Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 91–100
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 91–100
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मणे श्राग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण ब्रह्म और यज्ञ यह दो ही तत्त्व हैं - यह हम इस ब्राह्मण के प्रारम्भ में बतला आए हैं । ब्रह्म मौलिक तत्त्व है - यज्ञ यौगिक तत्त्व है । सोमयाग करने वाला यह यजमान — दोनों ही तत्त्वों कां - ब्रह्म और यज्ञ को आत्मसात करता है - इसी अभिप्राय से – देवता और यज्ञ कहा गया है । देवता ब्रह्म अभिप्रेत है, यज्ञ से यह ही अभिप्रेत है । सारे देवता एवं सारा यज्ञ तभी पकड़ में आ सकता है— जबकि उनके प्राद्यन्त छोर को पकड़ा जाय । आद्यन्त छोर में - श्रग्नि और विष्णु है— प्रतएव प्राग्नावैष्णव पुरोडाश किया जाता है । अग्नि अपने स्वरूप से ( घन स्वरूप से ) ८ भागों में विभक्त है इसीलिए तो " भ्रष्टारा वे गायत्री " यह कहा जाता है । एवं विष्णु २१ तक जाता है । इसके तीन विक्रम होते हैं । ६ तक पहिला विक्रस, १५ तक दूसरा विक्रम एवं २१ तक तीसरा विक्रम होता है । इस प्रकार हृद्य पिण्ड अग्नि द्वारा तीन विक्रम होते हैं । इसीलिए तो ' यज्ञो वै विष्ण: ' एवं ' विष्ण वँ यज्ञः ' कहा जाता है । बतलाना इस प्रपञ्च से हमें यही है कि — प्रग्नि चूँकि श्रष्टावयव है, विष्णु त्रिविक्रम है— प्रतएव दोनों के लिए ८-३ के हिसाब से एकादश कपाल पुरोडाश का निर्वाण किया जाता है । बस इसी विज्ञान को बताते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं— " अपः प्ररणीय - प्राग्नावैष्णवमेकादशकपालं पुरोडाशं निर्वपति । श्रग्निवे सर्वा देवताः । श्रग्नौ हि सर्वाभ्यो देवताभ्यो जुह्वति । श्रग्निर्वै यज्ञस्यावरार्थ्यो विष्णुः परार्ध्यः सर्वाश्चैतद्देवताः परिगृह्यः सर्वे च यज्ञं परिगृह्य दीक्षं इति-तस्मादाग्ना वैष्णव एकादश कपालः पुरोडाशो भवति " ॥१ ॥
" तर्द्धके - श्रादित्येभ्यश्चरु निर्वपन्ति ". ऐतरेय से पहिले के याज्ञिक लोग दीक्षणीयेष्टि में आदित्यों के लिए चरु का निर्वाण करते थे । परन्तु ऐतरेय ने " अग्निवें देवानामवमो विष्णुः परमस्तदन्तरेण सर्वा अन्या देवताः " कहकर उस चरु को अशुद्ध बतलाया । उन्होंने कहा कि यह सोमयाग की दीक्षा है । हमें अपने श्रात्मा का सम्बन्ध पारमेष्ठ्य सोम से करना है – अतः रोदसी के सारे देवताओं को एवं यज्ञ को श्रात्मसात करने के लिए - श्राग्ना वैष्णव एकादश कपाल पुरोडाश ही का निर्वाण करना चाहिए । अग्नि यज्ञ के अवरार्ध्य अर्थात् इस छोर के देवता हैं एवं विष्णु यज्ञ के परार्ध्य देवता अर्थात् उस छोर के देवता हैं । ' प्राविरन्स्येन सहेता ' वत् दोनों के आत्म-सात् करने से सारा यज्ञ श्रौर सारे देवता पकड़ में श्रा जाते हैं अतः दीक्षणीयेष्टि में - प्राग्नावैष्णव एकादशकपाल पुरोडाश ही करना चाहिए । अग्नि अष्टावयव है— एवं विष्णु त्रिविक्रम है - प्रतः दोनों के लिए मिलाकर एकादश कपाल पुरोडाश ही करना चाहिए— जैसा कि भगवान् ऐतरेय कहते हैं— ' तदाहुर्यदेकादश कपालः पुरोडाशो - द्वावग्नाविष्णू, कैनयोस्तत्र क्लृप्तिः का - विभक्तिरिति । श्रष्टा कपाल श्राग्नेयः । श्रष्टाक्षरा वं गायत्री । गायत्रमग्नेच्छन्दः । त्रिकपालो