Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 221–230

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 221–230

पृष्ठ 221

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मणं जपिष्यन् भवतीति वदन्तः " । [ २०३ ] कृष्णा जिनदीक्षा क्रिञ्च न तोह वा ऊर्क उदम्बरः । ऊर्क स्वरूप अन्नादि के संग्रह के लिए ही भौदम्बर दण्ड होता है । शत्रु को मारने के लिए, बल बढ़ाने के लिए दण्ड रक्खा जाता है । ऐसी अवस्था में जो वास्तव में अधिक ऊर्क बढ़ाने वाला अन्न है यदि उसी का दण्ड लिया जायगा तो उसके प्राण सम्बन्ध से अधिक बल बढ़ेगा अतः गूलर का ही दण्ड होना चाहिए | ऊर्जोऽन्नाद्यस्यावरुध्यै ( संग्रहाय ) तस्मादौदुम्बरो भवति " ॥३३ ॥

वह दण्ड मस्तकपर्यंन्त होना चाहिए । पैर से मस्तक तक ही बल है बाद में तो सफाचट मैदान है अत: जहां तक यजमान का वीर्य होता है वहां तक की नाप का दण्ड होता है । यदि मुंह से अधिक लम्बा होगा तो प्रहार करने में बड़ी कठिनता होगी इसीलिए अंदाज का ही दण्ड होना चाहिए यही तात्पर्य है । " मुखसंमितो भवति एतावद्वै वीर्यम् स यावदेव वीर्यं तावांस्तद् भवति यन्मुखसंमितः ॥ ३४ ॥

इसके अनन्तर - ' उच्छ्रयस्व वनस्पतऊर्ध्वो मा पाहि, अहं स श्रास्य यज्ञस्योदृच: " यह मन्त्र बोलतां हुआ वह यजमान न उस दण्ड को ऊपर की ओर उठाता है । हे वनस्पते! आप ऊंचे उठिए और जो मेरे ऊपर आक्रमण होते हैं उनसे मुझे बचाइये । यज्ञ-समाप्तिपर्यन्त आप मेरी रक्षा करें - यही तात्पर्य है । " ऊर्ध्वो मा गोपायास्य यज्ञस्य संस्थाया इत्येवैतदाह ॥ ३५ ॥

दण्डोच्छ्रय के अनन्तर कितने ही आचार्य लोग अंगुलियों को संकुचित कर लेते हैं एवं वाक् संय-मन कर लेते हैं । कारण इसमें वे यही बतलाते हैं कि दण्डोच्छ्रय के अनन्तर न जप करना है न मन्त्र बोलते हैं इस भाव को दिखलाने के लिए अंगुली संयमन और वाक् संयमन कर लेना चाहिए । " अत्र है के प्रङ्ग लीश्च न्यचन्ति, वाचं च यच्छन्ति परन्तु याज्ञवल्क्य इस मत का खण्डन करते हुए कहते हैं कि नहीं ऐसा कभी नहीं करना चाहिए । " तवु तथा न कुर्यात् " । कारण इसका यही है कि यज्ञकर्म इस समय उत्तरोत्तर आगे बढ़ता जा रहा है तो ऐसी हालत में हाथों की अंगुलियों का संकुचित करना ऐसा होगा जैसे कि आगे आगे दौड़ने वाले मनुष्य को पकड़ने के वास्ते ठीक उसके प्रतिदिक् की ओर दौड़ना । एक मनुष्य पूर्व की ओर भाग रहा है परन्तु हम उसे पकड़ने के लिए पश्चिम की ओर दोड़ लगा रहे है । यज्ञ आगे बढ़ रहा है अंगुली संकोचकर हम उसके प्रतिदिक् में जाकर पकड़ने का अभिनय कर रहे हैं अतः अंगुली संकोच नहीं करना चाहिए । " यथापराञ्चद्यावन्तमनुलिप्सते ते नानुलभेतैवं ह स यज्ञं नानुलभते " । इसीलिए दर्भपावनान्तर ही वही अंगुलीबन्धन करना चाहिये एवं वही वाक् संयमन करना चाहिए ।

