Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 651–660
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 651–660
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तृतीय काण्ड ( अ ० 2 ) शतपथ ब्राह्मण अधिषवरण ब्राह्मण यज्ञकर्त्ता यजमान मनुष्य है- प्रतएव अनृतस्वरूप है । जिस सोम की प्राहुति दी जाएगी, वह सोम देवता है । द्युलोक का सोम ही वल्लीरूप में परिणत हो रहा है । इस सोम - वल्ली को कूट कर इसका रस निकाला जाता है | भला, एक मामूली मनुष्य सोमदेवता के ऊपर आघात करे यह कितना अनुचित है । बस इस अनौचित्य को हटाने के लिए ही अंगुली में सोना बाँधा जाता है । जैसे सोम देवता है तथैव सुवर्ण भी देवता ही है । सुवर्ण अग्नि का ही रेत है । पानी के देवता चूंकि वरुण हैं, अतएव पानी वरुण की पनियाँ कहलाता है । पार्थिव पानी, जो कि ६४ ( चौसठ ) प्रकार की मिट्टियों में से एक खास प्रकार की मिट्टी से युक्त हो जाता है तो सौररश्मियाँ उसमें बद्ध हो जाती हैं । सोर अग्नि परमाणु ही पानी में बद्ध होकर सोना बना देते हैं । पानी में मिश्रित मिट्टी से संबद्ध अग्नि- रेत का सौर रश्मियों का ही नाम " सुवर्ण " होता है । सोना - मिट्टी में पड़ा हुआ साक्षात् अग्नि है । यही कारण है कि सोने की कभी भस्म नहीं होती क्यों कि सोना अग्नि है । अग्नि, अग्नि को हर्गिज नहीं जला सकता । अग्नि केवल पार्थिव परमाणुओं को विशकलित कर देता है । जहाँ पार्थिव परमाणु विशकलित हुआ कि वह बद्ध अग्नि ( सुवर्ण ) अपने प्रभव सूर्य्य में चला जाता है । बाकी बचे हुए जो भस्मीभूत पार्थिव परमाणु एवं उसमें ऊपर से डाली गई श्रौषधियों की भस्म है - वही " सुवर्ण भस्म " नाम से प्रसिद्ध कर दी जाती है । वास्तव में सोने की भस्म कभी नहीं हो सकती । सुवर्ण साक्षात् अग्नि का रेत है - इसमें इससे अधिक और क्या प्रमाण हो सकता है? इसीलिए तैत्तिरीय श्रुति कहती है-" आपो वरुणस्य पत्नय श्रासन् । ता अग्निरभ्यध्यायत् । ताः समभवत् तस्य रेतः पराऽपतत् । तद्धिरण्यमभवत् " - इति । ' ( तै ० सं ० ५ । ५ । ४ । १ ) इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-" अग्निरेतसं वै हिरण्यम् " । जब कि सोना श्रग्नि का रेत है— साक्षात् अग्नि ही है तो हम इसे देवता कहने के लिए तय्यार हैं । यदि देवता, देवता पर प्रहार कर बैठता है तो इससे देवता रुष्ट नहीं होते । ऐसी अवस्था में सुवर्ण को अंगुली में बाँध कर सोम को कूटना - यजमान द्वारा कूटना नहीं कहलाता, अपितु सुवर्ण रूप श्रग्नि-देवता द्वारा कूटना कहलाता है । यजमान प्रहार नहीं करता अपितु अग्नि देवता प्रहार करते हैं । वस्तु-तस्तु अग्नि का प्रहार करना प्रहार ही नहीं कहलाता क्यों कि अग्नि तो सोम का मित्र है । अग्नि को देखते ही सोम " तवाहमस्मि सख्येन्यो का " - कहता हुआ उसके अनुगत हो जाता है । अतएव अग्नि का प्रहार तो सोम के लिए मित्र की मीठी चुटकियाँ हैं । इस प्रकार सुवर्ण से प्रहार स्वरूप हिंसा का भाव हट जाता है एवं सत्य का सत्य ही से स्पर्श भी बन जाता है । श्रतएव याज्ञवल्क्य कहते हैं-" मैं सत्य से सत्य अंशु का ( सोम का ) स्पर्श करू " सत्य अग्नि से सत्य सोम का अभिषव करू । : इसलिए अनामिका में हिरण्य बाँधता है-१ " यहाँ पर ' तद्धिरण्यमभवत् ' यह पाठभेद है, अतएव द्रष्टव्य - सायरणभाष्य शत ० ब्रा ० ३ | ६ | ४ | १ ” । [ ६३७ ] J
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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण अधिषवरण ब्राह्मण " सत्येनांशूनुपस्पृशानि । सत्येन सोमं पराहणानि - इति । तस्माद्वाऽस्यां " हिरण्यं बध्नीते " ॥१ ॥
