Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 251–260
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 251–260
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मणं " यज्ञेन वे देवा इमां जितिजिज्ञुर्या एषांमियं जितिः " दीक्षितव्रत ब्राह्मण इस प्रकार प्रकृतिमण्डल में विजय का हेतुभूत जो यज्ञ है - वह अनवरत होता रहता है परन्तु सामान्य मनुष्य इस यज्ञ रहस्य से अपरिचित है । हर एक आदमी इस यज्ञ विद्या को प्राकृतिक विज्ञान को नहीं जानता । क्यों नहीं जानता इसमें भी वे देवता ही कारण है । प्रकृति नहीं चाहती कि मेरा स्वरूप सामान्य मनुष्य पहचान जाय । वह मनुष्यों से अपने आपको छुपाने की कोशिश करती है । यही तो उसकी प्रतिष्ठा है । प्रतिष्ठा तत्त्व की रक्षा मर्यादा पालन से ही होती है । जो मनुष्य नीच मनुष्यों के साथ रहता है वे पर्दगी से बातें करता है ट संट बकता रहता है । आचार व्यवहार से घृणा करता है । लोक में ऐसा मनुष्य अप्रतिष्ठित समझा जाता है । उससे सब घृणा करने लगते हैं अपितु जो ठीक इसके विरुद्ध आचरण करता है वह प्रतिष्ठित समझा जाता । प्रतिष्ठा के लिए सामान्य भाव को तोडना पडता है एवं मर्यादा में रहना पडता | मर्यादा में कोई नहीं प्रतिष्ठा है । राजा के अन्तःपुर जा सकता । यही अन्तःपुर की प्रतिष्ठा है । यदि सामान्य मनुष्य इसमें जाने लग गये तो वह अन्तःपुर ही नहीं रहा । अन्तःपुर का अन्तःपुरपना मर्यादा पर अवलम्बित है । हाईकोर्ट में सामान्य मनुष्य नहीं जा सकता, यही हाईकोर्ट की प्रतिष्ठा है यदि चाहे जो उसमें जाने लग जाय तो वह हाईकोर्ट ही न रहे । फिर तो बाजारू दुकान बन जाय । कहना यही है कि प्रतिष्ठा के लिए सामान्य भाव को रोका जाता है चूंकि प्राकृतिक यज्ञ ब्रह्म की प्रतिष्ठा है अतएव उसे उसने सामान्य मनुष्यों से छुपा रक्खा है । यज्ञ विद्या को सबके सामने प्रकट नहीं होने देता । प्रकृति का सारा काम पर्दे में होता है । इसीलिए श्रुति में बार बार - " परोक्षप्रिया इव हि देवा: - इस कथन में " इव " पद का सन्निवेश है - अतएव एकदम परोक्ष की नहीं है । कुछ अंशों में प्रकृति अपने रहस्य को बतला भी देती है । सूर्य में सोम की आहुति होती है, इसी से यज्ञ होता रहता है । इस बात को आधिदैविक मण्डल के देवताओं ने छुपा रखा है । सामान्य मनुष्य इस बात को नहीं जानता कि सूर्य में परमेष्ठिमण्डल का सोम आहुत होता रहता है एवं इस अग्नि सोमा -त्मक यज्ञ से देवताओं की विजय हो रही है । प्रकृति ने जिस साधन से इस यज्ञ विद्या को छुपाया वह यही सूर्य है । सूर्य ही उस यज्ञस्वरूप को सब पर प्रकट नहीं होने देता । सूर्य इतना तेजस्वी पिण्ड है जिस पर प्रांख ठहरती ही नहीं । यदि सूर्य इतना ज्योतिष्मान न होता तो शायद हमें परमेष्ठि के सोम का दर्शन हो जाता एवं जैसे हम सूर्य को प्रत्यक्ष में देख रहे हैं वैसे उस आहुतिस्वरूप यज्ञ के सार भाग को, तत्त्व भाग को प्रत्यक्ष में देख लेते । परन्तु सूर्य ही हमें इस यज्ञ को नहीं देखने देंगे । सोम की आहुति ही तो यज्ञ का सार भाग है इसी का हमें प्रत्यक्ष नहीं होता । देवताओं ने सूर्य द्वारा उस रस भाग को, आहुति स्वरूप को हमारे से प्रच्छन्न कर रक्खा है । अतएव इस सूर्य को वैदिक परिभाषा में " यूप " कहा जाता है । यूप शब्द का अर्थ है प्रच्छन्नता । छुपाना ही यूप शब्द का अर्थ है | यज्ञ को छिपाने के कारण जिसका नाम यूप हो गया है ऐसे यूप से अर्थात् सूर्य से देवताओं ने यज्ञ भाग को सामान्य मनुष्यों की दृष्टि से छुपाया । इसीलिए सूर्य का नाम यूप हो गया । हमें केवल सूर्य ही अर्थात् यूप ही दीखा करता है । उस यज्ञ रहस्य को, यज्ञ के वैज्ञानिक तत्त्व को समझने में हम सर्वथा असमर्थ हैं । बस इसी