वैष्णवः । त्रिदं विष्णुर्व्यक्रमत् । संनयोस्तत्र क्लृप्तिः सा विभक्तिः । " ( ऐ ० ब्रा ०, प्र ० स ० प्र ० प्रध्या ० ८ ) [ ७३ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मणं अग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मणं बस भगवान् याज्ञवल्क्य इसी अभिप्राय से प्रादित्यचरु का प्रतिपादन करते हुए — उसे खण्डनीय बतला के अन्त में ' अयं त्वे वाग्नावैष्णवः प्रज्ञातः ' से प्राग्नावैष्णव एकादश कपाल पुरोडाश निर्वाण पक्ष का ही समर्थन करते हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं— कई याज्ञिक लोग दीक्षणीयेष्टि में आदित्यों के लिए चरु का निर्वाप करते हैं । परन्तु यह निर्वाप सर्वथा प्रत्याख्यात है । इस मत का खण्डन हो चुका है अतः चरु का निर्वाप नहीं करना चाहिए - यही तात्पर्य है । " तद्वै के - श्रादित्येभ्यश्चरु निर्वपन्ति । " तदस्ति पर्युदितमिव ( प्रत्याख्यात-मिव ) - तस्मान्न कर्त्तव्यमिति भावः । आग्नावैष्णव एकादशकपाल पुरोडाश करना चाहिए – यह सिद्धान्त स्थापित करने से पहिले-प्रादित्यचरु निर्वाण में प्राचीन लोग जो उपपत्ति बतलाते थे — उसका उपपादन करते हैं । आदित्यचरु - किस अभिप्राय से किया जाता था— - पहिले इसका विज्ञान बतलाते हैं । [ सूर्य्य प्रतिदिन एक अ ंश चलता है । सूर्य्यं चलता है - यह बात हमने दृश्य मण्डल के अभिप्राय से कही है । वास्तव में प्रकृति मण्डल के अनुसार सूर्य्य स्थिर है— एवं पृथिवी चल है । कैसे स्थिर है-कैसे चल है— इत्यादि वातों का विशद विवेचन ' अहोरात्रवाद के चिरस्थिर विमर्श ' नाम के प्रकरण में किया गया है | यहाँ अप्राकृत समझ कर उस प्रकरण को छोड़ते हैं । बतलाना, हमें यही है कि सूर्य्यं इस प्रकार सावन वर्ष के अनुसार सूर्य्यं ३६० दिन में अपने वृत्त की जो प्रतिदिन एक अंश चलता है । कि क्रान्ति वृत्त नाम से प्रसिद्ध -परिक्रमा लगा लेता है । उत्तर ध्रुव से ६० अ ंश दक्षिण एवं दक्षिण ध्रुब से ६० अंश उत्तर का जो कल्पित वृत्त है -उसी का नाव विषुवद् वृत्त है । इसी को ' इक्वेटर ' लाइन कहते हैं । इस इक्वेटर से ठीक ६० अ ंश उत्तर— उत्तर ध्रुव है, ठीक ६० अंश दक्षिण — दक्षिण ध्रुव है । इस विषुवृत से – २४ अंश उत्तर और २४ अंश दक्षिण - इतनी दूर का अर्थात् ४८ अंश का जो एक वृत्त है, उसे ही " क्रान्ति वृत्त ” कहते हैं । इस क्रान्तिवृत्त की उत्तर में परम क्रान्ति २४ अंश तक है । एवं इसी प्रकार २४ अंश दक्षिण में हैं । विषुवत् से उत्तर का भाग ' उत्तरगोल ' कहलाता है एवं दक्षिण का भाग ' दक्षिणगोल ' कहलाता है । दक्षिण गोल स्थित सूर्य्य जब दक्षिण की परम क्रान्ति पर अर्थात् २४ वें अंश में पहुँच कर वापस लौट पड़ता है— अर्थात् उत्तर दिशा की ओर मुख कर लेता है - तो बस यही सूर्य्यं का " उत्तरायण " होना है । एवमेव उत्तरगोल स्थित सूर्य्य उत्तर की परम क्रान्ति पर पहुँचकर - वहाँ से दक्षिण की ओर रुख कर लेता है तो यह उसका ' दक्षिणायन ' कहलाता है । कहने का तात्पर्य यही है कि — उत्तरायणं. दक्षिण गोल में होता है, एवं दक्षिणायन उत्तरगोल में होता है । वस इस ४८ अंश के परिसर के बीच में में ही सारे ग्रह रहते हैं । सिवाय चन्द्रमा को छोड़कर बाकी सारे ग्रह - इसी क्रान्तिवृत्त के परिसर को छोड़कर बाहर नहीं जाते । चन्द्रमा अलबत्ता २८ तक चला जाता है । स्वाती नक्षत्र - करीब ३० अ ंश [ ७४ ]
