Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 671–680
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 671–680
पृष्ठ 671
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ० ६ ) शतपथ ब्राहारण जगति का विक्षेप का - क्षोभ का - प्रशान्ति का - हलचल का - महकमा है, सब के अधिष्ठाता इन्द्र ही हैं । पार्थिव अग्नि में सोम आता है परन्तु गति इन्द्र की प्रेरणा - नोदना - से यदि इन्द्र धक्का न मारे तो सोम श्रग्निमें आहुत ' ही नहीं सकता । यदि सोम न आए तो सोमाहुति पर निर्भर रहने वाला यज्ञ ही न हो । अतएव इन्द्र ही को यज्ञ का देवता बतलाया जाता है एवं यही इन्द्र बल का अधिष्ठाता है । संसार में जो एक प्रोज - बल दिखलाई पड़ता है - वह इसी इन्द्र की महिमा है । प्रतएव यास्क मुनि कहते हैं— " या च का च बलकृतिरिन्द्रकर्म एव तत् " इति । इसी बल के कारण इन्द्र को " वृषभ " कहा जाता है । इसी वृषभ- इन्द्र का वर्णन करती हुई श्रुति कहती है-" चत्वारि शृङ्गा त्रयो s स्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासोऽस्य । त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महोदेवो मर्त्या आविवेश " - इति । ( ऋग्वेद मं ० ४ । ५८।३ ) इस वृषभ- इन्द्र के धक्के से सौर प्रारण के धक्के से ही पार्थिव यज्ञ होता है एवं इसी के धक्के से पृथिवी घूमती रहती है । सूर्य्यप्राण का जो विक्षेपाक्रमरण है - वही पृथिवी को घुमा रहा है परन्तु साथ ही, वही इसे पकड़े हुए भी है । यदि धक्का न देता तो पृथिवी सूर्य में जा कूदती । यदि पकड़े न रहता तो पृथिवी रसातल में चली जाती । परन्तु पृथिवी एक लाइन पर घूमा करती है - यह इसी इन्द्र की - वृषभ इन्द्र की महिमा है । पार्थिव यज्ञ निष्पन्न करने वाला - पृथिवी को अपनी प्राण- रश्मियों से पकड़े रखने वाला यही इन्द्र है । अतएव मन्त्र श्रुति कहती है-" यज्ञ इन्द्रमवर्द्धयत् । यद् भूमि व्यवर्तयत् । चकारण श्रोषशं दिवि " इति । ( ऋग्वेद मं ० ८ | १४।५ ) " बैल ने अपने सींग पर पृथिवी उठा रक्खी है " - इस कथा का यही रहस्य है । इन्द्र ही बैल ( वृषभ ) हैं । इनकी प्राण- रश्मियां ही सींग हैं । इन्हीं से पृथिवी सुरक्षित है । हम कह रहे थे कि पृथिवी अग्निगर्भा है । यह अग्नि, यज्ञ के कारण २१ ( इक्कीस ) तक चला जाता है । २१ ( इक्कीस ) में ९ - १५-२१ तीन विभाग हो जाते हैं । तीनों लोक कहलाते हैं । तीनों के अवस्थात्रययुक्त प्रग्नि अधिष्ठाता हैं । अवस्था विशेष के कारण वही अग्नि- अग्नि, वायु, आदित्य इन नामों से व्यवहृत होने लगता है । for & ( नौ ) तक रहता है- यही ध्रुव श्रग्नि है । वायु १५ ( पन्द्रह ) तक रहता है - यही धर्त्र ( तरल ) अग्नि है । २१ ( इक्कीस ) तक आदित्य है - यही धरुण ( विरल ) श्रग्नि है । ९ ( नौ ) तक पृथिवीलोक माना जाता है । १५ ( पन्द्रह ) तक अन्तरिक्ष माना जाता है - २१ ( इक्कीस ) तक द्युलोक माना जाता है । द्युलोक में जो इन्द्र है वह अन्तरिक्ष के - वायु नाम के तरल अग्नि में भी रहता है । यद्यपि रहता इन्द्र ( ईथर ) सर्वत्र । कोई भी स्थान इन्द्र से शून्य नहीं है । अतएव " नेन्द्रादृते पवते धाम किंचन ' " " १ ऋग्वेद मं ० ९ ६६ | ६ | [ ६५७ ]
पृष्ठ 672
