Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 141–150

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 141–150

पृष्ठ 141

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तृतीय काण्ड ( श्र ० १ ) शतपथ ब्राह्मण श्रद्ग्रभण ब्राह्मण अथ यद्ध वायामाज्यं परिशिष्टं भवति । तज्जुह्वामानयति त्रिःस्त्र वे-राज्य विलापन्याऽधिजुह्वां गृह्णाति यत्तृतीयं गृह्णाति तत्त्र वमभिपूर-यति ॥१७ ॥

स जुहोति । विश्वोदेवस्य नेतुर्मर्तो वुरीत सख्यम् । विश्वो राय इषुध्यतिद्युम्नं वृणीत पुष्यसे स्वाहेति ॥ १८ ॥

सैषा देवताभिः पतिर्भवति । विश्वोदेवस्येति वैश्वदेवं नेतुरिति सावित्रं मर्तो बुरीतेति मैत्रं द्युम्नं वृणीतेति बार्हस्पत्यं द्युम्नं हि बृहस्पतिः पुष्य सइति पौष्णम् ॥१९ ॥

सैषा देवताभिः पङि क्तर्भवति । पाङ क्तोयज्ञः पाङ क्तः पशुः पञ्चर्तवः संवत्सरस्यैतमेवैतयाऽऽप्नोति यद्देवताभिः पङि क्तर्भवति ॥ २० ॥

तां वाऽनुष्टुभा जुहोति । वाग्वाऽनुष्टुब्वाग्यज्ञस्तद् यज्ञं प्रत्यक्षमाप्नोति ॥२१ ॥

तदाहुः । एतामेवैकां जुहुयाद्यस्मै कामायेतरा हूयन्तऽएतयैव तं काममा-fiti जुहुयात् पूर्णां जुहुयात्सर्वं वै पूर्णं सर्वमेवैनयैतदाप्नोत्यथ यत् त्र वमभिपूरयति त्र ुचं तदभिपूरयति तां पूर्णां जुहोत्यन्वेवैतदुच्यते सर्वास्त्वेव हूयन्ते ॥२२ ॥

तां वाऽनुष्टुभा जुहोति । सैषाऽनुष्टुप्सत्येक त्रिंशदक्षरा भवति दश पाण्याप्रङगुलयो दश पाद्या दशप्रारणा आत्मैकत्रिशो यस्मिन्नेते प्राणाः प्रतिष्ठि-ताएतावान्वै पुरुषः पुरुषौ यज्ञः पुरुषसंमितो यज्ञः स यावानेव यज्ञो यावत्यत्य मात्रा तावन्तमेवैनमयैतदाप्नोति यदनुष्टुभैकत्रिंशदक्षरया जुहोति ॥ २३ ॥

[ १२३ ]

पृष्ठ 142

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण श्रद्ग्रभण ब्राह्मणं [ अनुवाद ] ॥ॐ ॥ दीक्षा के जितने भी यजुर्मन्त्र हैं सब ग्रभरण ( औद्ग्रहण ) कहलाते हैं क्योंकि अध्यात्म देवताओं ( आध्यात्मिक प्राणों ) का आधिदैविक देवताओं ( प्राणों ) से सम्बन्ध कराने वाले हैं । अध्यात्म के देवता को यजुर्मंन्त्र द्वारा अधिदैवत से योग कराना ही दीक्षा हैं । अध्यात्म का अधिदैवत के साथ मेल यजुर्मन्त्रों से होता है । दीक्षा के यजुर्मन्त्र अध्यात्म को अधिदैवत के साथ मिलाने में सहायक हैं । अतः दीक्षा सम्बन्धी यजुर्मन्त्रों का उत्- ऊर्ध्वं अधिदैवतं अध्यात्मप्राणान्तं ग्रहणे - योगे साधनानि, इस व्युत्पत्ति से इन यजुर्मन्त्रों को ' भरण ' कहा गया है । जो यजमान यज्ञ दीक्षा लेता है वह इस पृथ्वीलोक से देवलोक को पहुँचता है । किन्तु उसके देवलोक में पहुँचने के साधन में ये दीक्षाङ्गभूत यजुर्मन्त्र ही हैं । अतः उद्ग्रहण साधनत्स्वात् इन यजुर्मन्त्रों को प्रौद्ग्रभरण कहा गया है । दीक्षाङ्गभूत सभी यजुर्मन्त्र भरण हैं । सब यजुर्मन्त्रों में दीक्षाहुति-साधनभूत आकृत्मारि मन्त्र उग्रभरण में अत्यन्त संनिहित हैं प्रधान सहायक है ऐसा कहते हैं । क्योंकि अन्य यजुर्मन्त्रों का जाप होता है उनके द्वारा आहुति नहीं दी जाती किन्तु ये औद्ग्रभरण नामक यजुर्मन्त्र ग्राहुतिस्वरूप ही हैं । आहुति का नाम ही यज्ञ है । जपसाधनभूत यजुर्मन्त्रों का यज्ञ से परोक्ष सम्बन्ध है, क्योंकि जप्ययजुर्मन्त्र केवल वागुरूप है । जप से हमारी वाक् का अधिदैवत वाक् से सम्बन्ध होता है और अधिदैवत वाक् द्वारा उन मन्त्रों का देवताओं से सम्बन्ध होता है । क्योंकि देवता वाङ्मण्डल ( सूर्य्यमण्डल ) में रहते हैं । किन्तु दीक्षाहुति साधन भूत यर्जुमन्त्रों का साक्षात् देवताओं से सम्बन्ध होता है । क्योंकि आहुति अग्नि में सोम की आहुति है और अग्नि में सोमाहुति ही यज्ञ है । यज्ञ से यजमा-नात्मा का आधिदैविक देवताओं से साक्षात् सम्बन्ध होता है । अतः दीक्षाहुति साधनभूत यजुर्मन्त्र साक्षात् अध्यात्म का अधिदैवत से सम्बन्ध कराते हैं । अतः इन प्रौद्भण यजुर्मन्त्रों को अन्य यजुर्मन्त्रों की अपेक्षा प्रधान बतलाया है ॥ १ ॥

