Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 271–280

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 271–280

पृष्ठ 271

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण प्राण आते हुए का नाम है अतएव इसे मित्र कहते हैं । उदान जाता हुम्रा है प्रतएव उसे वरूण कहते हैं । प्रकृत में यही कहते हैं कि वाक् के बाद प्राणोदानस्वरूप मित्र वरुण देवता है । दोनों वायु स्वरूप हैं । " प्राणोदानौ मित्रावारुणी " वायु के अनन्तर है आदित्य । अध्यात्म में जो नेत्र हैं वे आदित्य स्वरूप हैं । इसलिए " चक्षुः सूर्यो प्रजायत " यह कहा जाता है । चौथा नम्बर है चन्द्रमा का इससे इन्द्रिय मन बनता है, एवं विश्वेदेवों से अर्थात् दिक् सोम से श्रोत्र बनते हैं । " श्रोत्रं विश्वेदेवाः ” । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि ग्राहवनीय अग्नि में आहुति डाली जाती हैं । इसी से हवन मान लिया जाता है । परन्तु अध्यात्म में सारे देवता मौजूद रहते हैं । फिर इस अध्यात्म यज्ञ को हम कैसे यज्ञ न माने । इन पूर्वोक्त सारे देवताओं में वह दुग्ध हुत श्राने ठीक है । जाता है अतएव " जुह्वदु हैव मन्येत " यह सोलह " एतासु हैवास्यै तद्देवतासु हुतं भवति ॥१३ ॥

दूध यजमान को ही पीना चाहिये । श्रात्माग्नि में ही दूध की आहुति देनी चाहिये न कि बाहर के आहवनीय अग्नि में । इसकी उपपत्ति बतला दी गई है । कई आचार्य इस दूध में पहले पहल दिन जौ और व्रीहि दोनों को पीस कर पटकते हैं । उनका मत है कि दीक्षा के दिन पहले पहल जब यजमान दूध पीये तो उसमें जौ और चावल दोनों का रस मिला लेना चाहिये । क्यों मिला लेना चाहिए - इसका कारण वे बतलाते हैं कि यजमान के आज यज्ञ का जो सारभाग देवताओं द्वारा निर्धीत हो गया है ( चूस लिया है ) एवं विदुग्ध हो गया है । इस व्रीहि और यव के रस से हम उस कमी को पूरी कर यजमान के इस यज्ञ प्राप्यायित करते हैं । तर्द्धके प्रथमे व्रतऽउभौ ब्रीहियवौ श्रावपन्ति, उभाभ्यां रसाभ्यां यदेवात्र यज्ञस्य निर्धीतं यद्विदुग्धं पुनराप्याययाम इति वदन्तः । यज्ञ का जो सार भाग निकल गया है अतएव यज्ञ विदुग्ध अर्थात् सार भाग-रहित हो गया है उसे इन दोनों के रस से वापस प्राप्यायित करते हैं । यह कारण बतलाते हुए कई एक प्राचार्य दीक्षाव्रत के प्रारम्भ के ही दिन में उस दूध में जो और चावल का सत्तू मिलाते हैं । अपिच वे प्राचार्य कहते हैं कि यजमान के लिए नियत जो गाय है उसका नाम व्रतदुधा है । इसका दूध यजमान ही पी सकता है अन्य नहीं । व्रतदुधा गाय यदि कारणवश न दुही जाय अर्थात् दूसरे तीसरे दिन यदि गाय का दूध किसी कार्यवश न दुहा जाय अथवा वह गाय ही बछड़ों को चुखवाने के कारण दूध न दे तो ऐसी हालत में व्रीहि और यव दोनों में से जिसकी इच्छा हो उसी को अन्न बनाले अर्थात् दुग्धाभाव में दोनों में से चाहे जिसको खाले । व्रतदुधा न दुहीत, ( दुह्यात् ) यस्यैवातः कामयेत तस्य व्रत कुर्यात् ” । इति-दूसरे तीसरे दिन यह यजमान दुग्धाभाव में व्रीहियव दोनों में से चाहे जिसको खा सकता है । इसके लिए मनाई नहीं है क्योंकि यजमान के लिए व्रीहि और यव दोनों ही प्रारम्भ के दिन अन्वारब्ध हो चुके हैं अर्थात् व्रत के अन्तर्गत हो चुके हैं । तात्पर्य कहने का यही है कि दीक्षा के दिन प्रथम- प्रथम जो अन्न दीक्षित खा लेता है ग्रन्त तक सुत्यापर्यन्त उसका वही व्रत रहता । उसे उसी व्रत का पालन [ २५३ ]

