Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 131–140

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 131–140

पृष्ठ 131

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तृतीय काण्ड ( ० १ ) शतपथ ब्राह्मण आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण फिर यजमान मन्त्र बोलता है- " वाक्पतिमनातु " ॥ वाक्पति मुझे पवित्र करे । जैसे चित्-शक्ति में पवित्र करने की शक्ति है वैसे ही वाक्पति में अर्थात् सूर्य में भी फिल्टर करने का सामर्थ्य हैं । सौराग्नि सारी गन्दगी को दूर कर देता है । स्वयम्भू, परमेष्ठि, सूर्य्य, चन्द्र, पृथिवी यह पांचों ही पञ्ची-कृत यज्ञक्षर हैं । इन्हीं को प्रारण, आप, वाक्, अन्नाद, अन्न शब्द से कहा जाता है । पांचों के प्राणमण्डल, प्रापोमण्डल, वाङ्मण्डल, अन्नादमण्डल, अन्नमण्डल यह नाम हैं । सूर्य्यमण्डल ही को वाङ्मण्डल कहते है । अग्नि ही को वाक् कहते हैं । इसीलिए - " तस्थ वा एतस्याग्नेः वागेवोपनिषत् " यह कहा जाता है । अग्नि का प्रवेश जहां हो जाता है वहाँ का भी दूषित भाव एकान्ततः नष्ट हो जाता है । बस इसीलिए " प्रजा-पति वाक्पति " से " सौर प्रजापति " ही अभिप्रेत है । सूर्य में १२ आदित्य हैं अर्थात् भिन्न - भिन्न काम करने वाले १२ प्राण हैं । इनमें से एक प्रेरयिता प्राण का नाम है " सविता " । यह सविता वास्तव में बृहस्पति, ब्रह्मणस्पति से भी ऊपर की वस्तु है । यही सविता सूर्य्य में आता है अतएव प्रादित्यों में इसकी गणना होने लगती है । पानी शरीर पर गिरा और यदि आपने हाथ से प्रेरणा अर्थात् रगड़ा नहीं तो मैल उतर नहीं सकता । रगड़ने से मैल उत-रता है, खाली पानी डालने से नहीं । पानी डालने से भी कुछ मैल तो अवश्य ही उतर जायेगा, परन्तु बिना प्रेरणा के बिना रगड़ के सुपूतता नहीं आती । सुपूतत्व प्रेरणा से ही होता है । इस प्रेरणात्मक क्रिया का अधिष्ठाता जो प्राण है उसे ही ' सविता ' कहते हैं । चित् भी है वाक्पति भी है और यदि सविता नहीं है तो सुपूतत्व नहीं हो सकता । बस इस सुपूतत्व संपत्ति के लिए ही प्रार्थना करते हैं- " देवो मा सविता पुनातु " । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि वही वस्तु सुपूत है जिसे कि सविता देवता पवित्र करें । बस इसी सुप्त-तत्व संपत्ति प्राप्ति के लिए ही " देवो मा सविता पुनाबु " कहा गया है- " एतद्वै सुपूतं यं देवः सविता पुनात् । तस्मादाह - " देवो मा सविता पुनातु " । अखिल विश्व में ऋत और सत्य यह दो ही पदार्थ हैं । सत्य उस पदार्थ का नाम है जो केन्द्र रखता है एवं ऋत उस पदार्थ का नाम है जो कि अकेन्द्र हो । जो अपनी लाइन को न छोड़कर सीधा श्राता है, वही सत्य पदार्थ है एवं जो लाइन को छोड़ देता है, वही ऋत है । जो सत्य पदार्थ है उसे सच्छिद्र कहते हैं एवं ऋत पदार्थ को अच्छिद्र कहते हैं । यदि इनका असली स्वरूप पूछना चाहो तो ये अग्नि और सोम ही हैं । जो आग्नेय पदार्थ हैं वे सत्य है | सोम ऋत है । अग्नि में से किरणें निकलती हैं । वे किरणें अपना स्थान नियत रखती हैं । इन किरणों के बीच का स्थान खाली रहता है । सूर्य की रश्मिएं नहीं ही अपितु आग्नेय पदार्थ मात्र सच्छिद्र हैं, परन्तु वायु अर्थात् ब्रह्मणस्पति का सोम चूं कि ऋत है अतएव वह अच्छिद्र है । सोम से कोई खाली स्थान नहीं रहता है | उसके लिए तो " त्वमातनो सर्वन्तरिक्षम् " कहा जाता है । पानी सच्छिद्र नहीं है, सूर्य्यं की रश्मि सच्छिद्र है । बस सूर्य्य की रश्मि अर्थात् अग्नि एवं सोभ पवित्रता करने वाले हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं - " श्रच्छिद्र रेग पवित्रेण " । अर्थात् सविता देवता अच्छिद्र पवित्र से हमें पवित्र करे । याज्ञवल्क्य कहते हैं, यह जो सोमात्मक वायु बह रहा है वही अच्छिद्र पवित्र है । इसी अभिप्राय से " अच्छिद्र ेण पवित्रेण " कहा गया है । इसी ब्रह्मणस्पति के वायु ( सोम ) के लिए श्रुति कहती है-[ ११३ ]

