Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 311–320

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 311–320

पृष्ठ 311

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मणं जब पृथिवी को देवताओं ने अलग निकाल दिया तो पृथिवी नाराज हो गई और नाराज होकर उसने देवताओं के यज्ञ को मोहित कर दिया । देवताओं की दृष्टि से यज्ञ को छुपा लिया । फिर क्या था-पृथिवी के छुपाते ही देवता लोग उस यज्ञ को बिल्कुल न जानने पाये । सारा यज्ञ देवता भूलभाल गये । तात्पर्य यही है बिना पृथिवी प्राण को ग्रात्मसात् किए ही देवताओं ने यज्ञ किया था । अतएव ऐसे यज्ञ का उन्हें जरा भी फल नहीं मिला । जब तक प्राकृतिक यज्ञ को प्रास्मसात् न कर लिया जाय तब तक खाली आग में सोम डालने से ही यज्ञ थोडे ही हो जाता है । इसी अभिप्राय को लक्ष्य में रखकर कहते हैं । " सा हैषामियं यज्ञं मोहयाञ्चकार - कथं नु मयि यज्ञं तन्वाना यज्ञादन्त इति ( कारणेनेतिशेषः ) तं ह यज्ञं न प्रजङ्गुः ( देवाः ) ॥ १ ॥

इस प्रकार यज्ञ का फल जब देवताओं को न मिला तो उन्होंने परस्पर में विचार किया, भाई हमने इसी पृथिवी पर जब यज्ञ किया है तो फिर समझ में नहीं आता, इसने किस कारण से अपने यज्ञ को मोह लिया अर्थात् छुपा लिया । साध्य लोग इसी पृथिवी पर यज्ञ करते थे, एवं ये इसी पर यज्ञ करके मनचाहा फल प्राप्त कर लेते थे । यह बात देवताओं ने सुन रक्खी थी । अतएव इन्होंने भी इसी पृथिवी पर ग्राहवनीय कुण्डादि बना, अग्नि प्रज्वलित कर यज्ञ करना शुरु किया । परन्तु सब व्यर्थ । तब देवताओं को चिन्ता हुई कि हमने भी यज्ञ तो साध्यों के माफिक ही किया है । जैसे साध्य लोग इस पृथिवी पर यज्ञ कर रहे हैं । फिर क्या कारण है, साध्यों को यज्ञ से मनचाहा फल मिल जाता था अपने को नहीं मिलता । इसी अभिप्राय से कहते हैं: -“ ते होचुः यन्नवस्यामेव यज्ञमत॑स्महि ( तनमनका ) कथं नु नोऽमुहत । कथं न प्रजानीम् इति ॥ अर्थात् आज अपना सारा यज्ञ व्यर्थ हो गया । अब ऐसा कौन सा उपाय करें जिससे हम इस को पहचान जाय । प्रर्यात् यज्ञ फल क्यों नहीं मिला जबकि हम साध्यों की तरह इसी पृथिवी पर यज्ञ कर रहे हैं । अतः इसका तलाश करना चाहिए ॥। २ ॥ आखिर तो देवता देवता थे । देवताओं की मस्तिष्क शक्ति बहुत ही बढ़ी चढ़ी थी । उन्होंने उस प्राकृतिक विज्ञान को पहचान लिया जिसके बिना इन्हें यज्ञफल नहीं मिल रहा था । उन्होंने अपने - अपने विज्ञान से उस रहस्य को पहचानकर कहा कि हे देवताओं, हमने इसी पृथिवी पर तो यज्ञ का वितान किया, एवं इसी को यज्ञभाग से अलग निकाल दिया । बस, इसीलिए हमारे से अप्रसन्न होकर इसी ने हमारे यज्ञ को छुरा लिया । देवताओं ने यज्ञ को व्यर्थ होते देखा तो खोज करनी शुरू की । ग्राखिर उनको उस रहस्य का पता चला गया । उन्हें मालूम हो गया कि पृथिवी प्राण ही यज्ञ की असली वस्तु है । प्राण अदृश्य पदार्थ [ २ ९ ३ ]

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तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण है । आँखों से नहीं दीखता । इसे आत्मसात् न करके यज्ञ किया था, अतएव अपना सारा परिश्रम व्यर्थ हुआ । इसलिए अपने को यज्ञ से पहले यज्ञ प्रतिष्ठा स्वरूप इस पार्थिव प्राण को आत्मसात् कर बाद में यज्ञ करना चाहिए । “ ते होचुः । श्रस्यामेव यज्ञं तन्वाना इमां यज्ञादन्तरगाम ( श्रन्तरिताम-कृष्महि ) सा न ( कृतापराधानामस्माकं ) यज्ञममूहत । ( श्रतः ) इमामेवो-पधावाम || ३ || अर्थात् अपने को चाहिए कि पहले इस पार्थिव प्रारण की आत्मसात् करे । प्ररोचनार्थ बनाई गई कथा का सिलसिला जोडने के अभिप्राय से भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं- सारे देवता पृथ्वी के पास गए और जाकर कहा कि हे श्रदिते, हे पृथिवी, हमने आप ही पर तो यज्ञ किया था, फिर किस कारण से हमारे यज्ञ को मोह लिया । क्यों हमें यज्ञ फल न मिला । अदिते, इसका कोई कारण हमारी समझ में नहीं आता । जब कि हमने आप ही पर यज्ञ किया है । " ते होचुः । यन्नु त्वय्येव यज्ञमतंस्महि कथं नु नोऽमुहत् कथं न प्रजानीम् इति ॥४ ॥

