Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 151–160
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 151–160
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण औद्ग्रभरण ब्राह्मण अग्नि अमर है इसलिए देवता ' अमरा ' " निर्जरा " कहलाते हैं । सूर्य में सोम हुत होता रहता है अतएव " सूर्यो ह वा श्रग्निहोत्रम् " यह कहा जाता है । इस प्रकार से आधिदैविक मण्डल के देवता इक्कीस से ऊपर के सोम सम्बन्ध से सदा अमर रहते हैं । यही देवता हमारे अध्यात्म में प्रविष्ट होते हैं । अग्नि, वायु, इन्द्र, सोम आदि देवताओं से ही हमारा शरीर बना हुआ है । जैसा कि श्रुति कहती है-निर्वाक् भूत्वा मुखं प्राविशत् । वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत् । प्रादित्यश्चक्षुर्भुत्वाऽक्षिरणी प्राविशत् । दिशः श्रोत्रं भूत्वा करणौं प्राविशत् । प्रोष -धिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशत् । प्रापोरेतो भूत्वा शिश्नं प्राविशत्.. तमशाना पिपासे अब्रू ताम् - श्रावभ्यामभिप्रजानी हि इति । ते प्रब्रवीत् एतास्वेव वां देवतास्वा भजामि । एतासु भागिन्यौ करोमि । तस्माद् यस्यै च कस्यै च देव-तायै हविगृह्यते भाग्न्यिावावेवास्थामशना पिपासे ' ( ऐ ० उ ० १।२ ) उन व्यापक देवताओं से प्रवर्ग्य बन कर हमारा अध्यात्म मण्डल बनता है । हमारे अध्यात्म देव -ताओं का उनसे सम्बन्ध छूट जाता है । अध्यात्म देवता की और अधिदैवत देवता की विद्युत् का सम्बन्ध हट जाता है । अतएव अध्यात्म देवता मर्त्य हो जाते हैं । इन्हें साक्षात् सोम नहीं मिल सकता । यदि किसी उपाय से उन देवताओं के साथ अध्यात्म देवताओं की विद्युत् का कनक्शन जोड़ दिया जाय तो फिर २१ विंशस्थ सोम के भागी अध्यात्म देवता भी हो सकते हैं- बस इसीका नाम है ' दीक्षा ', इसी का नाम है सोम याग, इसीका नाम है यज्ञ विद्या । दीक्षा से अध्यात्म का सम्बन्ध अधिदेवता के साथ जोड़ दिया जाता है । इस सम्बन्ध से प्राणोत्क्रान्त्यनन्तर यजमान का प्रात्मा सीधा स्वर्ग में १७ वें स्थान पर चला जाता है | अध्यात्म के देवता को यजुर्मन्त्र द्वारा अधिदैवत में मिलाने का नाम ही चूंकि दीक्षा है अतएव दीक्षा के जितने भी यजुर्मंन्त्र होते हैं वे ' प्रौद्ग्रभरण ' कहलाते हैं । उत् का अर्थ है- ऊर्ध्व लोक - अर्थात् अधिदैवतमण्डल । यह यजुमन्त्र चूंकि यजमान के अध्यात्म का उत् - ग्रहण करा देते हैं— उसमें मिला देते हैं अतएव इन यजु मन्त्रों को ' उद्ग्रहण ' मन्त्र कहते हैं । वेद में " हृग्रहोर्भश्च्छन्दसि ' से ' ह ' को ' भ ' हो जाता अतएव उद्ग्रहण को उद्भण - मन्त्र कहते हैं । बस इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं-सर्वाणि ह वै दीक्षाया यजूंषि श्रद्ग्रभरणानि इसीका स्पष्टीकरण करते हुए कहते हैं " यह यजमान देवलोक की तरफ जाता है - जो कि दीक्षा लेता है । अर्थात् यजुर्मन्त्रों से दीक्षा लेना अपने अध्यात्म को अधिदैवत से मिलाना है चूंकि यजुर्मन्त्रों से [ १३३ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथं ब्राह्मणं श्रग्रभण ब्राह्मण यह कहा जाता है । यजुमन्त्र ही अध्यात्म का अधिदेवता के साथ सम्बन्ध जोड़ता है— इसीलिए कहते हैं कि दीक्षा के जितने भी यजुमन्त्र हैं वे सब ' औद्ग्रभण ' हैं— " उद्गृभ्णीते वाऽएषोऽस्माल्लोकात् देवलोककमभि यो दीक्षते । एतैरेव तद् यजुभिरुद्ग्रभ्रणीते - तस्मादाहुः सर्वाणि दीक्षा यजूंषि प्रौद्ग्रभणानीति " सोमयाग में प्रयुक्त जितने भी यजुमन्त्र हैं उन सब यजुत्रों में दीक्षा - आहुति साधन इस उद्ग्रहण में साधनभूत जो ग्रभरण यजु हैं वे ही