Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 181–190
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 181–190
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तृतीय काण्ड ( ० २ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिनदीक्षा तत्पश्चात् यजमान मेखला की नीवी का “ सोमस्य नीविरसि " कहकर उपगूहन करता है, बांधता है । दीक्षा ग्रहण करने से पूर्व यजमान की नीवी अदीक्षित पुरुष की सामान्य नीवी थी किन्तु अब सोम याग के लिए दीक्षित पुरुष की नीवी सोममयी बन गई है । श्रतः " सोमस्य नीविरसि " ऐसा कहा गया है । इसके बाद जरायु स्थानीय वस्त्र से मस्तक को ढक लेता है क्योंकि जो दीक्षा लेता है वह गर्भी बनता है । गर्भ उल्ब ( गर्भ वेष्टन करते वाली पतली झिल्ली ) तथा जरायु से
वेष्टित रहता है अतः यह यजमान भी उसी प्रकार उल्बस्थानीय मेखला धारण करता है ।
तथा तदनन्तर उस वस्त्र से शिर को ढकता है ॥ १६ ॥
यजमान वस्त्र से शिर ढकता हुआ " विष्णोः शर्मासि शर्म यजमानस्य ' इस मन्त्र का उच्चारण करता है । अर्थात् यह दीक्षित पुरुष विष्णु और यजमान बन जाता । क्योंकि यह यज्ञ के लिए दीक्षा ग्रहण करता है । यज्ञ ही " यज्ञो वै विष्णुः ” इस श्रुति के अनुसार विष्णु है । अपि च यह दीक्षित पुरुष यजन करता है अतः यह यजमान बन जाता है ॥ १७ ॥
यजमान ने मस्तक को जिस वस्त्र से ढका है उस वस्त्र के अन्तिम भाग में वह काले हिरण का शृङ्ग बांधता है । देवता व असुर जो दोनों ही प्रजापति के पुत्र थे । उन्होंने पिता प्रजापति के दायभाग को प्राप्त किया । प्रकाशी प्रारण ही देवता हैं तथा तामस ( तमोमय ) प्राण असुर हैं । पार्थिव आग्नेय देवताओं का द्युलोक के देवताओं से सम्बन्ध ही यज्ञ है । इन पार्थिव देवताओं के साथ यजमान के मन, प्रारण वाग्रूप, आत्मविभूतियों का भी द्युलोक से सम्बन्ध हो जाता है । मन, वाक् आदि विभूतियां भी प्रजापति की सम्पत्ति है । यह देव व असुर दोनों में बंट जाती है । इनमें से मन को देवताओं ने प्राप्त किया और वाक् को असुरों ने प्राप्त किया । मन चन्द्रमा है । इसीलिए " चन्द्रमा वै मनो हृदयं प्राविशत् ” इस ऐतरेयोपनिषद् श्रुति द्वारा चन्द्रमा को ही अध्यात्म में मन बतलाया गया है । सोम की अग्नि हुति होती है अतः वह अग्नि का भोग्य है, अन्न है । एतद्वै सोमो राजा देवाना देवता आग्नेय है अतः सोम ( चन्द्रमा ) अन्न है । " एष वै सोमो राजा देवानामन्नं यच्चन्द्रमाः " यह श्रुति सोम को देवता प्रारण अन्न ( भोग्य ) बतला रही है । " वाग् वै त्रि " इस श्रुति अनुसार वाक् प्रत्रिप्रारण रूप है । अभिप्रारण सौर रश्मियों का अवरोधक है । अतः वह सौर-प्राणरूप देवताओं का विरोधी होने से प्रासुर है । अर्थात् प्रत्रिप्राणरूप वाक् देवविरोधी होने से असुरों के हिस्से में आया । इसी प्रकार यज्ञ को देवताओं ने प्राप्त किया । अग्नि में सोम हुति ही यज्ञ कहलाती है । इनमें अग्नि प्रत्ता या अन्नाद है तथा सोम आद्य या अन्न है । अन्नाद तथा अन्न का सम्बन्ध होने पर अत्ता या अन्नाद ही शेष रहता है और प्रत्ता अग्नि है । अतः प्रधान होने से अग्नि ही यज्ञ है । देवता आग्नेय हैं अतः यज्ञ देवताओं के हिस्से में आया । अग्निप्राणरूप वाक् सौररश्मियों का विरोधी होने से सौर प्रकाशी प्रारणरूप देवताओं का वाक् विरोधी है अतः वह असुरों के हिस्से में आया । [ १६३ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिनदीक्षा इसी तरह द्युलोक को देवताओं ने प्राप्त किया तथा पृथिवी को असुरों ने । क्योंकि द्युलोक के अधिष्ठाता सूर्य ( इन्द्र ) हैं और सूर्य देवघन है । जैसा कि “ चित्रं देवानामुदगादनीकं ” यह श्रुति बतला रही है । द्युलोक का प्रारण इन्द्र है जो प्रकाश का अधिष्ठाता व प्रकाशक है और पृथिवी का प्रारण अग्नि है जो कि तापधर्मा है, प्रकाशधर्मा नहीं है । इसीलिए — " यथाग्निगर्भा पृथिवी तथा द्यौरिन्द्रेण गर्भिणी " यह श्रुति द्युलोक का प्राण इन्द्र को तथा पृथिवी का प्राण अग्नि को बतला रही है । देवतानों के द्युलोकवासी होने से द्युलोक देवतात्रों को प्राप्त हुआ और पृथिवी तमोमय प्राणप्रधान होने से तमोमय प्रारण रूप पृथिवी को तमोमय प्राण रूप असुरों ने प्राप्त किया । सूर्य से निकलने वाली कान्ति श्वेत व प्रकाशमय जब कि पृथिवी से निकलने वाली कृष्ण तथा तामस है । इस प्रकार से प्रजापति की सम्पत्ति है । उनके दोनों पुत्रों में विभक्त हो गई ॥ १८ ॥
