Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 191–200

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 191–200

पृष्ठ 191

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिनदीक्षा " ऋचा समं मेने " यह कहा जाता है । जहाँ तक जिस वस्तु का सान जाता है, वहां तक उस वस्तु की सत्ता मानी जाती है । पृथिवो काण्ड यद्यपि सूर्य से २१ करोड़ मील नीचे है । ऐसी हालत में सूर्य का पृथिवीपिण्ड से क्यों कर सम्बन्ध हो सकता है? परन्तु पृथिवी का साम चूंकि सूर्य से भी ऊपरं तक जाता है एवं सामपर्यन्त उस पदार्थ की सत्ता मानी जाती है । अतएव हम कह सकते हैं कि पृथिवी लोक अवश्य ही सूर्यलोक से सम्बद्ध है । एवमेव सूर्य की ओर चलिए । पृथिवीपिण्ड की अपेक्षा सूर्यपिण्ड तेरह हजार गुणा बड़ा है, भला इसके साम का तो कहना ही क्या है । इसीलिए तो इसका साम बृहत्साम नाम से पुकारा जाता है । कहना हमें यही है कि जैसे पृथिवी का रथन्तर साम द्युलोक से सम्बद्ध रहता है तथा सूर्य के बृहत्साम से पृथिवी लोक बद्ध रहता है । दोनों लोक परस्पर बद्ध हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " सम्बद्धान्ताविव हीमों लोकों " साम का अन्तिम भाग हो परस्पर सम्बद्ध रहता है अतएव सम्ब-द्धान्ताविव कहा गया है । अपि च, इस सम्बद्धता के दर्शन हम दूसरे प्रकार से भी कर सकते हैं । एक ऐसे जंगल में चले जाये जहाँ पर कि वृक्ष का नाम निशान भी न हो । बस उस निरावरण प्रान्त में खड़े होकर चारों ओर दृष्टि डालते हैं, तो पृथिवी और ग्राकाश अर्थात् द्युलोक परस्पर मिले हुए मालूम होते हैं । दोनों के मिलने से इस सर्किल को ही " हरिज्जन " कहा जाता है । हरिज्जन, यह वैदिक शब्द है । हरित् दिशा को कहते हैं । इसलिए इस वृत्त को हरिज्जन कहा जाता है । यही हरिज्जन क्षितिजवृत्त नाम से प्रसिद्ध है | इसे ही पाश्चात्य जगत् " होराइजन " कहता है । होराइजन हरिज्जन का ही अपभ्रंश है । अस्तु, कहना हमें यही है कि क्षितिज की ओर दृष्टि डालने से दोनों लोक परस्पर सम्बद्ध ही प्रतीत होते हैं । हमारे यह दोनों लोकों की प्रतिकृति हैं एवं दोनों लोक हैं परस्पर सम्बद्ध, अतएव प्रकृति यज्ञ के अनु-सार “ यद्वैदेवा अकुर्वंस्तत्करवाणि " इस मर्यादा के पालनार्थ दोनों मृगचर्मों को ऊपर नीचे करके बिछाना चाहिए । इन दोनों का जो मांस भाग है वह भीतर की ओर रहना चाहिए, एवं लोम दोनों के ऊपर की ओर रहने चाहिए । इसी अभिप्राय से कहा जाता है, " अन्तर्मांसाभ्यां बहिर्लोमभ्यां ( ग्रापस्तम्ब श्रौत सू०-१०।८।१३१ ) इसी प्राकृतिक – विज्ञान ज्ञान परस्पर सम्बद्धता की उपपत्ति बतलाते हुए कहते हैं, " सम्ब-द्धान्ते भवतः ” “ सम्बद्धान्ताविव हीमो लोकौ " । इन दोनों मृगचर्मों के पश्चिम भाग को तर्दम ( सूत्रा ) से सीं देना चाहिए । पृष्ठ भाग को मिलाकर सीं देना चाहिए । यदि सींया न जायगा तो दोनों मृगचर्मों के अलग होने का भय रहेगा । यदि किसी कारण से दोनों अलग हो जायेंगे तो दोनों लोकों की परस्पर सम्बद्धत्व की सम्पत्ति का विनाश हो जायगा एवं जिस मतलब से इन दोनों को मिलाया था वह प्रयो-जन नष्ट हो जायगा, ऐसा न हो । ये दोनों कभी पृथक् हो हीं नहीं, अताव सूए से मृगचर्म के पश्चिम भागों को सी देना चाहिए । " तर्दमसुते ( सूए से सीए हुए ) पश्चाद् भवतः " । दोनों को सम्बद्ध करके एवं पश्चिम भाग को सीना, इसका फल बतलाते हुए कहते हैं दोनों को मिलाना दोनों लोकों को मिलाना है । इस प्रकार दोनों को मिलाकर इन पर दीक्षा देना है । सम्वद्ध मृगचर्मों पर बैठाकर दीक्षा देना दोनों लोकों को एक कर, उन पर बैठाकर दीक्षा देना है, यही तात्पर्य है । यजमान का आत्मा दोनों लोकों से सम्बद्ध रहे यही सारे कथन का तात्पर्य है । [ १७३ ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिनदीक्षा " तदिमावेव लोकौ मिथुनीकृत्य तयोरेनमधिदीक्षयति " ॥२ ॥