उद्ग्रहण में अत्यंत संनिहित हैं । अर्थात् यजमान का दिव्यलोक से सम्बन्ध जोड़ने में प्रधान दर्जा भरण यजुनों का ही है । यदि दीक्षा अच्छी प्रकार से हो जाती है । तो फिर सारा यज्ञ निर्विघ्नतया समाप्त हो जाता है और यदि दीक्षा में गड़बड़ रह जाती है तो फिर सारा कर्म्म व्यर्थ है - इन यजुओं से ही वह स्वर्ग लोक से आत्म सम्बन्ध जोड़ता है - औद्भण यजु ही-अध्यात्म को अधिदैवत के साथ मिलाने का सूत्र है अतएव इन प्रोग्रभण मन्त्रों को " अवान्तर " ( उद्-ग्रहण क्रिया में प्रत्यन्तसन्निहित दिव्यात्म सम्बन्ध में प्रधान सहायक ) कहा जाता है— " तत एतान्यवान्तरामाचक्षतेऽ प्रौद्ग्रभणानि " इन यजुमन्त्रों का प्रवान्तररण कैसे हैं? यह बतलाते हैं । और - और जो यजुं हैं उनका जपमात्र होता है । उनसे आहुति नहीं दी जाती परन्तु यह जो भण मन्त्र हैं वे तो प्राहुति - स्वरूप हैं अर्थात् यह यजुमन्त्र तो आहुति ही हैं-" आहुतयोह्यता: " आहुति को यज्ञ कहते हैं । देवता सारे वाङ्मय हैं । अतः वाक् से उनके साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है । देवताओं का आधार वाङ्मण्डल है । अर्थात् सूर्यमण्डल है । सारे देवता सूर्य्य में रहते हैं अतएव " चित्रं देवानामुदगादनीकम् " कहा जाता है । ऐसी हालत में केवल वाक् ( केवल यजु ) का हम प्रयोग करते हैं तो हमारी वाक् का सम्बन्ध होता है इस अधिदैवत् वाक् से एवं तत्द्वारा देवता का सम्बन्ध होता है हमारे से । इस प्रकार वाक् से देवता का सम्बन्ध परम्परया परोक्षरूपेण होता है । परन्तु प्राहुति -विशिष्ट मन्त्र से तो यज्ञ से साक्षात् सम्बन्ध होता है । अग्नि साक्षात् देवता है । इसमें ग्राहुति पड़ते ही श्रग्नि इसे विशकलित कर डालता है । अग्नि में सोम की प्राहुति का डालना ही यज्ञ कहलाता है अतएव हम श्राहुति को यज्ञ कहने के लिए तैय्यार हैं " प्राहुति हि यज्ञः " -याज्ञवल्क्य कहते है कि जो केवल यजुमन्त्र का जप करता है वह परोक्षभावेन प्रधिदंवत मण्डल से युक्त हो जाता है एवं यह प्रत्यक्ष यज्ञ है जो कि आहुति है अर्थात् आहुति सहित यजुर्मन्त्र का बोलना साक्षात् यज्ञ को प्रत्यक्ष रूपेण आत्मसात् करना है— [. १३४ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मणं " परोक्षं वै यजुर्जपति । श्रथैष प्रत्यक्षं यज्ञः यदाहुतिः " श्रग्रभरण ब्राह्मणं इस प्रकार से यह यजमान यजुर्मन्त्र सहित आहूयमान यज्ञ से देवलोक की तरफ जाता है, अर्थात् यजुर्मन्त्र सहित दी जाने वाली आहुतियों से चूंकि इस यजमान के अध्यात्म का अधिदैवत के साथ संबंघ हो जाता है अतएव हम इन प्रौद्भण यजुमन्त्रों को यजमान के इस अधिदैवत सम्बन्ध में खाली यजुमन्त्रों की अपेक्षा अवान्तर अर्थात् प्रधान कह सकते हैं ॥१ ॥
श्रद्भण होम में पांच प्राहुति होती हैं । इन पाचों के पांच ही यजुर्मन्त्र हैं । इनमें से पहले के जो तीन यजुर्मन्त्र हैं वे ' श्रधीत यजु ' के नाम से व्यवहृत होते हैं । इन्हें अधीत - यजु कहते हैं अर्थात् पांचों प्रौद्ग्रभरण यजुर्मन्त्रों में से स्रवा से प्राहुति डाले जाने वाले प्रथम के जो तीम मंन्त्र हैं वे " श्रधीत यजुमंत्र " कहलाते हैं— " ततो यानि त्रीणि त्रवेण जुहोति तान्याधीतय जूंषीत्याचक्षते " लोक में जो भी कोई काम किया जाता है उसके लिए पहले " इदं करिष्ये " यह संकल्प कर लिया जाता है । इसी संकल्प को प्रधान कहते हैं । पूर्वोक्त मन्त्रों में जो पहले के तीन हैं वे श्राधान स्थानापन्न हैं । " अहं यज्ञं करिष्ये " तीन मन्त्रों से इस अध्यवसाय का ही प्रात्मा में श्राधान किया जाता है एव तीनों " अधीत " तदन्तर चौथे से उस संकल्प