यज्ञ जब देवताओं को प्राप्त हो गया तब देवताओं ने यज्ञ से कहा कि कृष्णप्राणरूप वाक् जो कि असुरों को प्राप्त हुई है वह योषा रूप है इसलिए आप उसको अपने पास बुला लीजिए । जहां तुमने उसे बुलाया कि वह आपको अपने पास बुला लेगी । यज्ञ ने स्वयं विचार किया कि यह वाक् योषा ( स्त्री ) है, मैं उसे आमन्त्रित करूं । आमन्त्रित करने पर वह मुझे बुलायेगी । अतः यज्ञ ने उसे बुलाया । उस स्त्री रूप वाक् ने उसे फटकार दिया और उससे असूया करने लगी । आरी से व्यथित बैल आदि जिस प्रकार आरी चुभाने वाले से असूया करते हैं उस प्रकार वाक् ने यज्ञ से असूया की । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यह स्त्री का स्वभाव है कि जब पुरुष स्त्री को अपने पास बुलाता है तब वह पहले इसी प्रकार पुरुष को दूर से ही फटकार देती है अतः प्रकृति यज्ञ में यज्ञरूप पुरुष के द्वारा वाग्रूप स्त्री के बुलाने पर उसने उसे फटकार दिया था ॥ १६ ॥
देवताओं ने पुनः यज्ञ से कहा कि भगवान् श्राप वाक् को बुलाइए । बुलाने पर आपको बुलायेगी । वह आपको अपनायेगी । इसका तात्पर्य यह है कि पुरुष स्त्री का आह्वान करता है । प्रथम बार वह उसे फटकार देती है परन्तु फिर अन्तरात्मा की प्रेरणा होती है कि पुनः इस स्त्री को बुलावें, वह अवश्य ही मुझ से प्रेम करेगी । बस इस स्वाभाविक आत्मविज्ञान को बतलाने के लिए यज्ञरूप पुरुष ने वाक् रूप स्त्री का पुनः आह्वान किया । उसने अब के उसे फटकारा नहीं किन्तु सर्वथा निराशा के वाक्य कहे । क्यों मेरे को बुलाते हो? मैं तुम्हारे पास आना नहीं चाहती । " यह सुनकर यज्ञ ने देवतात्रों से कहा कि सर्वथा निराशापूर्वक वचन मुझ से कहे कि मैं तुम्हारे पास आना नहीं चाहती । इसी अभिप्राय से मूल में लिखा है । ' निपलाशमिवैव वदति ' इत्यादि । यहां ' निपलासम् का तात्पर्य सर्वथा निराशा के वाक्य ' यह अर्थ हिन्दी विज्ञान भाष्य में किया है । निपलाश शब्द की व्युत्पत्ति नितरां परागता आशा यत्रेति निपलाशम्, निपलाशमेव निपलाशम् इस प्रकार की है । किन्तु सायणाचार्य ने “ निपतितवर्णवृक्षादिक ” अर्थात् जिसके पत्ते गिर गये हैं ऐसे स्थाणुमात्रावशेष वृक्षादिक [ १६४ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शंतपंथ ब्राह्मण कृष्णाजिनदीक्षा अर्थ किया है । पतितपर्णवृक्ष जैसे कम्पनमात्र करता है उसी तरह शिरश्चालन मात्र से बोली किन्तु इन दोनों अर्थों में विज्ञानभाष्य का व्याख्यान ही उचित प्रतीत होता है ॥ २० ॥
देवताओं ने पुनः कहा कि हे यज्ञ आप वाक् को पुनः बुलाइए । वह आपको अवश्य बुलायेगी । आपको अवश्य अपनायेगी । देवताओं ( अन्तरात्मा ) की प्रेरणा से तीसरी बार जब यज्ञ ने इस वाक् को आमन्त्रित किया तब उस वाक्रूप स्त्री ने यज्ञरूप पुरुष को अपने पास बुलाया । याज्ञवल्क्य भगवान् कहते हैं कि इन तीनों कण्डिकायों में यज्ञरूप के द्वारा तीन बार वागुरूप स्त्री का आह्वान करने पर अन्त में यज्ञ को बुला लिया । इससे स्त्री के स्वभाव का चित्रण किया है कि आरम्भ में स्त्री पुरुष के द्वारा बुलाने पर फटकार देती है । पुनः प्रयास करने पर वह कुछ द्रवीभूत होती है और निराशापूर्ण शब्दों में निषेध करती है । किन्तु अन्त में पुन: प्रयास करने पर वह पुरुष को अपने पास बुला लेती है, अपना लेती है । इसी अभिप्राय से कहा है । " तस्मात् स्त्री पुमांसं ह्वयत एवोत्तमम् " इति । जब वाक् ने यज्ञ को बुला लिया तब यज्ञ ने देवताओं से कहा कि वाक् ने मुझे बुला लिया है ॥ २१ ॥
