Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 161–170

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 161–170

पृष्ठ 161

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 161 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण औद्ग्रभण ब्राह्मण संसार में अग्नि और सोम यह दो ही तत्त्व सारा काम करते हैं । सोम की जब अग्नि में ग्राहुति पड़ती है तो उसीसे सारे संसार का निर्माण होता है । सोम ही घन, तरल, विरल भेद से अप् - वायु-सोम तीन स्वरूपों में परिणत हो जाता है । एवमेव अग्नि ही घन तरल विरल भेद से अग्नि वायु आदित्य तीन स्वरूपों में परिणत हो जाता है । श्रप् - वायु- सोम इन तीनों को ही " भृगु " शब्द से कहा जाता है । एवं प्रग्निवायु- श्रादित्य इन तीनों को " श्रङ्गिरा " शब्द से कहा जाता है । बस इस भृगु की अङ्गिरा में हरसमय आहुति पड़ा करती है । इसी सोम को, जिसे कि हम घनावस्थापेक्षया पानी भी कह सकते हैं, शान्ति- घर्मा कहा जाता है । शान्ति करने का काम इसी पानी का है । अग्नि का स्वभाव है विशकलन करना, अतएव अग्नि अशान्तिधर्म्मा कहा जाता है । ' पानी ' अग्नि की उस विशकलन शक्ति का दमन कर डालता है अतएव यह शान्ति प्रदाता कहलाता है । जरा आपका हाथ अग्नि से जल जाय, पानी की पट्टी बांध दीजिए, उसी समय हाथ में शांति आ जायगी । इसीलिए श्रुति में बार- बार “ शान्तिरापः " -यह कहा जाता है । शान्ति का कारण एकमात्र पानी ही है । सोकर उठने पर प्रांखों में जलन होती रहती है । जरा पानी लगा लीजिए । जलन शान्त । आप थके हुए कहीं से आए है । पानी से स्नान कर लीजिए - अशान्ति दूर | पानी समीक्रिया कर देता है - प्रवृद्ध अग्निताप को शान्त कर देता हैं । समीक्रिया ही को तो शान्ति कहते हैं । उद्यास ही को अशान्ति कहते हैं । समुद्र में करोड़ों - करोड़ों ही नहीं असंख्यों पानी के परमाणु रहते हैं परन्तु सब अपने - अपने स्थान में अविरोधेन स्थिर हैं । सब में समीक्रिया है - इसी का नाम शान्ति है । समीक्रिया धर्म वाला यह पानी ही विश्व का कल्याण करता है । इसमें जो तरी ( ठंडक ) है वह वह परमेष्ठि मण्डल की वस्तु है । पानी मिले हुए वायु को ही " पारमेष्ठ्य वायु " कहते हैं । पार-मेष्ठ्य पानी वायु स्वरूप है चूंकि इसमें जल मिला रहता है अतएव इसे साम्ब सदाशिव कहते हैं । यही कल्याण करने वाला है । पानी के इसी प्राकृतिक शान्ति धम्मं को बतलाने के अभिप्राय से " विश्व -शंभुव: " कहा गया है । अपि च पानी ही सबसे पहले पैदा होता है एवं यही सारे लोकों का निर्माण करता है । " सर्वमापोमयं जगत् " हमारे साइंस का यही सिद्धान्त है । इस व्यापकता को बतलाने के लिए ही " विश्वशंभुवः " कहा गया है । इस पानी में ही पृथिवी अन्तरिक्ष और द्यौ स्वरूपिणी रोदसी त्रिलोकी का निर्माण होता है । इसी बात को बतलाने के लिए " द्यावापृथिवी उरो अन्तरिक्ष " - यह कहा गया है । इस परमेष्ठि मण्डल के अन्त में एवं द्युलोक के ऊपर बृहस्पति रहते हैं । बीच में सूर्य है । उनके नीचे पृथिवी - चन्द्रमा है एवं ऊपर परमेष्ठि और स्वयंभू है । स्वयंभू और परमेष्ठि का नम्बर पहले आता है अतएव वे " प्रथमजा " कहलाते हैं । उनके अन्त में अर्थात् परमेष्ठि के अन्त में ब्रह्मवीर्य्य प्रदाता बृहस्पति का नक्षत्र है जो कि परमेष्ठि के चारों ओर परिक्रमा लगाया करता है । उसीके लिए " बृहस्पतये हविषा विधेम स्वाहा " कहा गया है । बृहस्पति उन पूर्वजों के प्रथमजों के ( स्वयम्भू तथा परमेष्ठि के ) अन्त में है एवं इन्द्र ( सूर्य्य ) उत्तरों के ( पृथिवी - चन्द्रमा के ) पहले है । इसमें निम्नलिखित श्रुति ही प्रमाण है-[ १४३ ]

