Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 231–240
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 231–240
पृष्ठ 231
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मणे दीक्षितव्रत ब्राह्मणं होनी चाहिए । किन्तु यज्ञ द्वारा देवप्राण असुरों पर विजय प्राप्त कर लेते हैं । अग्नि में सोम की आहुति का नाम ही यज्ञ है । सोम भी यद्यपि पारमेष्ठ्य तत्त्व ही है क्योंकि पारमेष्ट भृगु आप- वायु- सोम भेद से ३ प्रकार का है । उसमें अमृतत्त्व का आग्नेय देवप्रारण के साथ विरोध है । क्योंकि जल अग्नि को शान्त कर देता है । किन्तु अप की बिरलावस्थारूप सोम, अग्नि का घृतादि की तरह सहयोगी है । घृत भी लोम ही है । घृत की आहुति से जैसे अग्नि प्रदीप्त होता है वैसे ही सोम की आहुति से अग्नि प्रदीप्त होता है । अधिदैवत में अग्निरूप सूर्य में पारमेष्ठ्य ब्रह्मणस्पति सोम की ग्राहुति से सूर्य प्रदीप्त हो जाता है और वह अपनी रश्मिरूप वज्च से श्राप्य वारुणरूप प्रासुरप्राणों के होने वाले आक्रमण को नष्ट कर उन पर विजय प्राप्त कर लता है किन्तु यह विजय सौर देवताओंों को श्राग्नेय सौर प्रारणों की आहुति रूप यज्ञ से ही प्राप्त होती है । आधिदैविक यज्ञ की तरह इस ग्राख्यान का ऐतिहासिक भुवनस्वर्गवासी देवताओं तथा उनसे स्पर्धा करने वाले असुरों में भी समन्वय है । भुवन-स्वर्गवासी मनुष्य देवताओं ने असुरों पर यज्ञ के द्वारा ही विजय प्राप्त की थी, इसी अभिप्राय से कहा है “ यज्ञेन वै देवा जिति जिग्युर्येषामियं जितिः । किन्तु इस विजय हेतु मूल यज्ञ विद्या को मनुष्यों से छिपाया और उसका साधन था यूप । प्राकृतिक यज्ञ में सूथ ही यूप है । सूर्य की प्रखर किरणों के चाकऊिक्य से उसमें होने वाली पारमेष्ठ्य सोमाहुति को कोई देख नहीं सकता । उसी प्रकार ऐतिहासिक मनुष्य देवताओं ने विजय साधनभूत यज्ञ को सूर्यप्रतिनिधि रूप यूप से छिपाया । इसीलिए लिखा है " अथ यज्ञं यूपेन योपयित्वा ( देवाः ) तिरोऽभवन् " इति । प्रकृति के इस यज्ञ विज्ञान को जिन्होंने अनुसन्धानरूप तप के द्वारा मालूम किया वे वैज्ञानिक महर्षि भुवनस्वर्गवासी देवता हैं । उन्होंने यहां प्राकृतिक यज्ञविज्ञान को मालूम कर यज्ञ का अनुष्ठान किया तथा उसके द्वारा दिव्य प्राणों का प्रधान कर बलशाली बन गये और उन्होंने असुरों पर विजय प्राप्त कर ली । किन्तु भुवनस्वर्गवासी देवताओं ने भी इस यज्ञ को मनुष्यों से छिपाया । किन्तु ऋषिलोग भुवनस्वर्ग में जाया करते थे । वे भुवन-स्वर्गवासी देवताओं के यज्ञ को देखते थे । उन्होंने यज्ञविज्ञान को सुन रक्खा था । उन्हीं ऋषियों से भारतवासी मनुष्यों को यह यज्ञविज्ञान प्राप्त हुआ । उन्होंने जिस प्रकार भुवन-स्वर्गवासी देवता यज्ञ का संभरण करते थे उसी प्रकार यज्ञ का संभरण किया । उसे आत्म-सात् किया । आज जो यजमान यज्ञ में दीक्षा ग्रहण कर रहा है वह भारतवर्षीय महर्षियों द्वारा संभृत ( आत्मसात्कृत ) यज्ञ की तरह यज्ञ का संभरण कर रहा है । वाक् ही यज्ञ का स्वरूप है । क्योंकि पृथिवी के केन्द्र से निकल देवरथ रूप सूर्य के ऊपर रथन्तर साम तक जाने वाला अग्नि ही यज्ञ है । २२ वें अहर्गण के ऊपर सोम भरा हुआ है । उस सोम की इस अग्नि में आहुति होती रहती है, और अग्नि में सोम की आहुति ही यज्ञ का स्वरूप निष्पन्न करती है । इस रीति से अग्नि व सोम दोनों के यज्ञ स्वरूप होने से केवल वाग्रूप अग्नि को यज्ञ बतलाना उचित प्रतीत नहीं होता तथापि सोम श्राद्य है अग्नि ग्रत्ता है अतः [ २१३ ]
पृष्ठ 232
