Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 301–310
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 301–310
पृष्ठ 301
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण सोम से देवतनों ने दक्षिण दिशा को पहचाना । क्योंकि सोम सर्वदा उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर जाया करता है और दक्षिण से उत्तर की ओर जाने के कारण ही देवताओं ने दक्षिण दिशा को पहचाना । इसीलिए सोमयाग के लिए खरीदे हुए सोम को दक्षिण की ओर ले जाते हैं और दक्षिण दिक्स्थ पितर ही इस सोम के देवता हैं अतः सोम को पितृदेवत्य माना जाता । देवताओं ने इस सोम के द्वारा दक्षिण दिशा को पहचाना । दक्षिण को सोम
की दिशा बतलाया गया है । क्योंकि सोम उत्तर से दक्षिण में ही आता है ॥।१७ ॥
सविता का स्थान सूर्य, बृहस्पति व ब्रह्मणस्पति सोम से भी ऊपर है । अर्थात् सूर्य जिसे कि इन्द्र भी कहा जाता है उससे ऊपर बृहस्पति है । बृहस्पति से ऊपर ब्रह्मणस्पति सोम है | जिसका कि वर्णन " पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि सर्वतः " इत्यादि मन्त्रों के द्वारा किया गया है । इस ब्रह्मणस्पति सोम से ऊपर सर्वप्रेरक सविताप्रारण की स्थिति है क्योंकि प्रारण ही देवता कहलाता है अतः सविता प्राण को सविता देवता कहा जाता है । इस प्राण का जिसमें भी प्रवेश हो जाता है वह भी सविता ही कहलाता है । क्योंकि इस सविता प्राण का सूर्य में भी प्रवेश है अतः सूर्य को भी सविता कहा जाता है । चूँकि सूर्य ( सविता ) पूर्व से पश्चिम की ओर गति करता है । अर्थात् दृश्यमण्डल की अपेक्षा से सूर्य प्रतिदिन पूर्व से पश्चिम की ओर जाता दिखाई देता है । अतः पश्चिम दिशा सूर्य की है । इसी से सूर्य रूप सविता से देवताओं ने पश्चिम दिशा की पहचाना ॥ १८ ॥
' खस्वस्तिक बिन्दु को ह्री अदिति कहते हैं । यह खस्वस्तिक मस्तक से ऊपर है, ऊर्ध्व हैं । अतः ऊर्ध्वादिक् ही अदिति की निश्चित होती है जैसा कि पहले बतलाया जा चुका है । पृथिवी ही अदिति है । और यह पृथिवी रूप अमृताग्नि ही ऊपर की ओर २१ वें अहर्गण तक जाने के कारण ऊर्ध्व दिक् की अधिष्ठाता है । ऊर्ध्व की ओर जाने के कारण इसमें उत्पन्न होने वाली ओषधि, वनस्पति आदि ऊर्ध्वमुख ही हैं अर्थात् ऊपर की ओर मुख किये रहती हैं । इस ऊर्ध्व दिग्गामिनी अदिति की ऊर्ध्वा दिक् है । अतः इस अदिति के द्वारा देवताओं ने ऊर्ध्वादिक् को पहचाना ॥१६ ॥
प्रायणीय इष्टि के अनन्तर आतिथ्येष्टि की जाती है । " यज्ञो वै पुरूष: " इस श्रुति के अनुसार यज्ञ पुरूष रूप है अतः पुरूष में जैसे हस्तपादादि अवयव होते हैं उसी प्रकार यज्ञ में भी हस्त मस्तकादि अवयव होते हैं इनमें आतिथ्येष्टि यज्ञ का मस्तक है और प्रायणीयेष्टि तथा उदयनीयेष्टि यज्ञपुरूष के दोनों हाथ हैं क्योंकि प्राकृतिक यज्ञ में मस्तक दोनों हाथों के मध्य होता है इसी की प्रतिकृति वैध यज्ञ में यज्ञपुरूष के मस्तक स्थानीय आतिथ्येष्टि के दोनों ओर दोनों हाथों के स्थान में प्रायणीयेष्टि व उदयनीयेष्टि है ॥ २० ॥
[ २८३ |
पृष्ठ 302
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण कतिपय विद्वानों का कथन है कि प्रकृति यज्ञ से मानव उत्पन्न होता है । प्रकृतियज्ञ में जिस प्रकार जिन पदार्थों की आहुति दी जाती है उसी प्रकार इस वैध यज्ञ में यजमान उन्हीं पदार्थों की आहुति द्वारा नवीन दिव्यात्मा को उत्पन्न करता है । चूंकि प्रकृति यज्ञ में जिस प्रकार पुरूष में मस्तक के दोनों ओर दोनों हाथ समानाकार होते हैं उसी प्रकार दिव्या-त्मा के मस्तकस्थानीय प्रायणीयेष्टि व उदयनीयेष्टि समानरूप से की जानी चाहिए । अर्थात् प्रायणीयेष्टि में जो बहि होती है वही उदयनीयेष्टि में होनी चाहिए । तभी दोनों हाथों में समानाकारता बन सकती है अतः प्रायणीयेष्टि करने के बाद उस बहि को अग्नि में न डाले अपितु अलग बचाकर रख ले । उसे उदयनीयेष्टि में काम लेने के लिए नियत स्थान पर रख दें इसी प्रकार मेक्षण अर्थात् चरू निर्माण में काम आने वाले काष्ठ को चरू निर्माण के बाद सक्षामकर्षा ( अग्नि संयोग से थोडे जले हुए ) चरु के लेप के सहित प्रायणी -येष्टि स्थाली के साथ रख दे । उदयनीयेष्टि में काम लेने के लिए । तथा जो ऋत्विक् प्राय-णीयेष्टि में हैं वे ही ऋत्विक् उदयनीयेष्टि में होने चाहिये । इस प्रकार दोनों दृष्टियों में उपर्युक्त वस्तुत्रों की एकता के कारण प्रायणीयेष्टि व उदयनीयेष्टि से निर्मित होने वाले
