Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 121–130

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 121–130

पृष्ठ 121

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) प्रतिपथ ब्राह्मण श्रग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मी “ तदुत्तरमेवैतदुत्तराबत् करोति - इति ॥ १६ ॥

इस प्रकार इस अञ्जन कर्म में, जो कि यह यजमान पाँच बार करके प्रञ्जन डालता हैं, इसका कारण बतलाते हैं— “ तद्यत् पञ्जकृत्व नानक्ति " – ( तदुच्यते ) यह यज्ञ संवत्सर संमित है । पृथिवी के केन्द्र से लेकर चारों ओर जहाँ तक इस पार्थिव अग्नि का मण्डल जाता है, उसे संवत्सर - मण्डल कहते हैं । इसी संवत्सर मण्डल को रथन्तर कहते हैं । यह अग्नि का मण्डल २१ तक जाता है जहाँ पर कि सूर्य्य तप रहा है । इस अग्नि में चूंकि पारमेष्ठ्य सोम आहुत होता रहता है एवं अग्नि में सोम की आहुति पड़ने का ही नाम है यज्ञ, अतएव इस संवत्सराग्नि को यज्ञ कह्ते हैं । सोम यज्ञ द्वारा इसी संवत्सर यज्ञ को आत्मसात् किया जाता है अर्थात् आत्मा का बन्धन उस १७ वें स्थान में कर दिया जाता है । संवत्सर में पाँच ऋतु होती हैं । यद्यपि ऋतु होती हैं छः, परन्तु " पावतो व यज्ञः " के अनुसार हेमन्त शिशिर को एक मानकर पाँच ही ऋतु मान ली जाती हैं, जैसा कि ऐतरेय कहते हैं— " सप्तवशते वै प्रजापतिः । द्वादश मासाः पञ्चर्तवः । हेमन्त शिशिरयोः समासेन । तावान् संवत्सरः । संवत्सरः प्रजापतिः " - इति । इस प्रकार उस संवत्सर यज्ञ को जो पाँच अवयवों में विभक्त है, पाँच बार प्रञ्जन डालकर प्राप्त कर लेता है अर्थात् पांच बार ग्रञ्जन लगने में मन प्रारण वाक् का सम्बन्ध पञ्चर्तुयुक्त संवत्सर यश से हो जाता है-" तस्मात् पञ्चकृत्व प्रानक्ति " ॥१७ ॥

इस प्रकार जब यजमान पांच बार करके प्रञ्जन लगा लेता है तो तदनन्तर इस यजमान को, डाभ की पत्ती से, जो कि दो के बीच में से पतली सी निकलती है - पवित्र कर देते हैं अर्थात् उस पसी को यजमान की दोनों आँखों पर फेर देते हैं । इससे यजमान का आत्मा भी पवित्र हो जाता है एवं कज्जल भी एकसार होता है । इस प्रकार से “ एकाक्रिया द्वयर्थकरी प्रसिद्धा " वाला आभारणक चरितार्थ हो जाता है— " अथैनं दर्भपवित्रेण पावयति " । मनुष्य अपचित्र कैसे है, जिससे कि इसे दर्भ से पवित्र करने की आवश्यकता हुई । यह बतलाते हैं— चूंकि मनुष्य झूठ बोलता है, झूठ बोलना मनुष्य का स्वभाव है अतएव वह अमेध्य रहता है, इसका अन्तरात्मा गिरा हुआ रहता है । पानी यदि सम होता है तो उस पर सूर्य का प्रतिबिम्ब अच्छी [ १०३ ]

