Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 291–300

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 291–300

पृष्ठ 291

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतथि ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण शिरो वै यज्ञस्यातिथ्यम् । बाहू प्रायणीयोदयनीयावभितो वै शिरो बाहू भवतस्तस्मादभित आतिथ्यमेते हविषी भवतः प्रायणीयश्चोदनीयश्च ॥ २० ॥

तदाहुः । यदेव प्रायणीये क्रियेत तदुदयनीये क्रियेत यदेव प्रायणीयस्य बहिर्भवति तदुदयनीयस्य बहिर्भवतीति तदपोद्धृत्य निदधाति तां स्थाली सक्षा-म प्रमृज्यमेक्षणं निदधाति यएव प्रायणीयस्यत्वजो भवन्ति तऽउदनीयस्य-S त्विजो भवन्ति तद्यदेतत्समानं यज्ञे क्रियते तेन बाहू सदृशौ तेन सरूपौ ॥२१ ॥

तदु तथा न कुर्यात् । काममेवैतद्बहिरनु - प्रहरेदेवं मेक्षणं निणिज्य स्थालों निदध्याद्य एव प्रायरणीयस्यऽत्विजो भवन्ति तऽउदयनीयस्य त्विजो भवन्ति यते विप्रेताः स्युरप्यन्य एव स्युः स यद्वै समानीर्देवता यजति समानानि हवींषि भवति तेनैव बाहू सदृशौ तेन सरूपौ ॥२२ ॥

सवै पञ्च प्रायणीये देवता यजति । पञ्चोदयनीये तस्मात्पञ्चेत्थाद-ङ गुलयः पञ्चेत्थात्तच्छम्य्वन्तं भवति न पत्नीः संयाजयन्ति पूर्वार्धं वाऽन्वा-त्मनो बाहू पूर्वार्धमेवैतद्यज्ञस्याभि संस्करोति तस्माद्यम्य्वन्तं भवति न पत्नीः संयाजयन्ति ॥ २३ ॥

[ अनुवाद ] दीक्षणीयेष्टि ब्राह्मण में यजमान ने यज्ञ के लिए दीक्षा ग्रहण की-इस बात का निरूपण किया जा चुका है । सोम याग के लिए अधिकार प्राप्ति ही दीक्षा है । इसके बाद दीक्षित के लिए वाक् - संयमन, शयन, जागरण, भाषण आदि के विशेष नियमों का प्रतिपादन किया जा चुका है । क्योंकि दीक्षाग्रहणानन्तर दीक्षित यजमान सामान्य मनुष्य नहीं रह जाता । वह देवताओं में अन्यतम व्यक्ति हो जाता है अत: उसके लिए सामान्य मनुष्यों से भिन्न देव सम्बन्धी नियमों का पालन श्रावश्यक हो जाता है । अब इस प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण में सोमयाग का प्रारम्भ किया जा रहा है । सोमयाग में सर्वप्रथम प्रायणीयेष्टि की जाती है । " प्रेति प्रारभते सौमिक कर्म अनेन इति प्रायणीयः । इस व्युत्पत्ति से सोमयाग के प्रारम्भ के लिए क्रियमाण इष्टि कर्म ही प्रायणीय कहलाता है । सोमयाग से यजमान नवीन दिव्यात्मा का निर्माण कर स्वर्गलोक में चला जाता है । देवताओंों में स्थान प्राप्त कर लेता है । इसीलिए " स्वर्ग वा एतेन लोकमुप-यन्ति यत् प्रायणीयस्तत् प्रायगोयस्य प्रायणीयत्वम् - ( तै. ब्रा. १ - २ - १ ) इस श्रुति के द्वारा स्वर्गलोक प्राप्त्यर्थ जो कर्म किया जाता उसे प्रायणीय कहा जाता है । जैसा कि कात्या-यन श्रौतसूत्र में बतलाया गया है । [ २७३ ]

