Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 81–90

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 81–90

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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण-कहा जाता है एवं पृथिवी के अग्नि का नाम अङ्गिरा है । बस, उसी प्रङ्गिरा अग्नि से पार्थिव अग्नि से -प्रार्थना की जाती है भाप नमोक्त प्रायु नाम धारण कर अर्थात् श्रान्तरिक्ष्य और दिव्याग्नि को अपने में शामिल कर यज्ञ में पधारिए - यही तात्पय्यं है । प्रपिच ' आयु ' शब्द कहने का एक रहस्य और भी है । ये तीनों ही भाग गए थे - इसका तात्पर्य यही था कि तीनों की सत्ता उच्छिन्न हो गई थी । सत्तोच्छिति का नाम ही तो प्रायुनाश हैं । आयु कहना उसमें प्रतिबल स्थापन करना है । इसी अभिप्राय से कहते हैं--" स यत् प्राधन्वंस्तदायुर्दधाति " । इस प्रकार मन्त्र बोल कर खोदी हुई जो मिट्टी है उसे उत्तरवेदि की ओर बड़ी सावधानी से पहुँचाते हुए यह मन्त्र बोलना चाहिए-" तत् समीरयति ( उत्तरवेदि प्रति सम्यक् प्रेरयति ) योऽस्यां पृथि-व्यामसि " । जो आप इस भूमि में थे- ऐसे आपको ( अग्नि को ) मैं ले जाता हूं - यही मन्त्रार्थ है । इस प्रकार मन्त्र बोल कर वहां ले जा कर यह बोलता हुआ उसे वहां स्थापित कर देता है-" यत्तेनाधृष्टं नाम यज्ञियं तेन त्वादधे " । ( वा ० सं ० ५।६ ) हे तिरोहिताग्नि युतमृत्! आपका जो अहिस्य - यज्ञीय भाग है - उसके साथ मैं आपको यहाँ स्थापित करता हूँ । यह कह कर तीनों को निकाल कर रख देता है । यदि तीनों अग्नि मिल जाते हैं तो यहां अग्नि प्राबल्यात् असुर ाक्रमण नहीं कर सकते हैं अतएव अनाधृष्ट कहा है । पृथिवी के आधे हिस्से पर तम का अर्थात् असुर - राक्षसों का राज्य रहता है, आधे पर प्रकाश का राज्य रहता है । जिस ओर प्रकाश का राज्य रहता है वह देव -- प्रारण सम्बन्धात् यज्ञीय भाग कहलाता है और पृष्ठभाग प्रयज्ञीय कहलाता है । आज यह ऋत्विक् राक्षसों से - अनाधृष्ट जो यज्ञीय नाम का हिस्सा है - उसे ही यज्ञ में रखता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" यत्तेनाधृष्टं रक्षोभिर्नाम यज्ञियं तेन त्वाऽऽदध इत्येवैतदाह " । चूँकि आप्या सहित चार अग्नि भागे थे अतएव चारों के सम्बन्ध से यहाँ पर चार ही बार मिट्टी लाई जाती है । इसमें तीन बार तो पूर्वोक्त मन्त्रों से लाई जाती हैं । अब चौथे को निम्नलिखित मन्त्र बोल कर लाते हैं - ' तु त्वा देववीतये ' ( वा ० सं ० ६।५ ) । हे श्राहृयमाण अग्ने! पूर्व के तीनों प्रहरणों के साथ ही मैं प्राप का देववीति के लिए आहरण करता हूँ । देवता लोग जिस स्थान पर जिसके द्वारा हविभक्षण करते हैं - उसका नाम देववीति है । ऐसा स्थान यज्ञ हीं । इस अग्नि का आहरण यज्ञ के लिए हो रहा है अर्थात् ' देववीतये ' कहा है । देवताओं के लिए जुष्ट जो आप हैं - उनका ग्रहण करता हूँ-यही तात्पर्य है । [ ६३ ]

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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण " नु त्वा देववीतयेऽइति चतुर्थं हरति । देवेभ्यस्त्वा जुष्टां हरामीत्ये-वैतदाह " । इस चात्वाल के चार कोने होते हैं । चारों अग्नियों को लाने के लिए इन चारों कोनों से मिट्टी लाते हैं । चार ही दिशाएँ हैं । इस प्रकार चारों स्रक्तियों से लाता हुआ यह सारी दिशाओं से ही अग्नि ले आता है । अग्नि की सर्वात्मकता के लिए जिस क्रम से चात्वाल बनाया था उसी क्रम से चारों स्रक्तियों से मिट्टी लानी चाहिए - यही तात्पर्य है --" तां वै चतुःस्रतेश्चात्वालाद्धरति । चतस्रो वै दिशः सर्वाभ्यः एवं-नामेतद्दिग्भ्यो हरति ॥३२ ॥