पृष्ठ 122

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण श्रग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मणं तरह पड़ता है, परन्तु यदि पानी कुटिल रहता है तो उस पर प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता । मनप्राणवाङ्मय ही प्रज्ञानात्मा है जो कि एक प्रकार का पानी अर्थात् सोम है । मनुष्य झूठ बोलता है, इसका अर्थ है अपने मनप्राणवाक् को कुटिल बनाता है । मन में कुछ है, व्यापार में कुछ है, वाक् में कुछ है । कहता कुछ है, करता कुछ है, बोलता कुछ है । यही कुटिलता है । मनप्रारणवाक् की विरुद्धता है । यही आत्मा का - पातन-है, इसी को " दुरात्मा " कहते हैं । जैसा कि कहा जाता है— " मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम् । मनस्यन्यत् वचस्यन्यत् कर्मण्यन्यत् दुरात्मनाम् ॥ ” बस इस कुटिलता की वजह से इस आत्मा में पवित्रता - मेध्यता का असर नहीं होने पाता है । ' इसको छुपा जाऊँ ', यह छिपाव का रंग उस पर चढ़ जाता है । यही पर्दा इसे मेध्य नहीं होने देता । तेल से रंगे हुए वस्त्र पर जैसे रंग नहीं चढ़ता तद्वत् मिथ्या - तेल से आत्मा के रंगे रहने के कारण मनुष्य का अन्तःकरण सर्वथा अपवित्र रहता है । बस इसी अभिप्राय से कहते हैं--“ श्रमेध्यो वै पुरुषो यदनृतं वदति । पूतिरन्तरतः ” । यह दर्भ मेध्य है क्योंकि पानी और भाग से बना हुआ है एवं दोनों ही में है - विद्युत् एवं दर्भ-पवित्र भी हैं । ऊपर आए हुए दोष को हटा देने का नाम पवित्रता है । जिस अन्तराय के कारण ऊपर की वस्तु आत्मा पर ठहरने नहीं पाती, इसी का नाम अपवित्रता है, एवं दोष न रहने पर भी जैसे लोटे पर मिट्टी नहीं ठहरती तद्वत् आत्मा पर संस्कार के न जमने का नाम अमेध्यता है । दोष निवारण पवित्रता है, श्रतिशयाधान मेध्यता है । दर्भ में दोनों गुण हैं । जैसे बुहारी से कूड़ा-कर्कट साफ हो जाता है तद्वत् दर्भ विद्युत् से दोनों दोष हट जाते हैं । बस हम मेध्य और पवित्र बनकर दीक्षा ले, श्रतएव दर्भ पवित्र से इसे पवित्र करते हैं— " मेध्या वै दर्भाः । मेध्यो भूत्वा दीक्षं इति । पवित्रं वैदर्भाः । पवित्रपूतो दीक्षं इति । तस्मादेनं दर्भपवित्रेण पावयति ॥ १८ ॥

जिससे इसको पवित्र करते हैं वह बीच की एक कोमल कुशा होनी चाहिए अर्थात् एक ही होनी चाहिए - " तद्वा एकं स्यात् " । इसका कारण बतलाते हैं - यह वायु एक है । वायु एक ही रूप से बह रहा है । वायु में एक हिस्सा इन्द्र का रहता है इसीलिए - " इन्द्रतुरीयग्र हा गृह्यन्ते " - कहा जाता है कि इन्द्र ही विद्युत् है, विद्युत् पानी धौर आग में रहता है, इन्हीं दोनों से दर्भ बनी है । चूंकि वायु एक है एवं उसी से बनी है दर्भ, अतः उसकी प्रतिकृति पर एक ही दर्भ होनी चाहिए— [ १०४ ]

पृष्ठ 123

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तृतीय काण्ड ( अ ० १ ) शंतपंथ ब्राह्मणं श्राग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण " एको ह्येवायं पवते । तदेत्स्यैवरूपेरण - ( पावयतीतिशेषः ) । तस्मादेकं -स्यात् ” ॥१ ९ ॥ अथवा तीन कुशा भी ले सकते हैं - " प्रथोऽपि त्रीण्यपि स्युः " । यह वायु यद्यपि एक रूप से ही बाहर बहता रहता है परन्तु वही शरीर में अन्तः प्रविष्ट हो प्राण, उदान और व्यान भेद से तीन स्वरूपों में परिणत हो जाता है । चूंकि हमें शरीर को पवित्र करना है, उसमें यह वायु तीन स्वरूपों में परिणत हो रहा है । जो आता है वह प्राण है जो वापस निकलता है वह उदान है, एवं जो केन्द्र में हृत्- प्रदेश में ठहरता है वह व्यान है । एक ही वायु, उत्पत्ति, स्थिति लय भेदेन तीन स्वरूपों में परिणत हो जाता है । अतः उसी की प्रतिकृति पर तीन ही कुशा से पवित्रता करनी चाहिए |

" तदेतस्यैवानुमात्राम् । तस्मात् त्रीरिण स्युः " ॥२० ॥

अथवा सात भी कुशा ले सकते हो । क्योंकि हमारे मस्तष्क में सात ही प्रारण हैं । दो कान हैं, दो ख हैं, दो नाक हैं एवं एक मुँह है । यह सातों ही सप्तपुरुष " पुरुष " नाम से प्रसिद्ध हैं । यह सातों प्राण सप्तर्षि शब्देन व्यवहृत होते हैं । यह सातों एक साथ रहते हैं । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है—-" साकंजानां सप्तथमाहुरेकजं षडिद्यमा ऋषयो देवजाः । तेषा मिष्टानि विहितानि धामशः स्थात्रे रेजन्ते विकृतानि रूपशः ” । यह सातों प्राण एक साथ पैदा होते हैं । इसी अभिप्राय से " साकं जानाम् - ( सहोत्पन्नानाम् ) यह कहा है | वेद कहता है इन सातों का जो सातवाँ है । उसे विद्वान् लोग एक ही से उत्पन्न होने वाला बतलाते हैं अर्थात् वाक् अकेली है एवं जो अवशिष्ट ६ हैं वे यम हैं अर्थात् कान, नाक, आंख दो - दो हैं परन्तु मुँह एक ही है, एवं यह सातों ही ऋषि हैं । अर्थात् प्राण है परन्तु देवता से उत्पन्न होने वाले ऋषि हैं । ऋषि प्राण स्वयम्भू की चीज है । उसी से पहले पित्र अर्थात् परमेष्ठि- मण्डल उत्पन्न होता है बाद में देवता अर्थात् सौर मण्डल उत्पन्न होता है । इस प्रकार देवता ऋषियों के पोते हैं, इसी अभिप्राय से भगवान मनु