पृष्ठ 222

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मणं कृष्णाजिन दीक्षा “ तस्मादमुत्रैवाङ्ग ुली यचेत् प्रमुत्र वाचं यच्छेत् ” अपि च पाठ नियम का भङ्ग तब होता है जबनि व्यर्थ की सामान्य मनुष्यवाक् बोली जाय । यदि वाक् संयमनान्तर यह दीक्षित मनुष्य ऋचा, यजु अथवा साम तीनों में से जो भी मन्त्र बोलता है वह मन्त्र बल के प्रभाव से ठहर - ठहरकर यज्ञ को श्रात्मसात् करता है । मन्त्र ही तो यज्ञस्वरूप है अतः वहीं वाक् संयमन करना चाहिए । यहां वाक् संयमन की कोई आवश्यकता नहीं है । “ अथ यद्दीक्षितः ऋचं वा यजु वा साम वाभिव्याहरति अभिस्थिरयन्ति स्थिरमेवैतद्यज्ञमारभते, तस्मादमुत्रैवांगुलिर्व्यचेत् प्रमुत्रवाचं यच्छेत् । अर्थात् यहां वाक् संयमन न करने से एवं मन्त्र बोलने से उलटा यज्ञ आत्मसात होता है अतः यज्ञस्वरूप संपादनार्थ यहां वाक् संयमन की कोई आवश्यकता नहीं हैं ॥ ३७ ॥

प्रसंगागत दर्शनानन्तर वाक्संयमन की उपपत्ति बतला देते हैं । " अथ यद्वाचं यच्छति तदुच्यते - इति शेषः " । वाक् ही यज्ञ है जैसा कि इसके आगे के ब्राह्मण में बतलाने वाले हैं तो जो वाक्संयम करता है वह यज्ञ को ही आत्मसात करता है । ऐसी अवस्था में यह मनुष्य यदि धोखे से कुछ बोल देता है तो यज्ञ आत्मा से विशिष्ट होकर पराङ्मुख हो जाता । यज्ञ आत्मा से दूर निकल जाता है अतः ऐसी अवस्था में विष्णुदेवताक ऋचा अथवा विष्णुदेवता सम्बन्धी यजुर्मन्त्र जप कर लेना चाहिए । क्योंकि यज्ञ ही विष्णु है तो वैष्णवी ऋचा बोलता हुआ यह यजमान उस यज्ञ को वापस आत्मसात कर लेता है । वाक् संयमन करते समय सद् असद् बोलने का यही प्रायश्चित है । “ वाग्वै यज्ञः यज्ञमेवैतदात्मनि धत्ते । अथ यद् वाचं यमो व्याहरति तस्मादुहैष विसृष्टो यज्ञः परा श्रावर्तते तथा वैष्णवीमृचं वा यजुर्वा जपेत् । यज्ञो

वै विष्णुः तं यज्ञं पुनरारभते । तस्यो हैषा प्रायश्चित्तिः ॥ ३८ ॥

इसके बाद ऋत्विजों में से एक ऋत्विज बोलता है: " दीक्षितोऽयं ब्राह्मणः, दीक्षितोऽयं ब्राह्मणः । इति यह ब्राह्मण दीक्षणीयेष्टि कृष्णाजिनादि दीक्षा संस्कार से संस्कृत हो गया है । यही इस मन्त्र का श्रर्थ है । यद्यपि दीक्षा लेने से यह यजमान देवताओं के निवेदन हो चुका अर्थात् मनुष्य मण्डली से हटकर देवताओं का बन गया, परन्तु इसी को " द्विर्बद्धं सुबद्धं भवति " न्याय से फिर देवताओं को सुनवा देते हैं । [ २०४ ]

पृष्ठ 223

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिनदीक्षा " निवेदितमेवेतत्सन्तं देवेभ्यो निवेदयति " । यह बड़ा ही प्रतापी है जो सोमयाग को प्राप्त हुआ है । हे देवताओं, आज यह आप में से एक हो गया है । अत: इसकी रक्षा करो, यही तात्पर्य है । " अयं महावीर्यो यो यज्ञं प्रापत् अयं युष्माकंकोऽभूत् तं गोपायते त्येवैतदाह "