इस प्रकार उत्तरावेदि के लिए मन्त्र पुरस्सर चात्वाल में से मिट्टी आ गई । जब यह आ जाती है तो अध्वर्यु उसका व्यूहन करता है अर्थात् ठीक कायदे से जैसी वेदि की रचना होती है - उस कायदे से मिट्टी को पसारता है । पसार कर उसे वेदि के ढाँचे में कर लेता है एवं व्यूहन करते समय यह मन्त्र बोलता है-“ ह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः कल्पस्व " । ( वा ० सं ० ५।१० ) यह मिट्टी मिट्टी नहीं है - पृथिवी में से निकलने वाली अङ्गिरा स्वरूप वाक् है । इसने देवासुर संग्राम में क्रुद्ध होकर सिंही बन कर देवताओं और असुरों पर हमला किया था - प्राज उसी वाक् का व्यूहन किया जाता अतएव ' सिंहीस ' यह कहा गया है-" सा यदेवादः सिंही भूत्वा शान्तेवाचरत्तदेवैनामेतदाह सिंह्यसीति " । अपि यह पृथिवी- यह सिंही वाक् शत्रुओं के आक्रमण को बर्दाश्त करने वाली है । सारे असुर तमोमयः ) सदा इस पर हमला किया करते हैं परन्तु यह उनकी कुछ भी पर्वाह नहीं करती है । यह सपत्नजित है अतएव ' सपत्न साही ' यह कहा है । वास्तव में हम श्रापकी बदौलत सारे सपत्नों को दबा डालें- उन्हें परास्त कर डालें ' सपत्नसाही ' कहने का यही मतलब है -" त्वया वयं सपत्नान्पापीयसः क्रियास्मेत्येवैतदाह " । यह जो उत्तरवेदि है इस पर यज्ञ - पुरुष अर्थात् वेद पुरुष रहता है प्रतएव हम इस उत्तरवेदि को उस वेद पुरुष की योषा कहने के लिए तैयार हैं । तो जैसे स्त्री अपने गुणों से अपने पति को प्रसन्न करती है तथैव ' देवेभ्यः कल्पस्व ' यह कहता हुआ अध्वर्यु योषा - स्वरूप उत्तरवेदि को देवताओं के लिए प्रसन्न करवाता है । आप योषा रूप बन देवताओं के भोग के लिए भोग - सामग्री बनिए - यही ' देवेभ्य;

