Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 261–270
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 261–270
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण देवताओं की चीज नहीं है । कारण इसका यही है कि देवता आग्नेय हैं । आग्नेय प्राण का नाम देवता है । देवता समष्टि का नाम ही सूर्य है । पूर्य अग्नि का पिण्ड है, उसमें जो कुछ डाला जाता है गरम हो जाता है | गरम चीज ही देवताओं को प्रिय है । जो वस्तु ठंडी रहती है वह ग्रासुर है । ठंडापना पानी का धर्म है । प्राप्य प्राण को ही असुर कहते हैं । जैसा कि ब्राह्मण के प्रारम्भ में विस्तृत रूप से बतला दिया गया है । औषधियों और पानी के मिश्रण से गौमाता के उदर में दूध बनता है । दूध में इसी-लिए तो -" श्रौषधीर्जग्ध्वा अपः पीत्वा तत एष रसः सम्भवति " यह कहा जाता है । कहना यही है कि दूध में पानी का हिस्सा मौजूद है । पानी का अधिष्ठाता वरुण है । वरुण असुर है । देवता विरोधी है अतः देवता को जो भी कुछ दिया जाता है अग्नि पर पका कर प्राप्य प्राण स्वरूप असुर का नाश करके ही दिया जाता है । जो अन्न जला हुआ होता है वह निर्ऋति देवता को दिया जाता है । जलना ही निॠति का स्वरूप है । इसीलिए " पाम्मा वै निर्ऋतिः " " धोरा: वं निर्ऋतिः " यह कहा जाता है एवं जो सर्वथा अपरिपक्व है वह रौद्र कहलाता है, एवं जो परिपक्व होता है वह देव कहलाता है । यो विदग्धः स न तो योऽतः स रौद्रो यः शृतः स दैवत्वाय " देव कहने का तात्पर्य यही है कि यह यजमान देवता है । सामान्य मनुष्य नहीं है । देवता परिपक्व हवि को पसन्द करते हैं अतएव इसके लिए ऋत्विग् लोग दूध गरम करते हैं । " देवान्वा उपावर्तते यो दीक्षते स देवतानामेको भवति । शृतं वै देवानां हविः । नाश्शृतम् । तस्माच्छ्रपयन्ति । पक्व हवि देवताओं के लिए है । इससे कहीं यह नहीं समझ लेना चाहिए कि यह परिपक्व दूध इस ग्राहवनीय कुण्डस्थ अग्नि में ' डालना चाहिए । नहीं, नहीं । इस समय आहवनीय कुण्ड यजमान बना हुआ है । यजमान ही इस दूध को पीता है । यजमान अपनी आत्माग्नि में इसकी आहुति देता है । बाहर के आहवनीय अग्नि में नहीं डालता है । " तदेष एव व्रतयति नाग्नौ जुहोति " यहां इस कर्म में जिस लिए कि यजमान स्वयं ही दूध पी जाता है बाहर की अग्नि में नहीं डालता, इसकी उपपत्ति बतलाते हैं-तद्यदेष एव व्रतयति नाग्नौ जुहोति तदुच्यते - इति शेषः || १० || -ब्राह्मण के प्रारम्भ में ही हमने कहा था कि वैदिक ग्राख्यान, अध्यात्म, अधिभूत, अधिदैवत तीनों से सम्बन्ध रखते हैं । इसी परिभाषा के अनुसार " यज्ञेन वै देवा इमां जिति जिजु येषामियं जितिः " यह आख्यान तीनों पर घटता है । तीनों में से अधिदैवत और ग्रधिभूत ग्रर्थात् ऐतिहासिक अर्थ इस प्राख्याम का बतला दिया गया । अब इसका प्राध्यात्मिक अर्थ भगवान् याज्ञवल्क्य स्वयं बतलाते हैं— [ २४३ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण जायमानो वै जायते सर्वाभ्यो एताभ्यो एवं देवताभ्यः – यह सिद्धांत है । संसार के यच्चयावत् पदार्थ, क्या जड, क्या चेतन - इन अग्नि वायु आदि से ही उत्पन्न होते हैं । हमारा शरीर इन देवताओं से ही बना हुआ है । जितने देवता प्राधिदैवत मण्डल में हैं उतने ही अध्यात्म में हैं " यदेवेहतदमुत्र यद-मुत्र तदन्विह " यह हमारा घण्टाघोष है । कौन कौन से देवता हमारे शरीर में है - यह बात आगे जाकर स्पष्ट हो जायेगी । देवता सारे श्राग्नेय हैं । यह हम कई बार कह चुके हैं एवं दृढ़ता के लिए फिर कह देते हैं कि देवता वास्तव में आग्नेय ही हैं । अग्नि में सोम की आहुति पड़ने का नाम ही यज्ञ है । जिसका विस्तृत विवेचन ब्राह्मण के प्रारम्भ में ही कर दिया गया है । अग्नि अन्नाद अर्थात् प्रत्ता कहलाता है । एवं सोम अन्न कहलाता है । वह खाने वाले और खाद्य के अलावा और तीसरी वस्तु है ही नहीं । श्रग्नि और सोम के अलावा वास्तव में और कुछ नहीं है इसीलिए " अग्निषोमात्मकं जगत् " यह कहा जाता है । इसी अभिप्राय से ही -द्वयं वाऽइदमत्ता चैवाद्यं च - यह कहा जाता है । सोम अन्न है, अन्न अग्नि में आहुत होकर अग्नि