Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 661–670
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 661–670
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तृतीय काण्ड ( ० 8 ) शतपथ ब्राह्मणे अधिषवण ब्राह्मण यह कहा जाता है | कण्ठ से हृदय तक प्राण रहता है - यह स्थान भी प्रादेश ( १०३ अंगुल ) मात्र ही है । हृदय से नाभि तक व्यान रहता है - यह स्थान भी प्रादेशमात्र है । नाभि से गुदा तक प्रपान व्याप्त रहता है - यह भी प्रादेशमात्र ही है । " प्रादेशमितः प्राणः " यह सिद्धान्त है । आज व्यान नाम के प्रारण का इस सोम से सम्बन्ध करना है । एवं वह है - प्रादेश मात्र । अतएव उस सोम को शिला के ऊपर प्रादेशमात्र नापते हैं । व्यान नाम के प्राणाधान के लिए ही इसे नापते हैं-" तमभि ( उपांशुसवनमभि - तस्योपरि ) मिमीते । ( किमर्थम् ) । घ्नन्ति वानमेतद्यदभिषुण्वन्ति । तमेतेन घ्नन्ति । तथा त उदेति । तथा संजीवति " । अथवा - इसका अर्थ निम्नलिखित समझना चाहिए-उपांशु - सवन भी तो अश्ममय ही होता है । सोम का जो अभिषव होता है, उससे उसके प्राण निकल जाते हैं । परन्तु उपांशु सवन रूप सोम के ऊपर नापने से वह फिर जीवित हो जाता है । अतएव इस पर नापते हैं । अपिच - जिस लिए कि नापते हैं - उसका प्रयोग और भी है । इस वैध यज्ञ की बात करते हुए उस प्राकृतिक यज्ञ की ओर लक्ष्य रखते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यह अध्वर्यु सोम को उपांशु - सवन पर नाता है, अतएव मनुष्यों में मात्रा है । तात्पर्य्यं यही है कि मनुष्य का निर्माण सोमाहुति से ही होता है । वीर्य्यं ही सोम है | वही योनिगत अग्निमय रुधिर में प्राहुत हो कर गर्भ रूप में परिणत होता है । योनि में सुत सोम ही बाहर पुत्ररूप से निकलता है, अतएव लड़के को " सुत " कहा जाता है । यह सुत-सोम ग्राठ भागों में विभक्त होता है एवं प्रत्येक भाग १०३ अंगुल में अभिव्याप्त रहता है । वह सोम - प्राण आठ प्रदेशों में विभक्त हो कर पुरुष - संस्था का निर्माण करता है । ब्रह्मरन्ध्र से कण्ठ तक एक प्रादेश है । कण्ठ से हृदय तक दूसरा प्रादेश है । हृदय से नाभि तक तीसरा प्रादेश है । नाभि से मूलाधार तक चौथा प्रादेश है । कटि से घुटने तक पाँचवाँ - छठा - दो प्रादेश हैं । घुटने से पैरों तक - सातवाँ एवं आठवाँ -दो प्रादेश है । इस प्रकार वही सोम प्रादेशमित हो कर - प्राठ मात्रानों में विभक्त हो कर - मनुष्य का निर्माण करता है । आठ मात्राएँ - आर्ट अक्षर हैं । अष्टाक्षर छन्द गायत्री कहलाता है । बस - इस गायत्री से ही यच्चयावत् मनुष्य बने हुए हैं । सब में ये ही आठ मात्राएँ हैं, अतएव ' गायत्र्या ब्राह्मणं निरवर्तयत् ' कहा जाता है । ब्राह्मण मनुष्य मात्र का उपलक्षण समझना चाहिए । मनुष्यों में हम ग्राठ मात्रा - विभाग देखते हैं । यह वही सोम है । प्रकृति के प्राण देवता सोम को प्रादेशयुक्त मात्रा में परिणत करके ही अध्यात्म जगत का निर्माण करते हैं । उसी अष्टमात्राश्रित सोम से सारा शरीर बना है । चूंकि हमें भी सोम से दिव्यात्मा बनाना है एवं आत्मा सोम मात्रा पर निर्भर है श्रतएव हमें " प्रकृतिवत् " यहाँ भी सोम को अवश्य ही नापना चाहिए । भगवान् याज्ञवल्क्य बतलाते हैं - प्राकृतिक यज्ञ विज्ञान - परन्तु शब्द बोलते है इस यज्ञ के अनुकूल । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यह अध्वर्यु इसलिए सोम नापता है कि मनुष्यों में सोम की मात्रा है । इसका अर्थ केवल यही है कि प्रकृति का अध्वर्यु सोम नापता है - इसका प्रत्यक्ष [ ६४७ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण श्रधिषवरणं ब्राह्मण प्रमाण मनुष्य - शरीर गत सोममात्रा है । यद्वै देवा अकुर्वंस्तत् रूपाणि " यह मान्य सिद्धान्त है - श्रतएव हमें भी सोम की मात्रा अवश्य ही नापनी चाहिए-" यद्वेव मिमीते - तस्मान्मात्रा मनुष्येषु । मात्रो यो चाप्यन्या मात्रा || ८ || सोम को उपांशु सवन पर प्रादेशमित क्यों किया जाता है? क्यों नापा जाता है? इसकी उप-पत्ति बतला दी गई । अब पद्धति बतलाते हैं - वह अध्वर्यु -" इन्द्राय त्वा वसुमते रुद्रवते इन्द्राय त्वादित्यवते - इन्द्राय त्वाभिमाति-न श्येनाय त्वा सोमभृतेऽग्नये त्वा रायस्पोषदे " । ( वा ० सं ० ६ । ३२ ) यह मन्त्र बोलता हुआ सोम को नापता है । वसु - रुद्र प्रादित्य- कुल ३१ ( इकतीस ) देवता हैं । ८ ( ग्राठ ) वसु हैं ११ ( ग्यारह ) रुद्र हैं -१२ ( बारह ) श्रादित्य हैं | वसुत्रों के लिए प्रातःसवन होता है- रुद्रों के लिए माध्यन्दिन सवन किया जाता है-एवं प्रदित्यों के लिए सायं सवन किया जाता है । तीनों में यज्ञ बँटा हुआ है । यज्ञ का सूर्य से सम्बन्ध है । सूर्य्यं प्रातः - सायं - मध्याह्न - तीनों में मौजूद हैं । सूर्यामृत प्राण का नाम ही इन्द्र है । अतएव तीनों सवनों में इन्द्र का श्राधिपत्य सिद्ध हो जाता है । इसीलिए मन्त्र श्रुति कहती है-" प्रातः सुतमपिबो हर्यश्व माध्यन्दिनं सवनं केवलं ते । समृभुभिः । पिबस्व रत्नधेभिः " । ( ऋग्वेद मं ० ४।३५।७ ) श्रतएव हम-" इन्द्रो वै यज्ञस्य देवता " । यह कहने के लिए तय्यार हैं । इन्द्र देवता सवनत्रय में विभक्त सारे यज्ञ में प्रभिव्याप्त है । अत-एव तीनों के साथ इन्द्र का सम्बन्ध जोड़ा जाता है । यदि कोई राजा मय अपने अनुचरों के किसी अन्य राजा के यहाँ जाता है तो वहाँ उसका बहुत स्वागत होता है । उसके लिए उसके निवास स्थान पर ही नाना पदार्थ भेजे जाते हैं । उन भेजे हुए पदार्थों में सब में राजा की प्रधानता रहती है । इस मेह-मानी में दो सीगे हैं - ( १ ) एक तो श्रम ( २ ) दूसरा, खास कितने ही पदार्थ ग्राम होते हैं उनका अनुचर सेवन करते हैं परन्तु कितने ही पदार्थ खास होते हैं- उनका सेवन राजा जी ही करते हैं । एवं एक तीसरा दर्जा और होता है । प्रनुचरों से अलावा राजा के पास एक अपना निजी संघ और रहता है । भाई -बेटे-जागीरदार इत्यादि इसी संघ में दाखिल हैं । इनके लिए अलग ही पदार्थ होते हैं । इस प्रकार ग्राम, ग्राम खास और खास मेहमानी में ये तीन सीगे होते हैं । जो ग्राम और खास है- इन दोनों में प्रधानता राजा की ही रहती है । जब अनुचरों के लिए कोई पदार्थ भेजना पड़ता है तब " फलाने अनुचरों के अधिपति के पास इतनी सामग्री भेज दो " यही कहा जाता है । भेजा जाता है अनुचरों के लिए परन्तु राजा का नाम [ ६४८ ]
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तृतीय काण्ड ( ० ) शतपथ ब्राह्मण अधिषवरण ब्राह्मण साथ रहता है । एवमेव आमखास वालों के साथ भी राजा का नाम रहता है । बस, पूर्व के मन्त्र से यही व्यवस्था बतलाई जाती है । वसु रुद्र- ये इन्द्र की आम प्रजा हैं । वसु पार्थिव देवता हैं - रुद्र, आन्तरिक्ष्य देवता हैं । दोनों पर द्युलोकस्थ इन्द्र का शासन रहता है । दोनों इसकी प्रजा हैं । अतएव इन दोनों को एक सीगे में बाँटती हुई मन्त्र श्रुति कहती है-“ इन्द्राय त्वा वसुमते रुद्रवत इति " । यद्यपि देना - वसु और रुद्र प्रजा को है, परन्तु प्रधानता इन्द्र की ही रहती है । यज्ञ के देवता इन्द्र ही हैं - प्रतएव " इन्द्रायत्वा " यह कहा गया है । इसी पहले विभाग की व्यवस्था का स्वरूप बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं-" इन्द्रो वै यज्ञस्य देवता । तस्मादाह - " इन्द्रायत्वेति " । दूसरा विभाग है - श्रामखास का । आदित्य, दिव्यलोक के देवता हैं । जिस जगह इन्द्र रहते हैं वहीं उसके पास ही १२ ( बारह ) आदित्य रहते हैं । इन्द्रवत् - आदित्य की भी वसु - रुद्र प्रजा पर हुकूमत रहती हैं, अतः इनकी अपेक्षा से यह खास है । परन्तु इन्द्रापेक्ष्य आम हैं अतएव श्रादित्य प्रजा को हम " आम-खास ' ' कहने के लिए तय्यार हैं । इसीलिए आदित्यों को रुद्र और वसु - सामान्य प्रजा से अलग बाँट कर