कल्पस्व ' का तात्पर्य है ।

" योषा वाऽउत्तरवेदिस्तामेवैतद्देवेभ्यः कल्पयति " ॥ ३३ ॥

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तृतीय काण्ड ( ग्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मणं हमने बतलाया था कि जहाँ से यह मिट्टी लाई जाती है वहाँ शम्या से नाप की जाती है एवं जहाँ पर लाई जाती है वहाँ युग से नाप की जाती है । उस वेदि को चारों ओर से युगमात्री करता है की । युगमात्री अङ्गल की होती है । यज्ञ द्वारा यजमान गर्भ बनकर दिव्यात्मा रूप में उत्पन्न होगा है । पुरुष । पार्थि मात्रा ८४ अङ्गल की है । संसार के यच्च यावत् मनुष्यों का निर्माण पार्थिवाग्नि से । होता पार्थिवाग्नि का वाग्नि प्राप:, फेन, उषा, सिकता, शर्करा, अश्वा, अय:, हिरण्य भेदेन अष्टावयव है नाम गायत्री है । इसके चूँकि आठ अवयव अतएव ' अष्टाक्षरा वै गायत्री ' यह कहा जाता है । होता एक-एक अक्षर एक - एक प्रारण कहलाते हैं । प्रारण की मात्रा एक प्रादेश है । १० अगुल का एक प्रादेश में है । प्रादेशमिता एक प्राण होता है । ' प्रादेश मिताः वै प्राणाः ' यह कहा जाता है । चूँकि गायत्री ८ प्रादेश हैं एवं इसीसे यज्ञपुरुष का निर्माण होता है अतएव पुरुष ८४ प्रगुल का होता है । एक बच्चा भी अपनी नाप से ८४ अङ्गल का है । एक महालम्बा आदमी भी अपनी नाप से चौरासी अङ्गल का है । इस प्रकार पुरुष की यह पहली मात्रा है । दूसरी है - १७ अङ्गल की एवं तीसरी है १२० अङ्गल है तो की । यदि मनुष्य पैर के अंगूठे के बल एडी को ऊँची कर और दोनों हाथ ऊँचे चरम करके सीमा खड़ा है । होता यदि किसी उस समय यह १२० अङ्गल का हो जाता है । बस यही पुरुष के पुरुषार्थ की सकता है । वस्तु को पुरुष अपने कब्जे में करना चाहता है तो अपने स्वरूप से वह इतना ही ऊँचा हो पौरुषं त्रिषु ' इससे अधिक पुरुष का पुरुषत्व काम नहीं कर सकता अतएव ' प्रर्ध्वविस्तृतदोः पाणिनुमाने है । प्रकृत में ८४ और ( अमरकोष, खंड १, मनुष्यवर्गः ८७ ) यह कहा जाता है । बस यही तीसरी नाप १२० इन दो नापों से ही सम्बन्ध । यदि पहली नाप अपेक्षित हो तो उत्तरावेदि युगमात्री ( ८६ ) की होनी ही चाहिए । ८४ वाँ पुरुष का प्रान्तभाग पड़ता है । ऐसी अवस्था में यदि वेदि ठीक ८४ अङ्गुल ओर से चौरस बनाई जाएगी तो इससे वेदि का घोर भाग खिरने का डर रहेगा । यह वेदि खिर जाएगी तो यजमान - आत्मा भी खिर जाएगा । अतएव इसकी रक्षा के लिए है । इसी अभिप्राय से एक अंगुल बढा देना चाहिए । इस प्रकार उत्तरावेदि ८६ अङ्गल की हो जाती कहते हैं-" तां वै युगमात्र वा सर्वतः करोति ( षडशीत्यङ्गुलपरिमिता युगमात्री इति सायणाचार्य: ) " । अथवा यजमान के १०-१० पद ( पाँवडे ) का एक - एक हिस्सा बना देना चाहिए । तक विराट् पुरुष संपत्ति के लिए १० पद की अर्थात् १२० अङ्गुल की उत्तरावेदि बनानी चाहिए होता है क्योंकि एवं एक यहाँ फायदा और का पौरुष रहता है । इस प्रकार यजमान के स्वरूप का भी उल्लंघन नहीं प्रारम्भ में ही बतला हो जाता है । वह यही है कि १० का नाम विराट् है - जैसा कि वेदि ब्राह्मण के, ग्राम्भृणी, बृहती, दिया गया है एवं विराट् ही यज्ञ है । हमने बतलाया है कि पाँचों मण्डलों की सत्या अनुष्टुप् वाक् बृहती अनुष्टुप् और श्रद्धा ये पाँच वाक् है । यहाँ पर इतना और समझ लेना चाहिए लागू कि रहता है । अर्थ की वाक् पर रहती है । अर्थब्रह्म और शब्दब्रह्म दोनों में यह नियम समानरूपेण नाम है अतएव ओर चलिए सूर्य की जो वाक् है - वही पृथिवी की सत्ता रख पाती है । वाक् अग्नि का [ ६५ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण ' तस्य वा एतस्याग्नेर्वाग्वेपेपनिष ( शत ० ब्रा ० १०।