इस दो मृगचर्म बिछा यह जिनका मत था उसका वैज्ञानिक विचार हो चुका । लोक सम्पत्ति प्राप्त्यर्थं मृगचर्म बिछाना चाहिए । ऐसा करने में कोई दोष नहीं है । अब दूसरे मत का समाधान करते हैं । दूसरा मत है कि, एक मृगचर्म बिछाना चाहिए । इस पर भगवान याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यदि एक ही मृगत्वर्म है तब भी कोई हानि नहीं है, क्योंकि यह एक मृगचर्म पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्यौ इन तीनों लोकों का स्वरूप है । एक ही मृगचर्म से त्रैलोक्य का सम्बन्ध हो जाता हैं । इस प्रकार इस मृगचर्म पर बैठाकर दीक्षा देता हुआ अध्वर्यु इसे तीनों लोकों पर ही बैठाकर ही दीक्षा देता है । त्रैलोक्य देवताओं का सम्बन्ध, जायमानात्मा से करवाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं—, .. " यद्यशब्दं भवति तदेषां लोकानां रूपम् तदेनमेव लोकेष्वधि दीक्षयति " । कृष्णमृगचर्म से त्रैलोक्य सम्पत्ति का सम्बन्ध कैसे हो जाता है? मृगचर्म में तीनों लोक कैसे हैं-यह कहलाते हैं— • कृष्णमृगचर्म कहने को कृष्ण मृगचर्म है । वास्तव में इसमें सफेद, काला और खाकी यह तीन रंग होते हैं । सफेद और काले रंग के बीच का सन्धिस्थानीय जो रंग है वही खाकी कहलाता है । इसी के लिए प्रकृत में " ब्रभ्रु " कहा गया है । कहना हमें यही है कि यह तीनों रंग ही तीनों लोक हैं । पृथिवी स्वरूप से सर्वथा काली है । प्रकाश पृथिवी की अपनी वस्तु नहीं है, वह सूर्य की वस्तु है । रात्रि को सूर्य नहीं रहता अतएव पृथिवी अपनी असली हालत में आ जाती है, तो बस पृथिवी. चूँकि काली है अतएव निदानेन मृगचर्म के काले हिस्से को हम पृथिवी की चीज बतला सकते हैं । बतला नही सकते, वास्तव में है ही । काला भाग पृथिवी ही है, एवं प्रकाश के अधिष्ठाता भगवान् सूर्य है । प्रकाश सूर्य की अपनी वस्तु है तो जैसे पृथिवी स्वस्वरूप से शुक्ल है । अतएव हम कह सकते हैं कि मृगचर्म के. शुक्ललोम द्युलोक की वस्तु है । सफेद और काला जब मिलाया जाता है वह खाकी सा रंग हो जाता है । खाकी सन्धिस्थानीय है । इधर अन्तरिक्ष भी पृथिवी और सूर्य इन दोनों की सन्धि में पड़ा हुआ है अतएव मृगचर्मस्थ सन्धिस्थानीय ब्रभ्रु रंग को हम अन्तरिक्ष की वस्तु कह सकते हैं । पूर्व प्रकरण से सिद्ध हो जाता है कि जो शुक्लपक्ष है वह युलोक का स्वरूप है । कृष्णरूप इस पृथिवी का स्वरूप है । बभ्रु वर्ण अन्तरिक्ष का स्वरूप है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " यानि शुक्लानि तानि दिवो रूपम् यानि कृष्णानि तान्यस्यै " ( श्रस्याः पृथिव्याः ) अथवा उलटा भी समझ सकते हैं । जो कृष्णलोम है वह द्युलोक का स्वरूप है । जो शुक्ल स्वरूप है वह पृथिवी लोक का स्वरूप है एवं जो हरित से बभ्रुब के लोम है वे अन्तरिक्षस्थानीय हैं - जिसको प्रकाश कहा जाता है - वह न सूर्य की वस्तु है न पृथिवी की । सूर्य भी एक दम काला है । पृथिवी भी काली है । सूर्य सर्वथा " कृष्णवर्ण है अतएव इसमें से जो चारों ओर किरणें निकलती है वे भी एकान्ततः काली ही होती हैं । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है ।: -[ १७४ ]

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बृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिनदीक्षा

