Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 111–120
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 111–120
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण अतः दोनों इसमें बने रहें, मनुष्य भाव भी बना रहे, देव भाव भी बना रहे । क्योंकि इस समय इसमें दोनों भाव ही मौजूद हैं बस इसी प्रयातयामिता के लिए ( अव्यर्थता = प्रासुर भाव निवारणार्थ ) नवनीत लिया जाता है । यह नवनीत घृत भी है और फाण्ट भी है । शुद्ध घृत से भी लेप नहीं कर सकते क्योंकि यह सर्वथा देवता नहीं है, एवं फाण्ट से भी नहीं कर सकते क्यों कि यह एकदम मनुष्य भी नहीं है एवं प्रासुर भाव प्रवेश दोष ' भिया ' किसी विजातीय से भी नहीं कर सकते अतः प्रयातयामिता के लिए फाण्ट, घृत स्वरूप अयातयाम इस नवनीत से लेप करके इस यजमान को प्रयातनाम ही बनाते हैं— ' स्यादेव घृतं स्यात्फाण्टमयातयामतायै । तदेनमयातयाम्नैव ( नवनीतेनं व ) अयातयामानं करोति । " इसी अभिप्राय से ऐतरेय श्रुति भी कहती है-" नवनीतेनाभ्यजन्ति । श्राज्यं वै देवानां सुरभि, घृतं मनुष्याणां श्रयुतं पितृणं, नवनीतं गर्भाणम् । तद्यन्नवनीतेनाभ्यञ्जन्ति, स्वेनेवैनं तद्भागधेयेन समर्धयन्ति " ( ऐ ० ब्रा ० प्र ० ३ ख ० ) बस नवनीताभ्यञ्जन की यही उपपत्ति है ॥ ८ ॥
क्यों अभ्यञ्जन करना चाहिए यह बतला कर अब पद्धति बतलाते हैं— यह यजमान पहिले माथे की ओर से लेप करता हुआ पैर की तरफ जाता है । इस प्रकार अनुलोम विधा से लेप करता है - " तमध्यनक्ति शीर्षतोऽग्र प्रापादाभ्यामनुलोमम् । " एवं लेप करता हुआ निम्नलिखित मन्त्र बोलता है-" महीनांपयोऽसि, वर्चोदा असि वर्चो मे देहि ॥ " हे नवनीत तुम गाय के हो, वर्च के देने वाले हो अतः मुझे ब्रह्मवर्चस् प्रदान करो । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं - ' मही ' यह उन गायों के अनेक नामों में से एक नाम है अर्थात् ' मही ' यह नाम गायों का ही है । चूंकि यह इन्हीं का पय है, अतएव - " महीनां पयोऽसि " यह कहा गया है— " मा इति ह वा एतासामेकं नाम यद्गवाम् । तासां वा एतत् पयो भवति । तस्मादाह – “ महीनां पयोऽसिति । " वर्चोदासि वर्चो मे देहि । " इसके लिए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इसका अर्थ तो स्पष्ट ही है - " नात्र तिरोहितमिवास्ति " ॥६ ॥
इति घृताभ्यञ्जनविधिः समाप्तः [ ६३ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मरण श्रग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मणं अथ अञ्जन विधिः प्रारम्भः घृतलेपानन्तर यजमान दोनों आँखों में अञ्जन डालता है - " प्रथाक्ष्यावनक्ति । " क्यों डालता है इसका कारण बतलाते हैं - मनुष्य की जो आँख है, वह ' अरु ' है अर्थात् घाव वाली है | इसमें से पानी चूता रहता है, गीड़ आते रहते हैं अतः यह घाव सदृश है । " श्ररुव पुरुषस्याक्षि । ” याज्ञवल्क्य कहते हैं कि - " मेरी आँखों में शान्ति हो जाय, उनका घाव मिट जाय, उनमें ठंडक हो जाय " बस यही प्रञ्जन डालने का कारण है - " प्रशान् मम " - इति ह स्माह याज्ञवल्क्यः । इसी का स्पष्टी-करणकरते ' हुए कहते हैं - यह आँखें ' दुरक्ष ' की तरह ही हैं अर्थात् बिना अञ्जन के आँखें खराब रहती हैं - यही तात्पर्य है । इस यजमान की आँखों का जो नेत्रमल है अर्थात् गीड़, पानी वगैरह है, वह पूय है अर्थात् दुर्गन्धियुक्त है — " पूयो हैवास्य दूषिका ", इसीलिए - " दूषिका नेत्रयोर्मलम् ” – यह कहा जाता है । चूंकि यजमान देवमण्डली में शामिल होने वाला है, पूय