पृष्ठ 272

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण करना पड़ता है । मान लो पहले दिन उसने केवल दूध ही पीया है तो फिर अन्त तक उसे दूध ही पीना पड़ेगा । बीच में सिवाय दूध के और कुछ नहीं खा सकता । अतएव प्राचीनों का कहना है कि यजमान सिवाय व्रतदुधा के और किसी का दूध पी नहीं सकता है । यदि गाय का दूध न निकाला जाय अथवा गाय ही दूध न दे तो फिर यजमान को भूखे मरना पड़ेगा और कुछ खा नहीं सकता है । क्योंकि व्रत केवल दूध ही का ले रक्खा है । अतएव हमारी राय में अर्थात् व्रत के आरम्भ में, व्रत में शामिल करने के लिए व्रीहि और यव दोनों को दूध में प्रवश्य मिला देना चाहिए | इससे ताकत भी दूध की अपेक्षा कुछ अधिक होगी एवं दूसरे दिन यदि गाय दूध न देगी तो व्रीहि यव दोनों में से एक को खाकर यह यज्ञ को ( आत्मा को ) आप्यायित कर सकेगा । अतएव व्रत में शामिल करने के लिए पहले दिन दूध ' में अवश्य ही को व्रीहि - यव का सत्तू डाल देना चाहिए । " एतदु ह्यं वास् ता उभौ व्रीहियवान्वारब्धौ भवत इति ( च वदन्ते इति शेषः ) परन्तु भगवान् याज्ञवल्क्य इस पक्ष का खण्डन करते हुए कहते हैं कि नहीं यजमान कभी ऐसा न करे । अर्थात् प्रथम दिन में व्रीहि और यव न डाले " तदुतथा न कुर्यात् " याज्ञवल्क्य इस मत का खण्डन करते हुए कहते हैं कि जो यजमान् इस दूध में ब्रीहि और यव दोनों डालता है वह यज्ञ को जरा भी प्यायित नहीं करता है । उलटा आलसी और बनाता है । दूध सात्विक अन्न है । यज्ञिय मनुष्य की दूध का ही सेवन करना चाहिए । अन्न में तो एक प्रकार की मादकता है । अतः उससे तो बजाय पुष्टि के हानि ही होती है । " न ह स यज्ञमाप्याययति, न संदधाति, य उभौ व्रीहियवावावपति ' इति ' याज्ञवल्क्य कहते हैं आवश्यकता तो दोनों ही की नहीं है । परन्तु डालो भी तो दोनों में से एक को डाल दो । दोनों ( व्रीहियव ही को डालने की श्रावश्यकता नहीं है इसलिए यदि डालना मुनासिब समझते हो तो दोनों में से एक ही डालना चाहिए । " तस्मादन्यतरमेवावपेत् " परन्तु अन्त में इस अन्यतर पक्ष का भी खण्ड कर देते हैं । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि दर्शपूर्णमा -सेष्टि करने वाला मनुष्य ही सोमयाग कर सकता है । इससे मान लेना पड़ता है कि यह दीक्षित् दर्श-पूर्णमासेष्टि किया । ही आहुति दी जाती है । दर्शपूर्ण -' हुआ है । दर्शपूर्णमास में व्रीहि यव के पुरोडाश की मास में इस यजमान की व्रीहि और यव दोनों ही हवि हो जाते हैं । दोनों को यजमान ने दर्शपौर्णमास में ही आत्मसात् कर डाला है । " हविर्वाऽग्रस्यैता ऽउभौ व्रीहियवौ भवतः " तो बस इस सोमयाग से पूर्व दर्शपूर्णमास में व्रीहि और यव दोनों इस यजमान की हवि हो जाते हैं । उन्हीं से व्रीहि और यव ग्रन्वारब्ध हो जाते हैं अर्थात् पहले दिन दूध में व्रीहि और यव डालने का सबसे बड़ा भारी कारण तुम यही बतलाते है कि पहले दिन व्रीहियव को दूध में डालने से दोनों अन्वारब्ध हो जायेंगे । यजमान के आत्मसात् हो जायेंगे । व्रत [ २५४ ]

पृष्ठ 273

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण के अन्तर्गत आ जायेंगे । ऐसा होने से यदि किसी दिन गाय दूध न देगी तो यजमान अन्वारब्ध होने के कारण दोनों में से चाहे जिसको खाकर अपने श्रात्मयज्ञ को प्राप्यायित कर लेगा । भूखा नहीं रहेंगा । परन्तु हम कहते हैं कि अन्वारब्ध मात्र के लिए आपको यह कष्ट उठाने की जरूरत नहीं है । क्योंकि यजमान ने दर्शपूर्णमास कर रक्खा है । यहाँ इसे व्रीहि और यव तो तभी से अन्वारब्ध है । अर्थात् आत्मसात् है । व्रत के अन्तर्गत है । अतः इसके लिए दीक्षा के दिन व्रीहि यव डालने की कोई मावश्यकता नहीं है - इसी अभिप्राय से कहते हैं— " स यदेवास्यैतौ हविर्भवतस्तदेवास्यैतावन्वारब्धौ भवतः । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि व्रीहि और यब अन्धारब्ध तो हैं ही अतः किसी दिन यदि व्रतदुधा का दूध न निकाले अथवा वह दे ही नहीं तो व्रीहि और यव दोनों में से जिसकी भी इच्छा हो उसका व्रत