पृष्ठ 162

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 162 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण औग्रभरण ब्राह्मण " बृहस्पतिः पूर्वेषामुत्तमो भवति इन्द्र उत्तरेषां प्रथमः " इसीका स्पष्टीकरण करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं " आपोदेवी बृंहतीविश्वशंभुवः " । यह ऋचा यज्ञ के बिल्कुल नजदीक है । अर्थात् यह ऋचा साक्षात् यज्ञस्वरूप का ही वर्णन करती है— " एषा ह नेदीयो ( या - उ - ) यज्ञस्य " क्यों यह ऋचा यज्ञ के अत्यन्त समीप है - इसका कारण बतलाते हुए वे स्वयं कहते हैं- यह ऋचा पानी का जिकर कर रही है । पानी ही तो यज्ञ का साक्षात् स्वरूप है— " अपां हि कीर्त्तयति - आपो हि यज्ञः " । तात्पर्य्य इसका यही है कि सृष्टि दो प्रकार की होती है, मैथुनी और मानसी । जो प्राण - सृष्टि है उसे मानसी - सृष्टि कहते हैं । भूत - सृष्टि को मैथुनी सृष्टि कहते हैं । मैथुनी सृष्टि जिस कायदे से होती है उसी कायदे को यज्ञ कहते हैं । अग्नि में जब सोम की प्राहुति पड़ती है तभी मैथुनी सृष्टि होती है । परमेष्ठी मण्डल से ऊपर स्वयम्भू मण्डल है । इसी स्वयंभू मण्डल को प्राण मण्डल कहते हैं । गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द रहित प्रसंग जो एक निराकार मौलिक तत्त्व है उसे ही प्रारण कहते हैं । इन्हीं प्राणों को " ऋषि " कहते है । सृष्टि दो के मेल से होती है । जब योषा वृषा का परस्पर मेल होता है तभी सृष्टि होती है । इसीलिए कहा जाता है--" द्वयोः परस्परं योगः संसृष्टिः सृष्टिरुचयते " प्रारण है असंग । वह मिलने वाला पदार्थ नहीं, अतएव प्रारण मण्डल अर्थात् स्वयम्भू मण्डल सृष्टि यज्ञ के बाहर की चीज है । यज्ञ का प्रारम्भ पानी से होता है अर्थात् सोम से ही होता है । सोम अग्नि में मिल जाता है । अङ्गिरा में भृगु की आहुति हो जाती है । इसी आहुति से आगे की सारी सृष्टिएँ उत्पन्न होती है । सोम और अग्नि जिन्हें कि हम योषा वृषा कहते हैं । दोनों के मेल से तीसरी वस्तु उत्पन्न होती है । कहने का तात्पर्य यही हैं कि यज्ञ का प्रारम्भ परमेष्ठी मण्डल से है । पैदाइश की शुरुआत पानी से होती है इसीलिए परमेष्ठि मण्डल को ' जनत् - लोक ' भी कहा करते हैं । ' जनत् ' यही इसका असली नाम है । आज इसी जनत् को जन - लोक कहा जाता है । पैदाइश इसी लोक से होती है । इसीलिए तो यह ' जनल्लोक ' कहलाता है । इस सोमयाग द्वारा हमें अग्नि में सोम की आहुति डालकर दिव्यात्म प्रजनन क्रिया करनी है । प्रजनन क्रिया स्वरूप प्राकृतिक यज्ञ का मूल पानी है । पानी ही यज्ञ का स्वरूप है । इसीलिए इस प्राकृतिक यज्ञ सम्पत्ति को मन्त्र शक्ति द्वारा आत्मसात् करने के लिए " आपो देवी " इत्यादि ऋचा से बृहस्पति के लिए आहुति दी जाती है । इस यज्ञ से पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ का निर्माण होता है । [ १४४ ]