पृथिवी ने कहा- हे देवता, यह बात सच है कि तुमने मेरे पर ही यज्ञ किया परन्तु मेरे पर ही तो तुमने यज्ञ किया और मुझे ही यज्ञ भाग से बाहर निकाल दिया । इसलिए मैंने ही तुम्हारे इस यज्ञ को मोहित कर दिया । तुम इस यज्ञ में मेरा भी हिस्सा कायम करो । बस जहां तुमने मेरा हिस्सा कायम किया कि उसी समय तुम अपने यज्ञ को देख लोगे और जान जाओगे । तात्पर्य यही है कि यज्ञ की जड़ पृथिवी है । पृथिवी से ही यज्ञ प्रारम्भ होता है, एवं पृथिवी पर ही जाकर समाप्त होता है । अतएव यज्ञ के पहले मूलभूत प्राण को आत्मसात् करना परम आवश्यक है । यह सर्वत्र भरा हुआ है परन्तु इसका प्रत्यक्ष नहीं होता । प्रत्यक्ष का एकमात्र जरिया यह पृथिवी ही है । पार्थिव प्राण को पहचाना नहीं कि सारे यज्ञ रहस्य समझ में आये नहीं । " सा होवाच मध्येव यज्ञं तन्वाना मां यज्ञादन्तरागात । सा वोऽहमेव यज्ञममूमुहम् । भागं नु मे कल्पयत् । अथ यज्ञं द्रक्ष्यथ - श्रथ प्रज्ञास्यथ || ५ || पृथिवी ने जब कहा कि मेरा भी हिस्सा यज्ञ में शामिल करो उसी समय देवताओं ने कहा, हां -अवश्य ऐसा ही होगा । अवश्य ही आपको यज्ञ में शामिल किया जायगा । हे अदिति, प्रायणीय याग और उदयनीय याग दोनों तुम्हारे ही होंगे । अर्थात् यज्ञ का प्रारम्भ भी तुम्हारा ही हिस्सा होगा, एवं यज्ञान्त में दी जाने वाली हवि भी तुम्हारी ही होगी । तुम्हारे ही से प्रारम्भ होगा और तुम्हारे पर ही यज्ञ समाप्त होगा । [ २६४ ]

पृष्ठ 313

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प्रायणीयेष्टि ब्राह्मणे तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण " ते देवा अब्रुवन्तवैव प्रायणीयः तवोदयनीयः " " इति । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते है कि इसीलिए प्रायणीय भी आदित्य चरु ही होता है एवं उदयनीय भी आदित्य चरु ही होता । अर्थात् प्रारम्भणीय यष्टि में यज्ञ प्रारम्भ में जो हवि दिया जाता है वह भी इसी पृथिवी का भाग है, एवं यज्ञान्त में जो हवि दिया जाता है वह भी इसी पृथिवी का हिस्सा है । " तस्मादेष प्रादित्यएव प्रायरणीयो भवति, आदित्य उदयनीय । " देना है पृथिवी को, नाम ले रहे है आदित्य का - इस भ्रम में कोई न पड़ जाय इसलिए याज्ञवल्क्य कहते हैं " इयं ह्यवादितिः ” इस पृथिवी का नाम ही तो अदिति है । इस चरु का देवता प्रदिति ही है । अतः " अदिति देवता अस्य " इस व्युत्पत्ति से चरु को प्रादित्य कहा जाता है । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि जब पृथिवी का हिस्सा उन्होंने कायम कर दिया तो सारे यज्ञ को देवताओं ने देख लिया पहचान लिया । बस पहचान कर उन्होंने फिर यज्ञ किया । तात्पर्य यही है कि पार्थिव प्राण को आत्मसात् करने के अनन्तर देवता यज्ञफल प्राप्त करने में समर्थ हुए । " ततो यज्ञमपश्यन् तमतन्वत " ॥ ६ । पृथिवी ही प्रायणीय और उदयनीय कैसे है । इस पृथिवी पर ही प्रारम्भ कैसे होता है, एवं पृथिवी पर ही समाप्त कैसे होता है— एकमात्र यह प्रश्न बाकी बच जाता । बस इसी प्रश्न का उत्तर देकर इस श्रादित्य चरू प्रकरण को समाप्त करेंगे । पृथिवी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा लगाया करती है, इससे आश्वर्य में नहीं पड़ जाना चाहिए । ज्योतिष में पृथिवी को स्थिर बतलाया जाता है, एवं सूर्य को चल बतलाया जाता है परन्तु इसमें कोई भी विरोध नहीं है । दृश्य मण्डल और प्राकृतिक मण्डल इस खगोल के दो विभाग हैं । दृश्यमण्डल वह है जिसे कि हम आँखों से देख रहे हैं । प्राकृतिक मण्डल वह है जो प्राँखों से नहीं दिखाई पड़ता । परमेश्वर रहता किसी दूसरे स्वरूप में है दर्शन देता है किसी दूसरे ही स्वरूप से । आकाश यच्चयावत् मनुष्यों को नीला दिखा करता परन्तु प्राकृतिक विज्ञान पर निगाह डालने से मालूम हो जाता है कि प्राकाश तो निरूप है, दृश्य है । हम उत्तर अर्थात् ऊंचा अपने मस्तक के उपरीभाग को समझा करते है परन्तु वास्तव में उत्तरभाग उत्तरध्रुव की ओर है । हम पृथिवी के उपर तिर्यक् रूप से स्थित है अतएव हमें ऊंचा अपने मस्तक के ऊपर का भाग ही प्रतीत होता है । कहने का तात्पर्य यही है कि वास्तविक स्थिति रहती है और हमें दिखलाई पड़ता है कुछ और । सामान्य मनुष्य अपनी इन्द्रियों पर विश्वास कर जिन पदार्थों को सत्य समझने लगते हैं, विद्वान् मनुष्य - वैज्ञानिक मनुष्य उन्हीं को मिथ्या कहने लगते हैं । इसी अभिप्राय से प्रकृति नियन्ता भगवान् कहते हैं ।

