Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 101–110
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 101–110
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तृतीय काण्ड ( ० १ ) शतपथ ब्राह्मरण आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण पर ही पूर्ण दृष्टि पड़ती है । पूर्णक्षिजित जिसे कि वेद में ' हरित - जन ' और पाश्चात्य विद्वान् ' होराइजन ' कहते हैं — यही लग्न कहलाता है । पृथिवी और आकाश इस स्थान पर भिड़ा हुआ अर्थात् लगा हुआ रहता है अतएव इस स्थान को " लग्न " कहते हैं । इसके ठीक सामने सदा सातवाँ रहता है । आधा पूर्व की ओर का आधा पश्चिम की ग्रोर का एवं ६ स्वय, इस प्रकार अदिति मण्डल हो जाता है । इन सातों के बीच मे पवाँ सूर्य्य बिम्ब रहता है । इससे ३.१ / २ पूर्व और ३.१ / २ पश्चिम प्रकाशमण्डल अभिव्याप्त यही सातों अधोमण्डल में हो जाते हैं, इन्ही को १४ मन्वन्तर कहते हैं, जैसा कि आगे के प्रकरण से स्पष्ट रहता है । हो जायेगा । ३०-३० अंश का अग्नि - सोमात्मक अर्थात् चन्द्रसूर्य्यात्मिक यज्ञ होता है । वे यज्ञ परस्पर सर्वथा भिन्न हैं । चूंकि अदिति मण्डल में ३.१ / २ - ३.१ / २ के हिसाब से ७ यज्ञ हो जाते हैं एवं वां स्वयं सूर्य्यं बिम्ब रहता है, अतएव अदिति के पुत्र माने जाते हैं । अदिति के सदा यह आठ पुत्र ही रहते हैं । एक सूर्य्यबिम्ब है, पूर्व - पश्चिम मिला के ७ यज्ञात्मक पुत्र हैं । बस इसी विज्ञान को बतलाते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं—
" अष्टौ पुत्रासो श्रदितेर्येजातास्तन्वस्परि ।
देवाँ उपप्रैत् सप्तभिः परामार्त्ताण्डमास्यत् ” – इति ॥
" अदितेः तन्वस्परि, ये अष्टौ पुत्रासः जाताः तेषु सप्तभिः देवाँ उपप्रैत् । मार्ताण्डम् परास्यत् ॥ ” अदिति के शरीर पर जो प्राठ पुत्र उत्पन्न हुए थे उनमें से सात पुत्रों को प्रजोत्पत्ति के लिए अदिति ने साथ ले लिए एवं मार्ताण्ड नाम के अपने आठवें पुत्र को छोड़ दिया । सूर्य अग्नि का पिण्ड है । अग्निमर्त्यप्रमृत भेदेन दो प्रकार का है । जो पिण्डाग्नि है वही मर्त्याग्नि है, जो मण्डलाग्नि है वही अमृताग्नि है । सूर्य्य पिण्डस्वरूप है पिण्ड का कभी न कभी नाश अवश्य ही होता है, अतएव पिण्ड को मर्त्य कहते हैं । बस इसीलिए सूर्य्य- बिम्ब को — सूर्य के गोले को कहा है | सृष्टि प्रवर्ग्य भाग से हुआ करती है । सूर्थ्य का जो भाग अर्थात् अग्नि का जो हिस्सा पार्थिव पदार्थों में रहता है, उसी से पार्थिव पदार्थों का स्वरूप बनता है । सूर्य्य का पिण्ड ज्यों का त्यों रहता है, प्रजोत्पत्ति से उसका कोई ताल्लुक नहीं । इसके १८० अंशात्मक में व्याप्त रहने वाला प्रकाश-मण्डल है, ताप है - वही प्रजोत्पत्ति करता है । ३. १ / २ पूर्व - ३.१ / २ पश्चिम इस प्रकार ७ देवतात्रों से ही जगत् का निर्माण होता है । अमृत भाग से सृष्टि होती है । सूर्य्यं तो मर्त्य है — पिण्ड है | भला उससे सृष्टि क्यों कर हो सकती है । उसके प्रकाशमण्डल से - संवत्सरमण्डल से - जो कि सप्तावयव है - सृष्टि होती है । — प्रजापति — यही संवत्सर है । इसीलिए तो " संवत्सरो वै प्रजापतिः " - यह कहा जाता है । सम्पूर्ण [ ८३ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण कथन का तात्पर्य यही हुआ कि सूर्य्य - बिम्ब के सहित जो अदिति के आठ यज्ञस्वरूप पुत्र हैं उनमें से ७ से अर्थात् संवत्सर यज्ञ से सृष्टि का निर्माण होता है एवं सूर्य्य पिण्ड - मार्ताण्ड – सृष्टि — निर्माण— प्रक्रिया से अलग रहता है । बस इसी अभिप्राय से-“ परामार्ताण्डमास्यत् ” - ( मार्ताण्डं परास्यत् ) यह कहा गया है || २ || इसी