दिव्यात्मा के हाथों में समानाकारता आ सकती है । अतः ऐसा ही करना चाहिये ॥ २१ ॥
किन्तु भगवान् याज्ञवल्क्य का कथन है कि ऐसा कभी न करे । प्रायणीयेष्टि में काम आने वाली बहि को यजमान यथेच्छ अग्नि में डाल दे । सक्षामकर्षा - प्रायणीय चरुस्थाली को भी साफ कर रख दे । उसको भी उदयनीयेष्टि में काम लेने की आवश्यकता नहीं है । केवल प्रायणीयेष्टि के जो ऋत्विक् है वे उदयनीयेष्टि में रहें किन्तु वे भी कारणवश इधर - उधर चले गये हों तो उदयनीयेष्टि में दूसरे ऋत्विक् कर लेने चाहिये । दोनों हाथों में एकरूपता के लिए उपर्युक्त वस्तुओं की एकता होना आवश्यक नहीं है किन्तु दोनों इष्टियों में देवता व हवि की समानता होने से दोनों हाथों में एकरूपता बन सकती है । अतः प्रायणीयेष्टि की बर्हि मेक्षण तथा सक्षामकर्षा प्रायणीय चरूस्थाली को उदयनीयेष्टि के लिए रखना उचित व आवश्यक नहीं है ॥२२ ॥
यजमान प्रायणीयेष्टि व उदयनीयेष्टि में अदिति आदि पाँच देवताओं का यजन करता । अतः दोनों हाथों में पाँच - पाँच अंगुलियां होती हैं । यह प्रायणीयेष्टि विकृतियाग है । " अतः प्रकृतिवत् विकृति कर्तव्या " इस सिद्धान्त के अनुसार प्रकृतियाग के समान शंयुवाक् पर्यन्त कर्म इस विकृतियाग में भी होते हैं किन्तु इस विकृतियाग में प्रकृतियाग की तरह पत्नी संयोजन नहीं करना चाहिये । क्योंकि प्रायणीयेष्टि व उदयनीयेष्टि से निष्पन्न होने वाले दोनों हाथ दिव्यात्मा के शरीर के पूर्वार्ध हैं । ऐसी स्थिति में पत्नी संयाज कर देने से यज्ञ में समा-गत सारे देवता चले जायेंगे क्योंकि पत्नी संयाज यज्ञ में आये हुए देवताओं को ससम्मान विदा करने के लिए ही होता है ॥ २३ ॥
[ २८४ ]
पृष्ठ 303
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण [ विज्ञानभाष्य ] पृथिवी से सूर्य तक प्राकृतिक यज्ञ होता रहता है । पार्थिव अग्नि में सौर पदार्थ प्रतिक्ष हुत होते रहते हैं जो पदार्थ आहुत होते हैं उनका नाम हैं सोम, एवं जिसमें ग्राहुत होते हैं उनका नाम है अग्नि । पार्थिव अग्नि में सूर्य के ऊपर रहने वाले पारमेष्ठ्य सोम की आहुति हर समय पड़ा करती है । इसी यज्ञ से ३३ देवता उत्पन्न होते । पृथिवी का जो अग्नि है वह इस सोमाहुति के प्रभाव से ३३ अवस्थाओं परिणत हो जाता है यदि इस अग्नि में उन सारे पदार्थों की सोम की आहुति न होती तो कभी भी ३३ देवता उत्पन्न नहीं हो सकते थे । श्रग्नि में जब सोम की ग्राहुति पडती है तो यह अग्नि प्रज्वलित होकर २१ अहर्गण तक आक्रमण करता है । बस इस २१ तक जाने वाले एक ही अग्नि की ३३ अवस्थाएं हो जाती है । इन्हीं का नाम ३३ देवता है । पृथिवी के ३३ ग्रहर्गण होते हैं । इन ३३ अहर्गणों के ५ स्तोम माने जाते हैं । पहला त्रिवृत सोम है, दूसरा पञ्चदश स्तोम है, तीसरा एकविंश स्तोम है, चौथा त्रिणवस्तोम है, पांचवा त्रयस्त्रिंशत् स्तोम है । त्रिणव और त्रयस्त्रिशत् यह दोनों सोम ही है परन्तु त्रिणव भास्वर सोम है एवं त्रयस्त्रिंशत् दिक् सोम है । इसी भेद को बतलाने के लिए एक ही सोम को दो सोमों में बांट दिया जाता है | एकविशस्तोम तक अग्नि है, एवं त्रयस्त्रिंशत् स्तोम तक सोम है । सूर्य २१ पर ही है । इसमें इस सोम की आहुति पड़ती रहती है । इसी आहुति के कारण पार्थिव अग्नि २१ तक प्रज्वलित रहता है । वह अग्नि जो कि सोमाहुति से २१ तक वितत रहता है उत्तरोत्तर विशकलित होता हुआ अपनी घन, तरल, विरल, यह तीन अवस्था बना लेता है । पृथिवी से कुछ दूर तक अग्नि घनावस्था में रहता है यह घनावस्था त्रिवृत् स्तोम पर अर्थात् पृथिवी के ६ अहर्गण पर जा के समाप्त हो जाती है । इस घनावस्था परिणत अग्नि की भी अवान्तर ८ अवस्थाएं और हो जाती हैं । बस ८ अवस्थाओं में परिणत यह घन श्रग्नि ही ५ वस्तुओं की समष्टि कहलाती है । पृथिवी पृष्ठ से त्रिवृत् स्तोम तक घनावस्था में परिणित जो अग्नि है वही अवान्तर ८ स्वरूपों में परिणत रहती है इन्हीं का नाम आठ वसु है । इन आठों वस्तुनों में जो पहला वमु है उसका नाम अग्नि ही है । & के बाद अर्थात् त्रिवृत् स्तोम के बाद पञ्चदश स्तोम तक ( १५ तक ) अग्नि घनावस्था को छोडकर तरलावस्था में परिगत रहता है । यहां अग्नि के परमाणु विश-कलित रहते हैं अतएव इसे अग्नि न कहकर वायु कहा जाता है । त्रिवृत् से पञ्चदश के स्थान का नाम अन्तरिक्षलोक है एवं पृथिवीपृष्ठ त्रिवृत्स्तोम तक का नाम ही पृथिवी लोक है । उसके अधिष्ठाता अग्नि है एवं अन्तरिक्ष के अधिष्ठाता तरल अग्नि है अर्थात् वायु है । यह वायु ११ अवस्थाओं में परिणत रहता है बस यही ग्यारह रुद्र कहलाते हैं । इसके बाद ( १५ के बाद ) यह वायु और भी विशकलित हो जाता है अर्थात् तरलावस्था से विरलावस्था में परिणत हो जाता है इसकी यह विरलावस्था जिसे कि प्राणावस्था भी कह सकते हैं । २१ पर जाकर समाप्त हो जाती है । आकाश में तपता हुआ जो सूर्य का गोला दिखलाई पड रहा है वह इसकी विरलावस्था की समाप्ति है । इसी विरलावस्था की फिर अवान्तर १२ अवस्थाएं हो जाती हैं बस इन्हीं का नाम द्वादश ग्रादित्य है । उनके इन्द्र, धाता, भग, पूषा, विवस्वा सविता, विष्णु, इत्यादि नाम हैं जिनका कि विस्तृत विवेचन " दीक्षरणीयेष्टि " ब्राह्मण में कर आये हैं । इस प्रकार घन, तरल, विरलावस्था भेद से एक ही ग्रग्नि ३१ स्वरूपों में परिणत हो जाता है एवं एक स्वयं पृथिवी देवता है और एक द्यु देवता है अर्थात् सूर्य देवता है । जैसे ३१ देवताओं की स्थिति इस सोम यज्ञ पर निर्भर है तथैव द्यावापृथिवी की स्थिति भी इसी पर निर्भर है । यदि सोमाहुति न पड़े तो सूर्य [ २८५ ]
पृष्ठ 304
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण और पृथिवी दोनों नष्ट हो जांय क्योंकि दोनों की स्थिति अग्नि पर निर्भर है एवं अग्नि की स्थिति सोमा-हुति पर निर्भर है । जब तक अग्नि में सोम की प्राहुति पडती रहती है तभी तक अग्नि प्रज्वलित रहता है । कहने का तात्पर्य यही है कि यह ३३ देवता जो कि पृथिवी के २१ वें अहर्गण पर जाके समाप्त हो जाते हैं, इसी यज्ञ से उत्पन्न होते हैं । इसी यज्ञ से प्रतिष्ठित रहते हैं अतएव इन्हें यज्ञिय देवता कहा जाता है जैसा कि श्रुति कहती है " इति स्तुतासो अस्थारिशादसो ये स्थ त्रयश्चत्रिंशच्च । मनोर्देवा यज्ञियासः " - ऋक्संहिता इन ३३ देवताओं में सबसे पहला देवता अग्नि है । जिसे कि हमने पहला वसु बतलाया है, एवं अन्तिम देवता विष्णु है जो कि २१ वें स्थान में है, एवं २१ वें श्रादित्य नाम से व्यवहृत होते हैं । इसीलिए कहा जाता हैं " अग्नि वें देवानामवमो विष्णुः परमस्तदन्तरेण सर्वा अन्या देवता: " यह कहा जाता है । इस द्यावापृथिवी के बीच में होने वाला प्राकृतिक यज्ञ की इस सीमा में इस छोर में अग्नि है और छोर में अर्थात् अन्त में विष्णु है इसीलिए " एते वै यज्ञस्यान्ते तम्बो यदग्निश्च विष्णुश्च " " अग्निश्च ह वै विष्णुश्च दीक्षापाली " यह कहा जाता है । सम्पूर्ण प्रपंच से बत-लाना हमें यही है कि पृथ्वी से द्यौ तक अर्थात् सूर्य तक प्राकृतिक यज्ञ वितत हो रहा है । आज यह यजमान वैध उपायों से उसी यज्ञ को आत्मसात् कर उस सोमाहुति को प्राप्त कर मृत्यु से प्रतिमुक्त होना चाहता है । प्रकृतिवार सोमयागकर अपने आत्मा का स्वर्ग से सम्बन्ध जोडना चाहता है जो कि २१ वां है | परन्तु इस यज्ञ क्रिया में सोमयज्ञ में तब तक यह यजमान प्रविष्ट नहीं हो सकता जब तक कि इन प्राणों को अपने आत्मा में आहित न करले । हाईकोर्ट में जाने के लिए चोगा पहनना पडता एवं उसके नियमित पोजीशन को धारण करना पड़ता है तब हाईकोर्ट में जाने का अधिकार मिलता है । सामान्य मनुष्य, यथा-जात मनुष्य वहां नहीं जा सकता, जो शिक्षित होगा वहां के नियमों से परिचित होगा । वही वहां प्रवेश पा सकता है । बस ठीक इसी प्रकार से द्यावापृथिवी में वितत रहने वाला यह प्राकृतिक यज्ञ परमेश्वर का हाईकोर्ट है । इसी को यह वैध उपायों से अग्नि में सोमाहुति डालकर आत्मसात् करना चाहता है परन्तु इसमें तब तक यह नहीं जा सकता, यजमान तब तक सोमयाग नहीं कर सकता जब तक कि वहां जाने का अधिकार उन्हीं देवताओं से प्राप्त न कर ले । बिजली के स्वरूप धर्म से जो परिचित होता है वह