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण

" पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः ।

तप्ततन तदामो समश्नुते शृतास इद्वहन्तस्तत् समाशत ॥

( ऋक् सं ० ६।८३।१ ) फिर मन्त्र का शेष बतलाते हैं- " सूर्यस्य रश्मिभिः ” । सविता देवता सूर्य्यं की रश्मियों से मुझे पवित्र करें । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यह पवित्र करने वाली है, जो कि सूर्य की रश्मिएं हैं । इसीलिए -" सूय्यंस्य रश्मिभिः " कहा है । चित्पति सोम का अभिमानी देवता है, वाक्पति सूर्य का अभिमानी देवता है एवं सोम और सूर्य्य दोनों ही पवित्र करने वाले हैं । बिना सविता के सुपूतत्व हो नहीं सकता है । बस इसीलिए सविता द्वारा चारों ओर से पवित्रता की जाती है ॥२२ ॥

इस प्रकार से कुशा से अपने शरीर को पवित्र करता हुआ यजमान मन्त्रशेष बोलता है - " तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत् कामः पुने तच्छकेयम् " । af ही पवित्रपति कहलाता है । इसीलिए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि अग्नि पवित्रपति ही होता है - " पवित्रपति हि भवति " । आज यह यजमान पवित्र से पूत हो जाता है अतएव कहता है कि है पवित्रपते! जिस काम के लिए मैंने आपसे अपने को पवित्र किया, वह काम मैं कर सकूं, यही वाञ्छा है । मैं यज्ञ की समाप्ति पर पहुँच जाऊं, यही कहना है । " यज्ञस्योदुचं गच्छानि " - इत्येवैतदाह अर्थात् ' तच्छकेयम् ' का यही तात्पर्य है ॥ २३ ॥

" श्रा वो देवास " इस मन्त्र का नाम " श्राशिषामारम्भः " है । इसी मन्त्र से अशी मांगना प्रारम्भ किया जाता है, अतएव इसे ' आशिषामारम्भ ' कहते हैं । अध्वर्यु अब इसे यही मन्त्र बुलवाता है, इसी अभिप्राय से कहते हैं— " अथाशिषामारम्भं वाचयति " ( यजमानमितिभावः ) यजमान बोलता है-" वो देवास ईमहे वामं प्रयत्यध्वरे । श्रावो देवास श्राशिषो यज्ञियासो हवामहे " ॥ ( वा ० सं ० ४।५ ) अध्वर्यु स्वयं भी इसे बोलता है एवं बजमान भी उसकी देखादेख बोलता है— " हे देवासः अध्वरे वामं प्रयति सति वः ग्रा ईमहे । हे यज्ञियासः देवा सः वः श्रा आशिषः हवामहे " [ ११४ ]