श्रासुर भाव है अतः उसे हटा कर आँखों के अरु भाव को नष्ट करके ही दीक्षा लेनी चाहिए । तो बस जो कि यह यजमान आँखों में ग्रञ्जन डालता है वह उन अपनी दोनों आँखों को अनरु बनाता है । तात्पर्य यही है कि दुर्गन्धि को हटाने के लिए दीक्षित को अवश्य ही ग्रञ्जन लगाना चाहिए । " ते एवैतदनरुष्करोति यदक्ष्यावानक्ति । " बस अञ्जन लगाने का पहिला कारण यही है || १० || यह तो हुई साधारण उपपत्ति, अब इसकी वैज्ञानिक उपपत्ति बतलाते हैं । पूर्व के ब्राह्मणों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि यह सारा महा ब्रह्माण्ड स्वयम्भू परमेष्ठी, सूर्य्य, चन्द्र, पृथिवी, इन पाँच मण्डलों में विभक्त है | इन पाँचों में प्रत्येक में ( १ ) वेद, ( २ ) लोक, ( ३ ) प्राण ( ४ ) भूत, ( ५ ) नाड़ी, ( ६ ) मनोता यह ६ - ६ पदार्थ रहते हैं । १ - जो स्वयम्भू मण्डल है, उसके वेद का नाम है - ब्रह्मनिःश्वसित त्रयीवेद । परमेष्ठि मण्डल के वेद का नाम है – भृग्वङ्गिराक्रियात्मक " प्रथर्ववेद । " सूर्य्य - मण्डल के वेद का नाम है - " गायत्री-मात्रिक त्रयीवेद । " एवं प्रथर्ववेद ही चन्द्रमा का वेद है एवं गायत्री मात्रिक ही पृथिवी मण्डल का वेद है । : २ – लोक –स्वयम्भूमण्डल - " वाचां लोक " अर्थात् वाग् लोक कहलाता है, परमेष्ठि - मण्डल को " वायु लोक " कहते हैं, जो कि वायु अम्भः नाम से प्रसिद्ध है, सूर्य्य - मण्डल को - ज्योतिलक " कहते हैं । चन्द्र - मण्डल को— “ अमृत लोक " कहते हैं । एवं पृथिवी - मण्डल को - " रस लोक " कहते हैं । ३ – प्राण – इन पाँचों के प्राणों का नाम क्रमश: ऋषि, पितर देवता, गन्धर्व और मनुष्य है । असुरऔर पशु दो प्राण और बच जाते हैं । इनमें पितृ ननु असुर है अर्थात् असुर प्राण भी परमेष्ठि की वस्तु है । एवं मनुष्यानुपशु है अर्थात् पशु पृथिवो की ही वस्तु है । एवं पाँचों के ग्राकाश, वायु, तेज, जल, [ ६४ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण मिट्टी यह पाँव भूत कहलाते हैं । एवं सत्य और ऋत यह दो नाड़ी है— जिन्हें कि ऋत सत्य सूत्र भी कहते हैं— स्वयम्भू मण्डल की हैं । ऊर्जस्वती और औदुम्बरी यह दो नाड़ी परमेष्ठि- मण्डल की हैं एवं इडा और पिङ्गला दोनों ही सूर्य मण्डल की हैं एवं श्रद्धा नाड़ी चन्द्र मण्डल की है एवं सुषुम्णा नाड़ी पृथिवी - मण्डल की है एवं वेद, सूत्र, नियति तीन मनोता स्वयम्भू के हैं । भृगु, अङ्गिरा अत्रि यह तीन मनोता परमेष्ठि के हैं । ज्योतिः, गौ, आयु, यह तीन मनोता सूर्य्य के हैं । रेतः श्रद्धा, यश यह तीन मनौता चन्द्रमा के हैं । वाक्, गौ, द्यौ यह तीन मनोता पृथिवी के हैं । बस अखिल ब्रह्माण्ड में कुल इतने ही पदार्थ हैं । नीचे लिखी तालिका से यह स्पष्टतया समझ में य़ा जाता है— ( महा ब्रह्माण्ड स्वरूपम् ) स्वयम्भूः परमेष्ठी सूय्य चन्द्रमा पृथिवी १ वेद ब्रह्मनिःश्वसित त्रयीवेदः गायत्री मात्रिक गायत्री मात्रिक अथर्व वेदः अथर्ववेदः वेदः वेदः : २ लोक वाग् लोक: वायु लोक: ज्योति लोकः अमृतलोकः रस लोकः ३ प्राण ऋषयः पितरः ( असुरा ) देवाः गन्धर्वाः मनुष्याः- पशवः ४ आकाशः वायुः तेजः जलम् मृत्तिका ५ नाडी ऊर्ज स्वती-सत्य - ऋत इडा, पिङ्गला श्रद्धा दुम्बरी सुषुम्णा ६ मनोता वेदाः, नियतिः, सूत्रम् भृग्वङ्गिरा - श्रत्रिः ज्योतिगौरायुः रेतः श्रद्धा यशः | वाग् गौ द्यौंः इति पञ्चपुण्डीरा प्राजापत्य बल्शा । पूर्वोक्त ६ नों विशेषों में से जो देवप्राण और असुर प्रारण हैं- इन दोनों का प्रकृत से सम्बन्ध है । परमेष्ठि का जो प्राण है वही असुर है, एवं सूर्य का जो प्रारण है वही देवता है । सूर्य्य पृथिवी से १३ हजार गुना बड़ा है । बस सूर्थ्य ' सोलर सिस्टम ' में जितनी हैसियत पृथिवी की है, सोलर सिस्टम सहित सूर्य्य की परमेष्ठि मण्डल में उतनी ही हैसियत है । उस महापारमेष्ठ्य समुद्र में सूर्य्य एक बुद् - बुद् के समान है । इसीलिए पौरिक - सूर्य्य को बुद् बुद् कहा करते हैं । यह सूर्य्यं परमेष्ठि - मण्डल के पेट में एक कौने में पड़ा हुआ है । परमेष्ठि- मण्डल का प्राप्य प्राण जिसे कि प्रकाश - विरोधी होने के कारण हम असुर कहेंगे, सूर्य्यं पर जिसे कि प्रकाशमय होने के कारण [ ६५ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण श्रग्नावष्णवेष्टि ब्राह्मणं देव- समष्टि कहेंगे – हरवख्त आक्रमण करता रहता है । पारमेष्ठ्य श्राप्य प्राण सौर प्रारण पर अनवरत श्राक्रमण करता रहता है । जो प्रकाश प्रारण हैं उन्हें देवता कहते हैं एवं तमोमय प्रारण को असुर कहते हैं । सूर्य्यं की रोशनी परमेष्ठि मण्डल में नहीं जा सकती श्रतएव उसके प्रारण को हम तमप्रधानत्वात् असुर कह सकते हैं । चूँकि पारमेष्ठ्य ' आप्य ' है अतएव हम प्राप्य प्राण को भी असुर कह सकते हैं | प्राप्य और तमोमय दोनों का एक अर्थ है । ८ वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य, १ प्रजापति, १ इन्द्र इस प्रकार जैसे देवता ३३ जाति के हैं, तद्वत् असुर ६६ जाति के हैं । असुर देवतानों से तिगुने हैं । इसीलिए-" जघान नवतीर्नव " यह कहा जाता है । होना भी ऐसा ही चाहिए, वास्तव में परमेष्ठि की विशालता के सामने सूर्य कोई चीज नहीं । परमेष्ठि मण्डल सूर्य्य से ऊपर है । पानी ही सूर्य्य से पहिले उत्पन्न होता है, अतएव असुरों को स्वयम्भू प्रजापति की ज्येष्ठ सन्तान बतलाया जाता है । यहाँ हमें सिर्फ इतना ही कहना है कि वह प्राप्य - प्राण उस सौरप्राग्नेयप्राण को चारों ओर से घेर कर उस पर हर वस्त हमला किया करता है । परन्तु साथ ही में सूर्य की रमिएँ अपने में आने वाले उस प्राप्य प्राण को प्राणन प्रपान न क्रिया से धक्का दे कर बाहर फेंकती रहती है । उधर से असुर - प्राण आग्नेय - प्रारण पर अर्थात् देवप्राण पर आक्रमण करता रहता है एवं इधर से देवप्रारण धक्का मार कर उसे बाहर निकाला करते हैं । बस यह देवासुर संग्राम प्रकृति में सदा होता रहता है । हमने बतलाया है कि असुर कुल ६६ तरह के | किल ताकुली, जिन्हें कि केल्ट कहते हैं, वृत्र, विश्वरूप इत्यादि उनकी ६६ जातिएँ । उनमें एक खाँप का नाम है— “ शुष्ण " असुर । शुष्ण असुरप्राण वह है जो कि सूखे स्थान पर अग्नि के स्थान पर रहे । जो असुर देवताओं से अर्थात् प्रकाश से धक्का खा कर सूखे स्थान पर चला जाता है अर्थात् अग्नि के चारों ओर वेष्टित हो जाता है वही " शुष्ण " असुर है । प्रकाश का नाम देवता है छाया का नाम असुर है । जहाँ प्रकाश नहीं होता है वहाँ असुर ग्राप से आप कूद पड़ता है । छाया प्रारण असुर है, वह गीला नहीं है अपितु शुष्क है अतएव इस छाया प्रारणासुर को " शुष्ण " असुर कहते हैं । हमारा शरीर वैश्वानर अग्निमय है । श्रालोमम्य श्रनखग्निभ्य सर्वाङ्ग शरीर में वैश्वानर अग्नि धधक रहा है । कान, नाक बन्द करने पर जो एक आवाज मालुम होती है - वह इसी अग्नि का शब्द है । जिस वख्त यह आवाज बन्द हो जाती है, समझ लो वह मनुष्य अति शीघ्र ही मर जायगा । जैसा कि श्रुति कहती है— " अथाप्य विधायकरर्णा उपभृणुयात् स एषोऽग्नेरिव प्रज्वलतो रथस्ये-वोपादिस्तं यदा न श्रृणुयात् तदप्येवमेव विद्यात् " ( ऐ ० ग्रा ०० प्र ० २ ख ० ४ ) हमें कहना यही है कि हमारा शरीर अग्निमय है । इस हमारे रहने वाला जो प्राण है वही शुष्ण असुर है । देवता तो प्रकाश का शरीर की जो छाया है, उसमें नाम है । प्रकाशाभाव ही का तो नाम श्रसुर है । प्रकाशाभाव ही का नाम छाया है । बस इस छाया - पुरुष को ही " असुर " कहते हैं, जैसा कि द्वितीय काण्ड में भगवान् याज्ञवल्क्य ने स्वयं कहा है ।