को कार्य्यं रूप में परिणत किया यजु ' यजु कहलाते हैं एवं जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं -स्वर्ग सम्पत् स्वरूप जो फल है उसी के लिए चौथे मन्त्र से आहुति दी जाती है— " संपदेवव चतुर्थे कामाय ( संपदे कामाय ) चतुर्थं हूयते " सायणाचार्य कहते हैं कि यद्यपि चार यजुर्मन्त्र होम साधन के अन्तर्गत नहीं हैं तथापि चूँ किं आगे की पाँचवीं आहुति में स्रचि का विधान है अतः चौथी प्राहुति स्रवा से ही देनी चाहिए | अन्त में पाँचवीं आहुति पाँचवें यजुर्मन्त्र से डालता है वही श्रद्भरण का प्रत्यक्ष स्वरूप है । अर्थात् पहले के तीन से संकल्प है, ४ थे से स्वर्ग का मिलना है, पाँचवें से अध्यात्म का उस प्राप्त अधिदै-वत के साथ सम्बन्ध होना है । अध्यात्म का अधिदैवत के साथ सम्बन्ध पूर्व से ही होता है इसी अभिप्राय से कहते हैं— “ प्रथयत् पञ्चमं त्र चा जुहोति तदेव प्रत्यक्षमौद्ग्रभणम् ” । यह यजुर्मन्त्र अनुष्टुप् छन्द वाले होते हैं । जो पार्थिव वाक् हैं उसे अनुष्टुप् वाक् कहते हैं । अन्त-रिक्ष्य वाक् को ' त्रिष्टुप् वाक् कहते हैं एवं दिव्यवाक् को बृहतीवाक् कहते हैं । यजमान अध्यात्म वाक् को चूँकि दिव्यवाक् में मिलाता है प्रतएव इसे अनुष्टुप् वाक् ही बोलनी चाहिए | क्योंकि अध्यात्म में पार्थिव प्राण ही तो है । इसे ही तो दिव्यप्राण में मिलाना है । बस इसी [ १३५ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) इतिपथे ब्राह्मणं औद्ग्रभरण ब्राह्मण अभिप्राय से कहते हैं — " वाग्धि अनुष्टुप् " । वाग्धि यज्ञः " । इसी अध्यात्म को प्रर्थात् इस अनुष्टुप् वाक् को अधिदैवत में अर्थात् बृहतीवाक् में मिलाने का नाम ही यज्ञ है अतएव " वाग्धि यज्ञः " कहा गया है । औद्भण होम, अनुष्टुप् मन्त्र से करना चाहिए यही इस प्रपञ्च का भावार्थ है ॥२ ॥
भुवन स्वर्गवासी देवताओं ने इसी यज्ञ के द्वारा उस विजिति को प्राप्त किया जो कि विजिति आज उनकी सुनी जाती है । अर्थात् इन्द्र ने असुरों को मार गिराया । देवताओं का क्या कहना है । सारा विश्व ही देवताओं के अधीन है - आज इस प्रकार से जो देवताओं की महिमा सुनी जाती है वह इसी यज्ञ का प्रताप है । देवता लोगों ने इतनी प्रतिष्ठा इसी यज्ञ द्वारा पाई थी । " यज्ञेन वं देवा इमांसि जिति जिग्यु इयमेषां विजितिः " । उन देवताओं ने विचार किया कि ऐसी कौनसी तरकीब करें जिससे कि यह यज्ञ-विद्या मनुष्यों को प्राप्त न हो सके । मनुष्य से " अनभ्यारोह्य " ( अप्राप्तुं योग्य ) कैसे बनाऐं - इसकी कोई तरकीब सोचनी चाहिए । उन्हें मालूम था कि मनुष्य असत्य संहित हैं । यदि उन्हें इस यज्ञ विद्या का पता लग जायगा तो वे नाना दुराचार कर बैठेंगे, अभिचारादि में निपुण हो जायेंगे । अतः इस विद्या को किसी प्रकार उनसे छुपाना चाहिए । “ ते होचुः कथं न इदं मनुष्यरनभ्यारोह्यम् स्यात् इति ” श्राखिर उन्होंने इसका रास्ता निकाल लिया । उन्होंने यज्ञ के इस भाग को ( सार भाग को ) खेंचकर जिस प्रकार भौंरा ( मधुकृत ) पुष्प में से मधु निकाल लेता है तद्वत यज्ञ के सार भाग का दोहन करके यज्ञ को यूप से अर्थात् दिखावटी ढोंग से - वहाँ पर छोड़ कर स्वयं तिरोहित हो गये । अर्थात् यज्ञ द्वारा वे स्वयं तो स्वर्गलोक में चले गए परन्तु साथ ही में जिस ढंग से वेदि - निर्माण श्राहुतिक्रम वगैरह - वगैरह कर्म किये थे, उन सबको तहस - नहस कर गये, जिससे कि यज्ञ - विद्या को मनुष्य न पहचान सके । उसका स्वरूप ऐसा विकृत कर दिया - ढोंग का कर्म्म इतना शामिल कर दिया, जिससे असली तत्त्व बिल्कुल तिरोहित हो गया । चूँकि उन्होंने इस महा थूण से इस यज्ञ -विद्या को छुपाया अत-एव इस थूरण ही का नाम " यूप " पड़ गया । यूप का अर्थ वास्तव में है ढोंग । चूँकि इस स्थूरण से यूप-रचना अर्थात् ढोंग किया था, यज्ञविद्या को अन्तर्हित किया था अतएव इस स्थूण का नाम ही " यूप " पड़ गया । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " ते यज्ञस्य रसं धीत्वा यथा मधु मधुकृतो निर्धयेयुः ( एवं ) विदुह्य यज्ञं ( सारभागं गृहीत्वा ) यूपेन योपयित्वा तिरोऽभवन् । श्रथ यदेनेनायोपयं तस्माद् " यूपो ” नाम ॥३ ॥