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागत्त संयमी ।

यस्यां जाति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥

[ २६५ ]

पृष्ठ 314

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तोय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण बस ठीक इसी प्रकार दृश्यमण्डल के हिसाब से पृथिवी स्थिर मालूम होती है एवं सूर्य चलता हुआ मालूम होता है । परन्तु वैज्ञानिक दृष्टि से प्राकृतिक दृष्टि से देखा जाता है तो पृथिवी का चलना सिद्ध होता है एवं सूर्य का रहना सिद्ध होता है । इससे यह नहीं समझना चाहिए कि भारतीय ज्योतिष शास्त्र वैज्ञानिक है, नहीं नहीं ऐसा विचार स्वप्न में भी नहीं करना चाहिए, ज्योतिष का काम है धर्म व्यवस्था करना । किस मुहूर्त में क्या करना चाहिए इसका निर्णय करना । यह मुहूर्तादि की व्यवस्था पृथिवी को स्थिर मानने पर भी वैसे ही ठीक बैठ जाती है, जैसी कि चल मानने में । चूंकि सामान्य जनता पृथिवी को स्थिर समझ रही है एवं उसके अनुरोध से ऐसा मान लेने पर भी गणित में एवं मुहूर्तादि में कोई फरक श्राता नहीं है । " न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसंगिनाम् । जोषयेत् सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरेत् ॥ " के अनुसार हमारे ज्योतिः शास्त्र ने पृथिवी को स्थिर मान रक्खा है, और सूर्य को चल मान रक्खा है परन्तु हम इस समय जो विचार कर रहे हैं वह यज्ञ से सम्बन्ध रखता है । यज्ञ विद्या से सम्बन्ध रखती है । वेद सूर्य को स्थिर मानता है पृथिवी को चल मानता है । इसीलिए " सूर्यो बृहती मध्यूढस्तपत्ति " यह कहा जाता है । और भी एक प्रमाण है जिनसे सूर्य का प्रचलत्व ही सिद्ध होता है जिनका कि विवेचन करना प्रकृत से दूर जाना है । यहाँ सिर्फ इतना ही समझना पर्याप्त होगा कि सूर्य स्थिर है । पृथिवी चल है । इस पृथिवी की गति दो प्रकार की होती है एक गति का नाम दैनन्दिन गति एवं दूसरी का नाम है सांवत्सरिक गति । बस जिस मार्ग से होकर यह पृथिवी सांवत्सरिक गति का भोग करती है उस मार्ग को " क्रान्तिवृत्त " कहते हैं । सांवत्सरिक परिभ्रमण मार्ग का नाम ही क्रान्तिवृत्त है । प्रत्येक वृत्त ३६० तय करती हुई आगे चलती रहती अंश का माना जाता है । बस पृथिवी प्रतिदिन एक अंश के मार्ग को है इस प्रकार ३६० दिन में यह उस क्रान्तिवृत्त की परिक्रमा लगा लेती है । ३६० दिन का जो वर्ष है । इसे ही ज्योतिष की परिभाषानुसार " सावन " वर्ष कहा जाता है । पृथिवी यदि पूरे एक अंश भी चलती तो अवश्य ही ३६० दिन में पूरी परिक्रमा लगा लेती परन्तु यह एक अंश से कुछ कम चलती है अतएव पूरी परिक्रमा में इसे ३६५ दिन और कुछ कला लग जाती है । इस ३६६ दिन वाले वर्ष को " सौर " वर्ष कहा जाता है । पृथिवी क्रान्तिवृत्त पर चलती जरूर है । परन्तु स्वाक्ष परिभ्रमण करती हुई चलती है । जिस प्रकार बाइसिकल का पहिया घूमता हुआ श्रागे चलता है ठीक उसी प्रकार यह पृथिवी घूमती हुई आगे चलती है । अपने स्थान पर ही चक्र लगाती हुई यह आगे चलती है । बस इस स्वाक्ष परिभ्रमण का नाम ही दैनंदिन गति है । जिस प्रकार सांवत्सरिक गति ३६६ दिन में समाप्त होती है । उसी प्रकार यह दैनंदिन गति २४ घन्टे में समाप्त हो जाती है । २४ घन्टे में पृथिवी अपने धुरे के चारों ओर घूम जाती है । इस स्वाक्ष परिभ्रमण से ही दिन रात का स्वरूप बनता है । पृथिवी १२ घन्टे सूर्य की ओर रहती है एवं १२ घन्टे सूर्य के प्रतिदिक् में रहती है अर्थात् अन्धकार में रहती है बस उस प्रकाशी भाग का नाम दिन है । तमोमय भाग का नाम रात्रि है । यहां पर इतना और समझ लेना चाहिए कि जैसे सांवत्सरिक परिभ्रमण [ २६६ ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण वृत्त का नाम " क्रान्तिवृत " है उसी प्रकार अहोरात्र परिभ्रमण का नाम “ विष्वद्वृत्त " है । इस प्रकार सिद्ध हो जाता है क्रान्तिवृत और विष्ववृत दोनों ही पृथिवी के परिभ्रमण हैं । दोनों पर पृथिवी घूमा करती है । उत्तर ध्रुव पर दृष्टि डालिए । इतनी दूर का जो प्रदेश है वह १८० अंश का प्रदेश, इन दोनों के नीचे है | इस ३६० अंश के वृत्त का नाम ही " ध्रुवप्रतिवृत्त " है । उत्तर - दक्षिण दोनों ध्रुवों के परे में होकर जो एक वृत्त बनता है उसी का नाम " ध्रुवप्रोतवृत्त " है, एवं उसी को याम्योत्तर वृत्त भी कहते हैं इस याम्योत्तरवृत्त के ठीक बीच में अर्थात् उत्तर ध्रुव से ६० अंश दक्षिण एवं दक्षिण ध्रुव से ठीक ९ ० अंश उत्तर का जो स्थान हैं उस पर से पूर्वापर की ओर एक गोलवृत्त है बस उसी वृत्त का नाम " विष्व-वृत " है । चूंकि यह वृत्त पूर्वापर बनता है अतएव इसी को पूर्वापर वृत्त भी कहा जाता । भगवान् सूर्य इसी पूर्वापर वृत्त के विष्वद्वृत्त के ठीक बीचों बीच अर्थात् उत्तर ध्रुव से दक्षिण की ओर ६० अंश पर एवं दक्षिण ध्रुव से उत्तर की ओर ० अंश पर भगवान सूर्य स्थित है । यह वृत्त अदृश्य मण्डल के हिसाब से बड़ा है | अतएव इसे " बृहती " भी कहा जाता है ' इसीलिए " सूर्यो बृहती मध्यूढस्तपत्ति " यह कहा जाता है इस विष्वद्वृत्त से २४ अंश उत्तर एवं २४ अंश दक्षिण इस ४५ अंश के परिसर का जो मार्ग है उसे ही “ क्रान्तिवृत्त " कहते हैं । इसी क्रान्तिवृत्त पर पृथिवी घूमा करती है । विषवत् से उत्तर का जो क्रान्तिवृत्त है वह २४ अंश नीचा है, एवं जहां यह क्रान्तिवृत्त विषवत् से संपात करता है वह हिस्सा उस विषुवत् के सम धरातल पर है । आजकल क्रान्तिवृत्त का विषुवत् के साथ संपात होता है | पृथिवी जब क्रान्तिवृत्त के उत्तर की ओर जाती है तो उस समय का जो क्रान्तिवृत्त और विषुवत् वृत्त का संपात होता है वह शारद संपात कहलाता है अर्थात् जिस दिन पृथिवी दक्षिण गोल को समाप्त कर उत्तर गोल में प्रविष्ट होती है उस दिन के क्रान्तिविष्वद् के संपात को शारद संपात कहते हैं । २२ सितम्बर को आश्विन में शारद् संपात होता है । उस दिन पृथिवी विषुवद् वृत्त पर सूर्य के समधरा-तल पर रहती है पृथिवी का केन्द्र और सूर्य का केन्द्र, दोनों विषुवद् रेखा से कटे रहते हैं । विषुव रेखा से सूर्य जितना नीचा है, पृथिवी भी ठीक उतनी ही नीची है, एवं विषुव रेखा से सूर्य जितना ऊंचा है पृ-थिवी भी ठीक उतनी ऊंची है । इसीलिए उस दिन अर्थात् २२ सितम्बर को दिन रात बराबर रहते हैं । रात भी १२ ही घन्टे की होती है, एवं दिन भी १२ ही घन्टे का होता है, क्योंकि पृथ्वी का आधा हिस्सा विषुव के नीचे है, आधा ऊपर है । अतएव उसी स्थिति में रहने वाले सूर्य का प्रकाश समरूपेण पृथिवी पर गिरता है । इसके अनन्तर पृथिवी ज्यों ज्यों ऊपर चढती जाती है । त्यों त्यों विषुवद् रेखा से पृथिवी का भाग हटता जाता है । हम विषुवद् वृत्त से उत्तर भाग में रहते हैं । प्रतएव पृथिवी ज्यों - ज्यों ऊपर चढती है त्यों त्यों सूर्य नीचे हटता जाता हैं । हम विषुव के उत्तर भाग में है । सूर्य पृथिवी से नीचे रह जाता है अतएव सूर्य का प्रकाश हमारी ओर कम मात्रा में पहुँचता है । अतएव हमें सर्दी मालूम होने लगती है । रात्रि बड़ी और दिन छोटे होने लगते हैं । इसके बाद जाते २ जब पृथिवी परम क्रान्ति-वृत्त पर पहुंच जाती है अर्थात् उत्तर भाग स्थित क्रान्तिवृत्त के अन्तिम २४ अंश पर पहुंच जाती है तो उस दिन सूर्य एकदम नीचा श्रा जाता है । इस समय दिन सबसे छोटा हो जाता है एवं रात्रि सबसे बड़ी [ २६७ ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण हो जाती है । १० घन्टे का दिन होता है १४ घन्टे की रात होती है । इसके अनन्तर पृथिवी धीरे धीरे नीचे की ओर झुकने लगती है । बस ज्यों ज्यों पृथिवी नीचे की ओर झुकती जाती है । त्यों त्यों बड़े दिन होने लगते हैं । २२ सितम्बर में पृथिवी उत्तर गोल में घुसती है एवं २३ दिसम्बर को परमक्रान्ति पर पहुंच जाती है । यही सबसे छोटा दिन है एवं यही सबसे बड़ी रात है । बस २३ दिसम्बर के दूसरे ही दिन से पृथिवी दक्षिण भाग की ओर झुक जाती है । पृथिवी का नीचे झुकना सूर्य का ऊंचे की ओर उत्तर भाग की ओर उठना है । यद्यपि चलती है पृथिवी ही, तथापि उत्तरायण दक्षिणायन का हिसाब सूर्य के हिसाब से माना जाता है । सूर्य न चढ़ता, न गिरता, वह तो बृहती छन्द पर स्थिर रूप से तपा करता है परन्तु पृथिवी चलती है एवं इस पर हम बैठे हुए हैं अतएव सूर्य चलता हुआ दिखलाई देता हैं । रेलगाड़ी में बैठ जाने के अनन्तर जब वह अति प्रबल वेग से चलने लगती है तो उसके साथ साथ ही आकाश, वृक्ष, चन्द्रमा, नक्षत्र, सब चलते हुए नजर आने लगते हैं । बस ठीक यही हालत सूर्य की गति में समझनी चाहिए । सूर्य एकदम स्थिर, पृथिवी चलती है । हम पृथिवी पर बैठे हुए हैं अतएव यह हमें चलता हुआ दिखलाई पड़ता है । बस इसी चाल की अपेक्षा सूर्य सम्बन्धेन दक्षिणायन - उत्तरायण व्यवस्था की जाती है । कहना इससे हमें यही है कि 23 दिसम्बर से ( मार्ग - शीर्ष से ) पृथिवी दक्षिण की ओर झुकी कि सूर्य उत्तर की ओर चढ़ता दिखलाई पड़ने लगा । उत्तरायण का सम्बन्ध सूर्य से है अतएव उस दिन सूर्य का उत्तरायण गमन माना जाता है । पृथिवी जब उत्तर की परमक्रान्ति पर पहुंच जाती है तो सूर्य एकदम दक्षिण की परम क्रान्ति पर चला जाता है । जहां पृथिवी दक्षिण की ओर झुकी कि सूर्य उत्तर की ओर बढ़ने लगा । अत-एव पृथिवी के दक्षिणायन को हम सूर्य का उत्तरायण कहेंगे । यहां से दिन बड़े होने लगते हैं एवं रात्रि छोटी होने लगती है । कारण इसका यही है कि पृथिवी ज्यों ज्यों नीचे आती है त्यों त्यों हमारी ओर प्रकाश अधिक पड़ने लगता है । प्राते श्राते जब पृथिवी विषुवत् से प्रा मिलती है तो उस दिन भी दिन रात बराबर हो जाते हैं क्योंकि पृथिवी का उत्तर दक्षिण ध्रुव अर्थात् सुमेरु क्रम से सूर्य के खगोल के दक्षिणोत्तर ध्रुव से मिल जाता है पृथिवी की अर्थात् भूगोल की और खगोल की विष्वद् रेखा एक सीध में आ जाती है । इस समय पृथिवी सूर्य के सम धरातल पर रहती है । २३ मार्च को फाल्गुन के महीने में पृथिवी विष्वद् पर आ जाती है बस इस विषुवत् संपात को " बासन्त संपात " कहते हैं । इसी से बसन्त ऋतु का आरम्भ होता है । यहीं से ग्रीष्म का प्रारम्भ होता है । ग्रीष्म के प्रारम्भ ही को वसन्त कहते हैं जैसा कि आगे जा कर स्पष्ट हो जायगा । इस दिन उत्तराभाद्रपद नक्षत्र रहता है । अर्थात् वासन्त संपात उत्तराभाद्रपद पर होता है, एवं शारत् संपात उत्तरफाल्गुनी नक्षत्र पर होता है । यहां से पृथिवी दक्षिण गोल में प्रविष्ट होती है एवं सूर्य उत्तर गोल में प्रविष्ट होता है । होते होते जब पृथिवी दक्षिण की परम क्रान्ति पर पहुंच जाती है तो इस दिन अर्थात् २३ जून को ( आषाढ़ में ) दिन सबसे बड़ा होता है । एवं रात सबसे छोटी होती है । कारण इसका यही है कि सूर्य उत्तर परमक्रान्ति पर पहुंच जाता है एवं वह हमारे ऊपर अधिक मात्रा से प्रकाश डालता है । सूर्य सम्मुख भाग में रहता है इसके अनन्तर पृथिवी जब दक्षिण भाग को छोड़कर उत्तर की ओर बढ़ने लगती है तो इसी दिन सूर्य दक्षिण की ओर झुक जाता है बस यही दक्षिणायन कहलाता है । २२ जून को दक्षिणायन होता है । इस दिन से रात फिर बड़ी होने लगती है एवं [ २६८ ]