वह अध्वर्यु इस मन्त्र को तीन दफे बोलता है क्योंकि यज्ञ त्रिवृत् ही है ।

" त्रिष्कृत्व ग्रह, त्रिवृद्धि यज्ञः " ॥३ ९ ॥

आवेदन वाक्य में जो ब्राह्मण पद दिया है उसका कारण बतलाते हैं । इस दीक्षा से पूर्व इस यज-मान का जान अर्थात् जन्म अविलक्षित ही होता है । जब तक यह यजमान दीक्षा नहीं ले लेता हैं तब तक यह किस वर्ण का है, यह पता लगाना जरा कठिन है । " अनद्धेव वा अस्यातः पुरा जानं भवति " । कौन अद्धा होता है— इसका कारण बतलाते हैं कि वैज्ञानिक महर्षि लोगों ने यह कहा राक्षस लोग स्त्रियों की ओर अभिमुख होते है । राक्षस स्त्रियों से सम्बन्ध रखते हैं एवं गर्भाधान समय राक्षस ही उस वीर्य को ग्रहण करते हैं । राक्षस नाम है असुरों का । असुर कहते हैं प्राप्यप्राण को । देवता कहते हैं ग्राग्नेय प्राण को । आप्यप्राण संकोचधर्मा है । आग्नेयप्राण विकास धर्मा है । वीर्य की स्थिति संकोच धर्मा - इस प्रप्यब्राण से ही होती है । यदि अग्नि का अर्थात् देवता का सम्बन्ध जाए । उसी समय गर्भ बिना वीर्य विशक-लित हो जाए । जब स्त्री रजस्वला होती है तो उसमें त्रिप्राण रहता है । त्रिप्राण सूर्य्यं विरोधी प्राण | अतएव यह असुर है | वही इस गर्भाधान में मदद पहुंचाता हैं । जब तक स्त्री ऋतुमती न होगी तब तक गर्भाधान होगा ही नहीं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर कहते हैं । " इदं ह्याहुः रक्षांसि योषितमनुसंचन्ते तदुतरणेस्यव परित प्रादधतीति " चूंकि राक्षस योनि से मनुष्य उत्पन्न होता है अतएव इसके ब्राह्मणत्व में संदेह है । परन्तु ब्रह्म की चिदात्मस्वरूप यज्ञ से जो दीक्षित हो जाता है प्राज वह वास्तव में ब्राह्मण बन जाता है । " अथात्राद्धा जायते यो ब्राह्मणो यो यज्ञाज्जायते " । इसीलिए चाहे, वैश्य हो, चाहे राजा हो - यदि वह दीक्षित है तो उसके लिए " श्रयं ब्राह्मणः " यही बोलना चाहिए । क्योंकि जो यज्ञ से पैदा होता है वह ब्रह्मवीर्य से ही उत्पन्न होता है । [ २०५ ]

पृष्ठ 224

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिन दीक्षा " तस्मादपि राजन्यं वा वैश्यं वा ब्राह्मरण इत्येव ब्रूयात् । ब्राह्मणो हि जायले यो यज्ञाज्जायते " इसीलिए कहा जाता है कि यज्ञकर्त्ता को कभी बुरी दृष्टि से नहीं देखना चाहिए । जो यज्ञकर्त्ता को बुरी नजर से देखता है वह पापी बनता है । " तस्मादाहुः न सवनकृतं स्यात् हन्यादे हैव सवनकृता " । अर्थात् सवनकृत निमित्त से, अर्थात् सवन करने वाले पुरुष के वध के कारण यह वधिक पापी हो जाता है ॥ ४० ॥

इति कृष्णाजिनदीक्षा ब्राह्मणं समाप्तम् । इति तृतीय काण्डे द्वितीयाध्याये प्रथमं ब्राह्मणं समाप्तम् । [ २०६ ]

