Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 41–50
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 41–50
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मणं " एष उ तत्र ( सोमयागे ) दीक्षितस्योपचारः ” ॥ १० ॥
देवयजनं ब्राह्मणं जिस प्रकार से विद्या- ग्रहण के लिए शिष्य दोनों हाथों में समिधा ग्रहण कर गुरु के पास जाता है तद्वत् यज्ञ के लिए यह यजमान दोनों हाथों में अरणी ले कर उस शाला में प्रविष्ट होता है— " अथाररणी पारणौ कृत्वा शालामध्यवस्यति " 1 इस शोला के दोनों ओर बड़ी - बड़ी दो थुरिएँ लगी रहती हैं । पूर्व पश्चिम जो वंश है उसे रोकने के लिए पूर्व - पश्चिम दोनों ओर बड़े - बड़े थूण लगे रहते हैं । इन दोनों में से जो पूर्व की थूणी है - जो कि विशाल होने से " स्थूणराज " कहलाती है उसका स्पर्श करके निम्नलिखित मन्त्र बोलता है-" एदमगन्म देवयजन पृथिव्या यत्र देवासो अजुषन्त विश्वे । ऋक्सामाभ्यां सन्तरन्तो यजुर्भिर्रायस्पोषेण समिषा मदेम " ॥ ( वा ० स ० ४११ ) " इदं पृथिव्या देवयजनं; - अगन्म । यत्र विश्वे देवासः, अजुषन्त । कीदृग्विधास्ते विश्वेदेवासः - तदुच्यते - ये हि ऋक्सामाभ्यां सन्तरन्तः यजुभिश्व एवं च ( वयम् ) रायस्पोषेण - समिषामदेम ( इषा संमदेम ) " । इस पृथिवी का जो देवयजन भाग था— आज मैं उसमें आ गया हूँ । वह देवयजन कैसा है जिसमें सारे ऋत्विक्, ऋक्यजुसाम के समुद्र में तैरते हुए इस सारे देवयजन में व्याप्त हो रहे हैं । मन्त्र ध्वनियों से उन्होंने सारे देवयजन को पूर्ण कर रखा है । इसी अभिप्राय से कहते " जो शुश्रूवान् एवं अनुचान विद्वान् ऋत्विग् ब्राह्मण लोग हैं उन्हीं से इस यजमान का यह देवयजन व्याप्त हो रहा है— " तदस्य विश्वश्व देवै जुष्टं भवति, ये चेमे ब्राह्मणाः शुश्रूवान्सोऽनूचानाः ” । कदाचित् कोई प्रश्न करे कि सारा देवयजन तो फिर भी इन देवताओं से व्याप्त नहीं हुआ । क्या सब जगह थोड़े ही ये पसरे रहते हैं - इसी का उत्तर देते हैं- यजमान के इस देवयजन को अनू-चान शुश्रूवान् ब्राह्मण चारों श्रोर दृष्टि फैला कर देखते हैं तो उनसे यह देवयजन वास्तव में सर्वात्मना जुष्ट हो जाता है । चारों ओर नेत्र - रश्मि डालना ही - आसमन्तात् - इस देवयजन में इनका व्याप्त होना है— “ यदहास्य तेऽक्षिभ्यामोक्षन्ते ब्राह्मणाः शुश्रूवांसस्तदहास्य तैर्जुष्टं भवति " । इत्येकोऽर्थः ॥११ ॥
जिस प्रकार से मनुष्य - देवता ऋक्सामयजु मन्त्रों के समुद्र में तैरते रहते हैं तद्वत् ऋक्सामयजु की लहर में ही यह प्राण देवता तैरा करते हैं । प्रत्येक पदार्थ के केन्द्र में अग्नि रहता है । यह अग्नि [ २३ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मरण देवयजन ब्राह्मण चित्यचितेनिधे भेदेन दो प्रकार का है । जो पिण्डाग्नि है उसे चित्य क्रिया मर्त्याग्नि कहते हैं एवं जो 33 तक ( वषट्कार मण्डल तक ) जाने वाला श्रग्नि है उसे चितेनिधे किंवा अमृताग्नि कहते हैं । 