Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 171–180

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 171–180

पृष्ठ 171

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 171 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिन दीक्षा अथ प्रोर्णुते । गर्भो वाऽएव भवति यो दीक्षते प्रावृता व गर्भा उल्बेनेव जरायुणेव तस्माद्वै प्रोर्णुते ॥१६ ॥

स प्रोर्णुते । विष्णोः शम्र्मासि शर्म यजमानस्येत्युभयं वा एषोऽत्र भवति यो दीक्षते विष्णुश्च यजमानश्च यदह दीक्षते तद्विष्णुर्भवति यद्यजते तद्य-जमानस्तस्मादाह विष्णोः शम्र्मासि शर्म यजमानस्येति ॥ १७ ॥

अथ कृष्णविषारणाँ सिचि बध्नीते । देवाश्च वा असुराश्चोभये प्राजा-पत्याः प्रजायतेः पितुर्छायमुपेयुर्म्मन एव देवा उपायनुवाच मसुरा अमूमेव देवा उपायन्निमामसुराः ॥१८ ॥

ते देवा यज्ञमन ुवन् । योषा वाऽइयं वागुममन्त्रयस्वह्वयिष्यते वै त्वेति स्वयं वा हैवैक्षत योषा वाऽइयं वागुपमन्त्रयै ह्वयिष्यते वै मेति तामुपाऽमन्त्रयत साहास्मारकादिवैवाग्र ग्रासूयत् तस्मादु स्त्री पुंसोपमन्त्रितारकादिवैवाग्रे ऽसूयति स होवाचारकादिव वै मयासूयीदिति ॥१९ ॥

ते होचुः । उपैव भगवो मन्त्रयस्वं ह्वमिष्यते वै त्वेति ता मुपामन्त्रयत साहास्मै निपालाशमिवोवाद तस्मादुस्त्रीपुंसोपमन्त्रिता निपलाशमिवैव वदति स होवाच निपलाशमिव वै मेवादीदिति ॥। २० ॥ ते होचुः । उपैव भगवो मन्त्रयस्व ह्वयिष्यते वै त्वेति तामुपाऽमन्त्रयत सा हैनं जुहुवे तस्मादु स्त्रीपुमांसं ह्वयन्त एवोत्तमं स होवाचाऽह्वयन्त वै मेति । २१ । ते देवा ईक्षाञ्चक्रिरे । योषा वाऽइयं वाग्यदेनं न युवितेहैव मा तिष्ठ-तमभ्येहीति ब्रूहि तां तु न आगतां प्रतिप्रबूतादिति सा हैनं तदेव तिष्ठन्तम-भ्येयाय तस्मादु स्त्रीपुमांसं संस्कृते तिष्ठन्तमभ्यैति तां हैभ्य श्रागतां प्रतिप्रोवा-चेयं वा प्रागादिति । २२ । तां देवाः । असुरेभ्योऽन्तरायंस्तां स्वीकृत्याग्नावेव परिगृह्य सर्वहुत-मजुहवुराहुतिहि देवानां स यामेवामूमनुष्टुभाजुहवस्तदेवनां तद्देवाः स्वयकुर्वत तेऽसुराऽप्रात्तवचसो हेऽलवो हेऽलव इति व्वदन्तः पराबभूवुः ।२३ । [ १५३ ]

पृष्ठ 172

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कण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मणं कृष्णाजिन दीक्षा तत्रैतामपि वाचमृदुः । उपजिज्ञास्यां स म्लेच्छस्तस्मान्न ब्राह्मणो म्ले-च्छेदसुर्य्या हैषा वा वागेवमेवैष द्विषतां सपत्नानामादत्ते वाचन्तेऽस्यात्तवचसः पराभवन्ति य एवमेतद्वेद ॥ २४ ॥

सोऽयं यज्ञो वाचमभिदध्यौ । मिथुन्येनया स्यामिति तां सम्बभूव ॥ २५ ।

इन्द्रो ह वा ईक्षाञ्चक्रे । महद्वा ऽहतोऽभ्वं जनिष्यते यज्ञस्य च मिथुनाद्वाचश्च यन्मा तन्नाभिभवेदिति स इन्द्र एव गर्भो भूत्वैन्मिथुनं प्रविवेश ॥२६ ॥

स ह संवत्सरे जायमान ईक्षाञ्चक्रे । महावीर्या वा ऽइयं योनिर्या मामदीधरत यद्वे मेतो महदेवाभ्वं नानुप्रजायेत यन्मा तन्नाभिभवेदिति ॥। २७ ॥ तां प्रतिपरामृश्यावेष्ट्याच्छिनत् । तां यज्ञस्य शीर्षन् प्रत्यदधाद्यज्ञो हि कृष्णः स यः स यज्ञस्तरकृष्णाजिनं यो सा योनिः सा कृष्ण विषारगाथ यदेना मिन्द्र प्रवेष्ट्या च्छिन्नत्तस्मादावेष्टितेव स यथैवात इन्द्रोऽजायत गर्भो भूत्वैतस्मान्मिथुनादेव मेवैषोऽतो जायते गर्भो भूत्वंतस्मान्मिथुनात् ॥ २८ ॥