मन्त्र का भाष्य करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं- “ अदिति के वास्तव में ग्राठ ही पुत्र हैं- " प्रष्टो ह वै पुत्रा श्रदितेः ” । अदिति के जो आठ पुत्र बतलाए हैं, उनमें जो देवता ' आदित्य ' नाम से व्यवहृत होते हैं, वे तो सात ही हैं । अर्थात् सृष्टि प्रक्रिया में प्रदानविसर्गात्मक यज्ञ में उपयोगी तो सात ही देवता हैं । वास्तव में बात सच है, संवत्सर यज्ञ से सृष्टि होती है । इसी अर्थ को पेट में रखते हुए कहते हैं— " परंस्वित् देवा श्रादित्या इत्याचक्षते सप्त हैव ते " । पूर्वोक्त जो सातों पुत्र उत्पन्न किए वे विकृत हैं । परन्तु इस मार्ताण्ड नाम के वें पुत्र को प्रदिति ने विकृत ही उत्पन्न किया । सूर्य्य इन सातों आदित्यों की प्रकृति है एवं सातों इसकी विकृति हैं । सूर्य्य पिण्ड ही से तो यह प्रकाशमण्डल निकला है । पुत्र की प्रकृति जैसे पिता है - तद्वत् सातों आदित्यों की प्रकृति भगवान् सूर्य्य है । इसी अभिप्राय से— " अविकृतं हाष्टमं जनयांचकार मार्ताण्डम् " । अविकृत है इसका तात्पर्य एक और भी है । वीर्य्यं की पिण्ड जब माता की योनि में प्रविष्ट होती है तो वहाँ बैठा हुआ त्वष्टा नाम का वायु उसे विकृत कर देता है । हाथ, पाँव, नाक, कान, मुँह इत्यादि अवयव निर्माण के लिए वीर्य्यं का विशकलन कर देता है । उसी विशकलन क्रिया से शरीरावयव निर्माण होता है । तो जैसे वीर्य्य - बिन्दु विकृत रहती है, जैसे त्वष्टा से विकृत होकर गर्भ हाथ, पैर, नाक, मुँह वाला हो जाता है, तद्वत् यह सूर्य्य- बिम्ब हाथ, पैर वाला नहीं है । वह तो अविकृत है । गोल-मटोल है, वर्तुल वृत्त है । सर्वतः पाणिपाद है, इसीलिए कहा जाता है—
“ सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षि शिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥
वास्तव में ठीक है जो वर्तुलवृत्त है उसमें कर चरणादि करते हुए कहते हैं कि वह पिण्ड संदेघ था अर्थात् घिलमिल था । वास्तव में बात सच है, जो गोल वस्तु होती है— उसका कहीं अन्त [ ८४ ] विकार कैसा । इसी का स्पष्टीकरण उसके छोर का कहीं पता ही न था । ही नहीं होता ।
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तृतीय काण्ड ( ० १ ) प्र शतपथ ब्राह्मण आग्नावष्णवेष्टि ब्राह्मण “ संदेघ हैवास ” — “ यावाने वोर्द्ध स्तावान्तिक " ( गोल वस्तु ऐसी ही होती है ) – यह तो हुआ एक मत । अब कितने ही वैज्ञानिक कहते हैं कि यह सूर्य्य बिम्ब तो पुरुष के माफिक ही था । जैसा आकार पुरुष का है, वैसा ही इसका है । उनका कहना भी एक प्रकार से ठीक है । सूर्थ्य का जो गोला है वह तो मस्तक स्थानापन्न हो सकता है, एवं पृथिवी पर जो सूर्य का प्रकाश मण्डल संसक्त होता है - वही पैर हैं, एवं पूर्व पश्चिम में पसरने वाला प्रकाश हस्त स्थानीय है एवं सूर्य्य बिम्ब से लेकर पृथिवी तक के बीच का प्रकाश भाग धड़ है, अतः हम सूर्य्य को पुरुषाकार कह सकते हैं । एक बात और दूसरी लीजिए । पुरुष का जो मस्तक है, उसमें और हिस्सों की अपेक्षा चेतना अर्थात् विज्ञान अधिक रहता है । वह विज्ञान उत्तरोत्तर कम होता जाता है । यहाँ तक कि पैरों तक आते - आते तो विज्ञान का सर्वथा प्रभाव ही हो जाता है । सूर्य्य में भी यही बात है । सूर्य का जो बिम्ब है वह ज्योतिर्धन है । उत्तरोत्तर वह घनता कम होती जाती है । यहाँ तक कि पृथिवी पर आते - आते तो घनता एकदम मारी जाती है । जिस ज्योतिर्धन की तरफ हम एक सैकण्ड भी नहीं झाँक सकते, उससे निकले हुए पृथिवी पर आने वाले प्रकाश की हम कोई परवाह ही नहीं करते । बस इस कारण से भी इसे पुरुष सम्मत कहा है । इसी अभिप्राय से— " यो s सावादित्येपुरुषः सोऽसावहम् " यह कहा जाता है । सूर्य के पुरुषत्व में वैज्ञानिक भाव बतला दिया गया । परन्तु जो प्रमाणभाक् हैं उनके लिए प्रमाण देना चूंकि आवश्यक है अतः प्रमाण भी बतला देते हैं । श्रुति कहती है- " द्यौमूर्द्धा......... इति । बस इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं— " पुरुष संमित इत्युक आहुः " ॥ ३ ॥