हविर्धान मण्डप में बराबर - बराबर दो शकट रक्ते रहते हैं । इन दोनों में जो दक्षिण हविर्धान है - उसके दक्षिण में ४ ( चार ) खड्डे रहते हैं । ये खड्डे यज्ञ - पुरुष के इन्द्रियस्थानापन्न हैं एवं इन्हें उपरव कहा जाता है । इस पर एक शिला रक्खी रहती है एवं शिला पर चार ग्रावा ( पत्थर ) रक्खे रहते हैं । इन पत्थरों से उस शिला पर सोम का अभिषव किया जाता है । अब सोमाभिषव होने वाला है, अतएव अध्वर्यु - यजमान के सुवर्णं बाँधने के अनन्तर शिला पर रक्खे हुए उस ग्रावा को उठाता है. " थ ग्रावारणमादत्ते ( अध्वर्युः ) " । किसी वस्तु को कूटने के काम में लाने वाला जो कठिन द्रव्य है चाहे वह काष्ठ हो - लौह हो या पत्थर हो- ' ग्रावा ' कहलाता है । यहाँ पर जो ग्रावा होते हैं, वे न काष्ठ के होते हैं - न लोह के होते हैं अपितु पत्थर के होते हैं । प्रर्थात् सोमाभिषवकर्म में अश्ममय ग्रावा ही होने चाहिए- पत्थर से ही सोम को ' कूटना चाहिए यही तात्पर्य है— " ते वाऽएते श्रश्ममया ग्रावारणो भवन्ति " - इति । वल्ली में जो सोम है - वह असल में द्युलोक की वस्तु है । द्यु में भी तीसरे द्युलोक की वस्तु है । स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूर्य्य - चन्द्रमा पृथिवी - ये पाँच पिण्ड हैं । पाँचों में से सोम की उत्पत्ति परमेष्ठी के सर-स्वान् समुद्र में होती है । पृथिवी, पृथिवी लोक है । सूर्य्य द्युलोक है । एवं दोनों के बीच का जो खाली स्थान है - वह अन्तरिक्ष है । इस अन्तरिक्ष को भी " द्युलोक " माना जाता है । श्रतएव " घुरपिस्यात्तदव्य-यम् " यह कहा जाता है । एवं सूर्य के ऊपर का जो प्रन्तरिक्ष है - वह भी इसी परिभाषा के अनुसार ' द्यु- लोक ' कहलाता है । इसी में ' भृगु और अङ्गिरा उत्पन्न होते हैं । भृगु ही को सोम कहते हैं । चूंकि यह सूर्य से भी ऊपर के द्यु में रहता है । अतएव ---" तृतीयस्यामितो ( पृथिवीलोकात् ) दिवि सोम आसीत् " । ( तै ० सं ० ३ | ५ | ७ | १ | ) यह कहा जाता है | वही सोम सूर्य्य से नीचे आ कर नीचे के अन्तरिक्ष में व्याप्त हो जाता है । इस प्रकार सूर्य के ऊपर एवं नीचे चारों ओर सोम भरा रहता है । इस महाविपुल सारे अन्तरिक्ष में सोम भरा रहता है । अतएव -" त्व मातनोरुवन्तरिक्षम् " १ यह कहा जाता है । जो पदार्थ दिव्यलोक में ( द्युलोक में ) रहते हैं -उन्हें हम ' देवता ' कहने के लिए तैयार हैं । यह वल्ली - सोम असल में द्यु में रहने वाला है, प्रतएव इसे भी १ ऋग्वेद मं ० १।६१।२२ । [ ६३८ ] ,
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तृतीय काण्ड ( ० ) शतपथ ब्राह्मण श्रधिषवरण ब्राह्मण देवता कह सकते हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं कि ' देवो व सोमः ' १ कैसे हैं? इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि ' दिवि हि सोमः १ अर्थात् चूँकि सोम द्यु - लोक में रहता है - द्युलोक की वस्तु है, अतएव इसे 11. देव कहा जाता । अपिच - यही सोम वृत्र भी कहलाता है । सारा संसार अग्नीषोमात्मक है । इन दोनों * में अग्नि, विकासधर्म्मा है एवं सोम संकोचधर्म्मा हैं । इस सोम की घन तरल- विरल- ये तीन अवस्थाएँ हैं । इन तीनों में जो घन सोम है - वही वृत्र कहलाता है । संसार में जितनी भी घनता दीखती है - वह इसी वृत्र सोम की - घनसोम की महिमा है । अग्नि का स्वभाव है कि पदार्थ के साथ संबद्ध होते ही वह उसके खण्ड - खण्ड कर डालता है । उसके परमाणुओं को विशकलित कर डालता है । परन्तु सोम इससे ठीक विरुद्ध है । वह पदार्थ परमाणुत्रों का चारों ओर से संवरण कर उस पर आप सवार हो जाता है । अपनी