Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 241–250

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 241–250

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शंतपंथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण अतएव अमृतस्वरूप होकर हमारी तृप्ति करें तथा हमारे ऋतभाग को बढ़ावें । जो दीक्षा ग्रहण करता है वह देवताओं में सम्मिलित हो जाता है । देवताओं में से एक हो जाता है । प्रर्थात् देवताओं में एक देवता बन जाता है । देवताओं के हव्य पदार्थ को ऊपर से खींचने के समान ऊपर से नहीं ग्रहण किया जाता अपितु हाथ से थोड़े थोड़े पुरोडाश की प्राहुति दी जाती है । किन्तु दीक्षित यजमान दुग्धान्न ही ग्रहण करता है तो उसे तो ऊपर से सेचन के समान पीया जाता है अतः यजमान देवता बन जाने पर भी उत्सिक्त दुग्धान्न को ग्रहरण करता हुआ अनुत्सिक्त हवि का ग्रहरण देवता को करना चाहिए । इस नियम का उल्लंघन है, उसे नष्ट करता है । उस नियम के उल्लंघन रूप व्रत के प्रायश्चित के लिए " श्वात्राः पीता: " इत्यादि मन्त्र का उच्चारण किया जाता है । उपर्युक्त मन्त्र में प्रापोदेवियों को यक्ष्मा तथा ग्रमीवा रोग का नाशक बतलाया है । शरीर में दो प्रकार के रोग होते हैं । एक मन्दाग्नि के कारण तथा दूसरे रक्त आदि में कीटाणुओं के कारण । उनमें मन्दाग्नि जन्य यक्ष्मा कहलाते हैं तथा रक्तादि में कीटाणु प्रवेश से कीटाणुजन्य रोग अमीवा कहलाते हैं । व्रतरूप से पीया हुआ, दूध शरीर की अग्नि को बढ़ाकर मन्दाग्निजन्य रोगों को भी नष्ट कर देता है तथा शरीर में अग्निवृद्धि से शारी-रिक बल की वृद्धि होने पर कीटाणुओं के अभिभूत हो जाने से कीटाणुजन्य रोगों को भी नष्ट कर देता है । वस्तुतः यक्ष्मा व अमीबा दोनों प्रकार के रोग अग्निमान्ध के कारण होते हैं । यजमान जब दुग्धान्न की आहुति अपनी आत्माग्नि में दे देता है तो एक प्रकार से उसकी आत्माग्नि में सोमरूप दुग्ध की आहुति हो जाती है । क्योंकि दूध सोम्य है । सोमाहुति से अग्नि प्रज्वलित हो जाती है और इस प्रकार से उभय प्रकार के रोगों का नाश हो जाता है । यजमान को परिमित मात्रा में ही दूध पीना चाहिए । जिससे शरीर में अशक्ति पैदा न हो । और यज्ञकर्म को सुचारु रूप से कर सके और अधिक पीने से आलस्य आदि भी शरीर में उत्पन्न न हो । वह जब भी दूध पीवे- इस मन्त्र का उच्चारण करके ही पीवे । जिससे उत्सेक जन्य दोष का प्रायश्चित्त हो सके ॥१६ ॥

दीक्षित यजमान मानुष भाव से हटकर देवभाव में चला जाता है । अतः उस पर मनुष्य की अपेक्षा कुछ विशेष नियम या प्रतिबन्ध लग जाते हैं उनमें से कुछ व्रतों ( नियमों ) का ऊपर उल्लेख हो चुका है । कुछ और बतलाये जा रहे हैं । उन्ही नियमों में एक मूत्रो-त्सर्ग नियम भी है । वह साधारण मनुष्यों की तरह मूत्रोत्सर्ग नहीं कर सकता । दीक्षित यदि मूत्रोत्सर्ग करना चाहे तो पृथ्वी के जिस प्रदेश पर वह मूत्रोत्सर्ग करे, मृग के काले सींग के द्वारा उस प्रदेश से मिट्टी के ढ़ेले को, यदि ढ़ेला न हो तो उस प्रदेश के खास कंकड व मिट्टी आदि को दूर कर दे । तब मूत्रोत्सर्ग करे, क्योंकि पृथ्वी " इयं ते यज्ञियातनूः - इति इस मन्त्र के द्वारा [ २२३ ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण पृथ्वी देवयजनी अर्थात् यज्ञिया भूमि है । दीक्षित उस पर लघुशंका न करे । अतः पृथ्वी के यज्ञिय भाग को हटाकर उसके नीचे पृथ्वी का जो प्रयज्ञिय शरीर ( प्रदेश ) है उस पर लघु-शंका करे । मूत्रोत्सर्ग करने से पूर्व यजमान निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करे । “ अपो मुञ्चामि न प्रजाम् " इति अर्थात् मूत्रद्वार से जल मात्र का ही उत्सर्ग करता है प्रजोत्पादक वीर्य का नहीं । मूत्रद्वार जल और वीर्य दोनों का निर्गम स्थान है । उनमें से जल भाग का ही उत्सर्ग करता वीर्य का नहीं । फिर मन्त्र बोलता है - " होमुचः स्वाहाकृताः " इति । अर्थात् देहान्तर्गत पाप के साथ ही जल का उत्सर्ग करता हैं अर्थात् यह मूल पापरूप है । मूत्र का उत्सर्ग करना पाप का परित्याग करना है । पुनः मन्त्र का उच्चारण करता है " स्वाहाकृतः पृथिवीमाविशत् ” इति अर्थात् हे जल, आप स्वाहाकृत होकर पृथिवी में प्रविष्ट हो जाओ अर्थात् तुम आहुति बनकर शान्त होकर पृथिवी में बैठ जाओ ॥ २० ॥