सूपिण्ड घन है, वह संदेव है, उसमें सारे प्राण घिलमिल हैं । उसमें प्राणों का विशकलन नहीं है । विशकलन प्रकाशमण्डल में आ कर होता है । जो संवत्सर यज्ञ है, उसी में प्रारण विभाग होता है । सूर्य्य प्राणघन है इसीलिए - " प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्थ्यः " — कहा जाता है । ऋतु विभाग से सारे प्रारण विकलित रहते हैं । आकाश में सारे प्राणों का जमाव हो रहा है । भिन्न - भिन्न प्रारणों के स्रोत परस्पर अलग होते हुए भिन्न - भिन्न काम करते रहते हैं । हाड, मांस, चर्बी, त्वचा, चर्म्म, मज्जा, शुक्र, शोणित, दधि, मधु, घृत, रस, उपरस, विष, उपविष, सोना, चांदी, लोहा, तांबा, जस्त, पीतल, काँसा, हीरा, पन्ना, माणिक, पुखराज इत्यादि - इत्यादि जितने भी पदार्थ हैं, उन सबका निर्माण इन्हीं सौर प्रारणों होता है । इन प्रारणों के तारतम्य से ही पदार्थों में वैचित्र्य होता है । किसी में कोई प्रारण अधिक है, तो किसी में कोई कम । किसी में क्या शक्ति है, किसी में क्या । हमारे घरमें प्राघुणिक आवेगा, विज्ञान का गर्द करने वाले हमें इसका पता भी नहीं रहता, परन्तु हमारे से सर्वथा कम प्रारण मात्रा रखने वाला कौवा इस प्राघुणिक श्रागमन को समझ जाता है। परन्तु साथ ही में हम जैसे बोलते हैं, वैसे वह बोल नहीं [ ६५ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मणं आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण सकता । कहने का तात्पर्य यही है कि किसी में क्या शक्ति है - किसी में क्या है । यह शक्ति तारतम्य प्राणाधीन है । एक आम का फल हाथ में लीजिए, उसमें आप अनन्त प्राण समष्टि पावेंगे । एक प्रारण तो ऐसा था - जिसने उसे हरित बना रक्खा था, आज इसका वह प्राण निकल गया एवं पीला बनाने वाला प्राण इसमें प्रविष्ट हो गया । एवमेव एक प्राण ऐसा है जिसने इसकी अस्थि का अर्थात् गुठली का निर्माण कर दिया । एक प्राण ऐसा है जिसने गूदे का अर्थात् मांस का निर्माण कर दिया । एक प्रारण ऐसा था जिसने गुठली के भीतर एक कच्ची गुठली का अर्थात् मज्जा का निर्माण कर दिया । कहने का तात्पर्य यही है कि यह प्राण अनन्त है । प्रत्येक वस्तु में अनन्त प्राण रहते हैं । जिसमें जो प्राण नहीं रहता उसमें उसी की कमी रहती है । किसी का मस्तिष्क राजनीति में प्रवीण है तो किसी का धर्म्मनीति में । किसी का परोपकार में है तो किसी का अपकार में । सम्पूर्ण कथन का सारांश यही है कि जगत् का वैषम्य साम्य जो कुछ है, जगत् के जो कुछ पदार्थ हैं, जो " है " कहने लायक है वह इसी प्राण की महिमा है, जिसका कि धाता सूर्य्य है । इसीलिए भगवती श्रुति कहती है-" नूनं जनाः सूर्येणप्रसूता प्रयन्नर्यः कृण्वन्नपांसि । " यह प्राण अनन्त है । प्राण ही को वैदिक परिभाषा में " ऋषि " कहते हैं । जैसा कि श्रुति कहती है-“ श्रसद्वेदमग्र आसीत् । तदाहुः किं तदासीदिति ऋषयो वाव तदग्रेऽसदासीत् । तदाहु: केते ऋषय इति, प्राणा वा ऋषयः " । ( श ० ६।१।१।१ ) वेद भगवान् कहते हैं कि यह ऋषि अर्थात् प्रारण अनन्त हैं । इनको समझना बड़ा दुष्वार है— " विरुपास इऋषयस्त इद् गम्भीर वेपसः । तेऽङ्गिरसः सूनवस्ते अग्नेः परिजज्ञिरे ॥ ( ऋ ० १०।६२।