Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 201–210

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 201–210

पृष्ठ 201

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तृतीय काण्ड ( श्र ० २ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिनदीक्षा है । इसीलिए किसी कार्य में प्रवृत्त होने पर वृद्ध पुरुष श्रादेश करते हैं, वत्स! कमर कस लो और इस कार्य में जुट पड़ो । कमर को बांधने से एक प्रकार का स्फूर्ति बल आ जाता है यह प्रत्यक्ष सिद्ध बात है । कमर पेटी की प्रथा आदिकाल से प्रचलित थी । पाश्वात्य जगत् ने हमारी नकल मात्र की है । यह कहने में हम जरा भी संकोच नहीं कर सकते । अस्तु - कहना हमें यही है कि अङ्गिरा महर्षियों ने निर्बलता को हटाने के लिए, यज्ञ की समाप्ति स्वरूप जो यह मेखला स्वरूप ऊर्क बल है - उसे अपनाया । उन्होंने निश्चित कर दिया कि यदि हम मेखला धारण कर लेंगे तो अवश्य ही यज्ञ समाप्ति पर पहुंच जायेंगे । " तएतामूर्जमपश्ययन्त् समाप्तिम् " अन्त में उन्होंने यज्ञ समाप्ति स्वरूप उस मेखला स्वरूप ऊर्ज को कटिस्थान में चारों ओर बांध दिया एवं उसी मेखला के कारण, उसी स्फूर्ति बल के कारण उन्होंने यज्ञ को समाप्त कर दिया अर्थात् मेखला बल से उनका यज्ञ निर्विघ्न समाप्त हो गया - " तां मध्यत श्रात्मन उर्जमदधत् समाप्तिम् । तथा समाप्नुवन् ” । बस जिस प्रकार से अङ्गिरा महर्षियों ने यज्ञ समाप्ति स्वरूप मेखला को धारण किया था एवं तद्द्वारा यज्ञ को समाप्त किया था तथैव पयोव्रती यह यजमान भी - आज मेखला स्वरूप ऊर्ज को धारण करता है एवं तद् द्वारा यज्ञ की समाप्ति को पहुंचता है । कहने का तात्पर्य यही है कि मेखला से ऊर्क बल मिलता है । इसके प्रथमाविष्कर्ता प्राङ्गिरमहर्षि हैं । अतः आज यह यजमान उसी ऊर्क बल की