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तृतीय काण्ड ( ०. १ ) शतपथ ब्राह्मणं आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मणं पर है— चन्द्रमा कभी स्वाती के पास नहीं जाता । परन्तु चन्द्रमा का स्वाती के साथ योग बतलाया है । चन्द्रमा जब स्वाती के पास जाता है तो वह स्वाती योग कहलाता है । परन्तु यह योग बन ही कैसे सकता है — जब कि स्वाती चन्द्रमा से २ डिग्री आगे निकला हुआ रहता है । इसी विप्रतिपत्ति को हटाने के लिए कहा जाता है-" सममुत्तरेण तारा चित्रायाः कीर्त्यते ह्यपां वत्सः । तस्यासन्ने चन्द्रे स्वातेर्योगः शिवो भवति ॥ " इस ४८ अंश के मार्ग में – चन्द्रमा के लिहाज से - तीन मार्गों की कल्पना की जाती है । वे तीनों मार्ग १६–१६ अ ंशों के हैं । वे ही मार्ग - ऐरावत मार्ग, जरद्गव मार्ग एवं वैश्वानर मार्ग से प्रसिद्ध हैं । उत्तरमार्ग ऐरावत मार्ग कहलाता है, मध्यममार्ग जरद्गव मार्ग कहलाता है एवं दक्षिणमार्ग वंश्वानर मार्ग कहलाता है । इस मार्ग कल्पना में भी बड़ा भारी रहस्य है— हम विषुवत् से उत्तर रहते हैं अतः दृश्य मण्डल के हिसाब से दक्षिण मार्ग सबसे छोटा है । यही कारण है कि जब सूर्य्यं दक्षिण की परम क्रान्ति पर पहुँच जाता है तो दिन सबसे छोटा होने लगता है । जब सूर्य्य वहां से उत्तराभिमुखं होता है तो दिन उत्तरोत्तर बडा होने लगता है । होते - होते उत्तर की परमक्रान्ति पर आ जाने से दिन सबसे बड़ा हो जाता है । हाथी से छोटा बैल होता है, बैल से छोटा बकरा होता है । चूँकि दक्षिण मार्ग से मध्यम मार्ग बड़ा है, मध्यम से उत्तरमार्ग बड़ा है, अतः इस छोटे - बड़े रहस्य को बतलाने के लिए इन तीनों भागों के क्रमशः - वैश्वामर, जरद्गव एवं ऐरावत यह नाम रक्खे हैं । ] वैश्वानर अग्नि को कहते हैं । बकरा आग्नेय है - जैसा कि श्रुति कहती है-" तर्द्धकेऽजमुपबध्नन्ति । श्राग्नेयोऽजः । श्रग्नेरेव सर्वत्वायेति वदन्तः ” । इसलिए भी— इस दक्षिणवीथी को " अजवीथी " कहा करते हैं । अपि च- दक्षिणमार्गस्थ नक्षत्र संस्था बकरे ही की शकल की है, मध्यममार्गस्थ नक्षत्रसंस्था बैल ही की शकल की है, एवं उत्तरामार्गस्थ नक्षत्र संस्था हाथी की ही शकल की है— जैसा कि नक्षत्र - दर्शन से स्फुट प्रतीत हो जाता है । बस इस संस्था रहस्य को बतलाने के लिए भी — इन भागों के नाम - ऐरावतादि ' रक्खे गए हैं । इन तीनों मार्गों में प्रत्येक में तीन - तीन वीथिएं हैं । कुल मिलाकर & वीथिएं हैं । उनके नाम दक्षिण की ओर से प्रारम्भ करके निम्नलिखित हैं-१ अजवीथी, २ मृगवीथी, ३ वैश्वानरवीथी ॥ इति वैश्वानर मार्गः प्रथमः । १ प्रार्षभवीथी, २ गोवीथी, ३ जारद्गवीवीथी । इति जारद्गवमार्गे द्वितीयः । १ ऐरावतवीथी, २ गजवीथी, ३ नागवीथी । इत्यैरावत मार्गस्ततृतीयः । [ ७५ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण श्राग्नविष्णवेष्टि ब्राह्मणं पूर्वोक्त तीनों मार्गों को ही श्रादिनाडी, मध्यनाडी, अन्त्यनाडी शब्द से ज्योतिषी व्यवहृत किया करते हैं । पूर्वोक्त जो वीथी विभाग है, वह अश्विनी, भरणी, कृत्तिका आदि नक्षत्रों के हिसाब से है । उन तीनों मार्गों में इन २७ नक्षत्रों की ६ संस्था है— श्रतएव - तीनों मार्गों में 8 वीथी अर्थात् गली हो जाती हैं । अश्विनी, भरणी, कृत्तिका यह तीन नक्षत्र श्राकाश के जिस खण्ड में हैं— उस वीथी को " नाग-वीयी ” कहते हैं । रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा यह जिस खण्ड में हैं उसे ' गजवीथी ' कहते हैं । पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा यह जिस खण्ड में है— उसका नाम ' ऐरावती वीथी ' है । बस इन तीनों वीथियों को ही-उत्तरमार्ग किंवा ' ऐरावत मार्ग ' कहते हैं । मघा, पूर्व फल्गुनी, उत्तर फल्गुनी ( नक्षत्र ), इनके मार्ग को " आर्षभी वीथी " कहते हैं । विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा इनके मार्ग को ' जारद्गवी वीथी ' कहते हैं । बस इन तीनों को ही मध्यममार्ग किंवा ' जारद्गव मार्ग ' कहते हैं । मूल, पूर्व श्राषाढा, उत्तरी प्राषाढा इनके मार्ग को अजवीथी कहते हैं । अवरण, घनिष्ठा, शत-भिषक् इनके मार्ग को मृगवीथी कहते हैं । पूर्व भाद्रपदा, उत्तर भाद्रपदा तथा रेवती इनके मार्ग को — वैश्वानरी वीथी कहते हैं । वस इन तीनों ही को दक्षिणमार्ग किंवा वैश्वानर मार्ग कहते हैं । बस सारे ग्रह इन्हीं वीथियों वाले वैश्वानरादि तीनों मार्गों पर अवलम्बित रहते हैं । चन्द्रमा जिस वृत्त पर घूमता है । उसका नाम ' दक्ष ' वृत्त है । सोम में स्नेहन शक्ति अधिक है । जिसमें स्नेहन अधिक होता है वह बलिष्ठ श्रर्थात् दक्ष होता है । चन्द्रमा सोममय है - जैसा कि श्रुति कहती है--" एतद्वै सोमो राजा देवानामन्नं यच्चन्द्रमाः ॥ " इसीलिए इसके परिभ्रमण वृत्त को दक्ष कहते हैं । यह चन्द्रमा २७ दिन में अपने इस वृत्त की परिक्रमा लगा लेता है । दक्ष प्रजापति की ६० लड़किएँ थीं— उनमें से २७ चन्द्रमा को दी । आधिदैविक मण्डल में इसका यही रहस्य है । २७ दिन में इस कक्षा का जो कि उसकी लड़किएँ हैं — चन्द्रमा भोग करता है— इसीलिए — ' सप्तविंशतिमिन्दवे ' कहा जाता है । यह दक्ष वृत्त - पूर्वोक्त तीनों नाड़ियों पर अवलम्बित है - प्रतएव चन्द्रमा के रथ को तीन पहिये का बतलाया जाता है । बस इसी अभिप्राय से चन्द्रमा के रथ का स्वरूप बतलाते हुए भगवान् वेदव्यास
कहते हैं-" वीथ्याश्रयारि चरति नक्षत्राणि निशाकरः ।
त्रिचक्रोभयतोश्वश्च विज्ञेयतस्य वै रथः ॥१ ॥
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण
शतारैश्च त्रिभिश्वत्रैर्युक्तः शुक्लंहयोत्तमैः ।
दशभिस्त्वकृशदिव्यं रसङ्गस्तैर्मनोजवैः ॥२ ॥
रथेनानेन देवश्व पितृभिश्चैव गच्छति ।
सोमो ह्यम्बुमयैर्गोभिः शुक्लैः शुक्ल गभस्तिमान् ॥३ ॥
क्रमते शुक्ल पक्षादौ भास्करात् परमास्थितः ।
देवैः पीतंक्षये सोममाप्याययति नित्यशः ॥४ ॥
पीतं पञ्चदशाहं तु रश्मिनेकेन भास्करः ।
प्रापूरयन् सुषुम्णेन भागं भागमनुक्रमान् ॥५ ॥
इत्येषा सूर्य्य वीर्येण चन्द्रस्याप्यायिता तनुः ।
स पौर्णमास्यां दृश्यते शुक्लः सम्पूर्ण मण्डलः ॥६ ॥
( लिङ्ग पुराण प्र ० ५६ ) एवमेव इन नौ वीथियों और नदियों का स्वरूप भी प्रकरण में बतलाया गया है जिसे कि प्रमाणत्वेन उपन्यस्त करना अनुचित न होगा— " सर्व ग्रहणेत्रीण्येव स्थानानि द्विजसत्तम । स्थानं जरद्गवं मध्ये तथैरावतमुत्तमम् । वैश्वानरं दक्षिणतो निर्दिष्टमि हतत्वतः अश्विनी कृत्तिका याम्या नागवीथी तिशाष्टिता । रोहिण्यार्द्रा मृगशिरोगजवीथीत्यभिधीयते ॥१ ॥