५ ) यह प्राण व्यवस्था प्राणों की काँट - छाँट उस मण्डल में प्रतीत नहीं होती । वह तो संदेघ है । वह जब पदार्थों के निर्माण में उपयुक्त होता है तब उसके संदेघ भाव की निवृत्ति होती है । आदित्य हमने १२ बतलाए थे, उनमें ८ तो बतला ही चुके । बाकी बचते हैं ४ । उनके नाम हैं-मित्र, वरुण, पर्जन्य, विवस्वान् । सारे खगोल को पूर्व और पश्चिम – इन दो भागों में विभक्त कर दीजिए, जो पूर्व का कपाल है उसका नाम मित्र है, पश्चिम कपाल का नाम वरुण है । जो प्राती हुई वस्तु है, उसका नाम मित्र है, जाती हुई का नाम वरुण है । रात्रि के १२ बजे बाद से सूर्य्यं हमारी ओर आता है एवं दिन के १२ बजे बाद से जाने लगता है । इसीलिए पूर्व कपाल को मित्र कहा गया है एवं [ ८६ ]
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बृतीय काण्ड ( अ ० १ ) शतपथ ब्राह्मण श्रग्नावेष्णवेष्टि ब्राह्मणं पश्चिम को वरुण कहा गया है । यही मित्रवरुण की सामान्य परिभाषा है । तीसरा है— पर्जन्य, यह सारे मण्डल में एक़ल्ला है । चौथा है— विवस्वान् - यह सारे मण्डल में पूरा है । प्रकृत में इसी विवस्वान् प्रजापति का सम्बन्ध है । हमने बतलाया था कि सूर्य का जो गोला है - वह संदेघ है, जितना ही ऊपर है, उतना ही नीचे है । गोल वस्तु के केन्द्र में से आप ऊपर नीचे चाहे जिधर नाप लीजिए, आपको वह एकसार मिलेगी । इस संदेघ की निवृत्ति अर्थात् प्रारण - विकृति, प्राण- विशकलन संवत्सर मण्डल में जिसे कि हम विवस्वान् प्रजापति कहेंगे- - कर होती है । इस विशकलन के कारण वे ही ७ आदित्य हैं जिनकी समष्टि को हमने यज्ञ किंवा संवत्सर बतलाया था । संवत्सर में ६ ऋतु होती हैं, कहने को ६ हैं वास्तव में अनन्त हैं प्रत्येक वस्तु क ऋतु भिन्न - भिन्न है । जिसकी ऋतु होती है उसमें वही वस्तु उत्पन्न होती है । भ्ररणी पर जब सूर्य्य आवेगा तभी शहत ऊपर से नीचे गिरेगा । सब प्राणों की ऋतु विभागेन व्यवस्था नियत है । यह ऋतु व्यवस्था संवत्सर में होती है, संवत्सर ही में वे आदित्य सातों देवता हैं, श्रतएव हम कह सकते हैं कि इस प्राण - विकलन के संदेध निवृत्ति के अधिष्ठाता यही आदित्य देवता हैं । बस इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं— उस सूर्य्य पिण्ड से अपनी प्रकृति से उत्पन्न होने वाले — उन देवता प्रादित्यों ने कहा कि, हम सबको इसी ने पैदा किया है, अतः हमको वैसा उपाय करना चाहिए जिससे कि यह बिगड़े नहीं, अपितु स्वस्वरूप में स्थिर रहे— " तउ है ऊचुः - देवा श्रादित्याः - यदस्मानन्वजनि मा तत् - प्रमुयेवभूत् 19 भला अपन इसकी संदेघ निवृत्ति कर इसकी छाँट कर दें अर्थात् इसके प्राणों का विभाग कर उसे सृष्टि क्रम में लगादें । जब तक आदान विसर्गात्मक यज्ञ होता रहता है तभी तक उस पदार्थ की स्थिति रहती है । सूर्य में से हर वख्त अनन्त प्रारण संवत्सर द्वारा पृथिवी में आकर पदार्थों में परिणत होते रहते हैं, एवं हर वख्त ' पार्थिव पदार्थ सूर्य्याग्नि में हुत होते रहते हैं । बस इस प्रदान विसर्गात्मक यज्ञ से ही सू की सत्ता है । यदि सू - पिण्ड में से प्रारण विभक्त हो कर पार्थिव सृष्टि का निर्माण न करे तो सूर्य्य - पिण्ड यज्ञ बन्द होने से उसी समय नष्ट हो जाय । जब उसमें से प्रारण निकलेंगे ही नहीं तो पदार्थ ही नहीं बनेंगे, जब पदार्थ ही नहीं तो फिर उस सौराग्नि में आहुति किसकी होगी, अतः सूर्य्य पिण्ड की स्थिति के लिए उसके प्राण विभाग की परम आवश्यकता है । बस इसी प्रकृतिसिद्ध विज्ञान को बतलाते हुए कहते हैं- " हन्त इम विकरवामेति " । अपन इसका विभाग कर दें अर्थात् प्रदान विसर्गात्मक यज्ञ में प्रवृत्त कर दें । यह विचार कर देवताओं ने उसको विभक्त कर दिया । जैसे कि यह पुरुष विकृत है । शुक्र