प्राप्ति के लिए मेखला धारण करता है ।

" तयोऽएवैष एतां मध्यत श्रात्मन ऊर्जं धत्ते समाप्तिम् " । तया-माप्नोति ॥ १० ॥

मेखला कई पदार्थों की होती है - मूंज की भी मेखला होती है । शरण की भी होती है । इस यजमान, को..किसकी मेखला धारण करनी चाहिए - यह बतलाते हैं । यह मेखला शाणी ( शाणमयी ) होती है । अर्थात् मूंज की मेखला नहीं होनी चाहिए अपितु शारण की मेखला होनी चाहिए । " सा वै शारणी भवति " याज्ञवल्क्य कहते हैं कि स्पर्श में मुलायम रहे - इसीलिए शाण की मेखला होती है । मूंज की मेखला चुभती रहती है एवं शाण कोमल होता है । अतः शारण की ही मेखला होनी चाहिए । अपि च मुलायम ही होनी चाहिए । इसका एक कारण और भी है । आज यह दीक्षित यजमान गर्भ बना हुआ है । गर्भ अति कोमल हुआ करता है । वह कठिन स्पर्श को सह सकता है । प्रकृति की प्रजनन क्रिया में गर्भ का यही स्वभाव है । बस इसी प्रकृति के अनुसार ही गर्भ स्वरूप यजमान को कोमल शरण की मेखला ही पहननी चाहिए । " मृद्वी असत् - इतिग्वेव शाणी " [ १८३ ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मणं कृष्णाजिनदीक्षा अपि च शरण की ही मेखला होनी चाहिए - इसका कारण एक और भी है । श्रग्नि में सोम की आहुति पड़ने का ही नाम यज्ञ है - यह हम पूर्व में कह आये हैं । सोम की आहुति पड़ती है इसीलिए इस अग्नि सोमात्मक यज्ञ को " सोमयाग " कहा जाता है । इसी सोमयाग से अर्थात् इसी अग्नि सोमात्मक यज्ञ से संसार के यच्चयावत् प्राणियों की उत्पत्ति होती है, चाहे वे जड़ हैं चाहे चेतन हैं । यज्ञ से उत्पन्न होने वाले जो प्राणी हैं, जीवात्मा हैं उन्हें ही " प्रजापति " शब्द से व्यवहृत किया जाता है । अनन्त जीव हैं, इसीलिए अनन्त प्रजापति हैं । प्रत्येक प्राणी भिन्न - भिन्न प्रजापति का स्वरूप है । जीवात्मा प्राणी, प्रजापति कहलाता है । इसीलिए " यद्वै प्राणी स प्रजापतिः " यह कहा जाता है । इन प्राणी प्रजापतियों को " क्षुद्र प्रजापति " कहा जाता है एवं जो इनका मूलभूत ' बृहत् प्रजापति ' है- परम प्रजापति कहलाता है उसी परम प्रजापति को ईश्वर कहते हैं । हम उसी के अंश हैं । सूर्य्यं परम प्रजापति है । सूर्य के अनन्त प्रतिबिम्ब " क्षुद्र प्रजापति " हैं । प्रजापति अर्थात् आत्मा त्रिवृतकृत होता है । सबसे पहले आत्मा रहता है जो कि गर्भ के पेट में रहने से गर्भी कहलाता है । गर्भ गर्भी के प्रभेद व्यवहार के कारण आत्मा गर्भ ही कह दिया जाता है । इसके ऊपर अर्थात् गर्भ के ऊपर उल्व होता है । गर्भ के चारों ओर से वेष्टित करने वाली एक पतली सी झिल्ली को ही " उल्ब " कहते हैं । उल्व के बाद जरायु रहती है जो कि " जेर " नाम से प्रसिद्ध है । इस प्रकार गर्भ, उल्व, जरायु भेद से प्रजापति त्रिवृतकृत रहता है । प्रजापति के अत्यन्त समीप उल्ब है अर्थात् गर्भ के बाद पहला नम्बर उल्ब का है अतएव वह नेदिष्ठ ( समीप ) कहलाता है । तदनन्तर जरायु है । सार में जितने भी पदार्थ उत्पन्न होते हैं यह इसी यज्ञ प्रजापति से उत्पन्न होते हैं । शरण- मूंज - लकड़ी -ई - मिट्टी - प्रधि - वनस्पति- कन्द इत्यादि, संसार के यच्चयावत् पदार्थ इसी यज्ञ प्रजापति प्रारण से उत्पन्न होते हैं । प्राण चूंकि अनन्त प्रकार के हैं अतएव पदार्थ भी अनन्त प्रकार के उत्पन्न होते हैं | जिसे हमने यज्ञ प्रजापति कहा है वह नभोमण्डल में चमकता हुआ यही सूर्य्य है । सूर्य्यं अग्नि का गोला है, इनमें परमेष्ठि- मण्डल का सोम अनवरत प्राहुत होता रहता है । बस इसी अग्निसोमात्मक सूर्य्य यज्ञप्रजापति से संसार के यच्चयावत् पदार्थ उत्पन्न होते हैं - इसीलिए " नूनं जनाः सूर्येण प्रसूताः " “ प्राणः प्रजानामुदपायेष सूर्य्यः । " सूर्थ्य श्रात्मा जगतस्तस्थुषश्च " यह कहा जाता है । सूर्य्य स्वयं प्रजापति है अतएव गर्भ, जरायु और उल्व ये तीनों भाव उसमें भी मौजूद हैं । सूर्य्य हमारी अपेक्षा प्रवश्य परमप्रजा-पति है किन्तु परमेष्ठि एवं स्वयंभू प्रजापति की अपेक्षा तो क्षुद्रप्रजापति ही है । स्वयंभू प्रजापति यहाँ कर्ता है इससे यह सूर्य्यं प्रजापति उत्पन्न होता है इस सूर्य्य यज्ञप्रजापति से अस्मदादि अनन्तान्त यज्ञप्रजापति उत्पन्न होते हैं । अस्तु, हम कह रहे हैं कि सूर्य में भिन्न - भिन्न जाति के अनन्तानन्त प्राण हैं - रस, उपरस, विष उपविष, धातु - सोना - चांदी - लोहा वगैरह, शहद, दधि, दुग्ध इत्यादि - इत्यादि सारे पदार्थ सूर्य से ही उत्पन्न होते हैं । सूर्य में विजातीय प्राण है अतएव पदार्थ भी परस्पर विजातीय भाव को पैदा किए होते हैं । सूर्य प्रजापति में एक प्रारण ऐसा है जो प्रांख बनाता है, एक प्राण ऐसा है जो मुँह बनाता है । प्रख गोल वस्तु का नाम नहीं है अपितु उस प्रारण का नाम है - इसीलिए उस चक्षुनिर्माता प्राण में उत्पन्न होने वाले त्रिककुद पर्वत को भी चक्षु कहा जाता है जैसा कि पूर्व प्रकरण में ( ६६ पृ ० ) बतलाया गया है । जो प्राण जिस स्थान में पड़ जाता है उसका नाम उसी प्राण के नाम से पड़ जाता है । हमारा उल्ब [ १८४ ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिन दीक्षा जिस प्रारण से बनता है वास्तव में उस प्राण का नाम उल्ब है । वह उल्ब प्रजापति का उल्ब है । इसीसे हमारा उल्ब बनता है । जहां वह प्राण प्रविष्ट हो जाता है उसीका नाम उल्ब पड़ जाता है । कहना इस प्रपंच से हमें यही है कि सौर प्रजापति जो कि यज्ञ से, अग्नि से उत्पन्न हुआ है उसका जो उल्ब है अर्थात् उल्ब निर्माता प्राण है जो कि प्रजापति की नेदिष्ठ ( नजदीकी ) वस्तु है उसी उल्ब से यह शण बनता है । प्रजापति के चक्षु प्राण से जैसे त्रिककुद पर्वत बनता है तथैव प्रजापति के उल्ब प्राण से यह शरण बनता है जो प्रजापति का उल्ब प्राण हमारे उल्ब में है वही प्रारण इस शण में है । इसी प्राकृतिक विज्ञान को लक्ष्य में रखकर याज्ञवल्क्य कहते हैं । " यत्र वै प्रजापतिरजायत गर्भो भूत्वा एतस्माद्यज्ञात् तस्य यन्नेदिष्ठमुल्बमासीत् ते शणाः ॥ " प्रजापति के उल्ब को तो हम नहीं देखते, वह तो परोक्ष है परन्तु क्षुद्र प्रजापति ( जीव ) का जो उन है, उसके तो हम प्रत्यक्ष ही दर्शन कर सकते हैं । यह उल्ब ऐसा सड़ा करता है । गर्भ के ऊपर रहने वाले उल्ब में से ऐसी बुरी गन्ध आती है जिसको एकमात्र धरित्री ही सहन कर सकती है । बस इस उल्ब के गन्ध से हम इस शरण की परीक्षा कर सकते हैं कि यह शण वास्तव में उल्ब प्रारण से ही बना है या और किसी से । तो परीक्षा करने पर मालूम हो जाता है कि शरण में जबकि पानी मिला कर कूटा जाता है उसमें ठीक उल्ब सदृश ही दुर्गन्ध निकलती है । यही उसके उल्बत्व में प्रत्यक्ष प्रमाण है । प्रजापति के उल्ब से यह शण बने हैं अतएव उल्बवत् दुर्गन्धयुक्त होते हैं । सडा करते हैं । अतएव हम अवश्य ही इसे प्रजापति के उल्ब से उत्पन्न हुआ कह सकते हैं । " तस्मात्ते पूतयो वान्ति " एवं इस प्रजापति का जो जरायु होता है, वही दीक्षित का वसन है अर्थात् दीक्षित स्वयं गर्भ है । शरण की मेखला उल्ब है एवं ऊपर से जो वस्त्र दीक्षित प्रोढ़ता है वह जरायु स्थानापन्न है | " यद् वस्य जरावासीत् तद्दीक्षितवसनम् ” तात्पर्य सम्पूर्ण कथन का यही है कि प्राकृतिक प्रजनन क्रिया में गर्भ, उल्ब एवं जरायु यह तीन पदार्थ रहते हैं । उल्ब जरायु के अन्दर रहता है । अर्थात् गर्भ और जरायु के बीच में रहता है चूंकि मेखला शण की है । शरण में उल्ब प्रारण है । उल्ब जरायु से पहले रहता है अतएव इस मेखला को कपड़े के अन्दर बांधी जाती है अर्थात् पहले मेखला पहनी जाती है अनन्तर जरायु स्थानापन्न वस्त्र प्रोढ़ा जाता है इस प्रकार मेखला एव वस्त्र धारण करता हुआ यह यजमान प्राकृतिक प्रजापति की तरह अर्थात् जीवात्मा की तरह इस वैध सोम यज्ञ द्वारा दिव्यात्मस्वरूप से नया जन्म लेता है । जो कि आत्मा इस यजमान के मानुष आत्मा को प्रज्ञानात्मा का स्वर्ग में ले जायेगा । उल्ब प्राणयुक्त है अतः शरण की ही मेखला धारण करना उचित है । वल्क्य कहते हैं । [ १८५ ] शरण - मेखला उल्बस्थानीय है । इसी अभिप्राय से भगवान् याज्ञ-