तब देवताओं न विचार किया और यज्ञ से कहा कि स्त्रियों की बातों पर विश्वास नहीं करना चाहिए । वह इसी स्थान में बैठे हुए, खड़े हुए मुझ से प्राकर मिले — ऐसा उससे कहो और वह जो कुछ कहे उसकी सूचना हमें भी देना । यज्ञ ने वैसा वाक् से कहा और वह यज्ञ के पास संकेत स्थान पर आ गई । अर्थात् वाक् ( पार्थिवाग्नि ) यज्ञ ( द्युलोकीय ) देवताओं में शामिल हो गई । इसकी सूचना यज्ञ ने देवताओं को दे दी । इसमें भी स्त्री स्वभाव का वर्णन किया है कि स्त्री जिस पुरुष के प्रेम में बंध जाती है तो वह अन्त में उसके पास संकेत स्थान में आ ही जाती है ॥ २२ ॥
देवताओं ने उस वाक् को स्वीकृत कर असुरों से अन्तर्हित कर ( छिपाकर ) उसकी अग्नि में आहुति दे दी । उस वाक् को परिगृहित कर सर्वाहुत् यज्ञ द्वारा उसकी अग्नि में हुति दे दी । आहुति का नाम ही यज्ञ है । यह प्रारण व्यापार रूप यज्ञ बिना वाक् के श्रर्थात् बिना मन्त्रोच्चारण के नहीं होता । मन्त्रोच्चारण रूप वाग् व्यापार करना ही वाक् की अग्नि में आहुति है । इस वाक् को असुरों से तिरोहित किया । इसका अभिप्राय यह है कि अशुद्ध लौकिक वाक् के द्वारा मन्त्रोच्चारण नहीं करना चाहिए । अपितु उदात्तादि स्वरयुक्त शुद्ध वाक् से ही मन्त्रोच्चारण करना चाहिए । पार्थिव वाक् नाम से प्रसिद्ध है उनकी अग्नि में ग्राहुति होते ही पृथिवी के बन्धन से मुक्त होकर देवताओं में सम्मिलित हो जाते हैं । इसीलिए लिखा है " आहुति हि देवानाम् " स यामेवामूमनुष्टुभाऽजुहवस्त देवेना तद्देवाः स्व्यकुर्वत - इति । [ १६५ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मणे कृष्णाजिनदीक्षा आहुति द्वारा वाणी के सारभाग का देवताओं द्वारा ग्रहण कर लेने पर हे अरयः के स्थान पर हेऽलयः हेऽलयः ऐसा अशुद्ध उच्चारण करने से असुर पराभूत हो गये ॥ २३ ॥
जो उपजिज्ञास्य वाक् का अर्थात् संदिग्ध वाक् का उच्चारण करता है जिसमें यह जिज्ञासा बनी रहे कि यह क्या बोलता है । इसका अर्थ क्या? वह भी म्लेच्छ होता है । इसलिए ब्राह्मण कभी म्लेच्छ न बने अर्थात् संदिग्ध वाक् का उच्चारण न करे क्योंकि संदिग्धवाक् प्रसुर्य होती है । शुद्ध मन्त्र द्वारा जो आहुति देता है । शुद्ध वाक् ( मन्त्र ) बोलता है वह शत्रुओं के वाग्भाग को उसके सारभाग को खींच लेता है अतः वे उसके शत्रु अपहतवाक
होकर पराभूत हो जाते हैं । यदि वह उपर्युक्त वाग् विज्ञान को जानता है ॥ २४ ॥
उस यज्ञ ने इस आहुति युक्त वाक् का चिन्तन किया, संकल्प किया कि मैं इस वाक् के साथ मिथुनभाव से सम्बद्ध हो जाऊँ । संकल्प करते ही वह उससे संगत हो गया, युक्त हो गया ॥ २५ ॥
इन्द्र, धाता, भग, पूषा आदि १२ प्रारणों की समष्टि ही सूर्य है । उनमें बल का अधिष्ठाता प्रारण इन्द्र कहलाता है । वही सबका आत्मा है । उसने विचार किया कि इस यज्ञ व वाक् के मिथुन से अर्थात् प्रत्येक पृथिवी के मिथुन से कोई अति बलशाली अपत्य पैदा होगा । वह अति बलशाली होने से मुझे पराजित न कर दे । इसलिए वह आत्मा उस मिथुन में गर्भरूप से प्रविष्ट ( अर्थात् जैसे यज्ञ व वाक्रूप शुक्रशोणित ) योषा वृषा का संयोग हुआ, वही इन्द्ररूप आत्मा प्रविष्ट हो जाता है ॥२६ ॥
वह इन्द्र उस मिथुन में गर्भरूप से सम्वत्सर तक रह कर उत्पन्न हुआ । उत्पन्न होते ही उसने विचार किया कि यह योनि अत्यन्त वीर्यशाली है जिसने मुझे एक वर्ष तक धारण किये रक्खा । इससे कोई दूसरा बलशाली प्राणी न उत्पन्न हो जाय जो मेरा अभिभव ( पराजय ) कर बैठे ॥२७ ॥
इसलिए उस योनि को हाथ से मरोडकर छिन्न - भिन्न कर यज्ञ के शिर पर स्थापित कर दिया । क्योंकि यज्ञ ही कृष्ण है । जैसा कि " यज्ञो हि देवेभ्यो निलायत कृष्णो रूपं कृत्वा ” यह श्रुति बतला रही है । यह यज्ञ ही कृष्णाजिन है तथा जो कृष्णविषारण है वह स्त्री रूप योनि है । जिसे इन्द्र ने तोड़कर छिन्न - भिन्न कर कृष्णाजिनरूप यज्ञ के मस्तक पर रख दिया है । क्योंकि इन्द्र ने इसको तोड़ - मरोड़कर वेष्टित कर दिया है । अतः कृष्णमृग का सींग आवेष्टित सा है । जिस प्रकार इन्द्र यज्ञ तथा वाक् के मिथुन में गर्भ बनकर महायोनि से उत्पन्न हुआ उसी प्रकार यह यजमान भी कृष्ण विषारण को धारण करता हुआ यज्ञ व वाक् मिथुन में गर्भ बनकर इसी कृष्णविषाणरूपी योनि से उत्पन्न होता है अर्थात् यजमान का दिव्यात्मा उत्पन्न होता है ॥ २८ ॥
