Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 21–30
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 21–30
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श्रो ३ म् तत् सब्रह्मणे नमः अथ तृतीयकाण्डे प्रथमः प्रपाठकः प्रथमोऽध्यायः प्रारभ्यते तत्र प्रथमं ब्राह्मणम् ॥ श्रथ देवयजनब्राह्मणम् ॥
वाचं देवा उपजीवन्ति विश्वे वाचं गन्धर्वाः पशवो मनुष्याः ।
वाचीमा विश्वा भुवनान्यपिता सा नो हवं जुषतामिन्द्रपत्नी ॥ १ ॥
वागक्षरं प्रथमजा ऋतस्य वेदानां माताऽमृतस्य नाभिः ।
सा नो जुषाणोपयज्ञमागादवन्ती देवी सुहवा मेऽस्तु ॥ २ ॥
[ मूल ] ॐ । देवयजनं जोषयन्ते । स यदेव वर्षिष्ठं स्यात्तज्जोषयेरन्यद् भूमेर्नाभिशयीतातो वै देवा दिवमुपोद क्रामन्देवान्वाऽएष उपोत्क्रामति यो दीक्षते स सदेवे देवयजने यजते स यद्धान्यद्भ मेरभिशयीतावरतरऽइव हेष्ट्वा स्यात्तस्मा-द्यदेव वर्षिष्ठं स्यात्तज्जोषयेरन् ॥ १ ॥
तद्वर्ष्म सत्समं स्यात् । समंसदविभ्रंशि स्यादविभ्रंशि सत्प्राक्प्रवणं स्यात्प्राचि हि देवानां दिगथोऽउदक् प्रवरणमुदीची हि मनुष्याणां दिग् दक्षिणतः प्रत्युच्छ्रितमिव स्यादेषा वै दिक् पितृणां स यद्दक्षिरणाप्रवणं स्यात्क्षिप्रे ह यज-मानोऽमुं लोकमियात्तथो ह यजमानो ज्योग्जीवति तस्माद्दक्षिणतः प्रत्युच्छ्रित-मिव स्यात् ॥ २ ॥
न पुरस्ताद्देवयजमात्रमतिरिच्येत । द्विषन्तं हास्य तद्भ्रातृव्यमभ्यति -रिच्यते कामं ह दक्षिरणतः स्यादेवमुत्तरत एतद्ध त्वेव समृद्धं देवयजनं यस्य देव-यजनमात्रं पश्चात्परिशिष्यते क्षिप्रे हैवैनमुत्तरा देवयज्योपनमतीति नु देव-यजनस्य ॥ ३ ॥
[ ३ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण देवयजन ब्राह्मण तदु होवाच याज्ञवल्क्यः वाष्र्णाय देवयजनं जोषयितुमैमतत्सात्य-यज्ञोऽब्रवीत्सर्वा वाऽइयं पृथिवी देवी देवयजनं यत्र वाऽश्रस्यै क्व च यजुषैव परिगृह्य याजयेदिति ॥ ४ ॥
ऋत्विजो हैव देवयजनम् । ये ब्राह्मणाः शुश्रुवांसोऽनूचाना विद्वांसो याजयन्ति सैवाह्वलंतन्नेदिष्ठतमामिव मन्यामहऽइति ॥ ५ ॥
तच्छालां वा विमितं वा प्राचीन वंशंमिन्वन्ति । प्राची हि देवानां दिक्पुरस्ताद्वै देवाः प्रत्यञ्चो मनुष्यानुपावृत्तास्तस्मात्तेभ्यः प्राङ् तिष्ठ-ञ्जुहोति ॥ ६ ॥
तस्मादु ह न प्रतीचीनशिराः शयीत । नेद्देवानभिप्रसार्य शयाऽइति या दक्षिणा दिक्सा पितृणां या प्रतीची सा सर्पाणां यतो देवा उच्चक्रमुः सैषाऽहीना योदीची दिक्सा मनुष्याणां तस्मान्मानुषऽउदीचीनवंशामेव शालां वा विमितं वा मिन्वन्त्युदीची हि मनुष्यारणां दिग्दीक्षितस्यैव प्राचीनवंशा नादीक्षितस्य ॥ ७ ॥
तां वा एतां परिश्रयन्ति । नेदभिवर्षादिति न्वेव वर्षा देवान्वा एषऽ उपावर्तते यो दीक्षते स देवतानामेको भवति तिरंऽइव वै देवा मनुष्येभ्यस्तिर-वैद्यपरिश्रितं तस्मात्परिश्रयन्ति ॥ ८ ॥
तन्न सर्वइवाभिप्रपद्येत । ब्राह्मणो वैव राजन्यो वा वैश्यो वा ते हि यज्ञियाः ॥ ९ । स वै न सर्वेणैव संवदेत । देवान्वा एष उपावर्तते यो दीक्षते स देवता-नामेो भवति न वै देवाः सर्वेणैव संवदन्ते ब्राह्मणेन वैव राजन्येन वा वैश्येन वा ते हि यज्ञियास्तस्माद्यद्येनं शूद्रेण संवादो विन्देदेतेषामेवैकं ब्रूयादिममिति विचक्ष्वेममिति विचक्ष्वेत्येष उ तत्र वीक्षितस्योपचारः ॥ १० ॥
अथारणी पाणौ कृत्वा । शालामध्यवस्यति स पूर्वार्ध्यं स्थूणा राजर्माभ-पद्यैतद्यजुराहेदमगन्म देवयजनं पृथिव्या यत्र देवासोऽप्रजुषन्त विश्वऽइति तदस्य [ ४ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण देवयजन ब्राह्मण विश्वंश्च देवैर्जुष्टं भवति ये चेमे ब्राह्मणाः शुश्रुवांसोऽनूचाना यदहास्य तेऽक्षिभ्या-मीक्षन्ते ब्राह्मणाः शुश्रुवांसस्तदहास्य तैर्जुष्टं भवति ॥ ११ ॥