दिया जाता है । यद्यपि देते हैं आदित्यों के लिए ही परन्तु प्राधान्यात् राजा का नाम लगा दिया जाता है । इससे इन्द्र के अनु - उन प्रादित्यों को - पश्वाद्भागी बनाते हैं अर्थात् आदित्यों को प्रधान न रख कर इन्द्र को ही प्रधान रखते हैं - तद् द्वारा आदित्यों को शामिल करते हैं-" तदिन्द्रमेवान्वादित्यानाभजति " । तीसरा विभाग है - खास । कितने ही पदार्थ ऐसे होते हैं, जो खास राजा की ही भेंट किए जाते हैं । वह उनकी खास मिजमानी होती है । उसमें न ग्राम प्रजा शामिल रहती है, न खास प्रजा शामिल रहती है । इसी अभिप्राय से तीसरा मान केवल इन्द्र के लिए ही किया जाता है । इसी तीसरे विभाग का प्रतिपादन करती हुई मन्त्र श्रुति कहती है " इन्द्राय स्वाभिमातिघ्न " - १ ( असपत्न इन्द्र से लिए ) यह मान करता हूं । मन्त्र का अर्थ करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं- जो सपत्न ( शत्रु ) होता है - वही अभिमाति कहलाता है । इस अभिमातिघ्न से ' सपत्नघ्नेभ्यः ' यही कहना है । जिस प्रकार मेहमानी में आए हुए किसी राजा का अथवा श्रेष्ठ पुरुष का प्रातिविक एक खास हिस्सा होता है - उसमें और किसी का हिस्सा नहीं होता तथैव अभिमाताओं के मारने के कारण सर्वश्रेष्ठ इग्द्र के लिए खास उद्धार ( विभाग ) है । इसका यह उद्धार ( विभाग ) वसु-रुद्रादि देवताओं से सर्वथा पृथक् है । यह इसका अपना असाधारण हिस्सा हैं- इसमें और देवता शामिल नहीं हो सकते -१ ' वा ० सं ० ६।३२ ' । [ ६४६ ]
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तृतीय काण्ड ( ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण अधिषवण ब्राह्मण " सपत्नो वाभिमाति । इन्द्राय त्वा सपत्नघ्नऽइत्येवैतदाह । सोऽस्यो-द्वारो यथा श्रेष्ठस्योद्वारः । एवमस्यैष ऋते देवेभ्यः " || ९ || इसके बाद " श्येनाय त्वा सोमभृते ” – १ सोमभृत श्येन के लिए तुम्हारा मान करता हूं । इससे गायत्री देवता के लिए ही मान करता है-इसके अनन्तर - शुद्ध अग्नि के लिए-" तद् गायत्र्यै मिमीते ” । " अग्नये त्वा रायस्पोषदे " । ( वा ० सं ० ६ । ३२ ) इससे मान करते हैं । यदि कोई मनुष्य अपने स्वामी का खास ऐसा काम कर देता है जिसके बिना कि राजा की सत्ता ही उखड़ने का भय था - ऐसे मनुष्य पर राजा प्रत्यन्त प्रसन्न हो जाता है एवं उसे औरों की अपेक्षा डबल इनाम देता है । इस पार्थिव गायत्री ने बाज बन कर द्युलोक से सोम ला कर पार्थिव प्राग्नेय प्राणस्वरूप देवताओं की रक्षा की थी एवं आज भी कर रही है । यदि गायत्री सोम न लाती तो अग्नि - स्वरूप देवताओं की सत्ता ही नहीं रहती । द्युलोक से सोम लाई थी - प्रतएव वह सोमभृत् कहलाई- द्युलोक कौन सा है - गायत्री किसे कहते हैं - यह बाज कैसे बनी - सोम कैसे लाई? - इत्यादि विषयों की वैज्ञानिक उपपत्ति तृतीय काण्ड के सोमाख्यान ब्राह्मण में देखनी चाहिए । यहां पर केवल इतना ही कहना है कि पार्थिव श्रग्नि का नाम ही गायत्री है - यही सोम लाई थी । श्रतएव इसी वीर्य के कारण-पराक्रम के कारण - दो वक्त मान करते हैं । एक बार श्येनरूप से करते हैं- दूसरी बार स्व - रूप से करते हैं । करते क्या हैं - प्राकृतिक यज्ञ में ऐसा ही हो रहा है । प्राकृतिक यज्ञ में - श्येन - गायत्री के लिए भी सोम का मान हो रहा है एवं पार्थिव शुद्ध अग्नि के लिए भी मान हो रहा है । पृथिवी में रहने वाला अग्नि, अग्नि ही है । दोनों में सोम मौजूद है । अतएव यहाँ भी दो बार ही सोम - मान करते हैं । इसी प्राकृतिक विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहते हैं-" ये त्वा रायस्पोषदे । अग्निवें गायत्री । तद् गायत्र्यै मिमीते । स यद् गायत्री श्येनो भूत्वा दिवः सोममाहरत् तेन सा श्येनः सोमभृत् । तेनैवास्या एतत् वीर्येण द्वितीयं मिमीते ॥१० ॥