33 तक वितत रहने वाला यह अग्नि ही निविड - तरल - विरल भेद से अग्नि वायु आदित्य तीन नामों से व्यवहृत होने लगता है । बस इस अग्नि से ऋक् का स्वरूप बनता है - वायु से यजुः का स्वरूप बनता है - एवं आदित्य से साम का स्वरूप बनता है । जिसका हम प्रत्यक्ष कर रहे हैं वही ऋक् है— जो उसका चारों ओर मण्डल बनता है उसका नाम साम है एवं इन दोनों के बीच में गतिशील वायु यजुः है । जो कि संचार - क्रियया उस वस्तु के स्वरूप को सुरक्षित रखता है । देवता सारे प्राग्नेय हैं एवं अग्नि ही के ऋक्सामयजु तीन नाम हैं । जैसा कि श्रुति कहती है-“ त्रयो ह वै समुद्राः । अग्निर्यजुषां महाव्रतं साम्नां महदुक्थऋचाम् ” । ( ५०३ पृ ० ) बस इसीलिए प्रकृत में “ ऋक्सामाभ्यां यजुभिः सन्तरन्तः " कहा गया है । प्रकृत में यजमान यज्ञ कर रहा है । अग्नि में सोम की आहुति देना ही यज्ञ है । देवता अग्निमय है । जब अग्नि यहाँ है तो ऋक्यजुःसाम - समुद्र का होना स्वतः सिद्ध हो जाता है । " इषे त्वोर्जे " से मन्त्रों के समुद्र में ब्राह्मण देवता तैरा रहे हैं तद्वत् इस अग्नि से उत्पन्न होने वाले ऋक्यजुः साम समुद्र में प्राण देवता तैरा रहे हैं - यह हम अवश्य ही कह सकते हैं । इसी अभिप्राय से " यद्वाह " इस वृत्तान्तर को उठाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं— “ इस यजमान का जो यह देवयजन है वह ऋक्साम एवं यजुः इनसे तरण करते हुए सारे प्राण-देवताओं से चूँकि व्याप्त रहता है - प्रतएव यह यजमान " यत्र देवासो अजुषन्त ऋक्सामाभ्यां सन्तरन्तो-जुभिः " कहता है । अपि च ऋक्सामयजु से ही यजमान यज्ञ की समाप्ति पर पहुँचता है । ऋक्साम-यजुसमुद्र को पार करने से ही इसे यज्ञ सम्पत्ति मिलती है एवं दूसरे अर्थ में ऋक्सामयजु मन्त्र से ही यज्ञ की इतिकर्त्तव्यता पूरी होती है तो " मैं यज्ञ की सम्पत्ति पर पहुँच जाऊँ " इसी भाव को बतलाने के लिए " ऋक्सामाभ्यां सन्तरन्तो यजुभिः " कहा है— " यत्र देवासोऽजुषन्त विश्वेऽइति तदस्य विश्वेदेवजुष्टं भवति । ऋक्सामाभ्यां सन्तरन्तो यजुभिरिति । - ऋक्सामाभ्यां वै यजुभि यज्ञस्योहचं ( परिसमाप्ति ) गच्छन्ति । यज्ञस्योहचं गच्छानि इत्येवैतदाह " । अर्थात् ऋक्सामाभ्यां सन्तरन्तोयजुभिः ” इससे मैं यज्ञ की परिसमाप्ति पर पहुँच जाऊँ - यही कहा है । " रायस्पोषेण समिषामदेम " । धन की पुष्टि को रायस्पोष कहते हैं । इसी रायस्पोष को ' भूमा ' कहते हैं । " भूमा ' रायस्पोषः " । बात सच है, यदि किसी के पास अत्यधिक सम्पत्ति आ जाती है तो उसका आयतन बढ़ जाता है । जितनी सम्पत्ति बढ़ती जायगी, उतना उतना ही इसका आत्मा ( मन ) [ २४ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण देवयजन ब्राह्मणं बढ़ता जायगा । इसीलिए तो " यावद्वित्तं तावदात्मा " कहा जाता है । एवं ' श्री ' को भी भूमा कहते हैं । तो बस ' रायस्पोषेण ' इससे " आर्थी " ही मांगता है ।