पृष्ठ 225

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अथ द्वितीयाध्याये द्वितीयं ब्राह्मणम् ' दीक्षित्वत ब्राह्मण ' ( मूल ) वाचं यच्छति । स वाचंयम प्रस्त प्रस्तमयात् तद्यद्वाचं यच्छति ॥१ ॥

यज्ञेन वै देवाः । इमां जिति जिग्युषा मियं जितिस्ते होचुः कथन्न इदं मनुष्यैरनभ्यारो स्यादिति ते यज्ञस्य रसं धीत्वा यथा मधु मधुकृतो निर्द्ध-येयुविह्य यज्ञं यूपेन योपयित्वा तिरोऽभवन्नथ यदेनेनायोपयंस्तस्माद्यूपो नाम ॥२ ॥

तद्वा ऽऋषीणां मनुश्रुत मास । ते यज्ञं समभरन्यथायं यज्ञः सम्भृत एवं वा एष यज्ञं सम्भरति यो दीक्षते वाग् वै यज्ञः ॥३ ॥

तामस्तमिते व्वाचं विसृजते । संवत्सरो वै प्रजापतिः प्रजापतिर्य्यज्ञो होरात्रे वै संवत्सर एते ह्य ेनं परिप्लवमाने कुरुतः सोऽहं न दीक्षिष्ट स रात्रि प्रातप्स यावानेव यज्ञो यावत्यस्य मात्रा तावन्त मेवैतदाप्त्वा वाचं विसृजते || ४ || तर्द्धके । नक्षत्रं दृष्ट्वा वाचं विसर्जयन्त्यत्रानुष्ट्यास्तमितो भवतीति वदन्तस्तदु तथा न कुर्यात् क्व ते स्युर्य्यन्मेघः स्यात्तस्माद्यत्रैवानुष्ठयास्तमितं मन्येत तदेव वाचं विसर्जयेत् ॥५ ॥

अनेन हैके वाचं विसर्जयन्ति । भूर्भुवः स्वरिति यज्ञः माप्याययामो यज्ञं सन्दध्म इति वदन्तस्तदु तथा न कुर्यान्न ह स यज्ञ माध्याययति न सन्द-धाति य एतेन वाचं विसर्जयति ॥ ६ ॥

अनेनैव वाचं विसर्जयेत् । व्रतं कृणुत व्रतं कृणुताग्निब्रह्माग्मिर्यज्ञो वनस्प-तिर्यज्ञिय इत्येष ह्यस्यात्र यज्ञो भवत्येतद्धविर्यथा पुराग्निहोत्रं तद्यज्ञेनैवं तद्यज्ञं [ २०७ ]

पृष्ठ 226

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण सम्भुत्य यज्ञे यज्ञं प्रतिष्ठापयति यज्ञेन यज्ञं सन्तनोति सन्ततं ह्येवास्यैतद् व्रतं भवत्या सुत्यायै त्रिष्कृत्व ग्राह त्रिवृद्धि यज्ञः ॥७ ॥

अथाग्निमभ्यावृत्य वाच विसृजते । न ह स यज्ञ मात्याययति न सन्द-धाति योऽतोन्येन वाच विसृजते स प्रथम व्याहरन्त्सत्यं वाचो ऽभिव्याह-रति ॥८ ॥

निर्ब्रह्म ेति । श्रग्निव ब्रह्माग्निर्य्यज्ञ इत्यग्निा व यज्ञो वनस्पतिर्यज्ञिय इति वनस्पतयो हि यज्ञिया न हि मनुष्या यजेरन् यद् वनस्पतयो न स्युस्त-स्मादाह वनस्पतिर्यज्ञिय ज्ञति ॥९ ॥

प्रथमं व्रतं श्रपयन्ति । देवान्वा ऽएष उपादर्तते यो दीक्षते स देवताना मेको भवति तं वै देवानां हविनाश्रितं तस्माच्छ्रपयन्ति तदेष एव व्रतयति नाग्नौ जुहोति तथदेष एव व्रतयति नाग्नौ जुहोति ॥ १० ॥