तां वा उत्तानामिव बध्नाति । उत्तानेव वै योनिर्गर्भ बिभर्त्यथ दक्षिणां व मुपर्युपरि ललाट मुपस्पृशतीन्द्रस्य योनिरसीतीन्द्रस्य ह्येषा योनिरतो वा ह्येनां प्रविशन् विशत्यतो वा जायमानो जायते तस्मादाहेन्द्रस्य योनि-रसीति ॥२ ९ ॥ थोल्लिखति । सुसस्याः कृषिस्कृधोति यज्ञ मेवैतज्जनयति यदा वै सुषमं भवत्यथालं यज्ञाय भवति यवो दुःषमं भवति न तह्यत्मिने च नालं भवति तद्यज्ञ मेवैतज्जनयति ॥ ३० ॥

अथ न दीक्षितः । काष्ठेन वा नखेन वा कण्डूयेत गर्भो वा एष भवति यो दीक्षते यो वै गर्भस्य काष्ठेन वा नखेन कण्डूयेदपास्यन् नित्येत्ततो दीक्षितः पामनो भवितोद्दक्षितं वाऽप्रानु रेतांसि ततो रेतांसि पामनानि जनितोः स्वा वै [ १५४ ]

पृष्ठ 173

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिनदीक्षा योनि रेतो न हिनस्त्येषा वाडएतस्य स्वायोनिर्भवति यत् कृष्णविषारणा तथो हैनमेषा न हिनस्ति तस्माद्दीक्षितः कृष्णविषाणयैव कण्डूयेत नान्येन कृष्ण-विषाणायाः ॥३१ ॥

प्रथास्मै दण्डं प्रयच्छति । वज्रो वै दण्डो विरक्षस्ता ॥ ३२ ॥

दुम्बरो भवति । अन्नं वाऽऊर्गुदुम्बर ऊर्जोऽन्नाद्य स्यावरुद्धचं तस्मादौदुम्बरो भवति ॥ ३३ ॥

मुखसम्मितो भवति । एतावद्वं वीर्यं स यावदेव वीर्यं तावांस्तद्भवति यन्नमुख सम्मितः ॥ ३४ ॥

तमुच्छ्रयति । उच्छ्रयस्व वनस्पतऽऊद्धवो मा पाह्यं हस श्रास्य यज्ञ-स्वोरच इत्यूर्द्ध वो मा गोपायास्य यज्ञस्य संस्थाया इत्येवैतदाह ॥ ३५ ॥

अत्र है । अंगुलीच न्यचन्ति वाचं यच्छन्त्यतो हि किञ्च न जपिष्यन् भवतीति वदन्तस्तदु तथा न कुर्य्याद्यथा पराञ्चं धावन्त मनुलिप्सेत तन्नानु-लभेतैवं ह स यज्ञं नानुलभते तस्मादमुत्रैवांगुलीर्न्यचेदमुत्र वाचं यच्छेत् ॥ ३६ ॥

अथ यदीक्षितः । ऋचं वा यजुर्वा साम वाभिव्याहरत्यभिस्थिरमभि-स्थिर मेवैतद्यज्ञमारभते तस्मादमुत्रैवाङ्ग लीन्यचेदमुत्र वाचं यच्छेत् ॥ ३७ ॥

अथ यद्वाचं यच्छति । वाग् वै यज्ञो यज्ञमेवैतदात्मन् धत्तेऽथ यद्वाचं मोव्याहरति तस्मादु हैष विसृष्टो यज्ञः पराङावर्त्तते तत्रो वैष्णवीमृचं वा यजुर्वा जपेद्यज्ञो वै विष्णुस्तद्यज्ञं पुनरारभते तस्यो हैषा प्रायश्चित्तिः || ३८ ॥ अथैकद्वदति । दीक्षितोऽयं ब्राह्मणो दीक्षितोऽयं ब्राह्मणइति निवे-दितमेवैनमेवसन्तं देवेभ्यो निवेदयत्ययं महावीर्य्यो यो यज्ञं प्रापदित्त्ययं युष्मा -कैकोऽभूत्तं गोपायतेत्येवैतदाह त्रिष्कृत्त्वऽग्राह त्रिवृद्धिः यज्ञः ॥३ ९ ॥ अथ यद् ब्राह्मण इत्याह । श्रनद्धेव वा स्यातः पुरा जानं भवतीदं ह्याहू रक्षांसि योषित मनुसचन्ते तदुत रक्षांस्येव रेते प्रादधतीत्ययात्रा द्वा [ १५५ ]