विज्ञान को लक्ष्य रख कर याज्ञवल्क्य कहते हैं: -[ २३३ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण " यज्ञ द्वारा जय प्राप्त कर अखिल ब्रह्माण्ड में अपनी सत्ता कायम कर देवताओं ने परस्पर विचार किया कि यह यज्ञ हमारा ( प्रकृति का ) प्रतिष्ठापद, मनुष्यों से कैसे अन्तर्हित हो इसके लिए कोई उपाय करना चाहिए । मनुष्यों के लिए यह यज्ञ रहस्य अनभ्यारोह्य हो जाय - अर्थात् मनुष्य यज्ञ को न पहचान जाय, कोई ऐसा उपाय करना चाहिए । आखिर देवताओं की समझ में इसका उपाय आ गया । उन्होंने यज्ञ के सार भाग को कसकर, जैसे भौंरा पुष्प में से सार भाग को खँच लेता है तद्वत् यश के सार भाग को दुहकर - निचोड़कर यूप से ( सूर्य से ) उसे छुपाकर मनुष्यों की दृष्टि से अन्तर्हित गये । चूंकि इन्होंने इस यूप से अर्थात् सूर्य से यज्ञ को छुपाया श्रतएव इसका नाम यूप हो गया । देवता वास्तव में अप्रत्यक्ष हैं । अग्नि, वायु, प्रादित्यादि प्राण देवता सर्वत्र व्याप्त रहते हैं परन्तु हम उन्हें नहीं देख सकते । यज्ञ उन्हीं के अधीन है । प्राण को पहचानने पर ही यज्ञ रहस्य मालूम होता है । जब प्राण ही अप्र-त्यक्ष है तो फिर तदाधारेण अपनी स्थिति कायम रखने वाले यज्ञ का प्रत्यक्ष क्योंकर हो सकता है । सूर्य ही तो यज्ञ का कुण्ड है । इसी में तो यज्ञ होता है । सोम की बाहुति इसी में तो होती है, एवं हम इसे प्रत्यक्ष देख रहे हैं । परन्तु मालूम नहीं होता कि यज्ञ कैसे होता है एवं कैसे एवं देवताओं ने कब कैसे इसे ले लिया । छुपा लिया । बस इसी भाव को बतलाने के लिए " यथा मधु मधुकृतः ” कहा गया है । भौंरा पुष्प में से रस चूस लेता है परन्तु हमें मालूम नहीं होता कि कब उसने रस चूस लिया । पुष्प हमें वैसा ही दिखलाई पड़ता है जैसा पहले दिखलाई पड़ता था । " बस इसी अभिप्राय से कहते हैं— " यज्ञेन वै देवा इमां जिति जिज्ञ येषामियं जितिः । ते होचुः कथं न इदं ( प्रतिष्ठापदं ) मनुष्यैरनभ्यारोह्यं स्यात् इति । ते यज्ञस्य रसं धीत्वा यथा मधु मधुकृतो निर्धये विदुह्य यज्ञं यूपेन योपयित्वा तिरोऽभवत् । अथ यदेने नायो-पस्तस्माद्य पो नाम || २ || इस श्रुति को भुवन स्वर्गवासी मनुष्य देवताओं के अभिप्राय पर भी समझना चाहिए । ऐतिहासिक एवं वैज्ञानिक दोनों रहस्य इस श्रुति से बतलाए जाते हैं । भुवन स्वर्गवासी देवताओं ने भी इस यज्ञ विद्या को भारतवर्ष में रहने वाले मनुष्यों से छुपाया था । जिस ज्ञापन से यज्ञ का सार वेदि - प्राहुति यही है । पृथिवी के २१ वें अहर्गण पर भगवान् सूर्य है । जिन्हें कि यूप कहा जाता है । भुवन स्वर्ग के देवताओं ने उसी प्रकृतिमण्डल के अनुसार यज्ञ किया था अतएव पृथिवीस्वरूप गार्हपत्याग्नि के २१ वें ग्रहण पर ही उन्होंने सूर्यं स्थानापन्न - काष्ठ का एक बड़ा लम्बा चौडा यूप कायम किया था, एवं श्राज भी सोमयज्ञ में महावेद्यन्तर्गत उत्तरावेदि के आगे २१ वें स्थान पर " यद्वै देवा अकुर्वस्तत् करवाणि " के अनुसार यूप खडा किया जाता है | प्रस्तु कहना हमें यही है कि देवताओं ने यज्ञ द्वारा अपने ग्रात्माग्नि को प्रबल कर जब अफ्रीका देश में रहने वाले असुरों को परास्त कर अपना राज्य का कर लिया तो उन्हें चिन्ता हुई कि कहीं सामान्य मनुष्य, इस प्रतिष्ठा को प्राप्त न हो जाय । बस यह विचार कर उन्होंने वेदि वगैरह, आहुति वगैरह, सारे कर्मों को यज्ञानन्तर नष्ट भ्रष्ट कर दिया । केवल यज्ञ - सूचनार्थ यूप मात्र रहने दिया । इसीलिए तो आज भी सारा काम खतम होने पर यूब को वैसे का वैसा ही छोड दिया जाता है । चू ंकि [ २३४ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण देवताओं को यज्ञ को छुपाने में इसी काष्ठ के स्थूण ने मदद दी - इसीलिए इसका नाम यूप हो गया । हमने यज्ञविद्या, इन