औद्ग्रभण होम में ५ आहुतियाँ होती हैं । उनके साधन ५ ही यजुर्मन्त्र हैं । उनमें आदि के ३ यजुर्मन्त्र जो स्रवा से आहुति देने से सम्बन्ध रखते हैं उन्हें मंत्र कहते हैं । आधानलिंगक होने से ' आधीतयजु ' नाम से कहते हैं । किये जाने वाले कार्य्यं का प्रथम संकल्प करना ही प्रधान हैं । प्रकृत में यज्ञकर्म करने से पूर्व, मैं यज्ञ करूंगा, इत्याकारक संकल्प ही तीन यजुर्मंन्त्रों से किया जाता है । अतएव इन तीनों यजुर्मन्त्रों को ' प्राधीतयजु ' कहा गया है । संकल्पानन्तर चतुर्थ यजुर्मन्त्र से उस संकल्प को कार्य रूप में परिणत किया जाता है । स्वर्गसम्पत्फलरूप के लिए चतुर्थ यजुर्मन्त्र से आहुति दी जाती है । पाँचवें यजु-मन्त्र द्वारा स्रुक्से आहुति दी जाती है । इस प्राहुति से अध्यात्म का अधिदैवत के साथ मेल हो जाता है । अतः पञ्चममन्त्र से अध्यात्म का अधिदैवत के साथ मेलरूप फल प्राप्त हो जाने से ये पञ्चम यजुर्मन्त्र ही साक्षात् उग्रभरण का साधन है । वह प्रत्यक्ष अर्थात् साक्षात् उद्ग्रभरण का साधन है । अतः वही मुख्यतया श्रग्रभरण यजु है । यह पञ्चम प्राहुति अनुष्टुप् छन्दवाले यजुर्मन्त्र से देनी चाहिए क्योंकि अनुष्टुप् पृथिवीवाक् है । इसी का बृहती [ १२४ ]

पृष्ठ 143

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तृतीय काण्ड ( ० १ ) शतपथ ब्राह्मण औद्ग्रभरण ब्राह्मण रूप दिव्य वाक् से सम्बन्ध कराना है । यही यज्ञ है । अतः इस वाक् को यज्ञ ( अध्यात्मप्रारण का अधिदैवत से सङ्गतिकरण ) कहा गया है ॥ २ ॥

इसी यज्ञ के द्वारा देवतानों ने उस विजय को प्राप्त किया जो कि ' इन्द्र ने असुरों को मार दिया ' इत्याकारक विजय उनकी सुनी जाती है अर्थात् सकल विश्व पर देवताओं का श्रधिकार है, यह जो महिमा सुनी जाती हैं वह सब यज्ञ का ही प्रताप है । उन देवताओं ने विचार किया कि हमने यज्ञ द्वारा यह महिमा प्राप्त की है । अब ऐसा उपाय करें कि जिससे यह यज्ञविद्या मनुष्यों को प्राप्त न हो अन्यथा वे भी हमारे समकक्ष हो जायेंगे और स्वभावतः ग्रनृतसंहित मनुष्य दुराचार कर बैठेंगे । यह विचार कर उन देवताओं ने यज्ञ के सार भाग को, जिस तरह मधुमक्खियाँ मधु के रस का पूर्णतया पान कर लेती है, उसी प्रकार दोहन कर, वे ग्रूप द्वारा विलुप्त कर तिरोहित हो गए, अर्थात् स्वर्ग में चले गए । क्योंकि यज्ञ को यूप के द्वारा आच्छादन किया, अतः यज्ञ का आच्छादन साधन होने से इसे ग्रूप कहा जाता है ॥३ ॥

किन्तु ऋषिलोग देवताओं के इस काम को जानते थे । उन्होंने अपने मस्तिष्क से सोचकर मालूम कर लिया कि इस यज्ञ में इतना वास्तविक सत्य है और बाकी ढोंग मात्र है, यज्ञ रहस्य को छिपाने के लिए | क्योंकि दीक्षाकर्म ही यज्ञ में सार भाग है । देवताओं ने इस होम को ही संभरण किया था । अतः उन्होंने प्रौद्ग्रभरण होम को सार समझ कर प्रौद्ग्रभरण होम को यज्ञ में संमिलित कर लिया, जो होम उपर्युक्त यजुर्मन्त्रों द्वारा होता है ॥ ४ ॥