यद्वाह । यत्र देवासोऽप्रजुषन्त विश्वऽइति तदस्य विश्वैर्देवैर्जुष्टं भवत्यृ-क्सामाभ्यां सन्तरन्तो यजुभिरित्युक्सामाभ्यां वै यजुभिर्यज्ञस्योरचं गच्छन्ति · यज्ञस्योढचं गच्छानीत्येवैतदाह रायस्पोषेरण समिषा मदेमेति भूमा वै रायस्पोषः श्री भूमाशिषमेवं तदाशास्ते समिषा मदेमेतीषं मदतीति वै तमाहुर्यः श्रिय-मश्नुते यः परमतां गच्छति तस्मादाह समिषा मदेमेति ॥ १२ ॥
[ अनुवाद ] – ॥ ॐ ॥ वे देवयजन के लिए ( स्थल ) पसंद करते हैं । ( इस हेतु ) वह ( स्थल ), जो सर्वाधिक उभरा हुआ हो, पसन्द किया जाना चाहिए । अर्थात् ( उस ) भूमिका ( अन्य आस - पास का ) स्थल उससे ऊँचा नहीं होना चाहिए । इसी स्थल से देवता ऊपर द्य ुलोक में पहुँचे थे । ( इस प्रकार ) जो दीक्षा लेता है वह भी उन देवों के निकट पहुँच जाता है । वह देवों के सान्निध्य में रहता हुआ यज्ञ में आहुतियाँ डालता है । यदि उस स्थल से ऊँची कोई अन्य भूमि ( आस - पास ) हुई तो वह ( दीक्षित ) उस निचले भू - भाग पर यजन करने के कारण हीनतर हो जाएगा । इसलिए जो भूमि सबसे अधिक ऊँचाई पर हो, वही यज्ञ हेतु पसन्द की जानी चाहिए ॥ १ ॥
उन्नत होने के साथ - साथ वह ( यज्ञ - स्थल ) चौरस होना चाहिए | चौरस होने के साथ - साथ सुदृढ़ होना चाहिए । सुदृढ़ होने के साथ - साथ वह पूर्व की ओर ढलान वाला होना चाहिए । क्योंकि पूर्व दिशा देवताओं की ( मानी जाती ) है । तदनन्तर उस स्थल का ढलाव उत्तर की ओर होना चाहिए । क्योंकि उत्तर दिशा मनुष्यों की है । ( वह यज्ञ स्थल ) दक्षिण की ओर से यत्किञ्चित् ऊपर उठा हुआ होना चाहिए । यह ( दक्षिण ) दिशा पितरों की है । यदि वह यज्ञ स्थल दक्षिण की ओर ढलाव वाला होगा तो यजमान तुरन्त ही उस ( पितृ ) लोक में पहुँच जाएगा । परिवर्तित स्थिति में ( यज्ञ स्थल का पूर्वोत्तर ढलान होने पर ) तो यजमान चिरकाल तक जीता है । इसीलिए यज्ञ - स्थल दक्षिण की ओर से ऊँचा उठा हुआ होना चाहिए ॥ २ ॥
( चुने गये ) यज्ञ - स्थल की मात्रा से अधिक विस्तृत भूमि सामने की ओर नहीं होनी चाहिए क्योंकि ( ऐसा होने पर ) उस ( यजमान ) से द्वेष रखने वाले शत्रु भी उसी अनुपात में बढ़ जाएँगे । दक्षिण दिशा में चाहे ( बढ़ कर ) हो, उसी प्रकार उत्तर की ओर भी बढ़ी हुई हो सकती है ) । और ऐसा यज्ञ निश्चय ही सफलता प्रदान करने वाला है-[ ५ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण देवयजन ब्राह्मरंग जिस यज्ञ भूमि के पश्चिमी भाग का परिमाण अधिक विस्तृत हो ( ऐसा करने पर ) इसकी विपरीत दिशा ( पूर्व दिशा ) निश्चय ही यज्ञ की योग्यता को प्राप्त कर लेती है । यह ( प्रकरण ) देवयजन ( स्थल के विषय में ) है ॥ ३ ॥
तदुपरान्त याज्ञवल्क्य ने वार्ण्य से कहा । हम यज्ञ स्थल पसन्द करने के लिए गये । तृब सात्ययज्ञ बोला – यह दिव्यस्वरूपिणी सारी पृथिवी यज्ञ स्थल है, अतः जहाँ जितना भी ( स्थल पसन्द करो ), यजुः मन्त्रों द्वारा ( स्थल - परिमाण ) प्राप्त करके ( उसी स्थान पर ) यज्ञ करना चाहिए ॥ ४ ॥
ऋत्विज ही यज्ञ है । ( जिसे ) वेदानुरागी तथा साङ्गोपाङ्ग वेदाध्यायी विद्वान् ब्राह्मण सम्पन्न कराते हैं वही यज्ञ अविकल होता है । ( हम ) ऐसे देवयजन को ( देवों के पास ) पहुँचा - सा मानते हैं ॥ ५ ॥
