Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 211–220

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 211–220

पृष्ठ 211

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 211 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मरण " ह्वमिष्यते वै त्वेति स्वयं वा " कृष्णाजिनदीक्षा यज्ञ ने इच्छा की, विचार किया, यह वाक् योषा है अर्थात् स्त्री है । अपन इसे बुलावे । सम्भव है मेरे बुलाने से यह मुझे बुलायेगी एवं मेरे प्यार करने लगेगी । " ऐक्षत योषावा इयं वाक् उपमन्त्रये हविष्यते वैभेति ” । बस यह विचारकर यज्ञ ने उसे बुलाया - उसको आमन्त्रित किया । याज्ञवल्क्य कहते है कि यज्ञ को अपने पास बुलाने की बात तो दूर रही उलटा उस वाक् ने दूर से प्रारम्भ में ही फटकार दिया । उधर यज्ञजी ने वाक् को बुलाया - इधर दूर खड़ी खड़ी वाक् ने फटकार बतादी । " तामुपामन्त्रयत् सा हास्मा ( अस्मै ) प्रारकादिवैव ( प्रारादेव ) अग्रप्रासूयत् " याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यही कारण है कि कोई पुरुष पहले पहल यदि स्त्री को अपने पास बुलाना चाहता है तो उपमन्त्रियता सी पहले पहल फौरन उसे फटकार बतला देती है । प्रकृति यज्ञ में स्त्रियों का आत्मा वास्तव में ऐसा ही बनाया है पहले मना करना यह स्त्रियों का स्वाभाविक धर्म है यही इस आख्या -नान्तर का तात्पर्य है । " तस्मादु स्त्रीपुंसोपमंत्रितारका दिवैवाग्नेऽसूयति " यज्ञ फटकार खा कर वापस देवताओं के पास लौट जाए और कहा कि हे देवताओं, उसने तो

मुझे दूर ही से फटकार बतला दी ।

" स होवाचारकादिव वै म प्रसूयादिति ॥ १ ९ ॥

जब यज्ञ फटकार खा के वापस लौट आया तो देवताओं ने फिर कहा कि हे यज्ञ, ग्राप फिर उसे बुलाओ । हमें आशा है वह अपने यहीं तुम्हें बुलायेगी अर्थात् तुम्हें अपनायेगी । हमारे शरीर में सारे देवता मोजूद हैं । इसीलिए तो - " श्रग्निर्वाक् भूत्वा मुखं प्राविशत् " । यह कहा जाता है । प्राण व्यापार का नाम यज्ञ है | मनुष्य स्त्री के लिए कोशिश करता है अर्थात् शरीरस्थ देवताओं की इच्छा की प्रेरणा से स्त्री के पास जाता है - वहां जाते ही प्रथम- प्रथम में वह फटकार बतला देती है । वह बिचारा अपना सा मुंह ले वापस लौट आता है । फिर अन्तरात्मा उसे प्रेरित करते कि फिर चल उसके पास, अब के अपने से यही प्यार करेगी । इस स्वाभाविक आत्मविकास को बतलाने के अभिप्राय से ही याज्ञवल्क्य कहते हैं-" ते होचुः उपैव भवतयो मंत्रयस्व ह्वायिष्यते वै त्वेति " आखिर देवताओं के कहने से यज्ञ ने फिर दुबारा उसे बुलाया । दुबारा तो उसने सर्वथा निराशा का वाक्य ही बोल दिया । अर्थात् " क्यों मेरे पास आते हो, मैं तुम्हारे पास नहीं आना चाहती " यह कह दिया । नितरां परागताशम् निपलाशम् निपलाशमेव निपलाशम् - एवंभूतं वाक्यमुवाद - उवाच । जिस वाक्य से, जिस उत्तर से सर्वथा निराशा उपजती थी - ना उम्मेदी मालूम होती थी, ऐसा उत्तर दिया । [ १ ९ ३ ]

पृष्ठ 212

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 212 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण " तामुपामन्त्रयत् सा हास्मै निपलाश मिवोवाद " कृष्णाजिनदीक्षा याज्ञवल्क्य कहते है इसीलिए पुरुष से दुबारा बुलाई गई स्त्री पहले की अपेक्षा बहुत ही सूखा एवं निराशाजनक उत्तर देती है: : -" तस्मादु स्त्री पुंसोपमंत्रिता निपलाशमिवैव वदति "