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिनदीक्षा अन्तरं वा उल्बं जरायुगो भवति । तस्मादेषा अन्तरावाससो भवति । स यथैवातः प्रजापतिरजायत गर्भो भूत्वा एतस्माद्यज्ञात् एवमेवैषोऽतो जायते गर्भो भूत्वा एतस्मात् यज्ञात् । ११ ॥ मेखला ' शरण ' की क्यों होनी चाहिए इसकी उपपत्ति बतला दी गई एवं वस्त्र से अन्तर भाग मे इसे पहनना चाहिए - इसका कारण भी बतला दिया गया । अब इस मेखला में एक बात और विशेष बतलाते हैं । वह मेखला त्रिवृत् होती है । अर्थात् तीन डोर की होती है । तीन अलग - अलग शरण की डोरी लेकर फिर तीनों को मिला कर त्रिवृत् बना मेखला धारण की जाती है जैसे पानी खींचने की रस्सी पचवरण होती है वैसे मेखला त्रिवृत् होती है । " सा वै त्रिवृद् भवति " क्यों त्रिवृत् होनी चाहिए? इसका कारण बतलाते हैं । अन्न उपकरण सामग्री को कहते हैं जिस वस्तु से आत्मा का स्वरूप बनता है एवं जिससे स्वरूप रक्षा होती है उसे अन्न कहा जाता है । इसी अन्न को वैदिक परिभाषा में ' पशु ' कहा जाता है । पशु का अर्थ है - मातहत । जो मातहत नहीं होता भोग्य नहीं होता, उसे पशु नहीं कहा जा सकता । परन्तु जो चाहे जिसके वश में आ जाता है, वह पशु कहलाता है । अन्न आत्मा के वशीभूत रहता है जबर्दस्ती से आत्मा अर्थात् प्रजापति भगवान् अन्न को आत्मसात् किया करते हैं अत-एव अन्न को पशु कहा जाता है । खाने के अन्न को पशु नहीं कहते हैं । अपितु भोग्यजात पदार्थ का उप-करण सामग्री को पशु कहते हैं । इस आत्म - प्रजापति के अन्न कुल तीन हैं, माता पिता और देव समष्टि । आत्मा चित् का नाम है । स्वयम्भू की जो चेतना है उसीका नाम आत्मा है उस चित् के प्रतिबिम्ब का आभास का नाम ' जीवात्मा है । इसीलिए तो वेदान्त में जीवात्मा को चिदाभास कहा जाता है । यह चित् का आभास शुक्र शोणित के संयोग होते ही हो जाता है । पानी के आते ही जैसे - जैसे सूर्य उस पर चमकने लगता है ठीक उसी प्रकार शुक्र शोणित के समुचित होते ही चित् का प्रतिबिम्ब पड़ने लगता है । शुक्र सोम है, सोम का नाम ही महान् है । यही चित् को ग्रहण करने वाला है । जैसे पानी सूर्य का ग्राहक है तद्वत् चित् का ग्राहक यही महान है । चिदात्मा का स्वरूप इसी महान् पर अवलम्बित है इसी-लिए महान को चिदात्मा की योनि कहा जाता है । इसी अभिप्राय से भगवान् कहते हैं— ममयोनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत । सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्त्तयः सम्भवन्ति याः तासां ब्रह्ममहद्योनिरहं बीजप्रदः पिता । - " गीता " तात्पर्य कहने का यही है कि चिद् ग्रहण करने वाले शुक्र शोणित हैं । जीवात्मा का स्वरूप शुक्र-शोणित के सम्बन्ध से ही उत्पन्न होता है । शुक्र पिता की वस्तु है । शोणित माता की वस्तु है । शुक्र [ १८६ ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिन दीक्षा सोम है । स्त्री की योनि में स्थित गरमागरम रुधिर अग्नि है । बस उस अग्नि में जब इस सोम की आहुति होती है तो उसी से आत्मसत्ता होती है । जीवात्मा का जन्म इसी अग्नीषोमात्मक यज्ञ पर निर्भर है । आत्मा की स्थिति, शुक्रशोणित स्वरूप माता पिता के सम्बन्ध से होती है । अतएव हम अवश्य ही माता पिता को जीवात्मा ( पुत्र ) का अन्न बतला सकते हैं । जब माता पिता के गर्भ में आत्मा आ जाता है तो उसमें अपने आप सूर्य - चन्द्र - नक्षत्र - पृथिवी इत्यादि पदार्थों के रस श्राया करते हैं । माता पिता के अर्थात् शुक्रशोणित के अलावा उसमें सौर - चान्द्र - पार्थिव रस भी प्रविष्ट होते रहते हैं । यही रस-समष्टि तीसरा अन्न है | तीन अन्नों से आत्मसत्ता रहती है । शुक्र शोणित स्वरूप जो अन्न है वह माता-पिता के संयोग पर निर्भर है एवं तीसरा अन्न अपने आप आया करता है इसीलिए उसके लिए " यज्जा-यते " कहा गया है । जीवात्मा के यही तीन अन्न है इसी अभिप्राय से कहते हैं— " त्रिवृद्धघन्नम् - पशवोऽन्नम्, माता पिता यज्जायते तत्तृतीयम् । श्रपिच - भोग्य पदार्थों पर दृष्टि डालते हैं तब भी अन्न तीन ही प्रकार का मिलता है । अन्न, पान, खाद, अन्न की यह तीन ही जातियां हैं । जो दांत से काटा जाय - जिसमें दन्त व्यापार न करना पडे- ऐसे खीर हलवा इत्यादि जो पदार्थ है वे अन्न नाम से व्यवहृत होते हैं, एवं जो पेय हैं वे पान कहे जाते हैं एवं जिनमें दन्त व्यापार करना पड़ता है-ऐसे रोटी वगैरह खाद कहलाते हैं । इसलिए भी " त्रिवृद्धघन्नम् " कह सकते हैं । कहना हमें यही है कि श्रात्मा के स्वरूप संस्थापक तीन ही अन्न है । तीन ही से आत्मा का स्वरूप बनता है चूंकि आज यजमान गर्म स्वरूप बन दिव्यात्मस्वरूप से जन्म लेने वाला है । अतः दिव्यात्मस्वरूप संस्थापनार्थं निदानेन इसे त्रिवृत् मेखला ही धारण करनी चाहिए । ] " तस्मात् त्रिवृत् भवति ” ॥१२ ॥