वह यजमान इस होम में पाँच प्राहुतियों को डालता है, क्योंकि यह संवत्सर से परिच्छिन्न है । अर्थात् अग्नि में सोमाहुति ही यज्ञ का स्वरूप है । अग्नि का रयन्तर-सामपर्यन्त जो सौरमण्डल है यही संवत्सराग्नि है । इस अग्नि में पारमेष्ठ्य सोम की आहुति होती रहती है । ग्रतः ग्रग्नि के संवत्सरसमित होने अग्नि में सोमाहुति रूप यज्ञ संवत्सर से परिछिन्न है । संवत्सर में ७२, ७२ दिन की बसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त शिशिर रूप पाँच ऋतुएँ होती हैं । इस होम में पाँच आहुतियों को डालता हुआ यजमान पाँचों ऋतुनों की प्राप्ति के द्वारा पञ्चर्तुसमष्टि संवत्सर को प्राप्त कर लेता है । इसलिए इस होम में पाँच आहुतियाँ दी जाती हैं ॥५ ॥

अब होम की मीमांसा की जाती है अर्थात् ग्रभरण होम के पाँचों आहुतिरूप पाँचों मन्त्रों की व्याख्या प्रस्तुत की जाती है । चार युग्मों में ही वैज्ञानिक महर्षियों ने यज्ञ के सार भाग को मालूम किया था । वे चार युग्म निम्नलिखित हैं । १ आकृति व प्रयुक् । २ मेधा व मन । ३ दीक्षा व तप । ४ सरस्वती व पूषा । इसी बात को बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यज्ञानुष्ठान से पूर्व मैं यज्ञ करूंगा यह दृढ़ संकल्प [ १२५ ]

पृष्ठ 144

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण प्रौद्ग्रभण ब्राह्मण किया जाता है, यही आकृति है तथा संकल्पानन्तर उस संकल्प को कार्य रूप में परिणत करना ही प्रयुक् है । इन्हीं को क्रमशः ऋतु व दक्ष शब्द से तथा मित्र व वरुण शब्द से भी अन्यत्र कहा गया है । इसी प्रकृति व प्रयुक् रूप प्रग्निसम्पत्ति की प्राप्ति के लिए ' आकू-त्यै प्रयुजे अग्नये स्वाहा ' कह कर आहुति दी गयी है । इस संकल्प तथा उसकी कार्रवाई में परिणतिरूप प्रयुग् के द्वारा यज्ञ के तत्व का अपनी आत्मा में स्थापन करता है || ६ || दूसरा तत्व मेधा व मन है । किये हुए संकल्प का धारणावती बुद्धि में धारण करना ही मेधा है तथा साधन भूत मन है । ' मेधायै मन से अग्नये स्वाहा ' कह कर प्राहुति दी जाती है । अर्थात् यज्ञ में मेधायुक्त मन रहना चाहिए । वही यज्ञ का दूसरा भाग है । आहुति के द्वारा इसे सारभाग को अपनी आत्मा में रखना है । इसीलिए कहा है कि " मेघया वैमनसाऽभिगच्छति ) " इति ॥७ ॥

तीसरातत्त्व है दीक्षा व तप । दीक्षा व तप की प्राप्ति के लिए ' दीक्षायै तपसेऽग्नये स्वाहा ' यह मन्त्र केवल बोल दिया जाता है । इसमें प्राहुति नहीं दी जाती । तप शब्द से यहाँ प्राणव्यापार अभिप्रेत है । संकल्प व धारणावती बुद्धि के पश्चात् यज्ञ के लिए प्राणव्यापार भी अभीष्ट है । इसके बिना यज्ञ का अनुष्ठान नहीं हो सकता । चौथा तत्व हैं सरस्वती व पूषा । वाक् को सरस्वती कहते हैं । वाक् ही यज्ञ है । सरस्वान्नामक पारमेष्ठ्य समुद्र में ग्राम्भृणीवाक् उत्पन्न होती है । ग्रतः सरस्वान् के समन्वय से वह वाक् सरस्वती कहलाती है । अतः ' वाग् वै सरस्वती ' यह कहा गया है । पारमेष्ठ्य अप्तत्व से ही यज्ञ का प्रारम्भ होता है । अतः वाक् को यज्ञ कहा गया है । पार्थिवप्राण ही पशु हैं । उपकरणसामग्री पूपा कहलाते हैं । उपकरण सामग्री से वस्तु की पुष्टि होती है । इसी अभिप्राय से ' पशवो वैषा, पुष्टि वैं पूषा पुष्टिः पशवः ' यह कहा है । पुरोडाश क्षीर एवं अजादि पशुओं के बिना यज्ञ नहीं होता । अतः पशवो ही यज्ञ ' इस वचन से यहां साधनत्वात् पशुओं को यज्ञ बतलाया है । अतः सरस्वती व पूषा की प्राप्ति के लिए ' सरस्वत्यं पूष्णेऽग्नेय स्वाहा ' यह मन्त्र बोलता हुआ ग्राहुति डालता है । इससे सरस्वती व पूषा में विद्यमान यज्ञसम्पत्ति को एकत्रित करता है । इस प्रकार संकल्प से लेकर पूषा तक की सम्पत्ति को आत्मसात् करने के लिए पूर्वोक्त प्रौद्ग्रभण होम किया जाता है ॥॥ यहां कति याज्ञिक विद्वान् कहते हैं कि श्रीद्भण होम में जो आहुति दी जाती है । वह् सर्वथा अप्रत्यक्ष, अप्रतिष्ठित व देवक है । क्योंकि आहुति देवता को दी जाती है और प्राकृति प्रयुग् श्रादि देवता नहीं है किन्तु ग्रग्नि, इन्द्र, सोम यादि देवता है । उनमें से यहां किसी भी देवता को ग्राहुति नहीं दी गई है । ग्रतः यह श्रग्रण होम ग्रदैवक है । तथा विना देवता के आहुति कहीं प्रतिष्ठित नहीं होती । अतः यह आहुति प्रतिष्ठित भी है । यद्यपि प्रथम तीनों ग्राहुतियों में तीनों मन्त्रों में ग्रग्नये पद देकर अग्नि देवता के नाम [ १२६ ]