यज्ञ वापस लौट आया और कहा कि वह तो साफ नट गई कि मैं तुम्हारे पास नहीं श्राती ।

" स होवाच निपलाशमिव वै मेऽवादीदिति ॥२० ॥

देवताओं ने फिर कहा कि हे यज्ञ, एक बार फिर बुलाओं - अब के अवश्य ही वह तुझे बुलायेगी -अर्थात् अब के वह अवश्य ही तुम्हारी हो जायगी । इससे सूचित करते हैं कि बारम्बार फटकार खाने पर भी उसकी चाह बनी ही रहती है । मनुष्य बार - बार तिरस्कृत होकर भी उसके पास जाता ही रहता है - इसी स्वाभाविक भाव को बताते हुए कहते हैं: -“ ते होचुः उपैव भगवो मन्त्रयस्व, हृयिष्यते वै स्वेति ” आखिर देवताओं के कहने से यज्ञ ने फिर बुलाया, फिर उसकी मिन्नत की । अब की बार इस वाक् ने यज्ञ को बुला लिया - अर्थात् तीसरी बार वाक् ने इसकी पत्नी बनना स्वीकार कर लिया । " तामुपामन्त्रयत्- साहैनं जदुवे " याज्ञवल्क्य कहते हैं - यही कारण है कि यदि बार - बार पुरुष स्त्री को बुलाता रहता है । यदि पुरुष की स्त्री के साथ सच्ची लगन है तो वह स्त्री चाहे राजरानी क्यों न हो अन्त में वह उसकी अवश्य ही हो जाती है । सच्चा प्यार बड़े से बड़े खान्दान की स्त्री के चित्त को डिगा देता है । सच्चा प्यार करने वाला यदि भंगी भी होता है तो उसके साथ भी अन्त में वह कुलीन स्त्री चली जाती है इसीलिए, “ विश्वासं नाचरेत् स्त्रीणां ताः स्वतन्त्राश्च नाचरेत् ” रक्षरणीयाः सदा यत्नात् यौवनेषु विशेषत: -यह कहा जाता है— इसी अभिप्राय से कहते हैं- " तस्मावु स्त्री पुमांसं यतएवोत्तमम् ( अन्त में बुला ही लेती है । यज्ञ ने वापस आकर कहा कि हे देवताओं! वाक् ने मुझे बुला लिया है अर्थात् अब के वह मेरी बन गई है ) " पार्थिव वाक्, सूर्य ज्योति द्वारा सूर्थ्य देवता में शामिल हो गई - यही असली बात है । प्रसंगागत स्त्री के आत्मा का प्राकृतिक स्वभाव बतलाने के लिए इतना प्रपंच रचा गया है ।: I [ १ ९ ४ ]

पृष्ठ 213

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 213 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिन दीक्षा " स होवाचाह्नत वै मेति " ॥२१ ॥

यज्ञ ने देवताओं से जब " उसने उसे बुला लिया है अर्थात् उसने कह दिया है कि मैं अवश्य तुम्हारी बनूंगी । " यह कहा तो इस पर देवताओं ने विचार किया कि भाई यह वाक् योषा है अर्थात् स्त्री है । इसने यज्ञ को बातों ही बातों में राजी कर दिया है । यज्ञ से यह मिली नहीं है । ( नयुविता ) यज्ञ के साथ इसका मिथुन हुआ नहीं है । स्त्रियों की बात का सहसा विश्वास नहीं करना चाहिए । यही पूर्वोक्त कथन का तात्पर्य है । " ते देवा ईशां चक्रिरे, योषा वाऽयंवाग् - यदेनं नयुविता " अर्थात् आखिर तो वाक्स्त्री थी न - इस नए बेचारे यज्ञ को बातों में ही टाल दिया, यही तात्पर्य है स्त्रियां वादा कर लेती हैं परन्तु समय पर मुकर जाती हैं इस स्वाभाविक भाव को ही पूर्व वाक्य से बतलाया गया है । देवताओं ने यज्ञ को कहा कि हे यज्ञ, तुम उसकी बातों पर विश्वास मत करो, तुम तो उससे यह कहो कि — मैं यहां मौजूद हूँ । तुम यहीं मेरे पास ही आ जाओ । मुझसे इसी स्थान पर आकर मिलो तब समभूंगा कि तुम वास्तव में मेरे से प्यार करती हो । " इहैव मा तिष्ठन्तमभ्येहि- इति ब्रूहि " एवं साथ ही में देवताओं ने यज्ञ से यह भी कह दिया जब कि वह आ जाय तो उसी समय तुम हमें कहना, उसके आने की सूचना भी दे देना । " तां तु न श्रागतां प्रतिब्रू तात " अर्थात् ' नः - अस्मान् प्रब्रूहि ' यज्ञ को देवताओं ने यही कहा । यज्ञ ने देवताओं के कथनानुसार वही वाक्य वाक् को कहे । वाक् यज्ञ के प्रेम में बंध चुकी थी अतः वह यज्ञ के बतलाए उस निर्दिष्ट स्थान में यज्ञ के पास आ पहुंची । " सा हैनं तदेव ( तत्रैव संकेतस्थाने ) तिष्ठन्तमभ्येयाय " । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि जिस पुरुष के प्रेम में स्त्री फंस जाती है वह पुरुष के बतलाए उस सं स्थान में, हजार प्रापत्ति आने पर भी पहुंच ही जाती है, चाहिए सच्चा प्रेम । " तस्मादु स्त्री पुमांसं संस्कृते तिष्ठन्तमभ्येति " । देवताओं के कथनानुसार अपने पास उसे आई देखकर उसी समय यज्ञ ने देवताओं को खबर कर दी कि यह वाक् आ गई है— तां हैभ्य श्रागतां प्रति प्रोवाच " इयं वाऽप्रागात् " इति ॥ २३ ॥