ही बन जाता है । अग्नि में जाए बाद सोम और अग्नि यह दो व्यवहार नहीं होते अपितु " अग्नि " यही व्यवहार होता है । अत्ता ही का नाम रहता है । अन्न जब तक अग्नि के बाहर है तब तक वह अन्न है जहां अग्नि में आहुत हुआ कि स्वयं अत्ता बना । खाया हुआ ग्रन्न अग्निस्वरूप में परिणत हो आत्मा बन जाता है अतएव हम अग्नि सोम की मिलित अवस्था को " प्रत्ता " कहने के लिए तैय्यार हैं इसी अभिप्राय श्रुति कहती है: -तद्यदोभयं समागच्छत्यतैवाख्यायते नाद्यम् । श्रुति ने " द्वयं वाऽइदमत्ता चैवाद्यं च " - यह कहा है । अत्ता अग्नि ही है । अन्न सोम ही है । यह विश्वास दिलाती हुई - श्रुति आगे जाकर कहती है । स वै यः सोऽत्ताग्निरेव सः । श्रादित्यो वाऽग्रत्ता, तस्य चन्द्रमा एवा-हितय: ( श्राहुतयः ) चन्द्रमसंह्यादित्येऽश्रादधति — इत्यधिदैवतम् ( शत ० १०/६/२/१ ) अधिदैवत मण्डल में इसत्ता - आद्य को सूर्य और चन्द्र नाम से व्यवहृत किया जाता है । सूर्य ता है, चन्द्रमा अन्न है । हमें अध्यात्म का विवेचन करना है । अध्यात्म मण्डल में प्रत्ता प्राण को कहते हैं । अद्य अन्न को कहते हैं । हम अपने शरीर पर जहां भी कहीं हाथ लगाते हैं - उसे गरम पाते हैं । यह गरमाई इसी प्राण की है जो कि अग्निस्वरूप है । यह अग्नि धक् धक् करता हुआ प्रज्वलित रहता है, एवं साथ ही में अनवरत खर्च भी होता रहता है । कान नाक बन्द करने पर जो एक शब्द सुनाई पड़ता है वही इसी शरीरस्थ प्राणाग्नि का शब्द है-प्राधिकर्ण उपशृणुयात् स एषोऽग्नेखि प्रज्वलतोरथरस्येवो शन्दिस्तं यदा न शृणुयात् तदप्येवमेवविधात् ( ऐ. आ. ) तात्पर्य कहने का यही है कि शरीरस्थ प्राण - अग्नि ही है । इस प्रारण अग्नि में अन्न की प्राहुति पड़ती रहती है । इसी से अग्नि की स्थिति रहती है । अग्नि सोमात्मक इस यज्ञ से ही मनुष्य की जिन्दगी [ २४४ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्राह्मणं दीक्षितव्रत ब्राह्मणं रहती है | संसार के यच्चयावत प्राणिमात्र इसी यज्ञ से जीवित रहते हैं । सर्वत्र यज्ञ ही जीवन का एक-मात्र कारण है । त्रैलोक्य में यज्ञ भगवान् व्याप्त हो रहे हैं । यह श्रग्नि की ही महिमा है । अग्नि का नाम ही देवता है । प्राणिमात्र को जो हम चलते फिरते देखते हैं । वह वास्तव में ग्रग्नि भगवान् का चलना फिरना है । सर्वत्र अग्नि की ही विजय हो रही हैं । बस इसी अध्यात्म विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं: -" यज्ञेन वै देवा इमां जिति जिग्युर्येषामियं जितिः " इति । देवताओं ने इसी अग्नीसोमात्मक यज्ञ द्वारा उस रूप को प्राप्त किया है एवं कर रहे हैं जो कि इनकी जय आज सर्वत्र देखी एवं सुनी जाती है । यज्ञ का सार भाग आहुति ही है । यदि अन्न न खाँय तो एकदम शरीर में शिथिलता आ जाय जब तक अन्न खाते रहते हैं तभी तक शरीराग्नि स्थित रहता है । ग्रन्न ही करामात है । इसीलिए भाषा में - " पडै तीन पाव चून पेट में जद फड़के बोटी बोटी " यह कहा जाता है । जिस समय हम अन्न खाते हैं तो खाने के साथ ही यज्ञ प्रारम्भ हो जाता है । अन्न की अर्थात् सोम की प्राणाग्नि में प्राहुति होने लगती है । इसीका तो नाम यज्ञ है । यह अन्न अर्थात् प्राहुति शरीर में जाकर ऊर्क् स्वरूप में परिणत हो जाती है । ' रसासृङ्मेदोमांसादि ' के अनन्तर अन्न ऊक् रूप में परिणत हो जाता है । ऊ एक प्रकार का स्फूर्तिप्रद प्राण है । शरीर पर चेहरे पर जो एक दम-दमाहट रहती है उसी का नाम ऊ है । ऊ अन्त में प्राण में परिणत होता है । वही प्राणाग्नि कह-लाता है । ऊ ही प्राणस्वरूप में परिणत है । इसीलिए यज्ञ का " नोकं प्रारणा नामन्योन्यपरिग्रहो -यज्ञः " यह भी लक्षण किया जाता है । यह प्राण असल में आहुति ही तो है । आहुति ही तो यज्ञ का सार भाग है । आहुति से जैसे यह प्रारण बनता रहता है, वैसे ही खर्च भी होता रहता है । हमारे शरीर की जो रोमावलियां हैं, उनके द्वारा प्रतिक्षण प्राणमात्रा खर्च होती रहती है । परन्तु साथ ही में प्रती भी रहती है । इसीलिए कमजोरी नहीं मालूम होती । यदि आमद से खर्च ज्यादा हो जाता है तो उसी समय प्राण की कमी का अनुभव हो