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय क ण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण श्रधिषवरण ब्राह्मण यह कहा जाता है । परन्तु इसका अपना खास - लोक सूर्य्यं -लोक है- एवं अन्तरिक्ष के वायु में भी यह. विशेष प्रकार से अपनी स्थिति रखता है । वायु में रहने वाला यह इन्द्र " मरुत्वान इन्द्र कहलाता है । वायु में एक हिस्सा इन्द्र का रहता है - तीन हिस्सा वायु का रहता है । १०० ( सौ. ) डिग्री वायु में २५. ( पच्चीस ) डिग्री इन्द्र रहेगा और ७५ ( पिचहत्तर ) डिग्री वायु का रहेगा । वायु, तरल अग्नि है -१५ ( पन्द्रह ) के पास में रहता है एवं इन्द्र युक्त है । वायु में जो गति है, वह इसी इन्द्र की गति है । वायु इन्द्र रहता है - इसी विज्ञान को बतलाती हुई श्रुति कहती है-इन्द्र - मिश्रित प्रान्तरिक्ष्य यज्ञ रस ( तरल - श्रग्नि ) ही पानी में प्रविष्ट रहता है । उसी से पानी बहता है । यज्ञ - रस से - प्रान्तरिक्ष्य वायुरूप अग्नि अभिप्रेत है । इस अग्नि से तो तरलता आती है एवं इस वायु में रहने वाले मरुत्वान् इन्द्र से पानी में गति धर्म्म उत्पन्न होता है । चूंकि इन्द्र और यज्ञ - रस ( तरलाग्न वायु ) दोनों पानी में रहते हैं, अतः पानी ने वृत्र को मारा - यह भी कहा जा सकता है - इन्द्र ने वृत्र को मारा - यह भी कहा जा सकता है । यज्ञ करने से वृत्रासुर मारा गया यह भी कहा जा सकता है । ब्राह्मण के प्रारम्भ में ही बतला आए हैं कि सोम का नाम ही वृत्र है । जो संकोचधर्म्मा प्राण होता है, वही वृत्र कहलाता है । सोम संकोचधर्म्मा है । अतएव हम इसे " वृत्वा शेते " इस व्युत्पत्ति से वृत्र कहने के लिए तय्यार हैं । सोम की तीन अवस्थाएँ हैं । तीनों में जो घन- सोम है - वही ' वृत्र ' कहलाता है । जिसमें यह घन - सोम प्रविष्ट हो जाता है - वह पदार्थ वज्र सदृश घन हो जाता है । परन्तु केवल घन सोम ही पानी को घन नहीं बना सकता - सोम के साथ ध्रुव अग्नि का भी योग होना चाहिए । धर्त्र अग्नि से पानी पिघल जाता है - ध्रुव से जम जाता है । कहना इस प्रपञ्च से यही है कि पानी में जो तरलता है - वह इसी इन्द्र की - यज्ञ रस की महिमा है । इन्द्र ही उस वृत्र को - घनता को प्रतिमूच्छित कर देता है- प्रतएव पानी जमने नहीं पाता । चणा ( चना ) महावज्र है - वृत्र है, परन्तु प्राप उसे पानी में डाल दीजिए उसकी सारी घनता दूर हो जाएगी एवं चरणा बिल्कुल मुलायम हो जाएगा । थोड़े ही काल के अनन्तर विकसित हो जाएगा । पानी एक ऐसी ताकत ( इन्द्र ) है- वह वृत्र को अर्थात् घनता को नेस्तनाबूद कर देती है । पानी वृत्र को मार डालता है । इसी वीर्य के कारण - वृत्र को मार डालने के कारण पानी बह रहा है । यदि इसमें घनता पैदा करने वाला वृत्र - सोम रहता तो पानी उसी समय जम जाता । अपि च - इसी ताकत से पानी इतने वेग से बहता है कि रास्ते में प्राए हुए पत्थर वृक्ष - काष्ठ इत्यादि कोई भी इसकी गति में बाधा नहीं डाल सकते । चाहे बीच में एक दीवार खड़ी कर दो - प्रबल वेग से बहता हुआ पानी दीवार की जरा भी पर्वाह नहीं करेगा -अपितु सब को तोड़ते - फोड़ते निकल जाएगा, क्यों कि उसमें वह वृत्र, को मारने वाला बैठा हुआ है | भला, जिस बल के कारण पानी ने वृत्र जैसे घन - भाव को मूच्छित कर दिया वह वृत्र, सोम की घनता के अंश से निर्मित लोष्ठ - काष्ठ - पाषाणादि की क्या परवाह कर सकता है? इस प्रकार किसी को कुछ भी चीज न समझता हुप्रा - उसी यज्ञ रस के किंवा इन्द्र - बल के कारण पानी सर्वतन्त्र - स्वतन्त्र हो कर बहता रहता है । पानी में ऐसी कौन सी शक्ति है जिससे कि वह क्षण मात्र भी स्थिर नहीं रहता, अपितु प्रबल वेग से बहता ही रहता है? सरोवर के किनारे पर जाने से जो यह सन्देह हुआ था - उसका वही उत्तर है । इसी इन्द्र रूप यज्ञ - रस के कारण पानी घनता पैदा करने वाले वृत्र को मार कर फिर सब को [ ६५८ ]
पृष्ठ 673
