Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 281–290

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 281–290

पृष्ठ 281

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तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्राह्मणं दीक्षितव्रत ब्राह्मण अग्नि ही देवताओं के व्रतपति है । ग्रग्नि ही से देवता सारे व्रत अन्न को प्राप्त करते हैं । देव-ताों का जो प्राचार नियम है उसके एकमात्र अग्नि ही अधिपति है । बात वास्तव में सच है । सारे देवता आग्नेय ही तो है— अग्नि वैं देवानां व्रतपतिः ॥ बस इसी अग्नि की जिम्मेदारी में अपने आप को सुरक्षित करके यह यजमान सो जाता है । हमारे शरीर में अग्नि, वायु और इन्द्र तीनों मौजूद हैं । जहां पर हाथ लगानो वहीं पर गर्मी मालूम होती है । बस यही अग्नि भाग है एवं श्वास प्रश्वास ही वायु देवता है, एवं तीसरा है प्रज्ञानात्मा जो कि मस्तिष्क में रहता है । इन तीनों में से सुषुप्ति इसी प्रज्ञानात्मा की होती है । प्रज्ञानात्मा के साथ ही जो इन्द्रियां और इन्द्रियों के प्राण सुखदुःखानुभवकर्ता इन्द्रियप्राण यह सब सो जाते हैं । प्रज्ञान के पुरीतति नाडी में घुसते ही सारे प्राण अस्त हो सो जाते हैं । उस समय जगते हैं तो एक मात्र अग्नि और वायु ही । देवता सारे आग्नेय हैं । प्रतएव हम कह सकते हैं कि देवता कभी नहीं सोते । इसी अग्नि से प्रार्थना की जाती है । इसी अग्नि को लक्ष्य में रखकर कहते हैं: -एवं मन्त्र बोलते हैं -" तस्मा एवैतत् परिदाय स्वपिति " " अग्ने त्वं सुजागृहि वयं सु मन्दिषीमहि " हे अग्ने! आप सावधानपूर्वक जागते रहें एवं मुझे प्राज्ञा दीजिए मैं प्रानन्द पूर्वक सोलूं - यही तात्पर्य है । श्रग्ने त्वं जागृहि वयं स्वप्स्याम " इत्यैवेतदाह । फिर उसी मन्त्र का शेष भाग बोलते हैं-रक्षाणोऽप्रयुच्छन् इति । आप श्रप्रमत्त होकर, सावधान होकर हमारी रक्षा कीजिए । गोपायनोऽप्रमत्त इत्येवैतदाह फिर मंत्र शेष बोलता है । " प्रबुधे नः पुनःस्कृधि " : _ " हम ज्वर व्याधि रहित होकर ही प्रातःकाल उठें ऐसी कृपा कीजिए । इस समय सोकर प्रात: -काल भले चंगे हो कर ही उठें । हमारे ऊपर आप ऐसी कृपा कीजिए । यथैः सुप्त्वा स्वस्ति प्रबुध्या महाऽएवं न कुवित्येवैतदाह ॥ २२ ॥

रात्रि में सोये बाद पानी पीने के लिए उठा जाता है । याज्ञवल्क्य कहते हैं ---कि यह यजमान जब वापस फिर नहीं सोता है उस समय अध्वर्य उससे मन्त्र वुलवाता है । अर्थात् उठकर फिर तो जाता है । तब मन्त्र न बुलावे अपितु अब देख लें कि भाई नींद समाप्त हो चुकी अब यह नहीं सोयेगा । तब निम्नलिखित मन्त्र यजमान से बुलावे । [ २६३ ]