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्राह्मरण दीक्षितव्रत ब्राह्मणं आदय की ग्रत्ता में आहुति होने पर अत्ता अग्नि ही शेष रहता है । अर्थात् आद्य सोम की अत्ता अग्नि में आहुति होने पर अग्नि ही अवशिष्ट रहती है । अतः अग्नि ही यज्ञ है । इस प्रकार अग्नि के यज्ञ होने पर भी वाक् को यज्ञ क्यों कहा गया? इसका समाधान यही है कि " तस्य वा एतस्याग्ने र्वागेवोपनिषद् ” इस श्रुति के अनुसार वाक् अग्निरूप ही है । इसी रहस्य को लक्ष्य कर “ वाग् वै यज्ञः ” के द्वारा वाक् को यज्ञ कहा गया है ॥३ ॥
दीक्षित यजमान ने प्रातःकाल जिस वाक् का संयमन किया था उसका सूर्यास्त होने पर विसर्जन कर दिया जाता है । सूर्यास्त होने पर वाक् संयमन का अर्थात् मौनव्रत का विसर्जन क्यों कर देना चाहिए? इसकी उपपत्ति बतलायी जा रही है । पहले बतला दिया गया है कि पृथिवी के केन्द्र से अमृताग्नि ( प्राणाग्नि ) निकल कर २१ वें अहर्गण, जहां सूर्य स्थित है, से भी ऊपर जाती है । वहां तक पृथिवी का प्राणाग्निमण्डल रहता है । इसी अग्नि मण्डल को संवत्सर कहते हैं । प्रत्येक मण्डल अर्थात् वृत्त ३६० अंश का होता है । अग्नि-मण्डल के इन ३६० अंशों को रेखा द्वारा चिह्नित कर दिया जाता है । ये ही अग्निमण्डल की ३६० रात्रियां हैं, तथा उन रेखाओं के मध्य के भाग भी ३६० ही होते हैं । ये ही उस अग्निमण्डल के ३६० दिन हैं । इस प्रकार अग्निमण्डलात्मक संवत्सर अहोरात्रों की समष्टि हो जाती है । इसी अग्निमण्डलात्मक संवत्सर से सकल पदार्थ, जड़ व चेतन उत्पन्न होते हैं । अतः इस अग्निमण्डल संवत्सर को प्रजापति कहा जाता है । २१ वें अहर्गण अर्थात् सूर्य से भी ऊपर जाने वाले इसी अग्नि में उसके ऊपर रहने वाले पारमेष्ठ्य सोम की आहुति रहती है । सोमाहुति का नाम ही यज्ञ है । अतः इस संवत्सर प्रजापति को यज्ञ कहा जाता है और यह अग्निमंडलात्मक संवत्सर उपर्युक्त रीति से ३६० दिन व ३६० रात्रियों की समष्टि है । इसीलिए अहोरात्र भी कहा जाता है । इसीलिए भगवान् याज्ञवल्क्य ने कहा है “ संवत्सरो वै प्रजापतिः प्रजापतिर्यज्ञः, अहोरात्रे वै संवत्सरः " ॥ इति ॥ एक अहोरात्र से संवत्सर प्रजापति का स्वरूप निष्पन्न नहीं होता अतः ३६० बार आवर्तन अहोरात्रों से अग्निमण्डलात्मक संवत्सर का स्वरूप बनता है, इसलिए " एते ह्य ेनं परिपक्वमाने कुरुतः ” यह कहा है । अर्थात् पुनः पुनः प्रवर्तमान अहोरात्र ही संवत्सर के स्वरूप बनाते हैं । अतः अन्ततोगत्वा अहोरात्र ही संवत्सर है यह मानना पड़ता है । यजमान ने चूंकि इस अहोरात्र के अहर्भाग अर्थात् दिन के प्रारम्भ में ही दीक्षा ग्रहण की है । क्योंकि अहोरात्र रूप संवत्सर ग्रहः भाग सूर्यप्राणरूप है तथा रात्रि पार्थिव प्राणरूप है । यजमान को यज्ञ द्वारा पृथिवीलोक से सूर्यलोक रूप स्वर्ग को प्राप्त करना है ग्रतः वह सूर्य प्राण को ही दीक्षा द्वारा आत्मसात् करता है । सूर्यास्त होने पर रात्रि या गई है । ग्रतः सूर्यमण्डल को प्राप्त करने के लिए वाक् संयम रूप जो व्रत लिया था उसको सूर्यास्त तक प्राप्त कर लिया । श्रतः वह ग्रव वाक् संयमन व्रत का परित्याग कर देता है ॥ ४ । [ २१४ ]
पृष्ठ 233
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ० २ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण कितने ही प्राचार्य नक्षत्र को देखकर वाक् का विसर्जन करते हैं । उनकी मान्यता है कि आकाश में नक्षत्रों के दिखाई देने पर वास्तविक रूप में सूर्यास्त हो जाता है । अतः नक्षत्र देखने पर ही सूर्यास्त वेला में होने वाला वाग्विसर्जन करना चाहिए । किन्तु भगवान् याज्ञवल्क्य का कथन है कि ऐसा नहीं करना चाहिए । क्योंकि यदि कभी आकाश मेघाच्छन्न हो जाय तो सूर्यास्त होने पर भी नक्षत्र नहीं दिखाई देंगे । अतः जब यह निश्चय हो जाय कि वस्तुतः सूर्यास्त हो गया तो वाग्विसर्जन कर देना चाहिए । अर्थात् नक्षत्र दर्शन को लक्षणया सूर्यास्तकाल का बोधक मानना चाहिए, न कि शब्दार्थ ग्रहण मात्र नक्षत्र दर्शन का बोधक मानना चाहिए ॥ ५ ॥