" प्राकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च ।

हिरण्यमयेन सवितारथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ॥

श्रुति में " कृष्णेन रजसा वर्त्तमानः " यह स्पष्ट ही कहा गया है एवं पृथिवी तो कृष्ण है ही । यहः जो प्रकाश है वह सोम और सौर आग्नेयप्रारण के सम्बन्ध मात्र से तत्काल उत्पन्न होता है । पृथिवी के ४८ कोस चारों ओर एक भूवायुस्तर है जो कि अभूषवराह नाम से प्रसिद्ध है । यह भूवायु सोमात्मक है । सोम दाह्य पदार्थ है । राल वगैरह पदार्थ अग्नि में गिरते ही जैसे भ्रमक उठते हैं एवमेव सोमग्नि के साथ मिलते ही जल पड़ता है तो उसी समय उजाला हो जाता है । कहना प्रकृत में यही कि पृथिवी के वायु स्वरूप सोम पर जब सौर आग्नेयप्राण आता है तो यह सोम जल उठता है, बस उसी का यह प्रकाश है । सूर्य तो सर्वथा काला है चूंकि वह प्रकाश पार्थिव पदार्थों पर ही अधिक मात्रा से पड़ता है ।.. सूर्यलोक बहुत दूर रहता है अतएव वहाँ यह प्रकाश नहीं पहुंच सकता, अतएव शुक्ल यदि हम कह सकते हैं तो पृथिवी को ही कह सकते हैं क्योंकि प्रकाश का सम्बन्ध पृथिवी से ही रहता है । अपि च- जिस वस्तु का ज्ञान हो जाता हैं उसे “ शुक्ल " नाम से व्यवहृत किया जाता है । गुरु जो शिष्य से पूछते हैं - सौम्य! तुम्हारी समझ में अभी तक वह बात आई या नहीं, शिष्य उत्तर देता है, गुरु जीउजाला हो गया, सारा अन्धकार हट गया । कहना यही है कि ज्ञान के लिए प्रकाश शब्द का उपयोग -होता है । हो क्यों नहीं, जबकि ज्ञान भूतज्योति को भी प्रकाशित करने वाला है । पार्थिव पदार्थों का ज्ञान हमें सम्यक्तया हो जाता है । पार्थिव पदार्थ विज्ञेय हैं, एवं सौर पदार्थ अविज्ञेय हैं । अतएव द्युलोक को हम कृष्णस्वरूप कहने के लिए तैय्यार हैं । बस इन्हीं वैज्ञानिक तत्त्वों को लक्ष्य में रखकर भगवान् याज्ञ-वल्क्य कहते हैं ।: -" यदि वेतरथा, यान्येव कृष्णानि तानि दिवोरूपम्, यानि शुक्लानि तान्यस्यै, यान्येव बभ्रु रगीव हरीणि तान्यन्तरिक्षस्य रूपम् " । इस विषय का विस्तृत विवेचन प्रथमकाण्ड के वेदिसंपादन ब्राह्मण के अनुवाद में देखना चाहिए । कहने का तात्पर्य यही है कि एक मृग चर्म पर बैठता हुआ वह ग्रध्वर्यु यजमान को तीनों लोकों पर बैठाकर दीक्षा देता है । मृगचर्म पर बैठने से निदान द्वारा यजमानात्मा का त्रैलोक्य से सम्बन्ध हो जाता है - यही तात्पर्य है: -" तदेनमेषु लोकेष्वधिदीक्षयति ” ॥३ ॥

एक कृष्णमृगचर्म पक्ष में त्रैलोक्य सम्पत्ति की प्राप्ति ग्रवश्य हो जाती है परन्तु लोक सम्बद्धता तो नहीं होती । दो मृगचर्मों में जैसे लोकों के परस्पर सम्बद्धता का भाव हो जाता है है यह बात एक कृष्ण-मृग पक्ष में न होगी । इस प्रश्न को हल करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यदि एक ही मृगचर्म [ १७५ ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मरण कृष्णाजिनदीक्षा बिछाते हो तो उसके पश्चिम भाग का अन्तिम हिस्सा, संकुचित कर देना चाहिए । अर्थात् पश्चिम का पर्य्यन्त प्रदेश मोड़ देना चाहिए । ऐसा करने से लोकमिथुन सम्पत्ति प्राप्त हो जायेगी । " अन्तकमु तहि ( एककृष्णाजिन पक्ष ) पश्चात् प्रत्यवस्येत् ( संकोचयत् ) ऐसा कहता हुआ वह ऋत्विक् इन्हीं तीनों लोकों