पृष्ठ 145

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तृतीय काण्ड ( अ ० १ ) शतपथ ब्राह्मण औग्रभण ब्राह्मण का उल्लेख है तथापि यहाँ अग्नि का कोई प्रसङ्ग नहीं है । आहुति तो आकृति आदि को आत्मसात् करने के लिए दी गई है ॥। १० ॥ उपर्युक्त कथन का निराकरण करते हुए कहा है कि " प्राकृत्यै प्रयुजेऽग्नये स्वाहा ” इत्यादि मन्त्रों का उच्चारण कर आकृत्यादि को आत्मसात् करने के लिए जो आहुति दी जाती है वह ' अग्नेय स्वाहा ' कहकर स्पष्ट रूप से अग्नि में ही दी जाती है । अतः अग्नि देवता का स्पष्ट उल्लेख होने से औद्भण होम की आहुति प्रत्यक्ष की तरह है अपरोक्ष नहीं । और हुतियाँ प्रतिष्ठित भी नहीं है क्योंकि अग्नि देवता पर वे प्रतिष्ठित हैं । इसीलिए सभी आहुतियों में ' अग्नेय स्वाहा ' ऐसा कहा गया है ॥११ ॥

प्रथम मन्त्र की व्याख्या की जा रही है -- यज्ञानुष्ठान से पूर्व में यज्ञ करू ँ , ऐसा संकल्प ' प्रकृत्यै ' इत्यादि मन से करता है । तत्पश्चात् संकल्पित वस्तु का प्रात्मा के लिए प्रयोग ( अनुष्ठान ) करता है जो यज्ञ का वितान करता है । अर्थात् संकल्पानुसार ही कर्म्म का वितान करता है । इस पर प्रकृति और प्रयुग् ( प्रयोग ) दोनों देवता इस यजमान के आत्मा ध्यान के विषय बन जाते हैं ॥। १२ ॥ ' मेधायै स्वाहा मन्त्र की व्याख्या - मेधायुक्त मन के द्वारा ही मैं यज्ञ करू ँ । इस संकल्प की ओर यजमान अभिमुख होता है । अतः मेधा और मन भी ये दोनों देवता भी यजमान

की आत्मा में प्राहित हो जाते हैं । प्राध्यान के विषय बन जाते हैं ॥।१३ ॥

' सरस्वत्यै पूष्णे ऽग्नये स्वाहा ' इस मन्त्र की व्याख्या - जैसा कि पहले बतलाया जा चुका है कि वाक् ही सरस्वती है और वह वाक् ही यज्ञ है । पशु ही पूजा हैं । क्योंकि पूजा पुष्टि का नाम है और पशुयों से यजमान पुष्ट होता है । ये पशु ही यज्ञसाधन होने से यज्ञरूप हैं । अतः इस मन्त्र के द्वारा वाग्रूप सरस्वती तथा पशुरूप पूषा दोनों ही यजमान की आत्मा में प्राध्यान का विषय वन जाते हैं । यहां काण्डिका में वाग्रूप सरस्वती एक है । अतः उसके लिए ' श्राधीता भवति ' इत्याकारक का प्रयोग किया गया तथा पूषा पशुरूप होने से और पशुओं के अनेक होने से उसके लिए ' आधीता भवन्ति ' इत्याकारक बहुवचन का प्रयोग किया गया है । इसलिए आध्यान विषयक होने से इनकी ' प्राधीत यजु ' नाम से व्यपदिष्ट किया गया है । चतुर्थी आहुति के मन्त्र का अर्थ करते हैं - वह मन्त्र निम्नाङ्कित है— आपोदेवी बृहती विश्वशम्भुको द्यावापृथिवी उरोऽन्तरिक्ष । बृहस्पतये हविषा विधेम स्वाहा " इति " [ १२७ ]