पृष्ठ 282

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण " अथ यत्र सुप्त्वा पुनर्नावद्रास्यन् भवति, तद् वाचयति-मन्त्र यह है । दीक्षितव्रत ब्राह्मण प्राणः पुनरात्मा ( प्रज्ञानात्मा ) म श्रागन् पुनश्चक्षुः पुनः श्रोत्रं मप्रागन् - इति सोते हुए यजमान के मन, आयु, प्राण, आत्मा, चक्षु, श्रोत्र इत्यादि सब गायब हो जाता है । जहां श्रात्मापुरीतति नाड़ी में गया कि सारे प्रारण अस्त हुए । केवल प्रारण ही अर्थात् अग्नि ही एवं वायु ही नहीं निकलता है अर्थात् सुप्तावस्था में और इन्द्रियों का काम बन्द हो जाता है परन्तु श्वासप्रश्वास और शरीर की गर्मी तब भी जागृत ही रहती है । " सर्वे हवा एते स्वपतोऽपक्रामन्ति " प्राणवत् ( अप्रक्रामन्तीति शेषः ) सोकर उठते ही यजमान इन सारे प्राणों से फिर युक्त हो जाना है । अतएव " पुनर्मन: पुनरायु: " इत्यादि कहा गया है । फिर मन्त्र बोलता हैः-वैश्वानरोऽदब्धस्तनूपा अग्निर्नः पातु दुरितादवद्यात् ॥ हमारे शरीर का जो वैश्वानर अग्नि है वह सर्वथा अदब्ध है किसी से नहीं दबता है । सदा प्रज्व-लित होता हुआ धक् धक् करता रहता है । एवं जब तक शरीर में वैश्वानर अग्नि रहता है तभी तक शिर की स्थिति रहती है तद्रूपायही वैश्वानर अग्नि है - इसीलिए -" ग्रहं वैश्वानरो भूत्वा " यह कहा जाता है इसी अग्निसे जो कि दिन की तरह रात्रि को भी जागता ही रहता है प्रार्थना करते हैं कि, रात्रि में स्वप्न से अथवा और किसी कारण से जो मिथ्या कर्म हो गया है अर्थात् यज्ञ विरुद्ध कर्म हो गया है उन सबसे हमें वह वैश्वानराग्नि बचावे, एवं यह अग्नि दुरित से एवं बुरे कर्मों से बचावे । तद्यदेवात्र स्वप्नेन वा येन वा मिथ्याकर्म तस्मान्नः सर्वस्माग्निर्गोपायत् इत्येवैतदाह, तस्मादाह " वैश्वानरो " इत्यादि ॥ २३ ॥

दीक्षित मनुष्य सामान्य मनुष्य नहीं रहता, अतएव उसका बोलचाल, आचार व्यवहार, खाना पीना, सोना, मूत्रोत्सर्ग करना सारा प्रपञ्च भी सामान्य मनुष्यों के समान नहीं होता । यही खाना चाहिए, यही बोलना चाहिए, इसी समय सोना चाहिए, इसी समय उठना चाहिए - इस प्रकार की मर्यादा में इसे बद्ध होना पड़ता है । बस, इस मर्यादा का नाम ही व्रत है । दीक्षित के लिए आज्ञा है कि तुम चाहे जो कुछ मत बोलो । यही बात नहीं है अपितु बीच बीच में जब कर्म से फुर्सत पाता है तब भी यह अंट - संट नहीं बोल सकता । उस समय ने लिए आज्ञा है कि तुम खाली समय में यह दीक्षित पुत्रादि से परिवृत हो याज्ञिक प्राख्यान सुने । जैसा कि श्रुति कहती है-" पुत्रामात्य परिवृताय राज्ञे पारिप्लवमाचक्षीत । आख्यानानि शंसन्ति । प्रथमेऽहनि मनुर्वैवस्वतो राजा इत्यादि । द्वितीयेऽहनि " यमौ वैवस्वत इत्यादि । तृतीयेऽहनि वरुण आदित्य इत्यादि इति । [ २६४ ]