को इकट्ठा करके, परस्पर सम्बद्ध करके, उनमें बैठाकर यजमान को दीक्षा देता हैं ।

" तदेनमेषु लोकेष्वधिदीक्षयति " ॥४ ॥

कृष्णमृगचर्म बिंध गया, अब उस पर बैठना किस तरह चाहिए - यह बतलाते हैं । दोनों मृगचम के पश्चिम भाग से एवं स्वयं भी बाद में प्राड़ मुख करके, दाहिने पैर को ऊँचा करके उस पर बैठता है । तात्पर्य यही है कि मृगचर्म के पश्चिम भाग की ओर से पश्चिम भाग की तरफ ही पूर्वाभिमुख होकर, अपने दाहिने पैर को ऊँचा करके मृगचर्म पर बैठना चाहिए - इसी अभिप्राय से कहते हैं ।: -" श्रथ जघनेन कृष्णाजिने पश्चात् प्राङ ( प्राङमुख ) जानवाकू: ' जान्वाकू: ) उपविशति ” ॥ ( संकुचित-अर्थात् जानु को, अंगुलियों को बिल्कुल संकुचित करके बैठना चाहिए । हाथ - पैर फैलाकर नहीं बैठना चाहिए । तदनन्तर कृष्णमृगचर्म के काले और शुक्लस्तोमों की जो सन्धि होती है उसका स्पर्श करके यह यजमान निम्नलिखित मंत्र बोलता है: -" स यत्र शुक्लानां कृष्णानां च संधिर्भवति तदेवमभिमृश्य जपति " वह मन्त्र यह है- " ऋक्सामयोः शिल्पेस्थः ” । शिल्प, अपूर्व एवं प्रतिरूप भेद से दो प्रकार का होता है । परमेश्वर ने कुछ बनाया है उससे एक-दम नया निर्माण करना अपूर्व शिल्प है । पुस्तक, मकान, रेल, तार इत्यादि इत्यादि यच्चयावत् नये आविष्कार मनुष्य के बनाये हुए हैं । ईश्वरीय जगत् में पहले यह कहीं न थे । अतएव हम इन्हें अपूर्व शिल्प कहने के लिए तैय्यार हैं । प्रकृति रचना से जितना अधिक दूर जाता है । वही इस अपूर्व शिल्प की उत्कृष्टता है । दूसरा शिल्प है " प्रतिरूप " । परमेश्वर ने जो कुछ बनाया है ठीक उसी की नकल पर पदार्थ बनाने का नाम ही है " प्रतिरूप शिल्प " । परमेश्वर ने घोड़े, हाथी, चिड़ियाँ इत्यादि अनन्त चीजें बनायी है । इनकी नकल करना प्रतिरूप शिल्प है । प्रकृति रचना के जितना अधिक समीप आना है यही इस प्रतिरूप शिल्प की उत्कृष्टता है | बस शिल्प दो ही प्रकार का होता है । दोनों शिल्पों में से “ शिल्पेः स्थ: " से प्रतिरूप शिल्प ही अभिप्रेत है न कि अपूर्व शिल्प - इसी अभिप्राय से कहते हैं कि: --" यद् वै प्रतिरूपं तछिल्पम् " । ऋक्, साम, यजु - इन तीनों की यह कृष्णमृगचर्म प्रतिकृति है । तस्वीर है । हे कृष्णमृगचर्म, आप दोनों ऋक्साम के प्रतिरूप में स्थित हैं अर्थात् ऋक् साम का जो प्रतिरूप शिल्प है उसमें प्रापकी स्थिति है | आप तत्स्वरूप ही हो । ऋक्, साम, यजु, का नाम ही यज्ञ है, इसीलिए " सैषा त्रयी विद्यायज्ञः " कहा [ १७६ ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिन दीक्षा गया है, इन तीनों की ही प्रकृतिस्वरूप वह कृष्णमृगचर्म है । कृष्णमृगचर्मस्वरूप वेदत्रयी की प्रतिकृति होने के कारण यज्ञस्वरूप ही तो है । ' ऋक्सामयोः शिल्पे स्थः " । इसमें अन्तर्भाव यही छिपा हुआ है कि मैं कृष्णमृगचर्म पर क्या बैठा हूं- यज्ञ में बैठा हूं । इस यज्ञस्वरूप कृष्णमृगचर्म पर बैठने से यज्ञ की सारी सम्पत्ति आत्मसात् हो जाती है । अतः इसी पर बैठकर दीक्षा लेनी चाहिए । इसीलिए " पुरोडाश सम्पादन ब्राह्मरण " में लिखा है: – " तस्मात् कृष्णाजिनमधिदीक्षन्ते यज्ञस्यैव सर्वत्याय " । कृष्णमृगचर्म यज्ञस्वरूप कँसे है, ऋक्साम की प्रतिकृति कैसे है - इसका विस्तृत विवेचन इसी प्रक ररण में ( ६ पृ ० ) देखना चाहिए । हे कृष्णमृगचर्म! आप ऋक्साम के प्रतिरूप में रहने वाले हो, अर्थात् आप ऋक् सामस्वरूप हो - यही तात्पर्य है । इसी अभिप्राय से कहते हैं: I “ ऋचां च साम्नां च प्रतिरूपे स्थः " इत्येवैतदाह ॥ ५ ॥

फिर उसी मन्त्र का शेष बोलते हैं तेवामारभे - इति मैं आप में प्रवेश करता हूं । जो यजमान दीक्षा लेता है वह गर्भस्वरूप बनता है । मृगचर्म द्यावापृथिवी स्वरूप है । द्यौ पिता है, पृथिवी माता है । यज्ञ द्वारा जो तपा दिव्यात्मा बनता है वह इन्हीं दोनों के पेट में रहता है जब वह मरता है तो तदनन्तर माता के गर्भ से निकल जाता है । अर्थात् पृथिवी की पकड़ से छूट जाता है । कृष्णमृगचर्मस्वरूप द्यावापृथिवी के बीच में बैठता हुआ यह यजमान छन्दों में प्रविष्ट होता है । छन्द कहते हैं वयोनाध को, नसीम भाव को । बस इसीलिए यह न्यक्नाङ्गुलि बनकर ही मृगचर्म पर बैठता है । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि गर्भ वास्तव में न्यक्नाङ्गुलि ही होते हैं । गर्भस्थ शिशु हाथ पैर फैला कर अपनी स्थिति कायम नहीं रख सकता इसे एक छोटे से घिरे हुए स्थान में, हाथ - पैर की अंगु— लियों को मोडकर, मस्तक को भी पेट की ओर झुकाकर रहना पड़ता है । वह हाथ पैर नहीं फैला सकता । प्रकृति स्वरूप में गर्भ की स्थिति ऐसी ही रहती है । यजमान प्रकृति के अनुसार प्राज एक नया दैवात्मा उत्पन्न करना चाहता है । स्वयं भी द्यावापृथिवी स्वरूप मृगचर्म पर बैठकर गर्भ बनता है एवं स्वयं ही दिव्यस्वरूप में उत्पन्न होता है । मृगचर्म पर बैठा हुआ दीक्षित यजमान गर्भ स्वरूप है । गर्भ न्यक्नाङ्गुलि रहते हैं | अतएव इसे भी अंगुलियों को संकुचित करके ही मृगचर्म पर बैठना चाहिए । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " गर्भो वा एष भवति यो दीक्षते । स छंदांसि प्रविशति, तस्मान्न्यवनांगु-लिरिव भवति । न्यवनांगुलय इव हि गर्भाः " ॥६ ॥