—-“ भूमाव रायस्पोषः । श्रीर्वै भूमा । श्राशिषमेवैतदाशास्ते ” । " समिषा मदेमेति " जो मनुष्य अत्यन्त श्रीयुक्त होता है एवं बहुत ऊँचे दर्जे पर पहुँच जाता है, उसके लिए, लोक में " इषं मदाति " इस शब्द से व्यवहृत किया जाता है । जाता नहीं है - याज्ञवल्क्य के समय किया जाता था । " इषं मदेम " का तात्पर्य यही है कि – अजी उनकी क्या बात - वे तो नजर-दौलत हैं । कर्त्तुं मकर्त्तुं मन्यथाकत्तु ं समर्थ हैं । बस इसी भाव को बतलाने के लिए " समिषा मदेम " कहा है । . " इषं मदतीतितमाहुर्यः श्रियमश्नुते यः परमतां गच्छति तस्मादाह समिषा मदेमेति " ॥ १२ ॥
मन्त्र का खुलासा अर्थ यही है कि मैं पृथिवी के इस देवयजन भाग में आा गया हूँ । जहाँ पर कि ऋक्सामयजुमन्त्र – समुद्र में मनुष्य देवता एवं ऋक्सामयजु स्वरूप अग्निमण्डल में प्राणदेवता तैरते हुए सारे देवयजन में व्याप्त हो रहे हैं एवं मैं यज्ञदेवता से प्रार्थना करता हूँ कि मैं घन की पुष्टि से एवं अन्न से अर्थात् भोग्यजात से मस्त हो जाऊँ । " इषा संमदे भोग्यजातेन संमदेम " ॥ १२ ॥
इति देवयजनगमनं - यज्ञशालागमनं समाप्तम् इति तृतीयकाण्डे प्रथमाध्याये प्रथमं ब्राह्मणं समाप्तम् [ २५ ]
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अथ तृतीयकाण्डे प्रथमः प्रपाठकः प्रथमोऽध्यायः प्रारभ्यते तत्र द्वितीयं ब्राह्मणम् ॥ श्रथ दीक्षाब्राह्मणम् ॥ [ मूल ] - अपराह्णे दीक्षेत । पुराकेशश्म श्रोर्वपनाद्यत् कामयेत तदश्नीयाद्यद्वा सम्पद्येत व्रतं ह्येवास्यातोऽशनं भवति यद्यु नाशिशिषेदपि कामं नाश्नीयात् ॥ १ ॥
अथोत्तरेणशालां परिश्रयन्ति । तदुदकुम्भमुपनिदधति तन्नापित उपतिष्ठते तत्केशश्मश्रु च वपते नखानि च निकृन्ततेऽस्ति वै पुरुषस्यामेध्यं यत्रास्यापो नोपतिष्ठन्ते केशरमश्रौ च वाऽस्य नखेषु चापो नोपतिष्ठन्ते तद्यत्केशश्मश्रु च वपते नखानि च निकृन्तते मेध्यो भूत्वा दीक्षाऽइति ॥ २ ॥
तद्धैके । सर्वऽएव वपन्ते सर्वऽएव मेध्या भूत्वा दीक्षिष्यामहइति तदु तथा न कुर्याद्यद्वै केशश्मश्रु च वपते नखानि च निकृन्तते तदेव मेध्यो भवति तस्मादु केशश्मश्रु चैव वपेत नखानि च निकृन्तेत ॥ ३ ॥
सवै नखान्येवाग्रे निकृन्तते । दक्षिणस्यैवाग्रे सव्यस्य वाऽग्रे मानुषेऽथैवं देवत्रा गुष्ठयोरेवाग्रे कनिष्ठिकयोर्वाऽग्रे मानुषेऽथैवं देवत्रा ॥ ४ ॥
स दक्षिणमेवाग्रे गोदानं वितारयति । सव्यं वाऽग्रे मानुषेऽथैवं देवत्रा ॥५ ॥
स दक्षिणमेवाग्रे गोदानमभ्युनत्ति । इमाऽश्रापः शमु मे सन्तु देवीरिति स · यदाहेमा प्रापः शमु मे सन्तु देवीरिति वज्रो वाऽश्रापो वज्रो हि वाऽश्रापस्त-स्माद्येनैता यन्ति निम्नं कुर्वन्ति यत्रोपतिष्ठन्ते निर्दहन्ति तत्तदेत मेवैतद्वजं शमयति तथो हैनमेष वज्रः शान्तो न हिनस्ति तस्मादाहेमा प्रापः शभु मे सन्तु देवीरिति ॥ ६ ॥
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मणं दीक्षा ब्राह्मण अथ दर्भ तरुणकमन्तर्दधाति । श्रोषधे त्रायस्वेति वज्रो वै क्षुरस्तथो हैनमेष वज्रः क्षुरो न हिनस्त्यथ क्षुरेणाभिनिदधाति स्वधिते मैनं हिंसीरिति वज्ञो वै क्षुरस्तथो हैनमेष वज्रः क्षुरो न हिनस्ति ॥ ७ ॥