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तृतीय काण्ड ( ० २ ) शतपथ ब्राह्मरण कृष्णाजिनदीक्षा यजमान कृष्णविषाणरूप योनि को ऊर्ध्वमुख बनाकर ही बांधता है क्योंकि ऊर्ध्वमुख योनि ही गर्भ को धारण करती है । योनि के अधोमुख होने पर गर्भपात हो जाता है और यजमान गर्भ बनकर योनि में प्रविष्ठ है अतः निदानविधया कृष्णविषारण को ऊर्ध्वमुख ही रहना चाहिए । तदनन्तर " इन्द्रस्य योनिरसि " इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ यजमान कर ललाट के कुछ ऊपर तक के प्रदेश का इस कृष्णविषारण से स्पर्श करता है । दक्षिणभ्रू से प्रारम्भ “ इन्द्रस्य योनिरसि " इस मन्त्रांश का अर्थ बतलाते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यह कृष्णविषाण इन्द्र की योनि है । इसी योनि में इन्द्र गर्भरूप से प्रविष्ट होता है तथा इसी योनि से वह उत्पन्न होता है अर्थात् बाहर निकलता है । ललाट प्रदेश भाग स्पर्श करने का अभिप्राय यह है कि शरीर में सौरप्राणरूप इन्द्र का प्रवेश शिरोगुहास्थ ब्रह्मरन्ध्र से ही होता है ॥२ ॥
तत्पश्चात् “ सुप्तस्याः कृषीस्कृधि " अर्थात् इस पृथिवी को एवं कृषिक्षेत्र को अच्छे धान्य वाली बना दो । इस मन्त्र का उच्चारण कर भूमि को कुरेद दो । भूमि के इस उल्लेखन से यज्ञ को ही उत्पन्न करता है । क्योंकि जब भूमि में प्रचुर मात्रा मैं अन्न पैदा होता है तभी यज्ञ किया जा सकता है । यदि अन्नरूप फल प्रचुर मात्रा में पैदा नहीं होता तो वह थोड़ा अन्न आत्मरक्षा के लिए, उदरपूर्ति के लिए भी पर्याप्त नहीं होता तो यज्ञ कैसे किया जा सकता है इस प्रकार अन्न भी प्रचुर उत्पत्ति यज्ञ का साधन है । इसीलिए " यज्ञमेवैतज्जनयति " यह कहा है || ३० | यह दीक्षित यजमान काष्ठ या नख से शरीर को कभी न खुजलावे क्योंकि जो यजमान यज्ञ में दीक्षित हो चुका है वह गर्भ बन गया है । वह यदि काष्ठ या नख से गर्भ का कण्डूयन करेगा तो गर्भ नष्ट हो जायगा । क्योंकि गर्भ को काष्ठ व नख से नहीं खुजलाया जाता । अथवा वह पाम का रोगी हो जायगा । न केवल दीक्षित ही अपितु उसके पुत्र भी पाम रोग से ग्रस्त हो जायेंगे । पाम रोग से ग्रस्त यजमान का वीर्य उसके पुत्रादि को भी पाम रोग से युक्त कर देगी । किन्तु कृष्णविषाण से गर्भ का कण्डूयन करने पर इस रोग की सम्भावना नहीं है । क्योंकि कृष्णविषाण गर्भ की योनि है अतः वह गर्भ को हानि नहीं पहुंचाती । चूँकि कृष्ण-विषाण गर्भीभूत यजमान की अपनी योनि है अतः वह उसे हानि नहीं पहुंचाती । अतः कृष्ण-विषाण से दीक्षित कण्डूयन करे, अन्य काष्ठादि से नहीं ॥ ३१ ॥
इसके बाद यजमान के हाथ में दण्ड दिया जाता है जिससे यज्ञविघातक राक्षसों का दण्डप्रहार द्वारा नाश किया जा सके । क्योंकि दण्ड वज्ररूप है और वज्र राक्षसों को नष्ट करने वाला है । [ १६७ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्राह्मणे कृष्णाजिनंदीक्षा वह दण्ड गूलर के वृक्ष का होता है, क्योंकि और वृक्षों की अपेक्षा गूलर में ऊर्क ( बलप्रदरस ) अधिक है जैसा कि तैत्तिरीय ब्राह्मण में कहा है " देवा वा ऊर्जं व्यभजन्त तव उदुम्बर उदतिष्ठत् ” अतः बलप्रद अन्नरस के संग्रह के लिए दण्ड गूलर के वृक्ष का बनाना चाहिए ॥ ३३ ॥
वह दण्ड मुखपर्यन्त ऊंचा होना चाहिए । वीर्य होता है । अतः जहां तक यजमान का वीर्य है क्योंकि पैर से मुख तक ( मस्तक तक ) हो उतना ही ऊंचा दण्ड होना चाहिए ॥ ३४ ॥
तदन्तर “ उच्छ्रयस्व वनस्पते ऊर्ध्वो मा पाह्य हसः । आस्य यज्ञस्योद्ऋचः " हे वनस्पते, आप ऊंचे उठिये और पाप से ( राक्षस शत्रुओं से ) मुझे बचाइये । अर्थात् यज्ञ समाप्ति तक आप शत्रुओं से मेरी रक्षा कीजिए । इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ यजमान दण्ड को ऊपर उठासा है ॥३५ ॥