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तृतीय काण्ड ( ० १ ) शतपथ ब्राह्मण आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण हे देवताओ! यज्ञ के उत्तर जाने पर हम ग्रापकी स्तुति करते हैं । हे यज्ञिय देवताओ! प्राशिषों के लिए अर्थात् फलप्राप्त्यर्थ हम आपका इस यज्ञ में आह्वान करते हैं । यज्ञ कहते हैं अग्नि को । अग्नि में सोम डालने का नाम ही यज्ञ है । यज्ञ अर्थात् श्रग्नि सदा दक्षिण से उत्तर की ओर ही जाता है । इसी अभिप्राय से " वामं प्रयत्यध्वरे " कहा गया है । इस यजमान के लिए इन प्राशिषों को अपना बनाते हुए ऋत्विक लोग देवताओं से मांगते हैं अर्थात् ऋत्विक लोग ' हमें दो, हमें दो " इस अपने नाम से ही यद्यपि

प्राहुति मांगते हैं परन्तु यह प्राहुति है वास्तव में यजमान के लिए ।

" तदस्मै स्वाः सतीॠ त्विज प्राशिष आशासते " ॥ २४ ॥

इसके बाद यजमान यज्ञ संपत्ति ग्रहण भावनार्थ मुष्टिबन्धन करता है— अथांगुलीयंचति " – ( संकोचयति ) किस तरह से मुष्टिबन्धन करना चाहिए, इसका प्रकार बतलाते हैं— " स्वाहा यज्ञं मनसे " इस मन्त्र से दोनों हाथों को कनिष्ठकादि दोनों को बन्द कर ले, एवं ' स्वाहा द्यावापृथिवीभ्याम् ' इससे फिर दो आगे की बन्द कर ले, एवं अन्त में ' स्वाहावातादारभे ' इससे दोनों हाथों की दोनों कनिष्ठिकानों को बन्द करे, दूसरे से, उसके आगे की करे एवं चौथे से मुट्ठी बांध ले । मुष्टि क्यों एकदम बन्द कर ले, अर्थात् पहले मन्त्र से उसके आगे की दोनों करे एवं तीसरे से, बांधनी चाहिए इसका कारण बतलाते हैं-देवता ब्रह्म है, यज्ञ कर्म्म है । यज्ञ सांयोगिक पदार्थ है । जब देवता अर्थात् ब्रह्म ( मौलिक तत्त्व ) ही अदृश्य है तो उनके योग से उत्पन्न यज्ञ क्योंकर इन्द्रियगोचर हो सकता है । अग्नि में सोमाहुति से यज्ञ का स्वरूप बनता है । वह कैसा है, उस यज्ञ के हाथ - पैर कैसे हैं, यह हम नहीं जान सकते । इसी मूल पर वैशेषिकों का चातुभौतिकत्व मत अवलम्बित है । उनका कहना है कि आकाश अदृश्य है एवं प्रवशिष्य चारों भूत दृश्य हैं । भला अदृश्य आकाश शरीर निर्माण में क्यों कर उपयुक्त हो सकता है, अतः शरीर चतुभौतिक ही मानना चाहिए । प्रकृत में हमें यही बतलाना है कि जैसे वस्त्र, घट, पट का हम हाथ से ग्रहण करते हैं, वैसे यज्ञ का ग्रहण नहीं कर सकते । यज्ञ तो अदृश्य पदार्थ है फिर भला वह मुट्ठी में क्यों कर पकड़ा जा सकता है । क्योंकि देवता जब परोक्ष है तो उनके संयोग से उत्पन्न होने वाला यज्ञ भी परोक्ष ही होगा । हमें यज्ञस्वरूप को पकड़ना है अर्थात् वैध प्रक्रियाओं द्वारा अध्यात्म यज्ञ को अधिदैवत यज्ञ में में मिलाना है, परन्तु मिलावें कैसे, जबकि यज्ञ परोक्ष है, कैसे उसे आत्मसात् करें । बस उसी यज्ञ को आत्मसात् करने के लिए ही मुष्टिबन्धन किया जाता है । मैने यज्ञ को मुट्ठी में पकड़ लिया, यह ग्रध्यव-साथ, यह मन की श्रद्धा ही सर्वतः व्यापक यज्ञ को आत्मसात् कर देती है । कहने का तात्पर्य यही है कि यज्ञ सम्पत्ति ग्रहण भावनार्थ ही मुष्टिबन्धन किया जाता है । [ ११५ ]