कर ले अर्थात् उसे ही प्राहुति कर ले ।

" दद्युव्रतदुधा न दुहीत यस्यैवातः कामयेत तस्य व्रतं कुर्यात् ॥ १४ ॥

कई एक आचार्य- प्रथम व्रत में पहले दिन के दूध में सर्वोषधि और सर्वसुरभि श्रर्थात् पिप्पली आदि प्रष्टगन्ध डालते हैं । कितनों ही का मत है कि पहले दिन पीयेजाने वाले दूध में सर्वोषध और प्रष्ट-गन्ध डाल देनी चाहिए । कारण इसका यह बतलाते हैं कि यदि दीक्षित बीमार हो जाय तो इन पूर्वोक्त दोनों औषधियों में से जिसकी इच्छा हो, लेकर उस दूध में घोलकर उस औषधि से, उस व्रत से उसकी चिकित्सा करे । तात्पर्य यही है कि पहले दिन श्रोषधियों का अन्वारब्ध कर लिया जायगा तो दूसरे दिन अथवा जरूरत पड़े तब वह प्रोषधियां यजमान को दी जा सकती हैं । यदि यजमान का आत्मा प्रोषधियों से प्रथम दिन अन्वारब्ध नहीं है तो फिर बाद में चाहे यजमान कितना ही रोगी हो जाओ उस दूध के अलावा और कोई दवा नहीं दी जा सकती । यजमान आखिर मनुष्य है । जीना ही मनुष्य का धर्म प्रतः रोग को शान्त करने के लिए हम यजमान को दवा दे सकें इसलिए पहले दिन सर्वोषध, और सर्वरस व्रत में डाल देने चाहिए । यही उनका अभिप्राय है । इसी अभिप्राय से कहते हैं: -के प्रथमे व्रते सर्वोषधं सर्वसुरभ्यावपन्ति, यदि दीक्षितमातिविन्देत येनैवातः कामयेत तेनभिषज्येत् यथा व्रतेनमिषज्येत् ( इति वदन्तः ) परन्तु याज्ञवल्क्य इसका खण्डन करते हुए कहते हैं कि नहीं ऐसा कभी नहीं करना चाहिए । " तदुतथा न कुर्यात् " इति जो प्राचार्य दूध में सर्वोषध और अष्टगन्ध डालते हैं वे यज्ञ में मनुष्यभाव को प्रविष्ट करते हैं दोनों का उसमें प्रवेश करना दिव्य कर्म को मनुष्य कर्म बनाता है । जिसका कर्म में विधान नहीं है । पद्धति में जिसका ग्रहण नहीं है, उसे अपनी बुद्धि द्वारा मनमाने कायदे सांचकर यज्ञ में शामिल करना मनुष्यता है । दिव्य कर्म में सामान्य कर्म का प्रवेश करना है । [ २५५ ]

पृष्ठ 274

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण " मानुषं हते यज्ञ कुर्वन्ति " ( ये सर्वौषधं सर्वसुरभ्यावन्ति - इति शेषः ) वह यज्ञ की व्यृद्धि है जो कि मानुषभाव का प्रवेश है । देव कर्म में मनुष्य कर्म का शामिल होना, यज्ञ की ऋद्धि का सर्वथा विनष्ट होना है । हम यज्ञ में व्यृद्धि न कर बैठे, हमारे किसी काम से यज्ञ ऋद्धि रहित न हो जाय श्रतः कपोलकल्पित सर्वोषध और सर्वगन्ध को भी दूध में नहीं डालना चाहिए । " व्यृद्धं वै तद्यज्ञस्य यन्मानुषं नेद्वयृद्धे यज्ञे करवाणीति " याज्ञवल्क्य कहते है कि तुमने जो यह कहा था कि बिना अन्वारब्ध के फिर बीमार होने पर यज-मान को प्रोषधि कैसे दी जायगी । परन्तु हम कहते हैं कि ओषधि के अन्वारम्भ की कोई आवश्यकता नहीं है । यदि दीक्षित को बीमारी सताये तो इन दोनों में से जिसकी इच्छा हो उसी प्रोषधि से इसकी चिकित्सा कर दे । हमें यज्ञ समाप्ति अभीष्ट है । हम चाहते हैं कि यजमान क्षेम कुशलपूर्वक यज्ञ कर ले अतः ओषधि को अन्वारब्ध न होने पर भी दिया जा सकता है— " यदि दीक्षितमातिविन्देद्येनैवातः कामयेत तेनभिषज्येत । समाप्ति -व पुण्या " ( इष्टा ) ॥१५ ॥

इसके बाद होता एक पात्र में दूध ले के मानुषकाल का प्रतिक्रमण करके अर्थात् जिस समय मनुष्य दूध पीते हैं उस समय को टालकर यजमान को आत्मयज्ञाहुति के लिए दूध सौंपता है । " अथास्मै व्रतं प्रयच्छति । प्रतिनीय मानुषं कालम् " मानुषकाल का अतिक्रमण करके दूध देवें, इसका मतलब समझाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं । सायंकाल गरम किया हुआ दूध अपररात्र में अर्थात् प्राधीरात में पीना एवं प्रातःकाल गर्म किया हुआ दूध अपराहण में पीना, यही मानुषकाल का अतिक्रमण है । यह यजमान मनुष्य नहीं है अपितु देवता है । बस इस व्याकृति के लिए ( भेद करने के लिए ) ही मानुषकाल का अतिक्रमण करके दूध हुआ देता होता देवता और मनुष्य भाव का भेद करता । तात्पर्य यही है कि मनुषातिक्रमण में कोई वैज्ञानिक उपपत्ति नहीं है । केवल देव व मनुष्य का विभाग बतलाना है । " सायं दुग्धमपररात्रे प्रातर्दुग्धमपराह्न व्याकृत्याएव, दैवं चैवै-तन्मानुषं च व्याकरोति " ॥ १६ ॥