याज्ञवल्क्य कहते हैं कि वह यजमान जो कि " तेवामारभेः " कहता है, उसका तात्पर्य यही है कि मैं आप में प्रवेश करता हूं अर्थात् आप में प्रविष्ट हो गर्भ बनता हूँ । [ १७७ ]

पृष्ठ 196

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिन दीक्षा स यदाह " तेवामारभे " इति ते वां प्रविशामीत्येवैतदाह फिर मन्त्र का शेष बोलता है – “ ते मा पातमास्य यज्ञस्योदृचः " इति द्यावापृथिवी, यज्ञसमाप्तिपर्यन्त आप दोनों मेरी रक्षा करें । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इस यज्ञ की संस्था तक अर्थात् समाप्ति तक आप हमारी रक्षा करें " ते मा पातमास्य यज्ञस्योहचः ” इस का यही तात्पर्य है ऋक् अग्नि का नाम है । इस ऋक् में वर्गमूल के कारण उत्तरोत्तर तीन - तीन बिन्दु कम होती जाती हैं । अन्ततोगत्वा एक बिन्दु मात्र रह जाती है । बस यही इस ऋक् का उत् है अर्थात् ऊर्ध्वगमन है । एक बिन्दु वाली जो ऋक् है वही उदूच नाम से प्रसिद्ध है । वास्तव में वह उदृच ही है । वहां पर ऋक् की समाप्ति है । ऋक् कहते हैं अग्नि को । श्रग्नि ही को कहते हैं यज्ञ । जहां इस यज्ञ की समाप्ति हो अर्थात् वषट्कारमण्डल की अन्तिम अवधि हो, वहां तक श्राप मेरी रक्षा करें, यही तात्पर्य है! पृथिवी का उदयस्थान है रथन्तरसाम । क्योंकि पृथिवी के ऋक् की अन्तिम बिन्दु यहीं पर है । सोमयाग द्वारा इस उदूच के ऊपर के सोम को आत्मसात् कर अमृतत्व प्राप्त किया जाता है । अतएव प्रार्थना की जाती है कि हे द्यावापृथिवी! आप रथन्तर साम तक, जब तक हमारा आत्मा न पहुंच जाय तब तक हमारी रक्षा करो । बात वास्तव में सच है यदि रथन्तर तक यजमानात्मा न पहुंच पायेगा एवं बीच ही में स्खलित हो जायगा तो इस पर रहने वाला रथन्तर साम के अनन्तर रहने वाला सोम इसे हर्गिज नहीं मिल सकता जिसकी कि प्राप्ति के लिए ही इसने सारा प्रपञ्च रचा है अतः रथन्तर साम-गमन पर्यन्त रक्षा की याचना करना अत्यावश्यक है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— ते मा पातमास्य यज्ञस्योदृच इति - ते मा गोपायतमास्य यज्ञस्य संस्थाया इत्येवैतदाह ॥७ ॥

इसके अनन्तर दाहिने जानु से उस कृष्णमृगचर्म पर सवार होता है एवं साथ में मन्त्र बोलता है — ' शम्र्मासि शमं मे यच्छेति " । जिस पर यह यजमान सवार हो रहा है वह कृष्णमृग का चर्म है । इस कृष्णमृग की खाल का नाम, मनुष्य सम्प्रदाय में चर्म है । मनुष्य इसे चर्म नाम से व्यवहार करते हैं एवं देवसम्प्रदाय में इसे शर्म कहा जाता है । इससे हमें सुख मिलता है । अन्तरङ्ग मांसादि की हमारी खाल ही रक्षा करती है अतएव इसे शर्म कहने के लिए तैय्यार है । मनुष्य शरीर में व्याधि दो प्रकार की होती है अन्तरंग एवं बहिरंग । अन्तरंग व्याधि से प्रभिप्रेत है अध्यात्म और अधिदैवत । बहिरंग से अभिप्रेत है अधिकता । हमारे शरीर पर जो चर्म है वह अन्तरंग रक्षक है | मांसादि पर होने वाले आक्रमण को खाल बचाती है एवं वर्म अर्थात् कवच बाहर के आक्रमणों को बचाता है । बस इसी मूल पर हमारी वर्णव्यवस्था अवलम्बित है । ब्राह्मण अन्तरंग रक्षक है | आध्यात्मिक और प्राधिभौतिक दोनों को विनाश करने वाला ब्राह्मण है अतएव इसे शर्मा कहा जाता है । एवं आधिभौतिक आक्रमणों से बचाने वाला क्षत्रिय है अतएव इसे वर्मा कहा जाता है । इन दोनों से वैश्य सुरक्षित रहते हैं । व्यापार में कोई बाधा नहीं आती अतएव वैश्यों को गुप्त कहा जाता हैं । [ १७८ ]