पृष्ठ 174

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णा नदीक्षा जायते यो ब्राह्मणो यो यज्ञाज्जायते तस्मादपि राजन्य वा वैश्य वा ब्राह्मण इत्येव ब्रूयाद् ब्राह्मणो हिजायते यो यज्ञाज्जायते तस्मादाहुर्न सवनकृतं हन्या-देनस्वी हैव सवनकृतेति ॥ ४० ॥

[ अनुवाद ] इसके पूर्ववर्ती ब्राह्मण में दीक्षाहुतियों का निरूपण किया जा चुका है । अब इस ब्राह्मण में कृष्णाजिन पर बैठकर यजमान को सोमयागानुष्ठान के अधिकार प्राप्त्यर्थं दीक्षा लेनी चाहिये इसका प्रतिपादन किया जा रहा है । यज्ञशाला में ग्राहवनीय कुण्ड, गार्हपत्य कुण्ड, तथा दक्षिणाग्नि कुण्ड भेद से तीन कुण्ड तीनों ग्रग्नियों के लिए बनाये जाते हैं । इनमें आहवनीय कुण्ड यज्ञशाला के पूर्व की और बनाया जाता है | यह वर्तुलाकार ( गोल ) होता हैं । गार्हपत्यकुण्ड यज्ञशाला के पश्चिम की ओर बनाया जाता है । यह चतुष्कोण होता है एवं दक्षिणाग्निकुण्ड यज्ञशाला के दक्षिण भाग में होता है और वह अर्धचन्द्राकार होता है । आहवनीय कुण्ड तथा गार्हपत्यकुण्ड के मध्य में वेदि होती है । ग्राहवनीयकुण्ड के दक्षिणभाग में मृग कृष्णमृगचर्मं के मस्तक भाग को पूर्व की ओर रखकर अध्वर्यु दो कृष्ण मृगचर्मों को विछाता है । इन दोनों मृगचर्मों पर यजमीन को बैठाकर उसे दीक्षित करता है, क्योंकि कृष्णमृगचर्म पर बैठकर यजमान दीक्षा ग्रहण करता है । ग्रतः इसे " कृष्णाजिनदीक्षा " शब्द से कहा गया है । यहां दो कृष्णमृगचर्मो को बिछाकर उन पर बैठकर दीक्षा लेना एक मत है, तथा एक मृगचर्म पर बैठ कर दीक्षा लेना दूसरा मत है । पहले प्रथम मत का निरूपण कर रहे हैं । [ वह यजमान दो कृष्णमृगचर्मो पर बैठकर दीक्षा क्यों लेता है इसकी उपपत्ति बतलाते हुए ' याज्ञवल्क्य ' कहते हैं कि, दो कृष्ण मृगचर्म पृथिवीलोक तथा द्युलोक रूप हैं, अर्थात् दो कृष्णमृगचर्मों पर बैठना पृथिवीलोक तथा द्युलोक पर बैठकर दीक्षा ग्रहण करना है । अर्थात् वह द्यावा - पृथिवी रूप दोनों लोकों से यजमानात्मा का सम्बन्ध करता है ॥१ ॥

दोनों कृष्णमृगचर्मो के पर्य्यन्त प्रदेश परस्पर सम्बद्ध होने चाहिये । क्योंकि पृथिवी-लोक तथा द्युलोक दोनों के पर्य्यन्त प्रदेश सम्बद्ध हैं । निवारण प्रदेश में अर्थात् खुले मैदान में खड़े होकर देखने पर द्युलोक के पर्य्यन्त प्रदेश पृथिवीलोक के पर्य्यन्त प्रदेशों से मिले हुए ही प्रतीत होते हैं अतः अधिदैवत के प्रतिकृतिरूप इस वैद्य यज्ञ में दोनों कृष्णमृग-चर्मों के पर्य्यन्त प्रदेशों को सम्बद्ध करके ही बिछाना चाहिए । दोनों मृगचमों के पश्चिम भाग को सूए से सीं देना चाहिए, जिससे वे अलग न हो सके । दोनों को सम्बद्ध करके उनके पृष्ठभाग को सूए से सीं देना चाहिए । पृष्ठभाग से सीने का तात्पर्य यह है कि दोनों कृष्णमृगचर्मों के माँसवाले प्रदेश सम्बद्ध तथा सिले हुए प्रतीत होवे न कि लोम वाले प्रदेश | इसीलिए कात्यायन ने कहा है - " आहवनीय दक्षिणेन कृष्णाजिनं मांससंहिते [ १५६ ]

पृष्ठ 175

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिन दीक्षा स्यूतान्ते तद्य॑तु पश्चादासञ्जनवती निदधाति ' ( का ० श्रौ ० सू ० ७ / ८३ ) आपस्तम्ब में भी ' अन्तर्मांसाभ्यां वहिलोमाभ्याम् ( प्रा ० श्री ० सूत्र १०।८।१२ ) ऐसा कहा है । दोनों कृष्ण-मृगचर्मों को सीं कर दीक्षा देता हुआ पृथिवी लोक व द्युलोक को सम्वद्ध कर उन सम्बद्ध लोकों पर ही यजमान को दीक्षित करता है । ॥२ ॥