जाता है । यदि हम हिम्मत से ज्यादा यात्रा कर डालते हैं तो एक-दम थक जाते हैं अन्त में हमें विश्राम के लिए बैठना पड़ता है । कारण इसका प्राण का अधिक मात्रा में खर्च होना ही है । यह प्राण प्रतिक्षण खर्च होता रहता है । परन्तु हमें मालूम नहीं होता कि कैसे खर्च होता है? कब होता है? घटपटादिवत् हम प्राण को खर्च होते हुए नहीं देखते । यहां पर इतना और समझ लेना चाहिए कि हमारा यह प्राणभाग - यज्ञ का सारभाग, बाहर निकल कर उस व्यापक प्राण-मण्डल में जा मिलता है जिसे कि हम अधिदैवतमण्डल कहेंगे । हमारे अध्यात्मयज्ञ का सारभाग हमारे से खिंच कर बाहर निकल कर उन प्राण देवताओं में जा मिलता है । अन्न खाते हैं इसका तो हमें पता रहता है परन्तु भीतर जाके अन्न द्वारा यज्ञ क्यों कर होता है । इस यज्ञ का हर सामान्य मनुष्य जरा भी रहस्य नहीं जानते | इस यज्ञ के छिपने का एकमात्र साधन हमारा शिरोभाग ही है । इसी शिरोभाग को यूप कहते हैं । यूप सूर्यस्थानापन्न है, यह हम पूर्व के प्रकरणों में बतला आए हैं । पृथिवी अन्तरिक्ष और द्यौ इन तीनों लोकों के रस से हमारे शरीर का निर्माण होता है । जो पार्थिव प्राण है वह अपान कह-लाता है । प्रान्तरिक्ष प्राण व्यान कहलाता है एवं सौर प्राण प्राण ही कहलाता है । इन तीनों में व्यान सारे शरीर में रहता है । व्यान वायुस्वरूप है । यह वायु रक्तादि का सञ्चार करता हुआ सारे शरीर में [ २४५ ]
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तृतीय काण्ड ( ० २ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण व्याप्त रहता है । वायु से ही शरीर की स्थिति है । प्राण और प्रपान की सत्ता व्यान पर अवलम्बित हैं यदि वायु का व्यापार बन्द हो जाय तो न प्रारण व्यापार हो न प्रपान व्यापार हो । वातावरण ही अच्छी बुरी स्थिति का कारण है । इसीलिए श्रुति कहती है ।
न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन ।
इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥
यह वायु अर्थात् व्यान - प्राण एवं प्रपान के बीच की वस्तु है । प्राण सूर्य की चीज है । सूर्य ही में सारे देवता रहते हैं एवं पार्थिव आग्नेय देवता अपान में रहते हैं । दोनों देवता इस मध्यस्थ व्यान की हीं उपासना करते हैं अर्थात् इसी के आधार पर सारे देवताओं की सत्ता है । इसीलिए — " मध्ये वामनमासीनं सर्वे देवा उपासते " यह कहा जाता है । बतलाना इस प्रपञ्च से हमें यही है कि प्रारण सूर्य की वस्तु है एवं इसका प्रधान स्थान शिरोगुहा है । मस्तक में ही सौर प्राण की प्रधानता रहती है । सूर्य बुद्धि प्रदाता है । सोचने के विज्ञान का काम इसी सौर प्राण से होता है । हम सोचने का काम मस्तिष्क से लेते हैं अतएव मानना पडता है कि मस्तक सौर प्राणयुक्त है । जैसे दीपरश्मियां दीप से अभिन्न हैं अतएव हम इन्हें भी दीप कह सकते हैं । तद्वत् सौर प्रारण चूँकि सूर्य्यं से अभिन्न हैं अतएव हम सौरप्राण - प्रधान मस्तक को सूर्य कह सकते हैं । प्रकृति मण्डल में - सूर्य में ही पारमेष्ठ्य - सोम की आहुति पड़ती है । एवमेव यहां भी सूर्य स्थानापन्न मुख में ही आहुति पड़ती है । प्राहुति पड़ती है इतना ही तो हमें ज्ञान है । बाकी हम कुछ नहीं जानते, सिवाय यूप के ( सूर्य स्वरूप मुख्य के ) हम यज्ञ के विषय में और कुछ नहीं जानते, एवं जो प्रारणभाग, सारभाग हमारे में से निकल जाता है उसकी भी हमें जरा भी खबर नहीं रहती । शरीर हमारा वैसा रहता है जैसे कि मधु निकलने के बाद पुष्प । पुष्प में से मधु कैसे निकल गया, भौरां कैसे एवं कब उस रस को चूस गया । जैसे इस बात का पता लगना कठिन है वही हालत इस प्राण के विषय में है जो कि यज्ञ का सारभाग है | संपूर्ण कथन का तात्पर्य यही हुआ कि हम यज्ञ स्वरूप हैं । इसी यज्ञ से अध्यात्म आग्नेय-देवताओं की विजय हो रही है । यदि अन्न न खाया जाता तो यज्ञ नहीं होता । यज्ञ नहीं होता तो शरीर की गर्मी ( देवता ) निकल जाती । देवता लोग इस यज्ञ को मनुष्यों से छुपाते हैं । सामान्य मनुष्य नहीं जानता कि अन्न खाने से अध्यात्म यज्ञ कैसे होता है । प्राण प्रतिक्षण खर्च