पृष्ठ 283

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण गरज यह है कि वह फिजूल भाषण नहीं कर सकता । यज्ञ सम्बन्ध के बाहर की अंट - संट बातें करने का गप्पें मारने का दीक्षित को अधिकार नहीं है । यदि प्रमादवश यह दीक्षित अव्रत्य वाक् को बोलता है तो वह अपने व्रत को भंग करता है | किये - कराये सारे कर्म को मिथ्या अर्थात् सारशून्य कर देता है । व्रत मर्यादा का विध्वंस कर देता है । अथ यत् दीक्षित प्रमीणाति ॥ व्रत्यं वा व्याहरति, क्रुध्यति वा तन्मिथ्या करोति व्रतं याज्ञवल्क्य कहते हैं - कि जिस प्रकार यज्ञिय दीक्षित वाक् के अलावा और कुछ न बोलना यह दीक्षित के व्रत में शामिल है तद्वत् प्रक्रोध भी दीक्षित का व्रत ही समझना चाहिए । आत्मा देवभावयुक्त होता है । जिससे आत्मा प्रफुल्लित रहता है - समझता है यह दैवकर्म है, एवं जिन कामों से आत्मा विक्षुब्ध हो जाता है, कुण्ठित हो जाता है क्षीण हो जाता है, ये सारे के सारे आसुर धर्म हैं । क्रोध भी प्रासुर धर्मं ही है । क्रोध से आत्मा अशान्त हो जाता है । क्रोधी मनुष्य का सारा शरीर सूख जाता है एवं वह अत्यन्त निर्बल हो जाता है । यह यजमान सामान्य मनुष्य नहीं है अपितु देवता है । देवताओं का श्रासुरों से घोर वैर है ऐसी अवस्था में क्रोध करना दैव कर्म में आसुर भाव का प्रवेश करना है । अतएव दीक्षित को कभी क्रोध नहीं करना चाहिए, एवं कभी अव्रत्य अर्थात् नियम विरुद्ध अयज्ञिय भाषण नहीं करना चाहिए । " क्रोधो व दीक्षितस्य " ( व्रतमिति शेषः ) अग्नि ही देवताओं के व्रतपति हैं अर्थात् व्रत के ठेकेदार हैं । पृथिवी अन्तरिक्ष प्रौर द्यो- तीनों लोकों के अग्नि, वायु और आदित्य क्रमशः व्रतपालक हैं । पृथिवी के पार्थिव देवताओं के व्रतपालक अग्नि है, ग्रान्तरिक्ष्य देवताओं के व्रतपति वायु है एवं सौर देवताओं के व्रतपति आदित्य है । इसीलिए " अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि " " तच्छकेषं तन्मेराध्यताम् " - " वायो व्रतपते व्रतं चरिष्यामि " आदित्य! व्रतपते व्रतं चरिष्यामि " यह कहा जाता है । बस प्रमादवशात् अन्रत्य बोल कर और क्रोध करके यह यजमान उस व्रतपति अग्नि की ओर क्षमा मांगने दौड़ता है । उनसे प्रार्थना करता है कि अग्ने, आप मेरा अपराध क्षमा कर दीजिए । अग्नि वै देवानां व्रतपति, तमेवं तदुपधावति ( दीक्षितः ) एवं प्रार्थना का मन्त्र यह है— " त्वमग्ने व्रतपा श्रसि देवा मर्त्येष्वा त्वं यज्ञष्वीड्यः " ॥ २४ ॥

हे अग्निदेव, आप व्रतपा हैं । व्रत की रक्षा करने वाले हैं । एवं आप संसार के मरणधर्म यच्च-यावत् पदार्थों में एवं यच्च यावत् यज्ञों में स्तुत्य हैं, प्राराधनीय हैं । चाहे वेजड हो या चेतन हो, सबकी स्थिति अग्नि से ही है । जब तक ग्रग्नि है तब तक शरीर की स्थिति है । जहां हाथ पैर ठण्डे हुए नहीं कि काम समाप्त हुआ नहीं । एवमेव जो घर पर घट - पट मठादि जड़ पदार्थ हैं उनकी स्वरूप सत्ता भी इसी अग्नि पर अवलम्बित है । एवमेव कोई भी ऐसा यज्ञ नहीं है, जो अग्नि बिना हो जाय । यज्ञ से-दैवत प्रजा ही अभिप्रेत है । भौतिक एवं दैवत दोनों ही सत्ता अग्नि पर निर्भर है । यही तात्पर्य है । याज्ञ-वल्क्य कहते हैं कि यह वाक् ( मन्त्र ) यजमान की प्रायश्चित्ति है । इस मन्त्र से प्रार्थना कर लेने पर अनत्य-[ २६५ ]

