश्ममयी ग्रावा होती हैं ॥ २ ॥

वह अध्वर्यु ' देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामाददेरावा सि ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ ग्रावा को हाथ में लेता है । इस मन्त्र की व्याख्या करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि सविता देवता ही देवताओं को प्रेरित करने वाला व अनुज्ञा प्रदान करने वाला है । अतः सविता से ग्रनुज्ञा प्राप्त करके ही वह अध्वर्यु ग्रावा को ग्रहण करता है । नासत्य तथा दस्र नामक दोनों अश्विनीप्राण अध्वर्यु हैं । अतः इन्हीं अश्विनी प्रारण अध्वर्युत्रों की बाहुनों से अध्वर्यु ग्रावा को उठाता है न कि अपनी बाहुनों से 1 । देवताओं समरूप से प्राहुति दी जाती है । उस प्राहुति का प्रत्येक देवता के लिए विभाग करने वाला १२ आदित्यों में से पूषा आदित्य है । अतः उस पूषा देवता के हाथों से अध्वर्यु ग्रावा ग्रहण करता है न कि अपने हाथों से । यह ग्रावा वज्ररूप दिव्य अस्त्र है । उसे देवता ही धारण कर सकता है । अतः श्रध्वर्यु इन देवताओं के द्वारा ही ग्रावा को उठाता है || ३ || उपर्युक्त मन्त्र के अंश रूप ' प्रददेशवासि ' की व्याख्या करते हुए याज्ञवल्क्य ग्रावा के दाता होने की उपपत्ति बतला रहे हैं । प्रभिषव द्वारा आहुति देने पर ही ऋत्विजों को यज-मान द्वारा दक्षिणा प्राप्त होती है । क्यों कि ऋत्विजों को दक्षिणा की प्राप्ति होती है, अतः इस ग्रावा को मन्त्र में दाता बतलाया है ॥४ ॥

सूर्य चित्यपिण्ड है तथा उसका चितेनिधेय प्रमृत प्रारण इन्द्र कहलाता है । वही प्राकृत यज्ञ तथा वैधयज्ञ का देवता है । अतः इन्द्र से सब देवताओं का ग्रहण हो जाता है । इसीलिए ‘ इन्द्रः सर्वा देवताः ' यह कहा जाता है । हे ग्रावा! सर्वदेवतारूप इस इन्द्र के लिए अच्छे से अच्छा अभिषव करो । ' उत्तमेन पविना ' में पवि शब्द सोम का वाचक है । इस सोम को पी-कर बलवान् बन कर इन्द्र वृत्रादि का वध करते हैं । अतः सोम - वध का कारण यह सोम उत्तम पवि है । ऊर्ज स्वन्तं मधुमन्तं पयस्वन्तं तीनों पद रस के ही द्योतक हैं अतः तीनों रसों के ग्रहण के लिए तीन पद दिये गये हैं । तात्पर्य यह है कि हे ग्रावा! सोमरूप उत्तम पवि से युक्त इस यज्ञ को रस से युक्त बनाइए ॥ ५ ॥