मूत्रोत्सर्ग करने के बाद लोष्ट को " पृथिव्या संभव: " इस मन्त्र का उच्चारण करे । अर्थात् हे लोष्ट, आप पृथ्वी से पुनः संगत हो जाओ । मूत्रोत्सर्ग करने के पूर्व पृथिवी के लिए यज्ञिय भाव को मूत्रसम्पर्क से बचाने के लिए हटा लिया था पुनः उस प्रदेश पर डाल देता है । क्योंकि पृथिवी यज्ञिय भूमि है । उस पर यज्ञिय को पेशाब नहीं करनी चाहिए । उस यज्ञ भूमि से जिस लोष्ट को हटा लिया था उस पर लोष्ट को स्थापित कर उस भूमि को यज्ञिय बना देता है ॥२१ ॥

तदन्तर यजमान अपने ग्रापको अग्नि को समर्पित कर अर्थात् अग्नि की रक्षा में छोड़कर सो जाता है । जो दीक्षित हो जाता है वह देवताओं की ओर चला जाता है । देव-तानों में एक देवता बन जाता है देवता कभी सोते नहीं किन्तु यजमान को तो सोना ही पड़ता है । अर्थात् वह यजमान चाहे देवताओं की श्रेणी में आ जाय किन्तु जब तक पार्थिव प्राणरूप प्रज्ञानात्मा की पकड़ में है तब तक उसे सोना ही पड़ता है । अग्नि देवताओं का व्रत पति है । अर्थात् देवता अग्नि के द्वारा ही व्रत ( अन्न ) को प्राप्त करते हैं । देवताओं के नियम के अग्नि ही अधिपति हैं । अतः यजमान अपने आप को अग्नि की रक्षा में सौंप -कर सो जाता है । शयन से पूर्व यजमान " अग्ने त्वं सुजागृहि वयं शुभन्दिषी महि " अर्थात् हे अग्ने, आप अच्छी प्रकार अर्थात् सावधानी से जागते रहें, मैं आनन्दपूर्वक सोऊं - इस मन्त्र शेष को बोलता है । पश्चात् " रक्षाणो अप्रयुञ्जत् " अर्थात् सावधान होकर हमारी रक्षा करें — इस मंत्र शेष का उच्चारण करता है । पश्चात् " प्रबुधे नः पुनस्कृधि ” यह मन्त्र शेष बोलता है । ग्रर्थात् प्रातः हम शिरः पीड़ा रहित होकर जगे ॥ २२ ॥

जब दीक्षित यजमान शयन के बाद जागकर पुन: नहीं सोवे, तब श्रध्वर्युं यजमान से निम्नलिखित मन्त्र बुलवाता है । '.--[ २२४ ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) इति ॥ १४ ॥

रास्वे यत्सोमा भूयो भर- इति दीक्षितव्रत ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण [ २२५ ] " पुनर्मनः पुनरायुर्मेऽश्रागत् पुनः प्राणः पुनरात्मा म ग्रागत् पुनश्चक्षुः पुनः श्रोत्रं म-ऽश्रागत् — इति अर्थात् शयन के समय यजमान के मन, आयु, प्राण, आत्मा, चक्षु, श्रोत्र, सभी पुरीतत् नाड़ी में चले जाते हैं । स्वस्वस्थान में उनकी स्थिति नहीं रहती । केवल मुख्य प्रारण जागृत रहता है । पायनावस्था में उपक्रांत मन आदि की पुनः प्राप्ति के लिए वह प्रार्थना करता है । इस प्रार्थना से वह उन मन आदि से पुनः संगत हो जाता है । तदन्तर " वैश्वानरो अदब्धस्तनूपा अग्निर्नः पातु दुरितादवाद्यत् " इस मंत्र का उच्चारण करता है । ग्रर्थात् हमारे शरीर का वैश्वानर अग्नि किसी से अभिभूत न हो सर्वथा अहिंसित रहे । यह शरीररक्षक वैश्वानर अग्नि शयन के बाद जो कोई क्रिया कर्म अर्थात् यज्ञ विरुद्ध कर्म हो गया हो, उससे हमारी रक्षा करे ॥ २३ ॥