तदुपरान्त ( वे ) विशिष्ट परिमाण वाली चौकोर आयतन वाली ( पूर्वाभिमुख बाँस के शहतीरों वाली ) शाला अर्थात् ' प्राचीनवंश ' की प्रतिष्ठा करते हैं । वस्तुतः देवता पूर्व दिशा के अधिकारी हैं । पूर्व दिशा से देवता मुड़ कर मानवों के पास पहुँचे, इसीलिए उन देवों के लिए मनुष्य पूर्वाभिमुख खड़ा हो कर आहुति देता है ॥ ६ ॥
अतः पश्चिम की ओर सिर करके ( दीक्षित व्यक्ति ) न सोए । देवों की तरफ पैर फैला कर नहीं सोना चाहिए । जो दक्षिण दिशा ( कहलाती ) है वह पितरों की है । जो पश्चिम दिशा है वह सर्पों की है । जहाँ से देवता ( मनुष्यों की ओर ) चल पड़ े – वही यह समृद्ध पूर्व दिशा है । जो उत्तर दिशा ( कहलाती ) है वह मनुष्यों की है । इसीलिए मनुष्य विशिष्ट परिमाणवाली उत्तराभिमुख शहतीरों वाली शाला बनाते हैं । उत्तर दिशा मनुष्यों की है । पूर्वाभिमुख शहतीरों वाला प्राचीनवंश नामक यज्ञ - गृह दीक्षित ( व्यक्ति ) का होता है न कि प्रदीक्षित का ॥ ७ ॥
( वे ) इसे घेर ( कर सुरक्षित कर ) लेते हैं । कहीं चारों ओर पानी न बरस जाए । कहीं वर्षा से ( भीग न जाए ) । जो दीक्षा लेता है वह देवों के पास पहुँच जाता है । वह देवताओं में से ' एक ' हो जाता है । मनुष्यों के लिए देवता अदृश्य से हैं । यह जो घेर कर सुरक्षित किया गया है यह भी अदृश्य - सा हो जाता है । इसीलिए ( वे ) यह परिश्रयण कर्म करते हैं ॥ ८ ॥
इसमें सब लोग प्रविष्ट न हों । या तो ब्राह्मण या राजन्य या वैश्य । क्यों कि ये ( ही ) यज्ञ के अधिकारी हैं ॥ ६ ॥
[ ६ ]
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अ ० १ ) शतपथ ब्राह्मण देवयजन ब्राह्मण और वह ( व्यक्ति ) न किसी से वार्त्तालाप करे । जो दीक्षा लेता है वह देवों के निकट पहुँच जाता है । वह देवों में से ही एक कहलाता है । और देवता प्रत्येक से वार्तालाप नहीं करते । केबल ब्राह्मण से या राजन्य से या वैश्य से ( वार्तालाप करते हैं । ) क्योंकि ये यज्ञ के अधिकारी हैं । और यदि इस ( द्विज ) को ( किसी ) शूद्र से बात करनी
पड़ जाए तो वह इन ( तीनों ) में से किसी एक से कहे – इसे यह कह दो — इसे यह कह दो ।
उस समय दीक्षित व्यक्ति का यही व्यवहार ( कहा गया ) है ॥ १० ॥
अब वह दो अरणियों को हाथ में लेकर शाला में प्रविष्ट होता है । वह शाला के पूर्वार्द्ध में स्थित स्थूणराज अर्थात् मध्यस्तम्भ के पास जा कर इस यजुः ( मन्त्र ) का उच्चारण करे— ' एदमगन्म देवयजनं पृथिव्या यत्र देवासो अजुषन्त विश्वे ' ( वा. सं. ४ / १ ) ( हम पृथिवी के उस देवयजनस्थल पर आए हैं जिसकी सभी देवों ने कामना की थी ) । इस प्रकार इसका ( रूप ) सभी देवों द्वारा काम्य हो जाता है यदि, - जो वेदानुरागी श्रधीतसाङ्गवेद विद्वान् ब्राह्मण हैं - वे इसे आँखों से देख लें । ( देखने वाले ) ब्राह्मण वेदानुरागी हों तभी ( इसका स्वरूप ) उन देवों को प्रिय लगता है ॥ ११ ॥
जब वह उच्चारण करता है " यत्र देवासो अजुषन्त विश्वे " ( जहाँ सभी देवता प्रसन्न हो गये ) तब उसका यज्ञ सभी देवों द्वारा पसन्द कर लिया जाता है । ( वह उच्चारण करता है ) — ‘ ऋक् सामाभ्यां सन्तरन्तो यजुभि: – ( वा. स. ४ / १ ) – ( ऋक्, साम तथा यजुषों द्वारा पार पहुँचते हुए ) - ऋक् साम तथा यजुषों द्वारा ही ( वे ) यज्ञ की परिसमाप्ति तक पहुँचते हैं । ( जैसा कि ) वह उच्चारण भी करता है - " यज्ञस्योहचं गच्छानि ” अर्थात् मैं यज्ञ की पूर्णता तक पहुँच जाऊँ । ( फिर वह उच्चारण करता है ) – “ रायस्पोषेण समिषा मदेम ” अर्थात् धनसमृद्धि तथा अन्न के प्राचुर्य के कारण हम सदा आनन्द मनाते रहें । धन की समृद्धि ही ' भूमा ' कहलाती है । तथा ' भूमा ' ( मन तथा आत्मा का भरा-भरापन ) ही श्री कही जाती है । इस प्रकार वह आशीर्वाद देता है कि ' समिषामदेम ' | जो ' श्री ' को पा लेता है तथा सर्वोच्चता पा लेता है उसके बारे में लोग कहने लगते हैं कि यह अन्न को पा कर आनन्दित हो रहा है । इसीलिए यहाँ कहा गया है कि ' समिषा मदेम ' अर्थात् हम अन्न पा कर आनन्दित रहें ॥ १२ ॥