पृष्ठ 146

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण औद्ग्रभरण ब्राह्मण ये विशाल जो आपोदेवी हैं अर्थात् जलदेवता है ये संसार का कल्याण करने वाले हैं । लोक, पृथिवीलोक तथा विशाल अन्तरिक्ष इन के कार्य हैं क्योंकि जल से ही उत्पन्न होते हैं । हम बृहस्पतिदेवता के लिए आहुति प्रदान करते हैं । यह इस मन्त्र का शब्दार्थ है, किन्तु इस के रहस्य का उद्घाटन करने के लिए बृहद् व्याख्या की आवश्यकता है । जिसका प्रतिपादन हिन्दी विज्ञानभाष्य में है । प्रत्येक वस्तु में आत्मा, पद तथा पुनः पद अर्थात् केन्द्र, पिण्ड तथा महिमामण्डल ये तीन विभाग होते हैं । जैसे पृथिवी का केन्द्र, पृथिवीपिण्ड ( चित्यमर्त्य पृथिवी ) तथा २१ वें अहगर्ण से भी ऊपर तक वितत् महिमामण्डल जिसे चितेनिधेय पृथिवी या अमृता पृथिवी कहा जाता है । वस्तु का महिमामण्डल ही सोममण्डल कहलाता है । पास से वस्तु जितनी बड़ी मालूम पड़ती है, दूर जाने पर उत्तरोत्तर छोटी प्रतीत होगी । यहां तक कि किसी सीमा पर वह एक बिन्दु मात्र प्रतीत होगी । उस स्थान से वस्तु को केन्द्र में रखकर व्यासार्ध से उतनी ही दूर का जो एक मण्डल बनाया जायेगा, उस मण्डल पर खड़े होने वाले प्रत्येक मनुष्य को वह वस्तु बिन्दु मात्र ही दिखाई देगी । यही उस वस्तु का साममण्डल है । यह साममण्डल, ज्यों - ज्यों केन्द्र की ओर मनुष्य चलता जायेगा, छोटा होता जाएगा । यहा तक की अन्त में बिन्दुमात्र ही रह जायेगा । किन्तु इसके विपरीत केन्द्र से सूच्यग्रमुख होती हुई आगे बढ़ती हुई दो - दो बिन्दु कम होती हुई जो अग्नि है वह ऋक् कहलाती है । साम बाहर से छोटा होता हुआ केन्द्र में आकर बिन्दुरूप रह जाता है, किन्तु केन्द्र से बाहर जाता अन्तिम परिधि में जाकर बिन्दु मात्र शेष रह जाता है । यह ऋक् ही वस्तु की मूर्ति है । जैसाकि ' ॠग्भ्यो जाता सर्वशो मूर्तिमाहुः ' यह श्रुति बतला रही है । यह मूर्ति केन्द्र में महान् है । किन्तु अन्तिम साम में पहुंच कर अत्यन्त छोटी बिन्दु मात्र शेष रह जाती है । चूंकि प्रत्यक्ष मूर्ति का ही होता है । अतः बिन्दुमात्र शेष रहने के बाद आगे ऋक् का अभाव हो जाता है । अतः वस्तु का दर्शन नहीं होता । यह ऋक् साम सभी पदार्थों में होते हैं । पदार्थ भेद से ये लघु तथा महान् होते हैं । क्षर तथा अक्षर अर्थात् अपरा तथा पराप्रकृति विशिष्ट पुरुष प्रजापति के शरीर के स्वयम्भू, पर-मेष्ठी सूर्य, पृथिवी व चन्द्रमा ये पांच अवयव हैं । इनमें पूर्व - पूर्व के उदर में उत्तर - उत्तर अव-यव हैं । जैसे चन्द्रमा पृथिवी के उदर में, चन्द्रसहित रथान्तरसामान्त पृथिवी सूर्य के उदर में अपने बृहत, साममण्डल सहित सूर्य परमेष्ठी के उदर में तथा चन्द्रपृथिवी व सूर्य सभी को अपने उदर में लिये हुए अपने साममण्डल सहित परमेष्ठी स्वयंभू के उदर में है । चूँकि पर-मेष्ठी का साममण्डल सूर्य के साममण्डल से भी बहुत बड़ा है । अतः सूर्य परमेष्ठी के अन्दर एक बड़ी बूंद के समान है । इसीलिए ' द्रप्सश्चस्कन्द ' यह श्रुति सूर्य बूंद के समान परमेष्ठी मण्डल में है, यह कह रही है । परमेष्ठी आपोमय है । अतः मन्त्र में ' आपोदेवीबृहती: ' ऐसा कहा गया है । [ १२८ ]

पृष्ठ 147

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण श्रद्ग्रभण ब्राह्मण विश्व की उत्पत्ति, अग्नि में सोम की आहुति द्वारा ही होती है । ये अग्नि व सोम दोनों परमेष्ठी में है, क्योंकि धन, तरल, विरल भेद से क्रमशः आपः वायु सोमस्तत्व ही भृगु है । तथा घन, तरल, विरल भेद से त्रिधा विभज्य अग्नि, यम व आदित्य ही अङ्गिरा ( अग्नि ) कहलाता है । अङ्गिरा अग्निरूप होने से अशांतिजनक है । भृगुरूप आप की आहुति से वह शान्त्य् व शिव बन जाता है । अत: इन पारमेष्ठ्य आपोदेवियों को ' विश्व शंभुवः ' विश्व कल्याण करने वाली बतलाया है । मानसी व मैथुनी भेद से द्विविध सृष्टि में मैथुनी सृष्टि का मूल पारमेष्ठ्य आपस्तत्व ही है । इसीलिए भगवान् मनु ने कहा है ' अप एव ससर्जादी ' इति । ' आप:, वायु, सोम भेद से त्रिविध आप में ही चिदात्मारूप बीज की आहुति होती है । इसी से सृष्टि होती है । इसीलिए भगवद्गीता में कहा हैं: -ममयोनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भ दधाम्यहम् । संभवः सर्वभूतानां ततोभवति भारत । इति । क्योंकि जिसमें चिदात्मा की आहुति द्वारा सृष्टि होती हैं वह प्राप्यतत्व, अप्, वायु, सोमभेद से त्रिविध हैं । अतः सृष्टि भी श्राप्य, वायव्य, सौम्यभेद से तीन ही प्रकार की है । इस बृहत् त्रिविध प्राप्य तत्व से जिस सृष्टि का निर्माण होता हैं, वह रोदसी त्रैलोक्य है जो कि पृथिवी, अन्तरिक्ष, लोक भेद से त्रिविध है । उसी का निरूपण मध्य में ' द्यावापृथिवी उरोऽन्तरिक्षम् ' से किया हैं 1 जैसा कि ऊपर बतला दिया है कि क्षर तथा अक्षर अर्थात् अपरा प्रकृति विशिष्ट पुरुष प्रजापति के स्वयंभू आदि ५ अवयव हैं । इन में मध्यस्थ सूर्य है । सूर्य के ऊपर दो लोक स्वयंभू परमेष्ठी अमृतरूप हैं तथा सूर्यलोक से नीचे के दो लोक पृथिवी व चन्द्रमा मृत्युरूप हैं । स्वयंभू व परमेष्ठी पूर्ववर्ती है तथा सूर्य, पृथिवी व चन्द्रमा उत्तरवर्ती हैं । बृहस्पति परमेष्ठी का अन्तिम भाग है । अतः वह पूर्ववर्ती स्वयंभू, परमेष्ठी आदि का उत्तम ( अन्तिम ) कहलाता है तथा उत्तरवर्ती ग्रहों में सूर्य सबसे प्रथम है । अतः श्रुति कह रही है ' बृहस्पति पूर्वेषामुत्तमो भवति । इन्द्रउत्तरेषां प्रथमः ' इति । सूर्य का प्राण इन्द्र है अतः सूर्य के स्थान में श्रुति में इन्द्र शब्द का प्रयोग कर दिया गया है । बृहस्पति ब्रह्मवीर्यप्रदाता है । अतः बृहस्पति के लिए हवि प्रदान करें ' यह कहा गया है । ' आपोदेवी.... ' इत्यादि ऋचा यहां के प्रत्यन्त नजदीक है । अर्थात् यह ऋक् साक्षात् यज्ञ-स्वरूप का वर्णन कर रही है । क्योंकि इस में जल का वर्णन है और प्रप्तत्व ही यज्ञ का साक्षात् स्वरूप है । इसीलिए भगवान् याज्ञवल्क्य ने ' एषा हि वेदीयो यज्ञस्य ' अपां हि कीर्तयति, आपो [ १२६ ]