जो यजमान दीक्षित हो चुका है वह यदि असम्बद्ध - अनर्गल भाषण करता है, या क्रोध करता है तो वह अपने नियम का भंग करता है । यज्ञ कर्म को मिथ्या निःसार बना देता है । यज्ञिय वाक् के अतिरिक्त भाषण न करना तथा क्रोध न करना दीक्षित का नियम है । क्योंकि आत्मा देवभाव से युक्त होता है, और क्रोध करना असुर भाव है । यजमान देवता है अतः उसे क्रोध जैसा आसुर भाव ग्रहण नहीं करना चाहिए । अग्नि देवताओं के व्रतपति अर्थात् उनके व्रत की रक्षा करने वाले हैं अतः व्रतविरुद्ध आचरण कर. यजमान व्रतपति अग्नि से क्षमायाचनार्थ अग्नि की ओर दौड़ता है, जाता है । वह अग्नि से प्रार्थना करता हुआ निम्नलिखित प्रार्थना मन्त्र पढ़ता है । " त्वमग्ने व्रतपा असि देव आ मर्त्येष्वा । त्वं यज्ञेष्वीद्यः इति । अर्थात् हे अग्निदेव, आपव्रत की रक्षा करते वाले हैं । आप मरणधर्मा, सकल पदार्थों में तथा यज्ञों में स्तुत्य हैं । यज्ञ शब्द से यहां दैवत पूजा का अभिप्राय है अर्थात् भौतिक तथा दैवत दोनों प्रजाओं की सत्ता अग्नि पर ही आधारित है । इस मंत्र से अग्नि की प्रार्थना करने पर व्रतभंगदोष का प्रायश्चित हो जाता है । इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्यजी ने कहा है-" तस्यो हैषा प्रायश्चित्तिस्तथो हास्यैतन्न मिथ्याकृतं भवति न व्रतं प्रमीणाति --अनन्तर दीक्षित पुरुष को यदि कोई धन भेंट रूप में देता है तो उस समय अध्वर्यु दीक्षित यजमान से निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करता है । हे सोम इतना तो ग्राने दो और इससे अधिक भी आने दो अर्थात् इससे अधिक सम्पत्ति भी प्रदान करें । दीक्षित यजमान के लिए भेंट करने की प्रेरणा मनुष्यों में सोम ही

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण करता हैं । क्योंकि यदि यजमान सोमयाग न करता तो कोई भेंट रूप में धन नहीं देता । पुनः यजमान " देवो नः सविता वसोर्दाता वस्वदात् ” । _इस मंत्र शेष का उच्चारण करता है, अर्थात् सविता देवता सारे कार्यों की प्रेरणा देने वाला है, अतः वही यजमान के लिए धन देने की प्रेरणा करने वाला है । यह जो भेंट रूप में घन प्राप्त हुआ है वह सविता की आज्ञा से लिया हुआ है । सविता ने ही धन दिया है || २५ ॥ इसके बाद सूर्यास्त होने से पूर्व अध्वर्यु दीक्षित से कहता है कि हे दीक्षित, अब वाक् संयमन करलो, मौन धारण करलो । अतः वह मौन धारण कर लेता है, और सूर्यास्त होने के बाद यजमान वाग्विसर्जन कर देता है । अर्थात् मौन तोड़ देता है । इसी प्रकार सूर्योदय से कुछ समय पूर्व अध्वर्यु यजमान को वाक् संयमन करने के लिए प्रेरित करता है । तथा सूर्यास्त होने के बाद वह वाक् का विसर्जन कर देता है, मौन तोड़ देता है । इस प्रकार सायंकाल सूर्य्यास्त से पूर्व तथा प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व वाक् संयमन करना दिन को रात्रि के साथ तथा रात्रि को दिन के साथ जोड़ना है । क्योंकि अहोरात्र ही संवत्सर है । और संवत्सर ही यज्ञ कहलाता है । अतः संवत्सर रूप यज्ञ के दिन और रात्रिरूप पर्वों को सम्बद्ध करता है । सम्बन्धसूत्र वाक्संयमन है । अतः इस वाक् संयम द्वारा संवत्सर के दिन और रात्रिरूप दोनों पर्वो का संधान कर देता है । वाक् यज्ञ है । इस वाग्रूप के द्वारा संवत्सर यज्ञ के दोनों पर्वो का संधान होता है । यदि सूर्यास्त से पूर्व और सूर्योदय से पूर्व वाक् का संयमन न कर वाक् को खर्च किया जायगा तो सम्बन्ध सूत्र के खर्च होने से संव-त्सर के अहोरात्र पर्वों का संघान नहीं हो सकेगा । इसीलिए कहा है: -“ संतत्या एव अहरेवैतद् रात्र्या सन्तनोति अह्ना रात्रिम् - इति ॥ २६ ॥