[ विज्ञानभाष्य ] यज्ञ - अध्वर और चित्या इन दो भागों में बंटे हुए हैं- अग्नि में सोम की आहुति डालकर जो यज्ञ किया जाता है - उसे अध्वर कहते है - एवं अग्नि में अग्नि ही की आहुति डाल कर जो यज्ञ किया जाता है— उसे चित्या कहते हैं । अग्नि अन्नाद है— अर्थात् भोक्ता है – एवं सोम अन्न है । सोम जब अग्नि में डाला जाता है तो अन्नाद अग्नि उसे हजम कर जाता है । अग्नि में आहुत सोम-[ ७ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण देवयजन ब्राह्मण भुक्तान्नवत् अग्नि का आत्मा बन जाता है । परन्तु आग आग को नहीं पचा सकता । अतएव जब आग में आग डाली जाती है तो उस पहिले वाले अग्नि पर उस दूसरे हुत अग्नि का चुनाव हो जाता है । उत्तरोत्तर हुत अग्नि उस पर बैठता जाता है । तह पर तह इस क्रम से २१ तक अग्नि का चुनाव हो जाता है - बस इसीलिये इस दूसरे यज्ञ को - ' चित्या ' किंवा चयन कहते I अध्वर यज्ञ से स्वर्गप्राप्ति ( सप्तदशे ) होती है— एवं चित्या से मुक्ति होती है । इसी अभिप्राय से ‘ नामृतत्वस्याशास्ति ऋते चयनात् ' - कहा जाता है— चित्या का विवेचन चयन प्रकरण में आवेगा अतएव इसे अप्राकृत समझकर हम छोड़ते हैं । कहना हमें सिर्फ अध्वर यज्ञ के विषय में है— सारे यज्ञ ( चित्था को छोड़ कर ) सर्वात्मक और एकात्मक इन दो भागों में विभक्त हैं । सम्पूर्ण संवत्सराग्नि में सोम की आहुति डालकर जो यज्ञ किया जाता है वह सर्वात्मक यज्ञ कहलाता है एवं संवत्सराग्नि के एकदेश में सोम की आहुति डालकर जो यज्ञ किया जाता है वह ' एकदेशात्मक ’ यज्ञ कहलाता है । पृथिवी के केन्द्र से पृथिवी के चारों ओर रथन्तर साम तक का जो अग्नि मण्डल है— उसे ही ' संवत्सर मण्डल ' कहते हैं । यही संवत्सराग्नि नाम से प्रसिद्ध है । यह संवत्सराग्नि ६ भागों में विभक्त है । पहिला विभाग है इसका ७२० ( सात सौ बीस ) दिन का । एक संवत्सर के ३६० दिन होते हैं— एवं ३६० रात्रि होती हैं । वही अग्नि इन ७२० हिस्सों में बँटा हुआ है । दूसरा विभाग केवल दिन के हिसाब से ३६० ही दिन में बँटा हुआ है । जब दिन से भी ऊपर बढ़ते हैं तो पक्षों के हिसाब से वही अग्नि २४ विभागों में बँटा हुआ मिलता है । उससे भी ऊपर चलते हैं तो महिने के हिसाब से १२ विभागों में विभुक्त मिलता है । उससे ऊपर चलते हैं तो वही अग्नि उत्तरायण - दक्षिणायन भेद से- दो भागों में विभक्त मिलता है । बस इसके बाद में पूरा संवत्सर पकड़ में आता है । इस प्रकार एक ही संवत्सराग्नि अहोरात्र ( ७२० ), शुक्ल कृष्ण पक्ष ( २४ ), मास ( १२ ), ऋतु ( ३ ), अयन ( २ ), संवत्सर ( १ ), इन छः विभागों में बँटा हुआ है । वैध प्रक्रियाओं द्वारा-जो कि प्रक्रिया यज्ञ विद्या के नाम से प्रसिद्ध है – इस ६ विभागों में विभक्त दिव्याग्नि का अध्यात्म अग्नि से सम्बन्ध करा १७ वें स्थान से ( स्वर्ग से ) अपने आत्मा की कड़ी जोड़ दी जाती है । आयु भोग कर के यज्ञ कर्त्ता यजमान जब शरीर त्याग करता है तो उसका प्रज्ञानात्मा उस १७ वें अग्निसूत्र खिचाव के कारण नाटक के पर्दे की डोरी की तरह एकदम स्वर्ग में चला जाता है । पूर्वोक्त