-[ ६६ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपय ब्राह्मरण [ ६७ ] श्रग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण निकल जाता है अर्थात् असुर परन्तु वह प्रकाश असुर को मनुष्-" मध्यन्दिन एवादधीत । तहि ह्ये षोऽस्य लोकस्य नेदिष्ठं भवति । तन्नेदिष्ठा-देवैनमेतन्मध्यानिमिमीते । छाययेव वाऽप्रयं पुरूषः पाप्मनामनुषक्तः । सोऽस्यात्र कनिष्ठो भवति । अधस्पदमिवेयस्यते तत् कनिष्ठमेवैतत्पाप्मानमवबाधते । तस्मादु मध्यन्दिनएवादधीत " — ( श o पुनराधान ब्राह्मणः २.२.३.६-१० ) चूंकि यह छाया आग्नेय पुरुष के चारों ओर रहती है, सूखे स्थान में रहती है अतएव हम इस छायामय प्राण को — “ शुष्ण " असुर कहने के लिए तय्यार हैं । प्रकाश का नाम देवता है । इसके धक्के से पाप्मा ( छाया ) बाहर ( तम ) यद्यपि देवता पर ( मनुष्याग्नि पर ) आक्रमण करना चाहता है, धक्का मारकर के अलग कर देता है, जो कि छाया है । हमारे सामने यदि कोई अन्य मनुष्य खड़ा होता है तो उसकी जो कृष्ण कनीनिका है, उसमें हमारा वह छायापुरुष छोटे से छोटे बच्चे के आकार में परिणत हो घुस पड़ता है । हमारा छाया पुरुष हमारे प्रकाश से ( देवता से ) धक्का खाकर पुरोऽवस्थित मनुष्य की कृष्ण कनीनिका में जा घुसता है । वह छाया पुरुष वास्तव में शुष्ण असुर है । यदि असुर ( तमोमय ) न होता, वहाँ उसकी स्थिति ही नहीं होती । इसी विज्ञान को बतलाते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं— " यत्र वै देवा श्रसुररक्षसानि जघ्नु, तच्छुष्णोदानवः प्रत्यङ, पतित्वा याणामक्षीणि प्रविवेश । स एष कनीनिकः कुमारक इव परिभासते । " मनुष्य के शरीर पर आनेवाला जो सौर प्रकाश है, वही देवता है, उससे धक्का खाकर पैदा होने वाला छाया पुरुष ही शुष्ण असुर है । इसे सिद्ध करके बड़े - बड़े काम होते हैं । इसी को छाया - पुरुष - सिद्धि कहते हैं । बस यही देवासुरों का युद्ध है एवं यही छाया पुरुष जो कि कनीनिका में घुस गया है— शुष्ण असुर है । आज यजमान दीक्षा लेकर देवताओं की मण्डली में शामिल होने जा रहा है । ऐसी अवस्था में इसे बंध उपायों से अपने सारे असुरभाव को दूर कर देना चाहिए । जो शरीर पर श्रमेव्यता थी, उसे तो स्थान से दूर कर दी, अब इस छायापुरूष के शुष्ण असुर को दूर कैसे करे? बस इसका एकमात्र उपाय अञ्जन है । अञ्जन ककुद नाम के पत्थर का बनता है इस प्रकार से आँखों में पत्थर से बने हुए अञ्जन को लगाना उस शुष्ण असुर को पत्थर के किले में कैद करना है । इसमें कैद करने से असुर यज्ञ में शामिल नही हो सकता है । यदि कज्जल न डाला जायगा तो प्राँखो में पानी आ जायगा । पानी असुर को मदद पहुचाने वाला है श्राप्य प्रारण ही को तो असुर कहते हैं, अपिच प्रतिबिम्ब पानी पर ही पड़ता है । जब आँखों में कज्जल लगा दिया जायगा तो पानी सूख जायगा । इससे वह असुर नष्ट नहीं तो
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तृतीय काण्ड ( ० १ ) शतपथ ब्राह्मण आग्नावेष्णवेष्टि ब्राह्मण निर्बल अवश्य हो जायगा, अतएव अञ्जन लगाना चाहिए । अञ्जन प्राँख के पानी को रोकता है, पानी को रोकना असुर को बेदम बनाना है । इसी अभिप्राय से कहते हैं—