कहते हैं-" ऋषिभ्यः पितरो जाता पितृभ्यो देवदानवाः ।

देवेभ्यश्च जगत् सर्वं चरं स्थाण्वनुपूर्वशः ॥

परन्तु यह प्रारणऋषि देवताओं से उत्पन्न हुए हैं । अग्नि, वायु, आदित्य, दिक्, भास्वर सोम,.. इन्हीं से यह सातों प्राण उत्पन्न हुए हैं । इसीलिए तो - " पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति " कहा जाता है । बस इसी विशेषता को बतलाने के लिए " ऋषयो देवजा " कहा जाता है । ] [ १०५ ]

पृष्ठ 124

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण अग्नावैष्णवेष्ट्रि ब्राह्मणे वेद भगवान् कहते हैं कि इन सातों के दृष्ट अर्थात् विषय अपने - अपने स्थान पर ही नियत हैं । अपने ही स्थान पर, अपने नियत ही विषय को यह ग्रहण करते हैं अर्थात् सारी इन्द्रियाँ अध्याध्यकारी हैं । एवं अपने अपने अर्थ में नियत हैं । आँख कभी बोल नहीं सकती, मुँह कभी देख नहीं सकता । जो मनुष्य चक्षुरिन्द्रिय को " व्याप्यकारी " मानते हैं उन्हें भ्रांत समझना चाहिए, एवं यह सातों ही स्थाता के लिए अर्थात् विज्ञानात्मा के लिए अपने नाना रूपों को विकृत किया करते हैं अर्थात् इनका सारा काम उसी विज्ञानात्मा के लिए होता है । प्रकृत में हमें सिर्फ यही कहना है कि दर्भ से आध्यात्म मण्डल को पवित्र करना है । सात प्राण अतः सात कुशा से काम लेना चाहिए । " सप्त का इमे शीर्षन् प्रारणाः । तस्मात् सप्तस्युः । अथवा तीन सप्तक अर्थात् २१ ले सकते हो । एकविंशति ही तो यह यज्ञसंपत् है । २१ पर सूर्य्य है । यही यज्ञ का स्वरूप है अतः सम्पूर्ण सम्वत्सर यज्ञ सम्पत्ति को आत्मसात् करने के लिए २१ भी कर सकते हो -" त्रिः सप्तान्येव स्युः - एकविंशतिः । एषैव सम्पत्: ( यज्ञस्येति शेषः ) ॥ २१ ॥

एक कुशा से पवित्रता की जाती है, तीन से की जाती है, सात से की जाती है । इसमें २१ से करना यह अन्तिम्न मत है । इन इक्कीस कुशाओं को अलग अलग नहीं रखना चाहिए, अपितु ७-७ के तीन सप्तक कर लेने चाहिए । ७ को एक डोरे से बांध लेनी चाहिए, सात को एक से एवं सात को एक से । इस प्रकार तीन सप्तक कर लेने चाहिए । ७-७ का एक एक सप्तक है और वह तीन ही करें । इसमें थोड़ा सा वैज्ञानिक रहस्य है । हमारे शरीर में नाभि से कण्ठ तक कुल २ ९ प्राण हैं- पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्यो अर्थात् जमीन की गर्मी, वायु की गर्मी और सूर्य की गर्मी । इन तीनों गर्मियों से हमारे शरीर का निर्माण होता है । जो पृथिवी की गर्मी है वह पृथिवी ही में रहती है अतः पृथिवी को अलोक कहते हैं एवं वायु की गर्मी अन्तरिक्ष्य ( रिक्त ) में रहती है अतएव अन्तरिक्ष्य को " वायु लोक " कहते हैं एवं संध्याग्नि को सूर्य्यलोक कहते हैं । इसी त्रिलोकी को पृथिवी अन्तरिक्ष द्युलोक को वैदिक परिभाषा में " रोदसी " त्रिलोकी कहा जाता है । बस इस रोदसी से ही अर्थात् अग्नि, वायु, सूय्यं से ही हमारी, हमारी ही क्या यच्चयावत् पदार्थों की उत्पत्ति होती है । अग्नि तो अग्नि है ही, वायु भी श्रग्नि ही है एवं सूर्य भी अग्नि ही है । इस अग्नि की वास्तविक अवस्था वायु है । जब वायु घन हो जाता है तो यही अग्नि कहलाने लगता है एवं विरल हो जाता है तो आदित्य कहलाने लगता है । श्रग्नि की घन, तरल, विरल अवस्था का नाम ही " अग्नि, वायु, आदित्य है " । यह अग्नि संसार के यच्चयावत् पदार्थों का पिता है । यही अग्नि- अग्नि, वायु, आदित्य तक फैला' हुआ है । इस अग्नि में जब पारमेष्ठ्य सोम की आहुति होती तो इस अग्नि सोमात्मक यज्ञ से यच्चयावत् पदार्थं उत्पन्न होते हैं । यह अग्नि ऋत - सत्य भेदेन दो प्रकार का है । पार्थिव केन्द्र से बुद्ध जो [ १०६ ]