संकोच शक्ति से उस पदार्थ का चारों ओर से संवरण कर उस पर चाक्रान्ता हो जाता है । अतएव " सर्वं वृत्वा शिश्त्रे " इस व्युत्पत्ति से इस घन- सोम को हम अवश्य ही " वृत्र " कहने के लिए तय्यार हैं । इस सोम का - वृत्र सोम का - यदि साक्षात् स्वरूप देखना चाहते हो वह यही पर्वत है । सोम ही पर्वत बना हुआ है । परमाणु- मात्र पार्थिव है, बाकी सारा वृत्र सोम ही सोम है । इसीलिए तो " सोममद्रो ' यह कहा जाता है । पत्थर पर्वत चूंकि सोम का शरीर है- अतएव इससे ही सोम को कूटना उचित है । अपना शरीर अपना बाधक नहीं होता है । हमारे शरीर से हमें पीड़ा नहीं होती । चूंकि पत्थर सोम का शरीर है, अतएव इससे कूटने से सोम का कुछ भी नहीं बिगड़ता है | अतः इस ग्रावा से हानि होने के बजाय सोम समृद्ध होता है । ग्राव का सम्बन्ध होना - सोम के साथ उसके अपने शरीर का सम्बन्ध होना है । बिना ग्रावा के सोम अशरीर था, प्रतएव शरीर - संपत्ति से शून्य था परन्तु ग्राज ग्रावा के आ जाने से वह सशरीर बनता हुआ समृद्ध हो जाता है । इस प्रकार ग्रावा से अभिषव करता हुआ अध्वर्यु सोम को समृद्ध करता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं ---" वृत्रो वै सोम आसीत् । तस्यैतच्छरीरं यद्गिरयो यदश्मानः । तच्छरी-रेणैवैनमेतत् समर्द्धयति " । बिना शरीर के जैसे ग्रात्मा प्रकृत्स्न ( अपूर्ण ) रहता है तथैव प्रश्मा शरीर के बिना यह सोम प्रकृत्स्न था । आज प्रश्माशरीर से सोम का सम्बन्ध करता हुआ यह ऋत्विक् इसे कृत्स्न करता है- पूर्ण बनाता है । बस, ' अश्ममया ' ग्रावा क्यों होते? – इसका यही उत्तर है । सोमसमृद्ध्यर्थ ही अश्ममय ग्रावा होते हैं-" कृत्स्नं करोति । तस्मादश्ममया भवति " । अपि च- प्रभिषव करना - एक प्रकार से इसका वध करना है । जो ऋत्विक् लोग इसका अभिषव : करते हैं अर्थात् इसे कूटते हैं- ऐसा करते हुए वे इसे मारते हैं- इसकी हिंसा करते हैं । बस उस आघात से मरे हुए सोम को जिलाने के लिए ही वे अश्ममय ग्रावा से कूटते हैं । इससे कूटने से वह सोम इस १ शत ० ब्रा ० ३१६/४/२ | ' [ ६३६ ]
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तृतीय काण्ड ( ० ह ) प्रकार का प्रारण है । लिए बढ़ता है - वह इसी ' वा ० सं ० ६।३० ' । १ प्रधिषवरण ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण सविता देवता की अनुज्ञा में अश्विनी श्राप रावा हैं अर्थात् दाता हैं - दान-[ ६४० ] अभिषवस्थान से पुनरुदित हो जाता है एवं पुनः सम्यक् जीवित हो जाता है । तात्पर्य यही है कि कूटने से सोम - प्राण अन्तरिक्ष में चला जाता है । उसमें सोम की कमी होने से यज्ञ में कमी हो जाने की संभावना हो जाती है । चूंकि अश्मा सोम है, अतः इसके सम्बन्ध से निकला हुआ सोम - प्रारण फिर आ जाता है । अर्थात् उस कमी को यह पूरी कर उस सोम को पुनः प्राणयुक्त कर देता है । आघात - जनित हिंसा एवं शरीर - भाव युक्त प्रकृत्स्नता- इन दोनों को हटाने के लिए ही प्रश्ममय ग्रावा होते हैं - यही तात्पर्य है -" नन्ति वानमेतद् यदभिषुण्वन्ति । तमेतेन घ्नन्ति । तथा त ( अभि-षवस्थानात् ) उदेति ( पुनरुदितो भवति सोमः ) । तथा संजीवति ( जीवोपेतो
भवति ) तस्मादश्ममया । ग्रावारणो भवन्ति " ॥ २ ॥