प्रथम मत का प्रतिपादन कर अब एक कृष्णमृगचर्म को बिछाकर उस पर बैठकर दीक्षा लेनी चाहिए, इम मत का प्रतिपादन तृतीय काण्डका में किया जा रहा है । यह कृष्णमृगचर्म पृथिवी, अन्तरिक्ष व द्युलोक तीनों का रूप हैं । क्योंकि इस मृगचर्म में श्वेत, कृष्ण तथा भूरा तीन रंग हैं, वे ही तीनों लोक हैं । कृष्णमृगचर्म में श्वेतांग सूर्यलोक ( द्यु-लोक ) है क्योंकि सूर्य का प्रकाश श्वेतवर्ण होता है । कृष्णमृग का जो कृष्णवर्ण है वह पृथिवीलोक का स्वरूप है क्योंकि पृथिवी कृष्णवर्ण की है उससे कृष्णरश्मियां निकला करती हैं । दिन में सूर्य के श्वेत प्रकाश के कारण पृथिवी के वास्तविक रंग की प्रतीति नहीं होती किन्तु रात्रि में सूर्य - प्रकाश का प्रभाव होने से उस कृष्णवर्ण की प्रतीति स्पष्ट रूप से होती है अथवा प्रकारान्तर से मृगचर्म के जो कृष्ण रोम हैं वे द्युलोक हैं और श्वेत-वर्णं रोम पृथिवीलोक का रूप है । इसका कारण यह है कि सूर्य की रश्मियां श्वेतवर्ण की नहीं अपितु कृष्णवर्ण की हैं । इसलिए — “ आकृष्णेन रजसा वर्तमानों निवेशयन्नमृतं मर्त्यञ्च । हिरण्मयेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ॥ इस श्रुति में " कृष्णेन रजसा वर्तमानः " इस उक्ति के द्वारा सूर्य रश्मियां कृष्णवर्ण की हैं, यह स्पष्ट कहा है । सूर्य में जो श्वेत प्रकाश होता है उसका कारण कृष्णवर्ण सूर्य में कृष्णवर्ण सोम की की आहुति है । सोम भी कृष्णवर्ण है और सूर्य भी कृष्णवर्ण, किन्तु आग्नेय कृष्णवर्ण सूर्य में दा कृष्णवर्ण सोम की प्राहुति होने पर वह सोम प्रज्वलित हो जाता है । वही उसके श्वेत रूप की प्रतीति का कारण है । इस प्रकार से भी सूर्य ही श्वेत रंग का हुआ न कि पृथिवी । तथापि पृथिवी के तरफ ४८ कोस तक एमूष वराह वायु का स्तर है । वह वायु सोमात्मक है । उसका जब आग्नेय कृष्णवर्णा- सौर रश्मियों से सम्बन्ध होता है तब वह एमूष वराहरूप सोम जल उठता है । उसी का यह श्वेत प्रकाश है किन्तु वह वायुस्तर पृथिवी का है अतः पृथिवी से उस श्वेतवर्ण का सम्बन्ध है । पृथिवी दूरातिदूर वर्तमान सूर्य के साथ उसका सम्बन्ध नहीं हो पाता । इस अभिप्राय से कहा है कि मृगचर्म में श्वेतरोम हैं, वे ही शुक्लरूपा पृथिवी का रूप है तथा कृष्णवर्ण रोम, कृष्णवर्ण द्युलोक के रूप हैं । [ १५७ ]

पृष्ठ 176

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिन दीक्षा “ यदि वेतरथा, यान्येव कृष्णानि तानि दिवो रूपम् यानि शुक्लानि तान्यस्यै । ” कृष्ण व श्वेतवर्णों के मध्य में अर्थात् सन्धिस्थान में चो मृगचर्म के रोम हैं वे भूरे वर्ण के या हरितवर्ण के हैं । वे ही रोम अन्तरिक्ष लोक का रूप है । इस प्रकार एक मृगचर्म पर यज-मान को बैठाता हुआ अध्वर्यु निदानविघया त्रैलोक्य से सम्बन्ध करा देता है । अर्थात् उपर्युक्त रीति से एक कृष्णमृगचर्म पक्ष में यजमान को त्रैलोक्य सम्पत्ति प्राप्त हो जाती है ॥३ ॥

एक कृष्णाजिन पक्ष में तीनों लोकों के परस्पर सम्बद्धताभाव को बतलाने के लिए मृगचर्म के पश्चिम भाग के अन्तिम प्रदेश को संकुचित कर के, दोहरा कर लेना चाहिए । इसी अभिप्राय से कात्यायन ने कहा है – “ एकं चेत् पश्चात् पाद द्विगुणम् " । इस रीति से