देवता तो इसी की बाट जोह रहे थे । आते ही उन्होंने उसे असुरों की दृष्टि से छिपा लिया । छिपाकर उसे स्वीकार कर अर्थात् अपने वश में कर, देवताओं ने उसे अग्नि में आहुति दे डाली । विज्ञानभाव के साथ साथ ही मनुष्यदेवता भाव का भी पूर्वोक्ति भूमिका में समावेश कर दिया गया है । यज्ञ आहुति को कहते हैं । आहुति प्रारण व्यापार का नाम है । प्राण व्यापार वाक् से ही [ १६५ ]

पृष्ठ 214

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 214 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( श्र ० २ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिनदीक्षा होता है । अर्थात् यज्ञ बिना मन्त्र के बिना वाक् के नहीं होता । वाक् अर्थात् मन्त्र के साथ ही आहुति देनी पड़ती है । परन्तु यह वाक् असुरों से अन्तरित होनी चाहिए । तात्पर्य यही है कि जो अशुद्ध वाक् होती है वह आसुरी वाक् कहलाती है । बोलना चाहिए राम, बोल गए लाभ, बस यह लाम आसुरी भाषा है । इससे प्राहुति नहीं दी जा सकती । " श्रग्नये स्वाहा, इन्द्राय स्वाहा, इस प्रकार प्रासुरी वाक् से अन्तरित जो दिव्य वाक् है उसी से प्राहुति दी जाती है । असुरान्तरित दिव्या वाक् से ही यज्ञ का सम्बन्ध होता है । अग्नि के लिए स्वाहा है, यदि लौकिक वाक् बोलकर ग्राहुति देना चाहोगे तो यज्ञ भ्रष्ट हो जायगा! इस दिव्या वाक् के स्वरूप को देवता अर्थात् विद्वान ही समझ सकते हैं । जो हैं अर्थात् मूर्ख हैं वे वाणी की शुद्धता से कोसों दूर रहते हैं । यज्ञ द्वारा देवताओं ने वाक् को अपने वश में कर तद्द्द्वारा आहुति डाल दी । इसका अपन स्वर्गवासी देवताओं के पक्ष में यही अर्थ समझना चाहिए । पृथिवी काली है अतएव हम उसे असुर कहने के लिए तैय्यार हैं । उसके जो पदार्थ हैं वे वाक् नाम से प्रसिद्ध हैं । यह वाक् जो कि असुरों की वाक् थी सूर्य- रश्मियों द्वारा अर्थात् यज्ञ द्वारा असुरों से अर्थात् पृथिवी से अलग होकर देवताओं में अर्थात् सूर्यलोक में शामिल हो जाती है यह तो इस आख्यान का वैज्ञानिक अर्थ है एवं विद्वान लोग मूर्खो ( असुरों ) से वाक् को छीनकर अर्थात् श्रासुरी भाषा का परित्याग कर वाक् को अपने वश में कर, इसके द्वारा अर्थात् मन्त्र द्वारा अग्नि में प्राहुति डाल देते हैं - यही इस आख्यान का ऐतिहासिक अर्थ है । इन्हीं दोनों अर्थों को लक्ष्य में रखते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं— " तां देवाः असुरेभ्योऽन्तरायन् । तां स्वीकृत्याग्नावेव परिगृह्य सर्वे हुतम-जुहवः ” । यह जो आहुति डाली जाती है वह प्राण देवताओं में शामिल होती है इसलिए भी वाक् का देव-ताों के साथ सम्बन्ध मान लिया जाता है । " आहुति हि देवानाम् " वाक् वर्णात्मक, अक्षरात्मक, स्वरात्मक एवं श्रुत्यात्मक भेद से चार प्रकार की होती है । जो वर्णात्मक वाक् है वह पृथिवी की वाक् है । इसी का नाम अनुष्टुप वाक् है । क - च - ट - त - प इस अनु-ष्टुप् वाक् का स्वरूप है । आहुति के साथ जो वाक् बोली जाती है । वह चूंकि क - च - ट - त- प इत्यादि रूपयुक्ता हैं, वर्णात्मिका है, पार्थिवा है अतएव यह वाक् अनुष्टुप् कहलाती है । इसके साथ देवतानों को ( प्राण देवताओं को ) आहुति दी जाती है केवल वाक् देवताओं को नहीं मिलती, अपितु प्राहुतियुक्तवाक् ही देवताओं को मिलती है इसीलिए तो " प्राहुतिर्देवानाम् " यह पूर्व में कहा गया है । प्रकृत में यही बत-लाना है कि उन देवताओं ने अर्थात् मनुष्य देवताओं ने आहुति द्वारा जिस क - च - ट - त - प इत्यादिक प्रयुक्ता अनुष्टुप् वाक् का अग्नि में हवन किया, प्राण देवताओं ने ग्राहुतियुक्ता उस वाक् को स्वीकार कर लिना । अर्थात् देवता ( विद्वान् ) यज्ञ द्वारा प्राणदेवता स्वर्ग से बद्ध हो गए । [ १६६ ]