विश्व में जड़ और चेतन दो विभाग मानने वाले अवैज्ञानिकों को इससे शिक्षा लेनी चाहिए । अश्ममय ही ग्रावा क्यों होते हैं? इसकी उपपत्ति बतला दी गई । अब पद्धति बतलाते हैं । वह अध्वर्यु -देवस्य " त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामाददे रावासि " । ( वा ० सं ० ६।३० ) यह मन्त्र बोलता हुआ ग्रावा को अपने हाथ में उठाता है । कुमारों के बाहु से - पूषा के हाथों से आपको उठाता हूँ । हे ग्रावा! शील हैं - यही मन्त्रार्थ है । मन्त्र के प्रत्येक पद का अर्थ करते हुए कहते हैं—- सविता ही देवताओं के सविता हैं । सविता एक बिना इसके कोई काम हो ही नहीं सकता । हमारा हाथ किसी वस्तु को उठाने के सविता - प्रारण की खूबी है । हाथ है । हाथ को उठाने के लिए प्रसूत करना सविता प्रारण का काम है । सूर्य्य ही सविता है । यही हमारी बुद्धि को प्रेरित करने वाला है । अतएव ' धियो योनः प्रचोदयात् ' यह कहा जाता है । बस, " देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे " १ - कहता हुआ अध्वर्यु सवितृ प्रसूत होकर ही इस ग्रावा को हाथ में लेता है । " सविता वै देवानां प्रसविता । तत् सवितृप्रसूत एवैनमेतदादत्ते " । प्राण - देवताओं के अध्वर्यु जसे वायु हैं तथैव नासत्य और दस नाम के अश्विनी देवता भी अध्वर्यु हैं । श्राज यह श्रध्वर्यु इसे नहीं उठाता, अपितु अश्विनी कुमार उठा रहे हैं । ग्रावा से सोम का अभिषव
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तृतीय काण्ड ( ० 8 ) शतपथ ब्राह्मण अधिषवरण ब्राह्मण किया जाता है | भला ऐसे काम के लिए मानुष अध्वर्यु के बाहु क्यों कर ग्रावा को उठा सकते हैं? आज श्रध्वर्यु उन प्राण - रूप अश्विनीकुमार अध्वर्युनों के हाथ से ग्रावा उठाता है । यद्यपि उठाता आप ही है, परन्तु मनुष्य भाव को दूर करने के लिए अपने में उन प्रारणाध्वर्युत्रों की भावना करता है— " अश्विनोर्बाहुभ्यामिति । अश्विनावध्वर्यू । तत् तयोरेव बाहुभ्यामादत्ते " । देवताओं को जो समष्टिरूपेण आहुति दी जाती है - उसका भाग करने वाला १२ ( बारह ) मादित्यों में एक पूषा नाम का आदित्य है । पूषा ही हिस्सा कायम करते हैं । हिस्सा कायम करना - हाथ का काम है एवं ग्रावा उठाना भी हाथ का काम है । अतएव ' पूष्णोहस्ताभ्याम् " कहा है । अध्वर्यु के बाहु से - पूषा के हाथ से - सविता के प्रसव से मैं तुम्हें उठाता हूँ । मैं अपने बाहु से अपनी इच्छा से, अपने हाथ से नहीं उठाता -" पूष्णो हस्ताभ्यामिति । पूषा भागदुधः तत्तस्यैव हस्ताभ्यामादत्ते न स्वाभ्याम् ” । यह ग्रावा एक प्रकार का वज्र है । वज्र दिव्य अस्त्र है । इसे देवता ही उठा सकते हैं । सामान्य मनुष्य वज्र का स्वामी नहीं हो सकता । सामान्य मनुष्य वज्र का प्रहार करे यह असंभव है, अतएव श्रध्वर्यु इस ग्रावा वज्र को देवताओं द्वारा उठाता है । " देवस्य त्वा " इत्यादि बोल कर ग्रावा उठाना -देवताओं का ही ग्रावा उठाना है-" वज्रो वा एषः तस्य न मनुष्यो भर्ता । तमेताभिर्द्देवताभिरादत्ते " ॥३ ॥
" श्राददे रावासीति " । ग्रावा - रावा ( दाता ) कैसे है? ग्रावा से कौनसी सम्पत्ति मिलती है - जिससे कि उसे " रावा " कहा गया? - यह बतलाते हैं । ये ऋत्विक् लोग जब इस ग्रावा से सोम का अभिषव करते हैं - तभी यह सोम प्राहुति बनता है । रस ही की प्राहुति होती है । जब आहुति दे देते हैं तो आहुत्यनन्तर ऋत्विजों को यजमान दक्षिणा देता है । इस यज्ञ में प्राण और विद्वान् मनुष्य - दो प्रकार के देवता होते हैं । ऋत्वि-जादि - अनूचान ब्राह्मण देवता हैं एवं अग्नि आदि प्राण देवता हैं । अतएव कहा जाता है— " यह वै देवाः । देवा ह वै देवाः । श्रथ ये शुश्रुवांसोऽनूचानास्ते ब्राह्मणा देवाः " | यज्ञ में आहुत से प्रारण - देवताओं को तृप्त किया जाता है एवं दक्षिणा से मनुष्य देवताओं को तृप्त किया जाता है । ये दोनों काम - ग्रावा के अधीन हैं । ग्रावा हो तभी सोमरस निकले तभी प्राहुति हो तभी ऋत्विजों को दक्षिणा मिले । इस प्रकार यह ग्रावा - प्राहुति और दक्षिणा दोनों को देता है, प्रतएव हम इसे " रावा " कहने के लिए तय्यार हैं । [ ६४१ ]