इस प्रकार पूर्वोक्त मन्त्र से उस सोम का उपांशु - सवन पर पाँच बार मान करता है । यहाँ पर पांच बार सोम का मान क्यों किया जाता है? - इसकी उपपत्ति बतलाते हैं-' वा ० सं ० ६।३२ ' | " अथ यत् पञ्चकृत्वो मिमीते - ( तदुच्यते ) " । [ ६५० ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ) शतपथ ब्राह्मण श्रधिषवण ब्राह्मण प्राकृतिक यज्ञ संवत्सर सम्मित है अर्थात् - यज्ञाभिव्याप्ति संवत्सर तक ही है । पार्थिव प्राणाग्नि का नाम ही यज्ञ है । यह यज्ञ २१ ( इक्कीस ) तक रहता है । इसी का नाम रथन्तर साम है । इस साम-मण्डल का नाम ही संवत्सर - मण्डल है । बस, सारा श्रग्नि - यज्ञ संवत्सर - सम्मित हो रहा है अर्थात् संवत्सर से बाहर यज्ञ नहीं है अपितु संवत्सर जितना ही है । अतएव " संवत्सरो वै यज्ञः " यह कहा जाता है । इस संवत्सर - यज्ञ की - वसन्त- ग्रीष्म - वर्षा - शरत् - हेमन्त - ये पाँच ऋतुएँ होती हैं । चूँकि उसी प्राकृतिक संवत्सर यज्ञ की अनुकृति पर हमारा यह वैध - यज्ञ वितत होता है एवं प्राकृतिक यज्ञ पाङ्क्त है - पञ्चावयव है-पञ्चावयव सम्पत्ति को प्राप्त करने के लिए यहाँ भी पाँच बार ही सोम - मान करना चाहिए । प्रकृतियज्ञ में चूँकि यही सोम, वसन्तादि पाँच ऋतुओं में विभक्त हो रहा है अतः पाँच को पाँच से पकड़ कर संवत्सर को प्राप्त करने के लिए यहाँ पर भी पाँच ही बार सोम- मान करना चाहिए । बस इसीलिए पाँच बार सोम - मान करते हैं --" संवत्सरसंमितो वै यज्ञः । पञ्च वाऋतवः संवत्सरस्य । तं पञ्च-भिराप्नोति । तस्मात् पञ्चकृत्वो मिमीते " ॥११ ॥
इसके बाद निम्नलिखित मन्त्र बोलते हुए पञ्चधामित सोम का स्पर्श करते हैं-" यत्ते सोम दिवि ज्योतिर्यत् पृथिव्यां यदुरावन्तरिक्षे । तेनास्मै यजमानयोरु राये क्रुद्धचधि दात्रे वोचः " ॥ ( वा ० सं ० ६।३३ ) स्वयम्भूप्रारण ' ऋषि ' कहलाते हैं - पारमेष्ठी प्रारण ' पितर ' कहलाते हैं - सौरप्रारण ' देवता ' कहलाते हैं - चान्द्रप्राण ' गन्धर्व ' कहलाते हैं पार्थिवप्रारण ' मनुष्य ' कहलाते हैं । इन पाँचों की उत्पत्ति क्रमश: है । पहले स्वयम्भू - मण्डल का प्रादुर्भाव होता है बाद में परमेष्ठिमण्डल उत्पन्न होता है । तदनन्तर सूर्य उत्पन्न होता है । पश्चात् पृथिवी उत्पन्न होती है - पश्चात् चन्द्रमा उत्पन्न होता है । इन पाँचों में जो परमेष्ठि-मण्डल है- उसके " भृगु " और " अङ्गिरा " ये दो मनोता हैं । भृगु का नाम सोम है - प्रङ्गिरा अग्नि है । सूर्य जब उत्पन्न नहीं हुआ था उसके पहले ही सोम उत्पन्न हो गया था । सूर्य्यं परमेष्ठी के बाद में उत्पन्न होता है, अतएव मानना पड़ता कि मनोता रूप सोम भी सूर्य से पहले ही उत्पन्न हुआ है । सूर्य अग्नि का गोला | अग्नि का धर्म है - सोम को खाना । सोम से ही अग्नि की सत्ता रहती है । कापड है । इसमें उस पारमेष्ठ्य सोम की अनवरत आहुति होती रहती है । अतएव " सूर्यो ह वा अग्निहोत्रम् " यह कहा जाता है । सूर्य में जो प्रकाश दिखलाई पड़ रहा है - वह इसी सोम की महिमा है । सूर्य्य अपने स्वरूप से आबनूस के माफिक काला है । इसीलिए तो -" श्री कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मत्यं च " । ( ऋग्वेद मं ० १।३५।२ ) यह कहा जाता है । परन्तु सोम दाह्य पदार्थ है । यह अग्निरूप दाहक सूर्य में आहत होते ही भभक उठता है । बस, यही प्रकाश है । सूर्य्य में जो प्रकाश दिखलाई पड़ रहा है - वह इसी सोमाहुति की [ ६५१ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण विवरण ब्राह्मण महिमा है । इसीलिए - " त्वं ज्योतिषा वि तमो ववर्थ " " यह कहा जाता है । सौर प्राण का नाम ही देवता है जैसा कि हम बतला आए हैं । अतएव श्रुति कहती है-" चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुमित्रस्य वरुणस्याग्नेः " इति । ( ऋग्वेद मं ० १।११५।