पुष्याश्लेषा तथादित्या वीथीचैरावती स्मृता ।
एतास्तु वीथयस्तित्र उत्तरोमार्ग उच्यते ॥२ ॥
तथा द्वेचार्थे फाल्गुन्यौ मघाचंवार्षभीमता ।
हस्तश्चित्रा तथास्वाती गोवीथीति शब्दिता ॥ ३ ॥
ज्येष्ठा विशाखाऽनुराधा वीथी जारद्गवी मता ।
एतास्तु वीथयस्तिस्रो मध्यमो मार्ग उच्यते ॥४ ॥
पूर्वाषाढ़ोत्तराषाढ़ा साऽजवीथ्यभि शब्दिता ।
श्रवणं च घनिष्ठा च मार्गोशतभिषक्तथा ॥ ५ ॥
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श्राग्नावेष्णवेष्टि ब्राह्मण तृतीय काण्ड ( ० १:) शतपथ ब्राह्मण
वैश्वानरी, भाद्रपदे रेवती चैब कीर्तिता ।
एतास्तु वोथयस्तिस्रो दक्षिणोमार्ग उच्यते ॥६ ॥
नीचे लिखी तालिका से सारा विभाग स्पष्टतया समझ में आ जाता है— अनन्यनाड़ी मध्यनाडी आदिनाड़ी अश्विनी - भरणी - कृत्तिका आर्द्रा - मृगशिरा - रोहिणी ' पुनर्वसु पुष्य - अश्लेषा उ ० प ० पू ० फ०- मघा नागवीथी गजवीथी ऐरावती वीथी — इत्यंरावत मार्ग षोडशांशः ' आर्ष भी वीथी - हस्त - चित्रा - स्वाति गोवींथी जेष्ठा - अनुराधा - विशाखा- ' जरद्गवी वीथी - इति जरद्गव मार्ग षोडशांशः अजवीथी - मूल — पू.ग्रा. उ.प्रा. पात भिषक् घनिष्ठा - श्रवरण-मृग पू. भा. प. उ भा.प. - रेवती-वैश्वानरी वीथी— इति वैश्वानर मार्गः षोडशांशः चूँकि द्वादशादित्य यज्ञ में चन्द्रमा का ही सम्बन्ध है अतएव पहले उसके मार्गादि का स्वरूप बतला दिया है, अब सूर्य्य के रथ का स्वरूप बतलाते हैं: -हमने इस प्रकरण के प्रारम्भ में ही बतलाया था कि जिस - जिस मार्ग पर हां के सूर्य्यं घूमता है उसका नाम क्रान्तिवृत्त है । विषुववृत्त से उत्तर और दक्षिण इस क्रान्तिवृत्त को काटते १८ | ८ | ४ हुए अ ंशों के फासलों पर ६ वृत्त और बनते हैं । • विषुवत् से उत्तर कान्तिवृत्त को काटते हुए क्रान्तिवृत्त ही १२ अ ंश से एक पूर्वापर वृत्त बनता है । तदनन्तर दूसरा पूर्ववृत्त ८ अंश के फासले पर बनता है एवं अन्त में ४ थे अ ंश पर एक तीसरा पूर्व पर वृत्त बनता है । इस प्रकार से विषुवत् से और क्रान्तिवृत्त के २४ अंशों में १.२ । ८४ अंशों पर तीन पूर्वापर वृत्त बनते हैं । इसी प्रकार तीन पूर्वापर वृत्त विषुवत् से दक्षिण बनते हैं एवं एक स्वयं विषुवद् वृत्त रहता है, कुल मिलाकर ७ पूर्वापर वृत्त हो जाते हैं । इन्हीं सात पूर्वापरं वृत्तों को " अहोरात्र वृत्त " कहते हैं । वेद में इन्हीं का नाम छन्द है । इन सातों छन्दों के नाम यह हैं— " [ ७८
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण आग्नावष्णवेष्टि ब्राह्मरण १ गायत्री, २ उष्णिक्, ३ अनुष्टुप् ४ बृहती, ५ पंक्ति, ६ त्रिष्टुप् ७ जगती । " गायत्र्युष्णिगनुष्टुब्बृहतीपङ क्तित्रिष्टुब् जगत्यश्छन्दांसि ” जो गायत्री छन्द है उसे ही ज्योतिषी लोग " मकरवृत्त " कहते हैं, एवं इसे ही पाश्चात्य विद्वान् ' केप्रीकार्न ' कहते हैं एवं जगती छन्द को ज्योतिषी लोग कर्कवृत्त, और पाश्चात्य विद्वान् ' कैन्सर ' कहते हैं । बस सूर्य्यं के यही सात घोड़े हैं । प्रकृति मण्डल के अनुसार भगवान् सूर्य्य इसी बृहती छन्द पर स्थिर रूप से तपा करते हैं, इसीलिए " सूय्यों बृहती मध्यूढस्तपत्ति " कहा जाता है । प्रकृति मण्डल के हिसाब से गायत्री