पृष्ठ 148

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तृतीय काण्ड ( प्र ० १ ) शतपथ ब्राह्मण श्रग्रभण ब्राह्मणं हि यज्ञः ' ऐसा कहा है । इस यज्ञ से पृथिवी, अन्तरिक्ष व द्यलोकरूप रोदसी त्रैलोक्य की उत्-पत्ति होती है । अतः मूलग्रन्थ में ' द्यावापृथिवी उरोऽन्तरिक्ष ' इति लोकानां हि कीर्तयति ' यह कहा है । इन तीनों से ऊपर रहने वाला बृहस्पति ब्रह्मवीर्यप्रदाता है और ब्रह्म यज्ञ है । इस प्रकार सम्पूर्ण ऋचा यज्ञ का ही प्रतिपादन कर रही है 1 । यद्यपि ब्रह्म अमृतस्वरूप व प्रसंग तत्व है उसे यज्ञस्वरूप यौगिक तत्व कैसे माना जा सकता है तथापि सृष्टि के अणु - अणु में व्याप्त रहने के कारण सृष्टि के सम्बन्ध समन्वय से उसे यज्ञ माना जा सकता है । अतः ' ब्रह्म वै बृहस्पति ब्रह्म यज्ञः ' ऐसा कहा गया है । इस प्रकार मैथुनी अर्थात् यौगिक सृष्टि के कारण जलतत्व, उससे उत्पन्न होने वाली रोदसी रूपा त्रैलोक्यसृष्टि तथा उसमें व्याप्त रहने वाला ब्रह्मरूप तत्व सभी यज्ञ है । इस प्रकार सृष्ट्युत्पादक प्रप्तत्व तथा उससे उत्पन्न होने वाली रोदसी त्रिलोकी तथा इनका मूलभूत प्रसंगब्रह्म, तत्व इन तीनों में ब्रह्म ही प्रधान है । अतः ' बृहस्पतये हविषा विधेय स्वाहा, ऐसा कहा गया है ॥।१५ ॥ उपर्युक्त चारों आहुतियां प्राज्य स्थालीगत स्रुवा, आदि से दी जाती है । जैसा कि कात्यायन ने कहा है कि ' औद्भणानि जुहोतिस्थाल्याः सुवेणाहुत्यै प्रतिमन्त्रम् ( का ० नौ ० सू ० ७७ ९ ) इति । किन्तु पांचवीं आहुतिस्र ुक् ( जुहू ) से दी जाती है । यह आहुति साक्षात् यज्ञस्वरूप है । अनुष्टुभ् छन्द के द्वारा इस आहुति को दिया जाता है । वाक् ही अनुष्टुभ् है, वाग् ही यज्ञ है ॥।१६ ॥ पूर्वोक्त कण्डिका के अर्थ का ही इस १७ वीं कण्डिका के द्वारा स्पष्टीकरण किया जा रहा है । अर्थात् पांचवीं प्राहुति में दीक्षणीयेष्टि सम्बन्धी जो आज्य ध्रुवापात्र में अवशिष्ट रह गया था उस श्राज्य को जुहू में डाले, यह एक अक्त ( भाग ) है । और आज्यस्थाली से स्र ुव के द्वारा जुहू में तीन बार आज्य का निनयन करता है, डालता है, ये तीन अक्त हैं । इस प्रकार यह श्राज्य - चतुरक्त हो जाता है । इनमें तीसरा अक्त ( धृतभाग ) श्राज्य विला-पनी से जुहू के ऊपर पर स्रव का ऊर्ध्वमुख रख करके वह स्रव आज्य से परिपूर्ण हो जाए, इस प्रकार डालें । अर्थात् स्र ुव को चारों तरफ आज्य से पूर्ण कर दे । इसीलिए श्रौतसूत्र -कार कात्यायन ने कहा है: - ' जुह्वां धौव मासिच्य द्विदुच स्थाल्याः स्रुवेण तृतीयम् स्र ुवमभि-पूरयति विश्वोदेवस्य ' इति ( का ० श्रौ ० सू ० ७।८१ ) ॥१७ ॥