तीनों लोकों का परस्पर सम्बन्ध कर उस बैठाकर अध्वर्यु यजमान को दीक्षित करता है ।

अतः पृथिव्यादि तीनों लोकों की सम्पत्ति का यजमान से सम्बन्ध हो जाता है ॥ ४ ॥

यजमान दोनों कृष्णमृगचर्मों के पश्चात् भाग से पूर्व की ओर मुख कर दाहिने जानु को संकुचित कर अर्थात् ऊपर उठाकर बैठे । पश्चात् कृष्णमृगचर्म के कृष्ण व शुक्ल रोमों की जो सन्धि है उसका स्पर्श करके निम्न मन्त्र का उच्चारण करता है । “ ऋक्सामयोः शिल्पे स्थः " कृष्णमृगचर्म के कृष्ण व श्वेत लोम ऋक् और साम के प्रतिरूप शिल्प में स्थित हैं । अपूर्व तथा प्रतिरूप भेद से शिल्प दो प्रकार का है । पर-मेश्वरस्थित से सृष्टि से भिन्न वस्तु का निर्माण अपूर्व शिल्प कहलाता है जैसे पुस्तक, मकान, रेल, तार आदि । किन्तु ईश्वरस्थित सृष्टि की नकल पर पदार्थ का निर्माण प्रति-रूप शिल्प कहलाता है । जैसे ईश्वर रचित सिंह, गज आदि की नकल पर सिंह गजादि के चित्र का निर्माण | कृष्ण मृगचर्म के कृष्ण व श्वेत लोम ऋक् और साम के प्रतिरूप शिल्प हैं । क्योंकि ऋक् का वर्ण शुक्ल है तथा साम का वर्ण कृष्ण, जैसा कि तैत्तिरीय श्रुति बतला रही है— “ एष वा ऋचो वर्णो यच्छुक्लं कृष्णाजिनस्य, एष साम्नो यत् कृष्णम् " और कृष्ण-मृगचर्म में जो कृष्ण लोम हैं वह साम का तथा श्वेत लोम का रूप है । अतः कृष्ण मृगचर्म के श्वेत व कृष्ण लोम ऋक साम के प्रतिरूप हैं ॥ ५ ॥

पश्चात् " ते वामारभे " अर्थात् मैं आप दोनों में प्रवेश करता हूं, जो कि दीक्षा ग्रहण करता है वह ऋक् सोम का गर्भस्वरूप होता है । यज्ञ द्वारा जो नवीन दिव्यात्मा बनता है । वह द्युलोक व पृथीवीलोक के उदर में रहता है । कृष्णमृगचर्मरूप द्यावा पृथिवी के मध्य में बैठा हुआ यह यजमान छन्दों में प्रविष्ट होता है । वयोनाध अर्थात् सीमाभाव का नाम छन्द है | अतः यजमान संकुचितांगुलि होकर ही कृष्णमृगचर्म पर बैठता है क्योंकि गर्भ संकु-चितावयव ही रहता है क्योंकि गर्भस्थ प्राणी हस्त, पाद आदि अवयवों को समेटे हुए, [ १५८ ]

पृष्ठ 177

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तृतीय काण्ड ( ० १ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिनदीक्षा मस्तक को उदर की ओर झुकाकर ही रहता है क्योंकि यह दीक्षा लेने वाला यजमान भी द्यावापृथिवीरूप ऋक् साम का गर्भ है अतः वह भी संकुचितावयव होकर ही कृष्ण-मृगचर्म पर बैठता है ॥६ ॥

दीक्षा ग्रहण करता हुआ यजमान " ते वामारभे " यह मन्त्र बोलता है । इसका तात्पर्यं यह है कि मैं आपमें गर्भरूप से प्रवेश कर रहा हूं । पश्चात् " ते मा पातमास्म यज्ञस्योद् ऋचः ” यह मन्त्रशेष बोलता है । अर्थात् हे! द्यावा पृथिवी यज्ञ समाप्ति तक आप मेरी रक्षा करें यही अर्थ " तेमा पातमास्य यज्ञस्योद् ऋचः ” का है ॥७ ॥

इसके बाद दाहिने जानु से कृष्णमृगचर्म पर प्रारुढ़ होता है और निम्न मन्त्र का उच्चारण करता है । “ शर्मासिशर्म मे यच्छ " इति । हे कृष्णमृगचर्मं, तुम शर्म हो, मुझे सुख प्रदान करो । तात्पर्य्य यह है कि जो लोकभाषा में चर्म कहा जाता है वह देवताओं में शर्म कहलाता है । क्योंकि इससे हमें सुख मिलता है । यह चर्म देहाभ्यन्तरवर्ती आन्तरिक मांस मज्जा, रक्त आदि की रक्षा करने वाला है और इस प्रकार सुख प्रदानकर्ता होने से शर्म कहा जाता है । देवता परोक्षप्रिय होते हैं । अतः चर्म को परोक्ष भाषा में शर्म कहा है । पश्चात् " नमस्तेऽस्तु मा मा हिंसी " इस मन्त्र शेष का उच्चारण करता है । अर्थात् यजमान कृष्णमृगचर्म पर बैठकर जो उसका अपराध करता है उसके लिए क्षमा याचना करता हुआ यजमान कहता है कि आपको नमस्कार है । मैं जो आपके ऊपर बैठ गया हूं उसके लिए आप मेरी हिंसा न करें । यद्यपि मृगचर्म अचेतन है तथापि उसे अधिष्ठातृदेवता सर्वत्र व्यापक चैतन्य के उसमें भी रहने से उसके लिए चेतन की तरह मुझे मत मारो । यह कहना सर्वथा संगत है । लोक में जड़ चेतनव्यवस्था या चेतना चेतन व्यवस्था, चैतन्य की सत्ता या उसके अभाव के कारण नहीं है अपितु इन्द्रियों की सत्ता तथा इन्द्रियों के अभाव के कारण ही मानी गई है इसलिए महर्षि चरक ने-“ सेन्द्रियं चेतनं द्रव्यं निरीन्द्रियमचेतनम् ” के द्वारा सेन्द्रिय द्रव्य को चेतन तथा इन्द्रिय रहित द्रव्य को अचेतन बतलाया गया है मृगचर्म चैतन्य की सत्ता के कारण चेतन है अतः उससे मुझे मत मारना - यह प्रार्थना करना सुसंगत है । इसी मन्त्र की व्याख्या करते हुए याज्ञवल्क्य लिखते है कि यज्ञ में दीक्षा ग्रहण करने वाला यजमान यज्ञस्वरूप मृगचर्म पर सवार होकर अपनी अपेक्षा श्रेष्ठ यज्ञ पर आरूढ़ हो रहा है । अतः उस अपराध के लिए वह यज्ञरूप कृष्णाजिन से क्षमा प्रार्थना करता है कि आप मुझे न मारे || ८ || कृष्णमृगचर्मं पर आरुढ़ वह यजमान कृष्णाजिन के पीछे के भाग पर अर्थात् पश्चिम के आधे भाग पर पहले आसीन होवे । यदि कृष्णाजिन के अग्रभाग अर्थात् पूर्वभाग में या मध्यभाग में बैठेगा आगे बढ़ने न पायेगा । क्योंकि स्थान ही नहीं रहेगा । यज्ञ द्वारा दिव्यात्मा [ १५६ ]

पृष्ठ 178

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 178 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण को उत्पन्न कर यजमान गार्हपत्य रूप पृथिवीलोक से श्राहवनीय रूप दिव्यलोक में जाता है । यदि यजमान कृष्णमृगचर्म के पूर्वार्धभाग में या मध्यभाग में बैठेगा तो वह यज्ञ द्वारा मागे बढ़ने पर कृष्णमृगचर्म से पतित हो जायगा या कुत्सित गति को प्राप्त होगा । श्रुतः. प्रथम यजमान कृष्णमृगचर्म के पश्चिमार्धभाग पर ही बैठे । इसी अभिप्राय से कहा है “ तस्माज्जधनार्धं इवैवात्र श्रासीत ॥ ॥ कृष्णमृगचर्म के पश्चिमार्धभाग में आसीन होने के बाद यजमान अपने कटिस्थान में मेखला धारण करता है क्योंकि अग्निसोमात्मक यज्ञ में भोक्ता होने से भोग्य सोम की अपेक्षा अग्नि का ही प्राधान्य है । उस अङ्गिरारूप अग्नितत्त्व का साक्षात्कार करने वाले अङ्गिनों ने यज्ञ में दीक्षित होने के बाद बलप्रद अन्न को प्राप्त नहीं किया क्योंकि दीक्षा ग्रहण करने के बाद दीक्षित पुरुष आलस्यप्रद अन्य अन्नों का परित्याग कर सात्विक दुग्धरूप अन्न का ही सेवन करता है । दूध सात्विक तो है किन्तु उसमें इतना बल नहीं होता अतः दीक्षित निर्बल पुरुष प्रयास साध्य यज्ञ की समाप्ति पर पहुंचने में असमर्थ हो जाता है । अतः उन अङ्गिराम्रों ने सोचा कि आलस्यप्रद अन्न को छोड़कर अन्य कोई बलप्रद वस्तु प्राप्त की जाय जिससे यज्ञ की समाप्ति पर पहुंचा जा सके । सोचते - सोचते उन्होंने इसी बलप्रद मेखला को देखा । मेखला कमर में धारण की जाती है । कमर कसने पर मनुष्य में ऊर्क अर्थात् स्फूर्तिप्रद बल प्राप्त हो जाता है अतः उन्होंने शरीर के मध्यभाग कटि में बलप्रद समाप्ति ( मेखला ) को धारण किया । यज्ञ की समाप्ति बल पर निर्भर है और मेखला बलप्रद होने से यज्ञ की समाप्ति का साधन है अतः यहां मेखला को समाप्ति कहा गया है । सायणभाष्य के अनुसार “ सम्यगाप्यायते प्राप्यते वा बलमनया " - इस व्युत्पत्ति से बल प्राप्ति का साधन होने से मेखला को समाप्ति कहा गया है । इसी मेखला द्वारा बल प्राप्त कर यज्ञ की समाप्ति को अङ्गिरात्रों ने प्राप्त किया । उसी प्रकार आज यह दीक्षित यजमान इस बल प्राप्ति साधन व यज्ञ समाप्ति साधन मेखला को मध्यभाग में धारण करता है और उससे यज्ञ को समाप्त करता है ॥१० ॥