छन्द सबसे छोटा है एवं जगती छन्द सबसे बड़ा है । इसी विज्ञान को बतलाने के लिए गायत्री मन्त्र भी ही अक्षर का होता है - " अष्टाक्षरा वै गायत्री ", एवं जगती छन्द ४८ अक्षर का होता है, इसीलिए श्रुति ने पूर्वपक्ष प्रस्तुत किया है कि जगती छन्द सबसे बड़ा है तो उसी का नाम " बृहती " होना चाहिए, न कि मध्य के छन्द का । इसका अन्त में वह स्वयं ही उत्तर देती है कि जगती बड़ी है परन्तु दृश्य मण्डल के हिसाब से । हम चूँकि विषुवत् से उत्तर हैं अतएव हमारी अपेक्षा यह जगती छन्द बड़ा है । परन्तु प्रकृति मण्डल के हिसाब से मध्य ही का वृत्त बड़ा है । जो वस्तु वर्त्तुलवृत्त होती है उसका मध्य भाग सबसे बड़ा होगा । चूँकि आकाश गोल है, ख — गोल है अतः उसका मध्य स्थान ही बड़ा है । इसीलिए इस मध्य के छन्द को ही " बृहती " छन्द कहा जाता है न कि जगती को । सम्पूर्ण कथन से बतलाना हमें यही है कि क्रान्तिवृत्त के ४८ अंश का जो एक परिसर है- वही सूर्य्य का रथ है । सूर्य्यं श्राग्नेय है । अग्नि सोने के रंग के माफिक चमकता है, अतएव " हिरण्येन सविता रथेनादेवो-याति भुवनानि पश्यन् ” – कहा जाता है । एवं जो क्रान्तिवृत्त है वही इसके रथ का एक पहिया है । क्रान्तिवृत्त एक है अतएव सूर्य के रथ का एक पहिया बतलाया जाता है । एवं जो ७ छन्द हैं वे ही सात घोड़े हैं । बस इसी प्राकृतिक रथ स्वरूप को बतलाते हुए वेद भगवान कहते हैं— " सप्त युञ्जन्ति रथमेकचक्रमेको अश्वो वहति सप्तनामा । त्रिनाभिचक्रमजरमनवं यत्रेमाविश्वा भुवनानि तस्थुः । ऋ ० १ १६४।२ इमं रथमधि ये सप्ततस्थुः सप्तचक्रं सप्तवहन्त्यश्वाः । सप्तस्वसारो अभिसंनवन्ते यत्र गवां निहिता सप्त नामा " ॥ ऋ ० १।१६४।३ एक ही क्रान्तिवृत्त के ७ विभाग से ७ अहोरात्र बने हुए हैं, इसीलिए - " एको अश्वो वहति सप्त नामा " - यह कहा जाता है । इस प्रकार से यह सूर्य्य भगवान् इस रथ पर सवार होकर मर्त्य और अमृत प्रजा का शासन करते रहते हैं, अर्थात् जड़ और चेतन दोनों की सत्ता भगवान् सूर्य्य ही के अधीन है । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है-" प्राकृष्णेन रजसावर्त्तमानो निवेशयन्नमृतं मत्यं च । हिरण्ययेनसविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् [ ७६ ] ॥ " ( ऋ ० १।३५।२ )
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तृतीय काण्ड ( ० १ ) शतपथ ब्राह्मण श्रग्नावष्णवेष्टि ब्राह्मण इस सूर्य्यं के ताप से ही यच्चयावत् पदार्थों का निर्माण होता है । ज्योति, गौ और श्रायु — सूर्य्य के यह तीन मनोता हैं । ज्योतिमार्ग से देवता उत्पन्न होते हैं, गौ भाग से भूत उत्पन्न होते हैं एवं प्रायं -मार्ग से हमारा आत्मा उत्पन्न होता है, इसीलिए— " चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुमित्रस्य वरुणस्याग्नेः । प्राप्रा द्यावा पृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य्य श्रात्मा जगतस्तस्थुषश्चे ॥ ” ( ऋ ०१।