यज्ञेन वै देवा । इमां जिति जिभ्युय्यैषा मियं जितिस्ते होच: कथन्न इदं मनुष्यैरनभ्यारोहा स्यादिति ते यज्ञस्यरसं धोत्वा यथा मधु मधुकृतो निर्द्धये-युव्विदुह्यं यज्ञं यूपेन योपयित्वा तिरोऽभवन्नथ यदेनेनायोपयं - स्तस्माद्यूपो नाम ॥११ ॥

तद्वा ऋषीणाननुश्रुत मास । ते यज्ञं समभरन् यथायं यज्ञः सम्भृत एष वाऽत्र यज्ञो भवति यो दीक्षित एष न तनुतऽएष एनं जनयति तद्यदेवात्र यज्ञस्य निर्द्धतं यद्विदुग्धं तदेवैतत्पुनराध्यायति यदेष एव व्रतयति नाग्नौ जुहोति न हाप्यायमेद्यदग्नौ जुहुयाज्जुह्वदु हैव मन्येत नाजुह्वत् ॥१२ ॥

इमे वै प्राणाः 1 । मनोजाता मनोयुजो दक्षक्रतवो व्यागेवाग्निः प्राणोदानौ मित्रावरुणौ चक्षुरादित्यः श्रोत्रं विश्वेदेवा एतासु हैवास्यैतद्देवतासु हुतं भवति ॥१३ ॥

तद्वै । प्रथम व्रत उभौ व्रीहियवावावपन्त्यु भाभ्यां रसाभ्यां यदेवात्र यज्ञस्य निर्द्धातं यद्दिदुग्धं तत्पुनराप्ययाम इति व्वदन्तो यद्यु व्रतदुधा न दुहीत [ २०८ ]

पृष्ठ 227

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण यस्यैवातः कामयेत तस्य व्रतं कुर्यादेतदु वास्यैता उभौ व्रीहियवावन्वारब्धौ भवत इति तदु तथा न कुर्यान्न ह स यज्ञमाप्याययति न सन्दधाति य उभौ व्रीहियवावावपति तस्मादन्यतरमेवावपेद्धविर्वाऽग्रस्यैताऽउभौ व्रीहियवौ भवतः स यदेवास्यैतौ हविर्भवतस्तदेवास्यैतावन्वारब्धौ भवतो यद्य व्रतदुधा न दुहीत यस्यैवातः कामयेत तस्य व्रतं कुर्यात् ॥ १४ ॥

तद्वै । प्रथमे व्रते सर्वोषधं सर्वसुरभ्यावपन्ति यदि दीक्षितमतिविन्देद्ये-नैवातः कामयेत तेन भिषज्येद् यथा व्रतेन भिषज्येदिति तदु तथा न कुर्यान्मा नुषं हते यज्ञे कुर्व्वन्ति व्यृद्धं वै तद्यज्ञस्य यन्मानुषं नेद् व्यृद्धं यज्ञे करवाणीति यदि दीक्षितमतिविन्देद्यनैवातः कामयेत तेन भिषज्येत् समाप्तिर्ह्य व पुण्या ॥१५ ॥

श्रथास्मै व्रतं प्रयच्छति । श्रतिनीय मानुषं कालं सायन्दुग्धमपररात्रे प्रातर्दुग्ध मपरा व्याकृत्या एव दैवञ्चैवैतन्मानुषं च व्याकरोति ॥ १६ ॥

प्रथमं व्रतं प्रदास्यन्नप उपस्पर्शयति । दैवोन्धिय मनामहे सुमृडीका-मभिष्टये वच्चधां यज्ञवाहसं सुतीर्था नो ऽग्रसद्वश ऽइति मानुषाय वा एष पुराशनायावनेनिक्तऽथात्र दैव्यैधिये तस्मादाह देवों धियं मनामहे सुमृडीका-मभिष्टये वच्धां यज्ञवाहसं सुतीर्था नो ऽप्रसद्वश ऽइति स यावत् कियच्च व्रतं व्रतयिष्यन्नप उपस्पृशेदेते नैवोपस्पृशेत् ॥ १७ ॥