पृष्ठ 163

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 163 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ० १ ) शतपथ ब्राह्मण औद्ग्रभरण ब्राह्मण जिसे कि हम ' रोदसी ' त्रिलोकी नाम से व्यवहृत किया करते हैं । हमारा शरीर प्रात्मा इसी रोदसी से सम्बन्ध रखता है । यज्ञ का मूल यद्यनि आपोमण्डल है, परन्तु हमारा आत्मयज्ञ इसी रोदसी में ब्याप्त है । हम पहले रोदसी को जब कब्जे में कर लेंगे तब उस सोम के अधिकारी होंगे जो कि परमेष्ठी मण्डल में रहता है । इसी बात को बतलाने के लिए " द्यावा पृथिवी उरो अन्तरिक्ष " यह कहां गया है । एक बात — और दूसरा " द्यावा " यह कहने का तात्पर्य भी है कि उस यज्ञ से पहले बनाकर - यह समाप्त हो सकता है यज्ञ का स्वरूप बतला दिया तो उस अग्नि सोमात्मक यज्ञ से बना क्या? यह प्राकांक्षा बनी रहती है । उसी आकांक्षा को पूरा करने के लिए वेद भगवान् त्रिलोकी की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि जिस पर तुम बैठे हु वह पृथिवी, एवं यह विशाल अन्तरिक्ष अर्थात् आकाश, एवं यह द्युलोक जहां पर कि सूर्य तप रहा है ये तीनों लोक उसी यज्ञ से तो बने हैं । इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं— " द्यावा- पृथिवी उरो अन्तरिक्षेति - लोकानां हि कीर्तयति " मन्त्र का तीसरा हिस्सा है " बृहस्पतये हविषा विधेम स्वाहा ” इसका अर्थ करते हुए भगवान याज्ञवल्क्य कहते हैं कि ब्रह्म ही को बृहस्पति कहते हैं । यह ब्रह्म ही तो साक्षात् यज्ञ का स्वरूप है । ब्रह्म मौलिक तत्त्व का नाम है । मायाबलादि पाप्माओं ( बलों ) के कारण ब्रह्म के समन्वय से ही यज्ञ होता है एवं यज्ञ से ही सारी सृष्टि होती है । ब्रह्म यद्यपि अमृत स्वरूप है । अतएव सर्वथा असंग है । तथापि समन्वय से प्रसंग रहता हुआ भी ब्रह्म सृष्टि जर्रे जर्रे में सर्वत्र व्याप्त रहता है । समन्वय से संचार क्रम से ब्रह्म ही जगत् बन जाता है । इसीलिए ब्रह्म तो असंग है । उससे जगत् उत्पन्न हो ही कैसे सकता है । इस प्रश्न के उत्तर में भगवान् बादरायण कहते हैं " तन्तुसमन्वयात् " ( शां ० मू ० प्र ० प्र ० सूत्र ३ ) बादरायण कहते हैं कि समन्वय से वही ब्रह्म जगत् स्वरूप में परिणत हो जाता है अतएव हम श्रवश्य को " यज्ञ " ही ब्रह्म " कह सकते हैं । इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं— " बृहस्पतये हविषा विधेम स्वाहेति ब्रह्म वै बृहस्पतिः । ब्रह्म यज्ञः " । ब्रह्म, यज्ञ और यज्ञ से उत्पन्न होने वाली सृष्टि, इन तीनों के अलावा और है ही क्या? ब्रह्म मौलिक तत्त्व है । यज्ञ यौगिक तत्त्व है । लोक यज्ञ से उत्पन्न होने वाले हैं । भला मन्त्रशक्ति द्वारा जब इन तीनों के पास अपने मन - प्राण - वाक् स्वरूप शरीर आत्मा को पहुंचा दिया जाय तो फिर यज्ञ - सफलता में कसर ही क्या रहती है । यह ऋचा तो यज्ञ के प्रत्यन्त ही नजदीक है अर्थात् यज्ञ सम्पत्ति को प्रात्मसात् करवाने वाली है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " एतेन ( ३ ) हैषा नेदीयो यज्ञस्य " ब्रह्म, लोक और यज्ञ तीनों में प्रधान मौलिक तत्वस्वरूप बृहस्पति ही हैं अर्थात् ब्रह्म ही है । अतएव " बृहस्पतये हविषा विधेम स्वाहा " यह कहा गया है अर्थात् आहुति बृहस्पति के नाम से दी गई है । [ १४५ ]