" तस्मै ( शुष्णा सुराय ) एतत् यज्ञमुपप्रयन् सर्वतोऽश्मपुरां परिदधाति ।
अश्मा हि श्रञ्जनम् ॥
यज्ञ में शामिल होता हुआ यह यजमान इसके लिए चौतरफ से पत्थर की किलेबन्दी करता है । अञ्जन पत्थर ही तो है । बस अञ्जन लगाने की यही दूसरी वैज्ञानिक उपपत्ति है । यह अञ्जन ( सुरमा ) त्रिककुद पर्वत का होता है । जिस समय इन्द्र ने वृत्रासुर को मारा था, उस समय उसकी जो आँख थी, उसे त्रिककुद् पर्वत बना दिया । संसार में जितने भी पदार्थ हैं उन सबमें ३३ देवता, ६६ असुर, २७ गन्धर्व, ५ पशु, पितर यह पदार्थ रहते हैं । इन सबकी समष्टि से ही जगत् के यच्चयावत् पदार्थों का निर्माण होता है । द्वादश प्राण - समष्टि का नाम सूर्य्य है । इन्हीं को १२ आदित्य कहते हैं । इनमें से एक अन्यतम प्राण का नाम इन्द्र है । यह इन्द्र १४ प्रकार का है जिसका कि विशद विवेचन श्री गुरुप्रणीत " ब्रह्म समन्वय " नाम के ग्रन्थ में किया गया है । जो अमृत भाग है, आसमन्तात् व्याप्त रहने वाला प्रारण है, उसी का नाम ' इन्द्र ' है । इस इन्द्र प्राण से कोई भी स्थान खाली नहीं है । इसीलिए - " नेन्द्राद्ऋते पवते धाम किञ्चन " यह कहा जाता है । आदित्य को इस ब्राह्मण के प्रारम्भ में पुरुष संमित बतलाया है । तद्वत् श्रादित्य में भी पिण्ड, प्रकाश इत्यादि को लेकर पुरुष कल्पना की गई है । उसी श्रादित्य प्राणसमष्टि से जिसे कि विवस्वान् बतलाया गया है, हमारे अस्थि, मांसादि का निर्माण होता है । अतएव आँख, नाक, कान, मुँह इत्यादि का निर्माण करने वाले जो अधिदैवत में प्राण है उन्हें आँख, नाक, कान, मुँह इन नामों से व्यवहृत किया गया है । जो वस्तु जिसके लिए है उसे उस वस्तु के नाम से हम पुकार सकते हैं । “ तादार्थ्यात् ताद्यतः ” यह नियम है । बस आदित्य प्राण समष्टि की पुरुष कल्पना का यही रहस्य है । इसीलिए " पुरुष संमित इत्युहैक श्राहुः " यह कहा गया है । हमने कहा है कि देवता की तरह असुर का सृष्टि निर्माण में उपयोग होता है । आँख, कान, नाक वगैरह में अनन्त प्रकार के भिन्न भिन्न असुर - प्राण भी शामिल रहते हैं । जैसे देवप्राणों में आँख नाक की कल्पना कर उसे पुरुष संमत कहा जाता है, तद्वत् यही कल्पना इन असुर प्राणों भी कर ली जाती है । जिस असुर प्राण का प्रक्षि निर्माण में उपयोग होता है, उस प्राण को आँख कहने लगते हैं, जिससे मस्तक बनता है उसे मस्तक कहते हैं । इसी विज्ञान को विस्तृ-तरूपेण प्रथम काण्ड के इन्द्रवृत्रासुरोपाख्यान में बतलाया गया है, जैसा कि याज्ञवल्क्य कहते हैं— " त्वष्टु वै पुत्रः । त्रिशीर्षा षड्क्ष प्रास । तस्य त्रीण्येवमुखान्यासुः । तद्य-देवरूप स तस्माद्विश्वरूपो नाम । तस्य सोमपानमेवैकं मुखमास 1 । सुरापाण-मेकम् । अन्यस्माऽग्रशनायकम् । तमिन्द्रोदिद्वेष । तस्थतानि शीर्षाणि प्रचिच्छेद । [ 5 ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण आग्नावष्णवेष्टि ब्राह्मरण स यत् सोमपानमास ततः कपिञ्जलः समभवत् । प्रथयत् सुरापारणमास ततः कलविङ्कः समभवत् । अथ यदस्माऽशनायास ततस्तित्तिरिः समभवत् ” । ( शा ० १.६.