कितने ही आचार्यों का कथन है कि " भूर्भुवः स्वः " इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए वाग् विसर्जन करना चाहिए । क्योंकि दीक्षित यजमान ने प्रातः काल वाक् संयमन कर यज्ञ को आत्मसात् किया है । अब जब वह वाक् का विसर्जन करता है उस आत्मसात् कृत यज्ञ को परितुष्ट करने वाली व उसका संधान करने वाली वाणी का उसे उच्चारण करना चाहिए, और यज्ञ को परिपुष्ट व उसका संधान करने वाली वाक् " भूर्भुवः स्वः ” ही है । ये भूः, भुवः, स्वः क्रमशः पार्थिव, आन्तरिक्ष्य तथा दिव्याग्निरूप हैं, और अग्नि में सोमाहुति कोही यज्ञ कहते हैं । अतः ये तीनों यज्ञस्वरूप हैं । इसलिए इनके उच्चारण करने से यज्ञ की परिपुष्टि व संधान होता है । अतः इनका उच्चारण करते हुए ही वाग् विसर्जन करना चाहिए | किन्तु भगवान् याज्ञवल्क्य का कथन है कि " भूर्भुवः स्वः " रूप वाणी के उच्चारण करने से न यज्ञ की परिपुष्टि होती है और न यज्ञ का संधान होता है । अतः वाग् विसर्जन करते समय “ भू र्भुवः स्व " के उच्चारण की आवश्यकता नहीं हैं ॥।६ ॥ इसलिए “ व्रतं कृरणुत व्रतं कृणुताग्नि ब्रह्माग्निर्यज्ञो वनस्पतिर्यज्ञियः ” इति । इस मन्त्र का उच्चारण कर वाग् विसर्जन करना चाहिए । " अन्नं वै व्रतम् " इस श्रुति के अनुसार व्रत अन्न का नाम है और दीक्षित यजमान का अन्न साधारण अन्न न होकर दुग्धरूप विशेष अन्न है । क्योंकि दीक्षित दूध ही ग्रहण ' करता है । अतः दुग्ध ही दीक्षित यजमान का व्रत है । यह दुग्धरूप अन्न ही दीक्षित यज-मान का यज्ञ है । इसलिए कहा है " एष हि अस्यान्न यज्ञो भवति " इति । यही इस यजमान के आत्माग्नि का हवि है । दीक्षा से पूर्व जैसे अग्निहोत्र यज्ञ होता है | आज इस समय दुग्धरूप अन्न ही अग्निहोत्र यज्ञ है, क्योंकि जैसे अग्निहोत्र यज्ञ में दुग्ध प्रतिनि में दी जाती है, उसी प्रकार आज यजमान की ग्रात्माग्नि में इस दुग्ध-रूप अन्न की प्राहुति दी जाती है । अतः यह ग्राहुति साक्षात् ग्रग्निहोत्र यज्ञ है । यजमान ने आज दीक्षा ग्रहण की है । वाक् संयमन द्वारा यजमान का नया यज्ञात्मा उत्पन्न हुआ है । नवजात शिशु को भूख लगती है । अतः इस समय भूख शान्त करने वाला दुग्ध देना [ २१५ ]
पृष्ठ 234
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण ही उसका वास्तविक यज्ञ है । इस प्रकार अन्न के द्वारा यजमान के अन्न को प्रतिष्ठित करता है । मन्त्र में " व्रतं कृणुत व्रतं कृणुत " का को तैयार करो । मन्त्र बोलकर वाग् यज्ञ से दुग्ध को तैयार करता है, पीने से यजमान का श्रात्मा प्रतिष्ठित हो जाता है । यही यज्ञ में करना है । दीक्षितव्रत ब्राह्मणं आत्मयज्ञ में दुग्धरूप तात्पर्य्य दुग्धरूप ग्रन्न और उस दूध को यज्ञ को प्रतिष्ठित यज्ञ में यज्ञ को प्रतिष्ठित करता हुआ यजमान दुग्धरूप यज्ञ से यजमानात्मा रूप यज्ञ का वितान करता है । भगवान् याज्ञवल्क्य का कथन है कि दीक्षा के अनन्तर सुत्या कर्म-पर्य्यन्त दुग्धपान ही करना चाहिए । " व्रतं कृणुत " इत्यादि मन्त्र का तीन बार उच्चारण करना चाहिए । क्योंकि यज्ञ विवृत् ही होता है । अर्थात् यज्ञ के उक्थ, अर्क, अशिति भेद से तीन अवयव होते हैं ॥ ७ ॥
यजमान ग्राहवनीय ग्रग्नि के अभिमुख होकर वाग् विसर्जन करता है । " व्रतं कृणुत " इत्यादि मन्त्र से उच्चारण के अतिरिक्त मन्त्र से वाग् विसर्जन करता हुआ यजमान न यज्ञ को श्राप्यायित करता है और न यज्ञ का संधान ही करता है । वाग् विसर्जन के समय “ व्रतं कृणुत ” इत्यादि मन्त्र का उच्चारण करता हुआ दीक्षित यजमान सत्यावाक् का ही उच्चारण करता है । “ व्रतं कृणुत ” इत्यादि मन्त्र के " व्रतं कृणुत, व्रतं कृणुत " इस अंश का अर्थ षष्ठ-कण्डिका में वतलाया जा चुका है । अब इस कण्डिका के मन्त्रशेष की व्याख्या की जा रही है । वह अग्नि ही ब्रह्म है । क्योंकि अव्यय, अक्षर, क्षरभेद से त्रिविध ब्रह्म