अहोरात्र, पक्षादिस्वरूप जो अग्नि है - वह संवत्सर का एक देश है । अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, चातुर्मास्य इत्यादि अग्निएं संवत्सर के अवयव स्वरूप हैं । बस इन अग्नियों में आहुति डालकर जो यज्ञ किया जाता है - वह एकदेशात्मक यज्ञ कहलाता है - एवं सारे संवत्सराग्नि में सोमाहुति डालकर जो यज्ञ किया जाता हैं वह सर्वात्मक यज्ञ कहलाता है । अङ्गाग्नि में यज्ञ करना - एकदेशात्मक यज्ञ करना कहलाता है एवं अङ्गी में यज्ञ करना - सर्वात्मक यज्ञ करना कहलाता है । किन्तु इतना अवश्य समझ लेना चाहिए कि जब तक अङ्ग यज्ञ नहीं किए जाते हैं अर्थात् अग्निहोत्रादि नहीं किए [ " ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण देवयजन ब्राह्मण जाते हैं - तब तक अध्वर यज्ञ का अधिकार कथमपि नहीं हो सकता है । अधिकार समर्थक अग्निहोत्रादि ही हैं । वास्तव में बात ठीक है— जब तक अहोरात्र की अग्नि को आत्मसात् नहीं कर लिया जायगा तब तक पक्षाग्नि पकड़ में नहीं आ सकता है— जब तक पक्षाग्नि को अध्यात्म में नहीं मिलाया जाय तब तक मासिकाग्नि पकड़ में नहीं आ सकता है, जब तक मासिकाग्नि पकड़ में न आवे तब तक चातुर्मास्यानि आत्मसात् नहीं हो सकता है— जब तक चातुर्मास्य का आत्म से सम्बन्ध न हो तब तक नाग्नि असम्बद्ध ही रहता है— एवं जब तक अयनाग्नि का सम्बन्ध नहीं होता है तब तक संवत्सर पकड़ में नहीं आ सकता है । संवत्सराग्नि को पकड़ने के लिए पहले तदङ्ग स्वरूप - अग्निहोत्रादि यज्ञ करना परमावश्यक है । हमारा अध्यात्म अग्नि पार्थिवाग्नि है - श्रतएव इसे लौकिकाग्नि भी कहते हैं । इस लौकिकाग्नि में अर्थात् अध्यात्म अग्नि में दिव्याग्नि को जिस प्रक्रिया से मिलाया जाता है उसी को ' अग्न्याधान ' कहते हैं । अध्यात्म में अधिदैवत को मिलाने का काम ही अग्न्याधान है । हमने माना कि अग्निहोत्र से अहोरात्र का अग्नि पकड़ में आ जाता है— परन्तु प्रा तब जाता है जब कि अध्यात्म में उसके प्रविष्ट होने का कोई मार्ग हो । यदि दिव्याग्नि की मात्रा अध्यात्म में रहेगी तो एकदम अहोरात्र का दिव्याग्नि, अध्यात्म में प्रविष्ट हो जाएगा । बस इस अहोरात्राग्नि को आत्मसात् करने के लिए - पहले अध्यात्म अग्नि को ( लौकिकाग्नि को ) दिव्याधान करके दिव्याग्नियुत किया जाता है । बतलाना हमें यह है कि जैसे बिना अग्निहोत्रादि के संवत्सर यज्ञ नहीं हो सकेता तद्वत् बिना अग्न्याधानं के अग्निहोत्रादि नहीं हो सकते । अग्न्याधान अङ्ग का भी प्रङ्ग है । अङ्ग का अङ्ग क्यों सर्वाङ्ग है । बिना इसके कोई यज्ञ हो ही नहीं सकता तो बस संवत्सर यज्ञ करने वाले को पहिले अग्न्याधान करना पड़ता है, अनन्तर सांय - प्रातः श्रग्निहोत्र करना पड़ता है, अमापूर्णिमा को दर्शपूर्णमासेष्टि करनी पड़ती है - अनन्तर - ऋतु चातुर्मास्य अन्नचातुर्मास्य करने पड़ते हैं । तदनन्तर अयन करना पड़ता है - जिसे कि पशुबन्ध कहते हैं - तदनन्तर सौत्रामरिण इष्टि करनी पड़ती है । तदनन्तर सोमयाग का अधिकार प्राप्त होता है । अन्नचातुर्मास्य भी ब्रीहि, यव और श्यामाक भेद से तीन प्रकार के हो जाते हैं । वस्तुतः दोनों ऋतु चातुर्मास्य ही हैं क्योंकि ऋतु में ही तो यह किए जाते हैं । परन्तु एक में अन्न सम्बन्ध से दिव्य देवताओं को आत्मसात् किया जाता है अतएव एक को– “ अन्नचातुर्मास्य ” नाम से व्यवहृत करते हैं, एवं एक में चूँकि वायु सम्बन्ध से दिव्याग्नि सम्बन्ध किया जाता है-अतएव इसे " ऋतु चातुर्मास्य ' ' कहते हैं । जो