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बृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण श्राग्नावेष्णवेष्टि ब्राह्मण " स्वाहा यज्ञं मनसे " - इति द्वे । ' स्वाहोरोरन्तरिक्षात् ' इति द्वे । स्वाहा द्यावापृथिवीभ्याम् ' इति द्वे । ' स्वाहावातादारभे ' इतिमुष्टि करोति । न वै यज्ञः प्रत्यक्षमिवारभे । यथायं दण्डो वा वासो वा । परोक्षं वै देवाः परोक्षं यज्ञः ” ॥ २५ ॥

यज्ञ - मन में, द्यावापृथिवी में, वायु एवं अन्तरिक्ष में, इतने ही स्थानों में रहा है । बस इन सारे स्थानों से यज्ञ को आत्मसात् करने के लिए ही ' स्वाहा यज्ञं मनसे ' इत्यादि कहा है ।. इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं जो कि वह यजमान - ' स्वाहा यज्ञं मनसे ' कहता है उससे मन से यज्ञ को मुट्ठी में पकड़ता है । स यदाह स्वाहा यज्ञं मनसे " - इति तन्मनस श्रारभते " एवं ' स्वाहोरोरन्तरिक्षम् ' से अन्तरिक्ष में व्याप्त यज्ञ को पकड़ता है । एवं ' स्वाहाद्यावापृथिवीभ्याम् ' से द्यावापृथिवी में व्याप्त यज्ञ को पकड़ता है । इस प्रकार तीनों से तो यज्ञ को मुठ्ठी में करना परोक्षभाव से करना है । परन्तु — ' स्वाहा वातावारभे ' इससे तो साक्षात् यज्ञ को ही ( प्रत्यक्षरूपेण ही यज्ञ को ) पकड़ता है । क्योंकि वायु ही तो यज्ञ है । मन में, यात्रा पृथिवी में, अन्तरिक्ष में इन में सभी में यज्ञ रहता है परन्तु हमारे अध्यात्म - यज्ञ का अधिदैवत के साथ सम्बन्ध वायु द्वारा ही होता हैं । वायु ही संचारी है । हम वायु के स्वरूप को पहचानते हैं । वायु द्वारा ही आहुति अर्थात् यज्ञ देवताओं में पहुंचता है । अतएव हम कह सकते हैं कि औरों की अपेक्षा वायु - यज्ञ प्रत्यक्ष ही है । वस इसीलिए " वातो व यज्ञः " कहा गया है । ' स्वाहावातादार मे '

इससे यज्ञ को प्रत्यक्ष ही मुट्ठी में करता है ।

" तद्यज्ञं प्रत्यक्षमारभते " ॥२६ ॥

वादी प्रश्न करता है कि यज्ञ को तो मुष्टि में किया सो अच्छा किया परन्तु चारों मन्त्रों में " स्वाहा स्वाहा " " क्यों बोला जाता है । इमी का उत्तर देते हैं- " किसलिए वह चारों में स्वाहा - स्वाहा बोलता है " इसका कारण बतलाते हैं--' प्रथयत् स्वाहा स्वाहेति करोति तदुच्यते ' स्वाहाकार ही तो यज्ञ है । ' स्वाहा ' इस वाक् ही में तो शक्ति है । जब तक स्वाहा न बोला जाय उस आहूति को देवता नहीं ले सकते । देवता प्रसंग हैं । वे प्रसंगतया सर्वथा व्याप्त हो रहे हैं । संसार में जितने भी तुम भौतिक पदार्थ देखते हो उन सबमें प्राण अन्तःस्फूर्त है । बिना प्राण के भूत नहीं रह [ ११६ ]