११५१ ) सूर्य्य प्रतिदिन एक अंश चलता है, यह हम बतला श्राए हैं । जिस प्रकार सूर्य्य प्रतिदिन एक अंश चलता है, तथैव चन्द्रमा १३ अंश बीस कला प्रतिदिन चलता है । सूर्य्य ३६० दिन में अपने क्रान्तिवृत्त की परिक्रमा समाप्त करता है, एवं चन्द्रमा — २७ दिन कुछ कला में अपने इस वृत्त की परिक्रमा लगा लेता है । कल्पना कर लीजिए— प्राज सूर्य्य और चन्द्रमा एक बिन्दु पर अर्थात् अस्विनी नक्षत्र पर हैं । अब यहाँ से चन्द्रमा भी चलता है, और सूर्य्य भी चलता है । सूर्य्य एक दिन में एक अंश ही का रास्ता काटता है एवं चन्द्रमा १३ अंश २० कला का मार्ग काट देता है । इस प्रकार से २८ वें दिन चन्द्रमा ठीक उसी स्थान पर पहुँचता है, जहाँ से कि रवाना हुआ था । परन्तु सूर्य्यं उससे तीन अंश आगे निकल जाता है, अतएव चन्द्रमा को सूर्य्य से मिलने के लिए तीन दिन और लगते हैं । कहने का तात्पर्य यही है कि चन्द्र - सूर्य्य का सम्बन्ध ३० वें दिन हुआ करता है । एक संवत्सर के हैं ३६० अंश, अतः पूरे संवत्सर में चन्द्र - सूर्य्य का सम्बन्ध १२ दफे होता है । बस यही १२ आदित्य कहलाते हैं । इसी अभिप्राय से श्रुि कहती है-" कतम श्रादित्या इति । द्वादश मासाः संवत्सरस्य । एते प्रादित्याः । एते हीदं सर्वमाददाना यन्ति तस्मादादित्याः - " इति । ( श ० १४.३.७.६ ) अग्नि में सोम की आहुति पड़ने का नाम ही यज्ञ है । सूर्य्य अग्नि स्वरूप है, चन्द्रमा सोम का गोला है । यह अग्नि की खुराक है । ३० वें दिन यह सूर्य्य चन्द्रात्मक यज्ञ हुआ करता है, इस प्रकार एक संवत्सर में कुल १२ यज्ञ होते हैं । इसी अग्नि - सोमात्मक यज्ञ से जगत् के यच्चयावत् पदार्थों की उत्पत्ति होती है । अतएव " संवत्सरो वै यज्ञः " - " संवत्सरः प्रजापतिः " - यह कहा जाता । ३०-३० अंश में एक - एक यज्ञ होता है एवं ये बारहों यज्ञ परस्पर सर्वथा भिन्न हैं । सबका स्वरूप पृथक् - पृथक् है, अतएव ३६० अंशात्मक खगोल को ३०-३० अंश की ढेरी के हिसाब से १२ भागों में विभक्त कर दिया जाता है । यही १२ राशि हैं । चन्द्रमा के हिसाब से जैसे श्राकाश को २७ दिन के हिसाब से विचार किया जाता है । तो चन्द्रमा १३ दफे सूर्य्य से सम्बन्ध जोड़ता है । सूर्य्य को ही कश्यप कहते हैं, इसीलिए " कश्यपाय त्रयोदशः " — कहा जाता है । सूर्य्यं से ही सारे जगत् की उत्पत्ति होती है, अतएव " कश्यपात् सकलं जगत् ” – यह कहा जाता है । सूर्य्य ही का नाम कश्यप कैसे है, कश्यप ही सारे जगत का निर्मारण कैसे करता है, इसके लिए श्री गुरुप्रणीत " कृषि रहस्य " ग्रन्थ देखना चाहिए । कहना हमें सिर्फ इतना ही है [ 50 1
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तृतीय काण्ड ( ० १ ) शतपथ ब्राह्मण आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण कि सूर्य हिसाब से आकाश १२ भागों में विभक्त है एवं यही ( १ ) मेव, ( २ ) वृष, ( ३ ) मिथुन, ( ४ ) कर्क, ( ५ ) सिंह, ( ६ ) कन्या, ( ७ ) तुला, ( ८ ) वृश्चिक, ( ९ ) धनु, ( १० ) मकर, ( ११ ) कुम्भ एवं ( १२ ) मीन यह १२ राशि हैं । इन राशियों के नाम भी रहस्य से रक्खे गए हैं । सारा श्राकाश तारोंसे व्याप्त । बस इन नक्षत्रों की तस्वीरों के माफिक ही राशियों के नाम रक्खे गए हैं । वास्तव में उन - उन श्राकाश खण्डों से उन उन प्राणों ही का स्रोत प्राता रहता है । अतएव यह नाम कल्पित नहीं समझने चाहिए । ( भगवान् सूर्य्यं सदा आवे खगोल पर ही प्रकाश डालते हैं । १८० अंश पर ही सौर प्रकाश पड़ता । बीच में सूर्य्य - बिम्ब रहता है एवं ६० अंश इस बिम्ब से पूर्व और ९ ० अंश ही पश्चिम, बस इतनी दूर तक