पृष्ठ 215

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 215 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिनदीक्षां “ स ( ते मनुष्य देवाः ) यामेवानुष्टुभाजुहवुस्तदेवैनां तद्देवास्वकुर्वन् ” । अर्थात् श्राहुति युक्त वाक् को ही उन्होंने स्वीकार किया । न केवल वाक् को किया, न केवल प्राहुति को ही, यज्ञ में मन्त्र और प्राहुति दोनों की अपेक्षा है - यही तात्पर्य है । एवं जो असुर थे अर्थात् मूर्ख थे उन्होंने देवतानों से वाक् के सारांश को छिन जाने से प्रात्तवचस हेअरवः, के स्थान में हे अलवः, हे अलवः, बोलते हुए परास्त हो गए । अर्थात् वाणी का सारभाग देवता खींच लेते हैं | कूड़ा - कर्कट असुरों के मूर्खो के हिस्से में आता है । यही हालत इन असुरों की हुई । यह घोर अशुद्ध बोलकर यज्ञ करते थे, अतएव बजाय विजय के उलटे परास्त हो गए । यज्ञ में एक अक्षर की

भी अशुद्धि नहीं होनी चाहिए - यही तात्पर्य है ।

" तेऽसुरा प्रात्तवचसो हेऽलवो हेऽलव इति वदन्तः पराबभूव: " ॥२३ ॥

प्रसङ्गागत वाक् के विषय में कुछ विशेषता और बतला देते हैं । जो मनुष्य इस उपजिज्ञास्य वाक् को बोलता है उसे म्लेच्छ अर्थात् असुर समझना चाहिए । जिसकी बोली में यह संदेह रहे कि यह क्या बोलता है, इसके कहने का क्या अर्थ है, जिसमें यह जिज्ञासा बनी रहे, वह म्लेच्छ भाषा समझनी चाहिए । ऐसी संदिग्ध भाषा बोलने वाला भी सर्वथा म्लेच्छ ही है । असुर ऐसी उपजिज्ञास्य वाणी ही बोले - यही तो उसके पराभव का कारण था— " तत्रतामपि वाच मूदुरुपजिज्ञास्याम् " इसीलिए भगवान् याज्ञवल्क्य आदेश करते हैं । ब्राह्मण को चाहिए कि वह म्लेच्छ कभी न बने । अर्थात् असंदिग्ध भाषा न बोले । क्योंकि यह वाक् असुर्या है । यह असुरों की भाषा है न कि देवताओं की । ब्राह्मण को तो सदा देवी भाषा बोलनी चाहिए: -“ तस्मान्न · ब्राह्मणो म्लेच्छेत्, श्रसूर्या हैषा वा वाक् " कहना इस प्रपञ्च से हमें यही है कि यह यज्ञकर्त्ता यजमान शुद्ध मन्त्र द्वारा आहुति देता है एवं शुद्ध बोलता है । वह शत्रुओं के वाक् भाग को खींच लेता है एवं अपहृत वाक् होते हुए वे शत्रु सर्वथा पराभूत हो जाते हैं परन्तु शर्त उसमें यह है कि वह वास्तव में इस वाक् विज्ञान को जानता हो जानने पर यह फल मिलता है । " एवमेवैष द्विषतां सपत्नानामादत्ते वाचम् । तेऽस्यात्तवचसः पराभवन्ति य एव मेतद्वेद ॥ २४ ॥

कृष्णविषाण - वस्त्र की गांठ में क्यों लगाना चाहिए? इसकी उपपत्ति के लिए पूर्व का सारा प्रपञ्च बतलाना पड़ा, क्योंकि बिना इस यज्ञ वाक् के प्राकृतिक विज्ञान को समझे कृष्णविषाण की उपपत्ति समझ में नहीं आ सकती थी । इस वाक् का विज्ञान बतला दिया गया । अब जिसके लिए ( कृष्णविषाण [ १६७ ]

पृष्ठ 216

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 216 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिनदीक्षा के लिए ) यह विज्ञान बतलाया गया है वह विज्ञान बतलाते हैं । यह यज्ञ वाक् की ओर दौड़ा । सूर्य्य का जो ज्योतिर्भाग है वह यज्ञ है एवं पृथिवी का वाक् भाग ही वाक् है । सूर्य का रश्मिमण्डल ( यज्ञ ) पृथिवी की ओर हरबार आक्रमण करता रहता है । " सोऽयं यज्ञो वाचमभिदध्यौ " इसका यही तात्पर्य है । मैं इसके साथ मिथुनी बनूं अर्थात् मेरा इस वाक् के साथ सम्बन्ध हो जाए इसी गरज से वह वाक् की भोर अभिमुख हुआ । इच्छा की देर थी, इच्छा करते ही वह उस वाक् के साथ युक्त हो गया । मिथुनभाव को प्राप्त हो गया । वास्तव में बात सच । सूर्य का ज्योतिर्भाग अर्थात् यज्ञ पृथ्वी पर चारों ओर श्राक्रांत रहता है । सौर प्रकाश पृथ्वी से संसृष्ट रहता है । इसी प्राकृतिक विज्ञान को बतलाने के अभिप्राय से कहते हैं: --" मिथुन्येनया स्यामिति तां संबभूव ॥२४ ॥