उससे यथेच्छ काम ले सकता है परन्तु विद्युत स्वरूप से सर्वथा अपरिचित मनुष्य यदि विद्युत यन्त्र से स्पर्श कर बैठता है तो अपने प्राण खो बैठता है । ठीक वही हालत इस यज्ञ की है । यज्ञ में प्रविष्ट होने के पहले, इसके खास खास नियमों का पालन करना पड़ता है, प्राकृतिक देवताओं को आत्मसात् किया जाता है तब जाकर कहीं यजमान को सोमयाग करने का अधिकार मिलता है । प्रोफेसर की गद्दी उसे ही मिल सकती है, जिसके पास एम ए का सर्टिफिकिट है । डाक्टर वह बन सकता है जिसके पास एल. एम. पी. की डिग्री है | वायसराय वह बन सकता है जो कि लार्ड खानदान में पैदा हुआ हो, विलायत वह जा सकता है जिसने कि पासपोर्ट प्राप्त कर लिया है । ठीक इसी प्रकार यज्ञ वही कर सकता है जो कि दीक्षा ले लेता है । आदिरन्त्येन सहेतावत् अग्नि और विष्णु इन दोनों का यजन करने से सारे देवता आत्मसात् हो जाते हैं । इसीलिए " श्रग्निः सर्वा देवताः " " विष्ण सर्वा देवताः " यह कहा जाता है । सोमयाग करने वाले का पहला कर्त्तव्य यही है, कि वह अधिकार प्राप्ति स्वरूप पहले " दीक्षरणीयेष्टि " करे । [ २८६ ]
पृष्ठ 305
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण दीक्षणीयेष्टि में ग्नावैष्णव एकादश कपाल पुरोडाश का निर्वाप होता है । क्यों होता है - इसका विस्तृत विवेचन “ दीव्येष्टि ब्राह्मण " में कर दिया गया है । दीक्षणीयेष्टि से यह यजमान दीक्षित हो जाता है, अधि-कृत हो जाता है । दीक्षा लेना यज्ञ में शामिल होने का प्रमाण पत्र प्राप्त करना है । बिना इसके यज्ञ हर्गिज नहीं कर सकता । अब तक इसी दीक्षा का रहस्य बतलाया है । दीक्षित को किन - किन नियमों का पालन करना चाहिए, क्या खाना चाहिए, क्या बोलना चाहिए, कहां सोना चाहिए, कब सोना चाहिए, इत्यादि इत्यादि व्रतों का ही विवेचन अब तक किया है । प्राय-गीय याग के पहले तक का सारा कर्म अधिकार समर्पक समझना चाहिए । अधिकार समर्पण को ही " दीक्षा " कहते हैं । पूर्वोक्त सारे नियमों को यंगीकार कर दीक्षणीयेष्टि कर यह यजमान दीक्षित बन गया है । बस यहाँ से अब यज्ञ क्रिया का प्रारम्भ होता है । सबसे पहले जो इष्टि होती है उसका नाम प्रारम्भणीय इष्टि है । इसी को " प्रायणीय " शब्द से व्यवहृत किया जाता है । बस दीक्षान्तर यह यजमान प्रायणीयेष्टि ही करता है । दीक्षानन्तर सर्वप्रथम यह यजमान प्रायणीय आदित्य चरु का निर्वाप करता है । ” " प्रादित्यं चरू प्रायणीयं निर्वपति " सबसे पहले प्रायणीय आदित्य चरु का ही निर्वाण क्यों किया जाता है - इसकी उत्पत्ति बतलाते है । वैदिक समय से प्रतिपूर्व विश्व में साध्य देवताओं का राज्य था । जिस प्रकार आज ब्रह्मण, क्षत्रिय वैश्य, शूद्र, यह चार वर्ण है तथैव उस समय सारा मनुष्य समूह महाराजिक, साध्य, तुषित और परिण इन चार भागों में विभक्त था । साध्य ब्राह्मण थे । महाराजिक क्षत्रिय थे । परिण लोग वैश्य ये, इनके श्रादि पुरुष " भलन्दन " नाम से प्रसिद्ध थे, एवं तुषित शूद्र थे । जिस प्रकार आज सारा काम वर्णव्यवस्था पर निर्भर है तथैव उस समय की इन चारों वर्णों में काम बंटा हुआ था । साध्य लोग वैज्ञानिक थे । प्रकृति को पहचान कर तद् द्वारा नए नए आविष्कार कर उससे संसार को फायदा पहुंचाना इन्हीं साध्यों का काम था चूंकि ज्ञान के विभाग के ये अधिष्ठता थे-अतएव इन्हें ब्राह्मण कहा जाता था । महाराजिक क्षत्रिय थे । उपद्रवों से रक्षा करना इन्हीं का काम था । एवं पणि लोग वैश्य थे । इनका काम व्यापार करना था । इनके व्यापार का प्रधान द्वीप था उसका नाम पायन था जो कि आज भी ५२ उत्तराक्षांश पर स्थित है एवं ११४ अंश ५२ कला देशान्तर पर है । परिद्वीपायन का ही आज बिगडकर " फिलीपायन " हो गया है । इन्हीं के संस्कार से आज भी भारत-वर्ष में जो गावों से माल भर - भर कर लाते हैं उन्हें बिणजारा कहा जाता है । परिणया ही से बिणजारा बना हुआ है । बनिया शब्द भी इसी परिणया का अपभ्रंश है । तीसरा वर्ण था तुषित् । इनका काम सेवा करना था । बस इस प्रकार का सारा जनदाय ४ भागों में विभक्त था । इन चारों में से जो साध्य लोग थे उन्होंने ही सबसे पहले यज्ञविद्या का आविष्कार किया था । प्रकृति को पहचान कर तदनुसार वैध यज्ञों का आविष्कार इन्हीं के द्वारा हुआ था । ये लोग यज्ञ क्रिया में बहुत बढे चढ़े थे । असम्भव से अ-संभव काम को यज्ञ द्वारा यह संभव बना देते थे । अतएव उस समय सर्वत्र इनका प्रभाव व्याप्त हो रहा [ २८७ ]