३. १-५ ) यह असुर प्रारणसमष्टि सूर्य्य से ऊपर रहती है, क्योंकि परमेष्ठि मण्डल सूर्य्य से ऊपर ही तो है । इस असुर समष्टि को " वृत्र " भी कहा करते हैं । अंधकार सबको आच्छादित कर उन सब पदार्थों पर सो जाता है, ऊपर चढ़ बैठता है, अतएव - " सर्व वृत्वा शिश्ये " इस व्युत्पत्ति से इसे वृत्रासुर कहते हैं । दैवप्राणवत् इसमें भी आँख, नाक, कान की कल्पना करली जाती है । यह सारे असुर प्राण सूर्य्य द्वारा ही हमारे पास इस पृथिवी लोक में आते हैं । सूर्य्य तो मर्त्यपिण्ड है, वह तो अपने स्थान पर ही स्थिर रहता है । धक्का देकर प्रभुर प्राण को अर्थात् वृत्र को पृथिवीलोक में गिराने वाला तो आसमन्तात् व्याप्त रहने वाला सूर्य्य का अन्यतम वैद्युतप्राण इन्द्र ही है । इन्द्र ही वृत्र को नीचे गिराता है । सोना, चांदी, तांबा, शहत ( शहद ) इत्यादि इत्यादि जितने भी पदार्थ हैं वे सारे के सारे सूर्य्यं से अर्थात् इन्द्र से गिरते हैं । इनमें कई पदार्थ सौर हैं, कई पारमेष्ठ्य हैं । जो सौर हैं वे देवता हैं, जो पारमेष्ठ्य हैं वह आसुर है । त्रिककुद भी एक पर्वत है । यह काला है । अञ्जन इसी का बनता है ( बना करता था ) । काला प्राणरूप आसुर है । इसीलिए हम इस पर्वत को असुर कह सकते हैं । यह सूर्य्य ही से गिरा है, इसीलिए " इन्द्र ने वृत्र को गिरा दिया " यह भी कह सकते हैं । इससे हमारी आँखों की ज्योति बढ़ती है, श्रतएव हम कह सकते हैं कि, यह पर्वत वृत्र की ग्रांख है । अर्थात् वृत्रप्राणसमष्टि में जो प्राण आँख का निर्माता है, वही चूंकि यह त्रिककुद् है, अतएव इस त्रैककुद् को हम वृत्र की आँख बतला सकते हैं । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि जब हम त्रैककुद् पर्वताञ्जन को आँख में डालते है तो हमारी आँखों ज्योति बढ़ती है । इससे मानना पड़ता है कि वास्तव में त्रैककुद आँख है अर्थात् प्रक्षिप्राणसमष्टि है । चूंकि यह पर्वत काला है, काला असुर होता है । वृत्र को असुर कहते हैं अतएव हम इस पर्वत को वृत्र की आंख कह सकते हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवन् याज्ञवल्क्य कहते हैं--" यत्र वा इन्द्रो वृत्रमहन् तस्य यदक्ष्यासीत् तं गिरि त्रिककुदमकरोत् ” । जो कि यहां ककुद् अञ्जन होता है इससे चक्षु में चक्षु ही रखते हैं अर्थात् प्रांखों में ककुद् अञ्जन क्या लगाते हैं, आंख में दूसरी आंख लगाते हैं । " तद्यत्त्रैककुदं भवतिः चक्षुष्येवैतत् चक्षुर्दधाति । " भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि चूंकि ककुद् प्रांख है अर्थात् अक्षि- ज्योति को अधिक बढ़ाने वाला है अतः ककुद् पर्वत का सुरमा ही लगाना चाहिए --" तस्मात्त्रककुदं भवति । " यदि त्रैककुद् उस समय न मिले, तो त्रैककुद् से भिन्न और ही किसी का अञ्जन लगा लें । [ 8 ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) श्राग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण " यदि त्रैककुदं न विन्देत् प्रप्यत्रैककुदमेवास्यात् ” । क्योंकि अञ्जन की बन्धुता तो दोनों में ही समान है । प्रांख के पानी को रोकना है, वह ककुद् अञ्जन से भी रुक सकता है एवं अन्य अञ्जन से भी रुक सकता है— " समानी ह्येवाञ्जनस्य बन्धुता 11 1 इस प्रकार श्रञ्जन के लगाने से " दूषिका " नष्ट हो जाती है, असुर कैद हो जाता है एवं श्रांखों की ज्योति बढ़ती है । अञ्जन में तीन फायदें हैं । अतः दीक्षित मनुष्य को अवश्य ही अञ्जन लगाना चाहिए – ॥१२ ॥