१ ) यह सौर- प्राण - देवता अर्थात् सूर्य की रश्मियाँ इस सोम को हर वक्त चूसा करती हैं । जो वस्तु-सशरीरी सायतन होती है - वह सत्य कहलाती है । जितने भी पिण्ड हैं - वे इसी परिभाषा के अनुसार - सत्य कहलाते हैं । एवं जो अशरीरी पदार्थ हैं - वे ' ऋत ' नाम से व्यवहृत होते हैं । ऋतं पदार्थ सर्वत्र चारों ओर फैला रहता है एवं सत्य पदार्थ मर्यादित रहता है । जिस ' भृगु सोम " का हम जिकर कर आए हैं वह सोम घन- तरल - विरल भेदेन आप वायु सोम- तीन स्वरूपों में परिणत हो जाता है । ये तीनों ही अशरीरी - अनायतन होने से ' ऋत ' कहलाते हैं । ये चूंकि उत्पन्न परमेष्ठी में होते हैं, अतएव श्रुति कहती है-" ऋतमेव परमेष्ठि ऋतं नात्येति किञ्चन । ऋते समुद्र आहितः ऋते भूमिरियं श्रिता " इति ॥ ( तै ० ब्रा ० १५५ १ ) यह ऋत - सोम चारों ओर फैला रहता है - इससे खाली कोई भी स्थान नहीं है । चूंकि इस ऋत सोम से खाली कोई भी दिक् नहीं है, अतएव इस निरायतन सोम को ' दिक् - सोम " कहा करते हैं । एक सायतन सोम और होता है । चन्द्रमा सायतन सोम है । सायतन " भास्वर सोम " नाम से प्रसिद्ध है । इसका प्रकृत से चूंकि कोई सम्बन्ध नहीं है, अतएव इसके विषय में हमें कुछ नहीं कहना । कहना है-' केवल दिक् - सोम के विषय में । यह दिक् - सोम पहले सूर्य से ऊपर था । बाद में सूर्य के उत्पन्न होते ही यह सूर्य में कूदा एवं सूर्य्य के नीचे - ऊपर चारों ओर व्याप्त हो गया । इतना ही नहीं - प्रपितु अपने ऋतभाव के कारण सौर प्रारण सत्ता से भी नीचे तक पृथिवी अन्तरिक्ष सर्वत्र अभिव्याप्त हो गया । पहले सौर प्रारणरूप देवताओं में प्राहुत हुआ । तदन्तर पृथिवी अन्तरिक्ष में सर्वत्र व्याप्त हो गया । इस प्रकार देवताओं का हवि, ऋतसोम तीनों लोकों में व्याप्त हो गया । परन्तु सोम चूँकि अग्नि की ओर अनुगत रहता है, अतएव सूर्य के आकर्षण से वह नहीं बचता । चाहे सोम कहीं भी हो, उसी समय सौर प्राण अग्नि में इन्द्र उसे चूस जाएगा । स्प्रिट, ईथर, राल, तारपीन - इत्यादि पदार्थ सोम - स्वरूप हैं । जो पदार्थ श्राहुत हो कर अग्नि बन जाए, वही सोम कहलाता । इस लक्षण के अनुसार हम पूर्वोक्त पदार्थों को सोम कहने के लिए तय्यार हैं । इन पदार्थों को आप खुले मैदान में रख दीजिए थोड़ी ही देर में सौर प्रारण इन्द्र सबको सोख जाएगा । सोम इन्द्र की खुराक है । जहाँ सोम मिला कि इन्द्र ने उसे स्वाहा किया । यद्यपि सोमसूर्थ्य - पिण्ड से हट कर पृथिवी अन्तरिक्ष में चला गया था, परन्तु सूर्य ने वाक् द्वारा सबको फिर अपने में प्राहुत कर लिया । जिन स्वयम्भू आदि का हमने ऊपर स्वरूप बतलाया है - वे अधियज्ञ १' ऋग्वेद मं ० १।६१।२२ ' | [ ६५२ ] '
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण अधिषवरण ब्राह्मण परिभाषा में प्राण - आप- वाक् - अन्नाद अन्न इन नामों से व्यवहृत होते हैं । सूर्य्य की वाक् - कला, स्वयम्भू-प्राण है- परमेष्ठी, आप है -सूर्य्य, वाक् है - चन्द्रमा, अन्न है - पृथिवी, अन्नाद है । पाँचों में से- प्रकृत में वाङ्मय सूर्य ही से सम्बन्ध है । सूय्यं वाङ्मय है । सूर्य का गोला तो अपने स्थान पर ही रहता है । परन्तु यह वाक् सूर्य्य के गोले से बड़ी दूर तक - ३३ ( तेतीस ) तक वितत रहती है । इसी वाङ् मण्डल को " बृहस्पति साम " कहते हैं । इस वाक् के पेट में - पृथिवी - प्रन्तरिक्ष- द्यौ - सब का सब समा जाता है । इसी वाक् के कारण त्रैलोक्य में व्याप्त सोम- हविर्भूत सोम- सौर- देवताओं में प्राहुत होता रहता है । यदि वाक् न होती तो हवियों से अलग हुआ सोम, त्रिलोकी में व्याप्त हुआ सोम, सूर्य्य में श्रर्थात् सूर्य्यगत प्रारण - देवताओं में कभी भी वापस नहीं आता । क्यों कि सूर्य्यं स्वयं मर्त्यपिण्ड है- वह दूसरी जगह हर्गिज नहीं जा सकता । परन्तु अमृतावाक् ३३ ( तेतीस ) तक जाती है । अतएव वह सोम इस वाक् के जरिए खिंचा हुआ देवताओं, में आ जाता है । सारा ही सोम त्रिलोकी में नहीं जाता, अपितु कुछ सूर्य्य में भी रहता है । यदि सौर- देवता का सारा ही सोम चला जाता तो प्रकाश ही न