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तृतीय काण्ड ( प्र ० २ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण " दीक्षान्ते प्रायणीयमदित्यै चरु निर्वपति " ( का. श्रौ. सू. ७ - १४० - इति । ) सोमयाग का प्रारम्भ पार्थिवप्रारण से ही होता है और पार्थिवप्राण पर ही उसकी समाप्ति होती है । जब तक दीक्षित यजमान पार्थिव प्रारण को आत्मसात् नहीं कर लेता तब तक सोमयाग का स्वर्ग प्राप्ति रूप फल उसे प्राप्त नहीं होता । प्रारणरूप अमृताग्नि का ही नाम आदिति है जो कि भूकेन्द्र से लेकर २१ वें अहर्गणरूप विद्यमान सूर्य तक व्याप्त रहती है । भूकेन्द्र से निकलकर २१ वें अहर्गण तक जाने वाला आग्नेय पार्थिव प्रारण घन, तरल व विरल भेद से तीन भागों में विभक्त हो जाता है । त्रिवृत स्तोम तक वह प्राणाग्नि घन-रूप में रहती है । वहां तक उसका अग्नि ही नाम रहता है । आगे जाकर वह अग्नि विश-कलित होकर तरल रूप में परिणत हो जाती है । की यह तरलावस्था वायु कहलाती है । इस तरलावस्थापन्न अग्नि की स्थिति पञ्चदश स्तोम तक रहती है । इसके अनन्तर यह अग्नि और भी विशकलित होकर विरला-वस्था में परिणत हो जाती है । विरलावस्थापन्न अग्नि आदित्य कहलाती है । इसकी सीमा २१ विशस्तोम तक है । इस प्रकार यह प्राणरूप अग्नि २१ वें स्तोम तक जाती है । यहां जाकर वह समाप्त हो जाती है । अमृत रूप प्रजापति के इन तीन भेदों में ही ३३ आग्नेय देवता आ जाते हैं । अर्थात् ३३ देवता अग्नि के ही विभिन्न स्वरूप हैं । इनमें त्रिवृत् स्तोम तक जाने वाली घनाग्नि ८ वसुरूप अवान्तर आठ भेदों में परिणत हो जाती है । तरल रूप अग्नि जिसे वायु कहा जाता है ११ रुद्र रूप अवान्तर भेदों में परिणत हो जाती है । विरल रूप प्राणाग्नि द्वादश आदित्य रूप १२ अवान्तर भेदों में परिणत हो जाती है । इस प्रकार यह ३१ आग्नेय देवताओं का रूप धारण कर लेती है । त्रिवृत व पञ्चदशस्तोम की तथा पञ्चदश व एकविंशस्तोम की सन्धि दो अश्विनी कुमारों के रूप में परिणत हो जाती है । इस प्रकार ८ वसु, ११ रुद्र तथा १२ आदित्य व दो सान्ध्य देवता अश्विनीकुमार ये ३३ आग्नेय देवता है इन्हीं का निरूपण वाल्मीकि रामायण के निम्न श्लोक में किया गया है— अदित्यां जज्ञिरे देवास्त्रयस्त्रिशंदरिन्दम् । आदित्यां वसवो रुद्रा अश्विनौ च परन्तपं ” ये ही ३३ आग्नेय प्रारण यज्ञिय देवता कहलाते हैं । जैसा कि ऋग्वेद के सप्तममण्डल के निम्न मन्त्र से स्पष्ट है— " इति स्तुतासो असथा रिशादसो ये स्थ त्रयश्चत्रिंशच्च । मनोर्देवा यज्ञियासः । ( ऋ ० ७ म ० ) [ २७४ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० २ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण उपर्युक्त रीति से सारे यज्ञिय देवता आग्नेय पार्थिव प्राणरूप हैं और इन यज्ञिय देवताओं की सत्ता प्रदिति में है । अतः पार्थिव प्रारण को आत्मसात् करने पर सभी यज्ञिय देवता ग्रात्मसात् हो जाते हैं । इसीलिए अदिति देवताक चरु निर्वाप रूप आरम्भणीयेष्टि की जाती है । आज यह मनुष्य यजमान दीक्षानन्तर प्रायणीयेष्टि इसलिये करता है कि जिनसे यह यज्ञविद्या मनुष्यों को प्राप्त हुई है, वे भौम स्वर्गवासी देवता सोमयाग के प्रारम्भ में यह इष्टि करते हैं । अतः ‘ यद्देवा अकुर्वंस्तत्करवाणि ' इस सिद्धान्त के अनुसार मनुष्य यजमान यज्ञ के प्रारम्भ में प्रायणीयेष्टि का अनुष्ठान करता है किन्तु भौमस्वर्गवासी देवतानों ने ही यश के प्रारम्भ में इस इष्टि को क्यों किया? इस प्रश्न का समाधान यही है कि यज्ञविद्या के आविष्कर्ता साध्य लोग थे । जैसा कि निम्न ऋङ् मन्त्र से स्पष्ट हो रहा हैः-यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् । ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥ इन साध्यों से ही यह यज्ञविद्या भौमस्वर्गवासी देवताओं को प्राप्त हुई थी । इस यज्ञविद्या की प्राप्ति देवताओं को साध्यों से अध्ययन के द्वारा नहीं प्राप्त हुई थी अपितु श्रवण के द्वारा, श्रर्थात् देवताओं ने सुन रक्खा था कि साध्य लोग यज्ञविद्या के द्वारा महान् से महान् कार्य कर लेते हैं । श्रतः देवताओं ने भी यज्ञ प्रारम्भ किया । अग्नि में सोम की आहुति देना ही यज्ञ नहीं है । यज्ञविद्या प्रति गहन है । सुनने मात्र से देवताओं की कुंजी प्राप्त नहीं हुई थी । यज्ञ की कुंजी, प्राकृतिक प्राणों की पहचान जब तक नहीं हो जाती है, तब तक प्राप्त नही होती । क्योंकि यज्ञ के द्वारा आध्यात्म प्राणों में श्राधिभौतिक साधनों द्वारा आधिदैविक प्राणों का आधान किया जाता है । प्राध्यात्मिक व प्राधिदैविक ( प्राकृतिक ) प्राणों का सङ्गतिकरण ही यज्ञ है । अतः उन्होंने उन प्राणों की खोज प्रारम्भ की तथा निरन्तर श्रम के द्वारा उन्हें यज्ञ रहस्य प्राप्त हो गया । प्रारम्भ में साध्यों से सुनकर जो यज्ञ किया था । उसमें केवल अग्नि में सोम की श्राहुति ही थी, किन्तु अदिति रूप पार्थिव प्राण का ज्ञान न होने से पृथिवी पर यज्ञ करते हुए भी पार्थिव प्राण को उन्होंने आत्मसात् नहीं किया था । इस प्रकार पार्थिव प्राण को यज्ञ से बहिर्भूत कर दिया था । अब उन्हें यह मालूम हुआ कि पार्थिव प्राण को आत्मसात किये बिना यज्ञ निष्फल है, उससे कभी स्वर्ग प्राप्ति नहीं हो सकती, क्योंकि यज्ञ के द्वारा पार्थिव प्राण का अर्थात् आध्यात्मिक प्राण का सौर प्राण अर्थात् देवप्राण के साथ सम्बन्ध करना है, इसी सम्बन्ध के कारण शरीर त्यागानन्तर मनुष्य का आत्मा सौर देवप्राणों से आकृष्ट होकर स्वर्गलोक में चला जाता है । इसलिये अब उन्होंने सर्वप्रथम पार्थिव प्राण-रूप, अदिति देवताक चरु निर्वाप रूप प्रायणीयेष्टि को । उपर्युक्त रहस्य को भगवान् याज्ञवल्क्य ने एक कथा की कल्पना कर इस के द्वारा बतलाया है । अर्थात् जब भौमस्वर्गवासी [ २७५ ]