पृष्ठ 306
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण था । ये साध्य लोग वैज्ञानिक तो वडे जवरदस्त थे परन्तु थे महा- महानास्तिक | यज्ञ से अलावा यज्ञ का मूलभूत जो ब्रह्मतत्व था उसे यह नहीं मानते हैं । पदार्थ का धर्म ही ऐसा है फिर उनसे अलावा किसी को मानने की कोई आवश्यकता नहीं है । यज्ञ ही सब कुछ है । विज्ञान के आलावा - साइन्स के अलावा ब्रह्म कुछ नहीं है । सब झूठा झगडा है, यही इन लोगों का सिद्धान्त था । यज्ञ को यज्ञ से मिलाकर अर्थात् पदार्थों को पदार्थों से मिलाकर हम वैध उपायों से सब कुछ कर सकते हैं । जैसे बीसवीं सदी का पाश्चात्य जगत् अपने साइन्स के सामने आत्मतत्त्व को अति तुच्छ समझता है, तद्वत् मेटीरियल जगत् को ही सबसे ऊंचा प्रासन दे रहा है, ठीक वही हालत इन साध्यों की थी । यज्ञ से यज्ञ ही करना, यज्ञ ही में लगे रहना । यज्ञ के आलावा यज्ञ के मूलभूत ब्रह्मतत्व को न मानना यही इनका असूल था । इसी इति-हास को लक्ष्य में रखकर मन्त्र श्रुति कहती है ।
" यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।
तेन नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥
इन साध्यों में उस समय १० पार्टियां बनी हुई थी । इन दसों की दृष्टि भिन्न - भिन्न थी । यह विश्व किस से पैदा हुआ है, इसमें दसों में मतभेद था । सृष्टि केविषय में १० वाद प्रचलित थे । कोई पानी से सृष्टि मानता था, कोई अहोरात्र से सृष्टि मानता था, कोई मृत मृत्यु की समष्टि से विश्वोत्पत्ति मानता मानता था । इस प्रकार से १० मत प्रचलित थे । इस प्रकार जब एक ही सृष्टि की उत्पत्ति में १० मत हो गये, तो सामान्य जनता को संदेह होने लगा कि ऐसा हो नहीं सकता है । दसों मत हर्गिज सच्चे नहीं हो सकते । सच्ची बात एक हो सकती है १० नहीं । परन्तु यह दसों ही मत ऐसे प्रबल थे जिनका सहसा खण्डन नहीं किया जा सकता था । बस इसीलिए एक ११ वें संशयवाद का जन्म हुआ । यह ग्यारहों वाद १ - " विज्ञानेतिवृत्तवाद, २- सदसद्वाद, ३ रजोवाद, ४- व्योमवाद, ५- अपरवाद, ६- आवरणवाद, ७ - प्रम्भोवाद, ८ - त्रमृतमृत्युवाद - अहोरात्रवाद, १० - दैववाद, ११- संशयवाद इन नामों से प्रसिद्ध हुए । इन वादों का ॠग्वेद संहिता में उल्लेख मिलता है । अन्त में इसी साध्य जाति में उत्पन्न एक प्रतिभाशाली देवभावयुक्त मनुष्य ने इन सारे संशयों का उच्छेद किया । साध्य लोग इसकी बात मानने को तैयार न थे । अतएव इन्होंने तुषितों को अपने मत में शामिल करना शुरू किया । होते होते सारे तुषित इनके मत में आगए । इस प्रकार जब तुषितों के आ जाने पर इनका बल बाढ़ गया तो इन्होंने साध्यों से मेल मिलाप करना शुरू किया । इनका कहना था कि तुम्हारे दसों मत सच्चे हैं और दसों ही झूठे हैं । यदि इन दसों का मूलतत्त्व स्वीकार कर लिया जाता है तो सारे मत सच्चे हैं एवं उस मूलतत्त्व को ब्रह्मतत्त्व को नहीं माना जाता, तो सारे मत मिथ्या हैं । इनकी तर्क प्रणाली के सामने साध्य लोग नहीं ठहर सके । साध्यों को बाध्य होकर ब्रह्म की सत्ता स्वीकार करनी पडी । उन्हें स्वीकार करना पड़ा कि वास्तव में यज्ञ का मूलभूत कोई ब्रह्मतत्त्व अवश्य ही है । इन मतों के और मतों से खण्डन का मन्त्र ऋग्वेद सहिता में उपलब्ध होता है । वह मन्त्र यह है: -" नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परोयत् " । किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद्गहनं गभीरम् ॥ [ २८८ ]
पृष्ठ 307
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मरण प्रायेणीयेष्टि ब्राह्मण
न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न प्रासीत्प्रकेतः ।
प्रानीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किं चनास ॥