द्वादश प्राणसमष्टि का सूर्य्य है । उसमें से एक अन्यतम बलाधिष्ठाता प्राण का नाम “ इन्द्र " है । यही इन्द्र, हम सब प्राणियों का आत्मा है । यही इन्द्र चाक्षुषपुरुष नाम से प्रसिद्ध है । " योऽदक्षिणऽणि पुरुषः स चाक्षुषः " यह इसी इन्द्रालोक लिए कहा जाता है । संसार के जितने भी पदार्थ हैं वे द्यावापृथिवी के संयोग से उत्पन्न होते हैं । प्रत्येक पदार्थ में कुछ पृथिवी की चीज रहती है- कुछ सूर्य्य की चीज रहती है । दोनों के मेल से प्राणीजाति की उत्पत्ति होती है । जिस समय यज्ञ और वाक् अर्थात् पृथिवी और द्यु का मिथुन होने लगा, उस समय इन्द्र ने ( आत्म प्रजापति ) सोचा कि इस यज्ञ और वाक् के मिथुन से अवश्य ही कोई न कोई बड़ा जबर्दस्त अभ्व उत्पन्न होगा अर्थात् इस द्यावापृथिवी के संयोग से जो उत्पन्न होगा वह बड़ा ही बलवान् होगा । आत्मा का स्वभाव है जहां शुक्रशोणित का अर्थात् योषा - वृषा का सम्बन्ध हुआ कि वह उसमें कूद पड़ता है । यज्ञ वृषा है अर्थात् पुरुष है । वाक् योषा है अर्थात् स्त्री है जहां इन दोनों का सम्बन्ध हुआ कि श्रात्मोत्पत्ति हुई । यज्ञ भी एक जबर्दस्त शक्ति है । वाक् भी महाशक्ति है । इनसे जो उत्पन्न होगा उसके बल का कहना ही क्या है? बस इसी बात का विचार प्राणेन्द्र में हुआ । “ इन्द्रो ह वा ईक्षाञ्चक्रे महद्वाइतोऽभ्वं जनिष्यते यज्ञस्य च मिथुनाद्वाश्चनाय " इन्द्र अति बलवान था, उसे चिन्ता हुई कि इस मिथुन से उत्पन्न होने वाला कहीं मुझे परास्त न कर बैठे, इस ख्याल से वह स्वयं ही गर्भ बनकर प्रविष्ट हो गया । इन्द्र ही का नाम तो आत्मा है । उसके अलावा अन्य कौन गर्भ बन सकता था । इसी प्रकृतिसिद्ध धर्म को बतलाने के अभिप्राय से कहते हैं । यन्मा तन्नाभिभवेत् इति स इन्द्र एव गर्भो भूत्वैतन्मिथुनं प्रविवेश " ॥२६ ॥

एक सम्वत्सर में वह इन्द्र उत्पन्न हुआ । उत्पन्न होकर उसने विचारा कि यह योनि वास्तव में महावीर्या है । प्रति बलवती है । जिसने १२ महिने तक जैसे बलिष्ठ को अपने में रख लिया । इन्द्र विद्युत् का नाम है । विद्युत अति प्रबल वस्तु है । इसे कोई नहीं रोक सकता । यज्ञस्वरूप पार्थिव वाक् का संवत्सर चक्र है । वही इस मिथुन को रख सकता है । विद्युत् इसी संवत्सर चक्र में रहती है । प्रतिसंवत्सर में विद्युत का स्वरूप भिन्न भिन्न हो जाता है वर्षान्त में उत्पत्ति है । इसी अभि-प्राय से कहते हैं । [ १६८ ]

पृष्ठ 217

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 217 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिनदीक्षां स ह सम्वत्सरे जायमान ईक्षाञ्चक्रे, महावीर्या वा इयं योनि या मा मदीधरत ॥ इन्द्र को फिर चिन्ता हुई कि कही यह मेरे से अधिक बलवान् को उत्पन्न न करदे एवं वह उत्पन्न होकर मेरा श्रभिभव करदे । इस बात का विचार आते ही उस अपनी योनि को मोड़कर - छिन्न- भिन्नकर उसे यज्ञ के मस्तक पर रख दिया । तात्पर्य यही है कि कृष्णमृग के जो सींग हैं वह इन्द्र की योनि है अर्थात् उसमें इन्द्रप्राण अधिक मात्रा में व्याप्त है । कृष्णमृग वास्तव में यज्ञस्वरूप है इसके जो सींग हैं वे वास्तव में इन्द्र की योनि