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तृतीय काण्ड ( ० ) शैतपथ ब्राह्मणे श्रधिषवण ब्राह्म ' ' देवस्य त्वा ' इत्यादि मन्त्र का उच्चारण करते हुए सोमाभिषव के लिए ग्रावा की उठा कर श्रध्वर्यु, मौनव्रत धारण करता है, क्यों कि यज्ञ का वितान करते हुए देवताओं ने असुरों व राक्षसों के आक्रमण से भयभीत हो कर निश्चय किया कि यज्ञ हमें चुपचाप करना चाहिए || ६ | । इस के बाद निग्राभ्या पानी को हविर्धान के पास लाते हैं । फिर अध्वर्यु निम्न-लिखित मन्त्र यजमान से बुलवाता है-" निग्राभ्या स्थ देवश्रुतस्तर्पयत मा मनो मे तर्पयत " इत्यादि । अर्थात् हे प्रापः! आप देवताओं में श्रेष्ठ इन्द्र के वक्षस्थल में रहने के कारण निग्राभ्या नाम से व्यवहृत होते हैं । ऐसे आप मुझ को, मेरी मन, प्रारण, वाक्, चक्षु, श्रोत्र, इन इन्द्रियों को, मेरे प्रज्ञानात्मा को, मेरी प्रजा को, मेरे पशुओं को, मेरे भृत्यादि गरणों को तृप्त करें, मेरे भृत्यादिगरणों की तृष्णा न बढ़े । प्रज्ञानात्मा की पाँच रश्मियाँ ही भिन्न - भिन्न छिद्रों से निकल कर मन, वाक् प्रारण, श्रोत्र इन नामों से व्यवहृत होती हैं । निग्राभ्या पानी रस रूप है । अतः उन्हीं से सभी चक्षु की तृप्ति की कामना की है । चालीस उपांशुग्रहों के लिए ही सोम का अभिषव किया जाता है । यही उपांशुग्रहयाग है । सोम को उपांशु कहते हैं । सोम कूटने वाली लोढी ( ग्रावा ) को अन्तर्याम कहते हैं तथा जिस शिला पर सोम पीसा जाता है उसे उपांशुसवन कहते हैं । प्रकृति में सूर्य व्यान है । सूर्य से नीचे की ओर आने वाला सौर प्राण, प्रारण कहलाता है । वही प्राण पृथिवी में आ कर पृथिवी की वस्तु बन कर ऊपर की ओर जाता है । उस पार्थिव प्राण को पान कहते हैं । प्राण- प्रपान के सन्धि - स्थान को व्यान कहते हैं - ' अथ यः प्राणापानयोः सन्धिः स व्यानः ' । शरीर में प्रारण प्रपान इन दोनों का मेल हृदय में होने से ब्यान का स्थान हृदय ही है । सूर्य से प्रारण का उपक्रम तथा उसी में प्रारण का उपसंहार ( लय ) होने से सूर्य ही उपांशुसवन है । शिला पर ही सोमाभिषव का उपक्रम होता है और उसी पर सोमाभि-व का उपसंहार होता है, अतः वह शिला ही उपांशुसवन है । जैसे संवत्सर - रूप प्रकृति - यज्ञ का विवस्वान् आदित्य व्यान है उसी प्रकार इस वैधयज्ञ का यह शिला - रूप उपांशुसवन ही व्यान है || ७ || अध्वर्यु सोम की पूलियों को शिला के ऊपर शिला से नापता है । ऋत्विक् जब सोम को कूटता है तो निर्जीव बना देता है । व्यानरूप शिला पर नापता हुआ सोम में व्यान का सम्बन्ध कर उसे जीवित करता है । मनुष्य या अन्य वस्तु व्यान से जीवित होती. है न कि सौर प्रारण या पार्थिव प्रपान से । सौरप्राण तथा पार्थिव अपान दोनों का सन्धिस्थान हृदयस्थ व्यान ही है । उसी व्यान के ये दोनों प्रारण प्राश्रित हैं । जीवनाधार इस व्यान के सम्बन्ध के लिए ही सोम की पूलियों को व्यानरूप उपांशुसवन शिला पर नापा जाता है । प्रत्येक प्राण प्रादेशमित अर्थात् साढ़े दस अंगुल का होता है । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि अध्वर्यु उपांशुसवन पर जो सोम को नापता है, उसका तात्पर्य यह है कि यही प्रादेश -[ ६२६ ]

