Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 31–40
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 31–40
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण देवयजन ब्राह्मण ज्योतिष्टोम शब्द से भी व्यवहृत किया जाता है । इसी का प्रारम्भ किया जायगा । चूंकि यह ज्योतियों का स्तोम है— ( समूह ) है अतएव इसे ज्योतिष्टोम कहते हैं । इसी का तीसरा नाम है चतुष्टोम | त्रिवृत - पञ्चदश, सप्तदश और एकविंश- इन चार ज्योतियों का समूह चूंकि इसमें रहता है अतएव " चतुर्णा ज्योतिषां स्तोमः " इस व्युत्पत्ति से इसे चतुष्टोम कहते हैं । पृथिवी के केन्द्र से निकलने वाला अग्नि २१ तक ही जाता है— बाद में ३३ तक सोम रहता है । अतएव अग्नि सोम २१ तक ही बतलाया जाता है । सम्पूर्ण प्रपञ्च से सिद्ध होता है कि सोमयाग - ज्योतिष्टोम गोष्टोम, आयुष्टोम भेदेन तीन प्रकार का है । इनमें से ज्योतिष्टोम अग्निष्टोमादि भेद से ७ प्रकार का है । इनमें जो अग्निष्टोम है-उसे चतुष्टोम भी कहते हैं । बस इस चतुष्टोम का ही प्रारम्भ किया जाता है— अध्वरयज्ञः प्रारम्भः तत्रादौ प्रथमं देवयजनब्राह्मरणम्-पाकयज्ञ और वितानयज्ञ भेदेन यज्ञ दो प्रकार के होते हैं । जो घर में होने वाले गृह्य ( स्मार्त ) यज्ञ हैं — वे पाक यज्ञ कहलाते हैं । एवं जो जंगल में बड़ी दूर तक वितत होकर होते हैं— जोकि श्रौत यज्ञ हैं— आरण्य हैं — वे " वितान " यज्ञ कहलाते हैं । यह जंगल में किया जाता है । इस यज्ञ के लिए जो निर्धारित भूमि होती है उसे ही " देव - यजनभूमि " कहते हैं । १०० बीघा - १० बीघा - जितनी भी जमीन यज्ञार्थ नियत रहती है— जिसमें कि दूसरा काम नहीं हो सकता - बस उसे ही " देवयजन ” भूमि कहते हैं । यजमान सोमयाग करेगा- वितानयज्ञ करेगा – प्रतएव यजमान के अनुचर लोग देव-यजन भूमि को संपन्न करते हैं । सोमयज्ञ के लिए - जमीन का निर्धारण करते हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " देवयजनं जोषयन्ते " । देवता लोग इस भूमि में पूजे जाते हैं- प्रतएव " देवा - इज्यन्ते - ग्रत्र " इस व्युत्पत्ति से यज्ञार्थ निर्धारित भूमि को " देवयजन " कहते हैं । भौम स्वर्गवासी देवताओं के यज्ञ का स्थान कुरुक्षेत्र में था । कुरुक्षेत्र इसी काम के लिए नियुक्त था । वहाँ सिवाय देवताओं के और किसी का अधिकार न था-अतएव " कुरुक्षेत्र वै देवयजनमास " यह कहा जाता है । चूँकि देवता उसमें रहते थे - प्रतएव कुरुक्षेत्र के लिए “ धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे " कहा जाता है । यजमानपुरुष - प्राचीनवंश, सदो - मण्डप, हविर्द्धानि मण्डपादि निर्माणपर्य्याय जमीन को निर्धारित करते हैं । बस " देवयजनं जोषयन्ते " का यही तात्पर्य है । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यज्ञ करने के वास्ते यजमान जो सबसे बड़ी जमीन हो वही पसन्द करे | जंगल में जब वे यज्ञार्थ भूमि का निर्धारण करने जाएँ तो जो सबसे बड़ी जमीन हो वही घेरें । एवं साथ ही में - ऐसी जमीन घेरें जिसमें वृक्ष, कूड़ा कर्कट इत्यादि न हो । जमीन के अतिरिक्त और · कुछ न हो । अन्यथा उसे साफ करने में बड़ी दिक्कत होगी । इसलिए — वर्षिष्ठ लो ( अतिशयेन उरु इति वर्षिष्ठम् ) । एवं वृक्षादि से रहित लां - यही तात्पर्य है— [ १३ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण देवयजन ब्राह्मण " स यदेव वर्षिष्ठं ( प्रतिविपुलम् ) स्यात् तज्जोषयेरन् । यदन्यद् भूमेर्नाभिशयीत " । जमीन से अतिरिक्त वृक्षादि उस यज्ञार्थ निर्धारित