में क्षरब्रह्म अग्नि ही है । जो कुछ भूतभाग दिखाई दे रहा है उस भूतभाग का कारण यज्ञक्षर रूप यह क्षरब्रह्म ही है, और यह अग्नि ही है इसलिए निरुक्तकार यास्क ने कहा है – “ यत्किञ्चिद्दाष्टि-विसंग कर्म अग्निरेव तत्कर्म इति । यह अग्निरूप अक्षरब्रह्म ही भूतरूप में परिणत होता हैं । इसलिए अग्निहोत्र ब्रह्म - अग्निहोत्रयज्ञ - यह कहा है । अर्थात् अग्निरूप अक्षरब्रह्म सृष्टि का मूल कारण है । और वही यज्ञरूप मूल ब्रह्म में परिणत होता है । सभी वनस्प-तियां यज्ञिय अर्थात् यज्ञार्थ हैं, यज्ञ साधन हैं । वनस्पतियों के बिना यज्ञ संभव नहीं है । इसलिए कहा है कि यदि वनस्पतियाँ ( काष्ठसमिधादि ) नहीं होते तो मनुष्य यज्ञ किससे करते || ५ || वाक् संयमनविसर्जनान्तर ऋत्विक् दुग्धरूप व्रत को पकाते हैं । गर्म करते हैं । जो यजमान दीक्षा ग्रहण कर लेता है वह देवताओं में से एक हो जाता है । अर्थात् उसकी गणना देवताओं में हो जाती है । देवताओं का अन्न शृत ( परिपक्व ) होता है । अर्थात् पकाकर उसकी हवि दी जाती है । परिपक्व हवि देवताओं के लिए नहीं होती । इसलिए दूध को गर्म करते हैं । क्योंकि प्राग्नेय सौरप्राण ही देवता हैं । उन्हें परिपक्व हवि ही प्रिय है । वस्तु में ठण्डापन जल से होता है, और जल अर्थात् प्राप्यप्राण असुर होता है । और [ २१६ ]
पृष्ठ 235
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०२ ) शेतपथं ब्राह्मणं दीक्षितव्रत ब्राह्मण असुर प्राण का देवताओं से विरोध है । दूध में भी जलीय भाग होता है । अतः वह दूध आसुर प्रारण से आक्रान्त है । उस को दूर करने के लिए दूध को गर्म करना आवश्यक है । इस परिपक्व दूध की ही देवताओं को आहवनीय अग्नि में आहुति दी जाती है । इस नियम के अनुसार ग्राहवनीय अग्नि में आहुति नहीं देनी चाहिए । अपितु दीक्षित यजमान की आत्माग्नि में आहुति देनी चाहिए । अर्थात् उस गर्म दूध को यजमान पीवे – इसी अभिप्राय से मूल में कहा है - " एष एव ( दीक्षितो यजमान एव ) व्रतयति नाग्नौ जुहोतीति ॥१० ॥
कितने ही वैदिक आख्यानों की आधिदैविक, आधिभौतिक व आध्यात्मिक - तीन धारायें होती हैं " यज्ञेन देवा इमां जिति जिग्यु: " इसके द्वारा प्रतिपादित आख्यान की भी तीन धाराएं हैं इनमें आख्यान के आधिदैविक व आधिभौतिक ( ऐतिहासिक ) पक्ष का निरूपण हो चुका है । अब ११ वीं कण्डिका से आध्यात्मिक पक्ष का प्रतिपादन किया जा रहा है । संसार के जड़ व चेतन सभी पदार्थ " जायमानो वै जायते सर्वाभ्यो ऐताभ्यो एव देवताभ्य: " इस श्रुति के अनुसार आधिदैविक अग्नि वायु आदि देवताओं से उत्पन्न होते हैं । हमारा शरीर भी अग्नि वायु आदि देवताओं से ही निर्मित है । जिस प्रकार अधिदैवत में, सूर्यरूपी अग्नि में पारमेष्ठ्य सोम की आहुति होती है उसी प्रकार हमारी आध्यात्मिक अग्नि में भी अन्नरूप सोम की आहुति होती है । अग्नि अत्ता है तथा अन्न आद्य है । आद्य की अत्ता में आहुति होने पर अत्ता ही शेष रहता है । अतः आध्यात्मिक अर्थात् शारीरिक अग्नि में, जो कि अग्नि प्रतिक्षण गर्मी के रूप में हमारे शरीर से निकला करती है वह आद्य अन्न हुति होती है । अग्नि में सोमाहुति ही यज्ञ है । यह यज्ञ प्रतिक्षण चलता रहता है । प्राणरूप अमृताग्नि प्रतिक्षरण शरीर से निकलता रहता है, और उसमें अन्नरूप सोम की आहुति होती रहती है । शरीर में गर्मी इसी प्राणाग्नि की ही है । इसी यज्ञ से शरीर व जीवन की स्थिति है । यदि प्राणरूप अमृताग्नि में अन्न की आहुति न दी जाय तो शरीर में गर्मी कम हो जायगी, और शरीर में शिथिलता आ जायगी । प्राणाग्नि में अन्न की आहुति हो जाने पर अन्न अत्तारूप ही बन जाता है । ग्रतः " अग्नि वै यज्ञः ” इस श्रुति के द्वारा अग्नि को ही यज्ञ कहा गया है । आध्यात्मिक वाक्, प्रारण, चक्षु, श्रोत्र, मन आदि देवताओं की स्थिति