पृष्ठ 284

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण प्रयुक्त व्रतं भंग एवं व्रतनाश नहीं होता है । इसीलिए प्रायश्चित्त स्वरूप " त्वमग्ने " इत्यादि बोल देता है " तस्यो हैषा प्रायश्चितिः ' ' तयो हास्य तन्न मिथ्याकृतं भवति, न व्रतं प्रमीरणाति, तस्मादाह " त्वमग्ने व्रतपा इत्यादि ॥। २४ ॥ जैसे देवता के भेंट चढ़ाई जाती है, राजा महाराजा के नजर की जाती है वैसे ही देवता तुल्य इस दीक्षित के भी कई मनुष्य भेंट चढ़ाते हैं । यदि दीक्षित के लिए कोई भेंट लाता है एवं लाकर दीक्षित के अर्पण करता है तो अध्वर्यु उस समय दीक्षित से मन्त्र बुलवाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं । इस यज्ञ में दीक्षित के लिए मनुष्य, गौ आदि भेंट लाते हैं उस समय भेंट के लिए बाद अध्वर्यु निम्नलिखित मन्त्र दीक्षित से बुलवाता है । " अथ यद्दीक्षितायाभिहरन्ति तस्मिन् वाचयति ” वह मन्त्र यह है " रास्वे यत् सोमा भूयो भर - इति सोम, आप इतना तो ( इयत् ) आने दो ( रास्व ) एवं और श्राने दो - अर्थात् आपने जो यह सम्पत्ति दी है वह मैं कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार करता हूं । आप मुझे इसी तरह और सम्पत्ति प्रदान करेंगे । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि दीक्षित के लिए मनुष्य जो भेंट लाते हैं यजमान के लिए इस भेंट का सम्बन्ध यही सोम करता है अर्थात् मनुष्यों की यजमान को जो भेंट करने की इच्छा है उसके प्रेरयिता यही है । आज यदि दीक्षित सोम याग न करता तो कोई इससे पूछता भी नहीं । यजमान के लिए सोम ही इसके भेंट का सम्बन्ध कराता है जो कि भेंट दीक्षित के लिए यह लोग लाते । इसीलिए " रास्वे यत् सोमा ( हे सोम ) भूयो भर यह कहा गया है | आप हमारे लिए सम्पत्ति का आहरण कीजिए - यही तात्पर्य है । " सोमो ह वा अस्मा ( अस्मै ) एतद्युते यद्दीक्षितायाभिहरन्ति । स यदाह रास्वे यत् सोमेति " रास्व न इयत् सोमेत्येवैतदाह । श्रा भूयो भरेति श्रानो भूयो हरेत्यवेतदाह । फिर मन्त्र शेष बोलता है— " देवो नः सविता वसोर्दाता वस्वदात् " जो सविता देवता देने वाले है । उन्होने ही मुझे यह द्रव्य दिया है । देने वाला जो वह परमात्मा है उसी ने यह सम्पत्ति मेरे पास भेजी है । जैसे लोक में यह कहा जाता है - उसी के माफिक " देवो वः सविता " इत्यादि कहता है । सविता देवता ही सारे कमों को प्रसविता है । जब तक सविता की प्रेरणा नहीं होती है तब तक कोई भी काम सिद्ध नहीं होता है । प्रत एव इस समय भी सविता का नाम लेना जरूरी भी है । इसी अभिप्राय से कहते हैं । सविता देवता की प्रार्थना करने से इस यजमान के लिए प्राप्त जो धन है, अर्थात् सविता की आज्ञा से लिया धन जो हुआ है वह दान के लिए हो जाता है अर्थात् जब सविता श्राज्ञापूर्वक द्रव्य ले लिया जाता है तो उस पर दीक्षित का फल साथ हो जाता है । अतएव वह उस प्राप्त द्रव्य को दान करने का अधिकारी हो जाता है यदि सविता की आज्ञा नहीं ली जाती तो फिर यजमान का सत्व इस पर नहीं हो सकता अतएव इसे