चूंकि साध्य जाति में उत्पन्न इस महापुरुष द्वारा ब्रह्मसत्ता का प्रचार हुआ । अतएव तत्कालीन विद्वानों ने इनका यशोनाम " ब्रह्मा " रख दिया । ब्रह्मतत्त्व आविष्कार के कारण यह महापुरुष ब्रह्मा ही कहलाने लगे । जैसे प्राकृतिक देवताओं में सबसे पहले अग्नि ब्रह्म का जन्म होता है तथैव भुवनस्वर्गवासी देवताओं में सबसे पहले देवता यही ब्रह्मा हुए । देव व्यवस्था इन्हीं से कायम हुई । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है । ब्रह्मा देवानां प्रथमः संबभूव विश्वस्य् कर्ता भुवनस्य गोप्ता । स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठ पुत्राय प्राह-इन भगवान ब्रह्मा ने प्रकृति रचना के अनुसार ४ नई सृष्टियां बनाई । सबसे पहले इन्होंने लोक सृष्टि का निर्माण किया । प्रकृति में त्रैलोक्यवस्था बिलकुल व्यवस्थित है उस प्राकृतिक त्रिलोकी का, हम जिस पर रहते हैं वह भाग पृथिवी लोक है जिसे कि हमने त्रिवृत स्तो-मान्त बतलाया है, एवं त्रिवृत् से पञ्चदश तक का जो खाली स्थान है - पोल है- वह अन्तरिक्ष लोक है, एवं १५ से २१ तक अर्थात् सूर्य तक द्युलोक है । पृथिवी के अधिष्ठाता अग्नि है, अन्तरिक्ष के अधिष्ठाता वायु है, एवं द्युलोक के अधिष्ठाता सूर्य हैं । इसी अभिप्राय से यास्क मुनि कहते हैं: -" तिस्त्र एव देवताः इति नैरुक्ताः । श्रग्निः वायुवंन्द्रोऽन्तरिक्षस्थानः सूर्योद्युस्थानः । पृथिवीस्थानो यही तीन देवता अवस्था विशेष के कारण इन भागों में विभक्त हो जाते हैं जैसा कि ब्राह्मण के प्रारम्भ में ही बतला दिया गया है । इस प्राकृतिक त्रिलोकी का नाम वेद में रोदसी त्रिलोकी है । रोदसी के बाद में क्रन्दसी त्रिलोकी है । क्रन्दसी के अनन्तर संयति त्रिलोकी है । भूः भुवः स्वः महः जनः तपः सत्यम् सात लोक में तीन त्रिलोकियां हैं । इन तीनों में से प्रथम में केवल " रोदसी " त्रिलोकी का ही सम्बन्ध है । इसी रोदसी त्रिलोकी से पृथिवी के यच्चयावत् प्राणियों की उत्पत्ति होती है । पार्थिव रस-श्रान्तरिक्ष्य रस एवं सौर रस से ही यच्चयावत् जड़ चेतनों की उत्पत्ति होती है । श्रग्नि, वायु, प्रादित्य त्रिलोकी के समान ही साध्य जाति में ही इस रोदसी त्रिलोकी के अधिष्ठाता हैं । बस इस प्राकृतिक उत्पन्न भगवान ब्रह्म ने इस पृथिवी लोक में ही त्रिलोकी व्यवस्था की, जो भारतवर्षं कहा जाता है । इसी का नाम पृथिवीलोक था । भारतवर्ष में रहने वाले मनुष्य कहलाते थे । यहां के राजा वैवस्वत मनु थे । अतएव यहाँ की प्रजा मनुष्य कहलाई, एवं यह लोक मनुष्य लोक कहलाया । दक्षिण समुद्र से हिमालय पर्वत तक का जो स्थान वह भुवनत्रिलोकी का पृथिवी लोक है एवं अलतायी पर्वत से उत्तर समुद्रान्त तक का जो स्थान है वह स्वर्ग कहलाया एवं अलतायी पर्वत से हिमालय [ २८६ ]
पृष्ठ 308
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण के बीच का जो स्थान था वह अन्तरिक्ष लोक था । जैसे इस भारतवर्ष में मनुष्य रहते थे अन्तरिक्ष में यक्षगन्धर्वादि तिर्य्यक् योनि रहती थी, एवं स्वर्ग में देवता रहते थे । हिमालय से दक्षिण में पृथिवी लोक था । हिमालय से उत्तर ग्रलतायी पर्वत तक ग्रन्तरिक्ष लोक था एवं अलतायी से उत्तर समुद्र तक स्वर्ग था । इसीलिए महाभारत में भारद्वाज और भृगु के संवाद में कहा गया है- भारद्वाज पूछते हैं: -भृगु उत्तर देते हैं: -श्रस्माल्लोकात्परो लोकः श्रूयते नोपलभ्यते तमहं ज्ञातुमिच्छामि तद् भवान् वक्त मर्हति ॥
उत्तरे हिमवत्पार्श्वे पुण्ये सर्वगुणान्विते ।
पुण्यः क्षेमश्चयो देशः स परोलोक उच्यते ॥
न स्वर्गसदृशोदेशस्तत्रयुक्ताः शुभाःगुणाः काले मृत्युः प्रभवति स्पृशन्ति व्याधयो न च ॥ इन श्लोकों से हमें बतलाना यही है कि इसी पृथिवी लोक पर - प्रकृतिवत् त्रिलोकी व्यवस्था थी । पृथिवी लोक के अधिष्ठाता अग्नि थे, अन्तरिक्ष के वायु थे एवं द्यु लोक के इन्द्र थे । अग्नि थे देवता ही-परन्तु इनको इस पृथिवी लोक का वायसराय बनाकर भेजा गया था । भारतवर्ष के सम्राट् मनु महाराज थे एवं शहनशाह इन्द्र थे, जो कि स्वर्ग के राजा थे । अग्नि स्वर्ग की तरफ से भारतवर्ष में रहते थे । हमारी व्यवस्थाओं का यदि वर्णन करने लगें तो महापोथा तैय्यार हो जाय । इनका विस्तृत विवेचन देखना हो तो - इन्द्र विजय नाम का ग्रन्थ देखना चाहिए । यहां हमें केवल इतना ही कहना है कि प्राकृ तिक वैज्ञानिकी स्थिर त्रिलोकी के अनुसार भगवान् ब्रह्मा