अथ व्रतं व्रतयति । यो देवा मनोजाता मनोयुजो दक्षऋतवस्ते नो ऽवन्तु ते नः पान्तु तेभ्यः स्वाहेति तद्यथा वषट्कृतं हुतमेव मस्यैतद्भवति ॥ १८ ॥।

अथ व्रतं व्रतयित्वा नाभिमुपस्पृशते । श्वात्राः पीता भवत यूयमापो अस्माकमन्तरुदरे सुशेवाः । ता अस्मभ्यमयक्ष्मा अनमीवा अनागसः स्वदन्तु देवोरमृता ऋतावृध इति देवान् वा एष उपावर्तते यो दीक्षते स देवताना मेको भवत्यनुत्सिक्त वै देवानां हविरथैतद् व्रतप्रदो मिथ्या करोति व्रत मुपो-त्सिन् व्रतं प्रमीणाति तस्यो हैषा प्रायश्चितिस्तथो हास्यैतन्न मिथ्याकृतं भवति न व्रतं प्रमीणाति तस्मादाह श्वात्राः पीता भवत यूयमापो ऽग्रस्माकमन्तरु-[ २० ९ ]

पृष्ठ 228

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बृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मणं दरे सुशेवा । ता अस्मभ्यमयक्ष्मा अनमीवा अनागसः स्वदन्तु देवीरमृता ऋता-वृध इति स यावत्कियच्च व्रतं व्रतयित्वा नाभिमुपस्पृशेदेतेनैवोपस्पृशेत् कस्तद्वेद यद् व्रतप्रदो व्रतमुपोत्सिञ्चेत् ॥ १ ९ ॥ अथ यत्र भेक्ष्यन् भवति । तत् कृष्णविषाणया लोष्टं वा किञ्चिद्वोपह-न्तीयं ते यज्ञिया तनूरितीयं वै पृथिवी देवी देवयजनी सा दीक्षितेन नाभिमिह्या तस्या एतदुद्गृव यज्ञियां तनू मथायज्ञियं शरीरमभिमेहत्यपोमुञ्चामि न प्रजा मित्युभयं वा त एत्यापश्वरेतश्च स एतदप एव मुञ्चति न प्रजा महोमुचः स्वाहाकृता इत्यं हस इव ह्येता मुञ्चन्ति यदुदरे गुष्टितं भवति तस्मादाहा होमुच इति स्वाहाकृताः पृथिवी माविशतेत्याहुतयो भूत्वा शान्ताः पृथिवी माविशतेत्येवैतदाह । २० । अथ पुनर्लोष्टं न्यस्यति । पृथिव्या सम्भवेतीयं वै पृथिवी देवी देवयजनी सा दीक्षितेन नाभिमिह्या तस्या एतदुद्गृह्यं व यज्ञियां तनू मथायज्ञियं शरीरम-भ्याक्षित्तामेवास्या मेतत् पुनर्य्यज्ञियां तनूं दधाति तस्मादाह पृथिव्या सम्भ वेति ॥२१ ॥

प्राग्नये परिदाय स्वपिति । देवान् वा एष उपावर्त्तते यो दीक्षते स देवतानामेको भवति न वै देवाः स्वपन्त्यनवरुद्धो वा ऽएतस्यास्वप्नो भवत्य-ग्निर्वै देवानां व्रतपतिस्तस्मा एवैतत् परिदाय स्वपित्यग्ने त्वं सु जागृहि वयं सु मन्दिषीमही त्यग्ने त्वं जागृहि वयं स्वपस्याम इत्येवैतदाह रक्षाणोऽअप्रयुच्छ-निति गोपाय नो ऽप्रमत्त इत्येवैतदाह प्रबुधे नः पुनस्कृधीति यथेतः सुप्त्वा स्वस्ति प्रबुध्यामहा एवं नः कुव्वित्येवैतदाह ॥२२ ॥