पृष्ठ 125

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तृतीय काण्ड ( ० १ ) शतपथ ब्राह्मण श्रग्नावँष्णवेष्टि ब्राह्मण है, वह सत्य है एवं चारों ओर व्यापक जो अग्नि है, जिसका कि कोई केन्द्र नहीं वह ऋताग्नि है । बस इस ऋताग्नि में जब सोम की आपूर्ति पड़ती है तो यही " ऋतु ' कहलाने लगती है । बस इस ऋतु से ही संसार के यच्चयावत् पदार्थ उत्पन्न होते हैं । इस ऋतु सम्बन्धी अग्नि को ही " आर्तव " अग्नि कहते हैं । स्त्री जब ऋतुमती होती हैं, अर्थात् सोममिश्रित प्रजनन क्रियाशील ऋतुप्राण जब उसके रूधिर में प्रविष्ट होता है तभी सन्तानोत्पत्ति होती है । इसीलिए जब तक ( अर्थात् १५ दिन तक ) स्त्री ऋतुमती रहती है उसके १५ दिन तक ही गर्भाधान हो सकता है । यह आर्तव अग्नि गर्भ में अपनी आठ संस्था बनाता है । कैसे बनाता है इसके पहले इस अग्नि की संस्था का स्वरूप लमझ लेना चाहिए । अग्नि चित्यचितेनिधे भेदेन दो प्रकार का है । इन्हीं को मर्त्य - अमृत भी कहते हैं । जो पिण्डाग्नि है उसे मर्त्य अग्नि कहते हैं एवं जो पिण्ड के बाहर प्राण रूप से रहने वाला अग्नि है उसे ही अमृताग्नि कहते हैं । अव्यय, अक्षर, क्षर इन तीनों की समष्टि का नाम ही प्रजापति है । तीनों कहलाते पुरुष हैं । असल में पुरुष तो केवल अव्यय ही है । अक्षर और क्षर तो अव्यय की परा और अपरा प्रकृति हैं परन्तु सादेश्यात् तीनों को पुरुष कह दिया जाता है । इन तीनों में जो क्षर है, उसका जो विकारभाग है उससे ही जगत् का निर्माण होता है । निर्माण नहीं होता, विकारक्षर का नाम ही जगत् है एवं प्रति क्षण में परिवर्तनीय जो क्षर है उसको " अस्ति " इस प्रतीति में लाने वाला जो एक अमृतप्राण है अर्थात् अमृताग्नि है वही अक्षर है एवं इन दोनों का जो आलम्बन है वही अव्यय है । अव्ययरूप ज़मीन पर अक्षर रूप कुम्हार क्षर स्वरूप घटपटादि का निर्माण किया करता है । अव्यय जगत् का आलम्बन है, श्रसमवायि कारण है । अक्षर निमित्त कारण है, क्षर समवायि कारण है । अव्यय मनस्वरूप है, अक्षर-प्राणस्वरूप है, क्षर वाक् स्वरूप है । इसी मनप्राणवाक् प्रपश्व ही को जगत् कहते हैं । इसी विज्ञान को

बतलाते हुए भगवान् कहते हैं-" द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।

क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।

यो लोकत्रयमाविश्य विभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥

इन तीनों में से जो अक्षर - प्राण है, वह अपनी ६ संस्था रखता है अर्थात् इसमें 8 प्राण रहते हैं । इन ε में से एक प्राण तो महामाया द्वारा जो रसपरिच्छिन्न हो अव्यय बन गया है उस पर अभिव्याप्त हो उसीकी वस्तु बन जाता है । बाकी रहते हैं आठ प्रारण । इन आठों में से जो ४ प्राण हैं उनसे तो हमारा आत्मा बनता है, दो प्राणों से दक्षिणोत्तर पक्ष ( हाथ पैर ) बनते हैं एवं एक प्राण से पुच्छ प्रतिष्ठा बनती है जो कि स्वयं अनस्थियुक्त होती हुई भी इस अस्थि वाले शरीर को उठाए हुए है । इसी अभिप्राय से — " प्रस्थन्वन्तं यदनस्था बिर्भात " - कहा जाता है । मनुष्य में जो एक तनाव सा दौख़ता ,, जिससे कि वह खड़ा रहता है, बस वही प्रतिष्ठा पुच्छप्राण है, जो कि मेरूदण्ड के अन्त तक गुदा के समीप तक रहता है । इन ७ प्राणों को मिलाकर इनका जो सार भाग है, रस भाग है, मक्खन है [ १०७ ]