५।१ ) ' यह कहा जाता है । यह पृथिवी है - सूर्य का अग्नि भिन्न है । पार्थिवाग्नि भौतिक अग्नि है अतएव हम इसे ' मर्त्य का अग्नि भिन्न प्राणाग्नि है अतएव उसे ' अमृताग्नि ' कहेंगे । इसीलिए सौर प्रारणस्वरूप देवताओं ' कहेंगे । सौराग्नि निर्जरा ' कहा जाता है । इस सौर प्राणाग्नि का नाम जिसे कि वाकू कहेंगे ' बृहती के लिए ' भ्रमरा-बृहती ' वाक् है । सूर्य्य इस वाक् में - अमृताग्नि मण्डल के सोलर सिस्टम के मध्य में केन्द्र में बैठा हुआ ' सूर्यो बृहती मध्यूढस्तपति ' यह कहा जाता है एवं पार्थिव मर्त्या वाक् को तपा नश्वर करता वाक् है अतएव अनुष्टुप कहा जाता है । इसकी सत्ता इसी बृहती वाक् पर रहती है । सूर्य्य ही से पृथिवी की स्थिति को--सूर्य ही पृथिवी की प्रतिष्ठा है । यह तो हुई अर्थब्रह्म की कथा । अब चलिए - शब्दब्रह्म है । पार्थिव जो अनुष्टुप् वाक् है उससे क्- च् - ट् - प् इत्यादि वर्णं उत्पन्न होते हैं । इसी वर्ण वाक् की को पार्थिव ओर । सम्बन्धेन अनुष्टुप् वाक् कहते हैं एवं बृहती वाक् से अ आ इ ई इत्यादि स्वर उत्पन्न होते स्वर्लोक से अर्थात् अमृता बृहती वाक् से उत्पन्न होते हैं अतएव इन्हें ' स्वर हैं । वह वर्ण बिना इन स्वरों के एक क्षरण भी प्रतिष्ठित नहीं रह सकते । बिना स्वर के ' कहा जाता है । यह भी नहीं सकता न प्रतिष्ठा ही हो सकती है । वर्ण का नाम व्यञ्जन है - स्वर उन का वर्णों का उच्चारण स्वर अविनाशी हैं अतएव उन्हें अक्षर कहा जाता है । अक्षर अपनी प्रतिष्ठा स्व महिमा नाम में अक्षर प्रतिष्ठित I रहता हुआ - व्यञ्जनों को भी अपने ऊपर प्रतिष्ठित रखता है । उधर अर्थब्रह्म में भी में प्रतिष्ठित रहता है । इसीलिए तो ' स्वरोऽक्षरम् ' कहा जाता है । एक स्वर ७ व्यञ्जनों सूर्य्यं स्व - प्रतिष्ठा सकता है । ६ बिन्दु तक अक्षर का अपना राज्य है । आकाश में ६ बिन्दुनों की कल्पना को उठा इनमें अक्षर ठीक केन्द्र में बैठा है । पहले का केन्द्र स्थान पाँचवीं बिन्दु होगी । व्यञ्जन कर लीजिए । होता है एवं स्वर एक मात्रा का होता है अतएव व्यञ्जन स्वरूप जो यह बिन्दु है उस आधी से पाँचवीं मात्रा का छठी स्थिति पर स्वर बैठता है । बाकी अक्षर के पृष्ठ भाग में ४ व्यञ्जन बचते हैं और हैं । इन सातों व्यञ्जनों को पाँचवें छठे बिन्दु पर बैठा हुआ अक्षर उठा, आगे ३ व्यञ्जन बचते लेता है । उदाहरण के लिए ' स्त्र्यर्कट् में स् त्र्य् र् क् ट् सात व्यञ्जन हैं और एक स्वर है । इस अकेले स्वर ने सातों व्यञ्जनों को अपने ऊपर उठा रक्खा है । यदि अब एक भी व्यञ्जन अधिक प्रा जाएगातो झट से दूसरा स्वर कूद पड़ेगा! इस प्रकार अनुष्टुप् वाक् को वृहती वाक् ने अर्थात् इन्द्र ने अपने ऊपर उठा अभिप्राय से श्रुति कहती है- रखा है । इसी " अनुष्टुभमनु चचूर्यमारणामिन्द्रं नि चिक्युः कवयो मनीषा " । ( ऋग्वेद मं. १०११२४६ ) अस्तु प्रकृत में हमें यही कहना है कि वाक् पाँच प्रकार की है । ये पाँचों ही प्रमृत मर्त्य भेदेन दो दो प्रकार की हैं । इस प्रकार कुल १० वाक् हो जाती हैं । सारा वाक् प्रपञ्च १० परिमाण होता है एवं १० को कहते हैं विराट् प्रतएव ' दशाक्षरा वै विराट् ' - ' वाग्वै विराट् ' यह में समाप्त पृथ्वी की वस्तु है सो परमेष्ठि की वस्तु है । दोनों के मेल का नाम यज्ञ है एवं दोनों कहा है । अग्नि वाक् को यज्ञ भी कहा जा सकता है । तो बस ऐसी अवस्था में १० पदों से उत्तरावेदि ही बनाना वाक् हैं अतएव -यज्ञ को आत्मसात् करना है-[ ६६ ]