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तृतीय काण्ड ( प्र ० 8 ) शतपथ ब्राह्मण अधिषवण ब्राह्मण मित मनुष्यों में हैं । मनुष्य शरीर में प्राठ प्रारणों के प्रादेशमित होने का यही कारण है सोम कि मनुष्य का निर्माण स्त्री - योनि में आहुत वीर्यरूप सोम से होता है और प्रकृति प्रादेशमित में प्रादेशमित है । अतः उस वीर्यरूप से निर्मित होने वाले मनुष्य में भी आठों प्राण हैं । प्रारण की प्रादेशमितता ' सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमि सर्वतः स्पृत्वा- कि त्यतिष्ठद्दशांगुलम् ' इस श्रुति से भी सिद्ध हो रही है । इसी अभिप्राय से कहा गया है केवल मनुष्यों में ही नहीं किन्तु लोक में अन्य मात्राएँ भी सोममान प्रयुक्त ही हैं || 5 || वह अध्वर्यु निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करता हुआ सोम को नापता है त्वा -" इन्द्राय त्वा वसुमते रुद्रवते, इन्द्राय त्वाऽऽदित्यवते । इन्द्राय त्वामिमातिने, श्येनाय विभागों में सोमभृते, अग्नेय त्वा रायस्पोषदे " इति । देवता वसु, रुद्र, आदित्यभेद से तीन विभक्त है । इन्हीं को निरुक्तकार ने क्रमशः पृथिवीस्थानीय, अन्तरिक्षस्थानीय व ध्रुस्थानीय तथा देवता कहा है । वसुत्रों के लिए प्रातः सवन होता है, रुद्रों के लिए माध्यन्दिनसवन आदित्यों के लिए तृतीय सवन किया जाता है । तीनों सवनों में सूर्य के रहने यज्ञ का कारण देवता उसके कहते अमृत - प्राण इन्द्र का आधिपत्य तीनों सवनों में सिद्ध है । अतः इन्द्र को हैं । पार्थिव एवं वसु आदि, रुद्र आदि अन्तरिक्ष्य देवता इन्द्र की प्रजा हैं । इसीलिए ' इन्द्राय वसुमते रुद्रवते ' इस मन्त्रांश में इन्द्र को विशेष्य तथा वसुनों व रुद्रों को विशेषण बतला कर इन्द्र की प्रधानता सिद्ध कर दी है । अतः वसुत्रों और रुद्रों को इन्द्र के पश्चात् प्राभागी बनाता है । पार्थिव देवता वसु और प्रान्तरिक्ष्य देवता रुद्रों पर द्युलोकस्थ इन्द्र का शासन का होने से दोनों का एक विभाग मान लिया है । पश्चात् दूसरा विभाग द्युलोकस्थ आदित्य देवताओं का है । द्युलोकस्थ प्रादित्य देवताओं पर देवाधिपति इन्द्र का शासन है । पार्थिव एवं अन्तरिक्ष्य देवताओं की अपेक्षा उनका उच्च स्थान एवं पद होने पर भी इन्द्र की तो वे भी प्रजा हैं । अतः उन्हें भी इन्द्र का पश्चाद्भागी कहा है । तीसरा विभाग वसु, रुद्र, आदित्य-रूप प्रजा रहित इन्द्र का ही विशेषरूप से है । शत्रुत्रों का नाश करना इन्द्र का प्रातिस्विक कार्य है । अतः इन्द्र का अन्य देवताओं के सम्बन्ध से रहित सर्वथा पृथक् विभाग है || ६ || इसके बाद ' श्येनाय त्वा सोमभृते ' - से गायत्री - देवता के लिए माप करता है । गायत्री ने श्येन का रूप धारण करके ही तृतीय द्युलोक से सोम ला कर पार्थिव प्राण देवताओं की रक्षा की थी अन्यथा प्राणदेवताओं का अस्तित्व ही नहीं रहता । इसके बाद धन एवं पुष्टि प्रदात्री शुद्ध पार्थिव अग्नि के लिए सोम का माप करता है । पार्थिव अग्निरूप गायत्री श्येन बन कर पार्थिव देवताओं को द्युलोक से सोम लाई थी । अतः, उसके लिए दो बार सोम का नाप किया जाता है । पृथिवीपिण्ड से चितेनिधेयरूप अमृताग्नि श्येन है तथा पृथिवीपिण्ड में रहने वाला अग्नि, अग्नि है । यही चित्यपिण्ड में रहता है. ॥१० ॥

पाँच बार सोम का मान क्यों याज्ञवल्क्य कहते हैं कि प्राकृतिक यज्ञ किया जाता है । इसका कारण बतलाते हुए भगवान् संवत्सर सम्मित है । इसीलिए ' संवत्सरो यज्ञः ' इत्यादि [ ६३० ] ,

पृष्ठ 645

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तृतीय काण्ड ( ० 8 ) प्र. शतपथ ब्राह्मरण श्रधिषवरण ब्राह्मण श्रुतियाँ सम्वत्सर को यज्ञ बतला रही हैं । प्रकृति में सम्वत्सर में ७२, ७२ दिन की - वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त ये पाँच ऋतुएँ हैं । इस प्रकार संवत्सर पञ्चावयव है - पांक्त है । अतः पाँच बार ही सोम का नाप किया जाता है ॥११ ॥

इसके बाद पाँच बार नापे हुए सोम का, निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए स्पर्श करता है— " यत्ते सोम दिवि ज्योतिर्यत् पृथिव्यां यदुद्यवन्तरिक्षे । तेनास्मै यजमानायोरु रायेकृद्ध्यधि दात्रे वोचः ॥ ” अर्थात् हे सोम राजन्! आप की ज्योति द्युलोक, पृथिवी तथा विशाल अन्तरिक्ष में है | अपने सम्पूर्ण स्वरूप से युक्त हो कर यजमान की सम्पत्ति हेतु इस सोमवल्ली को प्रभूत ( समृद्ध ) करो । तथा हविः दाता यजमान के लिए उत्कृष्ट वारणी कहिए । उसे यशस्वी बनाइए । तात्पर्य ' यह है कि स्वयंभू, परमेष्ठी, सूर्य, पृथिवी, चन्द्रमा इन पाँच मण्डलों में भृगुरूप सोम परमेष्ठी की वस्तु है । यह सोम परमेष्ठी से सूर्यमण्डल में आता है और उसमें आहुत हो कर सौर देवताओं का हवि ( अन्न ) बनता है । पारमेष्ठ्य सोम की निरन्तर प्राहुति से ही सूर्य की सत्ता है । सूर्य भी घोर कृष्ण है- ' आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्य चेति । ' सूर्य में ज्योति ( प्रकाश ) दाह्य सोम की आहुति से ही है । यह सोम पहले सूर्य में आहुत हुआ । पश्चात् वह निरायतन दिक् सोम सूर्य के चारों ओर तथा पृथिवी व अन्तरिक्ष में भी व्याप्त हो गया । इसी अभिप्राय से कहा है- ' यत्र वा एष सोमोऽग्रे देवानां हविर्बभूव । इति । ' निरायतन दिक् - सोम सूर्य में आने के बाद पृथिव्यादि तीनों लोकों में भी व्याप्त हो गया । सूर्य पिण्ड प्राहुत ३३ वें ग्रहण तक व्याप्त होने वाली सौरी वाक् के द्वारा वह पृथिव्यादि तीनों लोकों में प्राहुत होता रहता है । पारमेष्ठ्य सोम का एक भाग सूर्य में तथा ३ भाग पृथिव्यादि लोकों में व्याप्त हो जाते हैं । यही सोम का अपने को तीनों लोकों में रखना है ॥१२ ॥