पृष्ठ 317

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण दिन छोटा होने लगता है । इसीलिए " कानजी कल में आया रात बड़ी दिन छोटा ल्याया " यह कहा जाता है । पूर्व कथन से यह भी सिद्ध तो जाता हैं कि उत्तरायण दक्षिण गोल में होता है एवं दक्षिणायन उत्तर गोल में होता है । इस प्रकार प्रहर्निश पृथिवी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा लगाती रहती है । पृथिवी का दक्षिणायन सूर्य का उत्तरायण ही है । पृथिवी का उत्तरायण सूर्य का दक्षिणायन है । हमने बतलाया है कि आज कल विषुव शारत् संपात उत्तरफाल्गुनी में होता है, एवं वासन्त संपात उत्तर भाद्रपद में होता है । परन्तु यह विषुव संपात स्थिर नहीं है पूर्व से पश्चिम की ओर यह संपात बिन्दु अर्थात् विषुवत् हटता जाता है । इसमें श्रुति भी प्रमाण है । मैत्रायण ब्राह्मण एवं कोषितकी ब्राह्मण में लिखा है कि रोहिणी नक्षत्र पूर्व बिन्दु पर अर्थात् विषुव पर रहता है परन्तु आज हम देखते है कि पूर्व बिन्दु पर उत्तरभाद्रपद नक्षत्र है आज विषुवत् संपात ६ नक्षत्र पश्चिम हटा हुआ है इससे मानना पडता है कि विषुवत् संपात पश्चिम की ओर सरकता जाता है एवं इसी से वेद निर्माण काल का भी पता लगाया जा सकता है । प्रत्येक नक्षत्र १३ अंश बीस कला का होता है १३ अंश बीस कला का एक नक्षत्र प्रदेश होता है इस हिसाब से ६ नक्षत्रों के हिसाब से विषुवत् ८० अंश आगे बढ़ आया है । एक भ्रंश का भोग ७५ वर्ष का है । विषुवत् ७५ वर्ष में एक अंश पश्चिम में हट जाता है इस प्रकार से ८० अंश के कुल ६००० छह हजार वर्ष हो जाते हैं । इसी मान पर हम कह सकते हैं कि कौषीतकि और मैत्रायण ब्राह्मण को बने हुए ६००० छह हजार वर्ष हो गए । इसके बाद शतपथ ब्राह्मण में और ही संपात का वर्णन है । शतपथ श्रुति कहती है-" कृतिकास्वग्नी प्रादधीत । एताह वै प्राच्यै दिशो न च्यवन्ते, सर्वाणि वा अन्यानि नक्षत्राणि प्राच्यं दिशश्च्यवन्ते " ह इससे मालूम होता है कि शतपथ निर्माण के समय विषुवत् संपात कृत्तिका पर था तभी " एता है प्राच्यं दिशो न च्यवन्ते " इसकी संगति हो सकती है । इसी में शतपथ निर्माण का भी समय निकाला जा सकता है । आज विषुवत् संपात उत्तरभाद्रपद पर होता है । इस प्रकार से करीब ४ साढ़े चार नक्षत्र पश्चिम की ओर हटा हुआ है । इस हिसाब से शतपथ को बने हुए ४५०० साढ़े चार हजार वर्ष के लगभग हो जाते हैं, यह मान लेना पड़ता है । सारे प्रपञ्च से कहना हमें यही है विषुवत् संपात बिन्दु पश्चिम की ओर हटती जाती है । प्राज विषुवत् वासन्त संपात उत्तर भाद्रपद पर होता है एवं शारत् संपात उत्तर फाल्गुनी पर होता है । जिस दिन पृथिवी इस संपात बिन्दु पर आ जाती है उस दिन, दिन-रात बराबर हो जाते हैं । हमें प्रकृत में बतलाना है अदिति का स्वरूप, और अदिति से यज्ञ प्रारम्भ होता है एवं अदिति पर ही यज्ञ समाप्त होता है, इसका रहस्य | पृथिवी के सांवत्सरिक परिभ्रमणवृत्त का नाम क्रान्तिवृत्त [ २६ ९ ]