भुवन स्वर्गवासी मनुष्य - देवताओं से प्राप्त की है । अतः प्रकृत में ऐतिहासिक अर्थ का ही सम्बन्ध समझना चाहिए । प्रकृति के इस विज्ञान को महर्षियों ने अपने तपोबल के द्वारा पहचाना । परिश्रम करके, रात दिन रिसर्च करके, ऋषियों ने, महावैज्ञानिक विद्वानों ने इस यज्ञ रहस्य को प्रकृतिमण्डल के प्रतिष्ठा पद को पहचाना - प्रतएव ये महर्षि वैज्ञानिक विद्वान् देवता नाम से प्रसिद्ध हुए इसीलिए कहा जाता है । " देवा ह वै देवाः प्रथ ये शुश्रूवांसोनूचानास्ते मनुष्य देवाः " प्रकृति के विज्ञान को जिन्होंने पहले पहचाना वे ही भुवन स्वर्गवासी देवता कहलाए । वे ही यज्ञविद्या के आविष्कर्ता थे । इसी अभिप्राय से कहते हैं । " तद्वा ऋषिणामनुश्रुतमास " महर्षि लोग, वैज्ञानिक लोग इस बात को, इस रहस्य को जानते थे । अतएव उन्होंने इस सोम यज्ञ का उस प्रकार से स्मरण किया जैसा कि यह प्रकृति यज्ञस्मृत है अर्थात् प्रकृति यज्ञानुसार उन्होंने सोम यज्ञ का वितान किया । " ते यज्ञं समभरन् यथाऽयं यज्ञः सम्भृतः ” इन देवताओं से हम यज्ञ विद्या को पहले पहल भारतवर्ष के महर्षियों ने सीखा था । भारतवर्ष के मनुष्यों में से ऋषि ही ऐसे थे जो कि भुवन स्वर्ग में जा सकते थे यह उन भुवन स्वर्ग देवताओं की यज्ञ विद्या को देखते थे- अतएव इनके द्वारा भारतवासियों ने यज्ञविद्या सीखी । बस आज जो यजमान दीक्षा ले रहा है वह भारतवर्षीय महर्षियों द्वारा सम्भृत यज्ञ की तरह ही अपने इस सोमयाज्ञ का सम्भरण करता है । अर्थात् यज्ञ को आत्मसात् करता है । वाक् ही यज्ञ का स्वरूप है । ऋषियों ने वाक् यज्ञ को वाक् संयम द्वारा आत्मसात किया था - अतएव आज यह यजमान भी वाक् संयम द्वारा यज्ञ को श्रात्मसात् करता है । " एवं वा एष यज्ञः संभरति यो दीक्षते, वाग्वै यज्ञः " वाक् ही तो यज्ञ का स्वरूप है । वाक् नाम है- अग्नि का । पृथिवी के केन्द्र में से एक अग्नि निकलता है । यह अग्नि रथन्तर सामतक अर्थात् २१ तक जाता है । २१ के बाद अर्थात् सूर्य के बाद सोम भरा हुआ है । वह सोम इस वाक् अग्नि में आहुत होता रहता है । वाक् को अग्नि कहते हैं— इसीलिए तो--' तस्य वा एतस्याग्नेर्वागेवोपनिषत् - यह कहा जाता है । इसी अग्नि में जब सोम की आहुति पड़ती है तो यज्ञ होता है । यज्ञ से ही ब्रह्माण्ड की स्थिति रहती है । यज्ञ से ही आत्म स्थिति रहती है । अतएव हम आत्मा को यज्ञ कह सकते हैं, इसीलिए -" श्रधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर " - यह कहा जाता है । हम जो अपने मुंह से क - च - ट - त - प स्वरूपयुक्ता वर्णात्मिक जो वाक् बोलते हैं वह भी तो ग्रग्नि ही है । शरीरस्थित गर्मी ही तो क - ट - तन्त्र [ २३५ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण बनकर बाहर निकलती है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि जिसके शरीर में अधिक अग्नि होगी अर्थात् बल होगा उसके शब्द उतने ही आगे जायेंगे, एवं मनुष्य जितना अधिक दुर्बल होगा उसकी वाणी उतनी ही अधिक मन्द होगी इसीलिए -श्रग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशत् " यह कहा जाता है । वाक् ही अग्नि है । अग्नि ही आत्मा का स्वरूप है । जब तक शरीर में अग्नि रहती है तभी तक आत्मस्थिति रहती है । जहां हाथ पैर ठण्डे हुए कि काम खत्म हुआ । श्रात्मा वाक्स्वरूप है अर्थात् अग्निस्वरूप है । इसमें एक प्रमाण और भी है । यह कबूतर है, यह कमेड़ी है - यह बतक है, यह सारस है, यह कोयल है, यह मनुष्य, है यह बैल है, यह कुत्ता है । इस प्रकार की जो जाति व्यवस्था है वह वाक् पर ही निर्भर है । जिसकी बोली एक सार होती है वे सब एक जाति के कहलाते हैं । वाक् ही श्रात्मस्वरूप को परिचायिक है । काकतोता, जो कि एक शतुर्मुर्ग के