देवताओं ने सोम की इस चाल को पहचान कर अमृतावाक् के द्वारा तीनों लोकों में व्याप्त सोम के भागों को पुनः प्राप्त कर लिया । अर्थात् त्रैलोक्य में व्याप्त सोम को सौर-रश्मियाँ हर समय चूसती रहती हैं । इस प्रकार सौरप्राण - देवताओं का हवि सोम बन जाता है । यही स्थिति प्राकृतिक यज्ञ की है । प्राकृतिक यज्ञ के अनुकरण पर होने वाले मानुष वंध यज्ञ में सोम के अन्तरिक्ष - स्थित भाग के न आने से सोमवल्ली के अभिषव से प्राप्त सोम - रस अपूर्ण एवं प्रकृत्स्न है । अतः अध्वर्यु सौरी वाक् से निष्पन्न मन्त्र - वाक् का प्रयोग करता है । उच्चावच लहरों से युक्त सौरी वाक् की तरह उदात्तानुदात्तादि स्वरों से युक्त मन्त्रवाक् से आधिदैविक सोम - प्राण गृहीत हो जाता है और अध्वर्यु अन्तरिक्षादि में व्याप्त सारे सोम को [ ६३१ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण प्रधिषवण ब्राह्मण इस वल्लीसोम में सम्मिलित कर लेता है तथा सोम की कृत्स्नता सिद्ध हो जाती है । मन्त्र-वाक् द्वारा वह सोमप्रारण अध्वर्यु में आ जाता है और फिर वह सोमप्रारण इस वल्लीसोम में प्रविष्ट हो जाता है । सोम की अकृत्स्नता मिट जाती है तथा कृत्स्न सोम आग्नेय प्राणदेव-ताों का हवि बन जाता है ॥१३ ॥

अध्वर्यु निग्राभ्या जल से सोमांशुओं का सेचन करता है । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि निग्राभ्या जल को वल्लीसोम में मिलाने का कारण यह है कि चित्य पृथिवीपिण्ड के गर्भ में प्राणाग्निरूप अमृताग्नि ( चितेनिधेयाग्नि ) पृथिवी - केन्द्र से निकल कर १७ वें ग्रह-र तक जाती है । १७ वें अहर्गण पर रहने वाला प्राणाग्नि यज्ञ से प्रवयं बन कर सोमरूप ' आप ' में प्रविष्ट हो जाता है । अप् की विरलावस्था ही सोम है । अपरूप सोम में प्रविष्ट प्राणाग्नि के कारण ही पानी में तरलता एवं बहाव है । पृथिवीपिण्ड के केन्द्र से निकल कर २१ वें अहर्गण तक वितत होने वाली प्राणाग्नि घन, तरल, विरल भेद से त्रिधा विभक्त हो जाती है । त्रिवृत् स्तोम तक व्याप्त घनाग्नि ही कहलाती है । इसे ही ध्रुव अग्नि कहते हैं । वायुरूप तरलाग्नि की सत्ता पंचदश स्तोम तक है । इसे धर्त्र - प्रग्नि कहते हैं । एकविंश स्तोम पर्य्यन्त विरलाग्नि आदित्य कहलाती है । इसे ही धरुण - अग्नि कहते हैं । ध्रुव अग्नि वस्तु में घनता पैदा करने वाली है । तरलाग्नि अर्थात् घ अग्नि घनता को दूर कर वस्तु में तरलता उत्पन्न करती है । वायुरूप तरलाग्नि में चार भागों में से एक भाग इन्द्र का भी मिश्रण है जो कि गति उत्पन्न करने वाला है । वायु में रहने वाले इन्द्र को मरुत्वान् कहा जाता है । वायु में जो गति है वह इन्द्र की ही महिमा है | इन्द्रमिश्रित तरलाग्नि ही वायु- रूप से जल में प्रविष्ट रहती है । इसीलिए जल में भी गति ( प्रवाह ) है । सङ्कोचधर्मा सोम की घनावस्था आपः कहलाती है । जो घनता है वही वृत्र है । जल में घनता के उत्पादक वृत्र प्रारण को वायुरूप तरलाग्नि तथा तत्सहकारी गतिधर्मा इन्द्र नष्ट कर जल में बहाव ( गति ) उत्पन्न कर देता है । बल भी इन्द्र का ही कार्य है । इसीलिए निरुक्तकार यास्क ने कहा है- ' या च का च बलकृतिरिन्द्रकर्मैव तत् ' इति । इस इन्द्र के बल के कारण ही कोई भी लोष्ट - काष्ठादि जल के बहाव को रोक नहीं सकता । किन्तु सभी पदार्थ इन्द्र के लिए स्थित हो जाते है । यहाँ तक कि सदा गतिशील वायु भी इन्द्र के लिए ठहर जाता है । वायु में जो गतिशीलता है वह भी इन्द्र के ही कारण है । यदि वायुमें से इन्द्र को हटा दं तो वायु भी गतिरहित हो जाएगा ॥ १४ ॥