है - इसे अभिप्राय से कहते हैं ।

" तां प्रति परामृश्यावेष्ट्या च्छिनत् ॥

काला हरिण यज्ञस्व है । इसके जो सींग हैं वह इन्द्र की योनि है अर्थात् सींगों में इन्द्रप्राण विशेषता से रहता है । काले हिरण के सींग इन्द्र विद्युत् की योनि है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण सींग की मजबूती ही है । बल ही इन्द्र का साक्षात् स्वरूप है जिसमें अधिक बल हो समझ लो उसमें इन्द्रप्राण अधिक घुसा हुआ है इसीलिए - याचका च बलकृतिरिन्द्रकर्म एवतत्-- यह कहा जाता है । यह इन्द्रप्राण भिन्न - भिन्न स्थानों में भिन्न - भिन्न स्वरूप कायम करके बैठता है । सींगों में यह प्रविष्ट होकर बैठा है— अतएव इन्द्र ने अपनी योनि को भेद कर यज्ञ के मस्तक पर रख दिया यह कहा गया है । इसी श्रभिप्राय से कहते हैं— " तां यज्ञस्य शीर्षन् प्रत्यधात् ( शीष्णि ) इति भावः " ॥ याज्ञवल्क्य यज्ञस्वरूप बतलाते हुए कहते हैं कि यह जो त्रयी विद्या सा प्रतिकृति स्वरूप काला हरिण है वही यज्ञ है । " यज्ञो हि कृष्णः ” सो जो यह यज्ञ है वह यही काले मृग का चर्म है अर्थात् जिस मृगचर्म पर यजमान बैठा हुआ है वह यज्ञ ही तो है । “ स यः स यज्ञस्तत् कृष्णाजिनम् " । एवं जो इन्द्र की योनि है वही काले हरिण का यह सींग है अर्थात् यज्ञ कृष्णमृगचर्म है एवं सींग

इस इन्द्र की योनि है, इन्द्र का प्रारण के रहने का स्थान है ।

यो सा ( या उसा ) योनिः सा कृष्णविषारणा ॥

यह कृष्ण विषाण वास्तव में इन्द्र की ही योनि है यह पहचान बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं-इस योनि को इन्द्र ने मोड़ मोड़ कर मसोस - मसोस कर छिन्न भिन्न कर डाला था इसीलिए यह हरिण के सींग स्वरूप योनि आविष्टित ही है अर्थात् सींग मुड़े हुए हैं चक्करदार हैं एवं इन्द्र ने अपनी योनि की ऐसी ही दशा की थी । श्रतएव मानना पड़ता है कि वास्तव में कृष्णविषारण इन्द्र की योनि है । द्वादशा प्राणसमष्टि का नाम ही सूर्य है इसमें एक अन्यतम प्राण का नाम इन्द्र है जिसे कि हम सूर्याभिन्नत्वात् सूर्य ही कह सकते हैं । यही इन्द्र अर्थात् चिदनुगृहीत सौरप्राण संसार के यच्चयावत् जड़ [ १६६ ]

पृष्ठ 218

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 218 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिन दीक्षा चेतन प्राणियों का आत्मा है अतएव " सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च " पद कहा जाता है । इन्द्रप्राण जो आत्मस्वरूप संपादनात् ग्रात्मा ही है वह वस्तुभेद से भिन्न भिन्न जिस्म में परिणत हो जाता है । यह इन्द्र हिरण के सीग में वक्रियता से प्रविष्ट होता है इसी वैज्ञानिक भाव के आधार पर पूर्व का इन्द्र सम्बन्धी आख्यान है | यजमान यज्ञ कर रहा है प्रतयव यज्ञ का जो साक्षात् स्वरूप है उसे ही अङ्गी-कार करना उचित है । अत: हिरण का सींग ही वस्त्रग्रन्थि में बांधा जाता है एवं कृष्णमृगचर्म ही बिछाया जाता है अपि च यह यजमान इस समय दीक्षा ग्रहण कर उभयतोग्र स्वरूप द्यावापृथिवीरूप माता - पिता की योनि में घुसकर गर्भस्वरूप बन रहा है अतएव इस विषाण को धारण करता हुआ यह यजमान, जैसे इस यज्ञ की योनि से इन्द्र गर्भ बनकर पैदा हुआ था, तद्वत् इसी यज्ञ मिथुन से गर्भ बन-कर पैदा होता है । अतएव आज यह कृष्णविषाण बांधता है । इन्द्र इसी योनि में से अर्थात् यज्ञ योनि में से पैदा हुआ था । बात सच है. अग्निसोमस्वरूप यज्ञ में ही तो चिदात्मा इन्द्र प्रविष्ट होता है । बिना यज्ञ के आत्मप्रजन हर्गिज नहीं हो सकता । कृष्ण विषाण यज्ञ की योनि है, यज्ञस्वरूप है । यज-मान दिव्याग्नि प्रधान कर दिव्याग्निप्रजननार्थ दीक्षित बना हुआ है अतएव निदानेन यज्ञमिथुनस्वरूप अतएव आत्मप्रजनन के साधनभूत कृष्णविषाण को धारण करता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " स यथैवात् इन्द्रोऽजायत गर्भो भूत्वैतस्मात्मिथुनात् एवमेवैषोऽतोजा-यते गर्भो भूत्वैतस्मात् मिथुनात् तस्मात् कृष्णविषाणं सिथि वधीते इति-शोषः ॥२८ ॥