क्यों दूध पीना चाहिए । इसकी उपपत्ति बतला दी गई । अव होता, दूध देता हुआ, पहले निम्न-लिखित मन्त्र बुलवाता हुआ यजमान के हाथ धुलवाता है । होता के कहने से, निम्नलिखित मन्त्र बोलता हुआ यजमान हाथ धोता 1 देवीं धियं मनामहे सुमृडीकामभिष्टये । वर्चोधां यज्ञवाहसं सुतीर्था नो असद्वशे - इति [ २५६ ]

पृष्ठ 275

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तृतीय काण्ड ( श्र ० २ ) शतपथ ब्राह्मण दोक्षितव्रत ब्राह्मण यजमान कहता है कि मैं - देवी बुद्धि को चाहता हूँ, जो जगत् का कल्याण करने वाली है मेरी ऐसी बुद्धि हो जो बुद्धि वर्च को अर्थात् ब्रह्मतेज को देने वाली है । यज्ञ का वहन करने वाली है । इस श्रच्छी बुद्धि के कारण अच्छे - अच्छे तीर्थ अर्थात् यज्ञ मेरे वशीभूत हो जाय । तीर्थ का अर्थ यज्ञ है जैसा कि विश्वकोषकार लिखते हैं: -: -तीर्थं शत्वाध्वर क्षेत्रोपायोपाध्यायमन्त्रिषु । अवतारषिजुस्टम्भः स्त्रीरजः सु च विश्रुतम् । ( वि ० कोष ० ) इस मन्त्र में जो विशेष बात है उसे बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं - यह यजमान दीक्षा के पहले सामान्य मनुष्य के लिए अपने दोनों हाथ धोता है । अर्थात् दीक्षा से पहले हाथ धोना मनुष्यों का काम है | आज यह हाथ धोना दिव्य बुद्धि के लिए है । आज देवता का हाथ धोना है न कि सामान्य मनुष्य का । ग्रतः " देवीधियं मनामहे " इत्यादि मन्त्र बोलकर हाथ धोता है । " मानुषाय वा एष पुराशनायावनेनिक्ते ( पाणौ ) - प्रथात्र देव्यधिये तस्मादाह “ देवीं धियं " इत्यादि । अन्त में याज्ञवल्क्य कहते हैं कि जब तक यह यजमान दूध पीने के लिए हाथ धोवे तब तक इसी मन्त्र को बोलकर धोवे । अर्थात् दूध पीने से पहले सदा इस मन्त्र को बोलकर हाथ धोना चाहिए । " स यावत् कियच्च व्रतं व्रतयिष्यन्नप उपस्पृशेत् एतेनैवोपस्पृशेत् ॥ १७ ॥

इसके अनन्तर निम्नलिखित मन्त्र बोलता हुआ यजमान दूध पीता है । “ ये देवा मनोजाता मनोजवोदक्षत्रतव स्तेनोऽवन्तु तेनः पान्तु तेभ्यः स्वाहा " । जिस प्रकार इन्द्र के लिए “ वौषट् ” करके दिया जाता है तद्वत् यह स्वाहा शब्द वषट्कार के माफिक ही हुत समझना चाहिये यहहै-तद्यथा वषट्कृतं हुतमेवमस्यै तद् भवति ॥ १८ ॥

इस प्रकार दूध पीकर यजमान अपनी नाभि का स्पर्श करता है - नाभि के स्पर्श करने का मन्त्र " श्वात्राः पीता भवतयूयमापोऽस्माकमन्तरुदरे सुशेवाः " ता अस्मभ्यमयक्ष्मा अनमीवा अनागसः स्वदयन्तु देवीरमृता ऋतावृधः " । देवता, आप वीत होकर हमारे लिये पोषक बनिए अर्थात् हमारी पुष्टि कीजिये । ग्राप भीतर उदर के अन्त में अर्थात् केन्द्र में जाकर श्राप सुखप्रद बनिए । वे पानी प्रयक्ष्मा - ग्रनमीवा एवं श्रनागत होकर, अमृतस्वरूप बनकर हमारी तृप्ति करें, एवं वे पीत पानी, हमारे ऋत भाग को बढ़ावें । यजमान ने दूध पी लिया है । इस दूध के लिए यह प्रार्थना की जाती है । प्रोषधि खाकर और पानी पीकर ही गायें गोमाताएं दूध उत्पन्न करती हैं जैसा कि " श्रौषधीर्जगध्वा श्रपः पीत्वा तत एष रस संभवति । यह दर्शपूर्णमासेष्टि ब्राह्मण में कहा गया है । चूंकि दूध में पानी का ही सार भी है । पानी का हिस्सा ही नहीं है, अपितु अधिक हिस्सा पानी का ही है । बस इसी अभिप्राय से पीत दुग्ध के लिए " श्वात्रा [ २५७ ]