इन्द्र ने कहा कि सारे ही भूत ( पदार्थ ) मेरे लिए स्थित हो जाते हैं अत: तुम भी मेरे लिए ठहर जाओ । जलों ने कहा कि इससे हमें क्या लाभ होगा? इन्द्र ने कहा कि सोम राजा का प्रथम भक्ष आप को ही प्राप्त होगा । जलों ने इस बात को स्वीकार कर लिया और ठहर गए । इन्द्र के द्वारा वक्षःस्थल में निगृहीत होने से इन जलों का नाम निग्राभ्या पड़ा । प्रकृति-याग में इन्द्र की तरह इस वैधयाग में यजमान भी इनको वक्षःस्थल में निगृहीत करता है । [ ६३२ ]

पृष्ठ 647

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तृतीय काण्ड ( ० ) शतपथ ब्राह्मरण श्रधिषवण ब्राह्मणं वैधयाग में सोम का प्रथम भक्ष इन निग्राभ्या जलों को ही प्राप्त होता है और वह भक्ष सोमाभिषव काल में वल्लीसोम का निग्राभ्या जलों से संसर्ग ( सेचन् ) ही है ॥ १५ ॥

वह अध्वर्यु - " श्वात्रा स्थ वृत्रतुर राघो गूर्ता अमृतस्य पत्नीः । ता देवीदेवत्रेमं यज्ञं नयत उपहूताः सोमस्य पिबत ॥ ” इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ निग्राभ्या पानियों से सोम का सेचन करता है । जल आप्यायन एवं कल्याण करने वाले हैं । अतः मन्त्र में श्वित्र शब्द शिव अर्थ का वाचक है । निग्राभ्या पानी ने वृत्र का वध किया है अतः उन्हें वृत्रतुरः - वृत्र का हिंसक कहा है । जल सम्पत्ति उत्पन्न करते हैं । निग्राभ्या जल अमृतरूप हैं । ये धन सम्बन्धी उद्यम पैदा करने वाले हैं । जिसके शरीर में निग्राभ्या जल होता है वह उद्यम कर धन का अर्जन कर सकता है । ऐसी महिमा से युक्त हे आपोदेवियो! देवताओं की ओर इस यज्ञ को पहुँचाइए तथा निमन्त्रित हो कर आप इस सोम - रस का पान कीजिए ॥ १६ ॥