पांचवा होम, जिस मन्त्र से किया जाता है उस मन्त्र को बतला रहे हैं ' विश्वोदेवस्य नेतुर्मर्तो वुरीत् सख्यम् । विश्वो रायइषुध्यति द्य ुम्नं वृणीत पुष्यसे स्वाहा ' । इति । इस मन्त्र में पञ्चदेवताकत्वरूप पाङ्क्तत्त्व अगली कण्डिका के द्वारा बत-लाया जा रहा है ॥।१८ ॥ इस मन्त्र में विश्वदेव शब्द के श्रवण से यह मन्त्र वैश्वदेव है । ' नेतु: ' इस पद के द्वारा प्रेरकत्व बतलाने से यह मन्त्र सवितृदेवताक है । क्योंकि ' सविता वै देवानां प्रसविता ' इस श्रति [ १३० ]

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तृतीय काण्ड ( ० १ ) शतपथ ब्राह्मण श्रद्ग्रभण ब्राह्मण के द्वारा सविता ही देवताओं को प्रेरणा देने वाला है । ' मर्ती वरीत ' इस वाक्य के द्वारा मनुष्यों के द्वारा वरणीय ( एष्टव्य ) बतलाने से यह मन्त्र मित्रदेवताक है । क्योंकि मित्र ही वरणीय होता है । रात्रि के १२ बजे से दिन के १२ बजे तक आने वाला सौर तेज हम से संगम करने बाला है अतः उसे मित्र कहा जाता है । ' द्रविणं धेहि चित्रम् ' इस वाक्य में द्युम्नापरपर्याय वि के देने में बृहस्पति का सम्बन्ध होने से यह मन्त्र बृहस्पतिदेवताक है । क्योंकि न बृहस्पति का ही है । ' पुष्यसे ' के द्वारा पोषण सम्बन्ध के अवरण से यह मन्त्र पूषा देवताक है । क्योंकि पोषण करना ' पूषा ' का ही काम है । इसीलिए ' पुष्टिर्वे पूषा ' यह १४ वां कण्डिका में कहा गया है । इस प्रकार यह पञ्चदेवताक होने से पंक्ति कहलाता है ॥।१६ ॥ यह मन्त्र पञ्चदेवताक होने से पंक्तिसम्पत्तियुक्त है । यज्ञ पंचावयव होता है । पशु भी पुरुष, अश्व, गौ, अवि, अज भेद से पांच हैं । एक संवत्सर में ७२, ७२ दिन की पांच ऋतुएं होती है । अतः संवत्सर पञ्चतु समष्टिरूप है । संवत्सर ही यज्ञ है । इस प्रकार पञ्चदेवता करूप पंक्ति सम्पत्तियुक्त ऋचा से यजमान संवत्सर यज्ञ को तथा पशुसम्पत्ति को प्राप्त कर

लेता है ॥।२० ॥

यह प्राहुति अनुष्टुप् छन्द से दी जाती है । अनुष्टुप् छन्द वाग्रूप है और वाक् ( वषट्कार ) यज्ञरूप हैं । अतः अनुष्टुप् छन्दस्क ऋचा से प्राहुति प्रदान करता हुआ यजमान प्रत्यक्षरूप से यज्ञ को प्राप्त कर लेता हैं ॥।२१ ॥ कतिपय आचार्य कहते हैं कि प्रभण होम में एक ही आहुति का हवन करें । किन्तु जुहू को घृत से पूरी भर कर आहुति दे । पूर्ण ही सर्व है । इस प्रकार जुहू को घृत से परिपूर्ण करके एक आहुति से सर्वकामनाओं की पूर्ति हो जाती है शेष आहुतियों की आवश्यकता नहीं है । पूर्णाहुति के समय स्र ुव को घृत से पूर्ण करे उस समय स्र ुव से होम न कर के धृत से जुहू को भर लें । तब उस आहुति को पूर्णाहुति करके उसकी आहुति दे । जैसाकि कात्यायन ने कहा है: - एतमेव वा पूर्णा जुहुयात् ' ( का ० श्री ० सू ० ७।८२ ) ॥२२ ॥

यह पाँचवीं आहुति अनुष्टुप् छन्दस्क ऋचा द्वारा दी जाती है । ३१ अक्षरों वाले अनुष्टुप् छन्द द्वारा आहुति देने से निम्न संपत्ति प्राप्त हो जाती है । इसमें १० अंगुलियाँ हाथों की, १० अंगुलियाँ पैरों की, १० प्राण एवं ३१ वां प्रात्मा है जिसमें कि सारे प्राण प्रति-ष्ठित है । यही पुरुष का स्वरूप है । ३१ अक्षरों वाले अनुष्टुप् छन्दस्क द्वारा चारों आहुति देने पर पुरुषसम्पत्ति पूर्णतया प्राप्त हो जाती है । पुरुष ही यज्ञ है । क्योंकि यज्ञ पुरुषसंमित है । जितनी मात्रा पुरुष की है उतनी ही मात्रा यज्ञ की है । यद्यपि अनुष्टुप् छन्द में ३२ अक्षर होते हैं किन्तु एक या दो अक्षरों की न्यूनता या वृद्धि से छन्दः सम्पत्ति का नाश नहीं होता है । जैसाकि श्रुति कहती है- ' नैकेनाक्षरेण छन्दांसि वियन्ति न द्वाभ्याम् इति ॥।२३ ॥ [ १३१ ]