पृष्ठ 294

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तृतीय काण्ड ( ० २ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण देवतानों ने जब यज्ञ करवा लिया तब इस पृथिवी ( पार्थिव प्रारण ) को यज्ञ भाग से अलग कर दिया । इससे अप्रसन्न होकर पृथिवी ने देवताओं के यज्ञ को मोह में डाल दिया अर्थात् यज्ञ को देवताओं की दृष्टि से छुपा दिया । क्योंकि उसने यज्ञ को छुपा लिया, अतः देवता यज्ञ को नहीं जान सके ॥ १ ॥

देवता कहने लगे कि हमने भी साध्यों की तरह इस पृथ्वी पर यज्ञ का वितान किया, फिर क्या कारण है कि यज्ञ हम से अदृश्य हो गया ॥ २ ॥

इस प्रकार बहुत विचार करने पर उन्हें मालूम हुआ कि पृथिवी प्राण ही यज्ञ की वास्तविक वस्तु है । प्राण अदृश्य वस्तु है । उसको आत्मसात् किये बिना हमने यज्ञ किया, अतः इस पृथ्वी प्राण को आत्मसात् न करने के कारण यज्ञ को हम नहीं जान सके । हमारा यज्ञ निष्फल हुआ । इसलिए पृथिवी प्राण रूप अदिति के पास ही हविर्भाग लेकर पहुंचे || ३ || उन देवताओं ने प्राणरूप पृथिवी से कहा कि आप पर ही हमने यज्ञ का वितान किया फिर आपने इस हमारे यज्ञ को क्यों मोह लिया अर्थात इस का स्वरूप हमें ज्ञान नहीं हुआ ।४ । पृथ्वी ने कहा - कि देवताओं, तुमने मेरे पर ही यज्ञ किया किन्तु मुझे यज्ञ भागरहित क्यों किया? इसलिए मैंने इस तुम्हारे यज्ञ को मोहित कर दिया । श्राप लोग इस यज्ञ में मेरा भाग निश्चित करो । तब तुम्हें वह यज्ञ दिखाई देगा । अर्थात् यज्ञस्वरूप को तुम जान जानोगे । तात्पर्य यह है कि यज्ञ का मूल पृथिवी है । उस पृथिवी प्रारण को पहले जानना चाहिये । तभी यज्ञ का स्वरूप आपको विदित होगा, यज्ञ को आप देख सकोगे ॥ ५ ॥

देवताओं ने इस बात को स्वीकार किया और माना कि पृथ्वी से ही यज्ञ का प्रारम्भ होता है और उसी पर यज्ञ समाप्त होता है । अतः सर्वप्रथम पृथिवी प्राण को आत्मसात् करना चहिए इसलिए प्रायणीय व उदयनीय दोनों इष्टियां प्रदिति देवताक हैं । यह पृथिवी अर्थात् पार्थिव प्रारण ही अदिति है । इस प्रकार पृथिवी प्राण को पहचानने पर यज्ञ का दर्शन हो गया और देवताओं ने उस यज्ञ का वितान किया । इस बात को समझाने के लिए जो कथा कही गई है उसके अनुसार पृथिवी ने देवताओं से कहा कि यज्ञ में मेरा भी भाग रखिये । मुझे यज्ञ से बहिर्भ ूत न कीजिए । देवताओं ने इस बात को स्वीकार किया यज्ञ के प्रारम्भ की प्रायणीयेष्टि भी आप की होगी और यज्ञान्त में जो उदयनीयेष्टि होगी उसमें भी आपको हवि दी जायेगी । इस प्रकार यज्ञ में पृथिवी का भाग नियत कर देने पर पृथिवी ने देवताओं के लिए यज्ञ रहस्य को प्रकट कर दिया और देवताओं ने यज्ञ का वितान किया । यद्यपि ये दोनों इष्टियां अदिति देवताक हैं न कि पृथिवी देवताक तथापि " इयं ( पृथिवी ) वा श्रदितिः " ( कौ ० ७-६ ) तै ० ( १-१-६-५ ) गोपथ-( १-२५ ) इयं पृथिवी प्रादितिः " ( ऐ०१-८ ) इयं वै ( पृथिव्यदितिः ) शत ० ( १-१-४ ) इत्यादि श्रुतिवचनों के अनुसार पृथिवी ही श्रदिति है । अतः अदिति देवताक हवि पृथिवी देवताक [ २७६ ]