इस द्रव्य को दान करने का अधिकार भी महीं रहता ।

तो हास्मा एतत् सवितृ प्रसूतमेव दानाय भवति ॥ २५ ॥

इसके अनन्तर सूर्यास्त से करीब करीब घण्टे भर पहले अध्वर्यु दीक्षित से कह देता है । है दीक्षित, वाक् संयमन करो अर्थात् मौन व्रत धारण करो " पुरास्तमयादाह- दीक्षित वाचं यच्छ, इति । " मात्मनो द्विगुणच्छाया मन्दीभवति भास्वरे " यही वाक् संयमन का समय है । [ २६६ ]

पृष्ठ 285

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण जिस समय शरीर से ठीक दुगनी छाया पड़ती हो, एवं सूर्य डूबने पर हो - यही मौन व्रत धारण करने का समय है । इसके अनन्तर जब सूर्य अस्त हो जाता है तो दीक्षित वाक् विसर्जन कर देता है एक घण्टे भर के करीब वाक् संयमन करता है । सूर्यास्त होते ही वाक् विसर्जन कर देता है । " तामस्तमिते वाचं विसृजते " जैसे सूर्यास्त से कुछ पहले वाक् संयमन के लिए अध्वर्यु यजमान को कहता है उसी प्रकार सूर्योदय से कुछ देर पहले भी कह देता है कि हे दीक्षित, वाक् संयमन कीजिए । “ पुरोदयादाह दीक्षित वाचं यच्छ " इति । इसके बाद जब सूर्योदय हो जाता है तो यजमान वाक् विसर्जन कर देता है । " तामुदिते वाचं विसृजते " इति इस प्रकार से सायंकाल सूर्यास्त से पहिले एवं प्रातःकाल सूर्योदय से पहले वाक् संयमन क्यों करना चाहिए - इसका कारण बतलाते हैं— अहोरात्र ही संवत्सर का स्वरूप है । संवत्सर ही को यज्ञ कहते हैं । जैसा कि इस ब्राह्मण के प्रारम्भ में ही बतला दिया गया है । इस यज्ञ के अहः और रात्रि ये दो पर्व हैं । अहः पद प्रथम पर्व है रात्रि द्वितीय पर्व है । यजमान को इस प्राकृतिक यज्ञ को आत्मसात् करना है । वाक् ही यज्ञ है बस प्रातः सायं वाक्संयमन करना अहोरात्र स्वरूप संवत्सर यज्ञ को जोड़कर आत्मसात् करना है । दो वस्त्रों को जोड़ने के लिए जैसे डोरा लगाया जाता है वह डोरा इस कपड़े में भी रहता है एवं उसमें भी रहता है । बस अहोरात्र स्वरूप दो यज्ञ - वस्त्रों को जोड़ने वाला यही वाक् यज्ञ है । यज्ञ ही से यज्ञ का सन्धान होता है । उस समय वाक् खर्च करना यज्ञ को सीने वाले, मिलाने वाले डोरे को खर्च करना है । अतः उतनी देर वाक् संयमन ही रखना चाहिए । प्रातःकाल सूर्योदय से पहले वाक् संयमन करने से रात्रि दिन में बद्ध हो जाती है एवं सायंकाल सूर्यास्त से पहले वाक् संयम से दिन में बद्ध हो जाता है इसी-लिए कहते हैं " संतत्या ( संतायै ) एव अहरेवैतद् रात्र्या संतनोति श्रह्ना रात्रिम् ॥ २६ ॥