परन्तु भारतीय महर्षि लोग देवताओं के इस कृत्य को जानते थे कि देवता इस तरह यज्ञ के असली रहस्य को छुपाकर अन्तहित हो गए हैं ---[ १३६ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण श्रद्ग्रभण ब्राह्मण " तद्वाऽऋषीणाममुभ तमास " तात्पर्य यही है कि, अपने वैज्ञानिक मस्तिष्क से उन्होंने पहचान लिया कि इस यज्ञ में असली तत्त्व इतना है एवं व्यर्थ का काम इतना है । यदि यह सार भाग ( श्रद्ग्र-भण होम ) कर लिया जाता है तो सारा यज्ञ सुफल हो जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं कि देव-विज्ञान अर्थात् प्राकृतिक यज्ञ जानने वाले महर्षियों ने यह सोम यज्ञ " प्रौद्ग्रभण " होम से सम्भूत कर लिया गया । अर्थात् देवताओं ने सोमयज्ञ के जिस रस - भाग को, जिस सार भाग को छुपाया था - महर्षियों ने उसे पहचान लिया कि इसमें सार भाग यही " प्रौद्भण होम " हैं । बस यह पहचान कर उन्होंने अपने यज्ञ में उसी सारभूत श्रद्भरण होम को शामिल कर दिया । कहने का तात्पर्य यही है कि सोमयाग में दीक्षा ही प्रधान है । यदि दीक्षा कर्म्म हो गया तो समझ लो सब कुछ हो गया । इसी अभिप्राय से कहते हैं- " ते यज्ञं समभरन् यथायं यज्ञः ( सोमः ) सम्भूतः ” । महर्षियों ने " भरण होम को सार भाग समझ कर अपने यज्ञ में शामिल किया था अतएव “ यद्वै देवा प्रकुर्वन्तत् करवाणि " के अनुसार यह यजमान अपने यज्ञ का सम्भरण करता है अर्थात् उसे रस - भाग से युक्त करता है जो कि " अद्भण मन्त्रों " द्वारा आहुति देना है । तात्पर्य यही है कि वेदविद्याविशारदों ने यज्ञ का सार भाग इस " प्रद्भण " होम ही को बतलाया है - अतः यज्ञ - समृद्धि चाहने वाले यजमान को अवश्य ही प्रौद्ग्रभरण होम करना चाहिए— " एवं वा एष यज्ञं सम्भरति यदेतानि जुहोति " ॥४ ॥
वह यजमान पाँच मन्त्रों से पाँच प्राहुति डालता है । पाँच ही आहुति क्यों डाली जाती हैं? इसका कारण बतलाते हैं " तानि वै पञ्चजुहोति ” । हमने पूर्व के प्रकरणों में कई स्थानों पर बतलाया है कि यह यज्ञ सम्वत्सर संमित है । अर्थात् अग्नि में सोमाहुति पड़ने का नाम ही यज्ञ है एवं इस अग्नि का जो रथन्तर साम का " सोलर सिस्टम है | वही सम्वत्सर मण्डल कहलाता है एवं इसी में पारमेष्ठ्य सोम प्राहुत होता रहता है अतएव हम कह सकते हैं कि यह यज्ञ सम्वत्सर संमित है । अर्थात् सारा यज्ञ सम्वत्सर से परिच्छिन्न है - ~. " सम्वत्सर संमितो वै यज्ञः " । एवं एक संवत्सर की पाँच ही ऋतु होती हैं । तो इस प्रकार पाँच प्राहुति देता हुआ यह यजमान पञ्चर्तुयुक्त सम्वत्सर यज्ञ को पांच प्राहुतियों से प्राप्त कर लेता है । अर्थात् पाक्त सम्पत्ति प्राप्त करने के लिए ही पाँच प्राहुतियाँ दी जाती हैं । " तं पञ्चभिराप्नोति तस्मात् पञ्च जुहोति अब होम की मीमांसा करते हैं अर्थात् " ॥५ ॥
ग्रभरण मन्त्रों की व्याख्या करते हैं - श्रथातो होमस्यैव " ( मीमांसा क्रियते इति शेष:) इस सोम यज्ञ में महर्षियों ने अपनी वैज्ञानिक दृष्टि से जिस सार भाग को रक्खा था, वह कुल ४ हैं । इन चारों के बिना सारा यज्ञ एकान्ततः व्यर्थ होता है अतः सोमयाजी को इन [ १३७ ]