पृष्ठ 318

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मणं है और अहोरात्र परिभ्रमण वृत्त का नाम विष्वद्वृत्त है । यह बात पूर्व के प्रकरण से सिद्ध हो जाती है । यह विषुवत् और क्रान्तिवृन्त जैसे पृथिवी में हैं वैसे ही खगोल में भी है । पृथिवी की रेखाओं से पृथिवी क्रान्तिवृत और विषुवद् वृत्त से खगोल का क्रान्तिवृत्त और विष्वत् कल्पित कर लिया जाता | पृथिवी पिण्ड गोल । इसका उत्तर भाग उत्तर ध्रुव से प्रोत रहता है, एवं दक्षिण भाग दक्षिण ध्रुव से प्रोत रहता है । इस याम्योत्तर वृत्त को ध्रुव प्रोतवृत्त भी कहते हैं । पृथिवी उत्तर ध्रुव और दक्षिण ध्रुव के ठीक बीच में रहती है । उत्तर ध्रुव के ६० अंश दक्षिण और दक्षिण ध्रुव से ६० अंश उत्तर जो एक पूर्वापरवृत्त बनता है उसी का नाम विषववृत्त है । इसी को बृहती छन्द कहते हैं । पृथिवी गोल है इसका जो बिलकुल बीच का हिस्सा है उस पर जो एक वृत्त रहता है बही विष्वद् वृत्त कहलाता है । गोल वस्तु के ठीक बीच का वृत्त पार्श्ववर्ती वृत्तों की अपेक्षा बड़ा होता है । गोल वस्तु का मध्यमवृत्त ही सबसे बड़ा होता है चूंकि विष्ववृत्त पृथिवी के ठीक बीच में है अतएव इसे वेद में बृहती छन्द कहा जाता है प्रत्येक वृत्त ३६० अंश का होता है । इसी हिसाब से मानना पडता है कि बृहतीवृत्त भी ३६० ही अंश का है । यह सारा वृत्तचार ६०-६० अंशों में बंटा हुआ है । पूर्व क्षितिज से मध्याह्न तक ६० अंश हैं, मध्याह्न से सायंकाल तक ६० अंश, सांयकाल से मध्यरात्रि तक ६० अंश हैं एवं मध्यरात्रि से प्रातःकाल तक ६० अंश हैं । वेद में १० संख्या की समष्टि को विराट् कहा जाता है । इसीलिए बारबार " दशिनो विराट् " यह लिखा रहता है । बृहती वृत्त में ६०-६० अंश के टुकड़े हैं । इस प्रकार १० - १० अंश के हिसाब से प्रत्येक टुकड़े में - विराट् हो जाते हैं । एक विराट् का नाम अक्षर है । इस प्रकार से एक एक टुकड़े में ९ ० अंश के १०-१० अंशों के हिसाब से ६-६ तो विराट् हो जाते हैं एवं ६-६ ही अक्षर हो जाते हैं । विराट् कहो या अक्षर कहो दोनों एक ही बात है । इस प्रकार एक बृहती में ३६ अक्षर हो जाते हैं । बस इसी विज्ञान को बतलाने के लिए बृहती छन्द को ३६ अक्षर का बनाया जाता है, जिस छन्द में ३६ अक्षर होते हैं उसे बृहती छन्द कहा जाता है । इसी बृहती छन्द को अहोरात्रवृत्त भी कहते हैं । यह अहोरात्रवृत्त कुल ७ हैं । इन्हीं का नाम वेद में क्रमशः गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप् वृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप् और जगती यह है । जो सबसे उत्तर का अ-होरात्रवृत्त है उसका नाम जगती है एवं जो सबसे दक्षिण का अहोरात्रवृत्त है उसका नाम गायत्री है | दृश्यमण्डल के हिसाब से गायत्री छन्द सबसे छोटा है अतएव " अष्टाक्षरा वै गायत्री " यह कहा जाता है । एवं सबसे बड़ा छन्द जगती है । ४५ अक्षर का छन्द जगती छन्द कहलाता है । इसी पर वेद में प्रश्न किया है कि जब जगती सबसे बड़ा है तो फिर उसको बृहती कहना चाहिए न कि मध्य ग्रहोरात्र वृत्त को इस प्रश्न का - प्रकृति को लक्ष्य में रखकर समाधान किया गया है । हम विषुवत् से उत्तर में हैं अतएव दृश्यमण्डल के हिसाब से हम जगती को बड़ा कहते हैं । परन्तु प्रकृति के हिसाब से गोल वस्तु के मध्य का वृत्त ही चूंकि बड़ा होता है अतएव हमने इसी को बृहती वृत्त कहा है । इस बृहती से २४ अंश उत्तर और २४ अंश दक्षिण का जो एक वृत्त है उसी का नाम क्रान्ति-वृत्त है । यह बात हम पहले बतला आये हैं । इस क्रान्तिवृत्त को काटते हुए जो पूर्वापरवृत्त बनते हैं उन्हीं का नाम अहोरात्रवृत्त है विषुवत् को बीच में रख लीजिए, इससे उत्तर की ओर १२ - ८ - ४ अंश पर क्रान्तिवृत्त को काटते हुए जो पूर्वापर वृत्त बनेंगे वे ही अहोरात्र वृत्त कहलाते हैं । इसी प्रकार १२ - ८ -४ [ ३०० ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण के हिसाब से ही तीनवृत्त विषुवत् से दक्षिण समझने चाहिए । इस प्रकार विषुवत् को मिलाकर कुल ७ अहोरात्र वृत्त हो जाते हैं जैसे सात अहोरात्रवृत्त भूगोल में हैं उसी प्रकार सात ही अहोरात्रवृत्त खगोल में हैं । जो खगोल सात अहोरात्रवृत्त हैं वे ही हिरण्मय रथ का एक पहिया है । इसी पर सूर्य अर्थात् पृथिवी घूमा करती है । जिस प्रकार कुम्हार का चाक खूब घूमता है, परन्तु अपने बीच के कीले को नहीं छोडता, ठीक उसी प्रकार से यह पृथिवी अपने धुरे को कभी नहीं छोड़ती है । इस घुरे को ही पुराण में मेरु कहा जाता है, एवं ज्योति में अक्ष कहा जाता है । बस अक्ष के इस धुरे की पृथिवी २४ घन्टे में एक परिक्रमा लगा जाती है । इस स्वाक्ष परिभ्रमण से जिसे कि हम दैनंदिनगति कहेंगे, रात दिन का जन्म होता है । अहोरात्र का स्वरूप इसी स्वाक्ष परिभ्रमण पर अवलम्बित है । यह मेरु, सुमेरु और कुमेरु नाम से व्यवहृत होता है । यह मेरु पृथिवी के ठीक केन्द्र में से आरपार होकर निकला हुआ है । पृथिवी के उत्तर भाग का मेरु उत्तर ध्रुव से बद्ध है, दक्षिण भाग का मेरु दक्षिण ध्रुव से बद्ध है । जो पृथिवी का अन्तिम उत्तर सीमान्त है उसी का नाम सुमेरु है । उत्तर में देव प्राण रहता है अतएव इसे सुमेरु कह दिया जाता है, एवं ठीक इसके - पृथिवी के दक्षिण भाग के अन्त में, दक्षिण ध्रुव की सीध में जो मेरु है वह श्रासुर प्राण प्रधानात् कुमेरु कहलाता है इसी सुमेरु - कुमेरु को लक्ष्य में रखकर कहा जाता है - " लंका कुमध्ये यमकोटिरस्याः प्राक् पश्चिमे रोमकूपत्तनं च " । इसका नाम सुमेरू ही समझना चाहिए । इस सुमेरु कुमेरु का यदि वास्तविक स्वरूप पूछना चाहो तो अग्नि ही है । पृथिवी के केन्द्र से आरपार होती हुई जो प्रज्वलित अग्नि की ज्वाला है उसी का नाम to है । इसी अग्नि का नाम हिरण्मय ब्रह्मा है । अग्नि का वर्ण सुवर्ण के माफिक होता है अतएव इसे हिरण्मय कहा जाता है । अतएव इसी अग्नि के आधार से पृथिवी की सत्ता है । अतएव पुराणों में इसे ब्रह्म कहा जाता है । यही अन्तर्गत - प्राग्नेय ब्रह्मवेद में प्रजापति नाम से व्यवहृत होते हैं । इसी अभिप्राय से कहा जाता है—