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तृतीय काण्ड ( ० १ ) शतपथ ब्राह्मण औग्रभण ब्राह्मण [ विज्ञान भाष्य ] " जायमानो वै जायते सर्वाभ्यो एताभ्यो एव देवताभ्यः " यही हमारे विज्ञान का सिद्धान्त है | जो कुछ " है " कहने लायक है वह इन्हीं देवताओं से उत्पन्न होता है । देवता कुल पाँच हैं, उनके नाम हैं ( १ ) ऋषि ( २ ) पितर ( ३ ) देव ( ४ ) गंधर्व ( ५ ) मनुष्य । ये पाँचों प्राण ही देवता कहलाते हैं । पितरों के साथ असुर - प्राण रहते हैं एवं मनुष्य - प्रारण के साथ पशु - प्राण रहता है । इस प्रकार कुल ६ प्राण हो जाते हैं । छत्रों ही देवता हैं - इससे चमक नहीं जाना चाहिए कि असुर और पशु एवं पितर और ऋषि, देवता कैसे हुए? देवता तो अग्नि, वायु आदित्य ही हैं — नहीं - नहीं, देवता सबके लिए सामान्य शब्द है । अपने - अपने काम में सब देवता है छओं ही देवता है इसीलिए तो असुर देवत्य, पितृदेवत्य, पशुदेवत्य ऋषि देवत्य इत्यादि व्यवहार होता है । यदि देवता केवल अग्नि वायु पर ही रूढ होता तो फिर असुर कर्म्म असुर देवत्य कैसे कहलाता? इसलिए सिद्धान्त समझना चाहिए सब अपने - अपने कर्म के देवता हैं । हां, पितर ऋषि नहीं हैं, ऋषि पितर नहीं है, असुर ऋषि नहीं हैं— ऋष्यादि भेदेन सब पृथक् हैं । देवतात्वेन सब एक हैं । असुर देवता अवश्य है परन्तु देव नहीं हैं । देवा: से ३३ देवताओं का ही ग्रहण होता है परन्तु देवताओं से यावन्मात्र प्राणों का ग्रहण होता है । अतएव ' देवताः ' और " देवाः " को पर्य्याय, अमरकार का पर्य्याय बतलाना वैज्ञानिक दृष्टि से एकान्ततः अशुद्ध है । बतलाना हमें यही है कि जायमानो वै जायते में जो देवता शब्द है उससे ऋषि पितरादि सबका ग्रहण समझना चाहिए । इन्हीं देवताओं से यच्चयावत् प्राणिमात्र का - प्राणिमात्र ही का क्या जड़चेतन सबका निर्माण होता है | हमारे शरीर में ६६ असुर है, ३३ देवता है, २७ गंधर्व हैं, आठ पितर हैं, पुरुषाश्वगोश्रविश्रज - पांच पशु हैं । इन सब की समष्टि से हमारा शरीर बना हुआ है । इन पांचों में से ऋषि ज्ञान मात्र के प्रदाता हैं एवं पहला मौलिक तत्त्व यही ऋषि है । यह स्वयंभूमण्डल की वस्तु है । पितर और असुर परमेष्ठि मण्डल की वस्तु है । ३३ देव सूर्य की वस्तु है एवं गंधर्व चन्द्र मण्डल की वस्तु है एवं पशु - प्राण पृथिवी की वस्तु है । पशु के देवता है ' पूषा ' एवं पशु रहते हैं पृथिवी पर प्रतएव पृथिवी के लिए " इयं वै पूषा " कहा जाता है । इन पांचों में से, प्रकृत में केवल सौर देवताओं से सम्बन्ध है । यज्ञ का सम्बन्ध अग्नि से है एवं अग्नि ही की अवस्था विशेष का नाम है ३३ देवता । अतएव हमारा सम्बन्ध यज्ञापेक्षया ३३ देव-तानों से है । पृथिवी से निकलने वाला अग्नि ८ वसु ११ रुद्र १२ आदित्य, प्रजापति, वटुकार भेदेन ३३ स्वरूपों में परिणत हो जाता है । ८ वसु पृथिवी की वस्तु है, रुद्र अन्तरिक्ष की वस्तु है, प्रादित्य द्युलोक की वस्तु है । १२ प्रादित्यों में से एक आदित्य का नाम है इन्द्र । इसीलिए -" यथाग्निगर्भा पृथिवी तथा द्यौरिन्द्रेण गभिरणी " कहा जाता है । यास्क मुनि भी कहते हैं— " श्रग्नि स्थानो वायुर्वेन्द्रो वान्तरिक्ष स्थानः सूर्य्यो द्युस्थान इति " । इस सम्पूर्ण प्रपञ्च से हमें बतलाना यही है कि यह देवता त्रिलोकी में व्याप्त हो रहे हैं, एवं इनमें पारमेष्ठ्य सोम - जिसे कि अमृत कहते हैं - प्राहुत हो रहा है । देवता आग्नेय है । अग्नि मत्यं है परन्तु चूकि इस २१ वें स्थान में रहने वाली अग्नि में अर्थात् सूर्य में हर समय पारमेष्ठ्य सोम स्वरूप प्रमृत की प्राहुति पड़ती रहती है अतएव [ १३२ ]