उस कृष्णविषाण को ऊँचा मुख करके बांधता है । " तां वा उत्तानामिव बन्धनाति " कारण इसका यही है कि कृष्णविषारण यजमान की योनि है । यजमान गर्भस्वरूप है । यदि योनि का मुख प्रधोभाग की ओर रहता है तो गर्भस्थिति नहीं रह सकती । ऊर्ध्वाभिमुखी भूत्वा योनि ही गर्भ को धारण करने में समर्थ होती है । यदि योनि अधोभागन्विता रहती है तो गर्भपात हो जाता है चूंकि यजमान आज गर्भ बन रहा है एवं गर्भ बनकर विषाणस्वरूप योनि में प्रविष्ट हो रहा है अतः प्राकृतिक पैदाइश के नियमानुसार योनि स्वरूप विषाण को ऊँचा मुख करके ही बांधना चाहिए । अन्यथा गर्भपात हो जायगा । " उत्तानेव वै योनिर्गर्भ बिर्भात " ( तस्मात्तामुत्तामाभिव बध्नातीति शेषः ) इसके अनन्तर " इन्द्रस्य योनिरसि " यह मन्त्र बोलता हुआ यजमान दक्षिण भाग से प्रारम्भ कर ललाट के ऊपर तक के ऊपर तक के प्रदेश का इस कृष्ण विषाण से स्पर्श करता है । अथ दक्षिणां भुवभुर्युपरि ललाटमुपस्पृशति " " इन्द्रस्य योनिरसि " इति । याज्ञवल्क्य कहते हैं यह जो कृष्णविषाण है वह वास्तव में योनि है । इस योनि के साथ ही इन्द्र गर्भ के रूप से प्रविष्ट होता है । इसी इन्द्र योनि से पैदा होने वाला पैदा होता है । इन्द्र योनि से [ २०० ]

पृष्ठ 219

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 219 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णा जिनदीक्षा यज्ञ ही अभिप्रेत है | अग्निसोमात्मक यज्ञ ही तो इन्द्र की योनि है । जो कि निदानेन काले हिरण का सींग है | मस्तक के स्पर्श कराने का कारण यही है कि वह मस्तक भी वास्तव में इन्द्र की योनि है । इन्द्र का प्रवेश ब्रह्मरन्ध्र द्वारा शिरोगुहा में ही होता है एवं संसार में जो भी कोई पैदा होने वाला है वह इसी मुख भाग से पैदा होता है । मुखभाग से अभिप्रेत है कि मुख में ही अन्न की आहुति पड़ती है इसी से वीर्य बनता है एवं वीर्य से जायमान उत्पन्न होता है अपि च पैदा होने के अनन्तर भी मुखभाग से ही शरीर प्राप्ति होती है । अन्न के उदर में जाने का यही मार्ग है । इन्द्र प्राणस्वरूप मस्तक प्रदेश में इन्द्रप्राणयुत कृष्णविषारण के स्पर्श का यही कारण है कि श्राप दोनों मिलकर इन्द्रस्वरूप अर्थात् आत्मस्वरूप उस यजमान को अपनी योनि में प्रतिष्ठित रक्खें । " इन्द्रस्य ह्येषा योनिरतो वाह्य ेना प्रविशन् प्रविशति । अतो या जाय-मानो जायते । तस्मादाह - " इन्द्रस्य योनिरसि " ॥२ ९ ॥ तदनन्तर वह यजमान उस कृष्णविषारण से " सुसस्याः कृषिष्कृधि " इस मन्त्र से पास ही की जमीन को जरा कुचर देता है । प्रथोल्लिखित - " सुसस्याः कृषिष्कृधीति । हे कृष्णविषाणे | आप इस पृथिवी को एवं इस खेती को धानवाली बनायो । अर्थात् इस खेत में खूब अन्न पैदा हो - ऐसा आर्शीवाद दो इस उल्लिखन् से यज्ञ ही को उत्पन्न करता है । " यज्ञमेवं तज्जनयति " इस अभिप्राय से कहते हैं जब खेती वृष्टयादि सम्पत्ति से सुखद होती है । अर्थात् जब खेत में अन्न बहुतायत से पैदा होता है तो यज्ञ अनुष्ठान के लिए वह मन्त्र काफी होता है । यज्ञ तभी हो सकता है । यज्ञानुष्ठान अन्न सम्पत्ति पर निर्भर है । यदि खेती बुरी होती है अन्न पैदा नहीं होता है यदि होता भी है तो थोड़ा सा ही पैदा होता है तो ऐसी अवस्था में तो इतना अन्न उदर-भरण के लिए भी अर्थात् पेट भरने के लिए भी काफी नहीं होता है ऐसी अवस्था में यज्ञ करके करना ही क्या है? इसी अभिप्राय से कहते हैं-" यदा वै सुषमं भवति अथालं यज्ञाय भवति यदो दुःषमं भवति न तर्ह्यात्मने च नालं भवति " चूंकि यज्ञ अन्न पर निर्भर है । अन्न हल जोतने पर ही उत्पन्न होता है चूंकि यजमान सोमयज्ञ करने वाला है अतएव उल्लिखन् करता हुआ निदानेन अन्न पैदा होने की भावना कर अपने यज्ञ को ही उत्पन्न करता है । तात्पर्य यही है कि मन्त्र द्वारा कृष्णविषाण से भूमि को जरा खोदकर अन्नोत्पत्ति की