भूमि में नहीं होने चाहिए यही ' यदन्यद्-भूमेर्नाभिशयीत " का तात्पर्य है । यदि वृक्षादियुक्त एवं अधिक कड़े कर्कट वाली जमीन ली जायगी तो उसे साफ करने में बड़ी दिक्कत होती है - यह तो आपत्तिप्रत्य ही है । एवं साथ ही में वैज्ञानिक दृष्टि से भी वृक्षादि समूहयुक्ता भूमि - यज्ञ के लिए त्याज्य है । बस इसी को बतलाते हुए कहते हैं— " देवता लोग इसी भूमि से ( ही ) स्वर्ग को गए हैं – एवं जा रहे हैं " । सूर्य में ' ज्योतिगरायु ' यह तीन पदार्थ रहते हैं - यह हम अभी बतला आए हैं । इनमें से जो ज्योतिर्भाग है - उसे ही देवता कहते हैं । सूर्थ्य का जो रश्मिमण्डल है वही प्रकाश कहलाता है । एवं प्रकाश ही को कहते हैं देवता । इसीलिए श्रुति कहती है—
" चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुमित्रस्य वरुरंणस्याग्नेः ।
प्राप्राद्यावा पृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य्यं श्रात्मा जगतस्तस्थुषश्च " ॥
सूर्य की रश्मिएँ पृथिवी पर आती हैं । यहाँ आकर उनका प्रतिफलन ( रिफ्लेक्शन ) होता है । बस इस प्रकार से प्राणद्वानत् करती हुई सूर्य्य - रश्मिएँ पृथिवी पर आती रहती हैं एवं प्रतिफलित हो वापस उसी अपने सूर्य्यलोक में जिसे कि स्वर्ग कहा जाता है लौटती रहती हैं । इसीलिए कहा जाता है—
" आयं गौः क्रमोद सदनमातरं पुरः पितरं च प्रयन्तवः ।
अन्तश्चरति रोचना - अस्य प्राणदपानती व्यख्यन् महिषो दिवम् ” ॥
रश्मियों को ही देवता कहते हैं । क्यों कि ज्योतिर्भाग का नाम हैं देवता - एवं रश्मिएँ हैं ज्योतिस्वरूप | यह देवता अर्थात् ज्योतिस्वरूप रश्मिएँ द्युलोक से प्राणदपानत् क्रिया से पृथिवी पर आके यहीं से वापस प्रतिफलित हो अपने द्यलोक में लौट जाती हैं । यह धाराक्रम अनवरत जारी रहता है । इसी विज्ञान को बतलाने के अभिप्राय से-" अतो वै देवा दिवमुपोदक्रामन् " । कहा गया है । जो मनुष्य दीक्षा लेता है अर्थात् सोमयाग करता है - यज्ञ प्रभाव से - पृथिवी लोक से जाते हुए उन देवताओं के साथ यह यजमान भी स्वर्गलोक में जाता है । अर्थात् पृथिवीलोक [ १४ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण देवयजन ब्राह्मण से प्रतिफलित ज्योतिर्भाग के साथ ही यज्ञ द्वारा यजमानात्मा का भी उस १७ वें स्थान से सम्बन्ध हो जाता है-" देवान्वा एष उपोत्क्रामति यो दीक्षते । ऐसी हालत में वृक्षादि रहित शुद्ध भूमि में यज्ञ करता हुआ यजमान - सदेव - ( देवता सहित ) देवयजन भूमि में ही सोम यज्ञ करता है । अर्थात् वृक्षादि से रहित शुद्ध भूमि में यज्ञ करना - लोक जाते हुए देवप्राणयुक्त भूमि में यज्ञ करता है - ऐसी भूमि में यज्ञ करने से ही — यजमानात्मा स्वर्ग में जाता है । " स सदेवे देवयजने यजते " । ऐसी हालत में यदि भूमि से अलावा वृक्षादियुक्त देवयजन में यह यजमान यज्ञ करेगा तो - यज्ञ करके भी - नीचे का नीचे ही रह जायगा । बात सच है । यदि सघन वृक्षों वाले जंगल में यज्ञ किया जायगा तो उस यज्ञभूमि पर तो सूर्य की रश्मिएं ही नहीं आएँगी । रश्मिएँ तो वृक्ष से ऊपर की ऊपर प्रतिफलित हो अपने लोक में चली जाएँगी । यजमान जो यज्ञ करा के भी नीचे ही टापां करेंगे । मात्मा तो ज्योति के द्वारा ऊपर जाता है । जब उसका यज्ञभूमि से सम्बन्ध ही नहीं होगा तो फिर यज्ञ करना व्यर्थ है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " स यद्ध ( यत्रह ) अन्यद् भूमेरभिशयीत - प्रवरतर इव हेष्ट्वा स्यात् ” । ऐसा न हो ( कि ) यज्ञ करके भी यजमान स्वर्गावाप्ति से वंचित रह जाय अतः यजमान के अनुचरों