पृष्ठ 295

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तृतीय काण्ड ( श्र ० २ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्म ही है किन्तु यह ध्यान में रखना चाहिए भूपिण्ड अदिति न कहला कर अमृता प्राणरूपा पृथिवी जो कि भूकेन्द्र से लेकर २१ वें अहर्गण तक व्याप्त है वह अदिति कहलाती है । इसी पृथिवी प्राण का ज्ञान होने पर उसे जब देवताओं ने अात्मसात् किया तब ही यज्ञ का स्वरूप देवताओं को मालूम पड़ा और तभी यज्ञ का वितान हुआ । प्रीयरणीय तथा उदयनीय दोनों इष्टियां अदिति देवताक हैं । १८० के अंशात्मक दृश्य खगोल के ६० अंश के उत्तरी ध्रुव तथा ६० अंश के दक्षिण ध्रुव दोनों के मध्य का ४८ अंश का परिसर है उसे क्रान्तिवृत्त कहा जाता है । यही क्रान्तिवृत्त पृथिवी का परिभ्रमण मार्ग कहलाता है । ४८ अंश के परिसर के मध्य में जो सबसे बड़ा पूर्वापर वृत है उसे बृहती कहते है । उत्तर से दक्षिण तक के पूर्वापरवृत्त नामक अहोरात्रों में सबसे बड़ा है । इसी बृहती पर सूर्य प्रतिष्ठित है । जैसा कि " सूर्यो बृहती मध्यूढस्तपति " इस श्रुतिवचन से सिद्ध हो रहा है । पृथिवी इस क्रान्तिवृत्त पर सूर्य की परिक्रमा करती हुई कभी उत्तर गोल की क्रान्ति पर पहुँच जाती है और कभी दक्षिण गोल की क्रांति पर । किन्तु उत्तर गोल से दक्षिण गोल में जाती हुई यह मध्यस्थ विषुवतवृत्त पर भी पहुंचती है और दक्षिण गोल से उत्तर गोल में जाते समय भी विषुवद् वृत्त पर पहुंचती है । दोनों ओर से जब विषुवद् वृत पर आती है तब विषुवद् वृत पर विद्यमान सूर्य के सम धरातल पर आ जाती है । उस समय क्रान्ति ( सूर्य की दूरी ) का पता हो जाता है । अतः इसे सम्पात कहते हैं । उत्तर गोल से दक्षिण गोल जाती हुई पृथिवी का जो कान्तिपात होता है उसे शरत् सम्पात कहते हैं । क्योंकि वह शरद् ऋतु में २२ सितम्बर में होता है और दक्षिण गोल से उत्तर गोल में जाती हुई जब विषवत् वृत्त पर आती है तब वसन्त सम्पात होता है । इन दोनों सम्पातों पर दिन और रात्रि समान होते हैं । किन्तु शरत् सम्पात के बाद जब पृथिवी दक्षिण गोल में जाती है तब रात्रि बडी और दिन छोटे होते हैं क्योंकि इस समय पृथ्वी सूर्य के नीचे चली जाती है । ज्यों ज्यों नीचे जाती है सूर्य का प्रकाश पृथिवी पर कम पडता है और इस तरह दिन छोटे और रात्रि बडी होती जाती है । तात्पर्य यह है कि जब पृथिवी सूर्य के चारों ओर घूमती हुई विषुवत् पर सूर्य के समधरातल पर आती है तब सूर्य संमुख कल्पित बिन्दु का नाम ही अदिति बिन्दु है । इस अदिति बिन्दु से ही यज्ञ का प्रारम्भ होता है क्योंकि जब अदिति बिन्दु से ( विषुवत् ) पृथिवी नीचे जाती है उस तब पर सौर पदार्थों की आहुति होती है । ऊपर की वस्तु के पदार्थों की नीचे की वस्तु पर आहुति होती है और पृथिवी पर सौर पदार्थों की आहुति का नाम ही यज्ञ है अतः यह कहना सर्वथा संगत है कि विषुवत् पर सूर्य संमुख कल्पित अदिति से ही यज्ञ का प्रारम्भ होता है अतः अदिति देवताक ही प्रायगोयेष्टि है तथा जब घूमती हुई पृथिवी दक्षिण गोल से उत्तर गोल में आती है तब विषुवतु पर आने पर सूर्य से ऊपर चली जाती है । अतः पृथिवी के सूय से ऊपर होने के कारण पृथिवी में सौर पदार्थों की आहुति नही होती । यही यज्ञ की समाप्ति है । अर्थात् उदयनीयेष्टि है । अतः यह सिद्ध हो जाता है कि अदिति ही यज्ञ प्रारम्भ रूप प्राणीयेष्टि है तथा वही यज्ञ समाप्ति रूप उदयनीयेष्टि है । इसी अभिप्राय से भगवान् याज्ञवल्यक्य ने कहा है " एष आदित्य एव प्रायणीयो भवत्यादित्या [ २७७ ]