अन्नचातुर्मास्य है- उसे ही " आग्रायणेष्टि - कहते हैं । १२ महिने में ब्रीहियव और श्यामाक यह तीन फसिल होती हैं अतएव श्रग्रायणेष्टि भी तीन ही करनी पड़ती हैं । शीत ु में बीहि पैदा होते हैं - प्रतएव इसमें ( १ ) ब्रह्माग्रायणेष्टि की जाती है, ग्रीष्म में यव पैदा होते हैं-श्रतएव इसमें ( २ ) यवाग्रायणेष्टि की जाती है, एवं वर्षा में श्यामाक पैदा होते हैं अतएव इसमें ( ३ ) श्यामाकाग्रायणेष्टि की जाती है । इन तीनों से अन्न द्वारा दिव्याग्नि को आत्मसात् किया जाता है -- एवमेव ऋतु चातुर्मास्य भी वैश्वदेव, वरुण - प्रधास एवं शाकमेध भेद से तीन ही प्रकार के होते -हैं । बस संवत्सराधिकार प्राप्त्यर्थं पहिले इतने यज्ञ करने पड़ते हैं— [ & ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण देवयजन ब्राह्मण १ श्रग्न्याधान ४ श्राग्रायणचातुर्मास्य २ अग्निहोत्र ५ ऋतुचातुर्मास्य ३ दर्शपूर्ण मासेष्ट ६ श्रयन एक संवत्सर तीन खण्डों में विभक्त रहता है । अग्न्याधान उसका पहिला खण्ड है— प्रग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, आग्रायण चातुर्मास्य ऋतु चातुर्मास्य, अयन इन पाँचों का दूसरा खण्ड है— एवं तीसरा स्वयं संवत्सर है । दिन, मास और वर्ष, संवत्सर में यह तीन ही विभाग मौटे तौर से माने जाते हैं । एवं ३ टुकड़े चार - चार महिने के होते है । बस इन्हीं के अग्नि को आत्मसात् जब पहिले कर लिया जाता है - तदनन्तर सोमयाग का अधिकार होता है । बिना इनके किये सोमयाग कर नहीं सकते अतएव अब से पहिले के दो काण्डों में - सोपपत्तिक, अग्न्याधान, अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, आग्रायण, वैश्वदेव, वरुणप्रघास, साकमेध, इतने यज्ञाङ्गों की इतिकर्तव्यता बतला दी है । सोमयाग से पहिले -अयन श्रथात् पशुबन्ध और सौत्रामरिण इष्टि और करनी पड़ती है - प्रतः इन्हें भी पूर्व के दो ही काण्डों में बतलाना उचित था परन्तु किसी कारण विशेष से अयन और सौत्रामणि की इतिकर्तव्यता बतला कर - चातुर्मास्य के अनन्तर ही सोमयाग का प्रारम्भ कर देते हैं । चूँकि यह सोमयाग प्रधान यज्ञ है— अतएव इस एकल्ले की इतिकर्तव्यता - दूसरे और चौथे दो काण्डों में बतलाई जायगी- तीसरे और चौथे काण्ड में सोमयाग ही की इतिकर्तव्यता समझनी चाहिए । इस सोमयाग के अर्थात् अध्वरयज्ञ के - सुत्या और ग्रह, यह दो भेद हैं । सुत्या ही का दूसरा नाम है " सव " । इस सुत्या में प्रातः सवन, माध्यंदिन सवन, एवं सायं सवन, यह तीन सवन होते हैं । एवं ग्रहयज्ञ में सोम रस से परिपूर्ण ४० ग्रह नाम के पात्रों की आहुति दी जाती है - जिसकी कि इतिकर्तव्यता ' सव ' याग के अनन्तर बतलाई जायगी - इस संवत्सराग्नि में यह सोम डाला जाता है— अतः ' सूयते ' - ( कम्र्माणि म प्रत्ययः ) इस व्युत्पत्ति से इस हुत होने वाले द्रव्य को - " सोम " कहते हैं । एवं इसको डालने की जो क्रिया है - उसे- ' सुत्या ' कहते हैं । एवं जब सोम अग्नि में डाल दिया जाता है तो वह " सुत " कहलाता है । इसीलिए तो पुत्र को भी " सुत " कहा जाता है । माता की योनि में जो भभकता हुआ आग्नेय रुधिर है उसमें जब पिता का वीर्य अर्थात् सोम हुत होता है तभी तो पुत्र उत्पन्न होता है । सोम ही पुत्र रूप में परिणत होता है - प्रतएव इसे सुत कहते हैं । इसीलिए सोम सम्बन्ध - से ही वैदिक महर्षि - शिष्य को किंवा पुत्र को " सोम्य " शब्देन व्यवहृत किया करते हैं । जो द्रव्य आता हुआ है वह सोम है - एवं जो आ कर हुत हो जाता है - वही सुत है । चूँकि इस