पृष्ठ 276

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण पीता भव यूयमापः " यह कहा गया है । यह प्रार्थना दूध से की जाती है । आज यह यजमान इस दूध को पी गया है प्रत्येक वस्तु खाये बाद केन्द्र में जाकर जमा हो जाती है । अतएव यह पीय, हुआ दूध भी केन्द्र में ही अर्थात् नाभि में ही स्थिर हो रहा है । प्रार्थना दूध की की जा रही है । वह है केन्द्र में नाभि प्रदेश में, अतएव नाभि का स्पर्श करके इस मन्त्र के जप करने के लिए कहा गया है । नाभि का स्पर्श करके मन्त्र बोलना, दूध का ही स्पर्श करके मन्त्र बोलना है इसीलिए-" अथ व्रतं व्रतयित्वा नाभिमुपस्पृशेत् " यह कहा गया है । रोग दो ही जाति के होते हैं अमीवा और यक्ष्मा । अग्नि की कमी के कारण - मन्दाग्नि के कारण शरीर में जो रोग होता हैं उसे तो यक्ष्मा कहते हैं, एवं अस्थि, असृक्, मांसादि आदि में रहने वाले कीटाणुओं से जो रोग होता है उसे श्रमीवा कहते हैं । इन दोनों ही रोगों की जड़ वास्तव में पूछा जाय तो अग्नि की कमी ही है । शरीर में जब ग्राग्नेय प्राण की कमी हो जाती है तभी यक्ष्मा होता है एवं तभी कीटाणुओं को मौका मिलता है । जिसके शरीर में अग्नि अतिवेग से ज्वलित रहता है वह श्रत्यन्त ही बलिष्ठ होला है उसे कोई भी रोग नहीं सताता । दूध सोम है । सोम वात्य पदार्थ है । जैसे अग्नि में घृताहुति डालने से अग्नि प्रति प्रज्वलित हो जाता है, एवं सारी सुस्ती जाती रहती है । जहां अग्नि प्रबल हुआ कि अमीवा यक्ष्मादि रोग भागे । इसका एकमात्र कारण यह सोमाहुति ही हैं । यदि सोंम की अर्थात् अन्न की इस आत्माग्नि में प्राहुति नहीं पड़ती है तो आत्माग्नि कमजोर हो जाता है । ऐसी अवस्था में इसको रोग घेर लेते हैं । परन्तु आज यह यजमान रोग-नाशक, श्रग्निप्रवर्द्धक, सोमस्वरूप दूध की आहुति आत्माग्नि में देकर श्रात्माग्नि प्रज्वलित कर शरीरस्थ यक्ष्मा एवं अमीवा का सर्वनाश करता है । बस इसी अभिप्राय से– " ता अस्मभ्यमयक्ष्मा अनमीवा अनागसः यह कहा है " दूध पीने से कभी कभी कफ प्रकृति वाले का अनिष्ट भी हो जाता है । ऐसा नहीं । बस इस भावना के लिए “ अनागसः " कहा गया है । आप निर्दुष्ट बनें - यही अभिप्राय है । आगम और निगम दो ही शास्त्र के विभाग हैं श्रागम में ६४ देवियें मानी जाती हैं । उनमें सबसे पहली आपो देवी है | अतएव यह सबसे प्रधान है । इसी बात को बतलाने के लिए " देवीरमृताः " यह कहा गया है । अखिल विश्व में ऋत और सत्य- ये दो ही तत्व है । सकेन्द्र वस्तु का नाम सत्य है एवं केन्द्ररहित वस्तु का नाम ऋत है । सत्य से ही ऋत उत्पन्न होता है । बाद में सभी सृष्टियां ऋत से ही उत्पन्न होती हैं । ऋत ही सृष्टि का मूल कारण है । सत्य से कोई भी वस्तु उत्पन्न नहीं होती । इस सत्य का ही एक अंश जब सत्य से अलग छट जाता है । तब उस अलग छटे हुए भाग से जो कि केन्द्र से अलग हट जाने के कारण ऋत कहलाने लगता है, सृष्टि होती है । सूर्य सत्याविष्ट है । इससे कोई भी नई वस्तु उत्पन्न नहीं होती । नई वस्तु उत्पन्न होती है सूर्य के प्रवर्ग्य भाग से ऋत से । सूर्य से जो गर्मी, जो आग्नेय प्राण अलग छट कर अन्नादि में प्रविष्ट हो जाते हैं । तभी अन्न की उत्पत्ति होती है पिता सत्य है एवं इसका वीर्य भी शरीर में बद्ध रहने के कारण सत्य है । जब यह वीर्य शरीर की पकड से अलग निकल जाता है तभी उससे पुत्रोत्पत्ति होती है । ग्रात्मा सत्य स्वरुप है । इससे नई चीज हगिज पैदा नहीं हो सकती । अपि च [ २५८ ]