इसी पर निर्भर है । इसी विज्ञान को लक्ष्य करके कहा है कि " यज्ञेन वै देवा इमां जिति जिग्यु येषामियं जितिः ” इति । यज्ञ का सारभाग अन्नाहुति है । क्योंकि अन्नाहुति के बिना यह यज्ञ सम्पन्न नहीं हो सकता । अन्न की आहुति होने पर वह रसासृगादि पार्थिव धातुओं में परिणत होता हुआ अन्त में ऋक् रस में परिणत हो जाता है । जिसे स्फूर्ति व शक्ति कहा जाता है, और बाद में प्राण ही बन जाता है । किन्तु यह प्रारण चलने फिरने आदि क्रियाओं के द्वारा खर्च हो जाता है । क्योंकि प्रारण के द्वारा ही बाह्य तथा आभ्यन्तर व्यापार होते हैं । प्राण के खर्च होने पर शरीर से उसके विस्रस्त हो जाने पर उसकी पूर्ति के लिए पुनः अन्न की आहुति [ २१७ ]
पृष्ठ 236
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मणे दीक्षितव्रत ब्राह्मण देनी पड़ती है । इस प्रकार अन्नाहुति, अर्क व प्रारण इनका क्रम चलता रहता है । यही आध्यात्मिक यज्ञ है । इसीलिए ग्रलोक प्राणानामन्योन्य परिग्रहो यज्ञः - यह ऐतरेय श्रुति अन्न, ऊर्को, मन, प्राण के परस्पर परिग्रह को यज्ञ बतला रही है । अधिदैवत में सारे देवता सूर्य्य में रहते हैं इसलिए सूर्य्य के उदित होने पर " चित्रं देवानामुदगादनीकम् " इत्यादि ऋक् श्रुति यह देव समूहरूप सूर्य उदित हुआ यह बतला रही है । प्राधिदैवत की तरह अध्यात्म में भी वाक्, प्रारण आदि इन्द्रियों की स्थिति शिरोभाग में ही है । शिरोगुहा में ही इनकी स्थिति है । जिस प्रकार अधिदैवत में सूर्य्यरूपी अग्नि में पारमेष्ठ्य सोमरूप अन्न की आहुति होती है । इस आहुति से ही प्राध्या-त्मिक यज्ञ निष्पन्न होता है तथा प्राध्यात्मिक देवताओं की स्थितिरूप विजय होती है । किन्तु इस यज्ञ के जानकार वैज्ञानिक मनुष्यों को छोड़कर साधारण मनुष्य इस आध्यात्मिक यज्ञ प्रक्रिया को नहीं जानते कि किस प्रकार यह अन्न, उ रस में तथा ऊ रस प्राणरूप में परिणत हो जाता है । इसीलिए इस आध्यात्मिक यज्ञ को साधारण मनुष्यों के द्वारा अभ्यारो ( अज्ञेय ) बतलाया है । आध्यात्मिक यज्ञ का सारभाग अन्नाहुति है । उसी से आध्यात्मिक यज्ञ द्वारा प्राण की निष्पत्ति होती है । आध्यात्म में मुख ही यूप है क्योंकि जैसे प्राधिदैवत में सूर्य्य में सोम हुति होती है और सूर्य्य ही यूप है । इसी प्रकार अध्यात्म में भी मुख में ही अन्न की आहुति होती है अतः मुख ही यूप है । जिस प्रकार मधुमक्खियां मधु के सार भाग को पी लेती है उसी प्रकार आध्यात्मिक देवताओं ने आध्यात्मिक यज्ञ के सारभूत अन्न को ग्रहरण कर मुखरूप यूप के द्वारा यज्ञ को छुपा दिया तथा तिरोहित हो गये जिससे साधारण वैज्ञानिक मनुष्यों को उसका ज्ञान न हो । क्योंकि यूप के द्वारा उनने यज्ञ को विलुप्त किया था । अतः “ यदनेन यज्ञमयोपयन् अत्योपयन् देवा: " इस व्युत्पत्ति से इसे यूप कहा गया है ॥११ ॥
किन्तु अन्न किस प्रकार प्रारण बन जाता है यह रहस्य तपःपूत अन्तःकरण वाले आविर्भूत प्रकाश वैज्ञानिक महर्षियों को प्रकृति यज्ञ के आधार पर मालूम था । उन्होंने इस आध्यात्मिक यज्ञ का संभरण किया, जिस प्रकार वह अध्यात्म में संभृत हो रहा है । उन्होंने दुग्ध रूप अन्न की आहुति देकर अर्थात् यजमान को दूध पिलाकर उसकी यज्ञात्मा को प्राध्या-यित किया । इससे यज्ञात्मा के वित्रस्त भाग की पूर्ति हो गई । यहां यह दीक्षाग्रहण करने वाला यजमान ही यज्ञ है क्योंकि इस की आत्मा में ही दुग्धरूप अन्न की आहुति होती है, और अग्नि में सोमाहुति ही यज्ञ है । यह यजमान ही इस ग्रात्म यज्ञ का वितान करता है, एवं स्वात्माग्नि दुग्धरूप अन्न प्राहुति दिव्यात्मा को उत्पन्न करता है । दुग्धरूप अन्न की आहुति देकर वह आत्मा के विस्रस्त बाहर निकल कर गए हुए आग को प्राप्ययित कर लेता है । [ २१८ ]
पृष्ठ 237