माफिक है वह भी तोता ही कहलाता है एवं एक छोटा सा हरितपर्ण का पक्षी भी तोता ही कहा जाता है । हम पूछते है कबूतर तोता क्यों नहीं कहलाता — इसका उत्तर सिवाय वाक् के और हो ही नहीं सकता । कबूतर की वाक् ( बोली ) काकतोता से भिन्न है अतएव वह तोता नहीं कहलाता । परन्तु छोटे तोते की आवाज काकट तोता से मिलती है अतएव वह तोता कहलाने लगता है । आकार में स्वरूप में चाहे जितना फरक हो यदि बोली समान हो तो वह एक भांति की चीज है । वाक् से जाति व्यवस्था होती है न कि रूप से क्रिया कर्म से । इसीलिए चिड़िया ही कहलाती हैं । मनुष्य - मनुष्य का स्वरूप सर्वथा पृथक् होता है परन्तु इसी वाक् की सदृश्यता से सब मनुष्य कहलाते हैं । मनुष्य एक जाति है यही वाक् के आत्मत्व का बड़ा जबर्दस्त प्रमाण है । वाक् ही आत्मा है । आत्मा यज्ञस्वरूप है इसीलिए " वाग् वं यज्ञः " यह कहा जाता है । जो वस्तु कच्ची होती है यदि उसे बाहर निकाल दी जाती है तो उसका स्वरूप एकदम बिगड़ जाता है । बच्चा यदि १६ वर्ष से पहले स्त्री प्रसङ्ग कर लेता है तो वह जन्म भर रुग्ण रहता है क्योकि १६ वर्षं के पहले वीर्यं सर्वथा अपरिपक्व रहता है । गर्भ जब तक १० महीने तक पक नहीं जाता है । तब तक उसकी रक्षा करनी चाहिए । यदि १० महिने से पूर्व ही गर्भ गिर जायगा तो उसका नाश हो जायगा । कहने का तात्पर्य यही है कि जब तक कच्ची अवस्था रहती है तब तक उसे बाहर नहीं निक लना चाहिए । सुरक्षित रखना चाहिए । कृष्णमृग चर्म पर दीक्षा लेकर यजमान आज गर्भ बना हुआ है । अग्नि ही वाक् ही इस गर्भ की आत्मा है । अभी यह एक दम कच्चा है । ऐसी अवस्था में यह मुंह से बोल देगा तो आत्माग्नि निकल जायगी । आत्माग्नि का निकलना यज्ञ का निकलना है । अतः यज्ञरक्षार्थ इसे वाक् संयमन करना चाहिए । बस इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर कहते हैं-" एवं वाऽएष यज्ञं संभरति यो दीक्षते " वाग्वै यज्ञः || ३ || प्रातःकाल वाक् संगमन करता है एवं उसे सूर्यास्त होने पर छोड़ देता है अर्थात् सायंकाल होते ही मौनव्रत तोड़ देना चाहिए । [ २३६ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण " तामस्तमिते वाचं विसृजते " सायंकाल होते ही वाक् विसर्जन क्यों करे, पहले अथवा बाद में क्यों न करे — इसकी उपपत्ति बतलाते हैं— पूर्व प्रकरण में हमने बतलाया है कि पृथिवी के केन्द्र से एक प्रकार का अग्नि निकलता है जो कि पृथिवी के २१ वें अहर्गण तक रहता है । इसी अग्निमण्डल को रथन्तर साम कहते हैं । अग्नि ही पदार्थ का आत्मा है अतएव जहां तक अग्नि जाता है वहां तक उस पदार्थ की सत्ता मानी जाती है । ' इसी आधार पर पृथिवी लोक की सत्ता सूर्य से भी ऊपर तक मानी जाती है इसीलिए तो इसका नाम रथन्तर साम है इसी को सोलर सिस्टम कहते हैं । यह अग्निमण्डल अर्थात् सोलर सिस्टम गोल होता है । पृथिवी पिण्ड के केन्द्र से लेकर पृथिवी के चारों ओर २१ तक यह अमृताग्नि व्याप्त रहता है । इस आग्नेय सोलर सिस्टम को ही सम्वत्सर कहते हैं । प्रत्येक वृत्त ३६० अंश का हुआ करता है । इसी नियम के अनुसार इस प्राग्नेय वृत्त में भी ३६० ही अंश हैं । संवत्सर मण्डल में आप ३६० अ ंशों का निशान बना दीजिए । बस जो निशान हैं - वह रात्रि है, एवं निशानों के बीच का भाग दिन है । इस प्रकार एक सम्वत्सर में ३६० दिन हो जाते हैं एवं ३६० रात्रि हो जाती । सारा संवत्सर अग्निस्व-रूप है । सम्वत्सर को ही अग्नि कहते हैं । अग्नि को ही वाक् कहते हैं । सम्वत्सर, अग्नि, वाक् तीनों एक ही वस्तु है इसीलिए कोई सम्वत्सर को अग्नि कहता है कोई वाक् को कहता है - जैसा कि श्रुति कहती है-" वायुरग्निरिति ह शाकायनिन उपासते श्रादित्योऽग्निरित्युहैक प्राहुः । श्रीमत्यो वा हालिङ्गवो वा वायुरेवाग्निः । शाट्यायनिरु ह स्माह - सम्वत्सराए-वाग्निः । तस्य वसन्तः शिरः ग्रीष्मो दक्षिणः पक्षो वर्षा उत्तरः शरच्चतुर्मध्यम आत्मा- - हेमन्त शिशिरावृत्त पुच्छं प्रतिष्ठां वागग्निः । " — इति ॥ इस संवत्सराग्नि में, जब सोम की आहुति पड़ती है तो इस अग्नि सोमात्मक यज्ञ से ही संसार के यच्चयावत्पदार्थ उत्पन्न होते हैं । सब का पिता यही संवत्सराग्नि है । बस इसी अभिप्राय से " संव-त्सरो वै प्रजापतिः " यह कहा गया है । प्रजापति जो अनिरुक्त प्रजापति है वह अकथ प्रजापति कहलाता है । सर्प प्रजापति वपन प्रजापति कहलाता है । संवत्सराग्नि जिस केन्द्र से निकलता है उस केन्द्रीय-मूल शक्ति का नाम ही अनिरूक्त प्रजापति है । इसी से सारा संवत्सराग्नि निकलता है । सम्वत्सराग्नि के निकलने का यही केन्द्रस्थ अग्नि है अतएव इसे उक्थ प्रजापति कहा जाता है । इसी के लिए " प्रजा-पतिश्चरति गर्भे " यह कहा जाता है । इस प्रजापति से ही यह अग्नि बाहर की ओर १२ तक फैलता है । इसी का नाम सम्वत्सर मण्डल है । यही इस प्रजापति की महिमा है । इस महिमा मण्डल के केन्द्र में उक्थ प्रजापति रहता है । अतएव इसके लिए " स्वे महिम्नि प्रतिष्ठति " यह कहा जाता है । यही प्रजापति महिमापर्यन्त व्याप्त करता है । बस इस महिमा विशिष्ट प्रजापति को ही " सर्व प्रजापति " [ २३७ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण कहा जाता है । सारे पदार्थों का अध्ययन अर्थात् स्थान यही प्रजापति है - प्रतएव सर्व प्रजापति को श्राय-यस प्रजापति भी कहा जाता है । प्रकृत में सम्वत्सर को प्रजापति कहा है अतः इससे सर्व प्रजापति ही अभिप्रेत समझना चाहिए । प्रत्येक प्रजापति में उक्थ, अर्क, अशिति यह तीन भाव रहते हैं जो केन्द्रीय ग्नि है वह उक्थ है एवं उसकी जो चारों ओर ज्वालाएं निकलती हैं वह ग्रर्क है एवं उसमें जो पदार्थ आहुत होंते रहते हैं वह अशिति है अर्थात् श्रन्न है । सूर्य का गोला उवथ है, उसकी किरणें अर्क है एवं जिन पानी वगैरह पदार्थों को वह सोस जाता है वही उसकी अशिति है | अहवनीयकुण्ड उक्थ है । अग्नि की ज्वाला अर्क है एवं आहुति अन्न है । प्रजापति अर्थात् अग्नि तीन ही स्वरूपों में परिणित हो अपनी संस्था कायम करता है इसीलिए " अपि " यह कहा जाता है । यह प्रजापति ही अग्निस्वरूप है । उसी में सोम की आहुति पड़ती रहती है अतएव इस प्रजापति को यज्ञ भी कहा जाता है । " प्रजापतिर्यज्ञः " इस सम्वत्सर का असली स्वरूप पूछना चाहो तो अहोरात्र ही है । संवत्सर यज्ञ प्रजापति का साक्षात् स्वरूप दिन और रात ही हैं । दिन आग्नेय है । रात्रि सौम्या है । अग्नि सोम का नाम ही तो यज्ञ है यज्ञ को ही तो संवत्सर प्रजापति कहते हैं " अहोरात्रे वै संवत्सरः " । ३६० दिन का नाम संवत्सर है, ऐसी अवस्था में एक अहोरात्र को ही संवत्सर बतलाना श्रसंगत है । इस भ्रम में कोई न पड जाय इसलिए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं— पुनः पुनः आवर्तमान यह जो अहोरात्र है यही तो सम्वत्सर को उत्पन्न करते हैं । दिन - दिन के ' बाद रात, रात के बाद फिर दिन, फिर रात यह जो अहोरात्र की शृंखला है इसीसे तो संवत्सर का स्वरूप बनता है । सम्वत्सर में सारभाग यह अहोरात्र ही तो है । अग्नि सोम ही है । इन दो के अलावा और है ही क्या? " एते ह्य ेनं परिप्लवमाने कुरुतः ( पुनः पुनरावर्तमाने एते ह्येव एनं ( संवत्सरं ) कुरुतः ( जनयतः इतिभावः ) अहोरात्र स्वरूप इस संवत्सर में दो पर्व हैं प्रथम एवं द्वितीय । अतः प्रथम पर्व है । रात्रि द्वितीय पर्व है । ग्रहः पूर्व यज्ञ है, रात्रि उत्तर यज्ञ है । अहः सूर्यप्राण है रात्रि अपान प्राण है - पार्थिव प्राण है । यजमान को पृथिवी लोक से सूर्य लोक में