ने इस पृथिवी लोक में भी त्रिलोकी निर्माण किया था जिसे आज " एशिया " कहा जाता है । वही हमारी त्रिलोकी थी । चारों सृष्टियों में से पहली यही लोक सृष्टि थी । दूसरी सृष्टि थी - वेदसृष्टि । जिस प्रकार प्रकृति यज्ञ में ऋग्, यजु, साम, अथर्वेद आसमन्तात अभिव्याप्त हो रहे हैं ' तथैब ' उनके रहस्य को समझाने के लिए भगवान् ब्रह्मा ने उस अपौ-रुषेय वेद के ४ ग्रन्थ बनाए जो कि ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद नाम से प्रसिद्ध हैं । परन्तु ध्यान रहे श्राजकल जो इन मन्त्रों को, वेद संहिताओं को अपौरुषेय बतलाया जाता है, यह बड़ी भारी भूल है । यह पुस्तकें महर्षियों द्वारा बनाई गई हैं । मंत्र - मनुष्य महर्षियों के बनाये हुए हैं न कि अपौरुषेय, एवं जो प्राकृतिक वेदत्रयी है वह वास्तव में नित्या है । प्राकृतिक वेद अवश्य ही अपौरूषेय हैं । उस अपौरूषेय वेद रहस्य को समझाने की विद्या का नाम संहिता है । संहिताएं वेद नहीं हैं, वेद की पुस्तकें हैं । इस विषय का भी हम प्रकृत में विस्तृत विवेचन नहीं कर सकते । सिर्फ इतना ही समझ लेना पर्याप्त होगा भगवान् ब्रह्मा ' ने वेद संहिता का निर्माण कर अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को पहले - पहल वेदविद्या सिखलाई । साध्यलोग जिन मन्त्रों से यज्ञ किया करते थे उन्हें " गाथा " कहा जाता था । परन्तु ब्रह्मा ने यज्ञ विद्या के लिए नया सिस्टम कायम किया । नई संहिताएं बनाई । जोकि १ ९ ३१ ग्यारह सौ इकतीस में विभक्त हैं । २१ ऋग्वेद शाखा है । ६ अथर्ववेद की शाखा है । १००० सामवेद की शाखा है, एवं १०१ यजुर्वेद शाखा । [ २ ९ ० ]
पृष्ठ 309
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मणे यही भगवान् ब्रह्मा की दूसरी वेदसृष्टि थी । तीसरी सृष्टि थी धर्मसृष्टि - वर्णसृष्टि । भुवन-त्रिलोकी के यच्चयावत् मनुष्यों को, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र इन चार वर्णों में बांट दिया था । वर्ण-व्यवस्था के श्राविर्ता यही भगवान् ब्रह्मा थे । वर्ण और तदनुकूल धर्म दोनों का इन्हीं ने आविष्कार किया था । चौथी सृष्टि थी गोत्र सृष्टि । गोत्रप्रवर्तक महर्षि कुल सात थे । भगवान् ब्रह्मा ने पुष्कर में यज्ञ किया था । यहां पर जिन ब्राह्मणों का उन्होंने वरण किया वे गोत्र के प्रवर्तक बन गये । बस ब्रह्मा की यही चार सृष्टियां थी । इन चारों का परस्पर घनिष्ट सम्बन्ध था । अमुक देश का रहने वाला, श्रमुक शाखा वाला, अमुक गोत्र वाला, अमुक धर्म का आचरण करे । इस प्रकार लोक, वेद धर्म, गोत्र, चारों परस्पर सम्बद्ध थे । जिस प्रकार प्रकृति में देवता है तथैव प्राणाराधन प्रक्रिया से यहां देवसृष्टि कायम की गई थी । यह सारे देवता स्वर्ग में रहते थे । ये देवता भी साध्यों की तरह यज्ञ करते थे । सबसे पहले आविष्कर्ता साध्य ही थे । साध्यों से मुवनस्वर्गवासी देवताओं ने सीखा । देवताओं से भारत-वर्ष के महर्षियों ने सीखा एवं उनसे भारतवर्ष ने सीखा । हमारे अधिष्ठाता भुवनस्वर्गवासी देवता थे प्रतएव वे जिस प्रकार से यज्ञ करते थे भारतवर्ष के मनुष्य भी ठीक उसी प्रकार करते थे “ यद्वै देवाश्रकु-वंस्तत् करवारिण ” यही हमारा मूलमन्त्र था । देवताओं ने सोमयाग के पहले दीक्षा के अनन्तर प्रायणीय इष्टि की थी - प्रतएव उसी नियम के अनुसार आज यह यजमान भी दीक्षा के अनन्तर प्रायणीय प्रादित्य चरू का निर्वाण करता है: -" आदित्यं चरू प्रायणीयं निर्वपति " देवताओं ने पहले - पहल प्रायणीय आदित्य चरू का निर्वाण क्यों किया था- इसकी उपपत्ति बत-लाते हैं । यजमान आदित्य चरू का निर्वाप क्यों करे, इसका कारण तो समझ में आ गया । " यद्वं देवा प्रकुर्वंस्तत् करवाणि " यह नियम ही इसी प्रायणीयेष्टि करने को बाध्य करता हैं, परन्तु देवताओं ने क्यों की थी, यह प्रश्न बना ही रहता है । बस इसी प्रश्न का उत्तर दिया जाता है । देवताओं ने यज्ञविद्या साध्यों से सीखी थी । सीखी क्या थी - सुन रक्खा था- वे लोग ऐसे ऐसे यज्ञ किया करते थे । देवताओं को मालूम था कि साध्यों ने इसी यज्ञ के द्वारा बड़े बड़े काम किये थे । व्रतएव उन्होंने भी यज्ञ करना शुरू किया । परन्तु खाली सुनने ही से