अथ यत्र सुप्त्वा पुनर्नावद्रास्यन् भवति । तद्वाचयति पुनम्नः पुनरायुमं ऽश्रागन् पुनः प्राणः पुनरात्मा म श्रागन् पुनश्चक्षुः पुनः श्रोत्रं मध्प्रागन्निति सर्वे ह वाऽएते स्वपतो ऽपक्रामन्ति प्राण एव न तैरेवैतत् सुप्त्वा पुनः सङ्गच्छते तस्मादाह पुनर्मनः पुनरायुर्म ऽश्रागन् पुनः प्राणः पुनरात्मा म ग्रागन् पुनश्चक्षुः पुनः श्रोत्रं मागन् । वैश्वानरो अन्धस्तनूपा प्रग्निर्नः पातु दुरितादवद्या-दिति तद्यदेवात्र स्वप्नेन वा येन वा मिथ्याकर्म तस्मान्नः सर्व्वस्मादग्निर्गोपा [ २१० ]

पृष्ठ 229

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण यत्वित्येवैतदाह तस्मादाह वैश्वानरों प्रदब्धस्तनूपा श्रग्निर्नः पातु दुरिताव-द्यादिति ॥२३ ॥

अथ यद्दीक्षितः । अत्रत्यं वा व्याहरति क्रुध्यति वा तन्मिथ्याकरोति व्रतं प्रमीणात्य क्रोधो व दीक्षितस्याग्निर्वै देवानां व्रतपतिस्तमेवैतदुपधावति त्व-मग्ने व्रतपा असि देवा मर्त्येष्वा । त्वं यज्ञ ेष्वीद्धय इति तस्यो हैषा प्राय-चित्तिस्तथो हास्यैतन्न मिथ्याकृतं भवति न व्रतं प्रमीणाति तस्मादाह त्वमग्ने व्रतपा असि देव मर्त्येष्वा त्वं यज्ञेष्वीङय इति ॥ २४ ॥

अथ यद्दीक्षितायाभिहरन्ति । तस्मिन् वाचयति रास्वेयत्सोमा भूयो भरेति सोमो ह वा अस्मा एतद्युते यद्दीक्षितयाभिहरन्ति स यदाह रास्वे यत्सामेति रास्व न इयत्सोमेत्येवैतदाहा भूयो भरत्या नो भूयो हरेत्येवैतदाह देवो नः सविता वसोर्दातावस्वदादिति तथो हास्मा एतत्सवितृप्रसूतमेव दानाय भवति ॥२५ ॥

पुरास्तमयादाह । दीक्षित वाचं यच्छेति ता मस्तमिते वाचं विसृजते पुरोदयादाह दीक्षित वाचं यच्छेति ता मुदिते वाचं विसृजते सन्तत्या एवाहरे-वैतद्राव्या सन्तनोत्यन्हा रात्रिम् || २६ || नैन मन्यत्र चरन्तमभ्यस्तमियात् । न स्वपन्तं मभ्युदियात्स यदेन मन्यत्र चरन्त मभ्यस्तमियाद्रात्रेरेनं तदन्तरियाद्यत् स्वपन्त मभ्युदियादन्ह एनं तदन्त-रियान्नात्र प्रायश्चित्तिरस्ति प्रतिगुप्य मेवैतस्मान्न पुरावभृथादपो ऽभ्यवेयान्नैन मभिवर्षेदनवत्कृप्तं तद्यत् पुरावभृथादपोऽभ्यवेयाद्यद्वैन भभिवर्षेदथ परिह्वालं वाचं वदति न मानुषीं प्रसृतां तद्यत्परिह्वालं वाचं वदति न मानुषीं प्रसृताम् ॥२७ ॥

यज्ञेन वै देवाः । इमां जिति जिग्युषा मिघं जितिस्ते होचुः कथं न इदं मनुष्यैरनाभ्यारोह्यं स्यादिति ते यज्ञस्य रसं धीत्वा यथा मधु मधुकृतो निर्द्धयेयु-विदुह्य यज्ञं यूपेन योपयित्वा तिरोऽभवन्नथ यदेनेनायोपयंस्तस्माद्यूपो नाम ॥ २८ ॥

तद्वा ऋषीणामनुश्रूतमास । ते यज्ञं समभरन यथायं यज्ञः सम्भृत एवं वा एषयज्ञं सम्भरति यो दीक्षते वाग् वै यज्ञस्तद्यदेवात्र यज्ञस्य निद्धतं यदि-[ २११ ].