इस मेखला में मूंज की शाखा भी लगा देनी चाहिए । यह शाणमयी मेखला मुञ्जशाखा से अन्वस्या होती है— प्रनुयुक्ता होती है । " मूञ्जवल्शेनान्वस्ता भवति " " शारणमयी मेखला " इसी मूंज को शरपत्र भी कहा जाता है यह मूंज अर्थात् शरपत्र वज्र स्वरूप है | मूंज साक्षात् अग्नि है अतएव वज्र है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि जरा सम्बन्ध होते ही उसी समय इस मूंज जिसे कि भाषा में " पानी " कहते हैं - से खून निकल आते हैं । इसकी धार तलवार के माफिक है । वज्र-कार्य सादृश्यात् इस शरपत्र को भी वज्र कह दिया जाता है । असुर तमोमय प्राण को श्राप्य प्राण कहते हैं । शरपत्र आग्नेय है, वज्रस्वरूप है । इससे प्राप्य प्रारण का सर्वथा नाश हो जाता है । तमोमय आप्यप्राण युक्त असुर अग्नि से भाग जाते हैं । अग्नि में हवा छानने ( फिल्टर ) करने की सामर्थ्य है । शणमयी मेखला पूतियुक्ता है | दुर्गन्ध प्रासुर भाग है । उल्ब सम्पत्ति के लिए धारण तो बाध्य होकर शणमयी का ही करना पड़ता है परन्तु साथ ही में उस प्रासुर भाव को दुर्गन्ध को नष्ट करने के लिए उसमें शर-पत्र ( मूंज ) का भी सम्बन्ध कर दिया जाता है - इसी अभिप्राय से कहते हैं शरबज्र है, वज्र चूंकि राक्षसों का असुरों का विनाश करने वाला है अतएव विरक्षता के लिए मेखला मुजवत्शेनान्वस्ता होती है । [ १८७ ]