पृष्ठ 277

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण इस सत्य का कभी विनाश नहीं होता है । ऋत को चाहे जो खा सकता है सत्यात्मा को कोई नहीं खा सकता । छिपकली मक्खी को तब खा सकती जब कि वह उसे मार दे । जब तक मक्खी जिन्दा है तब तक उसे कोइ नहीं खा सकता । खाय कैसे, जव कि वह सत्यात्मा से वृद्ध है । कहना सिर्फ यही है कि ऋत से ही नई उत्पत्ति होती है इसलिए श्रुति कहती है । " अहमस्मि प्रथमजा ऋतस्य " मैं ऋत से पैदा हुआ हूँ । मैं ऋत की प्रथमजा हूँ । अर्थात् पिता के ग्रात्मा से बद्ध जो शुक्र था, वह जब उससे अलग होकर ऋत स्वरूप में परिणत हो गया तो उस ऋत से मैं पैदा हुआ हूं । स्वयम्भू-सत्य प्रजापति से पहले पानी ही उत्पन्न होता है । अतएव पानी को - परमेष्ठि मण्डल को ऋत कहा जाता है । ऋत को बढाने वाला यही पानी है । यजमान सोमयज्ञ द्वारा नया दिव्यात्मा पैदा करेगा । पैदाइश ऋत से सम्बन्ध रखती है । पानी ऋत को बढाने वाला है । अतएव " ऋतावृधः " यह कहा गया है । दूध पीकर नाभि से स्पर्श कर मन्त्र क्यों बोलना चाहिए? इसका कारण बतलाते हैं । जो दीक्षा लेता है वह मनुष्यों की मण्डली से हटकर देवताओं की मण्डली में ग्रा जाता है । अतएव आज यह यज-मान देवताओं में से एक हो जाता है । अर्थात् देवता बन जाता है । देवता प्राण एवं विग्रह भेद से दो प्रकार के हैं । जो प्राण देवता है वे सूर्य में रहते हैं । अतएव “ चित्रं देवानामुदगादनीकम् " यह कहा जाता है एवं विग्रहधारी देवता चन्द्रलोक में अर्थात् चांदनी में रहते हैं । सारा भूतसर्ग १४ प्रकार का है । आठ प्रकार का देवसर्ग है । एक प्रकार का तमः सर्ग है, एवं पांच प्रकार का रजः सर्ग है । इस प्रकार ब्रह्म से स्तम्ब पर्यन्त अर्थात् वृक्ष पर्यन्त १४ प्रकार का भूतसर्ग है । इनमें उत्तरोत्तर इन्द्रियाधिक्य समझना चाहिए । जो वृक्ष है उस में एक ही इन्द्रिय है । त्वग्गिन्द्रिय के अलावा उनमें दूसरी इन्द्रिय नहीं है । चींटी-छोटी लटें, इनमें दो इन्द्रियें हैं । इस प्रकार बढ़ाते चले जाओ । बढ़ते - बढ़ते मनुष्य में ११ इन्द्रियें हो जाती हैं । पाँच कर्मेन्द्रियें होती हैं । पांच ज्ञानेन्द्रियें होती हैं । ११ वां संकल्प - विकल्पात्मक मन होता है । एवं बाद में जो आठ विग्रहधारी देवता हैं उनमें २८ इन्द्रियें होती हैं । मनुष्यों की अपेक्षा इनमें अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा प्राप्तिः प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व, ये आठ सिद्धियां होती हैं एवं ६ तुष्टियां होती हैं । इस कारण इनमें १७ इन्द्रियें अधिक होती हैं । यह प्राठों ही पृथिवी से अलग रहते हैं । यह चन्द्रमा के पकड़ में रहते हैं न कि पृथिवी की पकड़ में । इनके पैर जमीन पर नहीं टिकते हैं । यह यजमान यज्ञ द्वारा - " ये वै केचन अस्माल्लोकात् प्रयन्ति चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति " इस नियम के अनुसार इन्हीं विग्रहधारी देवताओं में ही शामिल होता है । बाद में यह सौर देवताओं में अर्थात् प्राण देवताओं में जाता है । चन्द्रमा सोम का पिण्ड है । यह विग्रह देवता चूंकि चन्द्रमा में ही रहते हैं, अतएव सोममय हैं । आज यजमान सोमयज्ञ की ओर अभिमुख हो रहा है तो सोम की ओर अभिमुख होना देव-तानों की ओर अभिमुख होना है । अपने आत्मा में देवप्राण का प्राधान कर देवतास्वरूप में परिणत होना है । बस, इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर कहते हैं " देवान् वा एष उपावर्त्तते यो दीक्षते, स देवतानामेको भवति " । देवताओं का जो हवि ( अन्न ) होता है वह ग्रनुत्सिक्त होता है । अर्थात् जैसे दूध को ऊपर से सींचने के माफिक पीया जाता है वैसे देवताओं में सींचा नहीं जाता अपितु हाथ से थोड़े थोड़े पुरोडाश की आहुति दी जाती है । [ २५६ ]