निग्राभ्या जल से सोम सेचन के बाद जब अध्वर्यु सोम पर ग्रावा से प्रहार करना चाहता है अर्थात् उसे कूटना चाहता है तब जिस से वह द्वेष करता है उसका मन से ध्यान करे कि मैं उस द्वेषी शत्रु के लिए प्रहार कर रहा हूँ न कि आप ( सोम ) के लिए । ऐसी भावना करने से सोम ग्रावा से कूदने पर मरता नहीं अपितु जीवित हो जाता है । यदि अध्वर्यु का कोई द्वेषी शत्रु न हो तो तृण का ही ध्यान करे । अर्थात् मैं इस तृरण के लिए प्रहार करता हूँ न कि सोम के लिए, ऐसी भावना करे । इससे अध्वर्यु सोम- हिंसारूप पाप से मुक्त हो जाता है || १७ || वह अध्वर्यु– “ मा भेर्मा संविक्या ऊर्जं धत्स्व धिषणे वीड्वी सती वीडयेथामूर्जं दधा-थाम् । पाप्मा हतो न सोमः " ' – इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ उपांशुसवन पर रखे हुए सोम पर अश्ममय ग्रावा से प्रहार करता है । अर्थात् हे सोम! तुम जरा भी मत डरो, उद्विग्न मत बनो, रस को धारण करो । जिस उपांशुसवन ( शिला ) पर सोम कूटा जाता है उस के दो फलकों के लिए कहा गया है कि वे दोनों फलक बुद्धिमान्, बलवान एवं दृढ बनें । उर्क रस धारण करें – ऐसा कतिपय आचार्यों का मत है । उसी का निरूपण करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि शिला के दो फलकों की दृढता के लिए, ' धिषणे बड्वी सती ' इत्यादि मन्त्र भाग नहीं कहा गया है । क्योंकि यदि सोम कूटने से शिला के फलक टूट भी जाएँ तो इससे क्या हानि होनी है? अतः यह मन्त्र -भाग शिला - फलकों के लिए नहीं अपितु द्यावा-पृथिवी के लिए कहा गया है । सोम कूटने के लिए जब अध्वर्यु अश्ममय ग्रावारूप वज्र उठाता है तो उसको देख कर द्यावापृथिवी डर जाते हैं, क्यों कि सोम द्यावापृथिवी की सन्तान है । उद्विग्न होने से उनसे एक शोकमय प्रारण निकलता है, जो अध्वर्यु का विनाश कर सकता है । उन द्यावापृथिवी के लिए अध्वर्यु प्रार्थना करता है कि हे द्यावापृथिवी! आप बुद्धिमान हैं एवं इस तथ्य को जानती हैं कि मैं आपके पुत्र सोम के लिए नहीं अपितु अपने शत्रु के लिए [ ६३३ ] J

पृष्ठ 648

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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण श्रधिषवरण ब्राह्मण प्रहार कर रहा हूँ । अतः आप बलवान् व दृढ बने रहिए । इस प्रकार इस प्रार्थना - मन्त्र से अध्वर्यु यज्ञ को शान्त कर रहा है । यज्ञ के शान्त होने से यज्ञ उत्क्षेप प्रवक्षेप के द्वारा द्यावा-पृथिवी की हिंसा नहीं करता । ' पाप्मा हतो न सोम: ' इस मन्त्रांश के द्वारा अध्वर्यु द्यावा-पृथिवी से कहता है कि हे द्यावापृथिवी! हमने इस सोम के सारे शत्रुनों को मारा है न कि सोम को । अतः आप बिलकुल सन्ताप न करें ॥१८ ॥

' वह अध्वर्यु तीन बार ग्रावा से सोम का अभिषव करता है ( कूटता है ) तथा तीन बार सोम का संभरण ( निष्पीडन ) करता है । चार बार निग्राभोपायन करता है । इस प्रकार सोमाभिषव में अभिषव, संभरण व निग्राभोपायन से दस संख्या हो जाती है । दस अक्षर का विराट् छन्द होता है । यह सोम भी वैराज ( विराट् सम्बन्धी ) है । क्यों कि इस सोम को पाँच बार यजु - मन्त्र से नापा जाता है तथा पाँच बार तूष्णीं नापा जाता है । अतः वैराजसोम सम्पत्ति को इस सोम में डालने के लिए १० बार सोमसम्पादन करता है ॥१६ ॥

तदनन्तर ' प्राग्वाक् ' इत्यादि मन्त्र से निग्राभोपायन करता है । सारी दिशाओं में गये हुए सोम को अपनी ओर मन्त्र द्वारा प्राप्त करना ही निग्राभोपायन है । इसकी उपपत्ति बत-लाते हुए कहते हैं कि यह सोम, सृष्टि के प्रारम्भ में जिस समय देवताओं का हवि बना था उस समय या जिन मेरे प्रिय शरीरावयवों को देवता लोग हवि बनाना चाहते हैं उन शरीरा-वयवों को दिशाओं में छिपा लूँ इस विचार से वह सोम दशों दिशाओं में व्याप्त हो गया था । देवताओं ने विचार किया कि सोम को निग्राभ ( आन्तरिक्ष्य रस ) बहुत प्रिय है । अतः उस छिपे हुए सोम को प्राप्त करने के लिए निग्राभोपायन किया । इससे देवता दिशाओं से मिथुनी-भूत सोम के प्रिय शरीर से संयुक्त हो गए । इसीलिए आज इस वैधयज्ञ में दिशाओं से मिथुनी भूतसोम को प्राप्त करने के लिए निग्राभ्या जलों से अध्वर्यु सोम का सेचन करता है || २० || वह श्रध्वर्यु - ' प्रागपागुदगधराक् सर्वतस्त्वा दिश प्राधावन्तु । अम्ब निष्पर समरी-विदाम् ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ सभी दिशाओं के साथ मिथुनीभूत प्रिय शरीरा-वयव से इस सोम का स्पर्श करता है । अर्थात् हे सोम! दिशाएँ तुम को सुरक्षित स्थानों से ले आएँ । अम्बा नाम जल का है और जल योषा है । यह जल दिशाओं में भरा रहता है अतः स्थान- समानदेशता के कारण दिशाएँ भी योषा हैं । प्ररी नाम प्रजा का है । हे अम्ब! सारी प्रजा श्राप को पहचान जाए । दूरगत प्रजा भी अपने सम्बन्धियों के साथ एकमनस्क हो जाती हैं || २१ || सोम नाम का निर्वचन बतला रहे हैं कि जब सृष्टि के प्रारम्भ में सोम, देवताओं का हवि बना तब उसने विचार किया कि मैं सर्वात्मना देवताओं का हवि न बन जाऊँ । श्रुतः अपने प्रियतम शरीर को उसने छुपा लिया । देवताओं ने सोम से कहा कि हे सोम! तुम अपने प्रिय शरीर को अपनी ओर बुला लो और उसके साथ हमारे इस हवि को समृद्ध करो । [ ६३४ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मणं अधिषवरण ब्राह्मण ऐसा कहने पर सोम ने दूर से ही पुकार कर कहा कि यह मेरा प्रिय शरीर है अर्थात् मेरा. स्वो नाम है, यह स्वो नाम शब्द ही परोक्ष भाषा में सोम शब्द बना है ॥ २२ ॥