प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा व्यजायत ।

तस्य योनि परिपश्यन्ति धीराः तस्मिन्ह तस्थुर्भुवनानि विश्वाः ॥

यही प्रजापति मेरु है । जिस प्रकार सारे शरीर की स्थिति मेरुदण्ड पर अवलम्बित है तथैव पृथिवी के शरीर की स्थिति चूंकि इसी प्रजापति पर अवलम्बित है अतएव इसे " मेरु " कहा जाता है । इस सुमेरु कुमेरु का आजकल पर्वत अर्थ किया जाता है परन्तु मेरु का पर्वत अर्थ करना सर्वथा अनभिज्ञता है । पर्वत अचल है तथैव यह प्रजापति भी अचल है इस लक्ष्य से इसका नाम मेरु रख दिया गया है न कि यह भी कोई पर्वत है । मेरु नाम का पर्वत भी अवश्य ही है परन्तु इस सुमेरु - कुमेरु से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है | हाँ ऐसी बात अवश्य थी, जिस समय त्रिभुवनस्थ भुवनस्वर्ग व्यवस्था थी जबकि ब्रह्मा जी देवता असुरों पर दोनों पर शासन करते थे, उस समय जिस पहाड़ पर ब्रह्मा रहते थे उसी पर सुमेरु बिन्दु थी । जिस पहाड़ पर ब्रह्मा जी रहते थे उसी का नाम " ब्रह्ममेरु " था, एवं इसे ही " हिरण्यशृंग " पर्वत भी कहते [ ३०१ ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण थे । यही पर्वत यही स्थान आज " पामीर " नाम से व्यवहृत होता है । हमने बतलाया है कि यह सुमेरु और कुमेरु दोनों ही दक्षिणोत्तर ध्रुव से बद्ध है । ध्रुव विष्णु भगवान् के अर्थात् नाक के चारों ओर परिक्रमा लगाता है । यह परिक्रमा २५ हजार वर्ष में जाकर पूरी होती है । हम मेरु को बदलता हुआ देखते हैं । ब्रह्मा के समय में यह मेरु बिन्दु ठीक हिरण्यशृंग पर्वत पर था । परन्तु ग्राज उससे बहुत ग्रागे बढ़ गया है अतएव मानना पडता है कि ध्रुव अवश्य ही फिरता है । मेरु ध्रुव से बद्ध है । यदि ध्रुव न चलता होता तो मेरु हर्गिज नहीं चल सकता था । चूंकि मेरु को हम चलता हुत्रा देखते हैं । अतएव इस ध्रुव को हम अवश्य ही गतिधर्मा कहने के लिए तैय्यार हैं । कहना इससे हमें यही है कि उस समय सुमेरु बिन्दु हिरण्य-पर थी अतएव लोगों को भ्रम हो गया है कि सुमेरु भी कोई पर्वत ही है । सुमेरु अक्षय पर्वत है परन्तु हिरण्यग का नाम - प्राग्मेरु का नाम - सुमेरु है । यह प्राग्मेरु पर्वत है न कि पृथिवी का सुमेरु-कुमेरु । पृथिवी का जो ३३ तक जाने वाला वषट्कारमण्डल है उसके २१ वें स्थान पर भगवान् सूर्य है । इस सूर्य से ४ अहर्गण नीचे और ४ अहर्गण ऊपर, इस प्रकार ८ अहर्गणों का जो एक परिसर है उसे स्कम्भ कहा जाता है । सूर्य २१ वें अहर्गण पर है । इस प्रकार अहर्गणों के परिसर का यह अग्निस्तम्भ विष्कम्भ नाम से व्यवहृत होता है । इसी को नवाह यज्ञ कहते हैं पृथिवी के १६ से लेकर २५ तक नवाह यज्ञ होता है । इस नवाह यज्ञ में कुण्ड सूर्य है । इसी में प्राहुति पड़ती रहती है । जिस प्रकार पृथिवी प्रजापति जिसे कि सुमेरु और कुमेरु कहते हैं, बडी दूर तक चला जाता है । उसी प्रकार यह अग्नि का स्कम्भ बडी दूर तक सूर्य से ऊपर और नीचे तक चला गया है । इस स्कम्भ का जो अन्तिम सीमान्त है उसी का नाम कदम्बवृत्त है । इसी कदम्बवृत्त को वैदिक लोग " नाक " शब्द से व्यवहृत करते हैं । इसी विष्णु का डाय-मीटर ४८ अंश का समझना चाहिए । सूर्य को केन्द्र में रखकर २४ अंश व्यासार्ध से जो एक वृत्त बनाया जाय, बस वही इस स्कम्भ का परिमाण है । इतना मोटा यह स्कम्भ है जो कि बड़ी दूर तक वितत है । इस स्कम्भ की उदक शिरोबिन्दु का नाम ही " नाक " है । इसी को उत्तरकदम्ब कहते हैं । यही भगवान् विष्णु है । ध्रुव इसी कदम्बवृत्त के चारों ओर परिक्रमा लगता है । यह कदम्ब एक कल्पित स्थान है । वास्तव में कोई नक्षत्र नहीं है । इसी अभिप्राय से कहा जाता है: -" तद्विष्णोः परमंपदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीवचक्षुरानतम् " मह लोग बड़े गौर से इसे देखा करते हैं । आँख को वितत करके जो देखा करते हैं इससे सिद्ध होता है कि वास्तव में कदम्ब एक स्थानमात्र है, वहां कोई नक्षत्र नहीं है । जिस प्रकार विषुवद् वृत्त से ठीक ६० अंश पर उत्तर ध्रुव है एवं ६० अंश दक्षिण ध्रुव है। ठीक इसी प्रकार क्रान्तिवृत्त से दक्षिण ६० उत्तर में उत्तरकदम्ब है । जो दक्षिण कदम्ब है वह दक्षिण ध्रुव से २४ अंश पर है । दक्षिण ध्रुत्र दक्षिण-कदम्ब्र से चारों ओर परिक्रमा लगाता है, एवं उत्तरध्रुव उत्तरकदम्ब के चारों ओर परिक्रमा लगाता है अतएवः-" नाकस्थ विष्णोः परितस्तु वेदध्वर व्यासार्धजं संचरति ध्रुवं ध्रुवः ॥ [ ३०२ ]