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) To शतपथ ब्राह्मण अधिषवण ब्राह्म प्रति तुच्छ समझता हुआ सदा बहता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-" प्रापोह वै वृत्रं जघ्नुः । तेनैवैतद्वीर्येण श्रापः XXX स्यन्दमानाः न किंचन प्रतिधारयते - ( एनाः श्रापः - लोष्ठादिकं किंचन अपि वस्तु न प्रति-नाति अपितु ) ता ह स्वमेव वशं चेरुः । ( स्वातन्त्र्ये कारणमाह ) कस्मै नु वयं तिष्ठेमहि याभिरस्माभिर्वृत्रो हत इति " - ( सर्व लोकस्तम्भको वृत्रोऽपि यदा अस्माभिर्हतः - एतादृश्यामवस्थायां वयं कथं परतन्त्राभवामः ) " । संसार में जितने भी पदार्थ हैं, वे इन्द्र के लिए तस्थान हैं । कितना ही तेज चलने वाला हो-परन्तु उसे इन्द्र के लिए तो ठहर ही जाना पड़ता है । प्रतिष्ठा तत्त्व का उपभोग इन्द्र ही करता है । तात्पर्य यह है कि सारा प्रपञ्च ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र इन तीन अक्षरों पर निर्भर है । प्रतिष्ठातत्त्व का नाम विष्णु है - विसर्ग का नाम इन्द्र है । वही इन्द्र बहु बन जाता है । एकतः गति का नाम इन्द्र है । सर्वतः गति का नाम स्थिति है - वही विष्णु है । प्रतएव विष्णु को “ उपेन्द्र " कहा जाता है । कहना यही है कि ' इन्द्र - विष्णु ' - दोनों एक वस्तु हैं । बाकी बचती है - प्रतिष्ठा । इसी का नाम ब्रह्मा है । इसी का नाम संसार है । इस गति का आधार प्रतिष्ठा - तत्त्व है । अतएव संसार की यच्चयावत् प्रतिष्ठा को हम इन्द्र के लिए बतला सकते हैं । ठहरा हुआ जो भाव है - वह सब इन्द्र के लिए है । चलते हुए पदार्थ भी इन्द्र के लिए तस्थान बन जाते हैं - ठहर जाते । मामूली चलने वाले ठहर जाएँ इसमें तो कुछ कहना नहीं है - अपितु अन्त्यदुर्वह- सदा चलने वाला प्रतएव - " सदागति " नाम धारण करने वाला जो वायु है - वह तक इन्द्र के लिए ठहर जाता है । इसका अर्थ यही है कि जो पदार्थ चल रहे हैं उनमें जो चलना, गति है - वह तो स्वयं इन्द्र है । बाकी स्थिति ही बचती है । यदि इन्द्र को इन्द्रत्व से - वायु से पृथक् करके देखते हैं तो वायु भी स्थिर है, क्यों कि वायु की गति तो स्वयं इन्द्र ही है । अतएव हम कह सकते हैं कि संसार में जितने भी पदार्थ हैं - वे इन्द्र के लिए प्रतिष्ठित हैं - अर्थात् इन्द्र गति के अलग करने से सब पदार्थ प्रतिष्ठित हो जाते हैं । बस, इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर याज्ञवल्क्य कहते हैं— " सर्वं वाऽइदमिन्द्राय तस्थानमास - य स- यदिदं किंच । अपि योऽयं पवते ( सो s पि - स्थितो जायते ) " ॥ १४ ॥
इन्द्र ही पदार्थों को चलाता है- इन्द्र ही प्रतिष्ठित करता है । आकाश में कभी वायु बिल्कुल शान्त हो जाता है, कभी वेग से चलने लगता है - यह इसी इन्द्र की महिमा है । इन्द्र के राज्य से बाहर कुछ नहीं है । सर्वत्र इन्द्र का दबदबा छा रहा है । इसीलिए " नेन्द्राहते पवते धाम किंचन ' १ यह कहते हुए हमें जरा भी संकोच नहीं है । १ ' ऋग्वेद मं ० ६ ६६ ६ ' । [ ६५६ ]
पृष्ठ 674
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( अ ० ) शतपथ ब्राह्मण श्रधिषवरण ब्राह्मण पानी किसी की परवाह न कर ठहरता ही नहीं- अनवरत चलता ही रहता है- उसे भी इन्द्र के लिए तो ठहरना ही पड़ता है । पानी में एक तरल सोम और एक रस- दो पदार्थ रहते हैं । असल में पानी, इस रस ही का नाम है । यह रस सारे अन्तरिक्ष में भरा रहता है । यह रस पार्थिव भारी हिस्से से अलग आकाश में रहने के कारण बिलकुल हलका होता है एवं अत्यन्त मधुर होता है । इसकी मधुरता का एक कारण और भी है । अन्तरिक्ष में रहने वाले इस रस में पारमेष्ठ्य अभ्यः नाम का पानी शामिल रहता है । अम्भः सूर्य्यं से ऊपर की वस्तु है, अतएव वह बहुत ही मधुर है । यही पानी गंगाजल कहलाता है । जब स्थूल भाग नीचे गिर पड़ता है तो प्राश्विन के महीने में वही अम्भः पानी नीचे गिरता है । श्राश्विन का पानी साक्षात् गंगाजल है । अतएव वर्षा के पानी को पीने का निषेध करते हुए