पृष्ठ 278

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 278 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण " अनुत्सितं वै देवानां हविः " दीक्षितव्रत ब्राह्मण परन्तु ' ग्राज यह व्रतप्रद यजमान दूध को अपने ग्रात्मदेवतायों में डालता हुआ आहुतिक्रम से बिलकुल विरुद्ध आचरण करता है । अर्थात् यजमान देवता हैं । यह जो दूधपीता है, वह यह नहीं पीता अपितु देवता पीते हैं । परन्तु देवतानों में इस प्रकार ऊपर से सींचा नहीं जाता । ऊपर से दूध सींचता हुआ यजमान देवताओं के देवहवि के क्रम से ठीक विरुद्धाचरण करता है । इतना ही नहीं, अपितु इस आहुति को इस व्रत को मारता है । हव्य का स्वरूप नष्ट करता है । श्रथैतद् व्रतप्रदो मिथ्या करोति व्रतमुपोत्सिञ्चन् । व्रतं प्रमीणाति । परन्तु पीये बिना काम भी नहीं चलता है, एवं पीने से व्रतनियम का भंग होता है । प्राहुति स्वरूप नष्ट होता है । बस इस अप-राध की क्षमा मांगने के लिए प्रायश्चित्त करने के लिए ही नाभिस्पर्श कर " श्वात्राः पीता: " इत्यादि मन्त्र बोला जाता है । यह मन्त्र इस मिथ्या कर्म की प्रायश्चित्ति समझना चाहिए । मन्त्र बोल देने से, मन्त्र प्रभाव से यजमान का यह व्रत अर्थादुग्धान मिथ्याकृत भी नहीं होता है । ग्रर्थात् ग्राहुतिक्रम से विरुद्ध भी नहीं होता है एवं पीये बाद मन्त्र बोलने से हव्यस्वरूप का नाश भी नहीं करता है । इसीलिए " श्वात्राः पीता " इत्यादि मन्त्र बोला जाता है । " तस्यो हैषा प्रायश्चित्तिः " तथो हास्यैतन्न मिथ्याकृतं भवति, न व्रतं प्रमीणाति तस्मादाह, " श्वात्राः पीता " ॥ इत्यादि ॥ अन्त में कितना दूध पीना चाहिए । यह नियम बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं - कि यजमान परिमित मात्रा युक्त दूध पीकर नाभि का स्पर्श करता है अर्थात् इतना सा दूध पीना चाहिए जिससे निर्ब-लता न आने पावे एवं कर्म अच्छी प्रकार से हो सके । इतना नहीं पी लेना चाहिए, जिससे पेट फूल जाय और उलटी अकर्मण्यता श्राजाय -" स यावत् कियच्च व्रतं व्रतयित्वा नाभिमुपस्पृशेत् " इति । यजमान सुत्यापर्यन्त प्रतिदिन दूध ही पीवेगा । तब इसे चाहिए कि प्रतिदिन दूध पीये बाद- इस मन्त्र से नाभि का स्पर्श करले । अन्यथा कौन जानेगा कि यजमान ने व्रतप्रद ने दूध पीया या नही । ऋत्विक लोग जान जांय इसीलिए और प्रायश्चित्त के लिए दोनों ही कार्यों के लिए मन्त्र बोलकर नाभिस्पर्श कर ही लेना चाहिए । यही तात्पर्य है ॥ एतेनैवोपस्पृशेत् कस्तद्वद यत् व्रतप्रदो व्रतमुपोत्सिञ्चेत् ॥१ ९ ॥ वैदिक भाषा में जिसे व्रत कहते हैं, उसे ही संस्कृत भाषा में " वृत्त " कहते हैं । आाचार नियम पालन को - कुल धर्म पालन को ही वृत्त कहते हैं । इसीलिए — वृत्तं यत्नेन संरक्षेत् वित्तमायाति याति च प्रक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः ॥ यह कहा जाता है । कि श्राचार नियम का नाम ही व्रत । इत्थं गन्तव्यम्, इत्थं भोक्तव्यम्, इत्थं वक्तव्यम्, इस प्रकार जो नियमों की श्रृंखला है उसी का नाम व्रत है । मर्यादापालन का नाम ही व्रत है । [ २६० ]

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 279 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मणं आज यह यजमान दीक्षित बना हुआ है । अतएव इसके लिए खास खास प्रतिबन्ध लगाये जाते हैं । शृद्रापेक्षया ब्राह्मण को जैसे यज्ञोपवीतादि व्रतों का पालन करना पड़ता है, तद्वत इस दीक्षित को भी कई नियमों का पालन करना पड़ता है । किन किन नियमों का पालन करना चाहिए यही इस दीक्षा व्रत धर्म ब्राह्मण में बतलाया गया । इनमें से कितने व्रत बतला दिए गए एवं कितने ही और बतलाने बाकी है । इन्हीं में से मूत्रोत्सर्ग विषयक नियम बतला सकते हैं । सामान्य मनुष्य की तरह दीक्षित मूत्रोत्सर्ग नहीं कर सकता । उसे इस क्रिया में भी विशेष नियम का पालन करना पड़ेगा, यही बतलाते हैं । यह यजमान जिस स्थान में मूत्रोत्सर्ग करने वाला होता है अर्थात् जहां मूत्रोत्सर्ग करना चाहता है वहां से, उस प्रदेश से उस कृष्णाविषारण से माटी का ढेला अथवा वह न मिले तो पृथिवी से सम्बन्ध रखने वाला घास वास उखाड़ लेता है । पेशाब करने से पहले, जिस स्थान पर दीक्षित पेशाब करना चाहे उस स्थान से कृष्णविषारण से मिट्टी का ढेला अथवा घासवास अथवा पार्थिव पदार्थ उठा लेना चाहिए एवं बाद में मूत्रोत्सर्ग करना चाहिये, यही तात्पर्य है । " यत्र वा मेक्ष्यन् भवति तत् कृष्णविषाणया लोष्टं वा किंचिद्वा-उपहान्ति " ऐसा क्यों करें, इसका कारण बतलाते हैं । यह पृथिवी देवी देवयजनी अर्थात् यज्ञिया है । प्रकृति -यज्ञ में पृथिवी ही वेदि है इस तक जाने वाले इस पार्थिव अग्नि में हैं । पारमेष्ठ्य सोम की ग्राहुति पड़ती रहती है इसलिए तो " यावती वेदिस्तानती पृथ्वी " यह कहा जाता है । पृथिवी में पारमेष्टय सोम आहुत हो रहा है । देवता सारे ग्राग्नेय हैं अतएव यह पृथिवी देवयजनी है अर्थात् यज्ञिया है " इयं वै पृथिवी देवी - देवयजनी " दीक्षित यजमान देवताओं को ग्राहुति देने वाला है । प्रतएव यह देवयजनी पृथिवी यजमान से, दीक्षित से मिला नहीं होनी चाहिए अर्थात् यजमान को चाहिए कि यशिया इस देवयजनी पर मूत्रोत्सर्ग न करें । " सा दीक्षितेन नाभिमिह्या " परन्तु मूत्रोत्सर्ग किये बिना काम चल नहीं सकता अतएव यह दीक्षित इस पृथिवी के यज्ञिय शरीर को उठाकर बाकी बचा हुआ जो पृथिबी का प्रयज्ञिय पार्थिव स्वरूप है उस पर मूत्रोत्सर्ग करता है । तात्पर्य यही है कि ढ़ले को उठाकर उसमें यज्ञिय भाग की भावना कर लेता है अतएव कोई दोष नहीं रहता । " तस्या एतदुद्गृह्यं व यज्ञियां तनूमथा यज्ञियं शरीरमभिमेहति " मूत्रोत्सर्ग करने से पहले दीक्षित मन्त्र बोलता है " अपो मुञ्चामि न प्रजाम् " मैं पानी का त्याग करता हूं न कि रेत स्वरूप प्रजा का । इस उपस्थ इन्द्रिय से मेढू से वीर्य और मूत्र दोनों निकलते हैं । इन दोनों में से यह यजमान पानी ही का त्याग करता है न कि प्रजास्वरूप वीर्य का इस मन्त्र शक्ति से यदि किसी का वीर्य पेशाब इस के साथ निकलता भी है, तो बन्द हो जाता है । [ २६१ ]