यज्ञ शब्द का निर्वचन बतला रहे हैं कि इस सोमवल्ली को पहले ग्रावा से कूटते हैं । कूटने के द्वारा मारे हुए सोम को संभरण ग्रहरण होमादि द्वारा वितत करते हैं, इसके द्वारा पुन: उत्पन्न करते हैं । अतः यन् अर्थात् संभरण ग्रहण होमादि द्वारा प्राहुति भाव को प्राप्त.. होता हुआ सोम पुन: उत्पन्न होता है । अतः ' यन् जायते ' इस व्युत्पत्ति से वह यञ्ज कहलाता

है । और यही यज्ञ है । इस तरह सोम ही यज्ञ है ॥ २३ ॥

सोमाभिषवकाल में उक्तार्थ संवादरूप से सोमप्रार्थनारूप मन्त्रसंवाद भी प्रदर्शित किया जा रहा है-.

" त्वमङ्ग प्रशंसिषो देवः शविष्ठ मर्त्यम् ।

न त्वदन्यो मघवन्नस्ति मडितेन्द्र ब्रवीमि ते वचः " ॥

हे अतिशय बलवान् इन्द्र! देवस्वरूप तुम मरणधर्मा मुझ सोम को प्रशस्त करो । आहुतिरूप से मेरा विस्तार करते हुए देवतारूप से मुझे पुनः उत्पन्न करो । तुम्हीं अभिषव के. द्वारा मुझ मृत को इस मर्त्य लोक से देवतारूप से उत्पन्न करने वाले हो और कोई नहीं || २४ || तदनन्तर निग्राभ्या जलों से ग्रहों का ग्रहण करता है । प्रान्तरिक्ष्य जलों में प्रविष्ट मरुत्वान् इन्द्र ने जल का स्तम्भन करने वाले वृत्र को मार कर जलों में तरलता प्रवहरण-शीलता उत्पन्न की । उसी वृत्रवधरूप वीर्य के द्वारा जल बहते हैं । उन जलों से वसतीवरी जलों का ग्रहण हुआ तथा वसतीवरी जलों से होतृचमस व निग्राभ्या जलों का ग्रहरण हुआ । निग्राभ्या जलों से सोमरस द्वारा ग्रहों का ग्रहण होता है । उसी वृत्रवधरूपी वीर्य से ग्रहों का... ग्रहण होता है । किन्तु निग्राभ्या जलों से होतृचमस के द्वारा होता है । जिस वस्त्र से सोम को छाना जाता है उस दशापवित्र के ऊपर होतृचमस को धारण कर उस होतृचमस में सोम-रस का सेवन कर ( डाल कर ) सोमरस की धारा बना कर धारारूप से ग्रहों का ग्रहरण होता है । ऋक् योषा ( स्त्री ) है, वही होता है । शस्त्ररूप ऋचा का प्रयोग होता ही करता है । प्रयोज्य व प्रयोजक का अभेद मान कर ऋक् के योषा होने से उसके प्रयोजक होता को भी योषा बतला दिया है । योषा से ही प्रजोत्पत्ति होती है । इसलिए ऋगभिन्न होतारूप योषा से इस सोम को उत्पन्न करता है । इस प्रकार अध्वर्यु निग्राभ्या जलों से होतृचमस के द्वारा ग्रहों का ग्रहण करे ॥ २५ ॥