भी प्रायुर्वेदज्ञ श्रश्विन में बरसे हुए पानी को पीने की आज्ञा दे देते । जैसा कि प्रायुर्वेद मर्मज्ञ वाग्भट कहते हैं-" समुद्र तनपातव्यं मासादाश्वयुजाद्विना " इति । कहना यही है कि आकाशस्थ पानी का मूल रस अत्यन्त मधुर होता है - बल प्रदाता है - शिवतम होता है । इसी पानी का स्वरूप बतलाती हुई श्रुति कहती है--" श्रापो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन । महे रणाय चक्षसे । यो वः शिवतमो रसः । तस्य भाजयतेह नः " इति " । ( तै ० सं ० ४ । १ । ५२ ) इस रस में जब सोम मिलता है तो यह पानी में परिणत हो जाता है । सर्वत्र व्यापक विरला वस्था युक्त दिक्सोम ही रासायनिक प्रक्रिया से पानी बन कर धरातल पर गिर पड़ता है । जब तक सोम नहीं मिलता तब तक वह रस - रूप पानी श्राकाश में वायु में स्थिर रहता है । पृथिवी अन्तरिक्ष - द्यौ-तीनों में सौर प्राण इन्द्र व्याप्त रहता । द्यौ - इस ऐन्द्र पुरुष का मस्तक है- पृथिवी पैर है - अन्तरिक्ष-छाती है । यहीं पर यह रसरूप पानी जमा रहता है । इसके जमा रहने का समय ( ८-८३ आठ - साढे श्राठ ) महीने है । सारा रस सूर्य की रश्मियों में इन्द्र के वक्षस्थल में ८ ( ठ ) महीने जमा रहता है । इसी विज्ञान को बतलाते हुए महर्षि वाल्मीकि कहते हैं-" अष्टमाते गर्भं भास्करस्य गभस्तिभिः । सं सर्व समुद्राणां द्यौः प्रसूते रसायनम् " ॥ ( वा ० रामायण ) पानी को रोकने वाला एक वृत्र का भाईबन्द और है । वह सोम को रस से मिलने नहीं देता । चूंकि यह वृत्र जाति का प्रारण विशेष ही पानी को नीचे नहीं गिरने देता अतएव पौराणिक लोग इसे " न मुञ्चति इस व्युत्पत्ति से " नमुचि " कहते हैं । श्राकाश में जो बादल दिखलाई पड़ते हैं - यही नमुचि का शरीर हैं । इन्द्र अपनी उसी प्रसिद्ध ताकत से उस विरोधी प्राण को निकाल देते हैं एवं पानी नीचे गिर पड़ता है । हमारा जीवन सोम से होता है । यदि सोम न मिले तो हम एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकते | यह सोम हमें साक्षात् न मिल कर अन्न द्वारा मिलता है । अन्न में पानी से आता है । पानी [ ६६० ]
पृष्ठ 675
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ० ६ ) शतपथ ब्राह्मणं अधिषवणं ब्राह्मणे अन्तरिक्ष से लाता है । सोम को सबसे पहले आन्तरिक्ष्य रस- रूप पानी ही खाता है । सोम को खा कर वह पानी नीचे गिर पड़ता है वही अन्न बनता है । उसे ही हम खाते हैं । सारे कथन का निष्कर्ष यही है कि जो पीने का पानी है उसमें रस और विरल सोम दोनों हैं । दोनों ही ग्रीष्म ऋतु में अलग हो जाते हैं । दोनों अन्तरिक्ष में उड़ जाते हैं । जो रसरूप पानी है - वह इन्द्र के वक्ष स्थल में अर्थात् अन्तरिक्ष में जा कर प्रतिष्ठित हो जाता है । जो पानी पृथिवी पर बड़े वेग से गतिशील है - वही - इन्द्र के लिए प्रतिष्ठित हो अन्तरिक्ष में जमा हो जाता है । परन्तु यही पानी-सोम के मिलते ही - फिर जमीन पर आ गिर पड़ता है । जिस सोम को हम खाते हैं उसका पहला भक्षक वही प्रान्तरिक्ष्य पानी है । सबसे पहले उसके साथ सोम का सम्बन्ध होता | चूँकि इस पानी को इन्द्र अपने वक्षःस्थल में निगृहीत कर लेता है, अतएव इसका नाम ' निग्राभ्या ' हो जाता है । वही निग्राभ्या पानी ही तो सोम सम्बन्धेन स्थूल बन कर पृथिवी पर बह रहा है । प्रकृति में इसी निग्राभ्या पानी को सबसे पहले सोम भक्षण करता है । इसी विज्ञान का अलङ्कार रूप से वर्णन करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं-जिस इन्द्र के लिए सब तस्थान है - उसने प्रबल वेग से बहते हुए पानी से कहा कि संसार में जो भी कुछ " है " कह कर व्यवहृत करने लायक है - वह सब मेरे लिए प्रतिष्ठित है अर्थात् मेरे कहते ही मेरा