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To तृतीय काण्ड ( ० 8 ) शतपथ ब्राह्मण अधिपवरण ब्राह्मण " यदा वाडएनमेतेनाभिषुण्वन्ति प्रथाहुतिर्भवति । यदाहुति जुहोति । अथ दक्षिणा ददाति । एतध्येष द्वयं रासते ( ददाति ) प्राहुतीश्च दक्षिणाश्च तस्मा-दाह रावासीति ॥४ ॥
फिर उसी ग्रावा की स्तुति करते हैं -" गभीरमिममध्वरं कृधीन्द्राय सुषूतमम् । उत्तमेन पविनोर्ज स्वन्तम्मधुमन्तम्पयस्वन्तम् " । ( बा ० सं ० ६।३० ) यह यज्ञ ही श्रध्वर कहलाता है । ग्रावा से प्रार्थना की जाती है कि हे ग्रावा! आप इस यज्ञ को विपुल बनाइए - बड़ा बनाइए । अर्थात् - यह बहुत ही समृद्धिशाली बने - ऐसा आशीर्वाद दीजिए-" अध्वरो वै यज्ञः । महान्तमिमं यज्ञं कृधीत्येवैतदाह । इन्द्राय सुषूतमम् " इति । सूर्य का जो पिण्ड है - वह तो सूर्य्यं ही कहलाता है, परन्तु इस सूर्य का जो चितेनिधेय अमृत-प्रारण है वह मघवा इन्द्र कहलाता है । हम जो भी प्राहुति देते हैं सूर्य में जाती है । यद्यपि जाती है देवताओं में, परन्तु सूर्य्य में सारे देवता प्रतिष्ठित हैं, अतएव सूर्य्यं में ही जाना कहलाता है । सूर्य्यामृत-प्रारण का नाम ही इन्द्र है । अतएव " इन्द्रः सर्वा देवता " " यह कहा जाता है । अतएव हम इन्द्र को यज्ञ का ( संवत्सर रूप प्राकृत यज्ञ का - मनुष्यकृत वैध यज्ञ का ) देवता कहने के लिए तय्यार हैं । अतएव और किसी देवता का नाम न ले कर सारे देवताओं के राजा इन्द्र के लिए ही - " हे ग्रावा! आप इन्द्र के लिए सुन्दर से सुन्दर - प्रच्छा से अच्छा - अभिषव करो " यह कह दिया गया है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" इन्द्रो वै यज्ञस्य देवता तस्मादाह- इन्द्रायेति । सुषूतममिति ( सुष्ठ्व-भिषुतम् ) सुसुतममित्ये ( सुष्ठु सुष्ठुतममिति ) वैतदाह " । देवताओं के लिए अच्छे से अच्छा अभिषव करो - यही तात्पर्य है । " उत्तमेन पविना " २ - यह जो सोम है, वही उत्तम पवि है । इसी पवि को - सोम को पी कर इन्द्र वृत्र को मारते हैं । पवि ही इन्द्र की शक्ति है । अतएव पवि नाम इन्द्र के वज्र का भी है । यहाँ पर पवि से बलकारक सोम अभिप्रेत है । संसार में बुद्धि को सुरक्षित रखते हुए शरीर में वज्रसदृश ताकत पैदा करने वाला - प्रतएव वज्र नाम से व्यवहृत होने वाला सर्वोत्तम पदार्थ यदि कोई है तो यही सोम है । इसी का नाम उत्तम पवि है । चूंकि ग्रावा से इसी का अभिषव किया जाता है, प्रतएव " उत्तमेन पविना ( युक्तं यज्ञं ) यह कहा है । १ ' शत ० ब्रा ० ३।४।२।२ ' | २' वा ० सं ० ६।३० ' । [ ६४२ ] 1
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ९ ) शतपथ ब्राह्मण अधिषवरण ब्राह्मण " एष वा उत्तमः पविर्यत् सोमः । तस्मादाहोत्तमेन पविनेति ऊर्जस्वन्तं मधुमन्तं पयस्वन्तमिति ” ॥ ५ ॥
रस तीनही प्रकार के हैं । बस, " ऊर्जस्वन्तं " इत्यादि से " रसवन्तं कुरु " यही कहना है । " हे ग्रावन्! आप रावा हैं अर्थात् आहुति और दक्षिणा को देने वाले हैं । ऐसे श्राप का - सविता देवता की अनुज्ञा हो जाने पर अश्विनी के बाहु से पूषा के हाथों से मैं आपको उठाता हूँ । हे ग्रावा! श्राप यज्ञ को बड़ा बनाइए एवं इन्द्र के लिए अच्छे से अच्छा अभिषव कीजिए तथा उत्तम सोम से युक्त इस वर को ( यज्ञ को ) ऊर्जादि रसों से रसयुक्त बनाइए " - यह मन्त्रार्थ है । इस प्रकार पूर्वोक्त देवस्य त्वेत्यादि मन्त्र द्वारा ग्रावा उठा कर श्रध्वर्यु वाक् - संयमन करता है । अर्थात् ग्रावा उठाने के बाद अध्वर्यु को मौनव्रत धारण कर लेना चाहिए । प्रतएव कात्यायन