पृष्ठ 206

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिनीक्षा " वज्ञो वै शरः । विरक्षस्तायै ( मुजवल्शेनान्वस्ताभवतीति शेषः ) । तीन चार डोरियों को जब परस्पर गूंथा जाता है तो दक्षिणावर्ततया गूंथा जाता है । लोक में मनुष्य जब नेज वगैरह बनाते हैं तो उन जेवडियों को प्रसलवि श्रर्थात् दाहिने हाथ की ओर से बटते हैं-इसीको वैदिक परिभाषा में ' प्रसलि ' कहते हैं एवं पितृ कार्य में वामावर्ततया कार्य किया जाता है - इसीको अपसलवि कहते हैं । प्रसलवि और अपसलवि का विस्तृत विवेचन - शकमेध दृष्टि में द्वितीय काण्ड में कर दिया गया है । यहां केवल इतना ही समझ लेना पर्याप्त होगा कि पितृकार्य में जेवड़ी को वामावर्ततया बटा जाता है एवं मनुष्य कार्य में दक्षिणावर्ततया बटा जाता है । पितृकार्य अपसलवि होकर करना पड़ता है । मनुष्य कार्य प्रसव होकर के करना पड़ता है अब यहां पर एक प्रश्न खड़ा हो जाता है कि ऐसी अवस्था में यदि इस मेखला को दक्षिण भाग की ओर से बटी जायगी तो यह मनुष्य कार्य हो जायगा । अभीष्ट है देवकार्य एवं वामभाग की ओर से बटी जाने पर पितृकार्य हो जायगा इस ग्रन्थि को सुलझाते हुए याज्ञ-वल्क्य कहते हैं कि-" स्तुकास सृष्टा भवति " अर्थात् जैसे केशवेणी गूंथी जाती है तद्वत् यह गूंथी हुई होनी चाहिए । स्तुका केशवेणी का नाम है । जैसे केशवेणी गूंथी जाती है । उसमें जैसे बायां - दाहिना दोनों भाग रह हैं बस उसी प्रकार शाणमयी मेखला होती है । दोनों भावों के शामिल रहने से न मनुष्य कार्य रहता है न पितृकार्य रहता है अपितु देवकार्य हो जाता है । याज्ञवल्क्य कहते हैं यह मेखला प्रसलवसृष्टा होगी अर्थात् दाहिने हाथ के सहारे से गूंथी हुई होगी तो जिस प्रकार से गाय वगैरह बांधने की सामान्य रज्जु हुआ करती है वैसी ही यह भी हो जायेगी । अर्थात् यह मानुषी हो जायगी, जबकि अभीष्ट है देवी । यदि अपसल विसृष्टा होगी तो पितृदेवत्या हो जायगी - दोनों ही अभीष्ट नहीं हैं अतः स्तुकासर्गसृष्टा ही होनी चाहिए | वेणीग्रथन में दक्षिण व वाम हाथ दोनों का व्यापार होता है । अतः न यह मनुष्य कार्य रहता हैन पितृकार्य । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " सा यत् प्रसलवि सृष्टा स्यात् यथेदमन्या रज्जवो मानुषी स्यात् । यद्वपस-विसृष्टा स्यात् पितृदेवत्यास्यात् । तस्मात्स्तुकासर्गं सृष्टा भवति ॥।१३ ॥ क्यों मेखला धारण करनी चाहिए, किसकी बनी करनी चाहिए, कब करनी चाहिए, कहां करनी चाहिए, उसकी गूंथन कैसी होनी चाहिए, इत्यादि बातों की उपपत्ति हो चुकी । अब पद्धति बतलाते हैं । यजमान उस मेखला को निम्नलिखित मंत्र बोलता हुआ धारण करता है । " उर्गस्याङ्गिरसो ह्यतामूर्जपश्यन्दा उ मयि धेहि " सबसे पहले इस ऊर्ग को—- ऊर्क, बल देने वाली मेखला को आांगिरसों ने ही देखा था । अर्थात् उन्होंने ही इसका श्राविष्कार किया था इसी अभिप्राय से कहते हैं - आप प्रांगिरस सम्बन्धी ऊर्क, हो एवं [ १८८ ]

पृष्ठ 207

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तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिनदीक्षा आप उनकी भांति कोमल हो - हे मेखले, आप मुझे ऊर्क, बल प्रदान कीजिए | इसी अभिप्राय से कहते हैं । " नाऽत्र तिरोहितमिवास्ति ॥ १४ ॥