संवत्सराग्नि में सोम की आहुति दी जाती है - अतएव इसको ' सुत्या, किंवा ' सव ', सोम ' इन नामों से व्यवहृत करते हैं । संवत्सर को हमने पृथिवी के रथन्तर साम स्वरूप बतलाया था । यह रथन्तर - साम सूर्य्य के बृहत्साम के ( सोलर सिस्टम के ) परे में रहता है - श्रतएव इस सूर्थ्य सोलर सिष्टम को भी हम “ संवत्सर मण्डल ” कह सकते हैं । बस इस संवत्सर में जिस वैध क्रिया से यजमानात्मा पहुँच जाता है उसी का नाम “ सव ” किंवा “ सुत्या " किंवा " सोम " किंवा " अध्वर " । स्वयं परमेष्ठी, सूर्य्य, चन्द्रमा, [ १० ]
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बृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण देवयजन ब्राह्मण पृथिवी बस सारा विश्वप्रपञ्च इन्हीं पाँच मण्डलों में विभक्त है । इन पाँचों की सत्ता, पाँचों का स्वरूप जिनके आधार पर अवलम्बित रहता है- वैदिक परिभाषा में उन्हें ही " मनोता " कहते हैं । उन्हीं में इनके मन प्रोत - प्रोत रहते हैं अतएव उनका नाम " मनोता " है । जैसा कि श्रुि कहती है-“ तित्रो वै देवानां मनोतास्तासु हि तेषां मनांस्योतानि । वाग्वै देवानां मनोता तस्या हि तेषां मनांस्योतानि । गौर्वैदेवानां मनोता तस्यां हि तेषां मनांस्योतानि । श्रग्निर्वै देवानां मनोता - तस्यां हि तेषां मनांस्योतानि ” इति ॥ ऐ. ब्रा. ॥ पांचों मण्डलों के भिन्न - भिन्न मनोता हैं । वेद, सूत्र, नियति यह तीन मनोता स्वयम्भू मण्डल के हैं, भृगु, अङ्गिरा, अग्नि यह तीन मनोता परमेष्ठि- मण्डल के हैं- ज्योतिः, गौः आयुः, यह तीन मनोता सूर्य के हैं, रेतः, श्रद्धा, यशः यह तीन मनोता चन्द्रमण्डल के हैं, एवं वाग्, गौ, द्यौ, यह तीन मनोता पृथिवीमण्डल के हैं । इन्हीं के आधार से पाँचों का स्वरूप बना हुआ है । इन पांचों में से प्रकृत में - हमारा प्रयोजन केवल - सौर मनोताओं से है । सूर्थ्य ही के सोलर - सिष्टम का नाम " संवत्सर " है । सोमयाग से इसी संवत्सराग्नि में ( १७ वें ) आत्मा को बद्ध किया जाता है । सूर्य्य में - चूंकि ज्योतिः, गौ, और आयु यह तीन मनोता हैं: - प्रतएव यह अध्वर याग भी तीन ही प्रकार का हो जाता है । ज्योतिर्भाग का नाम देवता है । प्रकाशीप्राण ही को तो देवता कहते हैं, एवं भूतभाग का नाम ' गौ ' है, एवं आत्मा का नाम श्रायु है । तात्पर्य यही है कि सूर्थ्य के ज्योतिर्भाग से - हमारे अध्यात्म ३३ सौ देवताओं का स्वरूप बनता है । एवं गौ भाग से हमारे हाडमाँसमेदा वगैरह भूत बनते हैं, एवं श्रायुर्भाग से जो कि संख्या में ३६००० ( छत्तीस हजार ) हैं - हमारा श्रात्मा बनता है । इसीलिए तो " सूर्य्य श्रात्मा जगतस्तस्थुषश्च " कहा जाता है । सूर्य्य से ही यच्चयावत् प्राणिमात्र की उत्पत्ति होती है । प्राणिमात्र की क्या जडचेतन सभी की उत्पत्ति इसी से होती है । इसीलिए " नूनं जनाः सूर्येण प्रसूता ' '...... ' ' यह कहा जाता है । श्रपि च इसीलिए
श्र ुति कहती है-" प्राकृष्णेन रजसाऽवर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च ।
हिरण्येन सविता देवो रथेनाऽयाति भुवनानि पश्यन् " ॥
सू में चूँकि ज्योति, गौ और प्रायु यह तीन ही पदार्थ रहते हैं । फरक केवल नाम का हो जाता है | अध्यात्म में उन्हीं तीनों को देवता, भूत और आत्मा कहने लगते हैं । तो बस इससे सिद्ध हो जाता है कि हमारे में सूर्य्य में से तीनों पदार्थ स्रोत रूप में आया करते हैं । अतएव हम तीनों से उस सूर्य्यलोक में अर्थात् १७ वें स्वर्ग में पहुँच सकते हैं । देवता द्वारा भी हम स्वर्ग में पहुँच सकते हैं, भूत द्वारा भी पहुँच सकते हैं, एवं प्रात्मा द्वारा भी पहुँच सकते हैं । स्वर्ग में पहुंचने के तीनों द्वार हैं । मार्ग तीनों भिन्न - भिन्न हैं- स्वर्ग प्राप्ति फल तीनों में समान हैं । तो बस ज्योतिमार्ग [ ११ ]