जो मेखला दीक्षित यजमान धारण करता है वह शण की बनी होनी चाहिए । क्योंकि शण की बनी हुई मेखला कोमल होती है वह शरीर में चुभती नहीं । क्योंकि यह दीक्षित यजमान द्यावापृथिवी में मध्य में गर्भ बना हुआ है । गर्भ प्रकृत्या कोमल होता है । अतः उसे कोमल शण की मेखला ही पहननी चाहिए । दूसरी बात यह है कि जीव प्रजापति स्त्रीशोणितरूप अग्नि में पुरुष के सोममय शुक्र हुति से पैदा होता है । अग्नि में सोम की आहुति का नाम यज्ञ है अतः यह यज्ञं से ही उत्पन्न होता है । यह जीवाप्रजापति मातृशरीर में गर्मी होता है । गर्भ गर्भी का अभेद होने से गर्भी जीव को यहां गर्भ शब्द से कह दिया गया है । इस गर्भ को चारों तरफ वेष्टित करने वाला उल्ब अर्थात् पतली झिल्ली रहती है । वह गर्भ के अत्यन्त संनिहित होती है । [ १६० ]

पृष्ठ 179

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 179 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णा जिनदीक्षा उसी पतली झिल्लीरूप उल्ब से शण बनता है । इसमें यही प्रमाण है कि गर्भ का परिवेष्टन करने वाला उल्ब गर्भ की मलिनता से दुर्गन्धयुक्त होता है । उसी प्रकार यह शण भी प्रति दुर्गन्धित होता है । गर्भ उल्ब से आच्छादित रहती है इसीलिए " स उल्बावृतो गर्भो भवति " ( ऐ ० ब्रा ० १।१।२ ) यह एतरेय श्रुति गर्भ को उल्ब से आवृत बतला रही है । इस गर्भ को आवृत करने वाला उल्ब जरायु ( जेर ) से आवृत होता है । अर्थात् जरायु के अन्दर रखा रहता है । यह जरायु उस उल्ब का वेष्टन करने वाला वस्त्र है । अतः यजमान वस्त्र के अन्दर इस उल्बरूप में विद्यमान मेखला को धारण करता है । क्योंकि यजमान प्राकृतिक यज्ञ की प्रकृतिरूप यज्ञ द्वारा दैवात्मा को उत्पन्न करने वाला है । अतः वह गर्भीभूत यज-मान गर्भ को वेष्टित करने वाले उल्ब के समान इस मेखला को धारण करते हैं तथा उसके ऊपर जरायु के समान दीक्षित यजमान के वस्त्र हैं ॥११ ॥

मेखला त्रिगुणात्मक होती है अर्थात् तीन डोरियों की बनी होती है । अन्न त्रिवृत् होता है । जिससे आत्मा का स्वरूप बनता है या आत्मा की स्वरूपरक्षा होती है । उसे अन्न कहते हैं । जो भोग्य होता है उसे पशु कहते हैं । प्रजापति भगवान् अन्न को आत्मसात् कर लेते हैं वह आत्मा का भोग्य है । अतः अन्न पशु कहलाता है । आत्मप्रजापति के अन्न माता-पिता तथा रससमष्टि ( देवसमष्टि ) आत्मा चिद्वस्तु या चेतना है जो कि स्वयंभू मण्डल की वस्तु है । उस चित् का आभास पारमेष्ठ्य प्रप्तत्त्व में हो पड़ता है वही चिदाभास जीव कहलाता है । पारमेष्ठ्य तत्त्व को ही अध्यात्म में महान् कहा है । इसी महान् में चित् का प्रतिबिम्ब पड़ता है उससे प्राणियों की उत्पत्ति होती है इसीलिए गीता में कहा है: -मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भ दधाम्यहम् संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत । सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ जिस पारमेष्ठ्य प्रप्तत्त्व में स्वायम्भुव चिदात्मा का प्रतिबिम्ब पड़ता है वह आप्य-त्तत्त्व आपः वायु सोम भेद से तीन प्रकार का है । अतः प्राप्य, वायव्य, सौम्य भेद से प्राणी तीन भागों में विभक्त हैं । अतः मनुष्य में शुक्रशोणित ही प्राप्यतत्त्व हैं । दोनों ही जल हैं । पुरुष में शुक्र जलीय तत्त्व है । स्त्री में शोणित जलीय तत्त्व है । वहां स्त्री का शोणित आग्नेय है तथा पुरुष का शुक्र सौम्य है । ग्रग्नि में सोमाहुति ही यज्ञ है । इस तरह शुक्र-शोणित का संयोग होने पर जीवात्मा की उत्पत्ति हो जाती है । क्योंकि उसमें स्वायम्भुव चिदात्मारूप बीज प्रतिष्ठित हो जाता है यहो जीवात्मा है । शुक्र और शोणित का सम्बन्ध माता - पिता से है अतः जीवात्मा स्वरूप सम्पादक तथा उसके स्वरूप के रक्षक शुक्ररूप पिता, शोणितरूप माता है । ये दोनों ही जीवात्मा के भोग्य होने से अन्नज [ १६१ ]