प्रच्छिद्योदपात्रे प्रास्यति । तूष्णीमेवोत्तरं गोदानमभ्युनत्ति तृष्णीं दर्भतरुण-कमन्तर्दधाति तूष्णीं क्षुरेणाभिनिधाय प्रच्छिद्योदपात्रे प्रास्यति ॥ ८ ॥
श्रथ नापिताय क्षुरं प्रयच्छति । स केशश्मश्रु वपति स यदा केशश्मश्रु वपति ॥ ९ ॥
अथ स्नाति । श्रमेध्यो वै पुरुषोयदनृतं वदति तेन पूतिरन्तरतो मेध्या वा s पो मेध्यो भूत्वा दीक्षाऽइति पवित्रं वाऽप्रापः पवित्रपूतो दीक्षाऽइति तस्माद्वै स्नाति ॥ १० ॥
स स्नाति । श्रापोऽस्मान्मातरः शुन्धयन्त्वित्येतद्धयाह शुन्धयन्त्विति घृतेन नो घृतवः पुनन्त्विति तद्वै सुपूतं यं घृतेन पुनंस्तस्मादाह घृतेन नो घृतप्वः पुनन्त्विति विश्वं हि रिप्रं प्रवहन्ति देवीरिति यद्वं विश्वं सर्व तद्यदमेध्यं रिप्रं तत्सर्वं ह्यस्मादमेध्यं प्रवहन्ति तस्मादाह विश्वं हि रिप्रं प्रवहन्ति देवी-रिति ॥ ११ ॥
अथ प्राङिवो ङ ङत्क्रामति । उदिदाभ्यः शुचिरा पूत एमीत्युद्धाभ्यः शुचिः पूत एति ॥ १२ ॥
अथ वासः परिधत्ते । सर्वत्वायैव स्वामेवास्मिन्नेतत्त्वचं दधाति या है वाइयं गोस्त्वक् पुरुषे हैषाऽग्रास ॥ १३ ॥
ते देवा अब्रुवन् । गौर्वाऽइदं सर्व बिर्भात हन्त येयं पुरुषे त्वग्गव्येतां दधाम तयैषा वर्षन्तं तया हिमं तथा घृरिंग तितिक्षिष्यतइति ॥ १४ ॥
तेऽवच्छाय पुरुषम् । गव्येतां त्वचमदधु स्तयैया वर्षन्तं तया हिमं तया घृरिंग तितिक्षते ॥ १५ ॥
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मणं दीक्षा ब्राह्मण अवच्छितो हि पुरुषः । तस्मादस्य यत्रैव क्व च कुशो वा यद्वा विकृन्तति तत एव लोहितमुत्पतति तस्मिन्नेतां त्वचमदधुर्वास एव तस्मान्नान्यः पुरुषाद्वासो बिभतां ह्यस्मिंस्त्वचमदधुस्तस्मादु सुवासा एव बुभूषेत्स्वया त्वचा समृध्याऽइति तस्मादप्यश्लीलं सुवाससं दिदृक्षन्ते स्वया हि त्वचा समृद्धो भवति ॥ १६ ॥
नो हान्ते गोर्नग्नः स्यात् । वेद ह गौरहमस्य त्वचं बिभर्मोति सा बिभ्यतो त्रसति त्वचं मऽश्रादास्यतऽइति तस्मादु गावः सुवाससमुपैव निश्रयन्ते ॥ १७ ॥
तस्य वाऽएतस्य वाससः । अग्नेः पर्यासो भवति वायोरनुच्छादो नीविः पितृणां सर्पाणां प्रधातो विश्वेषां देवानां तन्तव आरोकानक्षत्रारणामेव हि वा एतत्सर्वे देवा अन्वायत्तास्तस्माद्दीक्षितवसनं भवति ॥ १८ ॥
तद्वाऽअहतंस्यात् । अयातयामतायै तद्वै निष्पेष्टनै ब्रूयाद्यदेवास्यात्रामेध्यमा कृणत्ति वा वयति वा तदस्य मेध्यमसदिति यद्युग्रहतं स्यादद्भिरभ्युक्षेन्मेध्यमस-दित्यथो यदिदं स्नातवस्यं निहितमपल्यूलनकृतं भवति तेनो हापि दीक्षेत ॥ १ ९ ॥ तत्परिधत्ते । दीक्षातपसोस्तनूरसीत्यदीक्षितस्य वाग्रस्यैषाऽग्रे तनूर्भवत्य-यात्र दीक्षातपसोस्तस्मादाह दीक्षातपसोस्तनूरसीति तां त्वा शिवां शग्मां परिदधइत्येवं तदाह भद्रं तस्मादाह भद्रं वर्णं पुष्यन्निति ॥ २० ॥