इशारा करते ही सब की गति रुक जाती है । सब जहाँ के तहाँ ही ठहर जाते हैं, अतएव मेरे लिए तुम भी ठहर जाओ । पानियों ने कहा कि हम आपके लिए आपके पास ठहर जाएँगे तो इससे हमारा कौन सा प्रयोजन सिद्ध होगा - हमें क्या फल मिलेगा? इन्द्र ने कहा कि इसके एवज सोम राजा के प्रथम भक्ष में तुम्हारा ही नम्बर रहेगा अर्थात् और और देवताओं से पहले सबसे पहले तुम्हीं सोम को खानोगे । सबसे पहले सोम तुम्हें ही मिलेगा । पानी इस पर राजी हो गए एवं राजी हो कर वे इन्द्र के लिए ठहर गए । जब पानी ठहर गए तो इन्द्र ने उनको अपने वक्षःस्थल में निगृहीत कर लिया । चूंकि इन्द्र ने इन्हें उरस्थल में निगृहीत कर लिया, अतएव इनका नाम " निग्राभ्या ' हो गया-" स इन्द्रोऽब्रवीत् सर्वं वै मइदं तस्थानं यदिदं किञ्च । तिष्ठध्वमेव । इति । ता हो: - किं नस्ततः स्यादिति - प्रथमभक्ष एव वः सोमस्य राज्ञ इति । तथेति । ता प्रमातिष्ठन्त । तास्तस्थाना उरसि न्यगृह्णीत् । तद्यदेना उरसि निगृह्णीते - तस्मान्निग्राभ्या नाम " । प्रकृति में यज्ञाधिष्ठाता इन्द्र इस निग्राभ्या को वक्षःस्थल पर प्रतिष्ठित रखते हैं- अतएव - " यद्वै देवा कुस्तत् करवाणि " इस मर्यादा में बद्ध इस वैध यज्ञ का अधिष्ठाता यजमान इन्द्र- उस निग्राभ्या पानी को छाती से लगाता | लगा कर नीचे रख देता है । तदन्तर अध्वर्यु उससे सोम सिञ्चन करता है । प्रकृति में जैसे निग्राभ्या पानी सोमराजा का प्रथम भक्ष है - सबसे पहले सोम का सम्बन्ध निग्राभ्या से होता है - तथैव यहाँ पर सबसे पहले निग्राभ्या का ही सोम से सम्बन्ध कराया जाता है । अभिषव - काल में जो निग्राभ्या से सवन करना है वही इनका प्रथम भक्ष है ' निग्राम्या से सोम का सेचन क्यों कराया जाता [ ६६१ ]
पृष्ठ 676
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( श्र ० g ) शतपथ ब्राह्मण अधिवर ब्राह्मण है? यह प्रश्न हुआ था - इसका यही उत्तर है । प्रकृति में देवताओं से पहले निग्राभ्या सोम को खाता है-श्रतएव यहाँ भी प्राहुति देने से पहले निग्राभ्या का सम्बन्ध कराया जाता है --" तथैवैता एतद्यजमान उरसि निगृह्णीते । स श्रासामेष प्रथमभक्षः-सोमस्य राज्ञः - यन्निग्राभ्याभिरुपसृजति ” ॥१५ ॥
निग्राभ्या से सोम- सेचन क्यों करना चाहिए? इसकी उपपत्ति बतला दी गई । श्रब पद्धति बत-लाते हैं । वह अध्वर्यु निम्नलिखित मन्त्र बोलता हुआ उन निग्राभ्या पानियों से सोम का सेचन करता है-" श्वात्रा स्थ वृत्रतुरो राधो गूर्त्ताऽमृतस्य पत्नीः । ता देवीदेवत्रेमं यज्ञं नयतोपहूताः सोमस्य पिबतं " इति ॥ ( वा ० सं ० ६।३४ | ) मन्त्र के प्रत्येक वाक्य का अर्थ करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि पानी चूंकि सर्वाप्यायन रूपत्वेन शिव है - कल्याणकारिणी है - प्रतएव श्वात्रास्थ कहा है--" शिवा ह्यापस्तस्मादाह - श्वात्रास्थेति " । निग्राभ्या पानी ने वृत्र को मारा है - श्रतएव उसे वृत्रतुरः ( वृत्रहिंसकः ) कहा गया है -" वृत्रतुर इति - वृत्रं ह्येता अघ्नन् । राधो गूर्तामृतस्य पत्नी " । श्राप राध ( सम्पत्ति ) की पैदा करने वाली हैं एवं अमृत सोम की पत्नी हैं- पालयित्री हैं । निग्राभ्या पानी- वास्तव में उद्यम यित्री हैं । जिसके शरीर में ऊर्क पैदा करने वाला निग्राभ्या पानी रहता है, वही उद्यम कर सकता है । शिवतम रस ही उद्यम की मूर्ति है । जिसके शरीर में से यह रस निकल जाता है- 1 वह उद्यम रहित हो जाता है एवं ऐसे नीरस बेपानी के आदमी के मुंह पर मक्खियाँ भिनभिनाया करती हैं । श्रतएव हम इस पानी को " राघोगूर्ता " ( धनस्य उद्यमयित्री ) कहने के लिए तय्यार हैं । धन का उद्यम करने वाला यही आप है । एवं यह जो पीने का पानी है - यह उस रसरूप पानी का स्वामी है । उसका स्वामीपना इस रस पर अवलम्बित है । जब तक उसमें यह रस रहता है, तभी तक पानी रहता है । " ता देवीदेवत्रेमं यज्ञं नयत १ हे आपो देवी - इस यज्ञ को देवताओं की ओर ले जाइए । अनुज्ञात - हो कर - निमन्त्रित हो कर श्राप इस सोम राजा के प्रथम भक्ष को नहीं खातीं, अपितु, प्रतिष्ठापूर्वक हो कर ही खाती हैं-" तदुपहता एव प्रथमभक्षं सोमस्य राज्ञो भक्षयन्ति ॥१६ ॥