[ विज्ञानभाष्य ] एकधना निग्राभ्या पानी आ गया । हमने बतलाया था कि इस यज्ञ में वसतीवरी - एकधना- निग्राभ्या तीन तरह के पानी होते हैं । इन तीनों में एकधना एवं निग्राभ्या दोनों एक चीज हैं । एकधना ही निग्राभ्या बन जाता है जैसा कि आगे जा कर स्पष्ट हो जाता है । एकधना - पानी के तीन से पन्द्रह घड़े तक का विधान है जिनका कि विवेचन उपपत्तिपूर्वक पूर्व के सुत्या ब्राह्मण में कर [ ६३५ ] ,

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तृतीय काण्ड ( ० ९ ) शतपथ ब्राह्मण अधिषवण ब्राह्मण दिया गया है । इस प्रकार एकधना निग्राभ्या पानी लाने के बाद यजनं सहित सारे ऋत्विक अधिषवण पर बैठते हैं । काष्ठ का जो छोटे - छोटे पायों का पाटा होता है - उसे ही " प्रधिषवरण " कहते हैं । प्रायः ये पाटे पूजा में और बैठने में दो कामों में अधिक व्यवहृत होते हैं । कुल देवताओं की पूजा इन्हीं पाटों पर होती है एवं मनुष्य भी पाटा या चौकी लगा कर उस पर बैठा करते हैं । बस, उन्हीं पाटों पर ये सारे ऋत्विक बैठते हैं । अध्वर्यु श्रोर यजमान दोनों पास - पास बैठते हैं एवं बाकी बचे हुए होता उद्गाता ब्रह्मा-तीन ऋत्विक् अध्वर्यु से आगे बैठते हैं-" प्रथाधिषवणे ( दारुमये फलके ) पर्युपविशन्ति ” । यहाँ पर दो पाटे होते हैं । एक उत्तर की ओर बिछा रहता है- दूसरा उसके पास ही दक्षिण की ओर बिछा रहता है । इसमें जो उत्तर का पाटा है - उस पर तो अध्वर्यु और यजमान- ये दोनों बैठते हैं । एवं दूसरे पाटों पर तीनों ऋत्विक् बैठते हैं । जब सब ऋत्विक् पाटों पर बैठ जाते हैं तो एक सोने की टिकड़ी अथवा एक सोने की अँगूठी यजमान अपनी अनामिका अंगुली में बाँधता है । भगवान् याज्ञवल्क्य शिष्यों को पढ़ा रहे हैं । जब अंगुली में हिरण्य बाँधने का प्रकरण आता है तो वे अंगुली की ओर इशारा करके कहते हैं कि " इस अंगुली में यजमान हिरण्य बाँधता है । " बस, इसी अभिप्राय से ' अंगुली ' का नाम न ले कर केवल " प्रस्याम् " यही कह दिया गया है-" Arti ( अनामिकायाम् ) हिरण्यं बध्नीते " । ' सोना बाँधने की आवश्यकता ही क्या है? ' - इसका उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं- सम्पूर्ण विश्व में सत्य और मिथ्या के अलावा कोई तीसरी वस्तु है ही नहीं । साँच और झूठ - दो भावों के अलावा और किसी तीसरे भाव की सत्ता ही नहीं है । भूत - भविष्यत् वर्तमान इन तीनों कालों में जो वस्तु एकरस बनी रहती है - जो त्रिकालाबाध्य है उसी को " सत्य " कहते हैं । एवं जो एकरस नहीं है-प्रतिक्षरण बदलता रहने वाला भाव है उसे ही ' अनृत ' कहते हैं । गन्ध - रस - रूप - शब्द - स्पर्शादि रहित मौलिक प्राणस्वरूप देवता सदा एकरस रहते हैं । वे कभी भी अपने नियति सत्य से च्युत नहीं होते । प्राणाग्नि का स्वभाव है - जलाना | उसकी इस शक्ति का कभी भी ह्रास नहीं होता । सूर्य का काम है-रोशनी करना । वह अपनी इस ड्यूटी से कभी भी विचलित नहीं होता । श्रतएव हम इन प्राण - देवताओं को " सत्य " कहने के लिए तय्यार हैं । परन्तु मनुष्य ठीक इसके विपरीत है । मनुष्य का कोई भी काम एक लाइन से नहीं होता । खाना - पीना सोना - उठना- रोना - हँसना - चलना - बोलता पहनना सब अमर्यादित । वह पद पद पर प्रज्ञापराध करता है । अपिच - वह सर्वथा अनित्य भी है । देवता पहले भी थे, अंब भी हैं - प्रागे भी रहेंगे, परन्तु औसत मनुष्य आज से १०० ( सौ ) वर्ष पहले न था, न आगे रहेगा | अतएव हम इसे श्रसत्यरूप कहने के लिए तय्यार हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" द्वयं वा इदं न तृतीयमस्ति सत्यं चैवानृतं च । सत्यमेव देवाः अनृतं मनुष्याः " । [ ६३६ ]