पृष्ठ 197

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिन दीक्षा अस्तु प्रकृत में हमें यही कहना है कि यह चर्म है अर्थात् शर्म है । सुख का देने वाला है अतएव यजमान इससे प्रार्थना करता है कि आप शर्म हैं अतः शर्म अर्थात् सुख प्रदान कीजिए । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " चर्म वा एतत् कृष्णस्य तदस्यतन्मानुषम्, शर्मदेवत्रा - तस्मादाह शम्र्मा-सीति शम् मे यच्छेति " । फिर मन्त्र बोलता है " नमस्तेऽस्तु मा मा हिंसीः - इति । हमने बतला दिया है कृष्णमृगचर्म यज्ञ-स्वरूप है यह यजमान इस यज्ञ पर सवार होता हुआ एक महापुरुष की बेइज्जती करता है । इस पर सवार होना । इसकी बेइज्जती करना है । इस अवज्ञा को क्षमा करवाने के लिए ही मा मा हिंसी कहा है । यदि राध हो जाता है और उसकी हाथ जोड़कर क्षमा मांग ली जाती है तो महापुरुष का क्रोध शान्त हो जाता है । चर्म को नमस्कार करने का यही अभिप्राय है । इससे यह भी समझ लेना चाहिए कि वैदिक परिभाषा में जड़ और चेतन इन दो विभागों की जरा भी सत्ता नहीं है । वैदिक विज्ञान में सब चेतन है इसीलिए तो चर्म से प्रार्थना की जाती है । श्रेयांस वा एष उपाधिरोहति यो यज्ञम् । यज्ञो हि कृष्णाजिनम् । तस्मा-एवैतद्यज्ञाय निह्न ुते । तयो हैनमेष यज्ञो न हिनस्ति । तस्मादाह नमस्तेऽस्तु मा माहिसीरिति । ऋक्सामयोः शिल्पेस्थस्ते वामारभे ते मा पातमस्य यज्ञस्योदृचः । शम्र्मासि शमं मे यच्छ नमस्तेस्तु मा मा हिंसीः । आप में मैं प्रविष्ट होता हूं । देने वाले हैं, अतएव मुझे सुख हे कृष्णमृगचर्म, तुम ऋक्साम के प्रतिरूप शिल्प में स्थित हो, ऐसे यज्ञ की समाप्ति पर्यन्त मेरी रक्षा करें । हे चर्मन्! आप शर्म हैं, सुख के प्रदान कीजिए । हे चर्मन् आपको नमस्कार है । आप मुझे मत मारिए ( वा ० सं ० ४।८।३१ ) इस प्रकार यह मन्त्र बोलकर यजमान मृगचर्म पर बैठ जाता है ॥। 5 ॥ पाँचवीं कण्डिका में " प्राङ्जान्वान्क उपविशति " यह कहा जाता है । इस उपविशति को विधि-परक समझना चाहिए अर्थात् यों बैठता है, यही उपविशति का तात्पर्य है । बैठने का तरीका मात्र बतला दिया गया है न कि उपविशति से उसी समय बैठ जाओ यह तात्पर्य है । पहले - " ऋक्सामयोः शिल्पेस्थ " इत्यादि मन्त्र बोल लेता है तदन्तर कृष्णमृगचर्म पर बैठता है । मन्त्र बोलकर मृगचर्म पर बैठने में. एक विशेष बात और बतलाते हैं । उस यजमान को चाहिए कि कृष्णमृगचर्म पर बैठता हुआ वह पहले उस कृष्णमृगचर्म के पश्चिम के आधे भाग में ही बैठे । अर्थात् कृष्णमृगचर्म के दो भागों की कल्पना कर लेनी चाहिए । एक पूर्व का [ १७ ९ ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिनदीक्ष भाग एक पश्चिम भाग । इन दोनों में से पहले सवार होते समय पश्चिम का जो मृगचर्म का आधा हिस्सा है उसी पर बैठना चाहिए जिससे कि पूर्व का हिस्सा अधिक बचा रहे । " अग्रे जघनार्द्ध इवैव " पद दिया है, इसका तात्पर्य यही है कि ठीक नाप करने की श्रावश्यकता नहीं है केवल अनुमान से काम कर लो । पूर्व की ओर - अधिक हिस्सा बचा रहना चाहिए जिससे कि पश्चिम से पूर्व की ओर आगे बढ़ने का मौका मिले । पूर्वं-दिक् में देवता रहते हैं । इसीलिए तो — “ प्राची हि देवानां दिक् " । यज्ञ द्वारा यजमान को इसी देवलोक में जाना है | पश्चिम दिक् पृथिवी से सम्बद्ध रखती है । इसीलिए तो पश्चिम भाग में होने वाली गार्ह-पत्याग्नि को पृथिवी लोक कहा जाता है । आज यह यजमान यज्ञ द्वारा पूर्व की ओर बढ़ रहा है, स्वर्ग की ओर बढ़ रहा है । ऐसी अवस्था में इस गमन भाव के लिए पीछे से आगे बढ़ने की भावसम्पत्ति के लिए हमें पहले कृष्णमृगचर्म के पश्चिमार्द्धभाग में ही बैठना चाहिए । पूर्व में जगह खाली रहने से आगे बढ़ने का मौका रहता है | इससे यही सिद्ध होता है कि आज यह यजमान पश्चिम से पूर्व की ओर अर्थात् पृथिवी लोक से देवलोक की ओर जा रहा है । अतः इस उर्ध्वगमनसम्पत्ति के लिए अवश्य ही पश्चिमा-भाग में बैठना चाहिए । यदि वह पहले ही से उसके मध्यभाग में किंवा और भी आगे बढ़कर बैठ जायगा तो फिर आगे बढ़ने का मौका ही न रहेगा । इतनी ही बात नहीं है अपितु इस विज्ञान को जानने वाला अनुष्ट्या ( समपूर्वक ) यदि उस समय कह देगा कि " अरे यह यजमान तो कुत्सित गति हो जायगा अतएव इसका पतन हो जायेगा " बस उसके कहने के साथ ही वास्तव में यजमान का पतन हो ही जायगा । जो मनुष्य छलांग मारकर एकदम ऊपर चढ़ना चाहता है उसका पतन हो जाता है एवं जो धीरे धीरे सीढ़ी-सीढ़ी मार्ग तय करता है वह लक्ष्य स्थान में पहुंच जाता है । यह प्राकृतिक परिस्थिति है, इसीलिए जो यजमान एकदम आगे की ओर ही बढ़ जायगा वह उसी नियम के अनुसार पतित हो जायगा । उन्नतिपथ से च्युत हो जायगा । बात वास्तव में ठीक है यदि धीरे - धीरे थोड़ा - थोड़ा अन्न खाया जाता है, तो वह हमारी पुष्टि करता है एवं यदि एकदम ठूंस लिया जाता है तो उन्नति तो दूर रही उल्टा वह अन्न हमारे रोग का कारण बन जाता है । इसी प्रकार यहां भी शनैः शनैः पूर्व की ओर बढ़ते हुए यदि देवप्राण आत्मसात् किया जाता है तो यजमान का प्रात्मा दिव्यभाव से युक्त हो जाता है । यदि एकदम से उन्हें ( देवता ) आत्मसात् करना चाहता है तो इसका विपरीत फल होता है ऐसा न हो कि उन्नति पथ से यजमान गिर जाय । अतः इसे पहले मृगचर्म के पश्चिमार्ध में ही बैठना चाहिए । इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते है-स वै जघनार्द्ध इवैवाग्रश्रासीत् । अथ यदग्र एव मध्ये उपविशोद्यऽएनं