होता है परन्तु हम नहीं जानते । देवता सदा हमारे प्राण को चूसा करते हैं । हम यज्ञ - रहस्य को नहीं जानते इसका एकमात्र कारण मुख है । मुख ही ने यज्ञ को छुपा रक्खा है इसीलिए मुख को यूप कहते हैं । यूप का अर्थ छुपाना ही है । हम मुख ही मुख को देखते हैं । असली यज्ञ का हमें जरा भी पता नहीं है । बस इसी अध्यात्म यज्ञ को लक्ष्य में रख कर याज्ञवल्क्य कहते हैं— " यज्ञेन वै देवाः इमां जिति जिग्युर्येषामियं जितिः । ते होचुः कथं न इदं मनुष्यैरनभ्यारोह्यं स्यादिति, ते यज्ञस्य रसं धीत्वा यथा मधुकृतो निर्धयेयु-वि यज्ञं यूपेन योपियत्वा तिरोऽभवन् । अथ यदेनेनायोपयंस्तस्माद्यूपो नाम ॥११ ॥ "
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मणी भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि सामान्य मनुष्य जो कि यथाजात है, निर्बुद्धि हैं वे अवश्य ही इसे न जानते न सुनते, अर्थात् न पढ़ते, न मनन करते, परन्तु जो महर्षि हैं, वैज्ञानिक हैं, साहसिक हैं, तपोमूर्ति हैं । वे इस रहस्य को करकमलवत् देखते हैं एवं जानते हैं । उन्हें प्रकृति का सारा रहस्य मालूम है । अध्यात्म - यज्ञ के सारे रहस्यों से वे परिचित हैं । जैसा प्राकृति देवता पारमेष्ठ्य सोम प्राहुति से अपने प्राणभाग को संभूत कर स्वयज्ञ किया करते हैं तद्वत् महर्षियों ने स्वात्मयज्ञ को उसी प्रन्नाहुति क्रम से संभृत किया अर्थात् पूरा किया । अर्थात् जो वैज्ञानिक मनुष्य होते हैं वे जान जाते हैं कि आहुति ही इस अध्यात्म यज्ञ का सार भाग है । इसमें अन्न की श्राहुति दे दो । निकला हुआ यज्ञ का सारभग अभी पूरा हो जायगा । इसी अभिप्राय से कहते हैं: -" तद्वा ऋषीणामनुश्रुतमास । ते यज्ञं समभरन् यथायं यज्ञः ( प्रकृति-देवानाम् ) संभृतः " दूध क्यों पीना चाहिए " इसकी ओर ध्यान दिलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि आज यह यज-मान सोमभाग में यज्ञ बना रहा है । जो सामान्य मनुष्य होता है उनका आत्मा जयज्ञिय है । श्रयज्ञिय तो नहीं है किन्तु उसमें पार्थिव प्राण उल्वण रहता हैं एवं दिव्य प्राण अनुत्वा रहता है परन्तु जो बंध उपायों से दिव्याग्नि को आत्मसात् कर लेता है वही वास्तव में यज्ञिय मनुष्य कहलाता है । यज्ञ सूर्य की वस्तु है । उस सौर प्राण को दिव्याग्नि को आत्मसात् करना अपने को यज्ञस्वरूप बनाना है । जो श्राहिताग्नि होते हैं वे यज्ञस्वरूप कहलाते हैं क्योंकि उनमें दिव्याग्नि उत्वरण रहता है । यजमान ने आज दीक्षा लेकर दिव्याग्नि को आत्मसात् कर रक्खा है यही तो ग्रात्मा यज्ञान्त में " देवात्मा " नाम धारण करता हुआ उत्पन्न होगा । यह दिव्यात्मा ही तो इस यजमान को, मनुष्य श्रात्मा को स्वर्ग ले जायगा । अस्तु, कहना सिर्फ यही है कि दिव्याग्नि के आत्मसात् करने के कारण यजमान यज्ञस्वरूप है: -" एष वाऽत्र यज्ञो भवति यो दीक्षते " यह यजमान ही इस आत्मयज्ञ का वितान करता एवं अन्त में बाहर की अग्नि में सोम डाल यह यजमान ही, अपने इस दिव्यात्मा को उत्पन्न करता है अर्थात् पूरा स्वल्प बना लेता है । स्वयं दिव्याग्निमय बन जाता है । जिस दिव्याग्नि का छान्दस अग्नि का आत्मा में प्रधान होता है, वही गर्भ कहलाता है । सोम यागानन्तर यही गर्भ बाहर निकलता है ----" एष ह्य ेनं तनुते, एष एनं जनयति " आज यजमान यज्ञस्वरूप बना हुआ है । यज्ञात्मामय बना हुआ है । इस यज्ञात्मा का प्राणभाग प्रातः काल से सायं काल तक अधिक परिश्रम के कारण बाहर निकलता है । प्राणभाग वित्रस्त हो गया । है । यज्ञ का सारभाग देवताओं द्वारा निर्धीत एवं विदुग्ध हो गया है । बस दूध मिलाकर दूध की आहुति देकर उस यज्ञात्मा को प्राप्यायित करता है । अर्थात् यह भी अग्नि ही है । बज की तृप्ति के लिए यज-मान ही व्रत का पालन करता है । अर्थात् स्वयं ही दूध पीता है । बाहर की अग्नि में नहीं डालता है । " तद्य देवात्र यज्ञस्य निर्धीतं तद्विदुग्धं तदेवैतद् पुनराप्याययति यदेष एव व्रतयति नाग्नौ जुहोति " । [ २४७ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० २ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण याज्ञवल्क्य कहते है कि यदि यजमान अपने आत्माग्नि में दूध की आहुति न देकर बाहर के श्राहवनीयाग्नि में आहुति देगा तो अपने यज्ञ को प्राप्यायित नहीं कर सकेगा, एवं साथ ही में जिस सोमयाग को यह करना चाहता है वह भी प्राप्यायित नही होगा । भूखा मनुष्य निर्बल रहता है । न वह शरीरयज्ञ को संभाल सकता है । न बाहर के यज्ञ को संभाल सकता है अतः बाहर यज्ञ का एवं आत्मयज्ञ का दोनों का श्राप्यायन करने के लिए अपने में तो दूध की आहुति डालनी चाहिए । " न हाप्याययेद्य दग्नौ जुहुयात् " परन्तु साथ ही में याज्ञवल्क्य कहते हैं कि उस दूध को आहुति केमाफिक ही समझे | मै भूखा हूं इसलिए दूध पी रहा हूं यह न समझे । तात्पर्य यही है कि यह दूध नए ग्राहित - यज्ञात्मा के लिए पिया जाता है न कि मानुष आत्मा के लिए । मिल उसे भी जाता है, यह बात दूसरी है, किन्तु दिया उसी के उद्देश्य से जाता है । वह यज्ञाग्नि वास्तव में साक्षात् श्राहवनीय अग्नि है । उसमें आहुति देना वास्तव अग्निहोत्र करना है इसलिए उस दूध को इस भाव से भी पीना चाहिए कि मैं यज्ञ में आहुति दे रहा हूं । भूखा हूं इस खयाल से स्वाद ले लेकर केवल पेट भरने के भाव से जो दूध पिया जायगा वह मनुष्य
कर्म हो जायगा, इसलिए आहुति समझ कर पीना चाहिए ।
जुह्वदु हैव मन्येत नाजुह्वत् ॥१२ ॥
प्राणाग्नि में, दिव्याग्नि में इसे श्राप्यायित करने के लिए दूध की आहुति डाली जाती है । दूध पीने से यज्ञात्मा आप्यायित होता है अतः यजमान को दूध अपने आप पीना चाहिये । क्योंकि अपने श्राप पीना भी देवताओं में ही आहुति डालना है । हमारे शरीर में हुत दुग्ध भी ग्राहवनीयाग्नि की तरह देवताओं में ही जाता है । हमने बाहर की अग्नि में डाला ही नहीं फिर यज्ञ में कैसे पहुंचा क्योंकि यज्ञ देवता स्वरूप है एवं देवता शरीर के बाहर है इस भ्रम में नहीं पड़ जाना चाहिये । जो देवता प्रकृति मण्डल हैं वे वैसे से ही अध्यात्म मण्डल भी सारे देवता मौजूद हैं । ऐसी अवस्था में अध्यात्म में आहुति देना, देवताओं में ही आहुति देना है । कौन कौन से देवता हमारे शरीर में रहते हैं - यह बतलाते हैं । हमारे चक्षु में जो श्रोत्रादि प्राण है । यह सारे प्रारण मन से उत्पन्न हुए है अतएव मनोयुज् है । सारे प्रारण सदा मन से बद्ध रहते हैं । मन तीन प्रकार का समझना चाहिए । १ श्वोवसीयस २ सर्वेन्द्रिय ३ इन्द्रिय | अक्षर, क्षर एवं अव्यय समष्टि को आत्मा कहा जाता है । अक्षर अन्यय पुरुष की परा प्रकृति है, क्षर अव्यय पुरुष की अपरा प्रकृति है । अक्षर और क्षर, अव्यय पुरुष के बिना कभी नही रहते तीनों परस्पर अविनाभूत हैं । अतएव अक्षर और क्षर को भी पुरुष कह दिया जाता है । जैसा कि भगवान् कहते हैं ।
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्यय बिभत्र्त्यव्यय ईश्वर: ॥ [ गीता. १५ / १६-१७ ] [ २४८ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण इन तीनों पुरुषों में जो अव्यय पुरुष है उसकी श्रानन्दविज्ञान, मन, प्राण, वाक् ये पांच कलाएं हैं । इनमें से प्रानन्दविज्ञान मन का नाम ब्रह्म है । मन, प्राण, वाक् का नाम कर्म है जो आनन्दविज्ञान मन, इस ब्रह्म के सीगा का मन है वही श्वोवसीयस मन कहलाता है । इसी मन को अव्यय मन भी कहते है । यह मन शुद्ध ज्ञानस्वरुप है । इसी मन की प्रेरणा से कर्म वाला मन, जो कि इच्छात्मक है काम किया करता है । मन, प्राण, वाक् में जो मन है उसी का नाम सर्वेन्द्रिय मन है । इच्छा इसी का धर्म है श्रुति में बार बार स ऐक्षत, स तपोऽतप्यत, सोऽश्राम्यत् - यह लिखा रहता है इसमें जो ' स ऐक्षत ' है अर्थात इच्छा है वह मन का हिस्सा है ' तपोऽतप्यत ' प्राण का व्यापार है एवं सोऽश्राम्यत् वाक् का व्यापार है । आनन्द विज्ञान मन तीनों ज्ञान स्वरूप हैं! इससे मन का अर्थात् इच्छा मन का उदय होता है इच्छा से तप होता है इसी तप को प्रयत्न एवं कृति शब्द से भी व्यवहृत किया जाता है एवं तप से वाग् व्यापार होता है अर्थात भूत व्यापार होता है । इसी को चेष्टा भी कहते हैं । आत्मा - मन - प्राण - वाक् पर जाकर अपना स्वरूप समाप्त करता है अतएव " स वा एष आत्मा वाङ्मयः, प्राणमयो, मनोमयः - यह कहा जाता है मनोमय में जो मन है वह इच्छा स्वरूप है । यही प्रज्ञान मन कहलाता है यह उस ब्रह्मान्तर्गत शुद्ध ज्ञानस्वरूप मन के आलम्बन पर जो कि मन ग्रात्मा कहलाता है- अपना व्यापार करता है इसीलिए: -ज्ञानजन्या भवेदिच्छा इच्छाजन्या भवेत्कृतिः । कृतिजन्यं भवेत्कर्म तदेतत् कृतमुच्यते ॥ यह कहा जाता है । यह जो प्रज्ञानमन है वह पांचों ज्ञानेन्द्रियों पर एवं पांचों कर्मेन्द्रियों पर हावी रहता है । बिना इस इच्छा स्वरूप मन के, बिना प्रज्ञान के दसों इन्द्रियां बेकार है । यह प्रज्ञानमन इन दसों इन्द्रियों का बर्तन है । सूर्य के ऊपर हमने परमेष्ठिमण्डल बतलाया है एवं उसे सोममय बत-लाया है । यह जो सोम है वह ब्रह्मणस्पति सोम नाम से प्रसिद्ध है । संसार में अपवित्र भाव को दूर करने वाला यही सोम है । इसी ब्रह्मणस्पति सोम के लिए कहा जाता हैः— पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः । प्रतप्ततनूनं तदामो अश्नुते शृतास इद्वहन्तस्तत् समाशत || [ ऋ. ७/३/८ ] यह सोम जब तक स्वयंभूमण्डल की चेतना से युक्त नहीं होता जो कि स्वयम्भूमण्डल परमेष्ठि-मंण्डल से ऊपर है तब तक सोम ही कहा जाता परन्तु इसी सोम पर जब चित् का प्रतिबिम्ब पड जाता है तो यही सोम मन कहलाने लगता है । चित् ज्ञानशक्ति का नाम है । इस चित् को सोम के साथ सम्बन्ध हो जाने पर मन को प्रज्ञानमन कहने लगते है | चेतना का प्रतिबिम्ब - सोम, वायु और पानी तीनही पदार्थों पर पडता है । सूर्य का प्रतिबिम्ब जैसे तरल पदार्थों पर पडता है ठीक उसी प्रकार चेतना का जिसे कि चित् कहते हैं प्रतिबिम्ब इन्हीं पूर्वोक्त तीन पदार्थों पर पडता है । चित् के प्रतिबिम्ब का अर्थात् चित् के प्रभास का नाम ही जीव है । चिदाभास ही जीव कहलाता है एवं चित् ग्राहक है पानी, सोम, हवा ये तीन पदार्थ, अतएव अखिल ब्रह्माण्ड में जीव भी वायव्य, आप्य, एवं सौम्य तीन ही प्रकार उत्पन्न होते है । वायु श्रीर पानी वस्तुतः सोम की घन और तरलावस्था के नाम ही है । अतएव [ २४ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण तीनों सोम ही हैं । इसी सोम का नाम महान् है यही चित् के प्रतिबिम्ब का ग्राहक है । चिदात्मा की योनि है इसलिए: -" मम योनिमहद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ॥ यह कहा जाता है । कहना इस सारे प्रपंच से हमें यही है कि चिदनुगृहीत जो ब्रह्मणस्पति सोम है । उसी का नाम प्रज्ञामन है । जिस प्रकार ब्रह्मणस्पति सोम में चित् का सम्बन्ध हो जाता है । तद्वत सोम से नीचे रहने वाले अर्थात् परमेष्ठि मण्डल से अधोभागस्थित सौर प्राण में भी चित् का सम्बन्ध होता है । वह चिदनुगृहीत जो सौर प्रारण है उसी का नाम " विज्ञान " पड़ जाता है । सूर्य प्रारण क्रियास्वरूप है क्रिया प्रातिस्विकरूपेण सर्वथा जड़ है परन्तु चित् के सम्बन्ध में हो जाने से क्रियास्वरूप सौरप्राण विज्ञान कहलाने लगता है । चिदनुगृहीत इस सौर प्रारण का, विज्ञान का प्रज्ञानमन से जब सम्बन्ध हो जाता है तो यही प्रज्ञा - मन " प्राज्ञात्मा " कहलाने लगता है । इस प्रज्ञानात्मा में प्रज्ञामन और सौर प्रारण अर्थात् विज्ञान दोनों अंश मौजूद हैं । इस प्रकार प्रज्ञानात्मा यद्यपि भावद्वययुक्त है तथापि दोनों ( प्रज्ञा और प्राण ) ऐसे मिल रहे हैं कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता इसलिए श्रुति कहती है-" या वै प्रज्ञा सः प्राणः, यः प्राणः सा प्रज्ञा । सह ह्य ेतावस्मिन् शरीरे - स वा एष प्रज्ञानात्मा विज्ञानात्मना संपरि-वसतः सहो तिष्ठतः । श्रपि च वक्तो गच्छति । " इस प्रज्ञानात्मा के आधार पर ही चक्षु, श्रोत्र, वाक्, इत्यादि ज्ञानेन्द्रियाँ एवं कर्मेन्द्रियाँ अवलम्बित रहती हैं । जब तक आत्मा है तब तक सारी इन्द्रियों की स्थिति है । इसी प्रज्ञानात्मा के प्राधार पर इनकी ( इन्द्रियों की ) उत्पत्ति होती है एवं उत्पन्न होकर सारी इन्द्रियाँ इसी प्रज्ञानात्मा से बद्ध रहती है । प्रज्ञान मन का नाम है । इसी के आधार पर सारे देवता इसी से बद्ध होकर रहते हैं । इन इन्द्रियों को