पृष्ठ 164

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 164 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ० १ ) शतपथ ब्राह्मण औद्ग्रभरण ब्राह्मण पूर्वोक्त चारों आहुतिएँ स्रवा से दी जाती है । इतना और समझ लेना चाहिए एवं साथ ही में इतना और समझ लेना आवश्यक होगा कि पहले की जो प्राहुतिएं हैं वे " प्राकूत्यै प्रयुजे " केवल इनसे दी जाती हैं, अतएव उनके द्वारा यज्ञ का साक्षात् स्वरूप आत्मसात् नहीं होता है एवं यह चौथी प्राहुति " आपोदेवी बृहती " इस गायत्री मन्त्र से दी जाती है । अग्नि और सोम दोनों की मिश्रित अवस्था का नाम यज्ञ है । केवल अग्नि और केवल सोम तो यज्ञ का प्रङ्ग है न कि यज्ञ का साक्षात् स्वरूप । अतएव चौथी आहुति से भी यज्ञ का साक्षात् सम्बन्ध नहीं होता है । इसके साक्षात् स्वरूप सम्पादन के लिए ही यह पांचवी आहुति दी जाती है । ॥ १५ ॥

इसी पांचवी आहुति के विषय में कहते हैं- चौथी आहुति के अनन्तर जिस पाँचवी आहुति की चि से आहुति डाली है वही आहुति यज्ञ का साक्षात् स्वरूप है । इस पांचवी आहुति से ही साक्षात् यज्ञ आत्मसात् हो जाता है— " अथ यां पञ्चमीं चा जुहोति सा हैव प्रत्यक्षं यज्ञः ' 1 पांचवी ही आहुति प्रत्यक्ष यज्ञ का स्वरूप कैसे है? यह बतलाते हैं । प्रत्येक देवता की मात्रा नियत रहती है । कोई कितनी मात्रा से अपना स्वरूप कायम रखता है कोई कितनी से । इन भिन्न - भिन्न संस्था वाले देवताओं की जो कि वाक् स्वरूप हैं - लहर चारों ओर व्याप्त रहती है । सबकी लहर परिमित है । सीमाबद्ध है । सौर प्राण लहर का नाम ही देवता है । स्वर इसी सूर्य की वस्तु है, एवं क - च - ट - त - प इत्यादि इस पृथिवी की चीज है । इस प्राकृतिक प्राणयुक्त स्वर स्वरूप प्राण देवता को पकड़ने के लिए - आत्मसात् करने के लिए क - च - ट - त - प इस अनुष्टुप् वाक् में इसी लहर के अनुरूप उच्चावच स्तर सहित मन्त्र का प्रयोग करना पड़ता है । बस इस लहर से उस प्राण - लहर की कड़ी जुड़ जाती है । यही प्राधिदैविक प्राण देवता का अध्यात्म देवता के साथ सम्बन्ध होना है । अग्नि देवता अष्टावयव है अतएव उसके लिए गायत्री छन्द ही बोलना पड़ता है । तभी अग्नि पकड़ में आती है । यदि स्वर में जरा भी गड़-बड़ हो जाती है । तो अच्छे की बजाए सर्वनाश होने की नौबत आ पहुंचती है । इसीलिए तो —

" स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह ।

" स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्र शत्रुः स्वनोपराधात् ॥

यह कहा गया है । प्रकृत में कहना यही है कि प्रजापति की मात्रा इतने पर जाकर ( ३२ पर जा कर ) समाप्त होती है अतएव उसके लिए ३२ अक्षर युक्त अनुष्टुप छन्द का ही प्रयोग करना पड़ता है । अनुष्टुप छन्द से प्रजापति आत्मसात् हो जाते हैं । प्रजापति ही तो यज्ञाधिष्ठाता है । प्रजापति ही तो यज्ञ का साक्षात् स्वरूप है । बाक् ही को अनुष्टुप कहते हैं । वाक् ही यज्ञ का साक्षात् स्वरूप है । वाक् से अभिप्रेत है वषट्कार मण्डल । वषट्कार ही को - जो कि ३३ तक जाता है, ' वाक् मण्डल " कहते हैं । इसके केन्द्र में प्रजापति रहते हैं । प्रजापति को अनुष्टुप द्वारा आत्मसात् कर लेने पर उसी से बंधा हुआ वषट्कार स्वरूप यज्ञ ( वाग् यज्ञ ) श्रात्मसात् हो जाता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर याज्ञवल्क्य कहते है: -[ १४६ ]

पृष्ठ 165

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 165 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( अ ० १ ) शतपथ ब्राह्मण श्रग्रभरण ब्राह्मण इस पांचवीं प्राहुति को अनुष्टुप् छन्द से डालता है । अनुष्टुप् ही वाक् है अर्थात् अनुष्टुप् ही प्रजा-पति है एवं प्रजापति के आधार पर ही सारे वाङ्मंडल का वितान होता है । इस प्रकार अनुष्टुप् से आहुति देना साक्षात् यज्ञ भगवान् को आत्मसात् करना है—