पृष्ठ 126

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मणं आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण जो कि परिमाण में एक प्राण - भाग जितना है उससे मस्तक बनता है, जिसे कि " शिर " कहते हैं । चूंकि सातों के रस - भग से, सार - भाग से, श्रीभाग से मस्तक बना है अतएव यह मस्तक इन नीचे के सातों पर अर्थात् सर्वाङ्ग शरीर पर हुकूमत करता है । सातों से इसकी कड़ी जुड़ी रहती है इसी मस्तक के द्वारा सम्पूर्ण प्राणों को अपनी - अपनी खुराक मिला करती है । इस मस्तक में जब प्रन्नाहुति होती है तभी सारे प्राणों की स्थिति रहती है । हमने इन सातों में से जिन ४ प्राणों को आत्मा बतलाया था, उस आत्मा से नित्यश्रात्मा का कोई सम्बन्ध नहीं है । सिर, हाथ, पैर सब इस धड़ ही पर रहते हैं एवं औरों की अपेक्षा इसमें प्राण - मात्रा अधिक है । केवल इसीलिए हाथ पैरों की अपेक्षा से ही इस चतुःप्राणसमष्टि युक्त घड़ को श्रात्मा बतला दिया गया है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है - धड़ हाथ से चाहे जैसा काम ले सकता है, उसे इधर घुमा सकता उधर घुमा सकता है एवं यही धड़ मस्तक को भी चाहे जैसे हिला सकता है परन्तु हाथ पैरों की हुक्कू -मत धड़ पर नहीं चलती । इस धड़ में इस प्रकार श्रात्मत्व है अवश्य परन्तु चूंकि इनका रसभाग - सार-भाग निकल गया है जिससे कि मस्तक बना है अतः यह सातों प्राण मूच्छित ही रहते हैं । चेतना भाग विज्ञान का हिस्सा मस्तक ही में रहता है । मस्तक की अर्थात् विज्ञान की सहायता के बिना यह सातों ही बेकार हैं । इसी अभिप्राय से शिर को " श्री " कहा जाता है । श्री कहते हैं रस भाग को इसको जो धारण करता है वह कहलाता है " श्रीधार " इसीको लोक में " सरदार " कहते हैं । " सरदार " श्रीधार का ही अपभ्रंश है । प्रकृत में हमें कहना यह है - जहां तक मायावच्छिन्न अव्यय का स्वरूप है, वहां तक उसी में नीचे के एक हिस्से में तो अक्षर पुच्छप्राण रहता है एवं दोनों पार्श्वों में दो पक्ष प्राण रहते हैं एवं बीच में ४ प्राणों को मिलाकर के आत्मा रहता है, जिसे कि धड़ कहते हैं एवं जो बाकी का ऊपर का चौथा हिस्सा है उसमें इन सातों के रस भाग से युक्त जो शिर भाग है वह रहता है । इस प्रकार से चार आत्मा, दो पक्ष, एक पुच्छ एवं आठवां शिर इन सबकी समष्टि को ही पुरुष कहते हैं- जो कि अव्यय स्वरूप नाल-म्बन पर अपनी स्थिति कायम करता है । इसी विज्ञान को श्रुति बतलाती है— " एतान् सप्त पुरुषानेकं पुरुषमकुर्वन् यदूर्ध्वं नाभेस्तौ द्वौ समौब्जन् यदवाङ -नाभेतौ द्वौ पक्षः पुरुषः प्रतिष्ठैक श्रासीत् । अथ यैतेषां सप्तानां पुरुषाणां श्रीः यो रस आसीत् तमूर्ध्वं समुदौहंस्तदतस्य शिरोऽभवत् । श्रियः समुदौहंस्तस्मा-च्छिरः । तस्मिन्नेतस्मिन् प्रारणा प्रश्रयन्त तस्माद्वेवैतच्छिरः । अथ यत् प्रारणा अन्ततस्मादु प्राणा श्रियः । अथ यत् सर्वस्मिन्न श्रयन्त तस्मादुशरीरम् । सवै सप्तपुरुषो भवति । सप्तपुरुषो ह्यं पुरुषो यच्चत्वार श्रात्मा त्रयः पक्ष-पुच्छानि " - ( शत ० ६।१।१।४–६ ) [ १०८ ]