अर्थात् स्वर्ग में जाना है इसमें प्रधान साधक सौर प्राण ही है अर्थात् दिन हो है इसीलिए इसने दिन में ही प्रातः काल की दीक्षा ली है । इसने अहोरात्रस्वरूप संवत्सर के ग्रहः पर्व में दीक्षा दी है— " सो s हन् ( ग्रह्नि ) दीक्षिष्ट " अहर्यज्ञ को, अहः प्राण को इसने आत्मसात् किया है । अब वह रात्रि को पा गया है । अब रात्रि हो गई है तो बस जितना यज्ञ था जितनी इसकी मात्रा की उतनी ही मात्रा को कर यह अब वाक् विस-[ २३८ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण र्जन करता है । तात्पर्य यही है कि प्रधानतया इसे सौर प्राण को आत्मसात् करना है न कि अपान प्राण को । अतएव इसने दिन ही में दीक्षा ली थी । सायंकाल होते ही सूर्यप्राण अस्त हो जाता है अतएव अब वाक् संयमन की कोई आवश्यकता नहीं रहती क्योंकि प्राप्तव्य यज्ञांश दिन ही का था अतः उसी की प्राप्ति के लिए, उसे ही आत्मसात् करने के लिए वाक् संयमन की आवश्यकता थी । सायंकाल होते ही तो प्रपान प्रारण घुसने लगता । ऐसी अवस्था में यदि सायंकाल भी वाक् विसर्जन न किया जायगा तो पार्थिव प्राण का श्रात्मा में प्रवेश हो जायगा जो कि अभीष्ट नहीं है अतः सायंकाल ही वाक् विसर्जन करना चाहिए इसी अभिप्राय से कहते हैं-" संवत्सरो वै प्रजापतिः । प्रजापतिर्यज्ञः । श्रहोरात्रे वै संवत्सरः । एतेनं परिप्लवमाने कुरुतः । सोऽहन्न दीक्षिष्ट स रात्रि प्रापत् ।
यावानेव यज्ञो यावत्यस्य मात्रा तावन्त मेवैतदाप्त्वा वाचं विसृजते ।
तस्मात्तामस्तमिते विसृजते – इति शेषः ॥ ४ ॥
कितने ही आचार्य नक्षत्र देखकर वाक् विसर्जन करते हैं । उनका मत है कि जब आकाश में तारे दीख जावें तब वाक् विसर्जन करना चाहिए । इसमें वे उपपत्ति यह बतलाते है कि नक्षत्र दर्शन समय में सूर्य वास्तव में ग्रस्त हो जाता है । नक्षत्रोदय होने पर दिन का स्वरूप तिरोहित हो जाता हैं एवं वास्तव में रात्रि आ जाती है । ऋतः नक्षत्र देखकर ही वाक् विसर्जन करना चाहिए । " तद्ध के नक्षत्रं दृष्ट्वा वाचं विसर्जयन्ति " श्रनुष्ठ्या स्तमितो भवति इति वदन्तः । नक्षत्र समय में सूर्य अनुष्ठ्य ( वास्तव में एकदम ) अस्तमित हो जाता है । यह कारण बतलाते हु वे नक्षत्र देखकर वाक् विसर्जन करते हैं । परन्तु याज्ञवल्क्य इसका खण्डन करते हुए कहते हैं कि नहीं - ऐसा कभी नहीं करना चाहिए । " तदुतथा न कुर्यात् " याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यदि दैवयोग से आकाश में बदल छा जायेंगे तो आपके नक्षत्र कहां रहेंगे, कैसे नक्षत्र व्यवस्था बनेगी इसीलिए हमारे खयाल से जिस समय ठीक ठीक तरह से सूर्यास्त का ज्ञान हो जाय उसी समय वाक् विसर्जन कर देना चाहिए अर्थात् नक्षत्र दर्शन करने में लक्षणा माननी चाहिए । " क्व ते स्युर्यत् मेघः स्यात् । तस्मात् यथैवानुष्ठया स्तमितं मन्येत तदेव ( तस्मिन्नेव समये ) वाचं विसर्जयेत् ॥५ ॥
कितने ही आचार्य " भूर्भुवः स्वः " इस मन्त्र को बोलते हुए वाक् विसर्जन करते हैं | कारण इसका यह बतलाते हैं कि हमने प्रातःकाल से मौन व्रत धारण कर यज्ञ को श्रात्मसात् किया है, अब हम बोलने वाले हैं तो हमें ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जो यज्ञस्वरूप को पुष्ट करे । यज्ञ को बिखरने न दे अपितु जोड़ दे । यज्ञ को पुष्ट करने वाला एवं यज्ञ का संधान करने वाला तो यज्ञ ही हो सकता है । [ २३ ९ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण लोहे के बर्तन में लोहे की पाती लगाई जाती है । " भूर्भुवः स्वः " यह वाक् यज्ञ स्वरूप है । भूः पृथिवी लोक है, भुवः अन्तरिक्ष लोक है, स्वः सूर्यलोक है । तीनों अग्नि हैं । इन्हीं में तो ग्राहुति पड़ती है - अत-एव तीनों यज्ञस्वरूप हैं । इसलिए हमें इन्हीं से वाक् विसर्जन करना चाहिये ।