को चाहिये कि वे विपुल एवं वृक्षादि से रहित खुले मैदान को देवयज्ञार्थं घेरें । खुली और विपुल भूमि में यज्ञ करना चाहिए - यही तात्पर्य्य है— “ तद्यदेव वर्षिष्ठं स्यात् - तज्जोषयेरन् ” । जमीन तो है परन्तु वह ऊबड़ - खाबड़ है । विषम धरातलयुक्ता है - ऐसा भी नहीं होना चाहिए । वह देवयजन वर्ष्म होता हुआ सम भी होना चाहिए । वर्म कहते हैं शरीर को । जमीन के अलावा और कुछ न हो तो वष्मं ही कहलाता है । केवल जमीन नहीं है— उसी का शरीरमात्र है— उसके श्रलावा और वृक्षादि नहीं है इसीलिए ' वर्ष्म ' विशेषण दिया है । इस प्रकार भूमि के अलावा और कुछ न होने पर भी यदि वह जमीन ऊबड़ - खाबड़ हो तब भी काम की नहीं है । क्योंकि जो खड्डेवाली-विषम धरातलयुक्त जमीन होगी वह भी देवताओं से सर्वात्मनायुक्त नहीं होगी । जो खड्डे होंगे उनमें सूर्य्य रश्मियों का प्रतिफलन होगा ही नहीं । अतः वह देवयजन वर्ष्म होता हुआ भी सम होना चाहिए । देवयजनभूमि का धरातल एकसार होना चाहिए " तद् वधर्म सत् समं स्यात् " इति । एवं सम - होते हुए भी वह देवयजन अविभ्रंशि ( ठोस ) होना चाहिए । यदि दीखने में यह भूमि बिल्कुल सम है— [ १५ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण देवयजन ब्राह्मण परन्तु अन्दर से पोली है तो - ऐसी भूमि भी यज्ञ के लिए अनुपयुक्त है अतः समता के साथ - साथ ही वह देवयजन प्रविभ्रंशी भी होना चाहिए -" समं सदविभ्र ंशि स्यात् " इति -एवं ठोस होता हुआ भी वह देवयजन प्राकुप्रवण होना चाहिए । पूर्व की ओर उस जमीन का झुकाव होना चाहिए । यदि उस पर पानी डालें तो वह पूर्व की ओर बह कर जाय - ऐसी जमीन होनी चाहिए । पूर्व की ओर ढाल रहने वाली जमीन ही — यज्ञ के लिए उपयुक्त है । " अविभ्रं ' शिसत् प्राक् प्रवरण स्यात् " । प्राक्प्रवणता का कारण बतलाते हैं - पूर्वा दिक् ही तो देवताओं की दिक् है । बात सच है --पूर्व में ही भगवान् सूर्य्य का उदय होता है । देवता स्वरूप रश्मिएँ पूर्व से ही श्राती हैं । यदि पूर्व की ओर ढालू वह देवयजनभूमि होगी तो उन रश्मियों का सम्बन्ध उससे अच्छी प्रकार से होगा । यदि यह पश्चिम की ओर ढालू होगी तो देवता उसे स्पर्श किए बिना श्रागे निकल जायेंगे — एवं सम रहेगी तो भी अधिक मात्रा से देवता नहीं प्रावेंगे - अतः देवसंपत्ति प्राप्त्यर्थ देवयजनं प्राक्प्रवण ही होना चाहिए । " " प्राची हि देवानां दिक् ” ( तस्मात् प्राक्प्रवणमेव स्थात् — इति भावः ) ॥ यदि ऐसी जमीन न मिले तो फिर उदक्प्रवरण का निर्धारण करना चाहिए । जैसे पूर्वादिक् देवताओं की है वैसे उत्तरादिक् मनुष्यों की है । चूंकि यह यज्ञ मनुष्य कर रहा है अतः अपनी दिक् की ओर देवयजन को ढालू रखना भी बुरा नहीं कहा जा सकता । " प्रथोदक् प्रवरणम् " - " उदीची हि मनुष्याणां दिक् ” । परन्तु ध्यान रहे — चाहे पूर्व की ओर ढालू रहे अथवा उत्तर की ओर, परन्तु दक्षिणादिक् सदा ऊँची रहनी चाहिए | " दक्षिणतः प्रत्युच्छ्रितमिव स्यात् " । इसका कारण बतलाते हैं । जैसे - पूर्वादिक् देवताओं की है, उत्तरा मनुष्यों की है— एवं पश्चिम असुरों की है तद्वत् दक्षिणादिक् पितरों की है । श्राग्नेय प्राण का नाम देवता है । प्राप्य प्राण का नाम असुर है — एवं सौम्य प्रारण का नाम पितर है- जिसका कि दिशा विवेचन द्वितीयकाण्ड पिण्डपितृयज्ञ में और साकमेधाङ्गभूत पितृ यज्ञ में कर दिया गया है । यह सोम उत्तर से दक्षिण को जाया करता है । दक्षिण में जाकर उसकी स्थिति होती है । सोम प्रारण स्थान-दक्षिणादिक है । बस इसीलिए " एषा वै दिक् पितृणाम् " कहा है । ऐसी हालत में यदि देवयजन दक्षिण-प्रवरण होगा - दक्षिण दिशा की ओर यज्ञभूमि ढालू होगी तो पितृप्रारण सम्बन्ध से यह यजमान बहुत जल्दी ही परलोक सिधार जायगा । " स यद्दक्षिणा प्रवरणस्यात् - क्षिप्रेह यजमानोऽमुंलोकमियात् " । [ १६ ]