तदनन्तरमेखला की जो नीवी है- अन्तिम भाग है उसे " सोमस्य नीविरसि " बांध हैं । यह मंत्र बोलते हुए " अथ नीवीमुद्गृहति " सोमस्य नीविरसि " इति । याज्ञवल्क्य कहते हैं, जब तक यह मनुष्य दीक्षा नहीं लेता है तब तक यह नीवी सामान्य मनुष्य की नीवी कहलाती है परन्तु आज दीक्षित मनुष्य ने इसे धारण कर रक्खा है, जो कि दीक्षित सोम यज्ञ के कारण सोममय मूर्ति बन रहा है - इसीलिए सोमस्य नीविरसि कहा है । यज्ञोपवीत् मेखला और शिखा ये तीनों ब्राह्मणों के नित्य चिह्न हैं । तीनों भाव शरीर पर सदा रहने चाहिए । इसीलिए — प्रदीक्षितस्य वा अस्यैषाऽग्रे - यह कहा जाता है । वेदश्रुति ही मेखला के नित्य धारण में प्रमाण है । कहना यही है कि पूर्वोक्त मन्त्रभाग बोलता हुआ यजमान मेखला की गांठ बांध देता है गर्भस्वरूप यजमान उल्ब से प्रावृत हो जाता है ॥।१५ ॥ तदनन्तर जरायुस्थानीय वस्त्र से मस्तक को ढक लेता है जो दीक्षा लेता है वह गर्भ बनता है गर्म उल्ब से और जरायु से ढ़के रहता है । अतः प्रकृति नियमानुसार इस यजमान को उल्ब और जरायु से प्रावृत होना चाहिए । इसीलिए यजमान शरीर में उल्बस्थानीय मेखला पहनता है एवं मस्तक पर जरायु-स्थानीय वस्त्र प्रोढ़ता है । " गर्भो वा एष भवति यो दीक्षते । प्रावृता वै गर्भा

उल्बेनेव जरायुणेव । तस्माद्वै प्रोर्णुते ॥१६ ॥

वह यजमान " विष्णोः शर्मासि शर्म यजमानस्य " यह मन्त्र बोलता हुआ वस्त्र से मस्तक को ढ़क देता है इस सोमयाग में जो मनुष्य दीक्षा लेता है वह विष्णु और यजमान दोनों बन जाता है । चूंकि दीक्षा लेकर मनुष्यभाव से हटकर यज्ञ में शामिल हो जाता है इसलिए तो इसे विष्णु कहते हैं क्योंकि यज्ञ ही का नाम तो विष्णु है एवं चूंकि यह यजन करता है इसलिए यजमान भी है । एक राजा खाना, पीना, सोना, उठना इत्यादि सामान्य धर्मों का पालन करता है, इसीलिए तो वह मनुष्य है एवं चूंकि शासनकर्ता है - प्रतएव राजा भी है । जिस प्रकार एक राजा, मनुष्य और राजा दोनों कहलाता है तद्वत् यह दीक्षित, विष्णु और यजमान दोनों कहलाता है । इसी अभिप्राय से कहा जाता है कि हे वस्त्र, तुम विष्णु के शर्म हो अर्थात् चर्म हो एवं यजमान के भी चर्म हो । " उभयं वा एषोऽत्र भवति यो दीक्षते विष्णुश्चयजमानश्च । यदह दीक्षते तद् विष्णुर्भवति यद्यजते तद्यजमानः, तस्मादाह विष्णो: शर्मासि शर्म यजमानस्योति ॥।१७ ॥ [ १८६ ]