पृष्ठ 296

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तृतीय काण्ड ( श्र ० २ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण उदयनीयः ” इति अर्थात् यह प्रदितिरूप पृथिवी ही यज्ञ का प्रारम्भ स्थान है एवं यही अदिति रूप पृथिवी यज्ञ का परिसमाप्ति स्थान है । अदिति को केन्द्र में रखकर पृथिवी के दक्षिण गोल में जाने पर यज्ञ का प्रारम्भ होता है तथा अदिति से पृथिवी के उत्तर गोल में जाने पर जो सौर पदार्थों का सौर प्रकाश का पृथिवी पर अभाव होता है, यही यज्ञ की समाप्ति है, क्योंकि अब सौर तत्वों की पृथिवी पर आहुति नहीं होती है अतः अदिति ही यज्ञ समाप्ति स्थान है । यज्ञ स्वरूप के परिज्ञान के लिए अदिति के स्वरूप का ज्ञान अत्यावश्यक है । अतः यजमान अदिति के स्वरूप को पहचानने के लिए प्रायणीव अदितिदेवताक चरू का निर्वाप करता है । इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य ने कहा है “ स आदित्यं चरू प्रायणीयं निर्वपति यज्ञस्यैव दृष्ट्यै । यज्ञं दृष्ट्वा क्रीणानि तं तनवा " इति । यज्ञ के लिए ही सोमयाग में सोम का क्रयरण किया जाता है और उस क्रीत सोम के द्वारा सोमयाग का वितान किया जाता है । जिस देवता के लिए हवि दी जातो है उसे हवि को वह देवता ग्रहण कर लेता है । वह हवि उस देवता में सम्मिलित हो जाती है । जिस देवता को जो हवि दी जाती है उस हवि का वह इष्ट देवता कहलाता है । वह हवि उस देवता के द्वारा गृहीत हो जाने पर वह इष्ट देवता हो जाती है । किन्तु अदिति कोई देवता नहीं है अतः इसको दी हुई हवि देवता द्वारा गृहीत होने से अनिष्टा देवता ही रहती है । इसी अभिप्राय से कहा है " तद्वै निरूप्तं हविरासीदनिष्टा देवता - इति ॥७ ॥

अदिति को पहचानना ही पथ्यास्वस्ति का पहचनना है । जैसे अदिति सूर्य सम्मुख धरातल पर विद्यमान कल्पित बिन्दु है उसी प्रकार सूर्य से पश्चिम की ओर सूर्य के परिभ्रमण मार्ग का नाम पथ्यास्वस्ति है । अर्थात् दृश्यमण्डल की अपेक्षा से सूर्य पूर्व से पश्चिम की ओर चलता हुआ दिखाई देता है । वह कल्पित बिन्दु ही पथ्यास्वस्ति कहलाती है । अर्थात् सूर्य-परिभ्रमण मार्ग स्थिति ही पथ्यास्वस्ति है । किन्तु वह बिन्दु प्रतिदिन नवीन नवीन बनती है । अतः पथ्यास्वस्ति भी बदलती जाती है क्योंकि पूर्व से पश्चिम अर्थात् उदय से ग्रस्त की ओर जाते हुए सूर्य की भ्रमण मार्ग स्थिति बदलती रहती है । वह एक - एक बिन्दु उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ता रहता है । उसका मार्ग परिवर्तित होता रहता है । किन्तु यह ध्यान में रखना चाहिये कि पथ्यास्वस्ति अदिति बिन्दु की तरह सर्वथा कल्पित नहीं है । उसमें वाक्रूप पदार्थ भी सूर्य परिभ्रमण मार्ग रेखायें है । अतः वहां वाक् भाग से परिपूर्ण है । तात्पर्य यह है कि अग्नि अमृत - मर्त्य भेद से व चित्यचितेनिधेय भेद से दो प्रकार की है उनमें अमृताग्नि को चितेनिधेयाग्नि तथा मर्त्याग्नि को चित्याग्नि कहा जाता है । अमृता-ग्नि रूप पृथिवी में सौर पदार्थों व पारमेष्ठय पदार्थों की प्राहुति होती रहती है । आहुति उसी की होती है जो पशुभाग व मर्त्यभाग है । जैसे सूर्य से परित्यक्त अतएव अनात्म सौर प्रकाश की आहुति अमृताग्निरूप पृथिवी में होती है उसी प्रकार पृथिवी के मर्त्यभाग पशुभाग धातु - उपधातु आदि की सूर्य में श्राहुति होती रहती है । अमृताग्नि को अन्नाद व मर्त्यभाग को [ २७८ ]