कहते हैं--" देवस्य त्वेत्यद्रिमादाय वाचं यच्छति प्राग्विङ्कारात् " । " अथ वाचं यच्छति " । वाक् - संयमन क्यों किया जाता है? - इसकी उपपत्ति बतलाते हैं-( का ० श्री ० सू ० ६/५६ ) १ " यज्ञ - वितान करते हुए देवता लोग - असुरों और राक्षसों के आतंक से आक्रमण से डरने लगे । उन्होंने सोचा कि कहीं ऐसा न हो कि अपनी आवाज सुन कर असुरों के गुप्तचर अपना पता लगा लें एवं असुरों को खबर कर दें । यदि ऐसा हो जाएगा तो स्वभाव से ही दुष्ट असुर हमारा यज्ञ नष्ट कर डालेंगे | उन्होंने इस आपत्ति से बचने के लिए परस्पर सलाह की कि प्रपन चुपचाप धीरे - धीरे बोल कर यज्ञ करें । वाणी का संयम कर लें । न होगा बाँस न बजेगी बाँसुरी । जब ग्रसुरों को अपना पता ही नहीं लगेगा तो फिर वे आक्रमण किस पर करेंगे? आखिर देवताओं ने ऐसा ही किया । इस कथा का श्रध्यात्म - अधिभूत - प्रधिदैवत - तीनों से सम्बन्ध है । पृथिवी की वाक्- अनुष्टुप् कहलाती है । सौरी वाक्-बृहती कहलाती है । पारमेष्ठिनी वाक् प्राम्भृणी कहलाती है । स्वायंभुवी वाक् सत्या कहलाती है । इन चारों में से प्रकृत में अनुष्टुप् वाक् का सम्बन्ध है । अप्रा इ उ इत्यादि स्वर - वाक् बृहती से सूय्यं से सम्बन्ध रखती है । यही स्वरात्मिका सौरी वाक् प्रक्षर वाक् कहलाती है । एवं क च ट त - पात्मिका वर्ण वाक् पार्थिवी अनुष्टुप वाक् से सम्बन्ध रखती है । यही ' क्षरवाक् ' कहलाती है । यही हम बोलते हैं । अन्तरिक्ष में वायु में प्रासुरप्राण भरा रहता है । ये श्रासुरप्राण - पार्थिव प्राग्नेय प्राणदेवताओं द्वारा चन्द्र - सोमाहुति से होने वाले यज्ञ में बाधा डाला करते हैं । परन्तु पार्थिव वर्णवान् प्रनुष्टुप् वाक् प्रसुरों के आक्रमण से बचने के लिए अन्तरिक्ष तक पहुंचती ही नहीं । वह त्रिवृत् स्तोम तक ही रह जाती है । पञ्चदश में असुर हैं । उन्हें खबर भी नहीं होती कि पार्थिव प्रारण - देवता यज्ञ कर रहे हैं । यदि यह अनु-ष्टुप् वाक् प्रबल वेग से ग्रन्तरिक्ष तक चली जाती तो अधिक स्थान पा कर इसकी घनता जाती रहती और असुर प्रारण यज्ञ में घुस पड़ते । परन्तु वह वाक् उपांशु ही रहती है । त्रिवृत् तक ही घन रूप से १ ' शत ० ब्रा ० सायणभाष्य ३ | ६ | ४ | ६ | 1 [ ६४३ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० e ) शतपथ ब्राह्मरण श्रधिषवरण ब्राह्मण अपनी अभिव्यक्ति रखती है, अतएव श्रासुरप्राण को इस पार्थिव यज्ञ - मण्डल में घुसने का मौका नहीं मिलता, यही आधिदैविक वृत्तसंगति है । मनुष्य - देवताओं पर अफ्रिका निवासी असुर बार - बार आक्रमण किया करते थे । उनसे बचने के लिए देवता खास - खास नाजुक कामों को बहुत ही गुप्त रीति से करते थे । सोमाभिषव ही पर सारा यज्ञ अवलम्बित है, अतः इस समय वे वाक् - संयम कर लेते थे । ऐसा करने से उनका यज्ञ निर्विघ्न समाप्त हो जाता था । अन्न का नाम ही सोम है । जैसे मनुष्य कृत वैध यज्ञ में सोमाभिषव द्यावा - स्वरूप दाँतों से होता है, तथैव ग्रध्यात्म यज्ञ में मुख स्वरूप शिला पर रक्खे हुए अन्न का अभिषव दन्त स्वरूप ग्रावा से होता है । जिस समय ग्रावा को, अभिषव को उठाया जाता है - अन्न का चर्वण करने के लिए दाँत उठाए जाते हैं - उस समय अपने आप वाक् - संयम हो जाता है । यदि भोजन के समय बोलता रहता है तो चर्वणा क्रिया में बाधा पड़ती है एवं दाँतों का काम प्रांतों को करना पड़ता है । थोड़े ही दिन में अन्तडियाँ कमजोर हो जाती हैं, असुर का राज्य हो जाता है- दिव्यशक्तियाँ मारी जाती हैं । अतएव - अध्यात्म - यज्ञ करते समय ( भोजन करते समय ) वाक् - संयम करना बहुत ही अच्छा है । अपिच - यज्ञ में यदि जोर से बोला जाता है तो उससे एक लहर पैदा होती है, जो कि थोड़ी देर में गायब हो जाती है एवं उस पर तत्क्षण आन्तरिक्ष्य आसुर प्राण कूद पड़ता है । अतः इस समय वाक् - संयमन अवश्य ही कर लेना चाहिए । यदि बोले भी तो उपांशु बोलना चाहिए । क्यों कि उपांशु-वाक् अधिक दूर तक नहीं जाती । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-" श्रथ वाचं यच्छति । देवा ह वै यज्ञं तन्वानास्तेऽसुररक्षसेभ्य श्रासङ्गा-द्विभयाञ्चक्रुः । ते होचुः - उपांशु यजाम । वाचं यच्छामेति । तऽउपांश्वयजन् । वाचमयच्छन् ” ॥६ ॥
इसके अनन्तर निग्राभ्या पानी - इस स्थान पर ( हविर्धान के पास ) लाते हैं । जब निग्राभ्या पानी आ जाता है तो श्रध्वर्यु निम्नलिखित मन्त्र यजमान से बुलवाता है-" निग्राभ्यास्थ । देवश्रुतः । तर्पयत मा । मनो मे तर्पयत । वाचं मे तर्प-यत । प्राणं मे तर्पयत । चक्षुमें तर्पयत । श्रोत्रं मे तर्पयत । श्रात्मानं मे तर्पयत । प्रजां मे तर्पयत । पशून् मे तर्पयत । गणान् मे तर्पयत । गरगा मे मावितृषन् ” इति । ( वा ० सं ० ६।३१ ) हे आप! देवताओं में प्रसिद्ध होते हुए श्राप निग्राभ्या हैं - अर्थात् आप देवताओं में श्रेष्ठ - इन्द्र के वक्षस्थल में रहने के कारण " निग्राभ्या " नाम से व्यवहृत होते हैं - प्रतएव श्राप देवश्रुत ( देवताओं में [ ६४४ ] 1
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ९ ) शतपथ ब्राह्मण अधिषवणं ब्राह्मणं प्रसिद्ध ) हैं । ऐसे आप! मेरी इन्द्रियों को मुझे- मेरी प्रजा को मेरे पशुओं को एवं मेरे अनुचर वर्ग को -तृप्त कीजिए - रसयुक्त बनाइए । यहाँ पर आत्मा से प्रज्ञानात्मा अभिप्रेत है । क्यों कि तृप्ति होना- भूखे रहना आदि सब इसी के धर्म हैं । इस प्रज्ञानात्मा की पाँच रश्मियाँ ही भिन्न - भिन्न द्वार से निकल कर - मन ( इन्द्रियमन ) - वाक्-प्रारण चक्षु श्रोत्र - इन नामों से व्यवहृत होने लगती हैं । पहले " मनो मे तर्पयत " इत्यादि से इन्हीं को तृप्त करने की प्रार्थना की गई है । बाद में आत्मा के लिए कहा है- फिर पुत्र - पौत्रादि के लिए कहा है । उसके बाद पशुओं के लिए कहा है । अन्त में गरण के लिए भृत्यवर्ग के लिए कहा है । इन्द्रियाँ - प्रजा - पशु तीनों तो आत्मा का साथ प्रायः नहीं छोड़ते, परन्तु अनुचर वर्ग कभी साथ छोड़ भी देता है । अतएव -' ' गरणा मे मा वितृषन् ' ' विवृद्धतृष्ण ' न हो जाए अर्थात् उनकी तृष्णा न बढ़ जाए । हम तो इतने रुपयों के बिना नहीं रह सकते " ऐसे भाव उत्पन्न न हो जाएँ, नहीं तो वे हमारे पास न रहेंगे । से पानी रस - रूप है । पानी में जैसा तृप्त करने का धम्मं है - वैसा और किसी में नहीं है, अतः उसी यह ' आशी: माँगी गई है-" रसो वाऽप्रापः । तास्वेवैतामाशिषमाशास्ते " । मन - प्राण प्रादि पाँचों को मिला कर याज्ञवल्क्य कहते हैं-" सर्वं च मे । ( अर्थात् मनश्च मे वाक् च मे प्रारणश्च मे चक्षुश्च मे श्रोत्रं च मे तर्पयत ) - श्रात्मानं तर्पयत । प्रजां तर्पयत । पशून् में तर्पयत । गणान् मे तर्पयत । गणा मे मा वितृषन् " इति । उपांशु - ग्रहों के लिए इस सोम का अभिषव किया जाता है । सोम को कूट कर जो रस निकालते हैं- उसे ४० ( चालीस ) पात्रों में रख देते हैं । ये चालीस पात्र ' ग्रह ' कहलाते हैं एवं इन चालीस से आहुति दी जाती है । इसी को उपांशु ग्रह याग कहते हैं जिसकी कि इतिकर्तव्यता चौथे काण्ड में बत-लाई जाएगी । इस ' उपांशु - ग्रह - याग ' में काम आने वाला जो सोम है - वह ' उपांशु ' कहलाता है । एवं लोढी ' अन्तर्थ्याम ' कहलाती है - शिला ( सिल्ला ) ' उपांशु - सवन ' कहलाती है । इस उपांशु - सवन पर उपांशवन्तर्य्याम ( उपांशु सोम का अभिषव ) होता है । प्रकृति में जो सूर्य दिखलाई पड़ता है - वह व्यान है । एवं सूर्य्य से नीचे की ओर आने वाला सौर- प्राण, प्राण कहलाता है एवं वही प्रारण पृथिवी की वस्तु बन कर अपान कहलाने लगता है । प्राणा-पान की जो सन्धि होती है उसे व्यान कहा जाता है - जैसा कि छान्दोग्य श्रुति कहती है-" अथ यः प्राणापानयोः सन्धिः स व्यानः " । ( छा ० ब्रा ० ५।