प्रकाश मण्डल रहता है । इसी १८० अंशात्मक प्रकाश मण्डल का नाम " श्रदिति " । एवं सूर्य्य के " वर्क्स " का जो अन्धकार तपोमय मण्डल है, उसका नाम " दिति " मण्डल है । १८० अंश के बाद में प्रकाश कट जाता है अतएव अधोभाग को " दिति " मण्डल कहते हैं । एवं १५० अंश तक प्रकाश अवि-च्छिन्न रूप से रहता है अतएव इस प्रकाशमण्डल को " अदिति " मण्डल कहते हैं । अदिति से आदित्य पैदा होते हैं, दिति से दैत्य पैदा होते हैं । जो प्रकाशी प्रारण है उसी का नाम देवता है, जो तपोमय प्राण है उसी का नाम दैत्य किंवा असुर है । तपोमय प्रारण का अधिष्ठाता दिति मण्डल है, एवं प्रकाशी प्रारण का अधि-ष्ठाता — अदिति मण्डल है । इसीलिए दैत्य दिति के पुत्र कहलाते हैं, आदित्य अदिति के पुत्र कहलाते हैं । ] हमने बतलाया है कि सूर्य का प्रकाश सदा आधे खगोल में ही रहता है । अर्थात् ६ राशि में अदिति मण्डल रहता है एवं ६ में दिति मण्डल रहता है । १८० अंश का ही अदिति मण्डल है, १८० अंश काही दिति मण्डल है । जिस स्थान पर कोई ग्रह रहता है, उसकी सीधी दृष्टि सदा ७ वें पर पड़ा करती है । इसीलिए भगवान् पराशर कहते हैं— " पश्यन्ति सप्तमं सर्वे, शनि जीव कुजाः पुनः । विशेषतश्च त्रिदश त्रिकोण चतुरष्टमान् ॥ " ग्रह संसार के प्राणी मात्र का उपलक्षण समझना चाहिए । “ सर्व तेजः साम्यरूप्यं हि शाश्व š ” – यह वैज्ञानिक सिद्धान्त है । जो तेजस्वी पदार्थ होता है वह अपना गोल मण्डल बनाता है । आँखें भी चूंकि तेजस्वी पदार्थ हैं, इसीलिए - " प्रादित्यचक्षुर्भु त्वाऽक्षिणी प्राविशत् " - यह कहा जाता है । बस सूर्यवत् श्रख का भी एक रश्मिमण्डल बनता है । सूर्य्य प्रतिदिन एक अंश चलकर ३६० दिन में अपने वृत्त की परिक्रमा लगा लेता है, बस इसी प्राकृतिक मण्डल व्यवस्थानुसार सारे मण्डल ३६० अंश के ही माने जाते हैं, चाहे वह बड़ा हो चाहे छोटा हो । वर्तुलवृत्त सब ३६० अंश के होते हैं, हमारा रश्मिमण्डल भी वर्तुल है, अतएव इसके भी ३६० अंश मानने पड़ेंगे, एवं सूर्य मण्डलवत् इसके भी १२ ही टुकड़े मानने पड़ेंगे । श्राश्वर्य मत कीजिए, हमारी सारी व्यवस्थाएँ उसी प्राकृतिक मण्डल पर व्यवस्थित हैं- " यदत्रिह तदमुत्र यदमुत्र तदत्रिह " । [ ८१ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण श्राग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण “ मृत्योः समृत्युमाप्नोतियद् हन्त नैव पश्यति " - यह हमारा घण्टाघोष है । इस रश्मिमण्डल के १२ विभागों में ७ वें विभाग पर हमारी पूर्ण दृष्टि पड़ती है । यदि ७ वें पर कोई परत रक्खी होगी तो उसका हमें अच्छी तरह प्रत्यक्ष होगा । बात वास्तव में ठीक है । जिस स्थान पर हम बैठे हैं - वह तो हमारे से हीं घिर गया, फिर ६ ठे पर हमारी दृष्टि क्योंकर पड़ सकती है । हमारी दृष्टि तो ७ वें पर ही पड़ेगी । कहने का तात्पर्य यह है कि ७ विभाग हमारे कब्जे में श्रा जाते हैं । ७ वें पर ही दृष्टि कैसे पड़ती है, यह बात नीचे लिखे नक्शे से स्पष्ट समझ में आ जाती है -३ २ ५ m WS 42 १२ 99 % ob ज कहने का तात्पर्य यही है कि तेजस्वी पदार्थों का मण्डल गोल बनता है, उसमें ३६० अंश होते हैं, एवं १२ विभाग होते हैं एवं सदा ७ वें पर दृष्टि पड़ती है । ६ ठा ऊपर ही रह जाता है । लग्न से ७ वें [ ८२ ]