" अनुष्टुभा हि तां जुहोति । वाग्ह्यनुष्टुप् । वाग्धि यज्ञः " ॥ १६ ॥

ध्रुवा में घृत रक्खा रहता है । इसी में से स्रवा द्वारा स्र ुचि में घृत लेकर आहुति दी जाती है । अब तक इस ध्रुवा में से घृत ले के चार ग्राहुतियाँ दी जा चुकी हैं । अब पाँचवीं दी जायगी । उसके विषयमें कुछ विशेष बतलाने के अभिप्राय से कहते हैं— दीक्षणीयेष्टि सम्बन्धी जो घृत ध्रुवा में बाकी बच गया है - उसे पाँचवीं प्राहुति के लिए जुहू में ले लेता है । इस प्रकार यह एक अवदान ( ग्रास ) हो जाता है । इसके बाद आज्यस्थाली में से ( जिस पात्र में घृत को गरम करके तपाया जाता है उस पात्र को प्रज्यस्थाली कहते हैं । ) स्रवा से उस ध्रुवा के घृतयुक्त जुहू में तीन बार डालता है । अर्थात् ध्रुवा से एक बार जुहू में घृत देना चाहिए एवं प्राज्यविला-पिनी से स्र ुचि द्वारा तीन बार घृत लेकर उह घृतयुक्त जुहू में और डाल देना चाहिए । इस प्रकार से प्रजा-पति देवताक श्रवदान “ चतुरक्त " ( ४ ग्रास युक्त ) हो जाता है-श्रथ यद् ध्रु वायामाज्यं परिशिष्टं भवति तज्जुह्वामानयति । त्रिः स्रवे-णाज्यविलापिन्या श्रधिजुह्वां गृह्णाति " । हमने बतलाया है कि स्रं वा से प्राज्यस्थाली में से तीन बार घृत लेकर जुहू में डाला जाता है । इन तीनों बार में जो तीसरी बार स्रवा में घृत लिया जाता है उसे पूरा भर लिया जाता है एवं पूरा भर-कर उस भरे हुए स्रवा को ही जुहू पर रख दिया जाता है— श्रथ यत् तृतीयं गृह्णाति तत् स्रुवमभिपूरयति " इसी अभिप्राय से सूत्रकार कहते हैं-" जुह्वां धौवमा सिच्य द्विश्व स्थाल्याः स्त्रवेण तृतीयं स्त्रवमभिपूरयति "

( का ० श्री ० सू ० ७।३।१६ ) ॥१७ ॥

क्यों पाँचवीं आहुति दी जाती है - इसकी उत्पत्ति बतला चुके । श्रब पद्धति बतलाते हैं— वह यजमान निम्नलिखित अनुष्टुप् मन्त्र से पाँचवीं प्राहुति देता है— " स जुहोति – “ विश्वो देवस्य नेतुर्मर्त्तो बुरीतसख्यम् । विश्वो राय इषु-यति द्युम्नं वृणीत पुष्यसे स्वाहा " । [ १४७ ]

पृष्ठ 166

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 166 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ० १ ) शतपथ ब्राह्मण औद्ग्रभण ब्राह्मण यह मन्त्र सविता ही प्रेरयिता है अतएव उसी के लिए यह आहुति दी जाती है । परन्तु चूंकि छन्द अनुष्टुप् है अतः प्रजापति देवता का भी सम्बन्ध हो जाता है । “ विश्वमर्त्तः ( सर्वे मनुष्याः ) नेतुर्देवस्य ( सवितुर्देवस्य ) सख्यं ( सहा-यतां ) वुरीत ( इच्छन्ति ) । विश्वमतः राय इषुध्यति ( प्रार्थयते ) एवं ( विश्व -मर्त्तः ) पोषाय द्युम्नं वृणीते " । संसार के यावन्मात्र मनुष्य सविता देवता की सहायता चाहते हैं । बात वास्तव में ठीक है । जड़ और चेतन सबका अधिष्ठाता वही सविता तो है । हमारे पास जो भी पदार्थ आते हैं वे सविता की प्रेरणा से ही तो आते हैं । सूर्य से हमारा श्रात्मा बनता । उसी की ज्योति से हमारी स्थिति रहती है परन्तु इसको भी तो प्रेरित कर हमारे में शामिल करने वाला सविता देवता ही है । भला ऐसे की सहायता कौन नहीं चाहेगा । एवं सारे मनुष्य उससे घन की इच्छा किया करते हैं । सब यही चाहते हैं कि सविता देवता हमें दौलतमन्द बनावें एवं सब के सब पुष्टि के लिए उस सविता से द्युम्न अर्थात् तेज की प्रार्थना करते हैं । न तेज बृहस्पति का तेज है । उसी ब्रह्मवर्चस की कामना की जाती है । इस प्रकार यह यजमान परोक्षभाव से स्तुति करता हुआ खुद इन सम्पत्तियों को चाहता है । यज्ञ इसके पास आ भी गया और यदि सविता की प्रेरणा नहीं हुई तो सारा काम व्यर्थ है । अतएव अन्त में सविता की स्तुति करते हैं ॥१८ ॥