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( श्र ० २ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मणे इस दुग्ध रूप अन्न की आहुति बाहर की ग्राहवनीयाग्नि में देकर स्वात्मा में प्रति देना है | यदि बाहर की आहवनीयाग्नि में आहुति देगा तो अपने वित्रस्त भाग की प्राप्या-यन ( पूर्ति वृद्धि ) नहीं कर सकेगा । इसी अभिप्राय से मूल में कहा है । " एष एव व्रतयति नाग्नौ जुहोति न हाप्याययेद् यदग्नौ जुहुयात् - इति । यजमान स्वयं दुग्धपान करता हुआ, यह मान ले कि यह आहुति ग्राहवनीयाग्नि में दी जा रही है । अन्यथा अपने लिए दूध पीने पर उसमें मानुषभाव आ जायगा अतः वह दुग्धरूप आहुति यज्ञात्मा के लिए दी जा रही है, ऐसी भावना करे ॥ १२ ॥
यहाँ प्रश्न यह उपस्थित होता है कि बाहर ग्राहवनीयाग्नि में दी हुई ग्राहुति तो देवताओं में पहुंच जाती है, क्योंकि यज्ञ देवता स्वरूप है और वे देवता बाहर प्रकृति में है किन्तु यजमानात्मा रूप यज्ञ में दी हुई ग्राहुति देवताओं में कैसे पहुंचेगी । इसी का समाधान करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कह रहे है कि शरीर में भी अग्नि, वायु आदि सभी देवता है । श्रध्यात्म में जो वाक्, प्रारण, चक्षु यादि इन्द्रियां है वे ही देवता हैं क्योंकि अग्नि आदि बाह्य प्राकृतिक देवता ही ग्रध्यात्म में प्रविष्ट होकर वागादि इन्द्रियों का रूप धारण करती है जैसा कि " अग्निर्वाग् भूत्वा मुखं प्राविशत् वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत्, आदित्यश्चक्षुर्भूत्वा प्रक्षिणी प्राविशत् दिशः श्रोत्रे भूत्वा करण प्राविशत्, चन्द्रमा मनो-भूत्वा हृदयं प्राविशत् । यह ऐतरेय श्रुति बतला रही है । इसलिए कहा - इमे वै प्रारणाः ” अर्थात् सभी इन्द्रियों के लय के समय प्राण में प्रवेश करने से प्रारणपदवाच्य वागादि इन्द्रियों देवता ही हैं । हमारे शरीर में जो वाक्, प्राण, चक्षु यादि इन्द्रिय देवता हैं वे श्वोवसीयस मन,, सर्वेन्द्रियमन व इन्द्रियमन भेद से त्रिविध मन में से सर्वेन्द्रिय मन से ही उत्पन्न होती हैं । वे सब इन्द्रियां सर्वेन्द्रिय मन से बद्ध हैं । वे सर्वेन्द्रिय मन की प्रेरणा के बिना कुछ भी काम नहीं कर सकती । इसीलिए " केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रति युक्तः । केनेषितां वाचमिमां वदन्ति, चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति । यह केनोपनिषत् श्रुति ' क ' शब्दवाच्य श्रनिरुक्त सर्वेन्द्रिय मन ही इन्द्रियों को स्वस्वविषय में प्रवृत्त करने वाला है - यह बतला रही है । इसी अभिप्राय से भूल में कहा है - इमे वै प्रारणा मनोजाता मनो-युजः इति । वाक् प्राण चक्षुः श्रोत्रमनांषि ( इन्द्रियाणि ) में जो सुख दुःख – का ज्ञानरूप विषय नियत है और वागादि तथा इन्द्रिय मन का भी प्रेरक जो मन है, वह सर्वेन्द्रिय या अनिन्द्रिय मन है । उसका कोई नियत विषय नहीं है । जिस इन्द्रिय से वह सम्बद्ध होता है उसी विषय का वह ज्ञान करा देता है । अतः अनियत - विषयक होने से ही उसे सर्वेन्द्रिय या अनिन्द्रिय मन कहा जाता है । इसी को प्रज्ञानात्मा भी कहा जाता है जैसा कि निम्नलिखित ऐतरेयोपनिषच्छ्रुति में बतलाया गया [ २१६ ]
पृष्ठ 238
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मणं है । " " कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे कतमः स आत्मा येन वा पश्यति, येन वा शृणोति, येन वा गन्धाना जिघ्रति, येन वा वाचं व्याकरोति येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति । यदेतत् हृदयं मनश्चैतत् । सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति यत्किं प्राणि जंगमं पतत्रि च यच्च स्थावरं सर्वं तत् प्रज्ञानेत्रं प्रज्ञाने प्रतिष्ठितम्, प्रज्ञानेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्म ( ऐ ० उ ० इ ० अ ० -५ खण्ड ) क्योंकि ये चक्षुरादि प्रारण मनोजव ( मनः प्रेरित ) हैं अतएवं दक्षऋतुस्वरूप हैं । मैं इस काम को करूं - इत्याकारक अध्यवसाय - मानस विकल्प ऋतु कहलाता है तथा तदन्तर होने वाला प्रारणव्यापार, इन्द्रियव्यापार व शरीर चेष्टा हो जाती है । इसे दीक्षा कहा जाता है । प्राण शब्द वाच्य वागादि इन्द्रियां देवतारूप हैं इसका प्रतिपादन करते हुए कहते हैं । वागेन्द्रिय अग्नि देवता है । नासिका में जो श्वास प्रश्वास आते हैं वे वायु देवता हैं इन्हें ही यहां प्रारणोदान शब्द से तथा मित्रावरुण शब्द से कहा है । भीतर जाने वाला श्वास प्राण व मित्र कहलाता है तथा शरीर से बाहर जाने वाला प्रश्वास वायु ही उदान व वरुण कहलाता है । मित्रा जो हमारे शरीर में आनेवाला, हमसे स्नेह करने वाला है वह प्रत्येक पदार्थं प्राण व मित्र कहलाता है किन्तु हमारे शरीर का परित्याग कर हमसे अलग होने हैं उसे उदान व वरुण कहते हैं । अतः आने वाला श्वास प्राण तथा बाहर जाने वाला प्रश्वास उदान कहलाता है । प्राण व उदान ही क्रमशः मित्र व वरुण कहलाते हैं । इसी अभिप्राय से मूल में कहा है - " प्राणोदानौ मित्रावरुणौ " इति । आधिदैविक आदित्य देवता ही हमारे शरीर में आकर चक्षु बनता है । आधिदैविक विश्वेदेव देवता ही हमारे शरीर में आकर श्रोत्र बनता है । अतः यजमानात्मा में प्रदत्त
दु की आहुति शरीर में विद्यमान अग्नि, वायु आदि देवताओं में ही आहुति होती है ।
उन्हीं को प्राप्त होती है ॥१३ ॥
कतिपय आचार्यों का कथन हैकि प्रथम दिन दुग्धरूप अन्न में चावल व यव का रस भी डालना चाहिए । इससे उनका रस भी व्रत के अन्तर्गत प्रा जाता है तथा उन दोनों के रस से यज्ञ का जो सारभाग देवतात्रों ने पी लिया है और वह यज्ञ गलसार हो गया है, उसका पुनः आप्यायन ( परिपोष ) हो जाता है । क्योंकि दीक्षित यजमान दुग्धान्न का व्रत ले लेने पर जो व्रतदुधा गाय है उसी के दूध को पी सकता है । अन्य गायों के दूध को नहीं । किसी कारणवश वह व्रतदुधा गाय दूध न दे तो फिर यजमान को भूखा रहना पड़ेगा । [ २२० ]
पृष्ठ 239
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मणे दीक्षितव्रतं ब्राह्मण और प्रथम दिन दूध में चावल तथा यव के रस का मिश्रण कर लिया जाता है तो उसका रस भी व्रत के अन्तर्गत श्रा जाता है । और व्रतदुधा गाय का दूध न मिलने पर उन चावल और यव का यजमान भक्षण कर सकता है किन्तु याज्ञवल्क्य इस मत का निराकरण करते हुए कहते हैं कि ऐसा नही करना चाहिए, क्योंकि प्रीहि व यव को खाने से न यज्ञ का प्राप्यायन होता है । और न उसका सन्धान ही होता है । दूध सात्विक अन्न हैं । अतः सात्विकता के लिए यज्ञिय दीक्षित यजमान को दूध का ही सेवन करना चाहिए । ब्रोहि और यव अन्न हैं । अन्न में मादकता होती है । उनके सेवन से आलस्य उत्पन्न होगा । यदि व्रीहि और यव के रस का दूध में मिश्रण ही करना चाहते हो तो दोनों में से एक के रस को ही डालें । उचित तो यह है कि एक के रस को भी दूध में न डाले । बिना डाले वे व्रीहि और यव व्रत के अन्दर कैसे आयेंगे, और व्रत के अन्तर्गत न आने से बाद में व्रतदुधा गाय के दूध देने पर यजमान को भूखा रहना पड़ेगा । यह शंका निर्मूल है क्योंकि दर्शपूर्णमासेष्टि करने वाला ही सोमभाग कर सकता है, और दर्शपूर्णमासेप्टि में व्रीहि और यव की प्राहुति गई है । इसी से व्रीहि और यव दोनों अन्वारब्ध अर्थात् व्रत के अन्तर्गत आ चुके हैं । अतः यहाँ दूध में यव और व्रीहि के रस को डालने की कोई आवश्यकता नहीं है । व्रतदुधा गाय का दूध न मिलने पर दर्शपूर्णमासेष्टि में प्रदत्त हवि के द्वारा अन्वारब्ध व्रीहि और यव में से किसी भी अन्न का सेवन किया जा सकता है, और यजमान की यज्ञात्मा में आहुति देकर उसका प्राप्यायन किया जा सकता है ॥१४ ॥