होता । प्रकाश तो दूर रहा - सूर्य्यं ही न रहता । अतः उसमें अवश्य ही सोम - सत्ता माननी पड़ती है । परन्तु जो सोम त्रिलोकी में व्याप्त हो गया था उससे इसमें कमी हो गई थी । यह अधूरापन इसी वाक् से मिटता है । वाक् से - पराङ्मुख हुआ सारा सोम प्रत्यङ्मुख हो जाता है । इस प्रकार प्रारण देवता सौर सोम से युक्त होते रहते हैं । इसी प्राकृतिक विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-सूर्य्यं सृष्टि के प्रारम्भ में ( जब कि सूय्यं बना ही था ) यह पारमेष्ठ्य सोम - देवताओं का हवि बना था - उस समय सोम ने विचार किया कि कोई ऐसा उपाय करना चाहिए, जिससे अपन सर्वात्मना इन देवताओं के हवि बनें । ऐसा न हो कि देवता अपने को जरा भी बाकी छोड़ें । यह विचार कर उस सोम ने पृथिवी अन्तरिक्ष द्यौ - इन तीनों लोकों वाले तीन तनू - इन तीनों लोकों में जमा कर दिए । देव-ताओं के डर से सोम ने अपने तीन हिस्से त्रैलोक्य में छुपा दिए । एक हिस्सा सोम सूर्य में रहता है । तीन हिस्से त्रिलोकी में व्याप्त रहते हैं - यही अभिप्राय है-" यत्र वाडएषोऽग्रे देवानां हविर्बभूव । तद्ध ( तत्रह ) ईक्षांचक्रे ( विचारित-वान् ) मैव सर्वेणेवात्मना देवानां हविर्भूवमिति । ( इति विचार्य ) स एतास्ति-स्तनूरेषु लोकेषु विन्यधत्त ( विभज्य स्थापितवान् ) " ॥१२ ॥
भला, सोम की यह चालाकी देवताओं से कैसे छिपी रह सकती थी? देवताओं ने सोम की सारी कार्यवाही पहचान ली । उन्होंने इसी " वाक् " के जरिए सोम के उन तीनों विभागों को प्राप्त कर लिया । इस प्रकार वाक् द्वारा वह सारा सोम ही इन सौर प्रारण देवताओं का हवि बन गया । सौरी वाक् द्वारा ( जो मन्त्रनिर्माण करने के कारण मन्त्रवाक् भी कहला सकती है ) त्रैलोक्य में व्याप्त सोम इसी सूर्य में ग्राहुत होता रहता है- यही तात्पर्य है— " तद्वै देवा अस्पृण्वत ( ज्ञातवन्त ) तेऽस्य एतेनैव ( वाग्बलेनैव योगाकर्ष-नैव ) एतास्तनूराप्नुवन् । स कृत्स्न एव देवानां हविर्भवत् " । [ ६५३ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण अधिषवरण ब्राह्मण यह है - प्राकृतिक यज्ञ की स्थिति । प्राकृतिक प्रारण देवता इस वाक् द्वारा सौर सोम को हवि बनाए हुए हैं । आज उसी यज्ञ की नकल पर यह यजमान यज्ञ करना चाहता है, अतएव सोम का अभि-व करना चाहता है । परन्तु यह सोम अधूरा है । अभी इसका हिस्सा अन्तरिक्ष में और है । अधूरे सोम से किया हुआ यज्ञ सुसम्पन्न नहीं हो सकता । इस अधूरेपन को मिटाने के लिए यह अध्वर्यु मन्त्र - वाक् का प्रयोग करता है । मन्त्र - वाक् उसी सौरी वाक् से निष्पन्न होने के कारण तत्स्वरूप ही है । जैसी उच्चा-वच लहर - उस वाक् की है वैसी ही उच्चावच लहर युक्त इस उदात्तानुदात्तस्वरित प्रयुक्त मन्त्रवाक् प्राधिदैविक सोम - प्राण पकड़ में आ जाता है । इस प्रकार इस पूर्वोक्त मन्त्र - वाक् से यह अध्वर्यु सारे सोम की इस सोम में शामिल कर देता है । वाक् द्वारा सोम - प्राण अध्वर्यु में आता है एवं अपने शरीर की बिजली से स्पर्श द्वारा वह सोम - प्राण इस वल्ली सोम में प्रविष्ट हो जाता है । इस प्रकार देवताओं का यह सारा सोम हवि बन जाता है अर्थात् सोम की प्रकृत्स्नता मिट जाती है । प्रतएव " यत्ते सोम " यह मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु उपांशुसवन पर रखखे हुए सोम का स्पर्श करता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " तथो s वास्यैष एतेनैव ( मन्त्रेणैव ) एतास्तनूराप्नोति । स कृत्स्न एव
देवानां हविर्भवति । तस्मादेवमभिमृशति ॥ १३ ॥