दण्ड को ऊपर उठाने के बाद कितने ही आचार्य अंगुलियों को संकुचित कर लेते हैं, एवं वाक्संयम कर लेते हैं । क्योंकि दण्ड को ऊपर उठाने के बाद कितने न कुछ जप करना है और न मन्त्र बोलना है । अतः अंगुलियों को संकुचित करना तथा वाक्संयम करना उचित है । किन्तु भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि ऐसा न करे अर्थात् अंगुलियों का संकोच वाक्संयम नहीं करना चाहिए | क्योंकि अंगुलिसंकोच ऐसा कार्य होगा जैसे आगे दौड़ते हुए मनुष्य को पकडने के लिए उसकी विरुद्ध दिशा में दौड़ लगाना । जैसे भागने वाले के विरुद्ध दिशा में दौड़ लगाने से वह आगे भागने वाला पकड़ में नहीं आ सकता । इसी प्रकार उत्तरोत्तर आगे बढ़ने वाले यज्ञ को पकड़ने के लिए हाथों की अंगुलियों को संकुचित करना उन अंगुलियों का यज्ञ प्रतीप दिशा में ले जाना है । ऐसा करने से यज्ञ की प्राप्ति नहीं होगी । अतः दर्भ पावना-नन्तर ही मुष्टि व धनरूप अंगुलि संकोच करना चाहिए और वाक्संयम भी वहीं करना चाहिए, जैसा कि शतपथ ब्राह्मण के ( ३ का १० ३ का ०२२ - २७० ) में बतला दिया गया है ॥ ३६ ॥
अपि च दीक्षित ऋङ्मन्त्र, यजुर्मन्त्र व साममन्त्र का उच्चारण यज्ञसम्पादनार्थ करता है । वाक् संयम करने से यह नहीं हो सकेगा अतः यहां वाक् संयम प्रायश्यक नहीं है । दीक्षित मन्त्रादि का ही उच्चारण करता है । अनृतसंहित मनुष्य के साथ संभाषण नहीं करता ऐसा नियम होने से व्यर्थवाक् का संयमन तो हो ही चुका है अतः और मन्त्रों का उच्चारण यज्ञ
सम्पादनार्थ अपेक्षित है । अतः यहां वाक् संयम अपेक्षित नहीं है ॥ ३७ ॥
दर्भ पावनानन्तर जो वाक् संयमन पहले बतलाया है उसी की उत्पत्ति प्रसंगतः इस कण्डिका के द्वारा बतलायी जा रही है । अर्थात् वाक् ही यज्ञ है जिसका निरूपण आगामी ब्राह्मण में किया जाने वाला है । इसलिए जो वाक्संयमन करता है वह यज्ञ को ही आत्मसात् करता है । यदि वह वाक् संयमन करने वाज्ञा गलती से यदि बोल देता है तो यज्ञ आत्मा से विसृष्ट होकर पराङ्मुख हो जाता है । आत्मा से दूर चला जाता है । तब यजमान विष्णु [ १६८ ]
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तृतीय काण्ड ( ( ० २ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिनदीक्षा देवताक ऋचा या यजुर्मन्त्र का जप करे क्योंकि यज्ञ ही विष्णु है इसलिए विष्णुक देवताक ऋचा या यजुर्मन्त्र का जप करने से यजमान यज्ञ को पुनः आत्मसात् कर लेता है । यही वाक् संयमन करने वाले यजमान का गलती से बोलने पर प्रायश्चित है ॥ ३८ ॥
तदन्तर ऋत्विजों में से एक ऋत्विक् " दीक्षितोऽयं ब्राह्मणः, दीक्षितोऽयं ब्राह्मण: " अर्थात् यह ब्राह्मण दीक्षणीयेष्टि कृष्णाजिनादि दीक्षा संस्कार से संस्कृत हो चुका है । इस प्रकार उच्चैः स्वर से कहता हुआ जो कि दीक्षा लेने से देवताओं को निवेदित हो चुका है, इस ब्राह्मण को पुनः देवताओं को निवेदित करता है । यह दीक्षित ब्राह्मरण अतिशय वीर्यशाली है जो सोमभाग को प्राप्त कर लिया है । देवताओं को निवेदित ब्राह्मण को पुनः देवताओं को निवेदित करना " द्विर्बद्धं सुबद्धं भवति " इस न्याय का अनुसरण है । अर्थात् यह दीक्षित यजमान मनुष्यमण्डल से पृथक् होकर आप् देवताओं में एक देवता हो चुका है । अतः आप सजातीय होने से रक्षा करें । इस बात को वह ऋत्विक् तीन बार कहता है क्योंकि यज्ञ त्रिवृत है । सूत्रकार कात्यायन के अनुसार इस निवेदन का करने वाला अध्वर्यु से भिन्न ऋत्विग् होना चाहिए जैसा कि " अन्योऽयं दीक्षितो ब्राह्मण इत्याह म्रिरूचै: " में अन्य शब्द के द्वारा व्यक्त कर दिया गया है । सूत्र में उच्चैः पद से उपांश कथन का निषेध है न कि बहुत उच्च स्वर से कहने का अभिप्राय है ॥ ३६ ॥