इसी मन्त्र की प्रकारान्तर से प्रशंसा करते हैं । यह देवताओं से पङ्क्ति हो जाती है । अर्थात् यद्यपि अर्थ इसका पूर्वोक्त ही है । परन्तु शब्दों द्वारा यह ऋचा पाँच देवताओं के कारण " पङ्क्ति " हो जाती है । " संषा देवताभिः पङक्तिर्भवति " । “ विश्वोदेवस्य ” - इस से वैश्वदेव का ग्रहण हो जाता है । १ एवं नेतु - यह सवितु है - २ मतबुरीत -यह मित्र देवता का संकेत है - ३ द्युम्नं वृणीत - बार्हस्पत्य है । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि ' द्युम्न ' बृहस्पति के

तेज कारी नाम है - " द्युम्नं हि बृहस्पतिः " । एवं पुष्यसे यह पौष्ण है ॥ १ ॥

इस प्रकार यह ऋचा पाँच देवताओं के शामिल रहने के कारण पवित सम्पत्ति युक्त हो जाती है । एक सम्वत्सर में पाँच ऋतुएं होती हैं एवं सम्वत्सर ही को कहते हैं यज्ञ, इसीलिए " पाक्तो यज्ञः " अश्व, गो, अवि, अज भेदेन यह कहा जाता है । इस प्रकार पञ्चर्तु सम्बधेन यज्ञ भी पाङ्कत है एवं पुरुष, पशु भी पाँच ही हैं । बस इन पाँचों देवताओं की जो " पक्ति " हो जाती है । इस पङ्क्ति युक्त ऋचा सें से यह यजमान सम्वत्सर - यज्ञ को एवं पशु सम्पत्ति को प्राप्त हो जाता है— “ पाङक्तो यज्ञः । पाङ् क्तः पशुः । पञ्चर्तवः सम्वत्सरस्य एतमेवैतया-नोति यद्देवताभिः पङक्तिर्भवति ॥२० ॥

[ १४८ ]

पृष्ठ 167

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 167 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( अ ० १ ) शतपथ ब्राह्मण औद्ब्रभण ब्राह्मणं पूर्वोक्त मन्त्र पर एक पूर्वपक्ष होने वाला है अतएव उसका पुनः स्मरण दिलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं-" तां वा अनुष्टुभा जुहोति । वाग्वा अनुष्टुप् । वाग् यज्ञः । तद् यज्ञं प्रत्यक्षमाप्नोति ॥२१ ॥

यहाँ पर कई एक आचार्य कहते हैं - श्रद्भरण होम में एक ही आहुति का हवन करें एवं उसे एक बार घृत से पूर्ण करके अग्नि में डाले । सर्व ही को तो पूर्ण कहते हैं । इस प्रकार ऊपर तक घृत से जुहू को लबालब भर कर आहुति देने से केवल एक मात्र प्राहुति से यह यजमान सारी सम्पत्ति को प्राप्त कर लेता है । जिस कामना के लिए यजमान चारों आहुतिएं और डालते हैं, उन सब कामनाओंों को इस एक ग्राहुति द्वारा प्राप्त कर लेता है । पूर्णाहुति के जिस समय स्रवा को भरे उसी समय स्रवा से होम न करके आज्य से स्र ुचि को भरले, अर्थात् स्रुचि को ही पूर्ण भरकर आहुति दे देनी चाहिए । पूर्णाहुति क्रम में स्रवा से आहुति देने की आवश्यकता नहीं है— " तदाहुः एतामेवैकां जुहुयात् । यस्मै कामायेतरा हूयन्ते एतयैव तं काममाप्नोति इति ( वदन्तः ) - तां वै यद्येकां जुहायात् पूर्णा जुहुयात्सर्वं वै पूर्णम् सर्वमेवैनयै तदाप्नोति । प्रथयत् स्त्रवमभिपूरयति - त्र चं तदभिपूरयति । तां पू जुहोति । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यह मत बतला मात्र दिया है । वास्तव में यजमान पाँचों ही से आहुति देता है -" अन्वेवैतदुच्यते सर्वास्स्वेवहूयन्ते " ॥ २२ ॥