सामान्य मनुष्य जस्त की सलाई से प्रांख में अञ्जन डोला करते हैं । परन्तु यह यजमान सामान्य मनुष्य नहीं है अपितु, देवता है अतएव इसे एक विशेष प्रकार की शलाका से श्रञ्जन लगाना चाहिए । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" शरेषीकया अनक्ति " । जिस को सरकण्डा कहते हैं उसकी जो बीच की " इषीका " ( तूली ) है उससे अञ्जन लगाता है । लिएं कई प्रकार की होती है परन्तु अञ्जन शर की तूली से जिनके ऊपर गन्धक लगाकर प्राचीन समय की दीप शलाकाएँ बना करती थीं, लगाना चाहिए । दीप शलाका से प्रञ्जन क्यों लगाना चाहिए इसका कारण बतलाते हैं । यह शर वज्र है । अग्नि और पानी दोनों वज्र हैं । वज्र बिजली से सम्बन्ध रखता है इसीलिए वज्र ही कहीं भी गिरता है । एक-दम एक सन्नाटे से ग्रास - पास के वृक्षादि को जलाता हुआ जमीन में घुस जाता है । जैसे अग्नि का यह स्वभाव है तद्वत् पानी का भी यही स्वभाव है । पानी में भी विद्युत् रहता है । वह भी जहां वेग से घुसता है, खड्डा कर देता है एवं शीतकाल में यही पानी अर्थात् सर्दी प्राग्नेय वज्रवत् जङ्गल के जङ्गल जला डालते हैं, इसीलिए " वज्रो वा श्रापः " कहा जाता है । यह पानी जब प्रग्नि से सूर्य किरणों से ऊपर खेंच लिया जाता तो ' शर ' बन जाता है । जहां तक पार्थिव मिट्टी का हिस्सा जाता है वहां तक तो पानी ग्राग से जम कर शर वृक्ष रूप में परि-णत हो जाता है, अवशिष्ट पानी सूर्य्य खेंच लेता है । पार्थिव पानी को सूर्य्य - किरणों ही उपर खेचती हैं, इसीलिए महर्षि कणाद कहते हैं- " नाड्घो वायु संयोगादारोहरणम् " - इति - ( वै ० दर्शन ) । यह शर पानी और आग है । इसीलिए तो इसे भाषा में " पानी " कहते हैं । इसमें विद्युत् है । विद्युत् ही वज्र का स्वरूप है अतएव " वज्रो व शरः " - कहा जाता है । कनीनिका में असुर बैठा है, अत: इस शर से प्रञ्जन लगाना मानो उस असुर पर वज्र प्रहार करना है अर्थात् वीरता के लिए, राक्षस को नेस्तनाबूद करने के लिए, ही वज्र स्वरूप शर - इबीका से अञ्जन लगाता है । [ १०० ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण श्रग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण " वज्ञो वै शरः । विरक्षस्तायै ( शरेषिकया अनक्तीति शेषः ) " । लोक में जस्त की सलाई से ही प्रञ्जन लगा लिया जाता है, उसके मुंह पर रूई वगैरह कुछ नहीं लगाई जाती है, परन्तु यह शरेषिका सतूला होती है अर्थात् इस शरेषिका के मुंह पर रूई लगाकर बाद में उससे अञ्जन करना चाहिए । " सतूला भवति " । रूई क्यों लगानी चाहिए, इसका कारण बतलाते हैं । यह राक्षस अमूल होता हुआ, उभयतः परिच्छिन्न होता हुआ आकाश में घूमता फिरा करता है । जैसा कि यह मूल पुरुष उभयतः परिच्छिन्न होकर अन्तरिक्ष में डोला करता है अर्थात् जैसे पुरुष अमूल है वैसे ही राक्षसवर्ग भी मूल ही है । जीव कुल तीन ही प्रकार के होते हैं- " धातु, मूल, जीव । सोना, चांदी, तांबा, लोहा इत्यादि - इत्यादि जो जीव हैं वे धातु - जीव कहलाते हैं । धातु तो जड़ है, फिर इन्हें जीव कैसे कहा - कहीं इस भ्रम में नहीं पड़ जाना है । वैदिक वैज्ञानिक परिभाषा में कोई जड़ है ही नहीं । मन, प्राण, वाक् अर्थात् ज्ञान, क्रिया, अर्थ अर्थात् अव्यय, अक्षर, क्षर इन तीनों की समष्ट नाम ही श्रात्मा है । धातुत्रों में हवा रोकने की, स्थान रोकने की जब क्रिया है तो प्राण अवश्य मानना पड़ेगा । प्राण है तो मन अर्थात् ज्ञान अवश्य ही मानना पड़ेगा । कहते यही हैं - सारा प्रपञ्च, मनप्राण-वाङ्मय है । इसीको कहते हैं जीव, अतः धातु भी अवश्य ही जीव है । दूसरे जीव हैं मूल । वृक्षादि जितने भी जीव हैं उन सबका मूल पृथिवी में बद्ध रहता है । तीसरे जीव हैं हम और असुरादि । हम अमूल हैं, हमारे पैर पृथिवी की पकड़ में नहीं हैं अपितु हम सर्वत्र भ्रमण करते रहते हैं परन्तु साथ ही में