अथैनं शालां प्रपादयति । स धेन्वं चानडुहश्च नाश्नीयाद्धेन्वनडुहौ वाऽइदं सर्वं बिभृतस्ते देवा अब्रू वन्धेन्वनडुहौ वा इदं सर्वं बिभृतोहन्त यदन्येषां वयसां वीर्यं तद्धेन्वनडुहयोर्दधामेति स यदन्येषां वयसां वीर्यमासीत्तद्धेन्वनडुहयोरदधु-स्तस्माद्धेनुश्चैवानड्वांश्च भूयिष्ठं भुङ क्तस्तद्वैतत्सर्वाश्यमिव यो धेन्वनडुहयोर-श्नीयादन्तगतिरिव तं हाद्भुतम भिजनितोजीयायै गर्भं निरवधीदिति पापमक-दिति पापी कीर्तिस्तस्माद्धेन्वनडुहयोर्नाश्नीयात्तदु होवाच याज्ञवल्क्योऽश्नाम्ये-वाहमंसलं चेद् भवतीति ॥ २१ ॥
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षा ब्राह्मण [ अनुवाद ] - दिन के तीसरे प्रहर में दीक्षा प्रदान करे । सिर के बाल तथा मूंछ - दाढी मुंडने से पहिले, जो इच्छा हो वह खा ले अथवा जो उपलब्ध हो ( वह खा ले ) क्यों कि इसके बाद तो ‘ व्रत ' ( दुग्ध - पान ) ही उस ( दीक्षा लेने वाले ) की भोजन - क्रिया होती हे । और यदि भोजनेच्छा न हो तो चाहे न खाये ॥ १ ॥
अब शाला की उत्तर दिशा की ओर ( क्षौर कर्म हेतु ), स्थान घेरते हैं । वहाँ नाई बैठता है । फिर सिर के बाल तथा दाढी - मूंछ मूंडे जाते हैं और नाखून काटे जाते हैं क्यों कि पुरुष का ( वह अङ्ग ) अपवित्र माना जाता है जहाँ पानी नहीं ठहरता और इस ( दीक्षा लेने वाले ) के केश तथा मूँछ - दाढी और इसके नाखूनों पर पानी नहीं ठहरता अतः इसी प्रयोजन से केश तथा मूँछ - दाढी का मुंडन किया जाता है और नाखून काटे जाते हैं ताकि वह पवित्र बन कर दीक्षा ग्रहण करे ॥ २ ॥
कुछ लोग ( शरीर के ) सारे बाल ही मुंडवा लेते हैं ( क्यों कि ) वे सोचते हैं कि पूर्णरूपेण पवित्र बन कर ही दीक्षा लेंगे । उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए क्यों कि जब सिर तथा मूंछ - दाढी के बालों का मुंडन हो जाता है तभी वह पवित्र हो जाता है और इसीलिए केश तथा मँछ- दाढी ही बनवाए तथा नाखून ही कटवाये ॥ ३ ॥
' वह पहिले नाखूनों के अग्रभाग को ही कटवाये । पहिले दाहिने हाथ के । मनुष्य सम्बन्धी कर्म में पहिले बाएँ हाथ के ( नाखून काटने का प्रचलन है ) किन्तु देवकार्यं में ऐसा ( दाहिने हाथ के पहिले काटने का ) ही प्रचलन है । पहिले अङ्गठे का ( नखाग्र ) काटना चाहिये । मनुष्य सम्बन्धी कार्य में पहिले कनिष्ठिका अंगुली का ( नखाग्र काटने का प्रचलन है ) किन्तु देवकार्य में ऐसा ( अंगूठे का नखाग्र काटने का ) ही प्रचलन है ॥४ ॥
पहिले वह दाहिनी ओर से ही ( मुण्डन प्रारम्भ करके ) केशान्त -संस्कार सम्पन्न करवाता है । मनुष्य सम्बन्धी कार्यों में पहिले बाईं तरफ से ( मुण्डन प्रारम्भ होता है ) किन्तु देवकार्य में ऐसा ( दांई ओर से प्रारम्भ करने का ) ही प्रचलन है ॥ ५ ॥
वह पहिले दाहिने भाग के ही केशान्त गीले करता है ( मुण्डन से पहिले बाल भिगोये जाते हैं ) यह मन्त्र- बोल कर ( इमा आपः शमु मे सन्तु देवीः । यजु ० ४। १ ) " ये दिव्य जल मेरे जीवन के लिए कल्याणकारी हों " । और वह जो ऐसा कहता है कि " ये जल मेरे जीवन के लिए कल्याणकारी हों " ( उसका कारण यह है ) कि जल वज्र हैं और सचमुच वज्र हैं इसीलिये ये जिधर प्रवाहित होते हैं उधर ही गड्ढा कर देते हैं, जिस जगह ठहर जाते हैं वज्रपात् कर देते हैं । यही कारण है कि इस जल रूपी वज्र को शान्त करता है । इस जल के लिए ऐसा करने पर यह जलरूपी वज्र शान्त होकर नाश नहीं करता । इसीलिये कहते हैं " इमा आपः शमु मे सन्तु देवी: " ॥ ६ ॥