पृष्ठ 127

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मणाँ हमने जिन प्राणों की ऊपर चर्चा की है उन्हें आग्नेय प्राण समझने चाहिए | क्योंकि हाथ-पांव, धड़ इत्यादि का निर्माण इस अग्नि के चुनाव से ही होता है । इन आठों प्राणों में से जो ७ प्राण हैं उनको तो चित्याग्नि कहते हैं । इन्हीं सातों के चुनाव से चूंकि शरीर का निर्माण होता है अतएव यह प्राणसमष्टि चित्याग्नि कहलाती है एवं जो आठवां रसमय श्रीप्राण है उसे चित्तेनिधे ( अमृताग्नि ) अग्नि कहते हैं । यह रस भाग कभी नष्ट नहीं होता अतएव हम इस रसभाग को तो ' अक्षर ' कहेंगे एवं चूंकि इन सातों मर्त्य प्राणों से अस्थि मांसादि नई - नई वस्तुएं पैदा होती रहती हैं अतः क्षरणात् उस मर्त्य भाग को ' क्षर ' नाम से व्यवहृत करते हैं । परन्तु इतना इस क्षर में विशेष समझना चाहिए, चाहे इसमें से करोड़ों विकारक्षर निकल जायँ तथापि यह क्षर अपने स्वरूप से वैसा ही रहता है जैसाकि विकारोत्पत्ति के पहले था । इस क्षर को, चूंकि यह अपनी ही स्थिति में रहता है अतः आत्मक्ष रकहते हैं । इस आत्मक्षर से ही चूंकि विकारक्षर और यज्ञक्षरों की उत्पत्ति होती है अतः इनकी अपेक्षा से इसे " प्रजापति " कहा जाता है । विकारक्षर और यज्ञक्षर ही इस आत्मक्षर की प्रजा है । कहने का तात्पर्य यही है कि जो अष्टप्राणात्मक अक्षर था उसीमें चित्यचित्तेनिधे भेद से अक्षर और क्षर अर्थात् मर्त्य और अमृत यह दो भेद हो जाते हैं: वस्तुतः प्रजापति का स्वरूप दोनों को मिला-कर के ही सम्पन्न होता है । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है-" अर्द्ध वै प्रजापतेरात्मनो मर्त्यमासीदर्धममृतम् ” । इस प्रपञ्च से हमें यही बतलाना है कि यह प्रारण जो कि शरीर निर्माता है, आग्नेय है, अपनी ७ संस्था रखता है अर्थात् ७ प्राण इकट्ठे ही रहते हैं जो आठवाँ रस प्रारण बतलाया था वह भी ७ ही 1 सातों ही के हिस्सों से चूंकि रस - प्राण निकला है अतः उसे भी सप्तावयत्र कह सकते हैं । [ “ गायत्र्या ब्राह्मणं निरवर्त्तयत् ” यह कहा जाता है । गायत्री से प्रजापति ने ब्राह्मण का शरीर बनाया, यही इस श्रुति का तात्पर्य है । गायत्री अग्नि को कहते हैं- " गायत्री वा एषयदग्निः " । इसी अग्नि से शरीर बनता है । इस अग्नि के आठ ग्रवयव होते हैं । आठ अक्षर में इस अग्नि की मात्रा समाप्त होती है, इसीलिए - " अष्टाक्षरा वै गायत्री " यह कहा जाता है । अक्षर ही को प्राण कहते हैं । यह प्राण प्रादेशमित होता है " प्रादेशमितो वे प्रातः " । एक- एक प्रादेशं साढ़े दस - दस अंगुल का होता है । चूंकि आठ प्राणों से मनुष्य का शरीर बना है एवं प्रत्येक प्राण है साढ़े दस - दस अंगुल का, अतएव अपने बिलांद की नाप से ८४ अंगुल का होता है । बस, " गायत्र्या ब्राह्मणं निरवर्तयत्'- - इसका यही रहस्य है । ब्रह्मरन्ध्र से गुदा तक ४ प्रादेश हैं । अर्थात् ४ प्राण हैं, एवं गुदा से पैर तक ४ प्राण हैं । इन ८ में से गुदा से नीचे के प्राणों के विषय में हमें कुछ नहीं कहना है । कहना ऊपर के चार प्राणों के विषय में है । गुदा से ऊपर के जो ४ प्राण हैं उनमें प्रत्येक में सात - सात प्राण रहते हैं । सप्त प्राणसमष्टिही एक - एक प्रारण का स्वरूप है । गुदा से नाभि तक एक प्राण है, नाभि से हृदय तक एक प्राण है, हृदय से कण्ठ तक एक प्राण है एवं कण्ठ से ब्रह्मरंध्र तक एक प्राण है । चारों प्राण साढ़े दस - दस अंगुल की अभि-[ १० ९ ]