दीक्षित के रहने के लिए देवयजन भूमि में " दीक्षित निमित ” नामक स्थान नियत रहता है । यजमान को सांय सूर्यास्त के समय उस स्थान में रहना चाहिए । यदि उस स्थान से बाहर घूमते हुए यजमान को सूर्यास्त हो जाय तो वह अस्त होता हुआ सूर्य यजमान को रात्रिप्राण से वियुक्त कर देगा । इसी तरह ऐसा न हो जाय कि सूर्योदय हो जाय और यजमान सोता रहे क्योंकि ऐसा होने पर प्रातः काल के मुख्य सौर प्रारण का यजमान से वियोग हो जायगा । आगे याज्ञवल्क्य कहते हैं कि व्रतभंग, क्रोध आदि दोषों की प्रायश्चित्ति तो है जिसके करने पर उन दोषों की निवृत्ति हो जाती है, परन्तु सूर्यास्त में समय अपने निवासस्थान से बाहर रहना तथा सूर्योदय के समय सोते रहना- इन दोनों दोषों का कोई प्रायश्चित भी नहीं है । अतः इन दोषों से तो बचना ही चाहिए । यज्ञ समाप्ति किये जाने वाले अवभृथ ( यज्ञान्त ) स्नान से पूर्व यजमान जल में प्रवेश कर डुबकी लगाकर स्नान करे और वर्षा का पानी अपने ऊपर न गिरने दे अर्थात् वर्षा के पानी में न भीगे क्योंकि यज्ञान्त स्नान दीक्षितता के विमोचन के लिए होता है यदि इससे पूर्वं यजमान जलावसेचन करेगा तो दीक्षा का विघात हो जायगा । [ २२६ ]

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तृतीय काण्ड ( ० २ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण दीक्षित यजमान परिमित व संस्कृत देवी वाक् का ही उच्चारण करे । जन साधारण में व्याप्त मानुषी वाणी का प्रयोग न करे ॥ २७ ॥

यज्ञ के द्वारा देवताओं ने असुरों पर वह विजय प्राप्त की, जो कि विजय उनकी देखी व सुनी जा रही है । उन देवताओं ने विचार किया कि यह यज्ञ प्रक्रिया मनुष्यों को न प्राप्त हो जाय अतः जैसे भ्रमर या मधुमक्खी पुष्पों के रस को चूस कर निःसार बना देते हैं उसी प्रकार देवता यज्ञ के रस को पान कर उसको निःसार बना कर यूप के द्वारा उसे विलुप्त कर तिरोहित हो गये । यूप के द्वारा उस यज्ञ को विलुप्त किया इसीलिए " अनेन यूवेन यज्ञमयो-पयन् " इस व्युत्पत्ति से यज्ञ स्तम्भ को यूप कहा जाता है ॥२८ ॥

देवताओं ने जिस प्रकार यज्ञ का संभरण किया है इस बात को ऋषियों ने सुन रक्खा था । उन्हें यज्ञ का संभरण प्रकार ज्ञात था । जो दीक्षित हो जाता है, वह यज्ञ का संभरण करता है, जैसा कि इसी ब्राह्मण की द्वितीय कण्डिका में बतलाया जा चुका है । वाक् ही यज्ञ है । वह दीक्षित यजमान वाक् के द्वारा यज्ञ के निष्पीत व गतसार भाग का पुनः आप्यायन कर लेता है । उसे पुनः प्राप्त कर लेता है जो कि परिमित व संस्कृत अर्थात् दिव्यवाक् का उच्चारण करता है तथा जनसाधारण में व्याप्त मानुषी वाक् को नहीं बोलता है जो मानुषी वाक् को बोलता है - यज्ञ का श्राप्यायन नहीं कर सकता । अतः परिवृढ़ वाक् का ही उच्चारण करे न कि मानुषी वाक् का, वह यजमान प्रेक्षापूर्वक सोच समझ कर कार्य करता . है जो कि दीक्षित होता है आज यज्ञ के लिए दीक्षित यजमान प्रत्येक कार्य विचारपूर्वक करता है । प्रेक्षापूर्वक कार्य करना ही अधीक्षा है । अधि उपसर्ग पूर्वक ईक्ष् धातु से अधीक्षते या अधीक्षा शब्द निष्पन्न होता है । उसमें अधि उपसर्ग में प्रकार लोप से धीक्षते, धीक्षा व धीक्षित शब्द बनते हैं । क्योंकि दीक्षित यजमान प्रेक्षापूर्वक संस्कृत व परिमित वाक् का ही यज्ञानुष्ठान काल में प्रयोग करता है अतः यह कहा है कि " वाचे हि दीक्षते ” वाक् का प्रेक्षा-पूर्वक प्रयोग करना यज्ञ के लिए प्रेक्षापूर्वक कर्म करना ही है । क्योंकि वाक् ही यज्ञ है । यह यजमान में प्रेक्षापूर्वक वाक् का प्रयोग करने वाला है । अतः इसे धीक्षित ( अधीक्षित ) कहा कहा जाता है । और इसी का नाम दीक्षित है चूंकि देवता परोक्ष प्रिय होते हैं अतः दीक्षित के -स्थान में धीक्षित शब्द प्रयुक्त हुआ है ॥ ३० ॥