इस पांचवीं को अनुष्टुप् छन्द से प्राहुत करता है यद्यपि अनुष्टुप् चन्द ३२ अक्षर का होता है । परन्तु निम्नलिखित सम्पत्ति प्राप्त्यर्थ ३१ अक्षर का ही छन्द बोला जाता है । ३१ भी सख्यम् के स्थान में- " सखियम् ” बोलने से होती है । एक अक्षर कम हो गया । इससे तो छन्दोभङ्ग हो गया इस श्रम में नहीं पड़ना चाहिए | वैदिक परिभाषानुसार एक अक्षर से, अथवा दो अक्षर की कमी से छन्द नहीं बिगड़ा करता, जैसा कि श्रुति कहती है-" नैकेनाक्षरेण छन्दान्सि वियन्ति न द्वाभ्याम् " । बतलाना प्रकृत में हमें यही है कि यह ऋचा अनुष्टुभ् छन्द वाली होती हुई ३१ अक्षर की है । १० अङ्ग ुली पैरों की हैं, १० हाथों की हैं एवं १० प्राण हैं एवं ३१ वां आत्मा है जिसमें कि ये सारे प्राण प्रतिष्ठित हैं । बस इतना हो पुरुष का स्वरूप है । पुरुष ही यज्ञ है । पुरुष ही यज्ञ कैसे हैं? इसका कारण बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यज्ञ पुरुष सम्मित है । [ १४६ ]

पृष्ठ 168

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 168 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मरंग प्रौद्ग्रभण ब्राह्मण जितनी मात्रा यज्ञ की होती है उतनी ही मात्रा पुरुष की होती । वाक्मण्डल को यज्ञ कहते हैं । अग्नि ही को यज्ञ कहते हैं! यह अग्नि ही वसु ( ८ ) रुद्र ( ११ ) आदित्य ( १२ ) भेद से ३१ स्वरूपों में परिणत हो जाता है । बस इन ३१ अक्षरों के छन्द से प्राहुति देता हुआ यह यजमान उस प्राकृतिक यज्ञ सम्पत्ति को प्राप्त कर लेता है ॥ इति तृतीयकाण्डे प्रथमाध्याये श्रीभण - ब्राह्मणं उपरतम् ॥। समाप्तश्चायं शतपथ ब्राह्मण तृतीयकाण्डे प्रथमाध्यायः ॥ [ १५० 1

पृष्ठ 169

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 169 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अथ द्वितीयाध्याये प्रथमं ब्राह्मणम् ' कृष्णा जिनदीक्षा ' [ मूल ] - दक्षिणेनाऽऽहवनीयं प्राचीनग्रीवे कृष्णा जिनेऽउपस्तृणाति । तयोरेनमधि दीक्षयति यदि द्वे भवतस्तदनयोर्लोकयो रूपं तदेनमनयोर्लोकयोरधि दीक्षति ॥ १ ॥

सम्बद्धान्ते भवतः । सम्बद्धान्ताविव होमो लोको त समुते पश्चाद्भ-भवतस्तदिमावेव लोकौ मिथुनीकृत्य तयोरेनमधि दीक्षयति || २ || एकं भवति । तदेषां लोकानां रूपं तदेनमेषु लोकेष्वधि दीक्षयति यानि शुक्लानि तानि दिवो रूपं यानि कृष्णानि तान्न्यस्यै यदि वेतरथा यान्न्येव बनणीव हरीणि तान्न्यन्तरिक्षस्य रूपं तदेनमेषु लोकेष्वधि दीक्षयति ॥३ ॥

अन्तकमु तहि पश्चात् प्रत्यस्येत् । तदिमानेव लोकान् मिथुनीकृत्य तेष्वेनमधि दीक्षयति ॥४ ॥