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तृतीय काण्ड ( ० १ ) शतपथ ब्राह्मण देवयजन ब्राह्मण यदि उत्तर अथवा पूर्व देवयजन को प्रवरण किया जाता है— तो यह यजमान आयुशेष तक नीरोग हो कर ( ज्योक् ) जीवित रहता है— इसलिए देवयजन दक्षिण की ओर से ऊँचा ही रहना चाहिए— “ तथा ह यजमानो ज्योक् जीवति तस्माद्दक्षिणतः प्रत्युच्छ्रितमिव स्यात् ॥ २ ॥
दक्षिण से श्रग्नि श्राता रहता है, उत्तर से सोम श्राता रहता है, पूर्व से आयु श्राती रहती है क्योंकि आयु के प्रदाता भगवान् सूर्य्य ही तो हैं । अग्नि ही मनुष्य की जिन्दगी है । जब तक शरीर में गर्मी रहती है तब तक मनुष्य जीवित रहता है - जहाँ हाथ - पैर ठंडे हुए कि काम खतम । सर्दी प्राणघातिनी है । इसका आगमन उत्तर से होता है । सर्दी - गर्मी दोनों का प्रवेश सिर के बीच में जो केशान्त स्थान है— जिसे कि सुषुम्णा कहते हैं — जो कि वैदिक परिभाषानुसार " दृति " नाम से पुकारा जाता है— इसमें से होता है । ऐसी हालत में उत्तर की ओर मस्तक करके सोया जायगा तो सोम की मात्रा प्रविष्ट हो जायगी अतएव अग्नि की मात्रा कम हो जायगी । बस ऐसे मनुष्य की आयु जल्दी ही क्षीण होगी - इसीलिए उत्तर की ओर मस्तक करके न सोने की आज्ञा देते हुए भगवान् मनु कहते हैं-मरने पर मनुष्य की गति पितृलोक की तरफ होती है - अतएव मरे बाद उसे उत्तर की र सिराना करके सुलाया जाता है । अतः जीवित मनुष्य को अपना मस्तक दाहिनी ओर अथवा पूर्व की ओर करके सोना चाहिए । बस यही देवयजन भूमि के दक्षिण की ओर से ऊँची रहने का रहस्य है ॥ २ ॥
देव जन निर्माण करते समय उस तुम्हारे देवयजन से पूर्व की ओर - " दूसरा कोई देवयजन बना लें " - उतनी जमीन हर्गिज मत छोड़ो । अर्थात् जहाँ तुम यज्ञ करना चाहते हो - उस तुम्हारी यज्ञभूमि से पूर्व की ओर इतनी जमीन नहीं रहनी चाहिए - जिसमें कि दूसरा कोई मनुष्य देवयजन बना कर यज्ञ कर सके । या तो तुम्हारे देवयजन से पूर्व की ओर कोई पहाड़ होना चाहिए अथवा नहीं होना चाहिए । जो यजमान - अपने देवयजन से पूर्व की ओर देवयजन मात्र भूमि को छोड़ देता है - वह अपने द्विषत् और भ्रातृव्य शत्रुओं की वृद्धि करता है । अतः हर्गिज - हगिज पूर्व की ओर जमीन नहीं रहनी चाहिए । " न पुरस्ताद्देवयजनमात्रमतिरिच्येत । द्विषन्तं हास्य तद् भ्रातृव्यमभ्यतिरिच्यते " । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि आपत्ति पूर्व की ही है — उत्तर और दक्षिण के लिए कोई रुकावट नहीं है । उत्तर और दक्षिण के लिए कामचार है । तुम्हारी इच्छा हो उतनी जमीन उत्तर-दक्षिण में छोड़ सकते हो । “ कामं ह दक्षिणतः स्यादेवमुत्तरतः " परन्तु इतना अवश्य समझो देवयजन वही समृद्ध है जिस यजमान के पश्चिम में देवयजनमात्र भूमि परिशिष्ट है । [ १७ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण देवयजन ब्राह्मण जिस स्थान पर यजमान यज्ञ कर रहा है उससे पश्चिम की ओर यदि इतनी ही जमीन बाकी है तो यह सुसमृद्धि का लक्षण समझो । जिसके पश्चिम में देवयजनमात्र भूमि बाकी बच रहती है, बहुत शीघ्र ही " उत्तरा देवयज्या " उसकी ओर झुक जाती है । अर्थात् इस यज्ञ के बाद बहुत शीघ्र ही वह दूसरा यज्ञ करने वाला है । यही पश्चिम की ओर देक्यजनमात्र भूमि छोड़ने का फल है— " एतद्ध त्वेव समृद्धं देवयजनं यस्य देवयजनमात्रं पश्चात् परिशिष्यते क्षित्रे हैवनमुत्तरा देवयज्या - उपनमतीति " । बस देवयजन के विषय में हमें इतना ही कहना है । " एतन्नुदेवयजनस्य " । देवयजन में निम्न बातों पर लक्ष्य रखना चाहिए-“ देवयजनं जोषयन्ते । उच्चतमम् । समम् । अविभ्रंशि । अभितो देवयजन-मात्रदेशम् । पुरस्तादुवर्जम् । प्राक्प्रवरणम् । उदग्वा " – ( का ० भ ०७ ) ॥३ ॥
भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यदुवंशी महाराजा वृष्णि के वंश में उत्पन्न होने वाले वार्ण्य के लिए उनके निमन्त्रण से मैं वहाँ देवयजन भूमि का निर्माण करने के वास्ते गया था । कहो कैसी देवयजन भूमि होनी चाहिए इसके लिए उन्होंने मुझे बुलाया था - वहाँ पर सात्ययज्ञ नाम के महर्षि भी आए हुए थे । देवयजन भूमि के लिए मुझे आया देख उन्होंने कहा कि - " यह सारी पृथिवी हो देवयजन है " । बात सच है देवताओं ( सूर्यरश्मियों ) का जहाँ सम्बन्ध होता है " वह सब देवयजन है " । इसलिए हमारे खयाल से देवयजन के लिए कोई खास भूमि के परिग्रह की श्रावश्यकता नहीं है । जहाँ तुम इसका हिस्सा ठीक समझो वहीं – यजुः से अर्थात् मन्त्र से उसका परिग्रह कर - यजमान से यज्ञ करवा डालो । सात्ययज्ञ का अभिप्राय यह है कि सामर्थ्य तो मन्त्र में है । एक पाषाण की मूर्ति में भी मन्त्रशक्ति से प्राण प्रतिष्ठा कर उसे उपास्य के लायक बनादी जाती है । शक्ति मन्त्र में है न कि मट्टी में इसलिए जहाँ उचित समझो - मन्त्र से देवप्रारण का सम्बन्ध कर वहीं यज्ञ करवा डालो-" तदु होवाच याज्ञवल्क्यः - वाष्र्णाय देवयजनं जोषयितुमैम तत्सात्ययज्ञो-ब्रवीत् सर्वा वाऽइयं पृथिवी देवी देवयजनं यत्र वाऽग्रस्यै क्व च यजुषैव परि-गृह्य याजयेदिति ॥४ ॥
परन्तु भगवान् याज्ञवल्क्य तो ऋत्विजों को ही देवयजन बतलाते हैं " ऋत्विजो है व देवयजनम् " उनका कहना है कि जो उतथशास्त्र साङ्गप्रवचन अध्येता हैं - वह यदि किसी भी स्थान पर यज्ञ करवा देते हैं - तो यजमान के लिए वही अच्युता है । दोषरहिता सम्पत्ति है । यदि जमीन अच्छी है और ऋत्विज मूर्ख है तो सारा यज्ञ भ्रष्ट है - और यदि जमीन खराब भी है और ऋत्विक विद्वान् है तो सारा काम सिद्ध है । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि हम तो इसी ऋत्विज सम्पत्ति को देवयजन के अत्यन्त नजदीक मानते हैं । हमारे खयाल से " सच्चे ऋत्विजों का मिलना सब कुछ मिल जाना है— [ १८ ]
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तृतीय काण्ड अ ० १ ) शतपथ ब्राह्मण देवयजन ब्राह्मण " ऋत्विजो हैव देवयजनम् 1 । ये ब्राह्मणाः शुश्रूवान्सोऽनूचाना विद्वान्सो
याजयन्ति सैव " ला " । एतन्नेदिष्ठामिव मन्यामहे " - इति ॥ ५ ॥
जिस जगह सोमयाग किया जायगा उसके लिए भूमि का निर्धारण हो चुका जो कि भूमि " देवयजन " नाम से प्रसिद्ध है— उसका निर्माण हो चुका । इस महाविशाल देवयजन में भिन्न - भिन्न कर्मों के लिए अनेक शालाएँ बनती हैं । उनमें सब से पहिले उस महाशाला का विधान करते हैं जिसमें कि ग्राहवनीय गार्हपत्यागार बनेंगे एवं ग्राहवनीय गार्हपत्य कुण्ड बनेंगे । इसी महाशालान्तर्गत आह-वनीय ही में देवताओं के लिए आहुति दी जाएगी । वह शाला कैसी बननी चाहिए, किधर उसका मुँह होना चाहिए, यह बतलाते हैं-उस देवयजन में बड़ी लम्बी चौड़ी शाला बनाते हैं । इस शाला का जो बीच का बाँस है वह् पूर्व पश्चिम रहना चाहिए । छप्पर की शाला बनाई जाती है । छप्पर दोनों ओर से ढालू रहता है । उसके बीच में एक बड़ा लम्बा बाँस