[ विज्ञान भाष्य ] श्राहवनीय कुण्ड के दक्षिणभाग में पूर्व की ओर मुखभाग करके दो अथवा एक मृगचर्म को जिसके कि पीछे का हिस्सा त मसुत ( सूए से सीया हुआ ) है, विद्याकर उस पर यजमान बैठ जाता है । उस पर बैटकर " ऊर्गस्याङ्गिरसी " त्यादि मंत्र बोलता हुआ मेखला धारण करता है । तदनन्तर जरायु स्थाापन्न वस्त्र को प्रोढ़ता है । बाद में वस्त्र के ग्रंथिभाग में कृष्णविषाण ( काले हिरण का सींग ) बांधता है | बस यही पूर्व के दीक्षा ब्राह्मण का विषय है | इतने कर्म करने के अनन्तर वह यजमान सामान्य मनुष्य नहीं रहता ग्रपितु दीक्षित हो जाता है - देवभावयुक्त हो जाता है, प्रतएव इसके लिए [ २२७ ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण खास खास बातों का प्रतिबन्ध लगाया जाता है । सामान्य मनुष्य चाहे जहां फिर सकता है, चाहे जो खा सकता है, जिससे चाहे जो बोल सकता है । परन्तु दीक्षित मनुष्य ऐसा नहीं कर सकता । उसके लिए क्षेत्र विन्यास किया जाता है । इतनी दूर से ऐसे ही स्थान में जा सकते हो, फिर रुकते हो - यह रुकावट डाली जाती है । यह दीक्षित सिवाय द्विजाति के अन्य से नहीं बोल सकता । सिवाय दूध के और कुछ खा नहीं सकता । पय ही इसका व्रत । अर्थात् अन्न है । जैसा कि तृतीय काण्ड के प्रारम्भ में देव-यजन ब्राह्मण एवं संस्कार ब्राह्मण में विशदरूप से बतला दिया गया है । आज फिर उन्हीं नियमों को दोहराते हैं । दीक्षित मनुष्य के क्या क्या व्रतधर्म है? दीक्षित को किन - किन नियमों का पालन करना चाहिए - इसी विषय का इस ब्राह्मण में विवेचन किया जायगा । अतएव इस ब्राह्मण को " दीक्षितव्रतधर्म " ब्राह्मण नाम से व्यवहृत किया गया है । कृष्णमृगचर्म पर बैठने के अनन्तर मेखलादि धारण करता हुआ यह यजमान दीक्षित बनता है । यह दीक्षा कर्म्म प्रातःकाल होता है । इस प्रकार जब यह दीक्षित बन जाता है तो तदन्तर वाक् संयमन करता है । दीक्षान्तर मौनव्रत धारण करता है बस यही इसका पहला व्रतधर्म है । " वाचं यच्छति । " दीक्षान्तर वह यजमान सूर्य्यास्तपर्य्यन्त वाचंयम ही रहता है अर्थात् प्रातः काल से सायंकाल तक दीक्षित मनुष्य को दीक्षोत्तर मौनव्रती रहना पड़ता है । " स वाचंयम आस्ते प्रास्तमयात् ( प्र - अस्तमयात् इति भावः " ) यहाँ पर दीक्षान्तर इसलिए वाक्संयमन किया जाता है - यह बतलाते हैं अर्थात् वाक्संयमन का

प्राकृतिक रहस्य बतलाते हैं ।

तत् ( तत्र ) यत् ( यस्मात् ) वाचं यच्छति ( तदुच्यते - इति शेषः ) ॥ १ ॥

यज्ञ से ही देवताओं ने इस विजिति को जीता जो कि जिति आज देखी एवं सुनी जाती है । अर्थात् आज तुम देवताओं की प्रख्याति सुन रहे हो एवं देख रहे हो वह इसी यज्ञ की महिमा है जिस यज्ञ को कि आज यह यजमान करेगा । सोमयाग ही से देवताओं ने असुरों का विनाश किया था, कर रहे हैं - एवं करते रहेंगे, एवं इसी सोमयाग के प्रभाव से देवताओं ने अखिल ब्राह्माण्ड में अपना प्रभुत्व जमा रक्खा है । वेद के जितने भी आख्यान हैं वे आध्यात्म, अधिभूत, अधिदैवत- तीनों में समानरूप से लागू होते हैं । अध्यात्म में भी देवासुर संग्राम रहा । अधिदैवत में भी हो रहा हैं एवं अधिभूत में भी हो रहा है । इन तीनों में से पहले हम अधिदैवत संग्राम का ही विवेचन करेंगे । भगवान् प्रजापति की सन्ताने देवता और असुर इन पाटों में विभक्त हैं । जो ज्येष्ठ पुत्र हैं वे असुर कहलाते हैं । कनिष्ठ पुत्र देवता कह-लाते हैं । प्रजापति शब्द से सच्चिदानन्दघन, सर्वशक्तिमान, वह व्यापक ब्रह्म ही अभिप्रेत है । इसी ब्रह्म से चराचर की सृष्टि उत्पन्न होती है । संसार में जो कुछ भी होता है इसी प्रजापति से होता है अतएव श्रुति में: -[ २२८ ]