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 128 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) करणौ-चक्षुषी-नासिके-वाक्-श्रग्नावेष्णवेष्टि ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण " गुहा चित्रम् " ( मनुष्य कङ्कालम् ) शिरोगुहा [ ११० ] व्याप्ति में हैं । प्रत्येक में ७-७ प्राण हैं । इस प्राण का नाम ही " सप्तऋषि " प्राण है । यह सातों साथ रहकर ही अपनी स्थिति कायम करते हैं । इन चारों प्राणों के रहने का जो स्थान है उसे ही वेद में " गुहां " शब्द से व्यवहृत किया जाता है । चूंकि प्राण चार हैं अतः गुहा भी चार ही । उनके नाम यह हैं-( १ ) शिरोंगुहा, ( २ ) उरोगुहा, ( ३ ) उदरगुहा, ( ४ ) बस्तिगुहा । इनमें जो प्राण रहता है वह सप्तसंस्था है । इसमें प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि प्रत्येक गुहा में ७-७ ही वस्तुएं दिखलाई पड़ती हैं । प्रारम्भ में ही लीजिए - ब्रह्मरंध्र से कण्ठ तक २ कान हैं, दो आँख हैं, दो नासिका छिद्र हैं, एक मुँह है । कण्ठ से हृदय तक दो हाथ हैं, दो स्तन हैं, दो फुफ्फुस हैं, एक हृदय है । हृदय से नाभि तक यकृत और प्लीहा हैं । बाद में दो क्लोम हैं, दो वृक्क हैं, सातवीं नाभि हैं । नाभि से गुदा तक दो श्रोणी हैं, मूत्ररेतसी है, दो अण्डकोष हैं, सातवीं गुदा है । इस प्रकार प्रत्येक प्राण सप्तावयंव है । सातों में ६-६ तो जोड़ले ( जुड़वा ) हैं अर्थात् दो - दो हैं एवं एक ( मुँह, हृदय, नाभि, गुदा ) अकेला ही है । परन्तु सातों एक साथ ही पैदा होने वाले हैं । सातों ही देवजा ऋषि हैं अर्थात् अग्नि, वायु, इन्द्र, सोमं ( दिक् सोम, भास्वर सोम ) इन देवताओं से उत्पन्न होने वाले ऋषि है । इसी अभिप्राय से वेद भग-वान् कहते हैं—

" साकंजानां सप्तमेकमाहुः षडिद्यमा ऋषयो देवजाः ।

तेषामिष्टानि विहितानि धामशः स्थात्रे रेजन्ते विकृतानि रूपशः ॥

प्रत्येक गुहा में ७-७ प्राण रहते हैं, यह बात विज्ञान से स्पष्ट हो जाती है परन्तु बिना प्रमाण के सन्तोष नहीं होता, अतएव प्रमाण बतला देते हैं । श्रुति कहती है -" सप्तप्रारणाः प्रभवन्ति तस्मात् सप्ताचिषः समिधः सप्तहोमाः । सप्त इमे लोका येषुचरन्ति प्राणा, गुहाशया निहिताः सप्तसप्त ॥ ( मु ० २-१ ) पूर्वोक्त प्राण विभाग नीचे लिखे परिलेख से स्पष्ट हो जाता है—

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) हस्तो-स्तनो फुफ्फुसे-हृदयम्-यकृतप्लीहे -क्लोमानी वृक्के-नाभिः श्रोणी-मूत्र रेतसी-प्रांण्डे. गुदा-शतपथ ब्राह्मरंग -[ १११ ] श्रग्नावष्णवेष्टि ब्राह्मण उहा उदरगुहा बस्ति गुहा पूर्वोक्त चार सप्तकों में से कण्ठ से नीचे तक में ती त्रिलोंकी है एवं कण्ठे से ऊपर की चतुर्थ लोक है जो कि प्रपोलीक कहलाता है । गुदा से नाभि तक अग्निलोक है । नाभि से हृदय तक वायु लोक हैं । हृदय से कण्ठ तक श्रादित्यलोक हैं । कण्ठ से ब्रह्मरन्ध्र तक " प्रापोलोक " है जो कि शिवलोक भी कहलाता है । इन्हीं को पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, आप भी कहते । प्रकृतिमण्डल में सबसे पहले स्वयम्भू मण्डल है बाद में परमेष्ठि मण्डल है, बाद में सूर्यमण्डल है बाद में चन्द्रलोक है जिसे कि अन्तरिक्ष कहेंगे । बाद में पृथिवी लोक है ।