लगाया जाता है । उसी बाँस के आधार पर इधर उधर के पायों में छप्पर का आधा आधा हिस्सा झुका रहता है । इस बाँस का मुँह पूर्व पश्चिम रहना चाहिए । न कि उत्तर दक्षिण । छप्पर के दोनों पार्श्व उत्तर दक्षिण रहने चाहिए न कि पूर्व पश्चिम । इस शाला में बहुत द्रव्य लगता है । करीब करीब सात आठ सौ रुपये लग जाते हैं । इस शाला के ऊपर ताम्रकलश लगाया जाता है, ध्वजा लगाई जाती है । इस प्रकार से एक खासा मण्डप तय्यार किया जाता है । परन्तु जो इतना द्रव्य नहीं लगा सकता है, वह और कुछ नहीं तो, जितनी दूर में शाला बननी चाहिए उतनी दूर को लकड़ी बांध कर बीच में टाटी वगैरह लगाकर मामूली ही मण्डप तय्यार करले । परन्तु करना अवश्य पड़ेगा । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " तच्छालां वा विमितं वा प्राचीनवंशं मिन्वन्ति " । यदि शाला न बना सके तो एक हाथा ही उतनी दूर में बनाले – यही “ विमितं वा " का तात्पर्य है । इसका बाँस पूर्व की ओर क्यों रक्खे इसका कारण बतलाते हैं । देवता लोग पूर्व की ओर से पश्चिम मुख होकर – पूर्वादिक् देवताओं की है— मनुष्यों के पास आए हैं । बात वास्तव में ठीक है मूर्थ्य की रश्मि पूर्व से पश्चिम की ओर मुँह किए ही तो हमारे पास श्राती हैं इसीलिए उन देवताओ के लिए पूर्व की ओर मुख करके ही तो हवन करता है । जिधर से देवता आवें उसी ओर ही सारा काम होना चाहिए । चूँकि देवता पूर्व की ओर से आते हैं अतएव प्राहुति भी उधर मुख करके ही देनी चाहिए । एवं इस शाला के वंश का मुख भी पूर्व की ओर ही होना चाहिए-" प्राची हि देवानां दिक् । पुरस्ताद् वै देवाः प्रत्यञ्चो मनुष्यानुपा-वृताः । तस्मात्तेभ्यप्राङ तिष्ठन् जुहोति । तस्मात् प्राचीनवंशत्वमुपद्यते ” — इति भावः ॥ ६ ॥
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तृतीय काण्ड ( ० १ ) शतपथ ब्राह्मण देवयजन ब्राह्मण चूँकि देवता पूर्व से पश्चिम की ओर आते हैं— उनका अपना स्थान प्राची दिक् है— अतएव दीक्षित मनुष्य कदापि पश्चिम की ओर मस्तक करके एवं पूर्व की ओर पैर करके न सोवे । हम देवताओं की ओर पैर पसार कर न सोवें - उनकी बेअदबी न करें - बस इसलिए यजमान को कभी पूर्व की ओर पैर करके नहीं सोना चाहिए - " तस्माबु ह न प्रतीचीन शिराः शयीत । नेद्देवानभिप्रसार्य शया " इति । किसकी कौनसी दिशा है यह प्रसङ्गागत बतला देते हैं— जो दक्षिणा दिक् है वह पितरों की है, जो पश्चिम दिक् है वह सर्पों की है— देवता लोग ( सूर्य्य, चन्द्र, नक्षत्र ग्रह वगैरह वगैरह ) प्रतिक्षण पश्चिम जाते दिखाई पड़ते हैं । इन ग्रह वगैरहों की जो चाल है वह सर्प के प्रकार की है । सर्प की तरह मंगल - चन्द्रमा वगैरह का परिभ्रमरणवृत्त है । यही तो देवता हैं । यह पश्चिम की ओर सर्पण करते हुए जाते दिखाई पड़ते है - प्रतएव इस दिक् को सर्पों की दिक् कहा है । अथवा इसका दूसरा अर्थ समझना चाहिए । सूर्य्यं की रश्मियों को हमने देवता बतलाया है । यह रश्मिएँ पूर्व से पश्चिम की ओर इस प्रकार से सर्पण करती हुई प्राणदपानत् क्रिया से चलती हैं । जैसा कि श्रुति कहती है-" प्रायं गौः पृश्निरक्रमीद सदन् मातरं पुरः पितरंच प्रयन्तः । प्रन्तश्चरति रोचना अस्य प्रारणदपानती व्यख्यन् महिषोदिवम् " ॥ सर्प ठीक इसी प्राणदपानत् क्रिया से चलता है । इसी प्रकार मध्याकाश से पश्चिम की ओर सूर्य्य - रश्मि एँ ( देवता ) भी प्रतिसर्पण करती हुई ही जाती हैं । बस इसी अभिप्राय से " या प्रतीची सा सर्पाणाम् " कहा गया । इसी को स्पष्टतया बतलाने के वास्ते याज्ञवल्क्य कहते हैं कि देवता लोग जिस पूर्व की ओर से पश्चिम में चले गए वही दिकू " श्रहीना " है । सर्प ही को श्रहीन कहते हैं । वास्तव में सर्पों की दिक् यह नहीं है अपितु देवताओं के उस ओर प्राणदपानत् क्रिया से जाने से उसे महोना, " कहते हैं— " यतो देवा उच्चक्रमुः संषाऽहीना " । यह हुई पितर सर्पों की दिक् की व्यवस्था । एवमेव जो उत्तरा दिक् है - वह मनुष्यों की दिक् है चूंकि मनुष्यों की दिक् उत्तरा है । अतएव मनुष्य कर्म में ( मानुषे ) उदीचीन वंश ही शाला - अथवा.. हाथा बनाते हैं । अर्थात् मनुष्य अपने रहने के लिए यदि शाला ( मकान ) अथवा अहाता बनावे तो उसे उसके बीच का बांस उत्तरदक्षिणाभिमुख ही रखना चाहिए । क्योंकि वह मनुष्य है, मनुष्यों की विकू उत्तरा ही है-" योदीची दिक् सा मनुष्याणां तस्मात् मानुषे ( कर्म्मरिण ) उदीचीन-वंशामेव शालां वा विमितं वा मिन्वन्ति । उदीची हि मनुष्याणां दिक् " । [ २० ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण देवयजन ब्राह्मण दीक्षित मनुष्य का आत्मा अग्न्याधानादि से दिव्यभावयुक्त हो जाता है अतएव वह मनुष्य न रह कर देवता बन जाता है इसीलिए तो " इदमहमव्रतात्सत्यमुपैमि " इति तन्मनुष्येभ्यो देवानुपैति कहा जाता है ( श ० पृ ० १ ) । इसी अभिप्राय से कहते हैं कि — दीक्षित मनुष्य की शाला ही प्राचीन वंश हो सकती है क्यों कि वह मनुष्य नहीं है देवता है । परन्तु प्रदीक्षित मनुष्य की नहीं । अदीक्षित तो सामान्य मनुष्य है । उसकी अपनी दिक् तो उत्तरा दिक् है— " दीक्षितस्यैव प्राचीनवंशा ( शाला ) - नादीक्षितस्य " ॥७ ॥
इस शाला को चारों ओर से आच्छादित करते हैं । सोमयाग में बहुत दिन लगते हैं इसलिए-शाला को बड़ी ही सुरक्षित एवं मजबूत बनाना पड़ता है । यदि यज्ञ करते समय पानी बरस जाता है और वह पानी शाला में प्रविष्ट हो जाता है तो सारा यज्ञ नष्ट - भ्रष्ट हो जाता है बस इस वर्षा के उपद्रव से बचने के लिए ही शाला का चारों ओर से परिश्रयण किया जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" तां वा एतां परिभयन्ति । नेदभिवर्षादिति " । वर्षा न हो जाय अर्थात् वर्षा का पानी शाला में प्रविष्ट न हो जाय इसीलिए सर्वतः इसका परिश्रयण करते हैं । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इस शाला में तो यह यज्ञ - वर्षा ही वर्षा है । यहाँ पानी की वर्षा का क्या काम । शाला प्राहुतियों की वर्षा के लिए है न कि पानी की वर्षा के लिए - - ' इतिन्वेववर्षा ” । अपि च परिश्रयण करने का दूसरा कारण और भी है । जो दीक्षा लेता है वह मनुष्यों की मण्डली से हट कर देवताओं में शामिल हो जाता है । इसका मन मनुष्यों से हट कर देवताओं में लग जाता है । बस इसीलिए यह यजमान देवताओं का एक हो जाता है । अर्थात् इसकी गणना देवताओं में होने लगती है । देवता लोग मनुष्यों से तिरोहित ही से रहते हैं । सूर्य्यं ही में सारे प्रारण देवता रहते हैं । प्राण तो निराकार ब्रह्म है । शब्दरूपरसगन्धस्पर्शादि रहित हैं । भला इसका प्रत्यक्ष क्यों कर हो सकता है । परन्तु साथ ही में इस प्रकाश का हम प्रत्यक्ष भी करते हैं । इसीलिए " तिर इव वै " कहा है । एकदम तिरोहित तो नहीं हैं परन्तु यह इन्द्र है -- यह वरुण है - यह अश्विनीकुमार है -- इत्यादि रूप से प्रत्यक्ष भी नहीं है । यजमान देवता बन गया है, अतः इसे भी मामूली मनुष्यों से तिरोहित ही रहना चाहिए । प्राणदेवतावत् तिरोहित तो यह हो नहीं सकता । अतः इस शाला को चारों ओर से आच्छादित कर देते हैं । जो परिश्रित ( श्राच्छादित ) है वह भी ' तिरइव ' ही है । प्राच्छादन से ' तिरोहितस्य सम्पत्ति ' हो जाती । बस, इसीलिए इस शाला का परिश्रयण करते हैं-" देवान्वा एष उपावर्तते यो दीक्षते । स देवतानामेको भवति । तिर इव वै देवा मनुष्येभ्यः । तिर ह वैतद् यत् परिश्रितं तस्मात् परिश्रयन्ति ” ॥८ ॥