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षा ब्राह्मण अब कोमल कुशाग्रगुच्छ को क्षुर तथा सिर के बालों के बीच में रखता है " त्रायस्व ० ” यजु ० ४।१ ) ( हे ओषधि! तू रक्षा कर... ) यह मन्त्र पढ़ कर । क्षुर ( उस्तरा ) वज्र है । ऐसा करने पर इस यजमान को यह वज्र समान क्षुर कष्ट नहीं पहुँचाता है । इसके बाद क्षुर से सँवार बनाना प्रारम्भ करता है ( स्वधितेमैनं हिंसीः - वा ० स ० ४। १ ) " हे क्षुर! ( इस यजमान ) की हिंसा मत करना " यह मन्त्र कह कर । क्यों कि क्षुर वज्र है । ऐसा ( मन्त्र बोल कर मुण्डन प्रारम्भ ) करने पर इस ( यजमान ) को यह वज्र जैसा क्षुर कष्ट नहीं पहुँचाता है ॥ ७ ॥
( बालों को ) काट कर जल - पात्र में डालता है । इसके बाद मुण्डित किये जाने वाले ( बाईं ओर के ) केशान्तों को रखते हुए ही गीला करता है । क्षुर तथा बालों के मध्य कुशाग्रगुच्छ भी चुपचाप ही रखता है और मौन धारण करते हुए ही क्षुर को चला कर, बाल काट कर जल - पात्र में डालता है ॥ ८ ॥
तदन्तर नापित को क्षुर प्रदान करता है । वह ( नाई ) सिर तथा मूँछ - दाढी के
बालों का मुण्डन करता है । वह जब केश तथा मूँछ - दाढी मूंड देता है तो ॥ १ ॥
उसके बाद ( यजमान ) नहाता है । पुरुष अपवित्र है क्यों कि असत्यवादन करता है अतः ( उसकी ) प्रान्तरिक शुद्धि आवश्यक है । जल मेध्य होते हैं " मेध्य होकर दीक्षा लूँ " यह निश्चय करता है । जल पवित्र हैं । " जलरूपी ' पवित्रा ' से पवित्र होकर दीक्षा लूँ " यह
निश्चय करता है । इसीलिए स्नान करता है ॥ १० ॥
वह ( यजमान ) स्नान करता है " आपोऽस्मान् मातरः शुन्धयन्तु " – ( यजु ० ४।२ ) जल देवियाँ जो हमारी माताएँ हैं, वे हमें पवित्र करें - ( यह मन्त्र बोल कर स्नान करता है ) । यह मन्त्र इसीलिए ( यजमान ) बोलता है ताकि वे पवित्र करें । “ घृतेन नो घृतप्वः पुनन्तु ” ( यजु ० ४।२ ) क्षरणशील जल अपने जल - क्षरण से शुद्ध करें - वही शुद्ध है जिसे जल - क्षरण शुद्ध कर देता है । इसीलिए ऐसा कहा जाता है " घृतेन नो घृतप्वः पुनन्तु ” । " विश्वं हि रिप्र प्रवहन्ति देवी: " ( वज ० सं ० ४१२ ) – देवी आपस सभी अपवित्रताओं को बहा देती हैं — यह कहा जाता है । जो यह ' विश्व ' ( शब्द ) है वह ' स्व ' अभिप्राय वाला है । जो ' रि ' ( शब्द ) है वह ' अमेध्य ' का पर्याय है । इस ( यजमान ) भीतर जो कुछ अमेध्य अर्थात् अपवित्र भाव है वह ( ये जल देवियाँ ) बहा देती हैं इसीलिए ऐसा कहा जाता है कि " विश्वं हि प्रि प्रवहन्ति देवी: " ॥ ११ ॥
इसके बाद ( वह यजमान ) सामने उत्तर की ओर, – “ उदिदाभ्यः शुचिरापूत एमि " ( वाज ० सं ० ४।२ ) – इन जल देवियों से सब ओर से पवित्र होकर हो मैं उत्तर की ओर क्रमण कर रहा हूँ — यह मन्त्र बोल कर क्रमण करता है । इस प्रकार निश्चय ही ( वह [ ३०