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तृतीय काण्ड ( ० १ ) शतपथ ब्राह्मण श्रौद्ग्रभण ब्राह्मण चार कामों को पहले अवश्य ही कर लेना चाहिए, तभी उसका यज्ञ सुफल हो सकता है । वे चार काम यह हैं— ( १ ) प्राकृतिः ( २ ) प्रयुक्} ( ३ ) मेधा ( ५ ) दीक्षा ( ७ ) सरस्वती ( ४ ) मन ( ६ ) तप ( ८ ) पूषा} सर्वप्रथम ' आकृति ' का ही स्वरूप बतलाते हैं । मनुष्य जब भी कभी कोई काम करे, उसे " मया इयं कर्तव्यम् " इस रूप से अध्यवसाय कर लेना चाहिए । जिसका दृढ़ संकल्प कर लिया जाता है वह अव-श्य पूरा होता है । बस इस इदं कर्त्तव्यत्वेन जो अध्यवसाय है, उसे ही " आकूति " कहते हैं । इसी प्रकृति को ' ऋतु ' शब्द से भी कहा जाता है । जिस समय किसी काम के लिए हम " यह काम करेंगे " इत्यादि रूप से इरादा करते हैं । बस उस इरादे को - जो कि दृढ़ है - " ऋतु " कहते हैं । कर्त्ता की जो श्रध्यवसायात्मिका प्रवृत्ति है उसे ही ऋतु कहते हैं । " हम यह करें " इत्यादि स्वरूप युक्ता जो कर्म्मप्रवृत्ति हमारे पास आती है अर्थात् ' यह करें ' यह इरादा चूंकि हमारे पास प्रांता हैं- प्रर्थात् उत्पन्न होता है प्रतएव ऋतु को " मित्र " कहा जाता है । आने वाली वस्तु का नाम ही - वैदिकपरिभाषा में " ऋतु " है । यह प्रवृत्ति जब अध्यवसाय में अर्थात् कार्य रूप में परिणत होतीं है तो इसको दक्ष कहने लगते हैं । बस इसी दक्ष को प्रकृत में " प्रयुक् " कहा है । प्रवृत्ति को ऋतु कहते हैं एवं अध्यवसाय को वरूणं कहते हैं इसीलिए " ऋतुदक्षौ वा मित्रावरुणौ " - यह कहा जाता है । इसी क्रतुदक्ष का अर्थात् ' आकूतिप्रयुक् ' का स्वरूप बतलाती हुई श्रुति कहती है-" स यदेव मनसा कामयते - इदं मे स्यात्, इदं कुर्वीय इति स एव क्रतुः " अथ यदस्मै तत् समृध्यते स दक्षः । मित्र एव ऋतुः । वरुणो दक्षः ” । इस ऋतु दक्ष का विस्तृत विवेचन " अत्रिख्याति " के अनुवाद में देखना चाहिए । यहां कहना सिर्फ इतना ही है कि " मैं ऐसा करूँगा " " मैं यज्ञ करूँगा । यह अध्यवसाय जो दृढ संकल्प हैं- उसे ही श्राकृति कहते हैं एवं तदनुसार कार्य करना, संकल्प को कार्य्यं रूप में परिणत करने का नाम ही " प्रयुक् " है । बस इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं— " आकूत्यै प्रयुजेऽग्नये स्वाहा " इति । " अर्थात् आकृति एवं प्रयोग के लिए सम्पत्ति प्राप्त्यर्थं अग्नि के लिए स्वाहा है " । मन्त्र का यही अर्थ है । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यह यजमान यज्ञ से पहले " मया यज्ञं करिष्ये " यह आकूति करता है अर्थात् अध्यवसायात्मक दृढ़ संकल्प द्वारा यज्ञ का जो कुछ तत्त्व है उसे अपने आत्मा में रखता है अर्थात् खाली थोथा संकल्प ही नहीं करता अपितु प्रयोग की ओर लक्ष्य भी रखता है— [ १३८ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० १ ) शतपथ ब्राह्मण " वाऽग्रे कुवते ( कुवते ) - यजेयेति । तद्य-श्रौद्ग्रभण ब्राह्मण देवात्र यज्ञस्य ( तत्त्वमितिशेषः ) तदेवैतत् संभृत्यात्मन् कुरुते " ॥ ६ ॥
प्राकृति प्रयुक् के अनन्तर नम्बर आता है मेधा मन का । यज्ञ में खूब मन लगता है परन्तु यदि मेधा नहीं है तो भी सारा काम व्यर्थ है । संकल्प को सदा स्मरण रखने का नाम ही मेघा है । संकल्प किया गया था कि अपने को ये ये काम करने हैं परन्तु समय पड़ने पर सारा काम भूल गए । बस ऐसा नहीं होना चाहिए । यदि समय पर संकल्प को भूल गए तो भी कुछ नहीं है । संकल्प सदा स्थिर रहना चाहिए बुद्धि धाररंगवतो होनी चाहिए । ऐसी ही बुद्धि को " मेघा " कहते हैं- " धीर्धारणवती मेधा " - अर्थात् मन मेधायुक्त रहना चाहिए । यज्ञ में यही दूसरा सार भाग है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " मेधायं मनसेऽग्नये स्वाहा " मेधायुक्त मन से कार्य्यं की तरफ संलग्न होता है । कि " मैं यह करू " – यह करू " । तो बस इस मेधा में जो यज्ञ तत्व है उसे इकट्ठा करता है । अर्थात अपनी बुद्धि को मेधा से युक्त करता है— " मेधया वै मनसाऽभिगच्छति यजेयेति " ॥७ ॥