पृष्ठ 280

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 280 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मणं “ उभयं वा अत एत्यापश्च रेतश्च स एदतप एव मुञ्चति न प्रजाम् ” फिर मन्त्र बोलता है " अहो मुचः स्वाहा कृत इति " यह मूत्रयिता दीक्षित देहान्तर्गत पाप के साथ ही इस मूत्र का परित्याग करता है अतएव इसे " अ ' होमुचः " बोल देना चाहिए | पानी के शरीर में से निकल जाने के नाम ही पाप है । पानी प्राण का नाम है । शरीर में जो प्राणशक्ति है वह इसी पानी का नाम है इसलिए — अन्नमवेहि सौम्य मन श्रापोमयः प्राणः ॥ यह कहा जाता है । यह पानी जिस कारण से जिस दोष से निकल जाता है उसे पाप कहते हैं । पानी नाम है शरीर की रौनक का । जिस कार्य से शरीर की रौनक, शरीर का पानी उतर जाता है उस कारण का नाम अपाप है । अपाप ही को पाप कहते हैं । अधोगत जो पानी है, वही पाप है । जो पानी श्रात्मसात् हो जाता है वह पाप नहीं है अपितु जो आत्मा से संवृत हो इकट्ठा हो, अलग छट जाता है वह पानी पाप है जो कि " मूत्र " कहलाता है । इसी दूषित पानी को पाप को अंहः कहते हैं । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि उदर से पेट में आत्मा द्वारा गुष्टित अर्थात् परित्यक्त जो पानी होता है वह पाप स्वरूप है अतः मूत्रयिता पाप स्वरूपयुक्त ही इस मूत्र को छोड़ते हैं अर्थात् मूत्र को निकालना पाप भाग को निकालना है । यदि थोड़ी देर तक मूत्र रुक जाता है तो तबियत घबड़ाने लगती है अतः अवश्य ही यह पाप स्वरूप है । " अंहस इव होता मुंचन्ति यदुदरे गुष्टितं भवति, तस्मादाहांतोमुच इति । " फिर मूत्र कर ऐसा बोलता है । स्वाहा कृता पृथिवीमाविशत् । हे पानी, तुम स्वाहाकृत हो इस पृथिवी में प्रविष्ट हो जाओ, याहुति बन कर । हे पापस्वरूप पानी, तुम शान्त होकर पृथिवी में पैठ जाओ, यही तात्पर्य है: – ' प्राहुतयो भूत्वा शान्ताः पृथिवीमाविशत् इत्येवैतदाह " ॥ इसके बाद उस लोष्ट को उसी पृथिवी पर डाल देता है । उस समय " पृथिव्याः संभव । यह मन्त्र बोल देना चाहिए । होत्रीकृत लोष्ट आप वापस पृथिवी से संगत हो जाय । देवयजनी पर मूत्रो-त्सर्ग नहीं करना चाहिए । अतः यज्ञियस्वरूप लोष्ट उठा लिया था, उसे वापस रख देता है । पृथिवी के यज्ञभाग से वापस पृथिवी पर ही प्रतिष्ठित कर देता है ॥२१ ॥

इसके बाद यह यजमान अपने आपको अग्नि के लिए समर्पित कर अग्नि की रक्षा में छोड़ कर सो जाता है । " प्रथाग्नये परिदाय स्वपिति " जो मनुष्य दीक्षा लेता है वह देवताओं की ओर आ जाता है । देवता लोग कभी नहीं सोते हैं । " न वै देवाः स्वपन्ति " परन्तु यजमान का जो स्वप्न है अर्थात् सुषुप्ति है वह अनवरुद्ध है । अर्थात् यज-मान को तो सोना ही पड़ता है । कितना ही देवता बन जाय फिर भी प्राचिप्राण की अर्थात् प्रज्ञानात्मा की पकड़ में जब तक यह है तब तक इसे सोना ही पड़ता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं:: - -" अनवरुद्धो वा एतस्या स्वप्नो भवति " [ २६२ ]