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षा ब्राह्मण यजमान ) इन ( जल - माताओं की पवित्रता से शुद्ध होकर ( उत्तर की ओर ) क्रमण करता है ॥ १२ ॥
इसके बाद वह वस्त्र धारण करता है ताकि पूर्णता सम्पन्न हो जाये । इस प्रकार वह अपने इस शरीर पर यह वस्त्ररूपी त्वचा धारण करता है । और यह जो गोचर्म दिखाई देती है वह सृष्टि के प्रारम्भ में पुरुष ( की देह ) पर थी ॥ १३ ॥
उन देवताओं ने कहा " ( यह ) गाय ही इस पूरे विश्व को ( पोषण द्वारा ) धारण करती है ” अरे! यह चमड़ा जो पुरुष की देह पर है उसे गाय की देह पर लगा दें । इस चमड़े के कारण यह वर्षा को इसके कारण यह शीत को तथा इसके कारण यह धूप को सह लेगी – यह उन्होंने सोचा ॥ १४ ॥
उन्होंने ( उस त्वचा से ) पुरुष को अलग कर दिया और उस गाय ( की देह ) पर वह चर्म लगा दिया । इस चर्म के कारण ही वह वर्षा को, इसके कारण ही वह शीत को, तथा इसके कारण ही वह धूप को सह लेती है ॥ १५ ॥
अतः पुरुष ( उस अपनी चर्म से ) विच्छिन्न हो गया है । इसीलिये इस ( पुरुष ) के जहाँ कहीं भी कुश या अन्य ( तीक्ष्ण वस्तु ) चुभ जाती है वहीं खून निकल जाता है । इसलिये इस वस्त्ररूपी चर्म को ही उस ( पुरुष ) की देह पर रख दिया गया । इसीलिये पुरुष के अतिरिक्त अन्य प्राणी वस्त्र नहीं पहिनता है । क्यों कि इस देह पर वस्त्ररूपी चर्म रख दिया गया । इसलिए इस ( यजमान ) को स्वयं को सुन्दर वस्त्रों से विभूषित करना ही चाहिए ताकि वह चर्म से युक्त होकर समृद्ध हो जाये । इसलिए उस यजमान के ( प्रच्छन्न अङ्गों की ) अश्लीलता को सुन्दर वस्त्रों से प्राच्छादित रूप में देखने की इच्छा ( लोग ) करते हैं इस प्रकार वह अपनी स्वयं की चर्म के द्वारा ही समृद्ध हो जाता है ॥ १६ ॥
( यजमान ) गाय के सामने कभी नग्नावस्था में न उपस्थित होवे क्यों कि गाय यह समझती है कि मैंने इसी के चर्म को धारण कर रखा है । वह डर कर भागती हुई थर - थर कांपने लगती है कि कहीं ये ( यजमान ) मेरा चमड़ा न ले ले । इसीलिये गायें अच्छे वस्त्र धारण करने वाले के पास निश्चिन्तता पूर्वक जाती हैं ॥ १७ ॥
उस ( यजमान ) के इस ( धारण किये ) वस्त्र का ताना अग्नि का होता है तथा बाना वायु का । नीवी ( धोती में बाँधी जाने वाली गाँठ ) पितरों की, तथा प्रघात ( धोती की किनारी ) सर्पों की है । तन्तु विश्वेदेवों के हैं तथा छिद्र नक्षत्रों के । इस प्रकार निश्चय ही सभी देवताओं की सन्निधि की दृष्टि से दीक्षितवसन ( दीक्षा हेतु यजमान द्वारा वस्त्र धारण ) होता है ॥ १८ ॥
और यह ( यजमान द्वारा पहिना जाने वाला वस्त्र ) अक्षत ( बिना कटा -पिटा अर्थात् नया व परिपूर्ण ) होना चाहिए । इसकी सलवट आदि निकालने के उद्देश्य से इसे [ ३१ ]