तीसरा तत्व है दीक्षा और तप । यह मन्त्र बोल मात्र दिया जाता है । इसकी आहुति देने की कोई श्रावश्यकता नहीं है । " श्रन्वेवैतदुच्यते, नेत्तु हूयते " " - — इस मंत्र का तात्पर्य यही है कि यदि संकल्प भी हढ़ है एवं धारणा भी अच्छी है, परन्तु काम करने की इच्छा नहीं है, तप नहीं है अर्थात् प्राणव्यापार नहीं है । आलस्य ही में आनन्द आता है यह भी नहीं होना चाहिए ॥ ८ ॥
चौथा तत्त्व है सरस्वती और पूषा । वाक् ही को सरस्वती कहते हैं एवं वाक् ही यज्ञ है । पर-मेष्ठी समुद्र ' सरस्वान् कहते हैं । यह ग्राम्भृणी वाक् वहीं उत्पन्न होती है । सरस्वान् की पुत्री है अतएव " वाग्बे सरस्वती " कहा गया है । पानी से ही यज्ञ शुद्ध होता । यज्ञ का पहला स्वरूप पानी है अतएव " वाग्यज्ञ: " ' कहा गया है एवं पुष्टि को ही पूषा कहते हैं । पार्थिव पशु प्रारणाधिष्ठाता प्रारण का नाम ही पूषा है । उपकरण सामग्री को ही पूषा कहते हैं । अन्न - सम्पत्ति वगैरह का नाम ही पशु है । इसी से ही पुष्टि होती है । इसी का देवता है पूषा चूंकि पूषा " पुष्टि वें पूषा " " पुष्टिः पशव " । पुरोडाश एवं अजादि पशु बिना यज्ञ नहीं होता अतएव " पशवो हि यज्ञः " कहा गया है । इन दोनों में जो यज्ञ सम्पत्ति है वही इकट्ठी करता है । तात्पर्य इसका यही है कि यज्ञ में मन्त्र का - जैसा कायदा है उसी उच्चावच स्वर से बोलना चाहिए । यदि जरा भी गड़बड़ हो गई तो यज्ञ भ्रष्ट हुआ । इसीलिए तो " कुष्टः शब्दः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह । स वाग्वज्रो यजमान हिनस्तियथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् " - यह कहा गया है । इसीलिए यज्ञ में सरस्वती की ओर अर्थात् मन्त्र की ओर भी ध्यान रखना परम् आवश्यक है । एवमेव यज्ञ में जो - जो सामग्री चाहिए उसे पहले इकट्ठी कर लेनी चाहिए । उपकरण सामग्री के अभाव में भी यज्ञ नष्ट हो जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-[ १३६ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण औद्ग्रभण ब्राह्मण " तद्यदेवात्र यज्ञस्य तदेवैतत् संभृत्यात्मन् कुरुते " ॥९ ॥
इस प्रकार ( १ ) दृढ संकल्प ( आकृति ), प्रयुक्, ( २ ) मेघायुक्त मन ( ३ ) तप युक्त दीक्षा एवं ( ४ ) मन्त्र और उपकरण सामग्री - यदि यह सामग्री है तो सिद्धान्त समझो - तुम्हारा यज्ञ पूरा हो ही जायगा । बस इन सम्पत्तियों को आत्मसात् करने के लिए ही यह पूर्वोक्त प्रोग्रभण होम किया जाता है । यहां पर वादी पूर्वपक्ष करता है कि " यह जो अग्नि में तुम आहुतिएं डालते हो वह सर्वथा अप्र-त्यक्ष है- प्रसुर है- अप्रतिष्ठित है - अदेवक है अर्थात् देवता इन्द्र, सोम और अग्नि ही हैं । प्रयुक्, आकृती वगैरह देवता थोड़े ही हैं एवं आहुति दी जाती है देवता के लिए, ऐसी हालत में बिना देवता के नाम लिए जो तुम आहुति देना व्यर्थ है, अर्थात् सोमयज्ञ में प्रौद्भण होम करना अशुद्ध है । इसी पूर्वपक्ष को दिखलाते हुए कहते हैं— " तदाहुः नद्धेवैता आहुतयो हूयन्तेऽप्रतिष्ठिता देवकाः तत्र नेन्द्रो न सोमो नाग्निरिति ॥ १० ॥