पृष्ठ 135

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मणे आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण सकता । बिना भूत के प्राण नहीं रह सकता । दोनों अन्योन्याविनाभूत हैं । देवता भूत में रहते हैं । भूत देवता के चारों ओर रहते हैं परन्तु देवता फिर प्रसंग हैं । भूत उस पर, उस देवता पर सवार मात्र है । वह देवता का आत्मा नहीं बन सकता । प्राण सर्वथा बेलाग । स्वाहा देवता का अन्न है । वे संग हैं । आहुति उन पर जा के सवार हो जाती है अर्थात् देवता आहुति को ले जरूर लेते हैं परन्तु यहः आहुति उनमें मिलने नहीं पाती क्योंकि वे तो प्रसंग हैं । " बस यह प्रकृति - यज्ञ का स्वरूप है । ऐसी अवस्था में यदि हम ' स्वाहा ' ' स्वमन्होति व्याप्नोति ' बोलते हैं तो इस सजातीय वाकूलहर से देवता अन्न को ग्रहण कर लेते हैं । परन्तु यदि ' स्वधा ' बोला जायेगा तो देवता दूर हट जायेंगे एवं उस स्थान पर पितर प्राण घुस पड़ेगा । स्वधा पितरों का अन्न है, स्वाहा देवताओं का अन्न है | बिना स्वाहा के यज्ञ नहीं हो सकता प्रतएव हम ' स्वाहा ' को यज्ञ कह सकते हैं । बस इसीलिए - ' यज्ञो वै स्वाहाकारः ' कहा गया है । ऐसी हालत में यज्ञ को मुष्टि द्वारा श्रात्मसात् करता हुआ यह यजमान यदि ' स्वाहा ' न बोलेगा तो यज्ञ आत्मसात् होगा ही नहीं । क्योंकि यज्ञ का स्वरूप तो ' स्वाहा ' ही है । बस इसीलिए ' स्वाहा यज्ञं मनसे ' इत्यादि में स्वाहा स्वाहा बोला जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— ' स्वाहा ' यह बोलता हुआ यजमान यज्ञ को आत्मसात् करता है । ' यज्ञमेववैतदात्मन्धत्ते ' इसके अनन्तर यहीं से यजमान वाक् संयमन कर लेता है । अत्रोऽएव वाचं यच्छति ' । वाक् एक तत्त्व का नाम है जो कि सूर्य्यमण्डल की वस्तु हैं । इसीलिए तो सूर्य को वाङ्मण्डल कहा जाता है । वाक् सर्वव्यापी तत्त्व है । मन - प्राण वाक् को ही आत्मा कहते हैं । मन अव्यय का स्वरूप ' । प्राण अक्षर का स्वरूप है । वाक् क्षर का स्वरूप हैं । मन प्राण एक दर्जे की चीज है, वाक् एक दर्जे की चीज । वाक् ही आकाश कहा जाता है । आकाश भी एक पदार्थ है । पोल ( शून्यता ) का नाम श्राकाश नहीं है । पश्वभूतों में से पहला भूत यही वाक् है । यह वाक् ही पृथिवी, जल, तेज, वायु परिणित में हो जाता है, अतएव हम कह सकते हैं सब कुछ वाक् ही वाक् है । ' अथो वागेवेदं सर्वम् ' । इसीलिए - ' वाचीमा विश्वा भुवनान्यपिता ' कहा जाता है । श्रग्नि ही को यज्ञ कहते हैं एवं यह है वाक्, जैसा कि श्रुति कहती है-तस्य वा एतस्याग्ने वागेवोपनिषत् । [ ११७ ]