पृष्ठ 247

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मणे [ २२६ · ] दीक्षितव्रत ब्राह्मणं ) ये दो ही तो सन्तानें हैं । एक सन्तान असुर कहा जाता है जो गोरी सन्तान है पैदा होती है अतएव हम इसे ज्येष्ठ कहने " प्रजापतिस्त्वेदं सर्वमसृजत यदिदं किञ्च " ( श ० ६ का ० यह कहा गया है । हम संसार में दो ही तत्त्व देखते हैं - काला और सफेद । काले और सफेद के अलावा तीसरा तत्त्व है ही नहीं । काला तत्त्व अज्ञान है । सफेद तत्त्व ज्ञान है । काला तत्त्व सोम है । शुक्लतत्त्व अग्नि है । अग्नि गर्म है, सोम ठंडा है । इसीलिए कहा जाता है-' द्वयं वा इदं न तृतीयमस्ति आर्द्र चैव शुष्कं च ' यच्छुष्कं तदाग्नेयम् यदार्द्र तत् सौम्यम् । अन्त में श्रुति इस अग्नि सोम की, कृष्ण शुक्लतत्त्व की पहचान बतलाती हुई कहती है । " सूर्य एवाग्नेयः, चन्द्रमा सौम्यः । अहरेवाग्नेयं रात्रिः सौम्या । य एवा पूतेऽर्धमासः स श्राग्नेयः । योऽपक्षीयते स सौम्यः " ( श ० १/६/२/१५ ) पूर्वोक्त श्रुति प्रमाण से सिद्ध हो जाता है कि अखिल विश्व में सिवाय काले और सफेद के तीसरी वस्तु है ही नहीं । अग्नि और सोम के अलावा और कुछ नहीं है । सर्दी और गर्मी को छोड़कर आप कोई तीसरी वस्तु बतला ही नहीं सकते । विद्या और अविद्या के अलावा वास्तव में तीसरी वस्तु है ही नहीं । दिन और रात दिन के बाद रात रात के बाद दिन । क्या दिन रात के अलावा आप किसी तीसरे पदार्थ को बतला सकते हैं - हर्गिज नहीं । दिन सफेद है, रात काली है । दिन अग्नि है, रात सोम है 1 । दोनों के अलावा और है ही क्या । भगवान् प्रजापति की काली है, एक सन्तान गोरी है । जो काली सन्तान है उन्हें उन्हें देवता कहा जाता है । काली सन्तान देवताओं से पहले के लिए तैयार हैं । पानी, वायु और सोम तीनों कहने को तीन हैं वास्तव में तीनों एक चीज है । तीनों ही सोम हैं । सोम की जो घनावस्था है उसका नाम पानी है । तरलावस्था का नाम वायु है एवं विरलावस्था का नाम अर्थात् प्राणावस्था का नाम सोम है । एक ही चीज अवस्था भेद से तीन स्वरूपों में परिणत हो जाता है । इस सोम ही का दूसरा नाम भृगु है जिसका कि विस्तृत विवेचन करना प्रकृत से दूर जाना है | कहना यही है कि स्वयंभू भगवान् से सोम स्वरूप किंवा पानी स्वरूप पहले कृष्णतत्त्व ही उत्पन्न होता है । सृष्टिक्रम में स्वयम्भू से पहले पहले पानी ही उत्पन्न होता है - इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् मनु कहते हैं— " सोऽभिध्यायशरीरात् स्वात् सिसृक्षुविविधाः प्रजाः अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत् " – मनु ॥ इसी श्रापोमय मण्डल का नाम परमेष्ठि मण्डल है । यह प्रापोमण्डल हमारे ( रोदसी के ) सूर्य -ब्रह्माण्ड से भी परस्थान में रहता है अतएव " परमे स्थाने सीदति " इस व्युत्पत्ति से हम इसे " परमेष्ठी-मण्डल " कहते हैं । ऋत और सत्य दो ही तत्त्व हैं । जिस पदार्थ में केन्द्र होता है जो पिण्डस्वरूप पदार्थ