तोऽयं ब्राह्मणः ” इस आवेदन वाक्य में जो ब्राह्मण पद दिया है उसका अभिप्राय यह है कि दीक्षा ब्राह्मण से पूर्व यह किस वर्ण का है यह मालूम नहीं होता है । क्योंकि वैज्ञानिक महर्षियों का कथन है कि राक्षस लोग स्त्रियों से सम्बन्ध रखते हैं तथा गर्भाधान काल में राक्षस ही वीर्य को ग्रहण करते हैं तात्पर्य यह है कि प्राप्य प्राण असुर तथा आग्नेय प्राण देवता कहलाता है । आग्नेय प्राण का अर्धविशकलन तथा आसुर प्राप्यप्रारण का धर्म संकोच है । वीर्य की स्थिति, स्त्री योनि में स्थिति संकोचधर्मा प्रासुर प्राप्य प्रारण से ही होती है । आग्नेय से तो वीर्य विशकलित होकर स्थिति प्राप्त नहीं कर सकता । रजस्वला स्त्री ही वीर्य धारण योग्य होती है । रजस्वला स्त्री में सौर देवप्रारण विरोधी प्राप्य अभिप्राण रहता है । इसीलिए रजस्वला को आत्रेयी कहा जाता है । अतः निश्चित है कि वीर्य की स्थिति आसुर आप्यप्राण से ही होती है । चूंकि राक्षसप्राण अर्थात् प्रासुरप्राण वीर्य स्थिति स्त्री योनि में होकर मनुष्य उत्पन्न होता है । अतः उसके ब्राह्मत्व में सन्देह है । इसी अभिप्राय से कहा है “ अनधेव वाऽस्यातः पुरा जानं भवति - इति । किन्तु यज्ञ में जो दीक्षित हो जाता है वह यज्ञरूप ब्रह्म से उत्पन्न होने के कारण स्पष्ट रूप से ब्राह्मण हो जाता है । यज्ञ से उत्पन्न होने के कारण ही वह ब्राह्मण कहलाता है । इसीलिए क्षत्रिय व वैश्य मी यदि यज्ञ दीक्षित हो जाता है, उसके लिए भी " दीक्षिततोऽयं ब्राह्मणः " यह कहना संगत हो जाता है । अन्यथा सोमयाग करने वाले क्षत्रिय व वैश्य वर्ण वाले यज्ञकर्ता पुरुष नहीं मारना चाहिए । अर्थात् उसे बुरी दृष्टि से नहीं देखना चाहिए | क्योंकि ऐसा करने वाला यज्ञकर्ता के वध के कारण अधिक पापी हो जाता है ॥४० ॥
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिन दीक्षा [ विज्ञानभाष्य ] [ मानवधर्म प्राकृतिक एवं सांस्कारिक इन दो विभागों में विभक्त है । पैदा होना, पैदा होकर खाना पीना सीखना, चलना, फिरना, हंसना, रोना, बातचीत करना, मूत्रपुरीषोत्षर्ग करना, इत्यादि - इत्यादि जो धर्म हैं । जिन्हें कि मनुष्य अपने आप सीख लेता है वे धर्म प्राकृतिक धर्म नाम से प्रसिद्ध हैं । जो इन मनुष्यमात्र के लिए पूर्वोक्त धर्म साधारण हैं । जो इन प्राकृतिक धर्मों का ही अनुयायी रहता है, जिसने सांसारिक धर्म को नहीं अपनाया है वह " यथाजात " नाम से व्यवहृत होता है । चूंकि वीर्य इसका शुद्ध है अतएव जन्मना ब्राह्मण होता हुआ भी संस्कारधर्म दीक्षा के अभाव के कारण यह एक तरह • से शूद्र ही है । संस्कार से इसमें द्विजत्व आता है । परन्तु ध्यान रहे संसार में यह सामर्थ्य नहीं है कि वह एक चाण्डाल को भी द्विज कर दे । भंगी के गले में डला हुम्रा यज्ञसूत्र इतना सामर्थ्य नहीं रखता कि वह भंगी के आत्मा का परिवर्तन कर ही दे । हीरे की खान से निकला मैला कुचेला मिट्टी में सना हुआ हीरा ही संस्कार द्वारा चमक सकता हैं । कोयले की खान में पैदा होने वाला कोयला हजार प्रयत्न करने पर भी काला ही रहेगा, वह हीरा कभी नहीं बन सकेगा । बस ठीक इसी प्रकार जिसका वंश निर्मल है जो ब्राह्मण के वीर्य से उत्पन्न हुआ है वही संस्कार का भी अधिकारी है । इसीलिए इन सांसारिक धर्मों को " अाधिकारिक धर्म " भी कहा जाता है । वेद पढ़ना, यज्ञ करना, यज्ञ करवाना, इत्यादि - इत्यादि जो धर्म हैं वे आधिकारिक किंवा ' सांस्कारिक धर्म ' नाम से भी प्रसिद्ध है । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इन तीन वर्णों में उत्पन्न होने वाले के लिए ही आधिकारिक धर्म है । यह आधिकारिक धर्म भी साधारण एवं प्रसाधारण इन दो भागों में विभक्त है । द्विजाति मात्र के लिए सामान्यतया लागू जो धर्म है वह साधारण आधि-कारिक धर्म है । यज्ञोपवीत, विवाह संस्कार, पुंसवनादि संस्कार, वेदपठनादि जो धर्म है वे ही साधारण धिकारिक धर्म हैं । हमने बताया है कि जिसने अाधिकारिक धर्म को नहीं अपनाया है वह यथाजांत कहलाता है । वह यथेच्छाचारी होता है । उसके लिए खान - पान, आचार - व्यवहार इत्यादि नियमों की कोई भावश्यकता नहीं है । इदं भक्ष्यम् इदं भक्ष्यम्, वह इस विधि निषेध से परे है । वह चाहे जहाँ, चाहे जो कुछ खा सकता है । स्वतन्त्र रह सकता है । परन्तु जो आधिकारिक धर्मों का उपासक है, उसे मर्यादा के सूत्र में बद्ध रहना पड़ता है । ग्राधिकारिक धर्मानुयायी त्रैवरिंणक सम्प्रदाय को एकान्ततः बन्धन में रहना पड़ता