यज्ञ विद्या नहीं आ जाती । अग्नि सोम डाल देना ही तो यज्ञ नहीं है । यज्ञविद्या एक खास विद्या है । प्रति गहन रहस्य है । यज्ञ की एक खास कुञ्जी है । जब तक वह कुञ्जी हाथ न आवे, अग्नि में चाहे कितना ही सोम डाले जाओ, इससे कुछ नहीं हो सकता । प्रारण को जब तक नहीं पहचान लिया जाता, प्राकृतिक यज्ञस्वरूप को जब तक नहीं पहचान लिया जाता, तब तक यज्ञ करना सर्वथा व्यर्थ है । ऐसे यज्ञ से कुछ फल नहीं हो सकता । श्राज भारतवर्ष में से यह रहस्य विद्या लुप्त हो गई है । आग में घी डालने का नाम ही यज्ञ रह गया है । हवा फिल्टर करना ही यज्ञ का एक मात्र प्रयोजन बतलाया जाता है । यही कारण है कि आज ब्राह्मण भूखों मरते हैं, तिरस्कृत हैं ठुकराये जाते हैं । जिस यज्ञ विद्या के लिए जिस ब्रह्मविद्या के लिए " ब्रह्म विद्यया ह वै सर्वं भविष्यन्तो मन्यन्ते " यह कहा जाता है । इसी के अनुयायी आज भूखों मरते हैं । इसका एकमात्र कारण अविद्या है । ब्राह्मण यज्ञरहस्य को भूल गये हैं । यज्ञ की कुञ्जी उनके हाथ से निकल गई है । आग में घी डालने का नाम ही उन्होंने यज्ञ समझ रक्खा है । इसी का यह फल है: -[ २ ९ १ ]
पृष्ठ 310
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण अस्तु प्रकृत में हमें यही कहना है कि साध्यों की देख रेख में मनुष्य देवताओं ने जब पहले - पहल यज्ञ किया तो उन्होंने इस पृथिवी को यज्ञ से अलग कर दिया । यज्ञ में पार्थिवाग्नि प्राण और सौर प्राण ही प्रधान है । श्रात्मा में पहले इस पार्थिव प्राण और दिव्य प्राण को मिला लिया जाता है तब वैध यज्ञ वास्तव में यज्ञ बनता है परन्तु देवता चूंकि पहले ही पहले यज्ञ करने लगे थे प्रतएव वे इस रहस्य से अपरिचित थे । वे नहीं जानते थे कि पार्थिव प्रारण से ही प्राकृतिक यज्ञ का प्रारम्भ होता है एवं इसी पर जाकर यज्ञ समाप्त हो जाता है । अतएव उन्होंने सामान्य मनुष्यों की तरह अग्नि में सोम की आहुति डालने को ही यज्ञ समझ कर ऐसा ही यज्ञ कर डाला । परन्तु इससे कुछ फल नहीं हुआ । यज्ञ का जो सार भाग था, जिसके लिए कि यज्ञ किया जाता था देवताओं को जरा भी नहीं मिला । अतएव उन्होंने मिलकर विचार किया कि क्या कारण है अपना यज्ञ सफल नहीं होता । बस इसी चिन्ता से सारे देवता उस गुप्त रहस्य की खोज में लग गये । " जिन ढूंढा तिन पाइयां " यह सिद्धान्त अटल है । इसी के अतु-सार वर्षों तक रिसर्च करने के अनन्तर देवता उस प्राकृतिक अदिति रहस्य को समझ गये । उन्होंने पह-चान लिया कि पृथिवी का प्रारण ही यज्ञ में प्रधान चीज है । प्रकृति यज्ञ का प्रारम्भ इसी अदिति पृथिवी से होता है, एवं इसी अदिति पर समाप्त होता है । अतएव हमें पृथिवी प्राण को — अदिति प्राग को पहले आत्मसात् करना चाहिये । पृथिवी से ही यज्ञ प्रारम्भ होता है, एवं पृथिवी पर ही समाप्त हो जाता है । अतएव अपने को इसी पृथिवी को प्रायणीय और उदयनीय समझना चाहिये । बस फिर क्या था, दीक्षा के अनन्तर सबसे पहले इसी यज्ञ के सारभूत इस पृथिवी प्राण को आत्मसात् करने के लिए उन्होंने प्रायणीय आदित्य चरु का निर्वाण किया । ऐसा करने से देवताओं का यज्ञ सफल हो गया । यज्ञ के प्रारम्भ में प्रायणीय चरु के निर्वाण का यही कारण है । इसी रहस्य को सामान्य मनुष्यों की समझ में श्राजाने की गरज से याज्ञवल्क्य ने इसकी मिथ्या कहानी बना डाली है । " उपायाः शिक्षमाणां बालानामुपलालनाः-सत्ये वर्त्मनि स्थित्वा ततः सत्यं समीहते ॥ " के अनुसार वेद की करीब करीब सारी कथायें ऐसी ही समझनी चाहिये । प्ररोचना के लिए एक कल्पित कहानी बना डालना यह प्राचीन परिपाटी है । इसी परिपाटी के अनुसार पूर्वोक्त रहस्य को कहानी में परिणत करके भगवान् याज्ञवल्क्य कहते 1 इस पृथिवी में यज्ञ करते हुए देवताओं ने इस पृथिवी को अलग निकाल दिया । अपने यज्ञ में उन्होंने पृथिवी को यज्ञभाग नहीं दिया अर्थात् देवता साध्यों के देखा देखी पहले - पहल ही यज्ञ करने लगे थे । अतएव उन्हें इसका पता ही न था कि यज्ञ के लिए पहले पार्थिवप्राण को आत्मसात् करना आव-श्यक है । देवाह वास्यां ( पृथिव्यां ) यज्ञं तन्वानाः ( विस्तारयन्तः ) इमां ( पृथिवीम् ) यज्ञात् अन्तरीयुः ( भागरहितामकुर्वन् ) । [ २८२ ]