दीक्षित के रहने के लिए देवयजन भूमि में एक नियत मकान बनाया जाता है । उसका नाम " दीक्षित विमित " रक्खा जाता है । इस दीक्षित विमित से अन्यत्र इस यजमान के घूमते हुए, हवा खोरी करते हुए सूर्य अस्त हो जाय । अर्थात् वह दीक्षित विमित से बाहर ही टहलता रहे एवं उसी समय सूर्यास्त हो जाय - ऐसा कभी नहीं होना चाहिए । सूर्यास्त से पहले पहले हमें अपने घर में जाकर प्रतिष्ठित हो जाना चाहिए । “ नैनमन्यत्र चरन्तमभ्यस्तमियात् " एवमेव इस यजमान को सोते हुए सूर्योदय कभी न हो अर्थात् ऐसा न हो कि सूर्योदय हो जाय और वह सोता ही रहे । इसे सूर्योदय से पहले ही उठ जाना चाहिए-" न स्वपन्तमम्युपदियात् " एवमेव इस यजमान को सोते हुए सूर्योदय कभी न हो अर्थात् ऐसा न हो कि सूर्योदय हो जाय और वह सोता ही रहे । इसे सूर्योदय से पहले ही उठ जाना चाहिए-[ २६७ ]

पृष्ठ 286

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) दीक्षितव्रत ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण " न स्वपन्तमम्युपदयात् " वह सूर्य यजमान को दीक्षित विमित से अन्यत्र रहते ही अस्त हो जायगा तो वह अस्त होता हुआ सूर्य यजमान को रात्रि के प्राण से अलग कर देगा । दिन का प्रारण ऐन्द्र । इन्द्र गतिधर्मा है । ऐसी अवस्था में यदि बाहर ही टहलते रहोगे तो गति स्वरूप ऐन्द्र प्राण प्राधस्थात् रात्रि का यज्ञ के द्वितीय पर्व का प्रारण तुम्हारे से अलग जायगा । " स यदेनमन्यत्र चरन्तमभ्यस्तमियात् रात्रेरेनं तदन्तरियात् । " यदि सोते हुए उदय हो जायगा तो वह इस यजमान को अहर्भाग से ऐन्द्रभाग से अलग कर देगा । यदि सोते रहे तो प्रातःकाल के प्रारम्भ का मुख्य प्रारण निकल गया, उसका तुम्हारे से सम्बन्ध नहीं हुआ । " स्वपन्तमन्तरियादहन् एनं तदन्तरियात् " याज्ञवल्क्य कहते हैं कि पूर्व के अव्रत्य क्रोध इत्यादि जो दोष थे उनका तो प्रायश्चित्त भी था परन्तु इन दोनों अपराधों का प्रायश्चित्त ही नहीं है, इसलिए इनसे सदा बचते रहना चाहिए । नात्र प्रायश्चित्तिरस्ति प्रतिगुप्यमेवैतस्मात् " यज्ञान्त में अवभृतस्नान किया जाता है । यज्ञान्तस्नान को ही अवभृतस्नान कहा जाता है । यजमान को चाहिए कि यह यज्ञान्त के पहले कभी पानी में गोता न लगाये, एवं कभी उस पर वर्षा न पड़े । अर्थात् न यह बरसते मेह में जाय एवं न पानी में डुबकी लगावे । अवभृतस्नान से पहले डुबकी लगाकर नहाना और वर्षा में जाना प्रकृतियज्ञ के सर्वथा विरुद्ध है । यज्ञ अग्निस्वरूप है । इसके चारों ओर परमेष्ठिमण्डल है जब यज्ञ समाप्ति पर श्रर्थात् २६ वें अग्नि पर परमेष्ठि का वेष्टन रहता है अतएव यहाँ भी अग्नि अर्थात् यज्ञ की समाप्ति पर ही प्रकृत्युनुसार पानी का वेष्टन करना चाहिए, यही तात्पर्य है । " अनवक्लृप्तं ह तत् यत् पुरावभृथादपोऽभ्यवेयात् यद्धेनमभिवर्षेत् ” यह दीक्षित परिमित समयोचित संकुचित ही वाक् बोलता है जो प्रसृता मानुषी वाक् है उसे नहीं बोलता है । अर्थात् इसे गप्प समझ नहीं बोलना चाहिए । अपितु परिमित ही बोलना चाहिए । " अथ परिह्वालं वाचं वदति न मानुषीं प्रसृताम् । " क्यों परिमिता ही बोलता है - इसका कारण बतलाते हैं ॥ २७ ॥