है । यह नहीं खा सकते, वहाँ नहीं खा सकते, इस स्त्री से सम्बन्ध नहीं कर सकते, इत्यादि विधि-' निषेधात्मक प्रज्ञाएं नत मस्तक होकर स्वीकार करनी पड़ती है, बस इस मर्यादा बन्धन का सूचक ही हमारा यज्ञोपवीत है । यज्ञसूत्र नहीं डाला जाता है तब तक यह स्वतन्त्र रहता है परन्तु यज्ञसूत्र के बन्धन में आते ही इसकी सारी स्वतंत्रता छिन जाती है । यत्रोपवीत मर्यादासूचक है । यज्ञोपवीत धारण करने का यही प्रयोजन नहीं समझ लेना चाहिए | यज्ञोपवीत के धारण करने का श्रतिगहन रहस्य है जिसका विस्तृत विवेचन हमने " यज्ञोपवीतोत्पत्ति रहस्य " में कर दिया है । यहाँ उसका विवेचन करना प्रकृत से दूर जाना होगा अतः इस विषय को यहीं समाप्त कर हम प्रकृत का अनुसरण करते हैं । हम बतला रहे थे कि प्राधिकारिक धर्म साधारण एवं असाधारणभेदेन दो प्रकार के होते हैं । यज्ञोपवीतादि साधारण आधिकारिक धर्म हैं एवं जो प्रातिस्विक् यज्ञाधिकार हैं वे असाधारण आधिकारिक धर्म नाम से प्रसिद्ध है । उदाहरणार्थ- जो सोमयाग करना चाहता है उसे पहले अधिकार समर्पण के लिए सोमयाग में अधि-कार प्राप्त करने के लिए दीक्षा लेनी पडेगी । यह प्रातिस्विक् यज्ञाधिकार है । जिसने सोमयागोपयुक्त दीक्षा ले ली है वही सोमयाग का अधिकारी है । अग्निहोत्र करने वाला किंवा दर्शपूर्णमास करने वाला, [ १७० ]
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बृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिन दीक्षा बिना दीक्षा के सोमयाग नहीं कर सकता । अतएव हम ऐसे ऐसे प्रातिस्त्रिक् यज्ञाधिकारों को असाधारण-आधिकारिक धर्म कहने के लिए तैयार हैं । सोमयाग का प्रकरण चल रहा है । देवयजन - गमन, यज्ञशाला - गमन दीक्षणीयेष्टि इत्यादि कर्म हो चुके हैं । अब यह यजमान सोमयागाधिकार प्राप्ति के लिए कृष्णः मृगचर्म पर बैठकर दीक्षा लेगा । अधिकार समर्पण करना - यही दीक्षा है । विलायत जाने के लिए जैसे पासपोर्ट लेना पड़ता है । बिना पासपोर्ट के विलायत जाना असम्भव है, ठीक इसी प्रकार सोमयाग संस्था में प्रविष्ट होने के लिए दीक्षात्वरूप पास-पोर्ट की नितान्त आवश्यकता है । बिना दीक्षा के सोमयाग का अधिकार कथमपि नहीं मिल सकता । श्रतएव दीक्षा का अधिकार समर्पण दीक्षा " यह लक्षण सर्वथा मान्य है । अधिकार समर्पणत्वरूप असाधा-रण आधिकारिक धर्मत्वरूप " दीक्षाकर्म " का विवेचन ही प्रकृत दीक्षाग्रहण का विषय है । दीक्षा क्यों लेनी चाहिए? इत्यादि विषयों की उपपत्ति विस्तृतरूपेण पूर्व के प्रकरण में बतला दी गई है । उपपत्ति बतलाकर अब प्रावृत्त बतलाते हैं । कैसे - किन मन्त्रों से - कहाँ पर बैठकर दीक्षा लेनी चाहिए? यही इस प्रकरण का विषय है । जो यज्ञशाला बनाई गई है, उसमें ग्राहवनीय, गार्हपत्य एवं दक्षिणाग्नि- यह तीन अग्निकुण्ड बनाये जाते हैं । ग्राहवनीय पूर्व की ओर रहता है एवं यह कुण्ड वर्तुल वृत्त होता है एवं गार्हपत्य पश्चिम की ओर चौकोर होता है । दक्षिणाग्नि दक्षिण भाग में अर्द्धचन्द्राकारयुक्त होता है । ग्राहवनीय और गार्हपत्य के बीच में होती है - यह यज्ञकुण्डसंस्था है । यजमान को इन कुण्डों के किस प्रोर बैठाकर एवं किस पर बैठाकर दीक्षा देनी चाहिए - यह बतलाते हैं । पूर्वस्थ ग्राहवनीय कुण्ड के दक्षिण भाग में - मृगचर्म के मस्तक भाग को पूर्व की ओर रखता हुआ अध्वर्यु, दो काले हिरण के काले ही चर्मों को बिछाता है एवं उन दोनों मृगचर्मों पर यजमान को बैठाकर वहीं उसे दीक्षित करता है । तात्पर्य यही है कि ग्राहवनीय के दक्षिण भाग में दो हिरण के चर्म बिछा कर, उस पर बैठ के यजमान को सोमयागाधिकारप्राप्त्यर्थं दीक्षा लेनी चाहिए । चूंकि कृष्णमृगचर्मों पर बैठकर दीक्षा ली जाती है अतएव इस दीक्षा को " कृष्णाजिनदीक्षा " नाम से व्यवहृत करने लग गए हैं । दक्षिणेनाहवनीयं प्राचीन ग्रीवे कृष्णा जिने उपस्तृणाति । तयोरेनमधिदीक्षयति । एक ही कृष्णमृगचर्म पर बैठकर दीक्षा लेंना प्रथवा दो कृष्णमृगचर्मो पर बैठकर दीक्षा लेना, दीक्षा के विषय में यह दो मत हैं । दोनों ही मत