पृष्ठ 136

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण हम जो बोलते हैं वह भी वाक् ही है । क च ट त प इत्यादि मन्त्रात्मक वाक् का निर्माण अग्नि ही से होता है । इसीलिए तो - ' श्रग्निर्वाग् भूत्वा मुखं प्राविशत् ' कहा जाता है । मन्त्र से ही होता है यज्ञ एवं वह मन्त्र स्वयं आग्नेय है । अग्नि ही को कहते हैं यज्ञ, बस इसी अभिप्राय से ' वाग्वै यज्ञः ' कहा गया है | स्वाहा इत्यादि मन्त्रों से अभी - अभी यजमान ने अग्नि स्वरूप यज्ञ को आत्मसात् किया था, यदि अभी यह बोलने लग जायगा तो वाक् स्वरूप अर्थात् अग्नि स्वरूप यज्ञ इस अग्नि स्वरूप वाक् ( बोली ) के ये बाहर निकल जायगा । बस आत्मसात् किया हुआ यज्ञ बाहर न निकल जाय, इसीलिए वाक् संय-मन करता हुआ वाक् रूप यज्ञ को आत्मा में स्थिर करता है । वाग्वै यज्ञः । यज्ञमेवैतदात्मन् धत्ते ” ॥। २७ ॥ दीक्षणीयेष्टि शाला में होती है एवं घृताभ्यञ्जन आदि से लेकर वाक् संयमन पर्यन्त सारे कर्म्म यज्ञ शाला के बाहर होते हैं । इस प्रकार जब वाक् संयमन हो जाता है तो ऋत्विक लोग फिर इसे शाला में ले जाते हैं । " श्रथैनं शालां प्रपादयति " । वह यजमान आहवनीय के पश्चिम में एवं गार्हपत्य के पूर्व में अर्थात् श्राहवनीय गार्हपत्य के बीच में होकर ही जाता है । जब तक सब याग न कर लेगा तब तक यजमान के आने जाने का रास्ता यही रहेगा । सुत्या के पहले इन दो के बीच के मार्ग के अलावा और किधर से हर्गिज नहीं जा सकता । इसी अभिप्राय से कहते हैं— स जघनेनाहवनीयमेति प्रग्रेरण गार्हपत्यम् । सोऽस्य सञ्चरो भवति -श्रासुत्यायै " । सृष्टि दो प्रकार की हुआ करती है - मानसी और मैथुनी । मानसी सृष्टि के विषय में हमें कुछ नहीं कहना । कहना है केवल मैथुनी सृष्टि के विषय में । मैथुनी सृष्टि में — योनि, बीज और गर्भ यह तीन चीजें होती है । तीन ही से मैथुनि सृष्टि होती है । बीजवपन का जो स्थान है, उसी का नाम तो ' योनि ' है, एवं जो वप्ता है उसी का नाम बीज है अर्थात् जब तक वह बीज योनि में नहीं डाला जाता तब तक तो वह वप्ता ही कहलाता है । परन्तु योनि में जाकर वह बीज ही अर्थात् वप्ता ही गर्भ कह-लाने लगता है । ( गृह्यते इति गर्हः गर्ह एव गर्भः ऋग्रहोर्भर छन्दसि ) पिता ही पुत्र बनता है । “ पिता वै जायते पुत्रः " यह सिद्धांत है । तीन तो कहने के हैं, वास्तव में तो बीज और योनि दो ही पदार्थ हैं । बीज ही योनि से अलग रहकर बीज कहलाता है, एवं योनि में जाकर ' गर्भ ' कहलाने लगता है । यदि इस बीज और योनि का असली स्वरूप पूछना चाहो तो अग्नि श्रीर [ ११८ ]

पृष्ठ 137

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मणं श्राग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण सोम ही है । श्रग्नि ही संसार के यच्चायवत् पदार्थों की योनि है एवं सोम ही बीज है । अग्नि और सोम के अलावा कोई तीसरी वस्तु है ही नहीं । स्त्री का जो रुधिर है वह अग्नि है वही योनि है, उसमें वीर्य्यं की अर्थात् सोम की जब प्राहुति होती है तभी लड़का उत्पन्न होता है । निदर्शन मात्र है - संसार की पैदा-इश इसी अग्नि सोम से है । इसीलिए तो " श्रग्निषोमात्मकं जगत् " कहा जाता है । इसीलिए भगवान् कहते हैं—

मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भ दधाम्यहम् ।

संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्त्तयः संभवन्ति याः । तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ आज यह यजमान अपना नया दिव्यात्मा बनाना चाहता है । स्वयं दिव्य स्वरूप में जन्म लेना चाहता है, अतएव यह आज गर्भ में है । इसी आहवनीय गार्हपत्य श्रग्नि के गर्भ में दिव्यात्मा उत्पन्न होगा । बस इसी अभिप्राय से कहते हैं – " गर्भ की योनि यज्ञ है " । आज यह यजमान अर्थात् दीक्षित गर्भ में है । अर्थात् यज्ञशाला में क्या है अग्नि के गर्भ में है । गर्भ योनि के अन्दर अन्दर ही फिरा करता है । वह योनि से बाहर नहीं निकलता, जब तक कि परिपक्व नहीं हो जाता, अतएव इसे अपनी योनि के बाहर सुत्या पर्यन्त बाहर नहीं जाना चाहिए । याज्ञवल्क्य कहते हैं - यह यजमान वहां चलता भी है एवं इधर - उधर बैठता है अतएव गर्भ योनि के पेट में चलते ही पर्य्यावर्त्तन भी करते हैं अर्थात् गर्भ एक ही स्थान में नहीं चिपकता अपितु चलता फिरता रहता है परन्तु योनि के बाहर नहीं निकलता । अतएव इसी प्राकृतिक प्रजनन क्रियानुसार गर्भस्थ दीक्षित को बाहर नहीं जाना चाहिए, सुत्यापर्य्यन्त बाहर नहीं जाना चाहिए । सुत्या से पहले बाहर जाना गर्भस्राव एवं गर्भपात होना है । सुत्या ही इस दिव्यात्मा का प्रसव है अतः ' आसुत्यायै यजमान का यही मार्ग रहता है । तस्मादस्यैष संचरो भवति - श्रासुत्यायै ॥ २८ ॥.

इति संस्कार ब्राह्मणं समाप्तम् । संस्कार ब्राह्मणान्तर्गत श्राग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मणं च समाप्तम् । इति तृतीयकाण्डे प्रथमाध्याये तृतीयं ब्राह्मणं समाप्तम् ॥ [ ११६ ]

पृष्ठ 138

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अथ चतुर्थ ब्राह्मणम् ॥ तत्र प्रौद्ग्रभण ब्राह्मणम् ॥ ] - सर्वारिण ह वै दीक्षाया यजूंष्यौद्ग्रभरणानि । उद्गृभ्णीते [ मूल वाएषोऽस्माल्लोकादेव लोकमभि यो दीक्षतऽएतैरेव तद्यत् यजुभिरूद् गृभ्णीते तस्मादाहुः सर्वाणि दीक्षाया यजूंष्यौद्ग्रभरणानीति ततऽएतान्यवान्तरामाचक्षतऽ औग्रभरणानीत्याहुतयो ह्य ेताआहुतिहि यज्ञः परोऽक्षं वै यजुर्जपत्यथैष प्रत्यक्षं यज्ञो यदाहुतिस्तदेतेन यज्ञेनोद्गृभ्णीतेऽस्माल्लोकाद्देवलोकमभि ॥ १ ॥

ततो यानि त्रीणि त्रवेण जुहोति । तान्याधीतयजूंषीत्याचक्षते सम्पद एव कामाय चतुर्थं हूयतेऽथ यत्पञ्चमं त्र चा जुहोति तदेव प्रत्यक्षमौद्ग्रभणनु-ष्टुभा हि तज्जुहोति वाग्ध्यनुष्टुब्वाग्धि यज्ञः ॥२ ॥

यज्ञेन वै देवाः । इमां जिति जिग्युर्येषामियं जितिस्ते होचुः कथं नऽइदं मनुष्यैरनभ्यारोह्य स्यादिति ते यज्ञस्य रसं धीत्वा यथा मधु मधुकृतो निर्द्धयेयु-विदु यज्ञं यूपेन योपयित्वा तिरोऽभवन्नथ यदेनेनायोपयंस्तस्माद्यूपो नाम ॥३ ॥

तद्वा ऋषीणामनुश्रुतमास । ते यज्ञं समभरन् यथाऽयं यज्ञः सम्भृतऽएवं वाऽएष यज्ञं सम्भरति यदेतानि जुहोति ॥ ४ ॥

तानि वै पञ्च जुहोति । संवत्सर सम्मितो वै यज्ञः पञ्च वाऽऋतवः संवत्सरस्य तं पञ्चभिराप्नोति तस्मात् पञ्च जुहोति ॥५ ॥