" हे सोमराजन्! श्रापकी जो ज्योति ( भाग ) द्युलोक में है एवं जो ज्योति पृथिवी में हैं एवं जो ज्योति इस विस्तीर्ण अन्तरिक्ष में है उस अपने स्वरूप से युक्त हो कर इस यजमान के लिए संस्पर्श्य इस वल्ली - सोम को प्रभूत करो - समृद्ध करो एवं हे सोम! दाता यजमान का बोल - बाला कीजिए अर्थात् यजमान को यशस्वी बनाइए " - यही मन्त्रार्थ है । इस प्रकार सोम की कृत्स्नता के लिए मन्त्रपूर्वक उसका स्पर्श करके तदनन्तर वह श्रध्वर्यु एक-धना निग्राभ्या पानी से सोम का उपसर्जन करते हैं । संसर्ग ही संसर्ज कहलाता है । निग्राभ्या पानी से सोमांशु का सिवन करते हैं । सोम को उपांशु सवन पर कूटा जाता है । कूटने से पहले सोम को इस पानी से सींच कर आर्द्र किया जाता है - यही तात्पर्य है-" अथ नित्राभ्याभिरुपसृजति " - ( सोमसेचनं करोतीत्यर्थः ) । निग्राभ्या पानी से सोम को मिलाने की क्या आवश्यकता है? - यह बतलाने के लिए भगवान् याज्ञवल्क्य तन्मूलक वैज्ञानिकी श्राख्यायिका बतलाते हैं । सबसे पहले निग्राभ्या पानी ही का सोम से सम्बन्ध क्यों कराया जाता है? इसकी उपपत्ति बड़ी ही कठिन है । उसका पूरा स्वरूप प्रकृत में नहीं बतलाया जा सकता - परन्तु बिना बतलाए काम भी नहीं चलता । अतएव सूक्ष्मरूपेण उसका थोड़ा सा प्रतिपादन कर दिया जाता है । यदि हम सरोवर के किनारे चले जाते हैं तो हमें सरोवर का पानी प्रबल वेग से बहता हुआ दिखलाई देता है । उसका कलनाद करते हुए प्रबल वेग से बहना संशय उत्पन्न करता है कि पानी में यह बहने की शक्ति कहाँ से श्राई? पानी में ऐसी कौन सी शक्ति है, जिससे वह क्षण मात्र भी स्थिर नहीं [ ६५४ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण .१ अधिषवण ब्राह्मण रहता अपितु चुपचाप अनवरत चलता ही रहता है । इसका उत्तर हमें इन्द्र - वृत्रासुर के पौराणिक श्राख्यान से मिलता है । वृत्रासुर पानी में रहता है एवं पानी को पकड़े रहता है । परन्तु इन्द्र अपने वज्र से उसके टुकड़े - टुकड़े कर देता है । बस, वृत्र के मरते ही पानी का संकोच धर्म जाता रहता है एवं वह बन्धन से विमुक्त हो प्रबल वेग से बहने लगता है । इन्द्र और वृत्रासुर का आख्यान अध्यात्म, श्रधिभूत, आधिदैविक तीनों से सम्बन्ध रखता है । तीनों में से आध्यात्मिक वृत्रासुर का और आधिदैविक वृत्रासुर का विवेचन प्रथमकाण्ड में " सान्नाय्य ब्राह्मण " ( शतपथ विज्ञानभाष्य १ | ६ | ४ ) में कर दिया गया है । वहाँ पर वृत्र का चन्द्रमा से सम्बन्ध बतलाया गया है एवं इन्द्र का सूर्य्य से सम्बन्ध बतलाया गया है । वस्तुतः चन्द्रमा पानी का ही गोला है - उसी में वृत्रासुर रहता है । सूर्य भगवान् उस तमोमय वृत्र को कृष्णपक्ष की अमावस्या से ही मारना शुरू करते हैं । मारते - मारते पूर्णिमा तक उस अन्धकार स्वरूप वृत्रासुर को सर्वथा मार डालते हैं | यह है - प्रथमकाण्ड की श्राधिदैविकी कथा - जिसका विस्तृत विवेचन “ प्रथमकाण्डा-नुवाद " में कर दिया गया है । एवमेव हमारे पेट में जो भूख है - वही वृत्र का स्वरूप है । खाऊँ खाऊँ- इस प्रकार की जो एक वृत्ति है - वही वृत्रासुर है । यह वृत्र शरीर के सारे देवताओं को अपने वश में कर लेता है । भूखे मनुष्य की कोई भी इन्द्रियाँ ठीक - ठीक काम नहीं करतीं । वह सर्वथा निर्बल हो जाता है । भूख - स्वरूप वृत्र के आक्रमण से शरीर का अधिष्ठाता इन्द्र निर्बल हो जाता है । परन्तु जब अन्न खाया जाता है, तो उस अन्न- सोम से सोम - भक्षक इन्द्र पुनः प्रबल हो जाता है । अन्न खाते ही चेतनेन्द्र पुनः प्रबल हो कर अध्यात्म के वृत्रासुर को मार डालता है । इस प्रकार प्राधिदैविक मण्डलवत्- इस अध्यात्म में भी इन्द्र - वृत्रासुर - युद्ध हुआ करता है । इन दोनों में से प्राधिदैविक विज्ञान का प्रतिपादन करती हुई श्रुति कहती है-" तद्वाऽएष एवेन्द्रः - य एष तपति । प्रथैष एव वृत्रो यच्चन्द्रमाः । सोऽस्यैष भ्रातृव्यजन्मेव " इति । ( शत ० १२६ । ४ । १८ ) एवं अध्यात्म कथा का प्रतिपादन करती हुई श्रुति कहती है-" स होवाच । मानु मे प्रहार्षीः । त्वं वै तदेतर्ह्यसि यदहम् । व्येव मा कुरु, मामुया भूवमिति स वै मेऽन्नमेधीति । तथेति । तं द्वेधान्वभिनत् । तस्य यत् सौम्यं, न्यक्तमास तं चन्द्रमसं चकार । श्रथ यदस्यासुर्य्यमास तेनेमाः प्रजा उदरेणाविध्यत् । तस्मादाहुर्वुत्र एव तर्ह्यन्नाद प्रासीत् । ( आधिभौतिक वृत्रएव तह - पुरा ) वृत्र एतहति । इदं हि यदसावापूर्य्यते - श्रस्मादेवैतल्लोकादाप्यायते । अथ यदिमाः प्रजा अशनमिछन्ते - अस्माऽएवैतद् वृत्रायोदराय बलि हरन्ति " । ( शत ० १।