पृष्ठ 230

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण दुग्धं तदेवैतत् पुनराप्याययति यत् परिह्वालं वाचं वदति न मानुषीं प्रसृतां न हाप्याययेद्यत् प्रसृतां मानुषीं वाचं वदेत्तस्मात् परिह्वालं वाचं वदति न मानुषीं प्रसृताम् ॥२ ९ ॥ सवै धीक्षते । वाचे हि धोक्षते यज्ञाय हि धीक्षते यज्ञो हि वाग् धीक्षितो हवं नामैतद्यद्दीक्षित इति ॥ ३० ॥

[ अनुवाद ] पूर्व ब्राह्मण में कृष्ण मृगचर्म पर बैठकर यजमान मेखला धारण करता है तथा जरायुस्थानापन्न वस्त्र को शरीर पर धारण कर वस्त्र के ग्रन्थि भाग में कृष्णमृग का सींग बांध लेता है, इस विषय का निरूपण किया गया है । अब इस ब्राह्मण में यजमान को दीक्षा ग्रहण करने पर जिन व्रतों का पालन करना पड़ता है उन व्रतों का निरूपण किया जा रहा है क्योंकि दीक्षाग्रहणानन्तर दीक्षित यजमान साधारण मनुष्य नहीं रहता अपितु वह देव-भावयुक्त हो जाता है अतः साधारण मनुष्य की तरह हर स्थान में गमन या भ्रमण तथा चाहे जिस पुरुष के साथ संभाषण उसके लिए निषिद्ध हैं ।

यजमान दीक्षाग्रहणानन्तर वाक् संयमन करता है । अर्थात् मौन धारण करता है ।

वह सूर्य्यास्त काल तक मौन ही रहता है ॥ १ ॥

वाक् संयमन का रहस्य बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि देवताओं ने यज्ञ के द्वारा इस विजय को प्राप्त किया । जो उनकी विजय श्राज देखी सुनी जा रही है यज्ञ द्वारा असुरों का विनाश तथा अखिल ब्रह्माण्ड में प्रभुत्वरूप विजय प्राप्त करने के बाद देवताओं ने विचार किया कि यज्ञ रहस्य को मनुष्य न जान सकें इसलिए जैसे भ्रमर पुष्प के रस को चूस लेता है उसी प्रकार देवता यज्ञ के सार भाग को निचोड़ कर यूप के द्वारा उसे छुपाकर अन्तर्हित हो गए । देवताओं ने ग्रुप के द्वारा यज्ञ को छुपाया इसलिए " अनेन यज्ञमयोपयत् " इस व्युत्पत्ति से उसका नाम यूप हो गया । इस आख्यान का सम्बन्ध अधिदैवत तथा इतिहास दोनों से है । अधिदैवत अर्थात् प्रकृति में सौरप्रकाशी प्रारण देवता कहलाते हैं तथा पारमेष्ठ्य व प्राप्यत्रारण असुर हैं । इनमें परस्पर स्पर्धा चलती रहती है । देवप्रारण समष्टि सूर्य पर प्रतिक्षण उसके चारों तरफ विद्यमान प्राप्यप्राण असुरों का आक्रमण होता रहता है । सौर ग्राग्नेय प्राणों की सत्ता सूर्य में है तथा आप्य असुर प्राणों की सत्ता परमेष्ठी में है । सौर देवप्राण ८ वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य, २ अश्विनी प्राण, संख्या में कुल ३३ हैं तथा प्राप्य पारमेष्ठ्य प्राण संख्या में ६६ हैं । जैसा कि " जघान नव तिर्नव " इस श्रुति से सिद्ध है । परमेष्ठी लोक सूर्य से ऊपर और सूर्यलोक उससे नीचे है । अतः पारमेष्ठथ प्राप्य प्रारणात्मक असुर ज्येष्ठ है और सौर प्राणा-त्मक देव कनिष्ठ है । अतः ज्येष्ठ तथा संख्या में अधिक होने से स्पर्धा में विजय असुरों की [ २१२ ]