कतिपय आचार्यं प्रथम व्रत में अर्थात् पहले दिन के दूध में सर्वोषधि तथा सर्वसुरभि ( पिप्पल्यादि अष्टगन्ध ) डालते हैं । उनका अभिप्राय यह हैं कि दीक्षित प्रथम दिन के दूध में सर्वोषधि तथा पिप्पल्यादि अष्टगन्ध द्रव्य डाल लेता है तो वे भी व्रत के अन्दर समाविष्ट हो जाती है, और यजमान के रुग्ण हो जाने पर उनके द्वारा उसकी चिकित्सा करली जाती है । क्योंकि प्रथम दिन में व्रतरूप से जो वस्तु ली जाती है उसी को यजमान आगे यज्ञ समाप्ति तक अन्नरूप से ले सकता है । अन्य वस्तुओं का । अतः सर्वौषध तथा सर्वसुरभि को प्रथम दिन के दूध में डालनी चाहिए । किन्तु याज्ञवल्क्य इसका निराकरण करते हुए कहते हैं कि, सवधि तथा सर्वसुरभि को डालना दिव्यकर्म रूप यज्ञ में प्रवेश करना है । क्योंकि यज्ञ कर्म पद्धति में इनका डालना विहित नहीं है । विहित से अतिरिक्त वस्तु का समावेश करना मनुष्यता है, दिव्यकर्म व मनुष्यकर्म को सम्मिलित करना यज्ञ को ऋद्धिरहित बनाना है । अतः ऐसा नहीं करना चाहिए । यदि यजमान बीमार हो जाय तो किसी भी औषधि से उसकी चिकित्सा की जा सकती है । उस औषधि को प्रथम व्रत में सम्मिलित करना आवश्यक नहीं । क्योंकि यज्ञ को निर्विघ्न समाप्त करना अभीष्ट है । अतः उस औषधि के प्रथम दिन के अन्त में सम्मिलित किये बिना भी उस औषधि को दिया जा सकता है ॥१५ ॥
[ २२१ ]
पृष्ठ 240
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण इसके बाद होता एक पात्र में दूध लेकर मानुषकाल का प्रतिक्रमण कर, अर्थात् जिस समय मनुष्य दूध पीते हैं उस समय को टालकर यजमान को आत्मयज्ञाहुति के लिए, पीने के लिए देता है । मानुषकाल के अतिक्रमण का तात्पर्य यही है कि सायंकाल गर्म किया हुआ दूध अपररात्र अर्थात् आधीरात में यजमान पीये और प्रातःकाल गर्म किया हुआ दूध अप-राह्न में अर्थात् दो बजे के आस पास पीये । मानुषकाल का प्रतिक्रमण करके यजमान को दूध देता हुआ होता देवभाग और मनुष्य भाग का विभाग करता हैं । अर्थात् देवभाग से मानुषभाव को पृथक् करता है ॥ १६ ॥
इसके अनन्तर होता यजमान को दूध देता हुआ, यजमान से निम्नलिखित मन्त्र बुलवाता हुआ, यजमान के हाथ धुलवाता है । मन्त्र— देवीं धियं मनामहे समृद्धीकामामिष्टये वर्चोपन्नं यज्ञवाहसं सुतीर्था नो असशे - इति । यजमान कहता है कि हम दैवी बुद्धि की कामना करते हैं जो दैवी बुद्धि जगत् का कल्याण करने वाली है तथा जो वर्चस् ( ब्रह्मतेज ) को धारण करने वाली है । इस श्रेष्ठ बुद्धि के कारण अच्छे - अच्छे तीर्थ अर्थात् यज्ञ मेरे वशीभूत हो जावें । मन्त्रोच्चारणपूर्वक हाथ धुलाने का कारण बतलाते हैं कि यजमान यज्ञ से दीक्षाग्रहण के पूर्व मानुष कार्य के लिए हाथ धोता था । अतः दीक्षा ग्रहणानन्तर दिव्य बुद्धि की प्राप्ति के लिए हाथ धोता है । इसी अभिप्राय से आज " दैवीं धियं मनामहे " इत्यादि मन्त्रोच्चारण पूर्वक हाथ धोता है । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि जब भी दूध के लिए हाथ धोए तब पहले इस मन्त्र का उच्चारण करके ही हाथ धोए ॥१७ ॥
तत्पश्चात् “ ये देवा मनोजाता मनोयुजो दक्षा क्रतवस्ते नोऽवन्तु ते नः पान्तु तेभ्यः स्वाहा । इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ यजमान दूध पीता है । जैसे इन्दु के लिए वौषट् शब्दोच्चारण के साथ आहुति दी जाती है अर्थात् स्वाहा शब्द वषट्कार के साथ आहुति देने के समान है ॥ १८ ॥
पश्चात् दूध पीकर यजमान निम्न मन्त्र का उच्चारण करते हुए अपनी नाभि का स्पर्श करता है: -" श्वात्राः पीता भवत यूयमापो अस्माकमन्तरुदरे सुशेवाः ना अस्मभ्यमयक्ष्मा अन-मीवा अनागसः स्वदन्तु देवीरमृता ऋता वृधत्रा इति । अर्थात् हे अप देवताओं, आप पीने पर हमारे पोषक बनें | आप हमारे दर के अन्दर अर्थात् केन्द्र में जाकर सुखप्रद बनें । वे जल यक्ष्मारहित अमीवारहित एवं अनागस होकर [ २२२ ]