ठीक है । वैज्ञानिक उपपत्ति दोनों में घट जाती है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— यदि दीक्षा के लिए कृष्णमृगचर्म दो होते हैं तब दो कृष्णमृगचर्मों पर बैठ कर दीक्षा ली जाती है तो इन दोनों मृगचर्मों का द्यावा पृथिवी का स्वरूप समझो । दो मृगधर्म विधान - निदान से पृथिवी और लोक का स्वरूप कायम करना है । निदान एक तरह की प्रतिकृति है, नकल है । पार्थिव देवताओं द्वारा अध्यात्मदेवतानों को अधिदैवत में मिलाने का नाम ही " यज्ञ " है । इस यज्ञ से यजमान का आत्मा लोक से बद्ध हो जाता है । बस यही बन्धन इसके स्वर्गोपभोग का निमित्त है । आज यज्ञ करता हुआ यह यजमान, वैध उपायों से पार्थिव देवताओं को द्युलोकस्थ देवताओं से मिलाता है । बस इसी भाव को [ १७१ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिनदीक्षा सृजित करने के लिए दोनों लोकों की स्वरूप सम्पत्ति के लिए ही दो मृगचर्मों पर दीक्षा ली जाती है । कहना यही है कि दो कृष्णमृगचर्मविधान, दोनों लोकों का स्वरूप कायम करना है । यही दो मृगचर्म-विधानों की उपपत्ति है । " यदि द्वे भवतस्तदनयोर्लोकयो रूपम् " खुलासा इसका यही हुआ कि इन दोनों मृगचर्मों पर यजमान को दीक्षा देता हुआ अध्वर्यु, दोनों लोकों के ऊपर दीक्षा देता है । अर्थात् द्यावापृथिवी दोनों से यजमानात्मा का सम्बन्ध करवाता है । पार्थिव देवताओं को दिव्य देवताओं के साथ मिलाता है । दोनों मृगचर्मों पर बैठकर दीक्षा देना दोनों लोकों पर बैठकर दीक्षा देना है । ये दोनों कृष्णमृगचर्म सम्बन्धान्त होते हैं । अर्थात् मृगचर्म बिल्कुल भिडाकर रखने चाहिए । उन दोनों के बीच में जरा सा भी अन्तर ( छेटी ) नहीं रहना चाहिए । " सम्बन्धान्ते भवतः " पर्यन्त प्रदेश के अभिप्राय से " प्रन्ते " कहा गया है । मृगचर्म के पर्यन्तभाग परस्पर सम्बन्ध होने चाहिए - यही तात्पर्य है । दोनों के प्रान्तभाग बिल्कुल संबद्ध रखने का क्या अभिप्राय है? यह बतलाते हैं । पूर्व के प्रकरण में हमने बतलाया दिया है कि मृगचर्म - द्यावा - पृथिवी इन दोनों लोगों के अनुकल्प में हैं । दोनों मृगचर्म मानों दोनों लोक है । यदि इन प्राकृतिक दोनों लोकों पर ( पृथिवी और सूर्य लोक पर ) दृष्टिपात करते हैं तो यह हमें परस्पर सम्बन्ध ही दिखलाई पड़ते । पृथिवी और सूर्य दोनों परस्पर सम्बन्ध हैं, इससे चौंक नहीं जाना चाहिए । पृथिवी और सूर्य्य वास्तव में परस्पर सम्बद्ध हैं । पृथिवी और सूर्य से रथन्तरसाम एवं बृहत्साम अभिप्रेत है । साम ही का दूसरा नाम महिमामण्डल है । यह महिमामण्डल किंवा साममण्डल प्रत्येक पदार्थ में रहता है चाहे वह छोटे से छोटा तो अथवा बड़े से बड़ा हो । संसार के यच्चयावत् पदार्थ अग्निसोमात्मक हैं । अग्नि तेजस्वरूप है, ज्योतिष्मान् पदार्थ है । ज्योतिष्मान् जितने भी पदार्थ हैं वे सारे अपना - अपना प्रातिस्विक् साममण्डल रखते हैं । यह साममण्डल ही उन उन स्वार्थों की स्वमहिमा कहलाती है । इसीलिए -" सर्वं तेजः सामरूप्यं हि शश्वत् ॥ ते ० ना ० १ ॥ कहा जाता है । इस साममण्डल को महिमामण्डल को ही वषट्कारमण्डल कहते हैं । इस वषट्-कारमण्डल में ३३ अहर्गण होते हैं । जिनका विस्तृत विवेचन प्रथम और द्वितीय काण्ड में किया गया है । यह साममण्डल वस्तु की बडाई छोटाई की अपेक्षा से बड़ा छोटा होता है । छोटी वस्तु का साम छोटा होता है, बडी का बड़ा होता है । इसमें भी इतना और विशेष समझ लेना चाहिए कि सौर पदार्थों का साम पार्थिव पदार्थों की अपेक्षा अधिक बड़ा होता है । अतएव पार्थिव पदार्थों के साम को रथन्तर साम कहा जाता है, एवं सौर पदार्थों के साम को " बृहत्साम " कहा जाता है । श्रकृत में पृथिवी श्रीर सूर्य के साम से ही सम्बन्ध है | पृथिवी बहुत बड़ी है - इसका साम सूर्य पिण्ड से भी आगे तक जाता है । सूर्य के रथ को भी पृथिवी का साम तैर कर पार तक चला जाता है - प्रतएव पार्थिव साम को रथन्तर साम कहा जाता है यह साम पृथ्वीपिण्ड के चारों ओर जाती हुई ऋचा के समान परिमाण में रहता है, इसीलिए [ १७२ ]