हम दोनों ओर से घिरे हुए भी हैं । नीचे जमीन है । ऊपर आस-मान है । द्यावापृथिवी से उभयतः परिच्छिन्न हैं । बस इसी अभिप्राय से कहते हैं— " अमूलं वाऽइदमुभयतः परिच्छिन्नो रक्षोऽन्तरिक्षमनुचरति, यथाऽयं पुरुषो-मूल उभयतः परिच्छिन्नोऽन्तरिक्षमनुचरति " । कहने का तात्पर्य यही है कि पुरुषवत् राक्षस मूल हैं । इन्हीं को " नाष्ट्रा " भी कहते हैं । यह श्राकाश में - वायु में फिरा करते हैं । आज यही अमूल असुर - छायापुरुष शुष्ण असुर, यजमान की आंखों में घुसा है । ऐसी हालत में - तज्जातीय पदार्थ ही से उस पर वज्र प्रहार किया जायगा तो वह दब जायगा । लौटे पर के मैल को उतारने के लिए मैल ( माटी ) ही लगाना पड़ता है । वस्त्र के मैल को उतारने के लिए मैल ( साबुन ) ही लगाना पड़ता है । चूंकि राक्षस अमूल हैं अतः इसके लिए तूल ही लगाना चाहिए । तूल अमूल ही तो है । मूल और तूल यह दो ही पदार्थ होते हैं । मूल ब्रह्म कहलाता है, तूल जगत् कहलाता है । तुल चूंकि मूल से उत्पन्न होने वाला है - जगत् है, अतएव यह तूल अमूल है । रूई का भी नाम तूल ही है । तूल श्रमूल है एवं असुर भी अमूल है अतः अमूल को मारने के लिए, निशाने के लिए शरेबिका में अमूल [ १०१ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण आग्तावैष्णवेष्टि ब्राह्मणं ही ( तूल ) लगाना चाहिए । इस अमूल - तूल से अमूल राक्षस का सर्वनाश हो जायगा । बस इसी अभिप्राय से कहते हैं-" तद्यत् सतूला भवति - " विरक्षस्तायै " ॥१३ ॥
वह यजमान सर्वप्रथम दाहिनी प्रांख में ही अञ्जन लगाता है – “ स दक्षिणमेवाग्रे प्रानक्ति " । मानुष कर्म में मनुष्य पहले बांई आंख में अञ्जन लगाते हैं- " सव्यं वा माजुषे " एवं पहले दाहिने में लगाना देवतापना है अर्थात् यह यजमान मनुष्य नहीं है अपितु देवता है अतः इसे पहले दाहिनी आंख में लगाना चाहिए | देवता सारे आग्नेय हैं । अग्नि दक्षिण से उत्तर की ओर हरक्षण जाता रहता है अतः इस दक्षिण भाग से ही सारा काम करना चाहिए, यही दक्षिण में ब्रञ्जन लगाने की उपपत्ति है । '' अथैवं देवत्रा " ॥ १४ ॥
अब यह यजमान निम्नलिखित मन्त्र बोलता हुआ सतूला शरेषिका से पहले दाहिनी आंख में अञ्जन लगाता है— " वृत्रस्यासि कनीनिकः, चक्षुर्दासि - चक्षुर्मे देहि - इति " । -( वा. सं. ४. ३ ) यह जो अञ्जन है वह वृत्रासुर की कनीनिका है अर्थात् आँख है । अतएव कहते हैं कि हे अञ्जन! तुम वृत्र की कनीनिका हो, चक्षु को देने वाले हो, अतः मुझे चक्षु प्रदान कीजिए अर्थात् मेरे नेत्रों की ज्योति बढ़ाइये | इसी अभिप्राय से ऐतरेय महर्षि कहते हैं-" आञ्जन्त्येनम् । तेजो वा एतदश्मोर्यदाञ्जनम् । स तेजसमेतं त्वत् कृत्वा दीक्षयन्ति — ऋत्विजः " ॥१५ ॥ ( ऐ ० ब्रा ० प्र ० न ० । ३ खण्ड । १८ )
बह यजमान पहले, दाहिनी ग्राँख में मन्त्र से एकबार अञ्जन डालता है- “ स दक्षिणं सकृद्यपुषा मनस्ति " एवं उसी दहिनी आँख में एक बार तूष्णीं डालता है - " सकृतूष्णीम् " । इस प्रकार दहिनी आँख में एक बार मन्त्र से, एक बार चुपचाप दो बार अञ्जन लगाता है । बाद में बाई आँख में वह एक बार मन्त्र से और दो बार तूष्णीं लगाता है— " अथोत्तरं सकृद्यजुषानक्ति, द्विस्तूष्णीम् " हम पूर्वाभिमुख होकर यदि खड़े होते हैं तो हमारी दाहिनी आँख दक्षिण दिक् की ओर रहती है । एवं बांयी अर्थात् उत्तरा उत्तरदिक् की ओर रहती है । चूंकि बांयी श्राँख उत्तरा है अतः उसमें अञ्जन भी उत्तर में ( बाद ही में ) डालता हुआ यह यजमान उत्तर आँख को उत्तरावत् करता है— [ १०२ ]