बिन्दु त्वष्टा वायु द्वाराः जैसे हाथ, पैर, अस्थि, मज्जा, मांस वगैरह - वगैरह स्वरूपों में परिणत कर दी जाती है । तद्वत् इन देवताओं ने उन प्राणों की छाँट कर दी, अर्थात् जो प्रारण सूर्य्य - पिण्ड में घन रूप से, संदेध रूप से, अविकृत रूप से थे वे ही इस संवत्सर मण्डल में अर्थात् प्रकाश मण्डल में आकर विभक्त हो जाते हैं । जैसे पुरुष के शरीर अस्थि मांसादि सारे विभक्त हैं तद्वत् उसमें मांस वगैरह सारे अवयव विभक्त हो जाते हैं । हमारे शरीर [ ८७ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मणं आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मणं के मांसादि उन - उन भिन्न - भिन्न प्राणों ही से बनते हैं, जैसा कि पूर्व में बतला आए हैं । चूकि उन - उन प्राणों से ही अस्थि मांसादि बनते हैं अतः हम उनको मांसादि शब्द से व्यवहृत कर सकते हैं । कर नहीं सकते पितु वही मांस है । मांसादि के बीज तो प्राण ही हैं । असली मांस तो वही है । बस इसी अभिप्राय से कहते हैं— " तं विचक्रुर्यथायं पुरुषो विकृतः ” । उस प्रजापति विवस्वान् का जो मांस था उससे इकट्ठा हुआ जो हिस्सा अर्थात् उस विवस्वान् प्रजापति का जो मांस निर्माण करने वाला प्राण है, बना है । था उससे हाथी बना । उसी से हाथी का मांस मांस बनाने वाले प्राण भी अनेक हैं । अतएव सबके मांस भिन्न - भिन्न गुण वाले होते हैं । उनमें से एक जाति के मांस निर्माता प्राण से हाथी बना है । " तस्य यानि मांसानि संकृत सन्यासुः ततो हस्ती समभवत् " " भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि जिस जाति के मांस प्राण से हाथी का शरीर बना है, उसी प्राण से मनुष्य का शरीर बना है । दोनों का मांस एकजातीय है अतः हाथी का दान कभी नहीं लेना चाहिए । क्योंकि अपनी वस्तु का आप ही दान लेना सर्वथा अनुचित है । हाथी के दान लेने से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है— ' तस्मादाहुर्न हस्तिनं प्रतिगृह, गीयात् । पुरुष. जानोहि हस्तीति । ' भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि जिसको उन्होंने विकृत किया वह वही विवस्वान् नाम का आदित्य है । अर्थात् सूर्य्यं से निकल कर अस्थि मांसादि प्राणों वाला जो एक संवत्सर व्यापी प्राण है उसी का नाम विवस्वान् है । इसी विवस्वान् की यह प्रजा है । उसी प्राणप्रदाता संवत्सर व्यापी प्रतएव संवत्सर यज्ञ स्वरूप विवस्वान् से ही इस सारी प्रजा की उत्पत्ति होती । इसीलिए तो इस मन्वन्तर को वैवस्वत मन्वन्तर कहते हैं । भगवान् ब्रह्मा का जो दिन है वह सृष्टि है, रात्रि प्रलय है । दिन - रात ३० मुहूर्त का होता है । एक मुहूर्त्त दो घड़ी का होता है । इस प्रकार दिन - रात में कुल ६० घड़ी होती हैं । मुहूर्त्त ही को वेद में " मनु " कहते हैं । दिन - रात में कुल ३० मुहूर्त्त होते हैं अर्थात् ३० ' मनु ' होते हैं । इनमें से १५ तो रात्रि. में अर्थात् प्रलय में चले जाते हैं, बाकी बचते हैं— १५ । बस सृष्टि इन्हीं में होती है । १५ में से आधा-धा सायं प्रातः की सन्धि में चला जाता है, बाकी बचते हैं १४ । बस चतुर्दश मन्वन्तर ही एक महा-सृष्टि का समय है । प्रत्येक मन्वन्तर में सृष्टि का फरक है । हर मन्वन्तर में विलक्षण सृष्टि होती है । मन्वन्तर चौदह हैं, इनमें ७ तक सृष्टि का चढ़ाव रहता ७ तक उतार रहता है । जो पूर्व के ७ मन्वन्तर हैं उन्हीं में से ७ वें मनवन्तर को वैवस्वत मनु कहते हैं, इसके पहिले चाक्षुष - मन्वन्तर था, इसके पहिले श्राद्ध मन्वन्तर था । गरज यह है कि ६ मन्वन्तर पहिले हो चुके हैं । अभी सातवाँ मन्वन्तर है । ब्रह्मा के दिन के अभी १ १/२ बजे हैं इसीलिए संकल्प में - " ब्रह्मणो द्वितीय प्रहराद्ध " बोला जाता है । जब १२ बज जायेंगे, वैवस्वत कल्प समाप्त हो जायगा । इसके बाद पूर्व के सातों को जोड़ कर उत्तरोत्तर उतार वाले सात मन्वन्तर और आवेंगे चूंकि ये सातों पूर्व के जोड़ के होंगे, अतएव यह " सावरण ' [ ८८ 1