" यज्ञेन वै देवाः " दोनों कण्डिकाओं की व्याख्या पूर्व के अध्यात्मपक्ष में कर दी गई है तात्पर्य इसका यही है कि वाक् ही यज्ञ है । ज्यादा बोलना यज्ञ को आत्मा से निकालना है । अतएव परिमित ही बोलना चाहिए ॥ २८–२९ ॥ [ २६८ ]

पृष्ठ 287

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तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्राह्माण दीक्षित व्रत ब्राह्मणं अधीक्षते का अर्थ है गौर करना । अन्दर डुबकी लगाकर तह पर पहुंचना । " इदं कर्तव्यं इदं न कर्तव्यम् इदं भोक्तव्यम् इदं न भोक्तव्यम् — तत्र गन्तव्यम् तत्र न गन्तव्यम् " इसी का नाम अधीक्षा कहलाता है । प्रेक्षापूर्वक काम करने का नाम ही अधीक्षा है, एवं जो प्रेक्षापूर्वक काम करता है वह अधीक्षित कहलाता है । आज यह यजमान अधीक्षा करता है । अर्थात् हर काम सोच समझ कर करता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं । " स वै धीक्षते । अधीक्षते का ' अ ' लुप्त ही हुआ समझना चाहिए । इसकी यह घीक्षा वाक् के लिए है । वाक् स्वरूप यज्ञ के लिए ही यह दीक्षित बनता है । वाक् ही तो यज्ञ है । बस घीक्षित ही का नाम दीक्षित समझना चाहिए । चूंकि देवता परोक्षप्रिय हैं । अतएव इस यजमान को घीक्षित न कहकर दीक्षित कहते हैं । " स वै धीक्षते । वाचे हि धीक्षते । यज्ञाय हि धीक्षते । यज्ञो हि वाक् । धीक्षते ह वै नामैतत् यद् दीक्षित " इति ॥ ३० ॥

। इति दीक्षितव्रत ब्राह्मणम् ।

॥ इति द्वितीयाध्याये द्वितीयं ब्राह्मणं समाप्तम् ॥

[ २६ ९ ]

पृष्ठ 288

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अथ द्वितीयाअध्याये तृतीयं ब्राह्मणम् ' प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण ' ( मूल ) - आदित्यं चरु प्रायणीयं निर्वपति । देवा ह वा ऽस्यां यज्ञं तन्न्वाना ऽइमां यज्ञादन्तरीयुः सा हैषामियं यज्ञं मोहयाञ्चकार कथं नु मयि यज्ञं तन्वाना मां यज्ञादन्तरीयुरिति तं ह यज्ञं न प्रजज्ञुः ॥ १ ॥

ते होचुः । यन्त्वस्यामेव यज्ञंमतंस्महि कथं नु नोऽमुहत्कथं न प्रजानीम-इति ॥२ ॥

ते होचुः । अस्यामेव यज्ञं तन्वाना ऽइमां यज्ञादन्तरगाम सा न ऽइयमेव यज्ञमममुह दिमामेवोपधावामेति ॥३ ॥

ते होचुः । यन्तु त्वय्येव यज्ञमतंस्महि कथं नु नोऽमुहत्कथं न प्रजानीम इति ॥४ ॥

साहोवाच । मय्येव यज्ञं तन्वाना मां यज्ञादन्तरगात हा वोऽहमेव यज्ञममूमुहं भागं नु मे कल्पयताऽथ यज्ञं द्रक्ष्यथाऽथ प्रज्ञास्यवेति ॥ ५ ॥