पृष्ठ 297

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण अन्न कहते हैं । प्रत्येक पदार्थ दूसरे का अन्न- भोज्य भी बनता है तथा अन्नाद भोक्ता भी । समय सूर्य से प्रवृक्त होकर अनात्म बन कर पार्थिव अमृताग्नि में आहुत होती रहती है । इस प्रकार पार्थिव श्रग्नि ग्रन्नाद है तथा उसका मर्त्यभाग सौर रश्मियों से आकृष्ट होकर सूर्य का अन्न व भोग्य भी बनता रहता है । प्रत्येक पदार्थ की यही स्थिति है । इसीलिए कहती है " ग्रहमन्नमन्नमदन्तमद्मि ” इति । इस प्रकार सूर्य परिभ्रमणरेखा सूर्य राश्मियों से आकृष्ट पृथिवी के मर्त्य अन्न वाग् भाग से व्याप्त है । श्रतः सूर्य परिभ्रमणरेखा केवल अदिति बिन्दु की तरह सर्वत्र कल्पित सी नहीं है अपितु सूर्य रश्मियों द्वारा प्राकृष्ट पार्थिव मर्त्यवाग् भाग से युक्त हैं । ग्रतः उन्हें सर्वथा कल्पित नहीं माना जा सकता । उपर्युक्त रीति से सूर्यपरिभ्रमरण मार्ग रेखानों की विभाजिका उत्तर गोल की परमक्रान्ति तक उन दोनों गोलों के मध्य में विद्यमान अदिति बिन्दुएँ भी हैं । उन्हीं अदिति बिन्दुओं से उत्तर परम क्रान्ति से दक्षिण परम त्रान्ति तक विद्यमान सूर्य परिभ्रमण मार्ग रेखाओं का विभाजन होता है । ये ही अदितिबिन्दुएँ उन सूर्य परिभ्रमणमार्ग रेखाओं का ज्ञान कराती है अतः अदिति के ज्ञान से सूर्य परिभ्रमरणमार्ग रेखारूप पथ्यास्वस्ति की भी पहचान हो जाती है अतः देवताओं ने अदिति की तरह पथ्यास्वस्ति को भी पहचाना और उनका भी यजन किया । परन्तु जैसा पहले बतला दिया गया है वे सूर्य परिभ्रमण मार्ग रूप रेखायें वाक् से व्याप्त हैं अतः वाक् को ही पथ्यास्वस्ति कहा जाता है । यह वाक् ही यज्ञ है क्योंकि पार्थिव मर्त्याग्नि ही क, च, ट, त, प, आदि वर्णों में परिणत होता है इसीलिए इस वाक् को अग्नि का उपनिषद् - " तस्य वा एतस्याग्नेर्वागेबोपनिषद् " - इस श्रुति में बतलाया गया है तथा - " अग्नि-र्वाग् भूत्वा मुखं प्राविशत् " इस ऐतरेयोपनिषत् श्रुति में श्राधिदैविक प्रग्नि ही वाग् रूप में परिणत होकर मुख में प्रविष्ट हो गया, यह कहा है । क, च, ट, त, प, ग्रादि वर्ण समष्टि ही मन्त्र कहलाती है तथा मन्त्र के बिना यज्ञ निष्पन्न नहीं होता । अतः यज्ञ साधनत्वेन वर्णसम-ष्टि रूप मन्त्र यज्ञरूप है इस अभिप्राय से याज्ञवल्क्य ने कहा है-" वाग्वै पथ्यास्वस्तिः, वाग्यज्ञः तद्यज्ञमपश्यन् तमन्वत - अर्थात् पथ्यास्वस्ति को जानना वाक् को जानना है । वाग् यज्ञरूप है । अतः पथ्यास्वस्ति रूप वाक् के ज्ञान से यज्ञ का स्वरूप मालूम पडता है । इस यज्ञ को जानकर देवताओं ने उस यज्ञ का वितान किया ॥ ८ ॥

जैसे अदिति के ज्ञान से पथ्यास्वस्ति रूप वाक् का अर्थात् पार्थिव मर्त्याग्नि का ज्ञान हो गया उसी प्रकार अदितिरूप अमृताग्नि का भी ज्ञान हो गया और यज्ञ में अमृताग्नि ही प्रधान वस्तु है । उसी में तो आहुति होती है और अग्नि में सोमाहुति होती ही यज्ञ कहलाती है । इसी अभिप्राय से कहा है “ अर्थभ्योऽग्निः प्रारोचत " अर्थात् प्रदिति के ज्ञान से अमृताग्नि के स्वरूप का ज्ञान भा देवताओं को ही गया । देवताओं ने उस अमृताग्नि का यजन किया । [ २७६ ]

पृष्ठ 298

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण अग्नि का परिज्ञान सोमयाग के आग्नेयभाग का परिज्ञान है । अतः अग्निस्वरूप ज्ञान द्वारा देवताओं ने यज्ञ में समिधा आदि जो शुष्क वस्तुएँ हैं उनका ज्ञान कर लिया । समिधा आदि शुष्क वस्तुएँ यज्ञ के साधन हैं । इस प्रकार देवताओं ने शुष्क आग्नेय भाग को पहचाना तथा उसे यज्ञ में सम्मिलित कर लिया ॥ अमृताग्नि का ज्ञान होते ही अग्नि में ग्राहुत होने वाले आग्निसमीपवर्ती सोम का ज्ञान भी हो गया । क्योंकि २१ वें अहर्गण तक अग्नि व्याप्त है तथा उससे ऊपर ही सोम की सत्ता है । सोम का ज्ञान होते ही देवताओं ने सोम का यजन किया । उन देवताओं ने सोम की पहचान हो जाने पर यज्ञ का जो सौम्य श्रार्द्र भाग है उसको पहचान लिया । क्योंकि वृतादि आर्द्रवस्तुएँ ही यज्ञ का सौम्य भाग है । उसका ज्ञान हो जाने पर उस सोम की अग्नि में आहुति दी तथा उसे भी यज्ञ में सम्मिलित कर लिया । क्योंकि जैसा बिना अग्नि के याग नहीं होता उसी प्रकार सोम के बिना भी यज्ञ नहीं होता ॥ १० ॥