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तृतीय काण्ड ( ० १ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षा ब्राह्मण धोने के लिए ( किसी से ) कहे ताकि इसमें अस्वच्छ अवस्था में ( कतेरन या बुनकरी द्वारा ) काता या बुना गया अपवित्र अंश शुद्ध हो जाये । यदि वह ( वस्त्र ) नया हो तो उसका जल से प्रोक्षण करे ताकि वह पवित्र हो जाये । और यदि वह वस्त्र स्नान करने के बाद पहनने के लिए ( पहिले से ) रखा हुआ हो तो वह वस्त्र क्षार आदि अशुद्ध साधनों से धुला हुआ नहीं होना चाहिए । उसी वस्त्र को धारण कर दीक्षा लेनी चाहिये ॥ १६ ॥
' दीक्षा तपसोस्तनूरसि " यह मन्त्र उच्चारित करते हुए उस वस्त्र को ( यजमान ) धारण करता है । इससे ( वसन क्रिया से ) पहिले वह देह प्रदीक्षित की थी तथा अब दीक्षित तथा तपस्वी की है अतः यह कहा गया है कि " तू दीक्षा तथा तप का शरीर है " । " ऐसी तुझ कल्याणकारी तथा शुभ ( धोती को ) धारण करता हूँ " । ऐसी तुझ “ शिवा ” अर्थात् साध्वी ( उत्तम धोती को ) धारण करता हूँ । और इसी प्रकार कहता है कि “ भद्र ं वर्णं पुष्यन् ” – सौभाग्यशाली बर्ण को पुष्ट करता हुआ - प्रारम्भ में प्रदीक्षिते अवस्था में जिस वर्ण को पोषित करता है वह ( दुष्टवर्ण होने के कारण ) पाप है और अब मंगलयुक्त है इसीलिये कहा गया है कि " भद्र वर्णं पुष्यन्निति ” ॥ २० ॥
तदनन्तर इस यजमान को शाला में लिवा ले जाता है । वह ( यजमान ) गाय तथा बैल ( के सत्त्व ) का भक्षरण न करे क्यों कि गाय तथा बैल ही इस सारे विश्व को धारण करते हैं । उन देवों ने कहा " गाय तथा बैल पर ही यह संसार आधारित है । अरे! जो भी अन्य प्राणियों की शक्ति है उसे गाय तथा बैल में स्थापित कर देते हैं । उन्होंने जो अन्य प्राणियों की शक्ति दी उसे गाय - बैल में रख दिया । इसीलिये गाय तथा बैल बहुत सारा ( चारा आदि ) खाते हैं । इसलिए जो गाय तथा बैल ( सत्त्व को ) खायेगा वह सब कुछ खाया हुआ माना जायेगा । सर्वनाश गति वाले उसे विचित्र योनि मिलेगी । लोग कहेंगे कि इसने माँ के गर्भ को नष्ट किया है । इसने पाप किया है । उसकी पापी के रूप में प्रसिद्धि होगी अतः गाय तथा बैल के ( सत्त्व को ) नहीं भोगना चाहिए । इसीलिए याज्ञ-वल्क्य ने कहा था कि जो वस्तुएँ ठोस होती हैं मैं तो उन्हें ही खाता हूँ ॥ २१ ॥
[ विज्ञान भाष्य ] दर्शपूर्णमासेष्टि में जैसे व्रत ग्रहण करना पड़ता है तद्वत् सोमयाग में दीक्षा लेनी पड़ती है । सर्वप्रथम मुण्डन कराया जाता है, बाद में स्नान किया जाता है तदन्तर वस्त्रादि पहिन कर कृष्णमृगचर्म के ऊपर बैठ कर दीक्षा ली जाती है । देवयजन भूमि निर्माणानन्तर एवं यज्ञशालासमीप स्थूणराज का समन्त्रक स्पर्श करने के अनन्तर दीक्षा के वास्ते यजमान को मुण्डन वगैरह करा के संस्कृत होना पड़ता है । तदनन्तर दीक्षा लेनी पड़ती है । वह दीक्षा किस समय लेनी चाहिए - इसका नियमन करते हैं । दीक्षाकाल बतलाते हैं - वह यजमान दुपहर के बाद अपराह ्मण में दीक्षा ग्रहण करे " अपराह्न दीक्षते " । यह यजमान जब तक मुण्डन नहीं करा लेता है तब तक दीक्षाङ्ग फर्क से पृथक् रहता है । मुण्डन करवाना दीक्षा का पहिला अंग है अतः मुण्डन करवाना [ ३२ ]