तथेति देवाऽब्रुवन् । तवैव प्रायणीयस्तवोदयनीय ऽइति तस्मादेष ादित्य एव प्रायणीयो भवत्यादित्य ऽउदयनीय इयं वाऽदितिस्ततो यज्ञम-पश्यँस्तमतन्वत ॥६ ॥

स यदादित्यं चरु प्रायणीयं निर्वपति । यवस्यैव दृष्ट्य यज्ञं दृष्ट्वा कीरणानि तं तनवाऽइति तस्मादादित्यं चरू प्रायणीयं निर्वपति तद्व निरुप्तं हवि-रासीदनिष्टा देवता ॥७ ॥

अर्थभ्यः पथ्या स्वस्तिः प्राऽरोचत । तामयजन्नवाग्वै पथ्या स्वस्तिर्वाग्य-ज्ञस्तद्यज्ञमपश्यँस्तमतन्वत || ८ || [ २७१ ]

पृष्ठ 290

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण अर्थभ्योऽग्निः प्रारोचत । तमयजन्त यदाग्नेयं यज्ञस्याऽऽसत्तिदपश्यन्-शुष्कं यज्ञस्य तदाग्नेयं तदपश्यंस्तदतन्वत ॥९ ॥

श्रथैभ्यः सोमः प्राऽरोचत । तमयजन्त्स यत्सौम्यं यज्ञस्याऽसीत्तदप-यद्वा यज्ञस्य तत्सौम्यं तदपश्यंस्तदतन्वत ॥१० ॥

अर्थभ्यः सविता प्रारोचत । तमयजन्न्पशवो वै सविता पशवो यज्ञस्त-द्यज्ञमपश्यँस्तमतन्वताऽथ यस्यै देवतायै हविनिरूप्तमासीत्तामयजन् ॥११ ॥

ता वा ऽएताः । पञ्च देवता यजति यो वै स यज्ञो मुग्ध श्रासीत्पाड़, र तो वं ससीत्तमेताभिः पञ्चभिर्देवताभिः प्राजानन् ॥१२ ॥

ऋतवो मुग्धा प्रसन्न्पञ्च । तानेताभिरेव पञ्चभिर्देवतानिः प्राऽजानन् ॥१३ ॥

दिशो मुग्धाऽप्रासन्पञ्च । तानेताभिरेव पञ्चचभिर्देवताभिः प्राऽजानन् ॥१४ ॥

उदीचीमेव दिशम् । पथ्यया स्वस्त्या प्राजानंस्तस्मादत्रोत्तरा हि वाग्वदति कुरुपञ्चालत्रा वाग्ध्येषा निदानेनोदीचीं तया दिशं प्राऽजानन्नुदीची ह्य ेतस्यै दिक् ॥१५ ॥

प्राचीमेव दिशम् । श्रग्निना प्राजानस्तस्मादग्नि पश्चात्प्राञ्चमुद्धृ-त्योपा ss सते प्राचीं ह्य तेन दिशं प्राजानन्प्राची ह्येतस्य दिक् ॥ १६ ॥

दक्षिणामेव दिशं । सोमेन प्राऽजानस्तस्मात्सोमं क्रीतं दक्षिणा परि-वहन्ति तस्मादाहुः पितृदेवत्यः सोमऽइति दक्षिणां तेन दिशं प्राजानन्दक्षिणा ह्येतस्य दिक् ॥ १७ ॥

प्रतीचीमेव दिशं । सवित्रा प्राजानन्नेष वै सविता य एष तपति तस्माः देष प्रत्यङ ङति प्रतीचीं तेन दिशं प्राजानन्प्रतीची ह्य ेतस्य दिक् ॥ १८ ॥

उध्वमेव दिशम । श्रादित्या प्राऽजानन्नियं वा ऽ प्रदितिस्तस्मादस्या-मूर्ध्वा ऽश्रोषधयो जायन्तऽरूद्धर्वा वनस्पतयऽउर्ध्वा ह्यतया दिशं प्राज्जानन्नूद्धर्वा तस्यै दिक् ॥१ ९ ॥ [ २७२ ]