पृष्ठ 248

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण होता है - वह सत्य कहलाता है एवं जो बिखरा हुआ रहता है जिसका कोई केन्द्र नहीं होता वह ऋत कहलाता है । पानी का कोई अपना केन्द्र नहीं है । पानी को जब आप जमीन पर डालेंगे पसर जायगा । इसका पिण्ड नहीं बन सकता । श्रतएव इस हम ऋत कहने के लिए तैय्यार हैं । बस सबसे पहले यही ऋत अर्थात् यही पानी उत्पन्न होता हैं जिसे कि हम परमेष्ठि नाम से व्यवहृत करते हैं । इसी आपोमय मण्डल के पेट में सूर्य्यादि सारे लोक समा रहे हैं । सूर्य सहित सारा ब्रह्माण्ड उस परमेष्ठि आपोमय-मण्डल में एक बबूले के समान है । आपोमय मण्डल के बाहर कुछ भी नहीं है । इसी अभिप्राय से वेद भगवान् कहते है: -" ऋतमेव परमेष्ठि ऋतं नात्येति किञ्चन । " ऋते समुद्र प्रहितं ऋते भूमिरियं शृता ॥ ( तै ० ब्रा ० ) कहना इस सारे प्रपञ्च से हमें यही है कि प्रजापति पहले पानी ही को अर्थात् सोम ही को उत्पन्न करते हैं । सोम स्वरूप से काला है । प्रकाश तो सूर्य का अर्थात् अग्नि का धर्म है । काले तत्त्व को ही असुर कहते हैं । अतएव इसी विज्ञान के आधार पर हम असुरों को ज्येष्ठ पुत्र कहने के लिए तैय्यार है । साथ ही में इतना और समझ लेना चाहिए कि देवता तैतीस ही है परन्तु असुर ६६ हैं अर्थात् यह काला प्राण - श्राप्यप्राण ६६ तरह का है चूंकि परमेष्ठि मण्डल सूर्य की अपेक्षा महाविशाल है अतएव उसमें प्राग भी अधिक है इसीलिए प्रभुर संख्या में ज्यादा हैं । देवता संख्या में कम हैं । यह बात श्रुति में अनेक जगह कही जाती है । असुर ६ में हैं इसीलिए तो " जघान नवतिर्नव " ( ऋग्वेद ) यह कहा जाता है । पानी के अनन्तर भगवान् सूर्य उत्पन्न होते हैं । " तासु बीजमवासृजत् " में बीजं शब्द से यही हिरण्मयमण्डलोपेत भगवान् सूर्य्य अभिप्रेत है । ऋत के अनन्तर इसी सत्य का अर्थात् सूर्थ्य का प्रादुर्भाव होता है | हमारे ब्रह्माण्ड के जिसे कि हम " रोदसी ब्रह्माण्ड " कहेंगे - अधिष्ठाता यही सूर्य्य है । पानी के अनन्तर सूर्य्य उत्पन्न होता है अतएव भगवान् मनु कहते हैं: -तदण्डमभवद्धैमं सहस्त्रांशुसमप्रभम् । तस्मिञ्जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोक पितामहः ” बस प्रजापति भगवान् के तप से यह अग्नि और सोम किंवा पानी और सूर्य किंवा ऋत और सत्य यह दो ही तत्त्व उत्पन्न होते हैं । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है " ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत ॥ इति उस सत्य प्रजापति से ऋत और सत्य यही दो तत्त्व उत्पन्न होते हैं । इसी अभिप्राय से प्रार्य-सर्वस्व ( पुराण ) कहता है । [ २३० ]

पृष्ठ 249

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण " सत्यस्य योनि निहितं च सत्ये सत्यात्मकं त्वं शरणं प्रपन्नः ॥ ( श्रीमद्भागवतः ) कहना सारे प्रपञ्च से हमें यही है कि प्रजापति भगवान् से कृष्ण और शुक्ल, अर्थात् अग्नि- सोम यह दो ही तत्त्व उत्पन्न होते हैं । दोनों ही प्रजापति की सन्तान है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " देवाश्च वा असुराश्च उभये प्राजापत्याः " यह कहा जाता है । यहां पर इतना और समझ लेना ग्रावश्यक होगा कि जिस सोम को हम ऋत बतला रहे है उसे हमने अब, वायु, सोम, अवस्थाभेदेन तीन तरह का बतलाया तीनों । यह यद्यपि हैं एक ही पदार्थ परन्तु अवस्था भेद से इसमें सर्वथा वैजात्य हो जाता है । आपका नाम रूप कर्म भिन्न है, बायु का नाम रूप कर्म भिन्न है एवं सोम का नाम रूप कर्म भिन्न है । एक ही मनुष्य जब हाई-कोर्ट की गद्दी पर जा बैठता है तो जज कहलाने लगता है । रूप उसका रोबीला हो जाता है । काम शासन करना हो जाता है । वही जज जब घर में स्त्री के पास आता है तो प्राणप्रिय पतिदेव नाम से व्यवहृत होने लग जाता है । रूप उसका बिल्कुल प्रेममय हो जाता है । जज बनकर हुकूमत का स्वरूप एकदम लापता हो जाता है एवं काम उसका बजाय शासन के प्रेमबन्धन के कारण स्त्री की मातहती हो जाता है । कहने का मतलब यही है कि अवस्था भेद से एक ही वस्तु के नाम, रूप, कर्म भिन्न भिन्न हो जाते हैं । बस यही बात सोम के विषय में समझनी चाहिए । जो सोम की प्राप्यावस्था है उसका नाम रूप कर्म भिन्न हैं । वायु का भिन्न है एवं सोम का भिन्न है । इन तीनों में से हम असुर केवल पानी को ही कहेंगे न कि सोम और वायु को । प्राप्य प्रारण को ही असुर समझना चाहिए । आप्यप्राण का ही अर्थात् पानी का ही आग के साथ वैर है । सोम कहते हैं धृत को, स्नेहन- द्रव्य को । उसका तो अग्नि के साथ सखा भाव है । सोम अर्थात् घृत अग्नि का नाश नहीं करता अपितु उसे अधिक प्रज्वलित करता है । ऐसी अवस्था में सोम को असुर कैसे कहा जा सकता है । सोम तो देवतानों का ग्रर्थात् अग्नि का अन्न है । चन्द्रमा सोम का गोला है । इसे देवप्राणधन - अर्थात् अग्निप्राणधन सूर्य प्रतिक्षण खाया करता है अतएव — " एतद्वै सोमो राजा देवानामत्रयश्चन्द्रमा " यह कहा जाता है । असुर शब्द से पानी ही अभिप्रेत है बस इन प्राप्यप्राणस्वरूप असुरों और ग्राग्नेय प्राणस्वरूप देवताओं में सदा युद्ध हुआ करता है । असुर अनवरत देवताओं पर आक्रमण किया करते हैं । सूर्य के ऊपर परमेष्ठिमण्डल है अर्थात् आपोमण्डल है । यह पानी चारों ओर से सूर्यमण्डल पर आक्रमण किया करता है । पानी ने सूर्य को चारों ओर से घेर रक्खा है बस यही असुरों का देवतानों पर श्राक्रमरण है । पानी सूर्य पर सदा आक्रमण करता रहता है । इसी प्रकृति रहस्य को लक्ष्य में रखकर — " देवाश्च वा श्रसुराश्च उभये प्राजापत्याः पस्पृधिरे " यह कहा जाता है । यह है वैदिक देवासुर संग्राम का आधिदैविक रहस्य । प्राधिदैविक मण्डल में रात दिन देवता और असुरों में युद्ध होता रहता है । [ २३१ ]