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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण :) " विराट् यज्ञः " | ( तस्माद् दशसंख्या युज्यते इति भावः महावेदि से ऊँची उत्तरावेदि होती है । उत्तरावेदि के बीचों - बीच चौकोर एक छोटी सी - कुछ ऊँची एक वेदि और बनाते हैं । उत्तरावेदि बन चुकी । अब उसके बीच में उससे जरा ऊँची चौकोर वेदि और बनाते हैं । " मध्ये नाभिकामिव करोति " । उत्तरवेदि में चारों ओर घृत का प्राधान किया जाता है । ऐसी अवस्था में एक जगह बैठ कर उत्तरवेदि के चारों ओर आधार करने में बड़ी कठिनाई होती है । इस कठिनाई को दूर करने के लिए ' मैं एक स्थान पर बैठा हुआ ही - उत्तरावेदि के चारों ओर घृत का आधार कर सकूं - इस खयाल घृत से बीच फैल में उत्तरावेदि से कुछ ऊँची वेदी बना देता है । उस पर घृत डालने से सारी उत्तरवेदि में जाता है-" समानत्रासीनो व्याधारयाणीति ( अतः मध्ये नाभिकामिव करोति ) " ॥३४ ॥

होकर - सिंही अब उस वेदि को पानी से छिड़कते हैं । देवासुर संग्राम के समय यह वाक् अशान्त हुई है । पानी शान्तिधर्म्मा है । बन कर चल रही थी । प्राज यही प्रशांत क्रुद्ध वाक् हमारे यज्ञ में शामिल ही शान्त करना । पानी के प्रोक्षण का पहला यही बस, पानी छिड़क कर इससे उसके क्रोध को कारण है-" सा यदेवादः शमयति " । सिंही भूत्वा शान्तेवाचरत् शान्तिरापस्तामद्भिः स्त्री है । इस पर पानी अपि प्रोक्षण का एक कारण और भी है । यह उत्तरवेदि वेद - पुरुष की अधिक प्रसन्न होते हैं । तो छिड़कना - इसके शरीर को सुन्दर और मुलायम बनाना है । इससे - देवतालोग बस, पानी छिड़कता हुआ देवताओं के लिए इसे प्रिय बनाता है " योषा वाऽउत्तरवेदिस्तामेवैतद्देवेभ्यो हिन्वति ( प्रीणयति ) तस्माद-द्भिरभ्युक्षति " ॥३५ ॥

बतलाते है । वह अध्वर्यु प्रोक्षण क्यों करना चाहिए इसकी उपपत्ति बतला दी गई । अब पद्धति हुआ उस पर प्रोक्षण करता है । ' सिंह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः शुन्धस्व ] ( वा. सं. ५।१० पर ) यह डालते मन्त्र हैं बोलता । वेदि योषा है । स्त्री का सौन्दर्य अल-इसके बाद चमकदार बालू रेत के करणों को इस वेदि अलङ्कारस्थानीय है अतएव इसे बिछाया ङ्कार से बढ़ता अतएव चूंकि सिकता चमकीली होने के कारण [ ६७ ]

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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण जाता है | अलङ्कारोन्येव सिकता । आगन्त इवहि सिकता । श्रपि च यह सिकता वैश्वानर अग्नि की है । भस्म है | आप - फेनादि श्राठों पदार्थ इसी से बनते हैं । आठों में जो सिकता है विष्ठा वह इसका प्रवर्ग्य भाग है । भस्म चूँकि अग्नि की विष्ठा है अतएव अग्नि इससे परहेज करता है । धधकते डाल दो । अभी अग्नि गायब हो जाएगी । अध्वर्यु वागाग्नि स्वरूप इस उत्तरावेदि अग्नि में पर बालू रेत आधान करने वाला है । इस अग्नि को यह सिंही अग्नि हानि न पहुँचा दे उसकी विद्युत् नए अग्नि का अतएव बीच में सिकता डाल दी जाती है । चूँकि सिकता से नीचे के अग्नि का विद्युत् को यह दबा दे है - ऐसी अवस्था में इस आहुत होने वाली अग्नि को यह सिंही अग्नि नुकसान नहीं पहुँचाता शान्त जाता उत्तरवेदि पर सिकता डाली जाती है- है । इसीलिए " अग्नेर्वा एतद्वैश्वानरस्य भस्म यत्सिकताः । श्रग्निं वाऽअस्यामाधास्य-भवतिः । तथो हैनामग्निर्न हिनस्ति । तस्मात्सिकताभिरनुविकिरति " । " सह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः शुम्भस्व " । ( वा ० सं ० ५।१० ) वह अध्वर्यु यह मन्त्र बोलता हुआ सिकता डाल देता है । सुन्दरी भव - यही शुम्भस्व है कि वेद - पलाश - देवदारु - विङ्कर इत्यादि यज्ञीय वृक्षों में से किसी एक के पत्ते ला का तात्पर्य को ढक देते हैं । वह रात्रि भर आच्छन्न रहती है । दूसरे दिन उसमें अग्नि का प्राधान कर होता इस उत्तरावेदि है-" अथैनां छादयति सा छन्नैतां रात्रिं वसति " ॥३६ ॥

॥ इति वेदिनिर्माणब्राह्मणं समाप्तम् ॥ ॥ इति पंचमाध्याये प्रथमं ब्राह्मणम्समाप्तम् ॥ [ ६८ ]

पृष्ठ 87

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पञ्चमाध्याये द्वितीयं ब्राह्मणम् ' अग्निप्रणयनं ब्राह्मणम् ' [ मूल ] इध्ममभ्यादधति । उपयमनीरुपकल्पयन्त्याज्यमधिश्रयति स्रुवं च स्रुचं च संमाष्टर्य थोत्पूयाज्यं पञ्चगृहीतं गृह्णीते, यदा प्रदीप्त इमो भवति ॥ १ ॥