१ ' वा ० सं ० ६।३४ ' । [ ६६२ ]
पृष्ठ 677
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ० ) शतपथ ब्राह्मणं अधिषवरण ब्राह्मण " हे निग्राभ्या! आप कल्याणकारिणी हैं, वृत्र को मारने वाली हैं, धन का उद्यम करने वाली हैं । इस स्थूल पानी का स्वामीपना सुरक्षित रखने वाली प्रतएव इसकी पत्नी हैं । ऐसी आप देवतात्रों के प्रति इस सोमात्मक यज्ञ को पहुंचा दीजिए एवं उपहूत हो कर आप इस के सोम को पीजिए - यही मन्त्र का अर्थ हैं । निग्राभ्या पानी से सोम का सिञ्चन हो चुका एवं इस पानी के सम्बन्ध से सोमवल्ली आर्द्र हो कर 1. कूटने लायक बन गई । तदनन्तर अध्वर्यु - उस प्रश्ममय ग्रावा से उसे कूटेगा - उस पर प्रहार करेगा । जिस समय अध्वर्यु प्रहार करने के लिए तय्यार हो- उस समय जिसको द्वेष- दृष्टि से देखता हो - जिसे अपना शत्रु समझता हो - उसका नाम ले कर मन ही मन में--" प्रमुष्माऽग्रहं प्रहरामि न तुभ्यमिति " । . इन अक्षरों का ध्यान कर ले । इससे इसका वह शत्रु एक वर्ष के भीतर - भीतर किसी आकस्मिक प्रहार से नष्ट हो जाएगा । ' हे सोम! मेरे फलाने ( अमुक ) शत्रु के लिए मैं इस पाषाणरूप वज्र का प्रहार करता हूं न कि आपके लिए । ' ऐसी भावना करने से सोम - हिंसा भाव हट जाता है एवं शत्रु थी मारा जाता है “ अथ प्रहरिष्यन् - यं द्विष्यात् तं तमसा ध्यायेत् - " प्रमुष्माऽश्रहं ( पाषा-ररूपं वज्रं ) प्रहरामि न तुभ्यम् - इति " । मैं आप पर प्रहार नहीं करता - अपितु शत्रु पर प्रहार करता हूं - ऐसी भावना क्यों की जाती है? -इसकी उपपत्ति बतलाते हैं । हम देखते हैं कि एक मामूली मानुष ब्राह्मण को यदि कोई मारता है - उस पर प्रहार करता है - तो लोक उस ब्राह्मणहन्ता की निन्दा करता है अर्थात् ब्राह्मण पर प्रहार करने वाले ' मनुष्य को लोक में बहुत ही हिकारत की नजर से देखा जाता है - सर्वत्र उसकी निन्दा होती है । भला, सामान्य ब्राह्मण के प्रहर्त्ता की जब यह दशा होती है तो उसका तो कहना ही क्या है जो इस सोम को मारता है - सोम पर प्रहार करता है क्यों कि सोम दिव्यलोक की वस्तु होने के कारण साक्षात् देवता है । यह ब्राह्मण नहीं, अपितु ब्राह्मणों का राजा है । भला, इसके ऊपर प्रहार करने वाला निन्दा से क्यों कर बच सकता है? -" यो न्वेवेमं मानुषं ब्राह्मणं हन्ति तं न्वेव परिचक्षते ( लोक: ) । किस् - य एतम् ( सोमराजानं हन्तीति शेषः ) । ( यतो हि ) - देवो हि सोम: " । कदाचित् कहो कि हम सोम को मारते कहाँ हैं? हम तो सिर्फ इसका रस निकालते हैं । इसका उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इसका जो अधिषव करते हैं - वह इसे मारते ही हैं अर्थात् पाषाण से कूटा जाना “ हिंसा - व्यापार " ही के अन्तर्गत है । मामूली चीज से नहीं - प्रपितु पत्थर से कूटते हैं । ऐसी अवस्था में सोम की हिंसा अवश्य ही होती है--[ ६६३ ]
पृष्ठ 678