( यजमानं ) तत्रानुव्या हरेत् द्रप्स्यति वा प्र वा पतिष्यतीति तथा हैवस्यात् ।

तस्माज्जधनार्द्ध इवैवाग्रऽ श्रासीत् ॥९ ॥

मृगचर्म पर यजमान बैठ गया, मृगचर्म पर क्या बैठ गया द्यावापृथिवीस्वरूप माता पिता के उदर में बैठकर गर्भ वन गया । वहाँ बैठकर यह यजमान अपने कटिस्थान में चारों ओर मेखला धारण करता है । " स वै मेखलां परिहरते " [ १८० ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० २ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिनदीक्षा मेखला क्यों पहनी जाती है । यज्ञविद्या में मेखलाधारण की प्रथा कब से चली, इत्यादिश्रतों की उपपत्ति बतलाते हैं— भृगु, अंगिरा एवं अत्रि परमेष्ठिमण्डल के यह तीन मनोता हैं । तीनों ही के आधार पर परमेष्ठि का स्वरूप स्थित है । अंगिरा को दूसरे शब्दों में हम अग्नि कह सकते हैं एवं भृगु को सोम कह सकते हैं । भृगु अ ंगिरा अर्थात् अग्नि सोम में प्रधान दर्जा अग्नि ही का है । अनि भोक्ता है, सोम भोग्य है । सोम अग्नि का अन्न है, वह प्रतिक्षण अग्नि में आहुत हुआ करता है । भोक्ता भोग्य से बड़ा हुआ करता है इसीलिए अग्नि को अर्थात् श्रङ्गिरा को श्रेष्ठ बतलाया जाता है । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है— " अग्निर्जागार तमृचः कामयन्ते, अग्निर्जागार तमु सामानि यन्ति, अग्निर्जागार तमु सोम ग्राह तवाहमस्मि सख्ये न्योका " इति । सो अग्नि से कहता है, हे अग्ने मैं आपका छोटे दर्जे का ( न्योका ) मित्र हूं । ग्राप मेरे से श्रेष्ठ हैं, बड़े हैं, यही तात्पर्य है । यद्यपि सृष्टि होती है अग्नि सोम दोनों के सम्बन्ध से । अग्नि पुरुष है, वृषा है, सोम स्त्री है, योषा प्रारण है तथापि कहलाती है सृष्टि अग्नि ही की, पुरुष ही की । इसीलिए लोक में सन्तान को पुरुष के नाम से, पिता के नाम से ही प्रधानता दी जाती है । देवदत्त का लड़का है यही कहा जाता है, न कि देवदत्त की स्त्री का लड़का है, यह कहा जाता है । स्त्री तो भोग्य है । प्रकृति विज्ञानानुसार स्त्री का दर्जा पुरुष से नीचा ही रहता है । कहना हमें इस प्रसंग से यही है कि अंगिरा की यह सारी सृष्टि है । अतएव अङ्गिरा को ब्रह्मा किंवा प्रजापति शब्द से व्यवहृत किया जाता है । बस सर्व-प्रथम जिसने सृष्टिकर्त्ता इस अङ्गिरा प्राण को पहचाना, तत्कालीन मर्यादानुसार उस का नाम भी अङ्गिरा ही रख दिया गया । भुवन त्रिलोकी में अङ्गिराप्राण आविष्कर्त्ता विद्वान ही " अङ्गिरा " नाम से प्रसिद्ध हुए । इन्हीं का नाम प्रकृतिरचनानुसार ब्रह्मा रखा गया । प्राचीन सम्प्रदायया जो जिस प्राण की परीक्षा करता था उसका वही नाम कहलाता था । चूंकि इस विद्वान ने जिसका कि प्रातिविक नाम कुछ और था, अङ्गिरा को पहचाना था, अतएव इसका नाम अङ्गिरा रख दिया गया एवं इसके खानदान में भी इसी प्राण का रिसर्च जारी रहा । अतएव वह अङ्गिरा वंश भी अङ्गिरा किंवा, आंगिरस नाम से प्रसिद्ध हुआ । इन भगवान् अङ्गिरा के बड़े पुत्र का नाम " श्रथर्वा " था । जैसा कि कहा है— " ब्रह्मा देवानां प्रथमः संबभूव विश्वस्य कर्त्ता भुवनस्य गोप्ता " ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह । ( मु ० उ ० ) यज्ञ का सम्बन्ध इसी अग्नि से है । अग्नि में सोम की आहुति डालने का नाम यज्ञ है । इस अग्नितत्त्व को पहचान कर यज्ञविद्या का आविष्कार करने वाले यही अङ्गिरा प्रजापति थे । जिस विद्या का अङ्गिरा ने