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 250 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मणं परन्तु इस युद्ध में जीतते हैं देवता ही । विजय प्राप्त करते हैं देवता ही । सूर्यस्वरूप अग्नि पर परमेष्ठि का पानी अनवरत आक्रमण करता रहता है । फिर भी सूर्य का गोला ज्यों का त्यों ही रहता है । अग्नि उस पानी के आक्रमण से बुझने नहीं पाता । अपितु सारे ब्रह्माण्ड में फैला हुआ है । सूर्य का प्रकाश त्रिलोकी में व्याप्त हो रहा है । देवताओं की इस विजय का एकमात्र कारण है - सोमयज्ञ । सोम-यज्ञ ही से देवता असुरों को परास्त करते रहते हैं । हमने बतलाया है कि सूर्य के ऊपर परमेष्ठिमण्डल है । इस परमेष्ठिमण्डल में प्राप्यप्राण की तरह सोम भी रहता है । सोम स्निग्ध पदार्थ है । राल के माफिक है - जैसे राल अग्नि में आहुत होकर अग्नि को प्रज्वलित कर देता है । सूर्य में जैसे पानी का आक्रमण होता है तद्वत् सोम भी सूर्य में आता रहता है । सूर्य में है । इसमें परमेष्ठि मण्डल का सोम अनवरत आहृत होता रहता है । वस इसी सोमाहुति के कारण अग्नि, रात दिन पानी के आक्रमण होने पर भी बुझने नहीं पाता । श्रपितु सोमा-हुति प्रभाव से अपनी ज्वलन्त किरणों से पानी को धक्के देकर बाहर फैलता रहता है । यदि सूर्य में सोम की आहुति न होती तो सारा ब्रह्माण्ड आपोमय हो जाता । अग्नि का अर्थात् देवताओं का कहीं पता भी न लगता । अग्नि में जब तक सोम की आहुति होती रहती है तब तक वह बुझने नहीं पाता । इसका प्रत्यक्ष दर्शन श्मशान में होता है । अग्नि पर चिता पर जब शव को रख दिया जाता है एवं उस चिता को प्रज्व-लित कर दिया जाता है तो घोर वृष्टि होने पर भी वह अग्नि तब तक शान्त नहीं होती जब तक कि शव का अंश एकान्ततः जल नहीं जाता । शव पुरोडाश है- सोम है । भला इसके रहते अग्नि क्यों कर शान्त हो सकता है । अग्नि में साम की आहुति पड़ने का नाम ही यज्ञ है । देवता सारे आग्नेय हैं । सूर्य अग्नि का गोला है । इसमें रात दिन सोम श्राहुत होता रहता है । इस सोम से अग्नि बुझने नहीं पाता । इससे सूर्यस्थ प्राग्नेय प्राण भी प्रकाशी प्राण भी नहीं मरते । अपितु सारे ब्रह्मण्ड में व्याप्त रहते हैं । आज हम जो सूर्य का अर्थात् देवताओं का राज्य इस ब्रह्माण्ड में देख रहे हैं यह जो प्रकाश दिख-लाई पड़ता है इसका एकमात्र कारण यह सोमयज्ञ ही है । यदि सूर्य में सोमाहुति न होती - अग्निसोमा-• त्मक यज्ञ न होता तो सूर्य मर जाता एवं सारे ब्रह्माण्ड में अन्धकार हो जाता । सूर्य अग्निहोत्र है । इसमें रात दिन सोम गिरा करता है । सूर्य कैसे अग्निहोत्र है? इसका विस्तृत विवेचन द्वितीय काण्ड में " सुर्यो हवा अग्निहोत्र " इस अग्नि-होत्र ब्राह्मण में देखना चाहिए । यहां सिर्फ यही समझ लेना पर्याप्त होगा कि इस सोमयज्ञ के द्वारा ही देवताओं ने उस जिती को प्राप्त की थी । जो कि उसकी विजय आज प्रत्यक्ष दिखलाई पड़ रही है । बस आधिदैविक - देवासुर संग्राम का एवं सोमयज्ञ का यही रहस्य है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रख कर भग-वान् याज्ञवल्क्य कहते हैं । [ २३२ ]