६।३।१७ ) तीसरी कथा है - प्राधिभौतिक से सम्बन्ध रखने वाली । इन्द्रस्वर्गाधिपति थे, वृत्र असुराधिपति थे । इन्द्र एशिया के सम्राट् थे - वृत्र अफ्रिका- अमेरिका - यूरोप के सम्राट् थें । इन दोनों में भी परस्पर घोर [ ६५५ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ) शतपथ ब्राह्मण श्रधिषवण ब्राह्मण युद्ध होता रहता था । पुराण तीनों कथाओं की खिचड़ी बना कर बोलता है, अतएव पौराणिक कथाओं से संदेह होने लग जाता है । परन्तु यह सन्देह तीनों का रास्ता जानने से सर्वथा हट जाता है । अस्तु, कहना इस प्रपञ्च से हमें यही है कि पूर्वोक्त तीनों में से जो श्राधिदैविक इन्द्र - वृत्रोपाख्यान है, उसका कई तरह से प्रतिपादन किया जाता है । कहीं चन्द्रमा को वृत्र बतलाया जाता है । कहीं सोम को वृत्र बताया जाता है, परन्तु इससे सन्देह में नहीं पड़ जाना चाहिए । एक ही पदार्थ - प्रवस्था - विशेष के कारण- दृष्टिकोण के कारण - बीसों स्वरूपों को धारण कर लेता है । उन - उन अवस्थाओं के हिसाब से वे बीसों स्वरूप सच्चे हैं । यहाँ पर कहा जाता है कि पानी ने वृत्र को मार डाला । पहले कहा था- इन्द्र को वृत्र ने मार डाला । कभी कहते हैं- पानी में बहता हुआ यह रस मिल न पाया इसलिए पानी बह रहा है-" यत्र वै यज्ञस्य शिरोऽच्छिद्यत । तस्य रसो द्रुत्वापः प्रविवेश । तेनैव तद्रसेन श्रापः स्यन्दन्ते " ( शत ० ब्रा ० ३।६।२।१ ) 1 यहाँ कहते हैं कि पानी ने वृत्र को मार डाला - इसी वीर्य्यं से पानी बह रहा है । ( श्रापो ह वै वृत्रं जघ्नुस्तेनैवैतद्वीर्येणापः स्यन्दन्ते ) किसे सच्चा समझें? इसका उत्तर है - इसको सच्चा समझो । इन्द्र क्या है? वृत्र क्या है? यज्ञ - रस किसे कहते है? जब इन पदार्थों का स्वरूप मालूम हो जाता है तो फिर ऐसी विरुद्ध भाषा से जरा भी सन्देह नहीं रहता । पदार्थ को समझने पर दोनों बातें ठीक मालूम होने लगती हैं । पृथिवी से निकल कर १७ ( सतरह ) तक वितत होने वाला जो प्राणाग्नि है, उसी का नाम यज्ञ है । अग्नि में सोम की आहुति पड़ने का नाम यज्ञ है । चूं कि अग्नि, यज्ञ का साधक है, अतएव इस अग्नि को ' यज्ञ ' कहा जाता है । १७ वें ( सतरहवें ) अहर्गण पर रहने वाला पार्थिव अग्नि प्रारण ही इस यज्ञ का मस्तक है । इस सत्रह से ऊपर सोम - रूप पानी भरा हुआ है । इसमें सतरहवें स्थान का अग्नि प्रारण यज्ञ से प्रवर्ग्य बन कर इस पानी में प्रविष्ट हो जाता है । इस पानी को संसार के यावत् पानियों का उपलक्षण समझना चाहिए । पार्थिवाग्नि प्रारण ही पानी में प्रविष्ट है । अग्नि के कारण ही पानी में बहाव है - तर-लता है - गति है । जिस दिन पानी में से यह तरल अग्नि - रस निकल जाएगा, उस दिन ध्रुव अग्नि के प्रवेश से पानी जम जाएगा । बस, इस विज्ञान के लिहाज से ही ' यज्ञ रस प्रवेशात् पानी बह रहा है ' यह कहा जाता है । पार्थिव प्राण का नाम अग्नि है - सौर प्राण का नाम इन्द्र है । अग्नि, पृथिवीचित्य पिण्ड का धिष्ठाता है | इन्द्र, सूर्य्य - पिण्ड का अधिष्ठाता है । पार्थिव प्राणाग्नि पृथिवी का चितेनिधेय है । सौर-इन्द्र, सूर्य्यं चित्य का चितेनिधेय है । पृथिवी अग्निगर्भा है । द्यु - इन्द्र गर्भिणी है । अतएव श्रुति कहती है-" यथाग्निगर्भा पृथिवी यथा द्यौरिन्द्रेण गर्भिरणी " । ( शत ० ब्रा ० १४ || ४ | २१ ) इन्द्र का स्वभाव है- विक्षेप करना । यों तो इन्द्र के १४ ( चौदह ) काम होते हैं । परन्तु उन सब से प्रकृत में कोई सम्बन्ध नहीं । यहाँ केवल गति और बल दो ही इन्द्र अभिप्रेत है । संसार में जितना भी [ ६५६ ]