प्रारणशब्द से कहा जाता है । चक्षु भी प्राण है, श्रोत्र भी प्राण है, वाक् भी प्राण है । सब प्राण ही प्राण हैं, पर सारे प्राण - दसों प्राण, अर्थात् दसों इन्द्रियाँ इस प्रज्ञान मन से उत्पन्न होती हैं । इसी पर रहती है । इसी अभिप्राय से कहते हैं--" इमे वै प्रारणा । मनोजाता मनोयुजः " । पांच कर्मेन्द्रियाँ हैं, पांच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, इन दसों इन्द्रियों का अधिष्ठाता यह मन ही है, जो कि प्रज्ञामन नाम से व्यवहृत होता है । यह मन सारी इन्द्रियों में रहता है । इन्द्रियों में संकल्प विकल्प धर्मा यह मन रहता है । चूंकि सारी इन्द्रियों का यह मन अधिष्ठाता है । अतएव इसे सर्वेन्द्रिय मन कहा जाता है । एक ही प्रज्ञामन पांचों ज्ञानेन्द्रियों में जाकर ज्ञानस्वरूप बन जाता है एवं कर्मेन्द्रियों में जाकर कर्म स्वरूप बन जाता है । एक ही मन ज्ञान कर्म भेद से उभयात्मक है । इसलिए — " उभयात्मकमत्रमन संकल्प विकल्पम् " ( सांख्य का ) - यह कहा जाता है । इन्द्रियों का धर्म सर्वथा नियत है । चक्षु से रूप ही का प्रत्यक्ष होता है । कान से शब्द ही का प्रत्यक्ष होता है । सारी इन्द्रियाँ अपने - अपने [ २५० ]
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तृतीय काण्ड अ ० २ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मणे विषयों में नियत हैं । एक इन्द्रिय अन्य इन्द्रिय के विषय का अनुभव नहीं कर सकतीं । यही विज्ञान नियतविषय च इन्द्रियों का लक्षण है । यह प्रज्ञामन दसों इन्द्रियों का अनुभव करता है । चक्षु पर बैठा हुआ प्रज्ञामन रूप का संकल्प विकल्प करता है । श्रोत्र पर बैठा हुआ प्रज्ञामन शब्द का संकल्प विकल्प करता है | चूकि प्रज्ञान मन सारी इन्द्रियों में व्याप्त है अतएव इस प्रज्ञामन को नियतविषयाभावात् इन्द्रिय नहीं कह सकते । इसी लिए यह सर्वेन्द्रिय मन अनिन्द्रिय मन भी कहलाता है । विषय को लेना नौर छोड़ना, संकल्प करना, विकल्प करना यही इस अनिन्द्रिय मन काकाम है । हमारे शरीर में अग्नि वायु, आदित्य, चन्द्रमा और विश्वेदेव ये पांच प्रारण रहते हैं । यही पांचों अवान्तर भेदों से एक - एक इन्द्रिय कहलाने लगते हैं । अग्नि वाक् कहलाता है । हम जो कुछ बोलते हैं वह सब अग्नि देवता की, अग्नि प्राण की महिमा समझो । क च ट त प इत्यादि वर्णं प्राग्नेय हैं एवं वायु नासिका स्थानापन्न है । आदित्य से चक्षु वनते हैं | चन्द्रमा से मन बनता है, एवं विश्वेदेवों से श्रोत्र बनते हैं । विश्वेदेव और चन्द्रमा दोनों ही सोम हैं । चन्द्रमा भास्वर सोम का नाम है । विश्वेदेव दिक् सांम का नाम है । चन्द्रमा से मन बनता है इसी लिए - " मनश्चन्द्रेण लीयते - यह कहा जाता है । दिक् सोम से श्रोत्र बनते हैं । हमने मन तीन प्रकार के बतलाये थे - इन तीनों में तीसरा यही मन है जो कि चन्द्रमा से बनता है, एवं मन कहलाता है । प्रज्ञान मन का काम संकल्प - विकल्प है । प्रज्ञानमन संकल्प विकल्पात्मक है एवं यह इन्द्रिय मन सुखदुःख का अनु-भव करने वाला है । चक्षु से हम रूप देखते हैं । इस रूप से जो आनन्द आता है वह इस इन्द्रिय मन का काम है, एवं बुरे रूप को देखकर जो दुःख होता हैं वह भी इसी इन्द्रिय मन का काम है । सारी इन्द्रियों के सुखदुःख का अधिष्ठाता ' अनुभवकर्ता यही इन्द्रियमन है । यद्यपि काम करता है यह सारी इन्द्रियों का तथापि सुखदुःखानुभव के अलावा और इसका कोई काम नहीं हैं । इसका विषय नियत है । अतएव हम नियत विषय साधर्म्यात् मन को अवश्य ही इन्द्रिय मन कह सकते हैं । " मनः षष्ठानीन्द्रियाणि " से यही मन अभिप्रेत है । मन स्वयं इन्द्रिय है । इन्द्रियां बिना मन के काम कर नहीं सकती । श्रतएव इन सब के लिए एक स्वतन्त्र मन मानना पड़ता है जो कि अतिन्द्रिय कहलाता है । वही प्रज्ञानमन इस इन्द्रिय मन पर भी सवार रहता है । यह न होता तो इन्द्रिय मन भी अपने सुख दुःख विषय का अनुभव नहीं कर सकता । यह पांच देवता हमारे में प्रविष्ट हो इन्द्रिय कहलाने लगते इसी अभिप्राय से श्रुति कहती हैं-" अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशत् वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत्, श्रादित्यश्चक्षुर्भूत्वा प्रक्षिणी प्राविशत् दिशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशत् चन्द्रमा मनोभूत्वा हृदयं प्राविशत् । ( ऐ ० उ १० २।