इसके बाद देवताओं ने, देवताओं को प्रेरित करने वाले, अनुज्ञा प्रदान करने वाले सविता का ज्ञान भी प्राप्त कर लिया क्योंकि सविता के बिना भी यज्ञ नहीं हो सकता । सविता देवता की प्रेरणा से अग्नि व सोम का मेल होता है और अग्नि व सोभ के मेल से ही यज्ञ की निष्पत्ति होती है । सविता ही पशु है । क्योंकि वस्तु से पृथक् हुआ प्रवृत भाग ही पशु कहलाता है । सविता का जो प्रेरणा बल था वह सविता से प्रवृक्त होकर ( पृथक् होकर ) अब अग्नि में, सोम में आगया और उसके मेल का करण बन गया । प्रवृत भाग ही पशु कह-लाता है अतः “ सविता वै पशव: " इस श्रुति में सविता को पशु कहा गया है । जिस प्रकार सोम के बिना याग नहीं होता उसी प्रकार अग्नि व सीम के मेल के बिना भी यज्ञ नहीं हो सकता और दोनों का मेल सविता के प्रेरणा बल से, जो कि सविता से प्रवृक्त होकर अग्नि व सोम में आ गया है- होता है । वह मेल सविता के प्रवृक्त प्रेरणा बल से होता है, और प्रवृक्त भाग ही पशु होता है अतः सविता को भो यज्ञ में सम्मिलित कर लिया गया । अर्थात् पशुनों को भी यज्ञरूप धन होने से पहचाना तथा उन्हें यज्ञ में सम्मिलित किया सविता हो पशुरूप है । यतः सविता को पहचान कर उसे यज्ञ में सम्मिलित करना है । अदिति में प्रदत्त चरू रूप हवि तो प्रदिति के देवताक होने से वह हवि उसमें सम्मिलित नहीं हुई किन्तु दिति के उत्तरवर्ती पथ्या स्वस्ति, अग्नि, सोम, व सविता के देवता होने से उनको दी हुई हवि उनमें सम्मिलित होकर तद्रूप बन गई ॥११ ॥

भुवनस्वर्गवासी देवतात्रों ने यज्ञ के प्रारम्भ में यज्ञस्वरूप निष्पादक अदिति, पथ्या-स्वस्ति, अग्नि, सोम व सविता, इन पाँचों का यजन किया था । इसी प्रकार आज यह यजमान वैध यज्ञ में, यज्ञ के प्रारम्भ में पाँचों देवताओं का यजन करता है । क्योंकि देवताओं से छिपा हुआ जो यज्ञ था वह पाँच अवयवों वाला था । उसे उन्हीं पाँचों देवताओं के द्वारा पहचाना, प्रकट किया ॥ १२ ॥

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण यज्ञ की तरह बसन्त, ग्रीष्म आदि पाँचों ऋतुओं का भी ज्ञान भुवनस्वर्गवासी देवताओं को नहीं था । उन्हीं अदिति आदि पाँचों देवताओं के द्वारा ही उन्होंने ऋतुस्रों का भी ज्ञान प्राप्त किया ॥ १३ ॥

जिस प्रकार अदिति आदि पाँचों देवताओं के ज्ञान के बिना यज्ञादि का भी ज्ञान नहीं था, उसी प्रकार दिशाओं का भी पहले ज्ञान नहीं था । क्योंकि किसी स्थिर स्थल के अभाव के बिना उस स्थिर वस्तु से पूर्व व पश्चिम आदि का ज्ञान कैसे सम्भव था । इसी अभिप्राय से भगवान् याज्ञवल्क्य ने कहा है- “ दिशो मुग्धा ग्रासन् पञ्च । ता एताभिरेव पञ्चभिर्देवताभिः प्राजानन् ॥ १४ ॥

तात्पर्य यह है कि संसार में निरपेक्ष - सापेक्ष भेद से दो प्रकार के पदार्थ हैं उनमें सूर्यं पृथिवी, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र ग्रादि निरपेक्ष पदार्थ हैं । इनके ज्ञान के लिए सूर्यादि पदार्थों को छोडकर अन्य किसी वस्तु की अपेक्षा नहीं है किन्तु जो सापेक्ष पदार्थ होते हैं उनके ज्ञान के लिए दूसरे की अपेक्षा रहती है जैसे पथ्यास्वस्ति, अग्नि, सोम, सविता, ऋतुएँ, दिशायें आदि । पृथिवी परिभ्रमण मार्ग स्थिति रूप पथ्यास्वस्ति, का ज्ञान मार्गज्ञान पर निर्भर है । प्राणाग्नि के अदृश्य होने से उसका ज्ञान जिस दृश्य वस्तु से प्राणाग्नि निकलती है उस वस्तु पर निर्भर उस सोम की निरन्तर आहुति होती रहती है । प्रेरणा प्रदाता सविता का ज्ञान, है जिसमें जिस वस्तु में प्रेरणा प्रविष्ट होती है— उस पर निर्भर है इस प्रकार पथ्यास्वस्ति, अग्नि, सोम आदि पदार्थ सापेक्ष हैं अतः उनका ज्ञान दूसरी वस्तुओं पर निर्भर है । इन सब का ज्ञान अदिति ज्ञान पर ही निर्भर है । अतः देवताओं ने सर्वप्रथम आदित्य चरू के निर्वाप द्वारा अदिति को आत्मसात किया तभी यज्ञ का स्वरूप प्रतीत हुआ । अदिति के अतिरिक्त पथ्यास्वस्ति वाक्, प्राणाग्नि व प्राणसोम तथा प्रेरणा प्रदाता सविता का भी ज्ञान होने पर यजन किया क्योंकि अग्नि, सोम, पथ्यास्वस्तिरूप वाक् तथा सविता के बिना यज्ञ का स्वरूप नहीं बन सकता । ग्रतः अदिति से सविता तक पांचों देवताओं को जानकर उन्हें आत्मसात् कर लिया । प्रारम्भ में यज्ञ स्वरूप निष्पादक अदिति आदि पाँचों का ज्ञान प्राप्त किया और उनका यजन किया । उन्हें आत्मसात् किया । इन पांचों देवताओं का यजन सोमयाग के प्रारम्भ में किया है । अतः इसका नाम प्रायणीयेष्टि हुआ । अदिति आदि पांचों देवताओं के ज्ञान के बिना दिशाओं का भी ज्ञान उनको नहीं हुआ था, क्योंकि दिशा भी सापेक्ष पदार्थ है । उनका ज्ञान आदित्यादि के ज्ञान पर ही निर्भर है अब किस दिशा का ज्ञान किसी देवता से होता है इसका निरूपण किया जा रहा है । उत्तर दिशा का ज्ञान, भुवनस्वर्गवासी देवताओं को पथ्यास्वस्ति के द्वारा हुआ क्योंकि जो सूर्य का उत्तरायण है वही पृथिवी का दक्षिणायन हैं । सूर्य का उत्तरगोल में जाना [ २८१ ]