पृष्ठ 208

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णा जिनदीक्षा मस्तक पर जो वस्त्र लपेटा जाता है उसका जो अन्तिम भाग है अर्थात् जहां वस्त्र की गांठ है उसमें काले हिरण का सींग बांधता है । सिक् वस्त्रान्त भाग का नाम है. वहां पर काले हिरण का सींग बांधना चाहिए । " अथ कृष्णविषाणां सिचि बध्नीते " कृष्णविषाण क्यों बांधना चाहिए इसकी उपपत्ति बतलाते हैं । देवता और असुर दोनों ही भग-वान् प्रजापति के.. पुत्र ब्रह्म ही अभिप्रेत है । तमोमय प्राण का नाम असुर है एवं शुक्ल-हैं । प्रजापति से भाव का प्रदायी प्राण का नाम देवता है । अन्धकार और प्रकाश दोनों उसी ब्रह्म से उत्पन्न होते हैं उस ब्रह्म की जो विकृति है वह इन दो भागों में विभक्त हो रही है । कुछ सम्पत्ति तमोमय प्राण में बटी हुई है कुछ सम्पत्ति शुक्ल प्राण में बटी हुई है । ब्रह्म की विभूतिएं कौन - कौन हैं कितनी हैं इसका विस्तृत विवेचन करना प्रकृत से दूर जाना है । हमें सिर्फ प्रकृत सम्बन्धी ही विकृतियों के विषय का विभाग - बतलाना है । यज्ञ में ' मन, प्राण, वाक्, आहुति ' पृथिवी एवं द्युलोक की आवश्यकता है । मन, प्राण, वाक् मिश्रित जो आहुति है उससे पार्थिव अग्नि को पार्थिव देवताओं को द्युलोक से मिलाने का नाम ही यज्ञ है । दोनों के बीच में यजमान का मन, प्राण, वाक्, स्वरूप आत्मा शामिल रहता है अतएव वह भी द्युलोक में जा मिलता है - कहने का तात्पर्य यही है कि यज्ञ से सम्बन्ध इन्हीं विकृतियों का है यह बिकृतिएं प्रजा-पति का दाय कहलाता है, सम्पत्ति कहलाती है । यह सम्पत्ति देवता और असुरों में बंटी हुई है । दोनों ही प्रजापति के पुत्र हैं । अतः दोनों को अपने पिता की सम्पत्ति मिली । इसी अभिप्राय से कहते हैं— देवता और असुर दोनों ही प्राजापत्य थे । अर्थात् प्रजापति के पुत्र थे । अतएव अधिकार प्राप्त प्राप केदाय को दोनों प्राप्त हुए । दोनों को प्रजापति की सम्पत्ति मिली । आधी सम्पत्ति देवताओं को मिली, आधी असुरों को मिली । " देवाश्च वा असुराश्वोभये प्राजापत्याः प्रजापतेः पितुर्द्वायमुपेयुः " । मन, वाक्, यज्ञ, पृथिवी और द्युलोक यही उस प्रजापति पिता का दाय था । वही उस की सम्पत्ति थी । उनमें से मन को देवताओं ने प्राप्त किया अर्थात् मन देवताओं के हिस्से में आया एवं वाक् असुरों हिस्से में आई । " मन एव देवा उपायन् वाचमसुराः " मन चन्द्रमा से सम्बन्ध रखता है । " मनश्चन्द्रेण लीयते " । देवता सारे प्राग्नेय हैं । प्रकाश इसी अग्नि का धर्म है एवं हमने प्रकाशी प्राण को ही तो देवता कहा है । सोम इस अग्नि की खुराक है अर्थात् देवताओं का अन्न है इसीलिए -" एतद्वै सोमो राजादेवानामन्नं यच्चन्द्रमा " । यह कहा जाता है कि मन अर्थात् सोम देवताओं की अर्थात् अग्नि की वस्तु है । इसीलिए - " मन एव देवा उचायन् " यह कहा है । भृगु, अङ्गिरा, अत्रि परमेष्ठी के यह तीन मनोता बतलाए गये [ १६० ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिन दीक्षा हैं । इनमें से जो अत्रिप्राण है वह वाक् नाम से प्रसिद्ध है । त्रिप्राण सूर्य विरोधी प्रारण है । सूर्य की रश्मियों को आगे जाने से रोकने वाला यही प्रत्रिप्राण है - इसी को वाक् कहा जाता है । संसार में जितने भी पदार्थ हैं सब वाक् ही वाक् है । यदि वाक् न होती तो पदार्थ स्वरूप ही न बनता । सूर्य्य किरणें जब प्रतिफलित होकर हमारे आती हैं तभी हमें नेत्रों पर पदार्थ का प्रत्यक्ष होता है । घट-घटादि का ज्ञान होता है । सूर्य्यं किरणों को रोकने वाला यही अत्रिप्रारण है, जिसे कि वाक् कहा जाता है । इस पर जब सूर्य्य की किरणें पड़ती है तो उधर न जाकर प्रतिफलित होती है बस प्रतिफलित सूर्य्य किरणें ही पदार्थ प्रत्यक्ष का कारण है । जिसमें श्रत्रिप्रारण की मात्रा कम होगी, सूर्य्य किरणें उसमें उतनी ही अधिक पार होगी । कॉच में त्रिप्राण कम है अतएव सूर्य्य रश्मिएं उस पार चली जाती है । वायु में प्राण नहीं के समान है अतः सूर्य्य रश्मि प्रतिफलनाभावात् वायु का आंखों से प्रत्यक्ष ही नहीं होता । प्रजापति केन्द्र में रहता है । सारे देवता प्रजापति के अनुगत रहते हैं । वाक् असुरों का भाग है । इसीलिए तो प्रथम काण्ड में वाक् और मन का युद्ध बतलाकर वाक् की प्रजापति पर नाराजगी बतलाई गई है ( देखिये प्रथम काण्ड - ३४ पृ ० ) वाक् क्या है? त्रिप्राण क्या है? कैसे वह सूर्य्य विरोधी है, इत्यादि बातों का पूरा रहस्य जानने के लिए " श्रत्रिख्याति " देखनी चाहिए । प्रकृत में सिर्फ यही बतलाना है कि वाक् प्रत्रिप्राण का नाम है । त्रिप्राण सूर्य्य का विरोधी प्राण है । " चित्रं देवानामुद्गात् " के अनुसार देवता सूर्य्य सम्बन्धी है अतएव वाक् को असुरों की वस्तु बतलाई है । इसी अभिप्राय से " वाचमसुरा " कहा गया है एवं यज्ञ को देवताओं ने प्राप्त किया अर्थात् यज्ञ देवताओं के हिस्से में आया एवं वाक् असुरों के हिस्से में आई । यज्ञ प्रारण व्यापार का नाम है । अग्नि में सोमाहुति डालने का नाम ही यज्ञ है । इसी का नाम व्यापार है । यज्ञ अग्नि से सम्बन्ध रखता है । देवता आग्नेय है । अतएव " यज्ञमेव तद्देवा उपायन् " 1 कहा है । वाक् का वही पूर्वोक्त अर्थ है । दूसरी तरफ मे यों समझना चाहिए कि काम करना देवताओं के हिस्से में प्राया एवं खाली बंक - बक * करना असुरों के हिस्से में आया । जिन्हें कर्मण्य देखो, आलस्य से रहित देखो - समझ लो वह देवभाग-युक्त है । जो आलस्य में पड़ा अन्धकार ग्रस्त हो, खाली बक बक करता हो, जान लो और समझ लो, वह असुर प्राणयुक्त है । तीसरी सम्पत्ति थी - पृथिवी लोक और द्युलोक । इनमें से उस द्युलोक को देव-ताओं ने प्राप्त किया एवं पृथिवी लोक को असुरों ने प्राप्त किया । द्युलोक के अधिष्ठातासूर्य्यं है । सूर्य्यं देवताओं की समष्टि है इसीलिए -" चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुमित्रस्य वरुणस्याग्नेः ” कहा जाता है । प्रकाशी प्राण का नाम इन्द्र है । अग्नि में ताप है प्रकाश नहीं । प्रकाश इन्द्र का धर्म है । यह प्रकाशस्वरूप इन्द्र सूर्थ्य में रहता है । सूर्य द्युलोक में रहता है । इसी अभिप्राय में " अमूमेव देवा उपायन् " यह कहा गया है । पृथिवी वास्तव में काली है । तमोमय प्राण का नाम ही तो असुर है । इसीलिए " इमामसुराः " यह कहा गया है - बस इस प्रकार से पिता प्रजापति की सम्पत्ति देवता और असुरों में विभक्त हो गई ॥ १८ ॥