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ० ) शतपथ ब्राह्मण प्रविण ब्राह्मणे " घ्नन्ति वा एनमेतद्यदभिषुण्वन्ति । तमेतेन ( पाषाणेन ) घ्नन्ति " । इसी हिंसा भाव को हटाने के लिए उसे अवश्य ही " अमुष्मा: - अहं प्रहरामि न तुभ्यम् " - यह श्रवश्य ही बोलना चाहिए । ऐसा बोलने से सोम- हनन बुद्धि हट जाती है । शत्रु- हनन बुद्धि हो जाती है । भावना का राज्य चूँकि कर्म की अपेक्षा बड़ा है - अतएव इस भावना के सामने कर्म्म पराजित हो जाता है । ऐसा बोलने से सोम मरता नहीं, अपितु, जी जाता है । एवं इससे वह अध्वर्युं श्रनेनस्य हो जाता है - एन पाप को कहते हैं । जिसका पाप न हो वह अनेन कहलाता है उसका भाव ' अनेनस्य ' कहलाता है-" तथा त उदेति । तथा संजीवति । तथाऽनेनस्यं भवति " । यदि इसका कोई शत्रु न हो, तब भी एक तृरण का ही " अमुष्यैदर्भ तृरणायाहं प्रहरामि न तुभ्यम् " बोल देना चाहिए | सोमहिंसा के भाव को हटाने के लिए बोलना नितान्त आवश्यक है - यही तात्पर्य है— " यद्यु न द्विष्यात् - प्रपि तृरणमेव मनसा ध्यायेत् । तथोऽअनेनस्यं भवति " वह अध्वर्यु — ॥१७ ॥
" माभेर्मा सं विवथा ऊज्जं धत्स्व धिषणे वीड्वी सती वीडयेथामूज्जं दधाथाम् । पाप्मा हतो न सोमः " । ( वा ० सं ० ६।३५ ) यह मन्त्र बोलता हुआ उपांशुसवन पर रक्खे हुए सोम पर अश्ममय ग्रावा से प्रहार करता है— हे सोम! तुम जरा भी मत डरो एवं प्रपने चित्त को जरा भी उद्विग्न मत करो । याज्ञवल्क्य मन्त्र -भाग का तात्पर्य्यार्थ बतलाते हुए कहते हैं कि मैं शत्रु के लिए प्रहार करता हूं न कि तुम्हारे लिए । श्रतः तुम्हारे भयभीत होने की एवं उद्विग्न होने की कोई आवश्यकता नहीं है-" प्रमुष्मै श्रहं प्रहरामि न तुभ्यमित्येवैतदाह " । इस " ऊर्जधत्स्व " का ग्राप रस को धारण करो बलिष्ठ बनो - यही तात्पर्य है -“ ऊर्जं धत्स्वेति- रसं धत्स्वेत्येवैतदाह " | जिस शिला पर सोम कूटा जाता है उसके दो फलक होते हैं । वे दोनों फलक जुड़े रहते हैं एवं उन पर सोम कूटा जाता है । कई प्राचार्यों का मत है कि-" धिषणे वीडवी " इत्यादि मन्त्र -भाग इन्हीं दोनों उपांशुसवन फलकों के लिए कहा है । " हे फलक! आप बुद्धिमान् - बलवान् बने हुए - मजबूत बने रहिए एवं ऊ को धारण किये रहिए " - उनके मत से इस मन्त्र - भाग का यही अर्थ है-[ ६६४ ]
पृष्ठ 679
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( श्र ० e ) शतपथ ब्राह्मण प्रविण ब्राह्मणं " इमेवैतत्फलके आहुरित्यु हैक प्राहुः ( एतस्मिन् वाक्ये - इमे सोमा-धारभूते फलके ब्रुवते इति केषांचिन्मतम् ) " । ' यह अशुद्ध मत है ' - यह बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यदि सोम कूटने से ये फलक टूट भी जाएँगे तो इससे बिगड़ क्या जाएगा? टूट जाएँगे तो भी जोड़ कर सोम तो कूटा ही जाएगा, अतः ' fu षणे ० ' इत्यादि मन्त्र - भाग का फलक - परक अर्थ लगाना अवैज्ञानिक है अतएव त्याज्य है । " किं नु तत्र योऽप्येते फलके भिन्द्यात् " । याज्ञवल्क्य मन्त्र भाग का वास्तविक अर्थ बतलाते हुए कहते हैं कि जिस समय प्रहार के लिए श्रध्वर्यु अश्म - वज्र उठाता है - उस समय द्यावापृथिवी - इस वज्र को उठता देख कर भयभीत हो जाते हैं, क्यों कि सोम द्यावापृथिवी की सन्तान है । सन्तान के ऊपर प्रहार होते देख कर माता - पिता कम्पित हो जाते हैं - घबड़ा उठते हैं । घबड़ाने से उनके आत्मा में से एक शोकमय प्रारण निकलता है - प्रशान्तिजन्य नाशक भाव निकलता है । वह निकल कर सीधा प्रहर्ता पर हमला करता है एवं इससे प्रहार करने वाले Sirf हो जाता है । कभी - कभी इस अभिशापाग्नि से मारने वाला नष्ट हो जाता है । श्रतः श्रध्वर्यु पृथिवी से कहते हैं कि हे द्यावापृथिवी! आप बुद्धिमती हैं तथा असली बात को समझने वाली हैं-अर्थात् - " शत्रु के मारने के लिए हमने यह वज्र उठाया है न कि तुम्हारे पुत्र सोम पर प्रहार करने के लिए " । - हमारे इस भाव को आप खूब पहचानती हैं । अतः आप बलवती बनी रहिए । " - इसी प्रार्थना से- इस यज्ञ को शान्त करता है । शान्त हो कर वे अध्वर्यु की हिंसा नहीं करती हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" इमे ह वै द्यावापृथिवी । एतस्माद् वज्रादुद्यतात् - संरेजेते | तदाभ्या-मेवैनं ( यज्ञ ) एतत् द्यावापृथिवीभ्यां शमयति तथेमे । शान्तो न हिनस्ति । ऊर्जं दधाथाम् -- रसं दधाथामित्येवैतदाह । पाप्मा हतो न सोम इति " । Sarara से कहता है कि हे द्यावापृथिवी! हमने इस सोम के सारे शत्रुओं को मारा है - न कि सोम को । अतः श्राप जरा भी संताप मत कीजिए-" तदस्य सर्व पाप्मानं हन्ति ॥ १८ ॥