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श्र ० १ ) शतपथ ब्राह्मण देवयजन ब्राह्मण में आहुति डालकर यदि हम स्वर्ग प्राप्ति के लिए यज्ञ करते हैं वह - " ज्योतिष्टोम " कहलाता है । एवं भूतभाग से अर्थात् गो भाग से यज्ञ करते हैं वह — " गोष्टोम " कहलाता है, एवं आयुर्भाग, से जो यज्ञ करते हैं — वह " प्रायुष्टोम " कहलाता है । सोम - राशि को समूह को कहते हैं । हमारे अध्यात्मस्य ज्योति - गौ- श्रायु - पर वैध उपायों से हम आहुति द्वारा जब उस हुत द्रव्य की -तह पर तह लगाते चले जाते हैं तो — १७ तक पहुँच जाते हैं । वही अध्याम अग्नि- उस दिव्याग्नि के चुनाव से उस १७ वें स्थान में पहुँच जाता है । उसकी पकड़ में अध्यात्म श्रग्नि श्रा जाता है । ज्योतिर्भाग में सोमाहुति डालने से - जो अग्नि का स्तोम १७ तक बनता है— उसे " ज्योतिष्टोम " कहते हैं, गोर्भाग में सोमाहुति से बनने वाले स्तोम को " गोष्टोम " कहते हैं, श्रायुर्भाग में सोमाहुति से बनने वाले सोम को " प्रायुष्टोम " कहते हैं । इस प्रकार वह श्रध्वर - ज्योतिर्गीरायु भेद से- तीन तरह का हो जाता है । तीनों एक से एक बेलाग हैं | एकत्रावस्थित पञ्चाशार दीपप्रभामण्डलवत् तीनों एक स्थान पर रहकर भी असंग हैं— परस्पर असम्बद्ध हैं । इन तीनों में से जो ज्योतिष्टोम है वह प्रकृतियाग है, एवं " गोष्टोम " " आयुष्टोम " विकृति भाग है । जो कायदा ज्योतिष्टोम का है वही कायदा गोष्टोम प्रायुष्टोम का है । " प्रकृतिवद् विकृतिः कर्त्तव्याः, यह सिद्धान्त है । जैसे श्रङ्गयज्ञों की प्रकृति दर्शपूर्णमास है, तद्वत् - श्रध्वरों की प्रकृति-ज्योतिष्टोम - है । ज्योतिष्टोम से स्वर्ग में जाना देवताओं के द्वारा जाना है ज्योति र्भाग के द्वारा जाना है । इसीलिए ज्योतिष्टोमयाजी कहता है— " सत्रस्य ऋद्धिरस्यगन्म ज्योतिरमृता अभूम । दिवं पृथिव्या अध्यारुहा माविदाम देवानृश्च ज्योतिः " ॥ ( ३३ पृ ० यजुः सं ० ) तात्पर्य कहने का यही है कि अधिदेवतवत् अध्यात्म में ज्योति, गो, आयु तीनों हैं अतः तीनों में से किसी एक के जरिए हम स्वर्ग में ( १७ वें ) पहुँच सकते हैं । इन तीनों में से जो ज्योतिष्टोम है— वह सप्तसंस्थ है । ज्योतिष्टोम ७ ( सात ) प्रकार का है - उनके नाम यह हैं - ( १ ) अग्निष्टोम ( २ ) अत्य-ग्निष्टोम ( ३ ) उक्थस्तोम ( ४ ) षोडशीस्तोम ( ५ ) प्रतिरात्रस्तोम ( ६ ) वाजपेयस्तोम एवं ( ७ ) प्राप्तो-र्यामस्तोम । जैसा कि आश्वलायन श्रौतसूत्र में लिखा है— " अग्निष्टोमो ऽत्यग्निष्टोम उक्थ्यः षोडशी वाजपेयोऽतिरात्रोऽप्तर्याम इति संस्थाः " इति । ( श्राश्व ० श्री ० सू ० ६।११।१ ) ॥ संवत्सर में वितत रहने वाले ज्योतिर्भाग की सात संस्था हैं । उसकी सात तह हैं । पहली तह का नाम श्रग्निष्टोम है एवं उत्तरोत्तर तहों का नाम श्रत्यग्निष्टोमादि है । सानों की इतिकर्तव्यता भिन्न-भिन्न है । इनमें पूर्व - पूर्वं यज्ञ उत्तरोत्तर में श्रङ्गभूत है । जो प्रत्यग्निष्टोम करेगा उसे अग्निष्टोम भी करना पड़ेगा । जो उक्थस्तोम करेगा उसे श्रग्निष्टोम और अत्यग्निष्टोम भी करना पड़ेगा । उत्तरोत्तर यही नियम समझना चाहिए । यह सातों ही ज्योतिष्टोम कहलाते हैं । अतएव प्रकृत के अग्निष्टोम को [ १२ ]