. अथ जधनेन कृष्णाजिने पश्चात् प्राङ जान्वान्क उपविशति । स यत्र शुक्लानां च कृष्णानां च सन्धिर्भवति तदेवमभिमृश्य जपत्यृक्सामयोः शिल्पे स्थऽइति यद्वै प्रतिरूपं तच्छिल्पमृचां च साम्नां च प्रतिरूपेस्थ इत्येवंतदाह ॥५ ॥

' ते वामारभ ' इति । गर्भो वा एष भवति यो दीक्षते स छन्दांसि प्रविशति तस्मान्न्यन्काङ्ग लिरिव भवति न्यन्काङ्ग लय इव हि गर्भाः ॥६ ॥

स यदाह । ते वामारभइति ये वाम्प्रविशामीत्ये वैतदाह ' ते मा पातमास्य यज्ञस्योहच ' ऽइति ते मा गोपायतमास्य यज्ञस्य संस्थायाऽइत्ये-दाह ॥ ७ ॥

प्रथ दक्षिणेन जानुनारोहति । शम्र्माऽसि शर्म मे यच्छेति चर्म्म वा S एतत् कृष्णस्य तदस्य तन्मानुषं शर्म देवत्रा तस्मादाह शम्र्मासि शर्म मे [ १५१ ]

पृष्ठ 170

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 170 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मणं कृष्णाजिनदीक्षा यच्छेति नमस्तेऽस्तु मा मा हिंसीरिति श्रेयांस वाऽएष उपाधिरोहति यो यज्ञं यज्ञो हि कृष्णाजिनं तस्माऽएवैतद्यज्ञाय निह्न ुते तथो हैनमेष यज्ञो न हिनस्ति तस्मादाह नमस्तेऽस्तु मा मा हिसीरिति ॥८ ॥

सवै जघनार्द्ध इवैवाऽग्र ग्रासीत । श्रथ यदग्रएव मध्य उपविशेद्य S एनं तत्राऽनुव्या हरेद् द्रप्स्यति वा प्र वा पतिष्यतीति तथा हैव स्यात् तस्माज्ज-घनार्द्ध इवैवाग्रासीत ॥ ९ ॥

श्रथ मेखलां परिहरते । श्रङ्गिरसो ह वै दीक्षिता नबल्य मविन्दतेनाऽन्यद् व्रतादशनमवाऽकल्पयंस्त एतामूर्ज्जमपश्यन्त्समाप्ति तां मद्धयत श्रात्मन ऊर्जं मदधत समाप्ति तथा समानुवँस्तथो ऽएवैष एतां मद्धयत श्रात्मन ऊर्जं धत्ते समाप्ति तथा समाप्नोति ॥१० ॥

सा वंशाणी भवति । मृद्धय सदिति न्वेव शारणी यत्र वै प्रजापति-रजायत गर्भो भूत्त्वैतस्माद्यज्ञात्तस्य यन्नेदिष्ठमुल्ब मासीत्ते शरणास्तस्मात्त ' पूतयो वान्ति यद्वस्य जराय्वासीत्तद्दीक्षितवसनमन्तरं वा उल्बं जरायुणो भवति तस्मादेषाऽन्तरा वाससो भवति यथैवाऽतः प्रजापतिरजायत गर्भो भूत्वैतस्माद्यज्ञा-देवमेवैषोऽतो जायते गर्भो भूत्वैतस्माद् यज्ञात् ॥११ ॥

सावै त्रिवृद्ध भवति त्रिवृद्धयन्नं पशवो ह्यन्नं पिता माता यज्जायते तत्तृतीयं तस्मात्रिबृद्भवति ॥ १२ ॥

मुञ्जवत्शेनान्वस्ता भवति । वज्रो वै शरो विरक्षस्तायं स्तुकासगं सृष्टा भवति सा यत् प्रसलवि सृष्टा स्याद्यथेदमन्या रज्जवो मानुषी स्याद्यद्व-पसलवि सृष्टा स्यात् पितृदेवत्या स्यात्तस्मात् स्तुकासगं सृष्टा भवति ॥ १३ ॥

तां परिहरते । उर्गस्याङ्गिरसीत्यङ्गिरसो ह्यतामूर्जमपश्यन्नूर्णादा ऊर्ज मयि धेही ' ति नात्र तिरोहितमिवास्ति ॥ १४ ॥

श्रथ नीविमुद्ग़हते । सोमस्य नीविरसीत्यदीक्षितस्य वा ऽग्रस्यैषाऽग्रे नीविर्भवत्यथाऽत्र दीक्षितस्य सोमस्य तस्मादाह सोमस्य नीविरसीति ॥१५ ॥

[ १५२ ]