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पृष्ठ 210

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिनदीक्षा हमने बतलाया है कि देवताओं के हिस्से में यज्ञ आया और असुरों के हिस्से में वाक् आई । देवता सारे सूर्य में रहते हैं । सूर्य ही यज्ञाधिष्ठाता है । उसीके यज्ञ से अखिल चराचर की स्थिति रहती है । अतएव " सूर्यं घ्रात्मा जगतस्तस्थुषश्च " यह कहा जाता है । सूर्य का जो पृथिवी की ओर आता हुआ प्रकाश है उसी का नाम यज्ञ है । प्राण व्यापार को ही हमने यज्ञ बतलाया है । प्रारणाधिष्ठाता क्रिया के यही सूर्य है इसीलिए " प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्य " कहा जाता है । यही सूर्य - संसार के पदार्थों को प्रेरित कर क्रिया में प्रवृत्त कराने वाला है । कर्मण्य बनाने वाला यही इन्द्र है । इसीलिए " धियो यो नः प्रचोदयात् " कहा जाता है । जैसे परमेष्ठि के मनोता, भृगु, अंगिरा - अत्रि हैं तद्वत् सूर्य के मनोता ज्योति, गौ, आयु है । देवता ज्योतिस्वरूप है । ज्योति करना यही यज्ञ है । इसीलिए — " विदाम देवान् स्वर्ज्योतिः " कहा जाता है । तात्पर्य यही है कि प्राता हुआ जो सौर प्राण है उसका नाम यज्ञ है । यह प्रकाशस्थ स्वरूप है । अतएव हम इसे देवताओं की वस्तु कहने के लिए तय्यार हैं एवं पृथिवी काली है । पृथिवी के वाक् गौ, द्यौ - यह तीन मनोता हैं । वाक् पृथिवी की वस्तु है । पृथिवी काली है । काले प्राण का नाम ही असुर है अतएव वाक् को असुरों की वस्तु बतलाया गया है । इसी प्रकार से यज्ञ देवताओं की वस्तु है एवं वाक् असुरों की वस्तु है । वाक् यद्यपि है असुरों की वस्तु परन्तु देवता यज्ञ द्वारा उसे अपनी चीज बना लेते हैं । यह वाक् अर्थात् पार्थिव पदार्थ सूर्य्य द्वारा हर समय ऊपर खिंचा करते हैं । सूर्य्य की ज्योतिर्मय किरणें ही जिन्हें कि यज्ञ बतलाया है पार्थिवी वाक् को ऊपर अर्थात् द्युलोक की ओर खँच लेती देवताओं का यज्ञ - अर्थात् सूर्य्य रश्मि असुरों के हिस्से में आई हुई वाक् को, पार्थिव पदार्थों को खींचकर द्युलोक में देवताओं के पास पहुंचा देता है । इस प्रकार देवता असुरों की भी वस्तु को खँच लेते हैं । पृथिवी की वस्तुओं को द्युलोक की ओर ले जाना ही देवताओं का यज्ञ द्वारा वाक् को अपने में शामिल करना है । पार्थिव पदार्थ सदा सूर्य में जाया करते हैं । सौर पदार्थ सदा पृथिवी में आया करते हैं । सूर्य्य की सत्ता से पृथ्वी की सत्ता है । इसीलिए विजय देवप्राण की ही बतलाई जाती है । इतना और समझना चाहिए कि यज्ञ प्रारण स्वरूप है अतएव वह वृषा है अर्थात् पुरुष है एवं वाक् रयि स्वरूप है अतएव वह योषा है अर्थात् स्त्री है । यज्ञपुरुष द्वारा स्त्री वाक् का मिथुन हो जाता है । पार्थिव वाक् सौर यज्ञ के साथ मिल जाती है । यही सौर प्रारण देवताओं की विजय है । बस इसी ज्ञान को भुवन त्रिलोकी के ऐतिहासिक भाव से तुलना करने के लिए आगे का सारा प्रपञ्च है एवं साथ ही में स्त्री और पुरुष की प्रात्मा के स्वाभाविक स्वरूप को समझा दिया जाता है । असल में तो स्त्री पुरुष के स्वात्म स्वभाव विज्ञान के लिए ही नीचे की सारी आख्यायिका है । जब देवताओं के अधिकार में यज्ञ आ गया तो उन्होंने यज्ञ से कहा- हे यज्ञ, असुरों के कब्जे में आई हुई यह वाक् योषा है । अर्थात् स्त्री है ग्रतः किसी तरह तुम उसे यहां बुला लो । " ते देवा अब्रुवन् योषा वा इयं वाक् उपमन्त्रयस्व " देवता कहने लगे कि जहां तुमने उसे बुलाया कि वह स्वयं तुम्हें बुलायेगी । अर्थात् वह तुम्हारे आह्वान् से वास्तव में तुझे अपने पास बुलायेगी, तुमसे प्यार करेगी । [ १ ९ २ ]