" इसीका स्पष्टीकरण करते हुए कहते हैं कि " श्राकूत्यै प्रयुजेऽग्नये स्वाहा " । इनमें इन्द्र - सोम-अग्नि इन तीनों में से एक भी तो देवता को ' उद्देश्य ' नहीं बनाया गया है जिससे कि तुम्हारी आहुति एं प्रतिष्ठित मानली जायें- " नात्र एकं चन " । इसीका खण्डन करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि एक भी देवता नहीं है, इसलिए आहुतिएं अप्र-तिष्ठित हैं । तुम्हारा यह कहना एक दम सार शून्य है । क्या तुम्हें " अग्नये " - यह अग्नि देवता नहीं दीखता? मन्त्र में अग्नि सर्वथा स्फुट तथा प्रतिष्ठित है । - " श्रग्निर्वा " । श्रद्धेवाग्निः प्रतिष्ठितः । तो बस जो कि यह यजमान इस अग्नि में " श्रग्नये " कह कर आहुति डालता है उससे इसकी सारी अद्धा है अतएव वे प्रतिष्ठित हैं । - " स यदग्नौ जुहोति तेनैवेता श्रद्धा तेन प्रतिष्ठिता " । मेरी आहुतिएं अग्नि में आहित हो जाएं, अर्थात् प्रतिष्ठित हो जाएं । इसलिए यह यजमान सारे मन्त्रों में " अग्नये स्वाहा'-" अग्नये स्वाहा " बोलकर के ही आहुति डालता है । चूंकि इसकी ये प्राहुतिएं अग्नि में प्राहित होती हैं-प्रतिष्ठित होती हैं अतएव इन यजुमन्त्रों को " अधीतयजु " कहते हैं-" तस्मादु सर्वास्वेव अग्नये स्वाहेति जुहोति । तत एतान्याधीतयजूंषीत्याचक्षते " ॥११ ॥
पूर्वोक्त मन्त्रों के अर्थ का स्पष्टीकरण करते हैं-“ प्राकूत्यै प्रयुजेऽग्नये स्वाहा " . वह यजमान पहला " यजेय " इत्यादि रूप से ग्रात्मा से यज्ञ का निश्चय करता है एवं उस संकल्प को आत्मा में रख कर उसका प्रयोग करता है अर्थात् जो कुछ वितान ( कर्म्म ) करता वह संकल्पानुसार [ १४० ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण औद्ग्रभण ब्राह्मण ही करता है । इस प्रकार से प्राकृती और प्रयुक् अर्थात् ऋतु और दक्ष दोनों देवता इसके आत्मा में बैठ जाते हैं, ग्राहित हो जाते हैं ॥ १२ ॥
एवमेव मेधा युक्त मन से - " यजेय " - इस संकल्प की ओर अभिमुख होता है । इससे मेधा और मन यह दोनों देवता आहित हो जाते हैं ॥१३ ॥
एवं वाक् ही सरस्वती है । वाक् ही यज्ञ है । इस प्रकार यह दोनों देवता ग्राहित हो जाते हैं । इस कर्म्म में जो कि यह देवता इस यजमान के आत्मा में आहित हो जाते हैं - अतएव इन प्रौद्-ग्रभण मन्त्रों को " अधीत यजुः " नाम से व्यवहृत करते हैं— " 1 " तद्यदस्यैताऽश्रात्मन्देवताऽप्राधीता भवन्ति तस्मादाधीत यजूंषि नाम " ॥१४ ॥
इस भण होम में ५ आहुतिएं दी जाती हैं । इनमें से अब तक तीन आहुति बतलादी गई । ' प्राकूत्यै प्रयुजेऽग्नये स्वाह " - यह पहली प्राहुति है । " मेघायै मनसेऽग्नये स्वाहा " – यह दूसरी प्राहुि है एवं " सरस्वत्यैणेऽग्नये स्वाहा " -- यह तीसरी आहुति है । सरस्वत्यै के पूर्व एवं मेधाय के अनन्तर दोनों के बीच में ' दीक्षायै तपसेऽग्नये स्वाहा ” – यह मन्त्र बोल मात्र दिया जाता है । इससे प्राहुति नहीं दी जाती है । आहुति कुल तीन ही होती है इसीलिए " दीक्षायै तपसेऽग्नये स्वाहा " इसके लिए याज्ञवल्क्य स्वयं कहते हैं- " अन्वेवैतदुच्यते नेत्तु हूयते ” । कहने का तात्पर्य यही है कि तीन आहुतिएं हो चुकी अब चौथी का हवन करते हैं-" अथ चतुर्थी जुहोति " । हुति निम्नलिखित मन्त्र से डाली जाती है— " आपो देवीबृहतीविश्वशं भुवो । द्यावापृथिवीऽउरोऽअन्तरिक्ष । बृहस्पतये हविषा विधेम स्वाहा " । बृहतः, आपोदेवीः, विश्वशंभुवः । द्यावा पृथिवी उरो अन्तरिक्ष । बृहस्पतये हविषा विधेम । बृहती जो आपो देवी है अर्थात् पानी देवता हैं वे संसार का कल्याण करने वाले हैं । वह द्यावापृथिवी है एवं विशाल अन्तरिक्ष है । हम बृहस्पति के लिए आहुति प्रदान करते हैं । प्रत्येक वस्तु में आत्मा, पद और पुनः पद यह तीन विभाग रहते हैं । इन तीनों में से पुनः पद