वह अध्वर्यु - तीन बार तो अभिषव करता है अर्थात् तीन बार प्रश्ममय ग्रावा से सोम पर प्रहार करता है एवं तीन बार ही संभरण करता है एवं चार बार निग्राभोपायन ( प्रागपागुदगधराक् ० - इत्यादि मन्त्र का जप चार बार ) करता है । इस प्रकार सोमाभिषव में कुल १० संख्या हो जाती | विराट् छन्द १० ( दस ) अक्षर का होता है एवं यह सोम वैराज कहलाता है । अतएव इस विराट् के लिए-[ ६६५ ]
पृष्ठ 680
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ० 8 ) शतपथ ब्राह्मणं अधिषवण ब्राह्मण " दशाक्षरा के विराट् ' ' और ' वैराजः सोमः २ यह कहा जाता है । इसलिए सोम वैराज कहलाता है । बस, उस वैराज सोम- सम्पत्ति को इस सोम में डालने के लिए १० ( दस ) बार करके सोम -सम्पादन करते हैं-" स वै त्रिरभिषुरणोति, त्रिः संभरति- चतुन्निग्राभमुपैति ( निग्राभोपायनं ' प्रागपादित्यादि मन्त्रजपः तत् चतुर्वारं कर्त्तव्यमिति भावः ) तद्दश । दशाक्षरा
वै विराट् वैराजः सोमः । तस्माद् दशकृत्वः सम्पादयति " ॥१ ९ ॥
" प्रागपा ० ' 11 इत्यादि वक्ष्यमारण मन्त्र से निग्राभोपायन किया जाता है । सारी दिशाओं में जा कर सोम को अपनी ओर मन्त्र द्वारा प्राप्त करना ही - ' निग्राभोपायन ' कहलाता है । बस यही उपपत्ति बतलाते हैं-" अथ यत् ( यस्मात् कारणात् ) निग्राभमुपैति ( तदुच्यते ) " । यह सोम सृष्टि के प्रारम्भ में जिस समय देवताओं का हवि बना उस समय " मैं इन दिशाओंों के साथ प्रिय सुरक्षित स्थान से अपना सम्बन्ध कर लूं, जिससे कि मैं देवताओंों का हवि न बनूँ " इस विचार से सारी दिशाओं की ओर दौड़ पड़ा । अर्थात्- पहले दिशानों से मिथुन - भाव को प्राप्त हो जाऊँ एवं उनके द्वारा अपने प्रिय शरीर से उनमें अपना स्थान कायम कर लूँ - अर्थात् जिन मेरे प्यारे धामों - शरीर _स्थानों - अर्थात् शरीरावयवों को देवता हवि बनाना चाहते हैं - उन्हें दिशाओं में छुपा दूं- इस गर्ज से वह " दिशाओं में व्याप्त हो गया । परन्तु देवता जानते थे कि कुछ भी हो - निग्राभ की तरफ इसे अवश्य ही झुकना पड़ेगा क्योंकि निग्राम ( आन्तरिक्ष्य रस ) इसे बहुत ही प्यारा लगता है । अतएव - इस उपाय को सोच कर देवताओं ने निग्राभोपायन किया । बस, इसके द्वारा उन देवतानों ने दिशाओं से मिथुनीभूत अपनी ओर आकृष्ट कर लिया । सूर्य्य बीच में है । चारों ओर सोम है - यही सोम दिक् - सोम नाम से प्रसिद्ध है । यह सारा सोम-निग्राम्या की ओर - प्रान्तरिक्ष्य रस की ओर - प्रनुगत रहता है एवं वहाँ इकठ्टे हुए सोम को देवता चूसा करते हैं । श्रपिच - भुवन स्वर्गवासी देवताओं ने सर्वतः व्याप्त सोम को अपने यज्ञ में शामिल करने के लिए प्रकृतिवत् निग्राभोपायन किया था तथैव यह भी निग्राभ्योपायन द्वारा सोम को यज्ञ में शामिल कर लेता है । बस, निग्राभ्योपायन का एकमात्र यही फल है -" यत्र वा seats ग्रे देवानां हविर्बभूव तद्धेमा दिशोऽभिदध्यौ । श्राभि-feforfa प्रियेण धाम्ना संस्पृशेयेति । तमेतद्देवा श्रभिद्दग्भिमिथुनेन प्रियेण धाम्ना समस्पर्शयन् । यन्निग्राभमुपायत् । तथोऽएवैनमेषऽएतदार्भािद्दग्भिमथुनेन " प्रियेण धाम्ना संस्पर्शयति यन्निग्राभमुपैति ॥ २० ॥
१ ' शत ० १।१।१।२२ ' । २ ' कौ ० ब्रा ० ६१६ ' । [ ६६६ ] '