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण श्राग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मणं मन्वन्तर कहा जाता है । वैवस्वतान्त विकास है, बाद में ह्रास है । हमें प्रकृत में केवल इतना ही बतलाना है कि श्राजकल की जो प्रजा है वह वैवस्वतादित्य की प्रजा है । बस इसी अभिप्राय से कहते हैं—
“ यमु ह तद् विचक्रुः, स विवस्वानादित्यः । तस्येमा प्रजाः ” ॥४ ॥
आदित्य चरु निर्वाण करने वाले महर्षि कहते हैं कि - " वह आदित्य कहता है कि जो मेरे चरु का निर्वाण करेगा उसकी वह प्रजा बढ़ेगी । अर्थात् आदित्य चरु से प्रजा - वृद्धि होती है । महर्षि कहते हैं कि हँसी नहीं है, वास्तव में वह यजमान और उसकी प्रजा बढ़ती है, जो इस प्राकृतिक विज्ञान को जानकर आदित्य के लिए चरु - निर्वाप करता है—
" स होवाच - राध्नवान् मे स प्रजायां य एतमादित्येभ्यश्वरु ' निर्वपात् ।
राध्नोति हैव य एतमादित्येभ्यश्वरु निर्वपति ॥
बस आदित्य चरु का निर्वाण करने वाले – यही उपपत्ति बतलाते हैं । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि वास्तव में आपकी उपपत्ति ठीक है परन्तु क्या करें! ऐतरेय के प्रबल विज्ञान के सामने आज सारे सम्प्रदायों के आग्नावैष्णव चरु ही प्रख्यात हैं । अतः दीक्षणीयेष्टि में
एकादश कपाल पुरोडाश ही करना चाहिए ।
" श्रयं त्वेवाग्नावैष्णवः प्रज्ञातः ” ॥५ ॥
इति आ आ.वै.ए.क. . वै. ए. क.पु. स्थापनम्, आदित्य - चरुः खण्डनं च समाप्तम् । [ ८ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० १. ) शतपथ ब्राह्मरण अथातो प्रवृतू ( पद्धतिः ) आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मणं दीक्षरणीयेष्टि में श्राग्ना वैष्णव एकादश कपाल पुरोडाश क्यों करना चाहिए, यह बतला दिया गया अब पद्धति बतलाते हैं । दीक्षणीयेष्टि एक स्वतन्त्र कर्म है । इसमें प्रयाजानुयाज पत्नी संयाजादि सारे कम्भ होते हैं । किसी कर्म में एकादश सामिधेनी होती हैं, किसी में सप्तदश होती हैं । यहाँ कितनी होनी चाहिए । प्रकृति - यज्ञ से इसमें कितनी विशेषता है, यह बतला देते हैं । बाकी का सारा कर्म्म – " प्रकृतिवद् विकृतिः कर्तव्या " के अनुसार प्रकृतिवत् करना चाहिए । इस कम्मं की १७ सामिधेनी होती हैं अर्थात् १७ सामिधेनी मन्त्रों का ( ' प्र वो वाजा ' इत्यादि का ) अनुवचन होता है । " तस्य सप्तदश समिधेन्यो भवन्ति " | प्रकृति - यज्ञ में ऊँचे स्वर से मन्त्र बोल कर देवताओं का यजन किया जाता है, परन्तु यहाँ अग्नि और विष्णु देवता का " उपांशु ” ( धीरे - धीरे बोल कर ) यजन करता है - " उपांशु देवते ( श्रग्नाविष्णू ) यजति " । इस कर्म्म में पाँच प्रयाज होते हैं, और तीन अनुमाज होते हैं – पञ्चप्रयाजा भवन्ति, त्रयोऽनुयाजाः ” । ऋत्विक् लोग अन्त में देवपत्नियों का यजन करवाते हैं । बिना इनके यजन के यज्ञ सम्पत्ति प्राप्त ही नहीं होती अतः यज्ञ सम्पत्ति प्राप्त्यर्थ पत्नीसंयाज कर्म्म करना आवश्यक है । बिना पत्नीसंयाज के कर्म्म कैसे अधूरा रहता है, इसकी उपपत्ति प्रथम काण्ड के " पत्नी संयाज " कर्म में देखनी चाहिए-" संयाजयन्ति पत्नीः सर्वत्वायैव " । प्रकृति यज्ञ में समिष्ट - यजु की आहुति होती है परन्तु यहाँ समिष्ट यजु की आहुति नहीं देते हैं । समिष्टय की आहुति देना यज्ञ में से देवताओं को विदा करना है । जो देवता यज्ञ में बुलाए जाते हैं वे समिष्ट हो चुके अर्थात् उनका यजन सम्यक् प्रकार से हो चुका अतः श्रन्त में देवताओं के समिष्ट होने पर यह यजन क्रिया होती है, अतएव इसका नाम समिष्ट - यजु है । जैसा कि प्रथम काण्ड में लिखा है— " अथ यस्मात् समिष्ट यजुर्नाम । या वा यतेन यज्ञेन देवताह्वयति, याभ्य एष यज्ञ स्तायते सर्वा वैतत्ताः समिष्टाः भवन्ति । तत् यत्तासु समिष्टासु अथैतज्जुहोति - " तस्मात् समिष्ट यजुर्नाम " ( पत्नी संयाज ब्राह्मण ) ॥ ( श ० १.६.२.२६ ) प्रकृत में यही बतलाना है कि समष्टि यजु यज्ञ संस्था से बाहर जाना है अतः - " हम इस समिष्ट-यजु कर्म्म को करके इस दीक्षित वस्त्र को पहिनकर यज्ञ समाप्ति के पहिले ही यज्ञ संस्था के अन्त में न चले जायँ अर्थात् यज्ञ से बाहर न निकल जायँ " - अतः समिष्ट - यजु नहीं करना चाहिए ---[ ६० ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण अनावष्णवेष्टि ब्राह्मणं " नेदिदं ( वस्त्रं ) दीक्षितवसनं परिधाय पुरा यज्ञस्य संस्थायान्तं गच्छानि " - इति ॥ याज्ञवल्क्य कहते हैं कि समिष्ट - यजु, यज्ञ का अन्त है । इसके करने के बाद देवता बिदा हो जाते हैं । अतः प्रधान यज्ञ से पहिले ही समिष्ट - यजु नहीं करना चाहिये - " अन्तो हि यज्ञस्य समिष्ट - यजुः ॥६ ॥
बस दीक्षणीयेष्टि समाप्त हो चुकी । तदनन्तर यजमान शाला में पूर्वाभिमुख खड़ा होकर घृत का अभ्यञ्जन करता है अर्थात् सारे शरीर पर घृत का लेप करता है । " प्रथाग्रेण शालां तिष्ठन्नभ्यङ्क्ते । ” क्यों करता है? इसका कारण बतलाते हैं - यह मनुष्य चूंकि प्रवच्छित है, अतएव यह ' अरु ' है अर्थात् घाव वाला है | संस्कार ब्राह्मण में हम वतला ग्राए हैं कि मनुष्य पशु - प्राण में त्वचा निर्माता जो प्राण था उसे भगवान् प्रजापति ने निकाल कर उसे गौ पशु - प्रारण में शामिल कर दिया । वास्तव में यह चर्म्म - प्राण पुरुष- पशु का था परन्तु चूँकि इनमें विज्ञान की अधिक मात्रा प्रदान की थी एवं गौ- पशु में नहीं, अतः इनके चर्म - प्रारण को उनमें दे दिया । जब शरीर पर से चमड़ा उतर जाता है तो शरीर पर घाव हो जाता है । संसार में जितने भी मनुष्य हैं सब उत्कृत्यचम्म हैं अर्थात् अवच्छित हैं । अतएव सब अरु हैं अर्थात् घाव वाले हैं । आज यह दीक्षित सामान्य मनुष्य नहीं है - देवता है, ऐसी हालत में यदि इसके शरीर में घाव रहेगा तो फिर इसकी सामान्यता कथमपि नहीं हट सकती । सामान्यता हटाने का, इसको ‘ ग्रनरु ' बनाने का एकमात्र उपाय नवनीत ही है । वह नवनीत भी गाय का होना चाहिए । कारण इसका यही है कि गाय में मनुष्य - पशु का चर्म्म है । मनुष्य पशु के चर्म्म प्राण को गाय में ही शामिल किया गया है अतः वह इस पुरुष की अपनी चीज है । इस प्रकार से गाय के नवनीत से इस यजमान का अभ्यञ्जन करते हुए अपनी ही उसकी खुद की ही त्वचा से इसे समृद्ध करते हैं अर्थात् इसके ' अरु ' भाव को नष्ट करने के लिए, सामान्य मनुष्यत्व को हटाने के लिए, नवनीत स्वरूप स्वयं की त्वचा से समृद्ध करने के लिए – नवनीत का लेप करते हैं । इसके लेप से यजमान अनरु ( बिना घाव का ) हो जाता है, समृद्ध हो जाता है, इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर कहते हैं--" रु पुरुषोऽवच्छितः " ( यतः प्रवच्छितः ततः प्ररुः, इति हेनं गर्भ विशेषणम् ) अनरुरेवैतद् भवति यदभ्यङ्के । गवि वै पुरुषस्य त्वक् । गोर्वा एतन्न-वनीतं भवति । स्वया एवैनं एतत्त्वचा समर्धयति, तस्माद् वा श्रभ्यङ क्ते ॥ " " तस्माद् वां " से अभ्यञ्जन के दो फल सूचित करते हैं । एक तो घाव भर जाता है एवं यजमान समृद्ध हो जाता 11911 जिस द्रव्य का यजमान के लेप किया जाता है, वह नवनीत होता है । जाता है - " तद्वै नवनीतं भवति ॥ " नवनीत ही का लेप क्यों किया जाता है, मक्खन का लेप किया इसका कारण बतलाते [ १ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मरण श्राग्नावष्णवेष्टि ब्राह्मणं । धृत अर्थात् श्राज्य देवताओं की वस्तु है, एवं फाण्ट अर्थात् घनीभूत घृत मनुष्यों की वस्तु है । एवं यह नवनीत न घृत है और न फाण्ट है । अर्थात् न तो घन है और न त'ल है, दोनों के बीच की वस्तु है - " घृतं वै देवानाम्, फाण्टं मनुष्याणाम् । " " श्रयैतना हैंव " घृतं नो फाण्टम् || " घृत अर्थात् प्राज्य एवं फाण्ट अर्थात् घृत में फरक है । जैसा कि कहा है-" सपिविलीनमाज्यं स्याद् घनीभूतं घृतं विदुः ॥ " जो तपा हुआ घृत है वह देवताओं की चीज है, एवं जो घनीभूत घृत है वह मनुष्यों की वस्तु है. एवं जो जरा - सा तपा हुआ है वह पितरों की वस्तु है । बात वास्तव में सच है, देवता प्रारण स्वरूप हैं वे पिण्डरूप में परिणत नहीं रहते । जो पिण्ड देखते हो, वह भूत समष्टि है । यद्यपि पिण्ड में भी प्रारण हैं, क्योंकि भूत और प्राण दोनों अविनाभूत हैं, तथापि प्रतिबिम्बवत् प्राण प्रसंग पदार्थ हैं बस इस ग्रन्थि-बन्धन रहित्व भाव की अपेक्षा से ही - " घृतं वै देवानाम् " कहा है । मनुष्य भूत समष्टि है, घन है अतएव इसके लिए " फाण्टं वै मनुष्याणाम् । " यह कहा है । पितर दोनों के बीच की चीज है अतएव ईषद् विलीन आाज्य को पितरों का बतलाया है, इसी अभिप्राय से तंत्तिरीय ब्राह्मण में भी लिखा है - घृतं वै देवानां -मस्तु पितृ गां, निष्पक्वं मनुष्याणाम् । " ईषद् विलीन ग्राज्य ही को मस्तु कहते हैं । यह कल्पना मात्र नहीं है अपितु य़थार्थ है । तरल पदार्थ में देवता उत्वरण रहते हैं, घन में मनुष्य - प्रारण उल्वरण रहता है, एवं मस्तु में पितृप्राण रहता है । घृत और फाण्ट दोनों दही से निकलते हैं परन्तु नवनीत दूध में से निकलता है । जो दूध में से निकाला जाय वही मक्खन है, उसे ही नवनीत कहते हैं । इस प्रकार यह आज्य और फाण्ट इन दोनों के बीच की चीज है । न यह घृत है न फाण्ट । गर्भ की वस्तु है । यजमान इस समय गर्भ में है । मनुष्यत्व से हट चुका है परन्तु देवता बना भी नहीं है । अभी गर्भ में है, दीक्षान्त गर्भ में से निकल कर यह देव-योनि में चला जायगा, अतः इस समय नवनीत ही से लेप करना चाहिए । गर्भ से ( नवनीत से ) गर्म को ( मध्यपतित यजमान को ) समृद्ध करना चाहिए । यह यजमान न तो इस समय मनुष्य ही है क्योंकि अभी यज्ञशाला में प्रविष्ट हो चुका है, एवं न यह देवता ही है, क्यों कि अभी दीक्षा नहीं ली है, अभी बीच के दर्जे की चीज है अतः देवता और मनुष्यों घृत और फाण्ट के बीच के दर्जे की जो वस्तु है, उसी का लेप करना मुनासिब है । बस इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर - " श्रथैतना हैवघृतं नो फाण्टम् " यह कहा गया है । परन्तु भगवान् याज्ञवल्क्य साथ में कहते हैं कि यह नवनीत दोनों नहीं होकर भी दोनों है, यह घृत भी है और फाण्ट भी है । दूध तो दही बनता है, उसी से तो घृत और फाण्ट निकलता है एवं उसी दूध में से ही तो हम नवनीत निकालते हैं अतः एक प्रकार से इसे घृत भी कह सकते हैं और फाण्ट भी कह सकते हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं- " स्यादेव घृतं स्यात् फाण्टम् " इसे घृत और फाण्ट बतलाने की आवश्यकता क्या हुई, इसका कारण बतलाते हुए कहते हैं - " प्रयातयामतायै । ” घृत देवता की चीज है, फाण्ट मनुष्यों की है । यदि सर्वथा विजातीय पदार्थ का ही लेप किया जायगा तो न यह मनुष्य रहेगा न देवता अपितु या तो पितर हो जायगा अथवा इसमें प्रासुर भाव प्रविष्ट हो जायगा । [ ९ २ ]