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 180 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( ० २ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिन दीक्षा पशुरूप हैं । जीवात्मा के गर्भ में आते ही सूर्य्य, चन्द्र, पृथिवी, नक्षत्र आदि के रस भी इसमें आने लगते हैं । यह रस समष्टि ही जीवात्मा का भोग्य होने से उसका तीसरा अन्न है । इस प्रकार माता, पिता, रससमष्टि तीनों ही जीवात्मा के अन्न हैं । माता - पिता शोणितशुक्र रूप सम्बन्ध होते हैं । सूर्य्यादि के रस स्वतः आते लगते हैं । अतः उस समष्टि को “ यज्जायते यत्तृतीयम् ” रूप से कहा है । प्रकृत में भी यज्ञ द्वारा दिव्यात्मा को उत्पन्न करना है । अतः जीवात्म प्रजनन के अनुसार यहाँ भी तीनों अन्नों की आवश्यकता है । इसलिए अन्नत्रय प्राप्त्यर्थ मेखला को त्रिगुरिणत डोरी से बनाया जाता है ॥१२ ॥

यह शण की बनी हुई मेखला मूंज की शाखा से अनुयुक्त होनी चाहिए । क्योंकि मूंज-शर ( सरकण्डे ) को कहते हैं और सरकण्डा वज्ररूप है । इस शररूप वज्र से राक्षस प्राणों का नाश हो जाता है जैसा कि तैत्तिरीय संहिता में कहा है । " इन्द्रो वृत्राय वज्र ं प्राहरत् स त्रेधा व्यभवत् । येऽन्तः शरान शीर्यन्त ताः शर्करा अभवन् । तच्छर्कराणां शर्करात्वं, वज्रो वै शर्करा: - इति ( तै ० सं ० ५-२-६-१०२ ) । शतपथ ब्राह्मण के हविर्यज्ञकाण्ड में भी " इन्द्रो ह यत्र वृत्राय वज्र प्रजहार स प्रहृत-श्चतुर्धाऽभवत् । तस्य स्फ्यस्तृतीयं वा यावद्वा । यूपस्तृतीयं वा यावद्वा । रथस्तृतीयं वा यावद्वा । अथ यत्र प्राहरन्तच्छकलोऽशीर्यत । स पतित्वा शणोऽभवत् । तस्माच्छरो नाम यदशीर्यत । एव मु स चतुर्धा वज्रोऽभवत् । ( श ० ब्रा ० १-२-४- १ ) । इन श्रुतियों से स्पष्ट है. कि शर ( पानी - मूंज ) वज्ररूप है अतः वह उल्बरूप मेखला के पूतिभाव ( दुर्गन्ध ) रूप राक्षसों के नष्ट करने में समर्थ हैं । इस मेखला को केशवेणी की तरह निर्माण करना चाहिए । अर्थात् इस मेखला को केशवेणी की तरह ग्रथित करना चाहिए न कि दक्षिणावर्त या वामावर्त रूप से । क्योंकि यदि इसको दक्षिणावर्त गूंथा जायगा तो इसमें मानुषभाव प्रजायगा क्योंकि मानुष कार्यों में रज्जु आदि को दक्षिणावर्त गूथा जाता है और मानुषभाव का समावेश देवकार्य में उचित नहीं है क्योंकि मनुष्य अनृतसंहित होते हैं और देवकार्यं सत्यसंहित होता है और यदि मेखला को वामावर्तरूप से गूथा जायेगा तो उसमें पितृभाव का समावेश होने से वह मेखला पितृ-देवत्या बन जायगी । देवदेवत्या नहीं रहेगी । अतः दोनों से बचने के लिए केशवेरणी की तरह मेखला का ग्रथन करना चाहिए ॥ १३ ॥

उस मेखला को " ऊर्जस्यांगिरस्यूर्णप्रदा ऊर्जं मयि धेहि " इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए धारण करना चाहिए । अर्थात् ऊ ( बलप्रदान करने वाली ) मेखला को अंगि-राम्रों ने सर्वप्रथम देखा था अर्थात् इसका आविष्कार किया था । अतः इस मेखला को

ङ्गिरसी मन्त्र से कहा गया है । हे मेखले, आप मेरे में बल का प्रधान कीजिए ॥ १४ ॥

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