शाला तैयार हो चुकी – बस अब उसमें हरेक आदमी न घुस सके — इस बात का ध्यान रखना चाहिए । बात सच है — देवतानों के हैडक्वार्टर में मामूली मनुष्य कैसे चा सकता है - " तत्र सर्वइवाभि-प्रपद्येत " । [ २१ ]
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बृतीय काण्ड ( अ ० १ ) शतपथ ब्राह्मणे देवयजन ब्राह्मणं हाँ ब्राह्मण - क्षत्रिय और वैश्य यह तीनों अवश्य जा सकते हैं । क्योंकि तीनों ही यज्ञिय हैं: यज्ञोपवीत संस्था में उनका आत्मा यज्ञिय है । यह यज्ञ है, यज्ञ में यज्ञिय मनुष्य का ही प्रवेश हो सकता है । वायसराय लार्ड खान्दान का ही मनुष्य हो सकता है, सामान्य कुल का नहीं । तात्पर्य यही है कि जिनके पास यज्ञ - सूत्र नहीं है, वे इसमें नहीं जा सकते । क्योंकि उपवीति का ही प्रात्मा यज्ञिय होता है । एवं यज्ञ में यज्ञिय पुरुष का ही प्रवेश हो सकता है - न कि शूद्रादि का— " ब्राह्मणो वैव राजन्यो वा वैश्यो वा ( अभिप्रपद्येत - इति शेषः ) ( यतः ) ते हि यज्ञियाः " ॥ ९ ॥
यजमान जब तक दीक्षा न ले तब तक चाहे जिससे बातचीत कर सकता है । परन्तु दीक्षा के अनन्तर यजमान किसी से न बोले । दीक्षित हुए बाद चाहे जिससे अण्ड - बण्ड बोलने का अधिकार नहीं है — " न वै सर्वेणैव संवदेत " । कारण इसका यही है कि जो दीक्षा लेता है वह मनुष्यों के योग में से हट कर देवताओं के योग में आ जाता है । वह मनुष्यों की मण्डली में से हट कर देवताओं का ' एक ' हो जाता है । अब देवगणना में - यह भी एक देवता है— इस प्रकार से यह यजमान आने लगता है । देवता लोग सभी से भाषण नहीं किया करते । केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य - इन तीनों से ही देवता भाषण करते हैं । क्यों कि ये तीनों ही यज्ञिय हैं । यज्ञसूत्र से संस्कार द्वारा इन तीनों के श्रात्मा में दिव्य भाव का प्रवेश करा दिया जाता है । यही तो देवताओं का इन तीनों से बोलना है । शूद्र का आत्मा दिव्य भाव से युक्त नहीं होता है - वह यज्ञसूत्र से बद्ध नहीं है - वह तो यथेच्छाचारी है अतएव देवता इससे बात नहीं करते । अर्थात् दैव सम्पत्ति से इसका आत्मा शून्य रहता है— " देवान् वा एष उपावर्तते यो दीक्षते । स देवतानामेको भवति । न वै देवाः सर्वेणैव संवदन्ते - ( अपितु ) ब्राह्मणेन वैव राजन्येन वा वैश्येन वा ( संवद-ते ) ( यतो ) - ते हि यज्ञियाः " । चूँकि यजमान देवता हो गया है अतः इसे भी इन तीनों को छोड़कर - शूद्र से कभी भाषण नहीं करना चाहिए | याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यदि शूद्र से बोलने का काम ही पड़ जाय तो भी स्वयं न बोले अपितु ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, तीनों में से उस समय जो भी कोई अपने पास हो उसे – आप इस शूद्रको यह कह दीजिए - यह कह दीजिए - यह कह दे । अर्थात् स्वयं न बोल कर जो कुछ शूद्र को कहलाना हो, इन तीनों में से किसी एक के द्वारा कहला दे । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " यद्येनं शूद्र ेण संवादो विन्देत् विचक्ष्वेममिति विचक्ष्व " । एतेषामेव एकं ब्रूयात् - इममिति बस यही दीक्षित का व्यवहार है उसे पूर्वोक्त मर्यादाओं का यज्ञ समाप्ति पर्यन्त पालन करना चाहिए— [ २२ ]