अथोद्यद्यन्तीध्मम् । उपयछन्त्युपयमनोरथाहाग्नये प्रह्रियमाणायानुब्रूह्ये-कस्पययाऽनूदेहीत्यनू दैति प्रतिप्रस्थातै कस्फ्ययैतस्मान्मध्यमाछङ्कोर्य एष वेदेर्जघनार्थे भवति तद्यदेवात्रान्तःपातेन गार्हपत्यस्य वेदेर्व्यवछिन्नं भवति तदेवैतदनु-सन्तनोति ॥२ ॥

तद्वै । श्रोत्तरवेदेरनूदायन्ति तदु तथा न कुर्यादेवैतस्मान्मध्यमाछको-रनूदेयात्तऽश्रायन्त्या गच्छन्त्युत्तरवेदिम् ॥३ ॥

प्रोक्षरणीरध्वर्युरादत्ते । स पुरस्तादेवाने प्रोक्षत्युदतिष्ठन्निन्द्रघोषस्त्वा वसुभिः पुरस्तात्पात्वितीन्द्रघोषस्त्वा वसुभिः पुरस्ताद्गोपायत्वित्येवैतदाह || ४ || अथ पश्चात्प्रोक्षति । प्रचेतास्त्वा रुद्रः पश्चात्पात्विति प्रचेतास्त्वा रुद्रः पश्चाद्गोपायत्वित्येवैतदाह ॥ ५ ॥

श्रथ दक्षिणतः प्रोक्षति । मनोजवास्त्वा पितृभिर्दक्षिणतः पात्विति मनो-जवास्त्वा पितृभिर्दक्षिणतो गोपायत्वित्येवैतदाह || ६ || अथोत्तरतः प्रोक्षति । विश्वकर्मा त्वाऽदित्यैरुत्तरतः पात्विति विश्वकर्मा ransfer यैरुत्तरतों गोपायत्वित्येवैतदाह ॥७ ॥

श्रथ याः पोक्षण्यः परिशिष्यन्ते । तद्येऽएते पूर्वे स्रक्ती तयोर्या दक्षिणा तान्यन्तेन बहिर्वेदि निनयतीदमहं तप्तं वार्बहिर्धा यज्ञान्निः सृजामीति सा [ ६६ ]

पृष्ठ 88

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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण अग्निप्रणयन ब्राह्मण यवादः सिंही भूत्वा शान्तेवाचरत्तामेवास्या एतछुचं बहिर्धा यज्ञान्निःसृजति यदि नाभि चरेद्यद्युभिचरेदादिशेदिदमहं तप्तं वारमुमभि निःसृजामीति तमे-तया शुचा विध्यति स शोचन्नेवानुं लोकमेति || || सद्धार्यमाणेऽग्नौ । उत्तरवेदि व्याघारयति यदेवैनामदो देवा अब्रु-वन्पूर्वी त्वाऽग्नेराहुतिः प्राप्स्यतीति तदेवैनामेतत्पूर्वामग्नेराहुतिः प्राप्नोति यद्वेषा देवानब्रवीद्यां मया काञ्चाशिषमाशासिष्यध्वे सा वः सर्वा समद्धष्यतइति तामेना s त्विजो यजमानायाशिषमाशासते सास्मै सर्वा समृध्यते ॥९ ॥

तद्वा एतदेकं कुर्वन्द्वयं करोति । यदुत्तरवेदि व्याघारयत्यथ यैषां मध्ये नाभिकेव भवति तस्यै ये पूर्वे स्रक्ती तयोर्या दक्षिणा ॥ १० ॥

तस्यामाघारयति । सिंह्यसि स्वाहेत्यथापरयोरुत्तरस्यां सिंह्यस्यादि-त्य ः स्वाहेत्यथापरयोर्दक्षिणस्यांसिंह्यसि ब्रह्मवनिः क्षत्रवनिः स्वाहेति बह्वी वै यजुः वाशीस्तद्ब्रह्म च क्षत्रं चाशास्तऽउभे वीर्ये ॥११ ॥

अथ पूर्वयोरुत्तरस्याम् । सिंह्यसि सुप्रजावनी रायस्पोषवनिः स्वाहेति तत्प्रामाशास्ते यदाह सुप्रजावनिरिति रायस्पोषवनिरिति भूमा वै रायस्पोष-स्तद्भूमानमाशास्ते ॥१२ ॥

अथ मध्यप्राघारयति । सिंह्यस्यावह देवान्यजमानाय स्वाहेति तद्देवा-न्यजमानाथावाहयत्यथ सुचमुद्यच्छति । भूतेभ्यस्त्वेति प्रजा वै भूतानि प्रजाभ्य-स्त्वेत्येवैतदाह || १३ | अथ परिधीन्परिदधाति । ध्रुवोऽसि पृथिवीं दुहेति मध्यमं ध्रुवक्षिदस्यन्त-रिक्षं दृहेति दक्षिरणमच्युतक्षिदसिं दिवं बृंहेत्युत्तरमग्नेः पुरीषमसीति सम्भारा-नुपनिवपति तद्यत्सम्भारा भवन्त्यग्नेरेव सर्वत्वाय || १४ || शरीरं हैवास्या पीतुदारु । तद्यत्पैतुदारवाः परिधयो भवन्ति शरीरेणे-वैनमेतत्समर्धयति कृत्स्नं करोति ॥१५ ॥