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तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण पृथिवी का दक्षिण गोल में जाना है । पृथिवी जब विषुवत् से नीचे की ओर जाती है अर्थात् दक्षिण में जाती है तब सूर्य ऊपर आ जाता है और ऊर्ध्ववर्ती सूर्य के पदार्थों का अधोवर्ती पृथिवी में आगमन होता है, वही यज्ञ है । सूर्य का विषुवत् से प्रतिदिन उत्तर की ओर एक-एक बिन्दु बढ़ना सूर्य परिभ्रमण मार्ग स्थितिरूप पथ्यास्वस्ति का उत्तर की ओर जाना है । इस प्रकार विषुवत् से उत्तरोत्तर उत्तर की ओर बढ़ने वाली पथ्यास्वस्ति से देवताओं ने उत्तर दिशा को पहचाना । यद्यपि सूर्यपरिभ्रमरण मार्ग स्थितिरूप पथ्यास्वस्ति उत्तरायण में जैसे उत्तरोत्तर उत्तर की ओर बढ़ती है वैसे ही सूर्य के दक्षिणायन में आने पर वह पथ्या-स्वस्ति प्रतिदिन अर्थात् उत्तरोत्तर दक्षिण की ओर भी बढ़ती है क्योंकि जब सूर्य दक्षिणा -यन होता है तो पृथिवी उत्तरायण हो जाती है अर्थात् उत्तर गोल में आ जाती है अतः पृथिवी के सूर्य की अपेक्षा से ऊपर आ जाने से सौरतत्वों का पृथिवी में आगमन रूप यज्ञ नहीं होता क्योंकि पदार्थं ऊपर से नीचे की ओर जाते हैं । उत्तरवर्ती पदार्थों की अधोवर्ती में हुति होती है । सूर्य के दक्षिणायन काल में पृथिवी के ऊर्ध्ववर्ती व सूर्य के अधोवर्ती होने से सौरपदार्थों का पृथिवी में आगमन रूप आहुति सम्भव नहीं है अतः दक्षिणगोलस्थ सूर्य परिभ्रमण मार्ग रेखायें यज्ञ साधन न होने से यज्ञसाधन भूत उत्तरगोलस्थ सूर्य परिभ्रमरण मार्ग रेखारूप पथ्यास्वस्तियों का ही यहाँ ग्रहरण है जैसा कि पहले बतलाया जा चुका है । ये पथ्यास्वस्तियाँ अदिति की तरह केवल कल्पित बिन्दु रूप ही नहीं है किन्तु उसमें सूर्य रश्मियों द्वारा आकृष्ट मर्त्याग्नि रूप वाक् की भी सत्ता है । अतः वाक् से परिपूर्ण होने के कारण पथ्यास्वस्ति को वाक् कहा गया है और यज्ञ साधनभूत यह वाक् उत्तर गोलस्थ पथ्या स्वस्तिगत ही है इसीलिए उत्तर की तरफ कुरुपाञ्चाल देशों में मधुर व स्फीत अर्थात् स्पष्ट वाणी का उच्चारण होता है । इसी उत्तर गोलस्थ सूर्य परिभ्रमण मार्ग रेखा रूप पथ्या-स्वस्ति ही मर्त्याग्निरूप वाक् से परिपूर्ण होने के कारण वाक् कहलाती है इसी पथ्यास्वस्ति रूप वाक् के द्वारा देवताओं ने उत्तर दिशा को पहचाना । क्योंकि उत्तर दिशा ही पथ्या-स्वस्ति की दिक् है । देवताओं ने पूर्व दिशा को अग्नि से पहचाना । अर्थात् पृथिवी अग्नि स्वरूप है । इसीलिए यह अमृताग्नि प्रतिक्षण पृथिवी केन्द्र से निकल कर २१ वें अहर्गण तक जाया करता है, वितत रहता है । यह पृथिवी पश्चिम से पूर्व की और सूर्य की परिक्रमा करती हुई चलती है । इसीलिए सूर्य पूर्व से पश्चिम की ओर चलता दिखाई देता है । पृथिवी अग्निस्वरूप है अतः अग्नि ही पश्चिम से पूर्व की ओर गति करती है । इसीलिए यज्ञ में पश्चिम दिशा में स्थित गार्हपत्यागार से अग्नि को पूर्व दिशा में स्थित ग्राहवनीयाग्नि में ले जाया जाता है और उसी में देवताओं के लिए हवि दी जाती है । उसी में अग्निहोत्र होमादि का अनुष्ठान किया जाता है क्योंकि प्रकृति में अग्नि पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर जाती है । अतः पूर्वदिक् ही अग्नि की है । इस अग्नि से ही देवताओं ने पूर्व दिशा को जाना ॥१६ ॥

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