आविष्कार किया था, वह पहले उनके वंश में प्रचलित हुई । अन्त में यज्ञविद्या सारी भुवन त्रिलोकी में प्रचलित हो गई । [ १८१ ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मणे कृष्णाजिन दीक्षा तृतीय काण्ड के दूसरे " दीक्षा ब्राह्मरण " के प्रारम्भ में बतलाया गया है कि दीक्षित मनुष्य का भोजन केवल दूध ही है । वह केवल दूध ही पी सकता है । " व्रतं ह्येवास्यातोऽशनं भवति " ( ३ | २ | ब्रा ० पृ ० १२७ ) अन्न वगैरह और और पदार्थ खाने से आलस्य की मात्रा का प्रवेश होता है । आलस्य से यज्ञक्रिया निष्ट हो जाता है । इसलिए यज्ञकर्त्ता के लिए प्रति सात्विक गौ के दुग्ध का ही विधान है । दीक्षा लेकर यज्ञ समाप्ति पर्यन्त उसे दूध ही पीना चाहिए । इसी मर्यादा के अनुसार जो कि मर्यादा स्वयं इन गिरसों की चलाई हुई है, इन्हें यज्ञ में केवल दूध ही पीना पडता था । अङ्गिरा लोग यज्ञ किया करते थे । यज्ञ के लिए उन्हें दीक्षा लेनी पड़ती थी । बस तभी से उन्हें सारे पदार्थों को त्याग कर केवल दूध पर ही अबलम्बित रहना पड़ता था । मेखलोत्पत्ति का यही उपक्रम है । श्रङ्गिरा लोगों को जो कि यज्ञ करने के लिए दीक्षित हो चुके थे, कमजोरी ने बहुत सताया । वह बहुत निर्बल हो गया । हर एक काम में आँखों के आगे अंधेरा आने लगा । उन्हें बलकर वस्तु का पता नहीं लगा । तात्पर्य यही है कि दीक्षित अङ्गिरात्रों ने बल्य वस्तु को नहीं पहचाना, उनकी समझ में न आया कि हम कौन से पदार्थ का सेवन: करें जिससे कि अपनी यह दुर्बलता हट जाय । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " अङ्गिरसो ह वै दीक्षिता- नबल्यमविन्दन् " ( बल्यं बलकरं वस्तुना-विन्दन् ) इति भावः । बलकर वस्तु की आवश्यकता उन्हें क्यों पड़ गई थी । क्यों वे निर्बल हो गये थे — इसका कारण बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं - उन्होंने दूध के अलावा और अन्न का सर्वथा परित्याग कर दिया था । जब से वे दीक्षित हुए थे तब से उन्होंने सर्वान्न परित्याग कर दिया था । केवल थोड़ा सा दूध मात्र ही पीते थे । दूध ही उन दीक्षितों का अन्न था । बस यही उनकी निर्बलता का कारण था । " तेनान्यद् व्रतावशन-मवाकल्पयन् ” परन्तु साथ ही में –— ये सिवाय दूध के कुछ खा भी नहीं सकते थे एवं दूध से वे निर्बल होते जाते थे । तएव यज्ञसमाप्ति में सन्देह था । यज्ञ में बड़ा परिश्रम करना पड़ता है । भला निर्बल आदमी परिश्रम साध्य यज्ञ समाप्ति पर क्यों कर पहुंच सकता है इसीलिए उन्होंने कोई ऐसी तरकीब निकालनी चाही जिससे व्रत भंग भी न हों एवं निर्बलता भी हट जाय । आखिर सोचते - सोचते उनकी समझ में इसका समाधान आ गया । यज्ञ समाप्ति स्वरूप इस मेखला स्वरूप ऊर्ज बल को उन्होंने देखा । उन्होंने देखा कि यदि ऊर्ज बल प्रदातृ इस मेखला को हम धारण कर लेंगे तो हमारी निर्बलता हट जायेगी एवं इस मेखला के बल पर हम इस यज्ञ को समाप्त कर लेंगे । ऊर्ज एक प्रकार के विशेष बल का नाम है । शरीर में एक प्रकार की जो स्फूर्ति आ जाती है इस स्फूति का नाम ही ऊर्ज बल है । मुस्तैदी का नाम ही " ऊर्क " है । ऊर्क बल के आते ही अकर्मण्यता, निर्बलता आदि दोष एकान्ततः तिरोहित हो जाते हैं जैसे अन्न खाने से “ ऊर्क " बल आ जाता है उसी प्रकार मेखला धारण करने से भी " ऊर्क ” बल आ जाता है । मेखला एक प्रकार का कमरबन्ध है । वास्तव में कमरबन्ध से एक प्रकार की मुस्तैदी आ जाती [ १८२ ]