[ ७० ]

पृष्ठ 89

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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मणं अग्निप्रणयन ब्राह्मण मांसं हैवास्य गुलगुलु । तद्यद्गुलगुलु भवति मांसेनैवैनमेतत्समर्धयति कृत्स्नं करोति ॥ १६ ॥

गन्धो हैवास्य सुगन्धितेजनम् । तद्यत्सुगन्धितेजनं भवति गन्धेनैवैनमे-तत्समर्धयति कृत्स्नं करोति ॥१७ ॥

अथ यद्वृष्णे स्तुका भवति । वृष्णेर्ह वै विषाणेऽन्तरेणाग्निरेकां रात्रि-मुवास तद्यदेवात्राग्नेर्व्यक्तं तदिहाप्यसदिति तस्माद्वृष्णे स्तुका भवति तस्माद्या ator नेदिष्ठं स्यात्तामाच्छिद्याहरेद्यद्यु तां न विन्देदपि यामेव काञ्चाहरेत्तद्यत्प-रियो भवन्ति गुप्त्या एव दूरइव ह्येनमुत्तरे परिधय आगच्छन्ति ॥ १८ ॥

[ अनुवाद ] जिस उत्तरावेदि का पूर्व ब्राह्मण में निरूपण किया गया है, उसका अग्नि ही महावेदि का आहवनीय बनता है । प्रत्येक यज्ञ में गार्हपत्य, श्राहवनीय व दक्षिणाग्नि ये तीन अग्नियाँ होती हैं । सोमयाग में हविर्वेदि का जो ग्राहवनीय है वह महावेदि का गार्हपत्य बनता है । उत्तरवेदि के अन्तर्गत जो अग्नि है वही सोमयाग में आहवनीयाग्नि कह-लाता है । मार्जालीय दक्षिणाग्नि कहा जाता है । सोमयाग के आहवनीय कुण्ड में नया अग्नि प्रज्वलित नहीं किया जाता अपितु गार्हपत्य का अग्नि ही आहवनीय में लाया जाता है । यद्यपि हविर्वेदि के आहवनीय से महावेदि के आहवनीय में अग्नि लाया जाता है न कि गार्हपत्य से, तथापि हविर्वेदि का जो आहवनीय है वह महावेदि का गार्हपत्य ही है । अतः गार्हपत्य से आहवनीय में अग्नि लाया जाता है, यह कथन समुचित ही है । यदि महावेदि के गार्हपत्य से महावेदि के आहवनीय में अग्नि ले जाया जाए तो गार्हपत्य निरग्निक न हो जाय । अतः गार्हपत्य में श्रग्नि- बाहुल्य के लिए अध्वर्यु उसमें समिधाएँ डालता है । इसी अभिप्राय से कहा है - " इध्ममभ्यादधति " इति । एवं उसी समय ऋत्विक् वहाँ उपयमनी तैयार रखता है । सिकतापात्र ही उपयमनी है क्योंकि उपयम्यते - उपग्रह्यते अग्निराभि: ' इस व्युत्पत्ति से सिकता का नाम उपयमनी है । इस समय एक ऋत्विक् उपयमनी लिए खड़ा रहता है । दूसरा ऋत्विक घृत को तपाने के लिए अग्नि पर रख देता है तथा वही ऋत्विक् स वा सूचि अर्थात् जुहू और उपभृत को पानी से धो कर साफ कर लेता है । इस प्रकार सर्वप्रथम - इध्मा-धान, उपयमनी का उपकल्पन, ग्राज्य का अधिश्रय तथा स्रुवा, स्रुक्र का सम्मार्जन ये चार अङ्गकर्म किये जाते हैं । तदनन्तर उत्तरावेदि में स्थित अग्नि में आहुति देने के लिए तप्त घृत में पड़े हुए तृणादि को निकाल कर आाज्य को शुद्ध कर पाँच बार उपभृत में घृत डाल देता है । इसी गृहीत घृत की उत्तरावेदिस्थ अग्नि में आहुति दी जाएगी । आहुति देने पात्री पर जब में, काष्ठ प्रज्वलित हो जाता है तब चिमटे से उसे उठा लेता है । और उसे उपयमनी जिसमें कि बालुका रेत बिछी हुई है, रख देता है ॥ १ ॥