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तृतीय काण्ड ( ०१ ९ ) शतपथ ब्राह्मण आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण हमारे सर्वाङ्ग शरीर में जो चेतना है वह स्वयम्भू की वस्तु है एवं श्रीभाग पारमेष्ठ्य है एवं तीनों प्राण तीनों लोकों के हैं । उत्तरोत्तर चेतना कम होती जाती है, अतएव शरीर में भी मस्तक से उत्तरोतर चेतना कम ही रहती है । बस, जैसी रचना प्रकृति की है वैसी ही रचना हमारी है । इसीलिए " यदत्रिह तवसूत्र यवमुत्र तदत्रिह " - कहा जाता है । यह है शरीर - विज्ञान । इसी विज्ञान के श्राधार पर कुशा के तीन सप्तकों से यजमान के शरीर को पवित्र किया जाता है । जो श्रीभाग है, सप्तशीर्ष प्राण हैं वे अमृतस्वरूप हैं, जैसा कि ऊपर कह दिया गया है । अमृत पदार्थ पर दोषाधान नहीं हो सकता । वह सदा पवित्र रहने वाली वस्तु है । भला उसे पवित्र कौन करेगा जो कि सबको पवित्र करता है । परन्तु कण्ठ से नीचे के जो गुदा तक के तीन सप्तक हैं, वे मर्त्य हैं अतएव अमेध्य हैं । बस इन तीनों की अमेध्यता दूर करने के लिए तीन ही सप्तक काम में लाए जाते हैं । सात - सात प्राण मिले हुए हैं । अलग - अलग नहीं हैं, सातों को मिलाकर के एक प्रारण है । इसीलिए ७-७ को एक - एक डोरे से बांधा जाता है, एवं यह तीनों प्राण भी एक से एक बद्ध हैं इसीलिए यहाँ भी तीनों सप्तकों को फिर एक डोरे में बांध लेते हैं । बस इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान याज्ञवल्क्य कहते हैं- " तं ( यजमानं ) सप्तभि: सप्तभिः पावयति ” । क्यों सात - सात के तीन सप्तकों से पवित्र करने चाहिए - यह बतलाकर अब पद्धति बतलाते हैं । अध्वर्यु मन्त्र बोलता है एवं उसी के अनुसार यजमान भी बोलता है इसीलिए " पावयति " कहा गया है । वह यजमान मन्त्र बोलता है - " चित्पतिर्मापुनातु " । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि प्रजापति ही को चित्पति कहते हैं । प्रजापति मुझे पवित्र करें यही तात्पर्य है । हमने बतलाया है कि ईश्वर का शरीर स्वयम्भू परमेष्ठि, सूर्थ्य, चन्द्र, पृथिवी इन पांच भागों में बंटा हुआ है । यही पञ्चपुण्डीराप्राजापत्यबल्शा ( टहनी ) कहलाती है । इनमें चित् का प्रधान स्थान स्व-यम्भू है । हम जो प्राणिमात्र में चेतना देखते हैं वह सर्वत्र व्याप्त होती हुई भी स्वयम्भू की वस्तु है । स्वयम्भू के नीचे है परमेष्ठि मण्डल । इसमें जो मनोता है वे भृगु, अङ्गिरात्रि कहलाते हैं । अब वायु सोम ही को भृगु कहते हैं । जैसे अग्नि की घनतरलविरलावस्था का ही नाम अग्नि ' वायु आदित्य है वैसे ही सोम की घनतरलविरल अवस्था का नाम ही " अब् " वायु और सोम हैं । वस स्वयम्भू की चेतना को ग्रहण करने वाले यह तीन ही पदार्थ हैं । पानी, सोम और वायु इन तीन ही पर चित् का प्रतिबिम्ब पड़ता है । चूंकि चित् ग्राहक तीन ही हैं अतः संसार के जीव कुल तीन ही प्रकार के हैं । तीनों श्राप्य, वायव्य और सोम्य कहलाते हैं । जल के जितने भी मत्स्यादि जीव हैं वे " आप्य " कहलाते हैं एवं वायु के अस्मदादि जितने भी जीव हैं वे वायव्य कहलाते हैं एवं चन्द्रमा की चाँदनी में अर्थात् सोम में रहने वाले देवता सौम्य जीव कहलाते हैं । शरीर में जब तक चेतना रहती है तभी तक वह पवित्र रहता है | यह चेतना हर वक्त हवा फिल्टर करती रहती है । जब शरीर में से चेतना निकल जाती है तो शरीर सड़ने लगता है । इस शरीर प्रजा का वह चित् ही प्रजापति है । यही शरीर को पवित्र रखता है । बस उसी से प्रार्थना करते हुए कहते हैं — " चित्पतिर्मांपुनातु " । " प्रजापति वें चित्पति " से पारमेष्ठ्य प्रजापति का ग्रहण है । [ ११२ ]