अथातो होमस्यैव । श्राकूत्यै प्रयुजेऽग्नये स्वाहेत्या वाऽग्रे कुवते यजेयेति तद्यदेवात्र यज्ञस्य तदेवैतत् संभृत्यात्मन्कुरुते ॥६ ॥

मेधायै मनसेऽग्नये स्वाहेति । मेधया वे मनसाऽभिगच्छति यजेयेति तद्यदेवात्र यज्ञस्य तदेवैतत् सम्भृत्यात्मन्कुरुते ॥७ ॥

[ १२१ ]

पृष्ठ 140

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तृतीय काण्ड ( ० शतपथ ब्राह्मण औद्ग्रभण ब्राह्मण

दीक्षायै तपसेऽग्नये स्वाहेति । श्रन्वेवैतदुच्यते नेत्तु हूयते ॥ ८ ॥

सरस्वत्यै पुष्णेऽग्नये स्वाहेति । वाग्वै सरस्वतीवाग्यज्ञः पशवो वै पूषा पुष्टि वैं पूषा पुष्टिः पशवः पशवो हि यज्ञस्तद्यदेवात्र यज्ञस्य तदेवैतत्सम्भृत्यात्मन् कुरुते ॥९ ॥

तदाहुः । अनद्धेवैताऽप्राहुतयो हूयन्तेऽप्रतिष्ठितां देवास्तत्र नेन्द्रो न सोमो नाग्निरिति ॥१० ॥

प्राकूत्यै प्रयुजेऽग्नये स्वाहेति । नात एकं चनाग्निर्वाऽद्धेवाग्निः प्रति-ष्ठितः स यदग्नौ जुहोति तेनैवैताऽद्धेव तेन प्रतिष्ठितास्तस्मादु सर्वास्ववाग्नये स्वाहेति जुहोति तत एतान्या धीतयजूंषीत्या चक्षते ॥११ ॥

प्राकूत्यै प्रयुजेऽग्नये स्वाहेति । श्रात्मनावाऽग्रग्राकुवते यजेयेति तमा-मनएव प्रयुङ्क्ते यत्तनुते ते अस्यैतेऽप्रात्मन्देवतेऽधीते भवत आकूतिश्च प्रयुक्च ॥१२ ॥

मेधाय मनसेऽग्नये स्वाहेति । मेधया वै मनसाऽभिगच्छति यजेयेति तेऽस्यैतेऽप्रात्मन्देवतेऽप्राधीते भवतो मेधा च मनश्च ॥ १३ ॥

सरस्वत्यै पूष्णेऽग्नये स्वाहेति । वाग्वै सरस्वती वाग्यज्ञः साऽस्यैषाऽऽत्म-न्देवताऽऽधीता भवति वाक्पशवो वै पूषा पुष्टिवै पूषा पुष्टिः पशवः पशवो हि यज्ञस्तेऽस्यैतऽश्नात्मन्पशव प्राधीता भवन्ति तद्यदस्यैताऽश्रात्मन् देवताऽप्राधीता भवन्ति तस्मादाधोतयजूंषि नाम ॥ १४ ॥

अथ चतुर्थी जुहोति । आपोदेवीबृहतीविश्वशम्भुवो द्यावापृथिवीऽउरो अन्तरिक्ष || बृहस्पतये हविषा विधेम स्वाहेत्येषा ह नेदीयो यज्ञस्यापां हि कीर्त-त्यापो हि यज्ञो द्यावापृथिवीऽउ रोऽअन्तरिक्षेति लोकानां हि कीर्तयति बृहस्पतये हविषा विधेम स्वाहेति ब्रह्म वै बृहस्पतिर्ब्रह्म यज्ञ एतेनो नेदीयो यज्ञस्य ॥१५ ॥

अथ यां पञ्चमीं स्रुचा जुहोति । सा हैव प्रत्यक्षं यज्ञोऽनुष्टुभा हि तां जुहोति वाग्ध्यनुष्टुब्वाग्धियज्ञः ॥ १६ ॥

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