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 90 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण अग्निप्रणयन ब्राह्मण समिधा अर्थात् यज्ञकाष्ठ के प्रज्वलित हो जाने पर अङ्गार बने हुए उस इध्म को ऊपर धारण कर ले और इध्म पात्र के नीचे उपयमनी पात्री को रख दे । तदन्तर अध्वर्यु होता से नये प्रयिमारणाय अनुब्रू हि ' यह प्रैष करता है । अर्थात् उत्तरवेदि में नीयमान ले जा रहे हैं । इसी प्रकार अध्वर्यु ' ' एकस्पययानुदेहि ' यह प्रैष प्रति प्रस्थाता के लिए करता है । हे प्रतिप्रस्थाता! स्फ्य से रेखा खींच कर उसी मार्ग से तुम अनुगमन करो । प्रति-प्रस्थाता अध्वर्यु कृत प्रैष के अनुसार स्पय के द्वारा खींची हुई रेखा से अध्वर्यु का अनुगमन करता है । हविर्वेदि के आहवनीय के अर्थात् महावेदि के गार्हपत्य के और महावेदि के बीच में तीन विक्रम स्थान रिक्त रहता है । गार्हपत्य से पूर्व की ओर तीन विक्रम पर एक शङ्कु गाड़ा जाता है; वही मध्यम शङ्कु कहलाता है जो महावेदि के पश्चिमार्ध में होता है । प्रति-प्रस्थाता स्फ्य से वहाँ तक एक लाइन खींच देता है, जिसे एक बार ही खींची जाने के कारण एक स्पय कहा जाता है । अन्तः पात ( अर्थात् मध्यमशकु ) से गार्हपत्य और महावेदि के बीच का जो व्यवच्छिन्न स्थान है, स्फ्य से रेखा खींचता हुआ अध्वर्यु गार्हपत्य और महावेदि के अन्तः पात्य व्यवधान को दूर करता है । अन्यथा अग्नि प्ररणयन करते समय गार्हपत्य व महावेदि के व्यवच्छिन्न स्थान हो कर ले जाने पर अग्नि यज्ञवेदि से बहिर्भूत हो जाएगा || २ || कतिपय याज्ञिक गार्हपत्य से प्रारम्भ कर उत्तरवेदि तक स्पय के द्वारा रेखा खींचते हैं । इससे गार्हपत्य और उत्तरावेदि का संधान हो सकेगा । किन्तु भगवान् याज्ञवल्क्य का कथन हैं कि ऐसा नहीं करना चाहिए । मध्यमशङ्कु तक रेखा खींचने से ही गार्हपत्य और महावेदि के व्यवच्छेद का सन्धान हो जाता है । तदन्तर होता, प्रतिप्रस्थाता और अध्वर्यु तीनों उस एक स्फ्य मार्ग से उत्तरवेदि के पास आते हैं ॥ ३ ॥

उत्तरवेदि के पास आ कर अध्वर्यु प्रोक्षणीपात्र ( प्रोक्षणी हेतु जल के पात्र ) को हाथ में लेता है । सर्वप्रथम उत्तराभिमुख होकर अग्नीत् उत्तरावेदि के पूर्व भाग का प्रोक्षण करता है और साथ ही ' इन्द्रघोषस्त्वा वसुभिः पुरस्तात् पातु ' इस मन्त्र का उच्चारण करता है । अर्थात् ' इन्द्र ' पद - रूप घोषित देवता, वसुनों के साथ आपकी असुरादि से रक्षा करें । इन्द्र का वसुनों के साथ भी सम्बन्ध है, जैसा कि ' यथाऽऽदित्यावसुभिः सम्बभूवुः ' इत्यादि श्रुति बतला रही है । प्रादित्यों में एक आदित्य इन्द्र भी है । अतः इन्द्र का वसुनों के साथ सम्बन्ध होने से ' इन्द्रघोषस्त्वा वसुभिः पुरस्तात् पातु ' कहा गया है । इन्द्र ही पूर्व दिशा के दिक्पाल हैं । अतः इन्द्र वसुनों के साथ पूर्व दिशा में रक्षा करें, कहना सर्वथा सङ्गत है || ४ || इसके पश्चात् ' प्रचेतास्त्वा रुद्रैः पश्चात् पातु ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ उत्तरावेदि के पश्चिम भाग का प्रोक्षण करता है । पश्चिम दिशा के दिक्पाल वरुण हैं । अतः ' प्रचेतास्त्वा ' ऐसा मन्त्र में कहा गया है ॥ ५ ॥ }

इसके बाद ' मनोजवास्त्वा पितृभिर्दक्षिणतः पातु ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ उत्तरावेदि के दक्षिणी भाग का प्रोक्षण करता है । सौम्य प्राण पितर कहलाते हैं । सोम उत्तर [ ७२ ] : : f ९ २ f <! व