" अनेन हैके वाचं विसर्जयन्ति । भूर्भुवःस्वरिति ।
यज्ञमाप्याययामो यज्ञं संदध्मः - इति वदन्तः " ॥
भूर्भुवः स्वः स्वरूप यज्ञ से हम इस यज्ञ का संधान करते हैं - यह कारण बतलाते हुए कितने ही श्राचार्य “ भूर्भुवः स्वः ” इस मन्त्र से वाक् विसर्जन करते हैं । परन्तु याज्ञवल्क्य इसका खण्डन करते हुए कहते हैं कि ऐसा कभी नहीं करना चाहिए । क्योंकि जो भूर्भुवः स्वः स्वरूप वाक् विसर्जन करता है न तो वह यज्ञ को पुष्ट करता है एवं न यज्ञ का संधान ही करता है जैसा कि हम आगे बतलाने वाले हैं । " तदु तथा न कुर्यात् न ह स यज्ञमाप्याययति न संदधाति य एतेन वाचं विसर्जयति " ॥६ ॥
याज्ञवल्क्य अपना मत बतलाते हुए कहते हैं कि निम्नलिखित मन्त्र से ही वाक् विसर्जन करना चाहिए | " अनेनैव वाचं विसर्जयति " व्रतं कृणुताग्नि ब्रह्माग्निर्यज्ञो वनस्पतिर्य-ज्ञिय - इति इसी मन्त्र से वाक् विसर्जन करना चाहिए । यह जो व्रत है अर्थात् दुग्ध है - इस समय इस यजमान का यही यज्ञ है । वाक् विसर्जन काल में साक्षात् यज्ञ यह व्रत ही है । अन्न ही को व्रत कहते हैं । " अन्न ं वै व्रतम् " यह सिद्धांत है । व्रत अन्न का साधारण नाम है परन्तु यजमान चूंकि दूध के अलावा और कुछ नहीं खाता प्रतएव दीक्षित के अन्न को दूध कहा जाता है । दूध ही इसका व्रत है सायंकाल के समय यह दूध ही इस यजमान का असली यज्ञ है । " एष हि अस्यात्र यज्ञो भवति " अपि च यह दूध ही अर्थात् व्रत ही इस यजमान के आत्माग्नि की हवि है । दीक्षा से पूर्व जैसे अग्निहोत्र यज्ञ होता है - प्राज इस समय यजमान का अग्निहोत्र ही है । तात्पर्य यही है कि अग्निहोत्र यज्ञ में दूध की आहुति दी जाती है तथैव आज इस यजमान की आत्माग्नि में जो कि श्राहवनीयाग्नि है उसमें दूध की आहुति दी जाती है अतएव यह प्राहुति साक्षात् अग्निहोत्र है । यह मनुष्य भूखा होता है उसकी शांति खाली मन्त्र बोलने से नहीं होती । मन्त्र यज्ञ से उसका सन्तोष नहीं होता अपितु अन्नाहुति ही उसका सच्चा यज्ञ है । इसी अभिप्राय से कहते हैं । [ २४० ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मरण " एतद्धविः यथापुरा अग्निहोत्रम् " " संततं वास्यैतद्व्रतं भवत्यासुत्यायै ” " त्रिष्कृत्व ग्रह त्रिवृद्धि यज्ञः " ॥७ ॥
" अथाग्निमभ्यावृत्य वाचं विसृजते " [ २४१ ] दीक्षितव्रत ब्राह्मण करते हुए कहते हैं-है जो इस मन्त्र के अग्निहोत्रयत् - यजमान का यह अग्निहोत्र है । यजमान श्राज दीक्षित बना है । वाक् संयमन द्वारा नया यज्ञात्मा बना है । जैसे पैदा होते ही बच्चा खाऊं खाऊं करने लगता है वैसे ही श्राज यजमान का आत्मा खाऊं खाऊं कर रहा है । इस समय इसका असली यज्ञ यही है कि इसमें दूध की आहुति डाली जाय । आत्म यज्ञ का असली संधान यही है । इस प्रकार से " वृतं कृणुत " इत्यादि मन्त्र बोलता हुआ यजमान वाक् यज्ञ से दूध स्वरूप यज्ञ को संभरण करके दुग्ध यज्ञ को आत्मयज्ञ में प्रतिष्ठित करता है । " व्रतं कृणुत, व्रतं कृणुत — इसका तात्पर्य यही है कि दूध तैय्यार करो, दूध तैय्यार करो । वाक् यज्ञ से ' दूध को तैय्यार करवाना है - यही तात्पर्य है, एवं वाक् यज्ञ से तैय्यार करा - जब उस दूध को पी लेता है तो वास्तव में उसका आत्मा प्रतिष्ठित हो जाता है यदि यह कुछ न खाता तो आत्मा की प्रतिष्ठा सर्वथा उखड़ जाती । चूंकि दूध यज्ञात्मा की आत्मा में आहुति दे देता है प्रतएव इसका आत्मा प्रतिष्ठित हो जाता है । इसी अभिप्राय से कहते है । " तद्यज्ञेनैवेदद्यज्ञं संभृत्य यज्ञे यज्ञं प्रतिष्ठापयति " ऐसा करता हुआ यह यजमान यज्ञ से ( दूध से ) यज्ञ को ( आत्मा को ) वितत करता है । मनुष्य जब अन्न खा लेता है तो उसमें आगे काम करने की शक्ति श्रा जाती है । आज यजमान ने दूध पीलिया है अतएव इसका आत्मा बलिष्ठ हो गया है - बस इसी अभिप्राय से " यज्ञेन यज्ञं संतनोति " यह कहा है । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि सुत्यापर्यन्त यजमान का यही व्रत रहता है अर्थात् दीक्षा के अन-तर होने वाले सुत्याकर्म पर्यन्त इसे दूध ही पीना चाहिए । पूर्वोक्त मन्त्र को तीन दफे बोलना चाहिए क्योंकि यज्ञ त्रिवृत् ही होता है । उवथ, अर्क अशिति - यज्ञ के तीन अवयव होते हैं । देवता त्रिसत्य होते हैं । देवताओं के लिए ही तो यह यज्ञ किया जाता है अतएव तीन दफे बोलना चाहिए । वाक्विसर्जन आहवनीय अग्नि के अभिमुख होकर करना चाहिए । यह बतलाते हैं - यह यजमान भग्नि की परिक्रमा करके वाक् विसर्जन करता हैः-" भूर्भुवः स्वः " इस मन्त्र का पुनः खण्डन करते हुए एवं स्वपक्ष की प्रशंसा वह दीक्षित न यज्ञ को आप्यायित ही करता है एवं न यज्ञ का संधान ही करता अलावा अन्य मन्त्र से ( भूर्भुवः स्वः से ) वाक् विसर्जन करता है ' --
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण " न ह स यज्ञमप्याययति न संदधाति योऽतोऽन्येन वाचं विसृजते " । एवं जो दीक्षित व्रतं कृरणत व्रतं कृणुत - यह मन्त्र बोलकर वाक् विसर्जन करता है वह पहले-पहल बोलता हुआ सत्यावाक् बोलता है । " दूध तैय्यार करो यह जो इसका कहना है वह वास्तव में सच्चा है । सत्यावाक् से वाक् विसर्जन करना बड़ी ही उत्कृष्टता है । इसी से वाक् विसर्जन करना चाहिए । यही तात्पर्य है: -" स प्रथमं व्याहरन्त्सत्यं वाचोऽभिव्याहरति ॥८ ॥
इसका अर्थ करते हैं: -मन्त्र का पहला हिस्सा है । " व्रतं कृणुत व्रतं कृणुत " इसका अर्थ तो स्पष्ट ही है । दूसरा भाग है " श्रग्निर्ब्रह्म । अग्नि वास्तव में ब्रह्म है । ब्रह्म के पर, परापर एवं अपर - यह तीन भेद हैं । परब्रह्म को अव्यय कहते हैं यह श्रालम्बन स्वरूप है | विश्वातीत है अतएव इसे प्रविविक्त ब्रह्म भी कहा जाता है । परापर ब्रह्म को अक्षर ब्रह्म कहते हैं । यह कारण ब्रह्म है इसे ही प्रविष्ट ब्रह्म कहते हैं एवं अपर ब्रह्म को क्षर ब्रह्म कहते हैं । यही सृष्ट ब्रह्म कहलाता है । इसी को यज्ञ - अक्षर कहते हैं । संसार में जो कुछ तुम देखते हो वह अग्नि ब्रह्म की ही महिमा है । अग्नि ही सब कुछ बना हुआ है । जो कुछ देख रहे हो उसका मूल तत्त्व अग्नि ही है । मूल को ही ब्रह्म कहते हैं । इसीलिए -" श्रग्निव ब्रह्म " यह कहा है । यही मूल तूल में परिणत हो जाता है । यही ब्रह्म यज्ञ बन जाता है । अग्नि ही तो यज्ञ बनता है । " अग्नि " व यज्ञः " तीसरा भाग है - " वनस्पतिर्यज्ञिय " - यह । वास्तव में वनस्पतिए यज्ञिय हैं । यदि वनस्पतिएं ( काष्ठादि ) न होते तो मनुष्य यज्ञ ही काहे से करे, अतएव हम कह सकते हैं वनस्पतिएं यज्ञिय हैं— न हि मनुष्या यजेरन् यद् वनस्पतयो न स्युः तस्मादाह वनस्पतिर्यज्ञिय इति ॥९ ॥
सायंकाल “ व्रतं कृणुत ” इत्यादि मन्त्र से दीक्षित यजमान वाक् विसर्जन करता है । यजमान ऋत्विजों के प्रति कहता है कि आप मेरे लिए अर्थात् ग्रात्मदेवताओं के लिए दूध तैय्यार कीजिए । “ व्रतं कृणुत " इसका यही तात्पर्य है । यजमान के इस कथनानुसार ऋत्विग् लोग यजमान के लिए दूध गरम करते हैं । अथास्मै ( यजमानाय ) व्रतं ( दुग्धं ) श्रपयन्ति ( ऋत्विजः इति शेषः । दूध को गरम क्यों करना चाहिए | क्यों न दीक्षित ठंडा दूध ही पीले, इसका कारण बतलाते हैं । जो मनुष्य दीक्षा लेता है वह मनुष्य मण्डली से हटकर देवताओं की ओर आ जाता है । आज यह यजमान दीक्षा के प्रभाव से देवताओं में एक हो जाता है अर्थात् देवताओं में इसकी गणना होने लगती है । यह भी एक देवता बन जाता है । देवताओं का जो अन्न है वह शृत होता है । जो हवि पकाया नहीं गया है ऐसा अत हवि [ २४२ ]