३।३ ) सूर्य से ही प्राण चलता है वहीं पर आ कर ठहरता है । सन्धि से मध्यस्थान अभिप्रेत है । मध्य-स्थान को ही हृदय कहते हैं । एवं जहाँ से मनोवृत्ति का उपक्रम होता है एवं जहाँ पर उसका उपसंहार [ ६४५ ] 1
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तृतीय काण्ड ( ० ) शतपथ ब्राह्मण अधिषवण ब्राह्मण होता है - वही हृदय कहलाता है । इस प्रकार " उपक्रमोपसंहार स्थानो व्यानः " यह तात्पर्य निकल प्राता है । सूर्य ही प्राण का उपक्रम है एवं सूर्य्य ही प्राण का उपसंहार है । उसी से प्रारण निकलता है एवं उसी में लीन होता है, अतएव इस ' विवस्वान् ' को इस संवत्सर यज्ञाधिष्ठाता सूर्य्य को - हम " व्यान " कहने के लिए तय्यार हैं । यहाँ पर जो उपांशु सवन है - उस पर प्राणरूप सोम का उपक्रम होता है- वहीं उपसंहार होता है । उसी पर सोम रक्खा जाता है- रख कर वहीं उसका संहार कर दिया जाता है । " प्राण- स्थानीय सोम की अन्तिम प्रतिष्ठा यही उपांशु सवन है, अतएव निदानेन संकेतेन हम इस उपांशु-सवन को " व्यान " कहने के लिए तय्यार हैं । श्रपिच - प्रकृति - यज्ञ प्राणापानरूप है एवं वही यज्ञ संवत्सर - यज्ञ कहलाता है । सूर्य्य प्राणापान-रूप उस संवत्सर - यज्ञ के ठीक बीचों - बीच रहने के कारण - " अथ यः प्राणापानयोः सन्धिः स व्यान: १ लक्षणे लक्षित व्यान कहलाता है । तथैव गार्हपत्य स्वरूप अपान एवं ग्राहवनीय स्वरूप प्राणरूप यज्ञ के बीच में हविर्धान के पास चूंकि यह उपांशु सवन प्रतिष्ठित रहता है, अतएव निदानेन हम इसे ' ध्यान ' कहने के लिए तय्यार हैं । निदानेन यह उपांशु - सवन विवस्वानादित्य है- सूर्य्य है । जैसे संवत्सर - यज्ञ का विवस्वान् आदित्य व्यान है तथैव हमारे इस वैध यज्ञ का - यह उपांशु - सवन ही व्यान है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर याज्ञवल्क्य कहते हैं --" स य एष उपांशुसवनः स विवस्वानादित्यो निदानेन । सो अस्य ( यज्ञस्य ) एष ( उपांशु - सवनो ) व्यानः " ॥७ ॥
वह अध्वर्यु - उपांशुसवन के ( व्यान के ) ऊपर उस सोम को नापता है । सोम की पूलियाँ बँधी रहती । उनकी इस शिला के ऊपर शिलामान से नापते हैं । शिला, व्यानरूप है । इससे नापना - सोम में व्यान का सम्बन्ध कर उसे जीवित करना है । प्राण और अपान से जीवन नहीं रहता अपितु व्यान से ही जीवन रहता है । इसीलिए श्रुति कहती है-" न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन । इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ” ॥ ( कठ ० उप ० २१२।५ ) ऋत्विक् लोग जो कि इस सोम को कूटते हैं - वे इसे मारते हैं । इसका प्राणापान निकालते हैं । परन्तु ग्रावा से इसको मारते हैं - प्रतः वह मरता नहीं अपितु ग्रावा सोम से वापस उठ जाता है- जीवित हो जाता है । इस प्रकार जो प्रारण इसका निकल जाता है वह तो उससे ( ग्रावा से ) प्रा जाता है, परन्तु व्यान तो नहीं आता एवं व्यान बिना यह प्रारण बेकार है । बस, उस व्यान के लिए ही उपांशु - सवन पर इसको प्रादेशमित मात्रा से नापते हैं । प्रत्येक प्रारण, प्रादेशमित होता है, अतएव " प्रादेशमितो वै प्राणः.112 " १ ' छा ० ब्रा ० ५।३।३ ' । २ ' को ० ब्रा ० २।३ ' । [ ६४६ ]