को " महिमा " भी कहा जाता है । इसी महिमा को साममण्डल भी कहते हैं । आप एक वस्तु को सामने रख दीजिए और उस पर नजर डालिए । समीप से वह जितनी बड़ी दिखलाई देगी - दूर जाने पर सही [ १४१ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मरण श्रौद्ग्रभरण ब्राह्मण वस्तु छोटी दिखलाई पड़ने लगेगी । यही नहीं - प्रपितु ज्यों - ज्यों आप दूर हटते जायेंगे त्यों - त्यों वह वस्तु छोटी होती जायगी । यहां तक कि कोई सीमांत ऐसा आवेगा जहां पर वह एक बिंदु - मात्र दीखने लगेगी । बस जिस स्थान पर आप खड़े हुए उसे एक बिन्दु मात्र देख रहे हैं वहीं खड़े रह कर, वस्तु को केन्द्र में रख कर व्यासार्धं से उतनी ही दूर कर एक मण्डल बना डालिए । उस चौतरफ के सर्किल पर जो भी कोई मनुष्य खड़ा होगा उसे वह वस्तु बिन्द्वात्मक ही दीखेगी । बस इसे ही साममण्डल कहते हैं । यह मण्डल भीतर - भीतर छोटे बनते जाते हैं । अन्त में केन्द्र में जाकर यह साममण्डल बिन्द्वात्मक रह जाता है । ठीक इसके विपरीत उस वस्तु के केन्द्र में से सूच्यग्र मुख बनाती हुई वर्गमूल के कारण तीन-तीन बिन्दु कम होती हुई जो अग्नि है वह ऋक् कहलाती है । पदार्थ का प्रत्यक्ष होना इसी ऋक् का धर्म है इसलिए " ऋङ्गमतिमंण्डलं साम " – यह कहा जाता है । उस साम बिन्दु पर चारों श्रोर खड़े होने वाले को वह वस्तु समान दीखा करती है अतएव इसे साम कहते हैं । उतना इसके सर्किल के बीच का “ ऋक् ” समान रूप से रहता है प्रतएव इसे साम कहा जाता है । इसीलिए " ऋचा समं मेने " – यह कहा जाता है । यह साम मण्डल प्रत्येक पदार्थ में होता है । आत्मा, पद और पुनः पद यह एक अणु से अणु में भी हैं - महान से महान में भी हैं । सारे पदार्थों में साम रहता है । परन्तु पदार्थ भेद से साम में अन्तर हो जाता है । जो पार्थिव पदार्थ है उसके साम का नाम " रथन्तर साम " है एवं सोर पदार्थों के साम का नाम " बृहत् साम " है । एक पुस्तक की बजाय दीपक का साम बड़ी दूर तक जाता है । उस पुस्तक का साम मण्डल दीपक के बृहत् साममण्डल के बीच में आजाता है । बात वास्तव में सच है । नाहरगढ़ पर रक्खे हुए दीपक को हम अच्छी प्रकार से देख लेते हैं । परन्तु वहीं पर यदि पुस्तक रखदी जाय तो किसी को न दीखे । इसी प्रकार बृहत् साम और रथन्तर साम का भेद स्पष्ट मालूम हो जाता है । अक्षर - क्षर विशिष्ट ( प्रकृति विशिष्ट ) पुरुष प्रजापति के शरीर के स्वयंभू, परमेष्ठि, सूर्य्य, चन्द्र, पृथिवी, यह पांच अवयव हैं । इनमें उत्तरोत्तर उत्तरोत्तर सम्बन्ध है | चांद पृथिवी के साम के पेट में है । पृथिवी चन्द्रमा को लिए हुए सूर्य के बृहत्साम के पेट में है एवं चन्द्रमा और पृथिवी को अपने साम में लिए हुए ससाम सूर्य्य परमेष्ठि के साम के पेट में है एवं इन सबको अपने पेट में लिए ससामपरमेष्ठि, स्वयंभू मण्डल के साम के पेट में है । पृथिवी से १३ हजार गुगा छोटी मानी जाती है एवं सूर्य वृत्त बडा माना जाता है । यह तो उस सू - पिण्ड की अवस्था है । भला उसके साम का तो कहना ही क्या है । ससाम सूर्य्य मण्डल में पृथिवी की हैसियत ही कितनी सी हैं । बस साम सहित पृथिवी की जो स्थिति सूर्य के बृहत् साम के अन्तर्गत है वही दशा परमेष्ठि मण्डल में रासाम सूर्य की । महाविशाल पारमेष्ट्य समुद्र में बृहत् सामसहित सूर्य्य एक बुबुद के समान है । इसीलिए परमेष्ठि मण्डल के लिहाज से में सूर्य्य को बुद्बुद् बतलाया जाता है । चूंकि परमेष्ठि का साम बृहत् साम से भी बे - अन्दाज बृहत् है एवं इसी मण्डल का नाम है— “ नापो मण्डल ” । बस इसी रहस्य को बतलाने के लिए " श्रापो देवीः बृहतीः " यह कहा गया है । [ १४२ ]