४ ) पूर्वोक्त श्रुति से सिद्ध हो जाता हैं कि सारे देवता हमारे शरीर में रहते हैं । इन सब का अधि-ठाता, मूल कारण यही प्रज्ञानमन है । सारे देवता इसी से उत्पन्न होते हैं, एवं इसी से युक्त रहते हैं । रूप, रस, गन्ध, शब्द स्पर्श इन सब का ज्ञान इसी प्रज्ञान मन से होता है इसीलिए - यह कहा जाता है । “ येन रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पशश्चि मैथुनान् । एतेनैव विजानाति " ( कठोपनिषत् २/१/३ ) [ २५१ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण [ २५२ ] दीक्षितव्रत ब्राह्मणं -" " इन सारे देवताओं का आत्मालम्बन यही प्रज्ञान है । इसीलिए श्रुति कहती है: " कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे, कतरः स श्रात्मा इति । येन वा पश्यति, येन वा शृणोति, येन वा गन्धानाजिघ्रति, येन वा वाचं व्याकरोति, येन वा स्वादु चास्वादुच विजानाति, यदेतद् हृदयं मनः । संज्ञानं, प्रज्ञानं, विज्ञानं, प्रज्ञानं, मेधा, दृष्टि तिर्मतिर्मनीषा जूतिः, स्मृतिः, संकल्पः, ऋतुरसुः कामो वश इति सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति । एष ब्रह्म, एष इन्द्र, एष प्रजापतिः, एते सर्वे देवा इमानि च पञ्चमहाभूतानि पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषि इत्येतानीमानि क्षुद्रमिश्रारणीव बीजानीतराणि चेतराणि चाण्डजानि, च जारुजानि च स्वेदजानि च चोद्भि जानि चाश्वागावः पुरुषा हस्तिनो यत्किञ्चेदं प्राणि जंगमं च पतत्रि च यच्च स्थावरं सर्वं तत् प्रज्ञानेत्रम् । प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं, प्रज्ञानेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा । प्रज्ञानं ब्रह्म इति । ( ऐ ० उप ० ५।१. ) ये सारे प्राण चूंकि मनोजव है प्रतएव दक्षऋतु स्वरूप हैं । " मयेदं करिष्ये " इस अध्यवसाय का नाम ऋतु है । कर्ता की प्रवृत्ति करना यही ऋतु है, एवं तत्परता का नाम ही दक्ष है । अध्यवसाय और व्यवसाय प्रत्येक कार्य दो भागों में विभक्त रहता है । श्रध्यवसाय को ब्रह्म कहते हैं एवं व्यवसाय को, कार्य तत्परता को दक्ष कहते । मन इच्छा करता कि यह करू ं , उसी समय प्रारण व्यापार हो पड़ता है । प्राण व्यापार होते ही हाथ पैर काम करने लगते हैं इसी का नाम दक्ष होता है । सारे प्रारण देवता ऋतु दक्ष स्वरूप है । अध्यवसायपूर्वक ही - इच्छापूर्वक ही व्यवसाय होता है । इसी अध्यात्म विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-" इमे वै प्रारणा, मनो जाता, मनोयुजो दक्षक्रतवः प्रज्ञान मन से उत्पन्न होने वाले एवं प्रज्ञान पर ही प्रतिष्ठित रहने वाले प्राण देवता कौन कौन से हैं, यह बतलाते है । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इस यजमान की जो वाक् है अर्थात् क - च - ट - त- पात्मिका वर्णात्मिका बोली है, वही अग्नि है । अग्नि ही तो वाक् स्वरूप में परिणत होकर मुख में घुसा हुआ है । ' वागेवाग्निः ' इति । अग्नि के अनन्तर नम्बर आता है - वायु का । यह वायु मित्रावरुणस्वरूप है । नासिका में जो श्वास - प्रश्वास आता है जो कि वायु है वह मित्रावरुण कहलाता है । श्वास का नाम मित्र है । प्रश्वास का नाम वरुण है | श्वास ही को प्राण कहते हैं । सूर्य से आते हुए का नाम प्राण है एवं वापस जाते हुए का नाम उदान है । जो वस्तु स्नेहन करने वाली है उसे वैदिक परिभाषा में मित्र कहा जाता है । एवं जो अपने तरफ जाने वाली वस्तु है उसे वरुण अर्थात असुर कहा जाता है । मित्र, वरूण, प्राण उदान का नाम ही नहीं है । अपितु संसार के यच्चयावत् पदार्थ मित्र एवं वरुण कहलाते हैं - इसलिए खगोल के पूर्व कपाल को मित्र कहा जाता है एवं पश्चिम कपाल को वरुण कहा जाता है अतएव च " अहर्वे मित्रम्, रात्रि वरुणः " यह कहा जाता है आते हुए का नाम मित्र है, जाते का नाम वरूण है ।