भावना कर लेनी चाहिए क्योंकि यज्ञ अन्न पर अर्थात् पुरोडाश पर ही अवलम्बित है ।

" तद्यज्ञमेवैतज्जनयति ॥३० ॥

याज्ञवल्क्य कृष्णविषाण के रखने का उपयोग बताते हुए कहते हैं कि यह यजमान यह दीक्षित काष्ठ से अथवा नाखून से कभी भी खाज न खोरे । [ २०१ ]

पृष्ठ 220

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 220 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण " न दीक्षितः । काष्ठेन नखेन वा कण्डूयते " कृष्णा नदीक्षा कारण इसका यही है कि जो मनुष्य दीक्षा लेता है वह गर्भ बनता है । जो अपने गर्भ को काष्ठ से अथवा नाखून से कुचर ड़ाले उसका यह गर्भ सर्वथा नष्ट हो जाता है । यह यजमान गर्म बना हुआ है यह उस वास्तविक गर्भ के अनुरूप मरेगा तो नहीं, परन्तु यदि यह काष्ठ अथवा नाखून से अपने को ( गर्भ को ) कुचर डालेगा तो यह पामन होने में समर्थ हो जाता है अर्थात् इसके पांव नाम का रोग हो जाता है । " गर्भो वा भवति यो दीक्षते, यो वै गर्भस्य काष्ठेन वा नखेन वा कण्डूयते अपास्य नु स्त्रियेत् ( अस्यापनयेत् ) ततो दीक्षितो पामनो भवितो ( भवितुं समर्थो भवतीत्यर्थः ) इतना ही नहीं अपितु दीक्षित से उत्पन्न जो इसके रेत हैं अर्थात् पुत्र हैं वे भी पान रोग को उत्पन्न करने में भी सर्मथ हो जाते हैं । अर्थात् अपने ही यह रोग नहीं होता अपितु बेटे पोतों तक के यह रोग हो जाता है । " दीक्षितं वानुरेतांसि ( रेतांसि पामनानि जनितोः ) जनितुं समर्थो भवति ” । परन्तु जो गर्भ की योनि है—– गर्भ को अपने में प्रतिष्ठित रखने वाली है, वह गर्भ को नष्ट नहीं करती है अपितु वह गर्भ की रक्षा करती है । यह जो कृष्णविषाण है वह इस इन्द्रस्वरूप आत्मा की अपनी योनि है श्रतएव कृष्णविषाण इस गर्भ को कोई नुकसान नहीं पहुंचाती है । बात समझ में नहीं आती, परन्तु माननी पड़ती है । वैज्ञा-निकों ने प्राणपरीक्षा करके ही इस श्राज्ञा को जारी किया है । अतएव इनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती जैसे कि आज भी राजाज्ञा को आंख मींचकर मान लेनी पड़ती है । अस्तु अन्त में याज्ञवल्क्य कहते हैं कि चूंकि यह कृष्णविषाण यजमान की अपनी योनि है अतएव इसे चाहिए कि यह इसी से खांज - खोरे । कृष्णविषाण से, अन्य से खाज कदापि न खोरे । " स्वावै योनि रेतो न हिनस्ति, एषा वा एतस्य योनिर्भवति यत् कृष्ण-विषारणा तथो हैनमेषा न हिनस्ति । तस्माद् दीक्षितः कृष्णविषारणयैव कण्डूयते नान्येन कृष्णविषाणायाः ” ॥३१ ॥

इसके अनन्तर यजमान के हाथ में दण्ड लिया जाता है । वज्र से भी प्रहार किया जाता है एवं दण्ड से भी प्रहार किया जाता है अतएव प्रहारसाधनत्वात् दण्ड भी वज्र ही है । यज्ञ में प्रायः दुष्ट राक्षस लोग सदा आक्रमण करते रहते थे । उन प्राक्रमणों से रक्षा करने के लिए भुवन - स्वर्गवासी देवताओं ने दीक्षा में दण्ड का भी विधान किया । बस उसी मर्यादा के अनुसार में एवं यदि कोई यहां आक्रमण कर बैठे उसके विनाश के लिए यजमान को दण्ड सौंपा जाता है—

अथास्मै दण्डं प्रयच्छति । वज्रो वै दण्डो विरक्षस्तायै । ॥ ३२ ॥

यह एक गूलर के पेड़ का होता है । जो उदुम्बर है वह अन्न अर्क प्रधान है । बलकरण का नाम के वृक्ष में यह अरस अधिक मात्रा में रहता । उन्नं-है, अर्क है । और और अन्नों की अपेक्षा गूलर [ २०२ ]