Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 321–330

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 321–330

पृष्ठ 321

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण यह कहा जाता है कि क्रान्तिवृत्त के पृष्ठ के प्रति बिन्दु से कदम्ब ९ ० अंश पर है एवं विष्वद्वृत्त के पृष्ठ की प्रतिबिन्दु से ध्रुव ठीक ६० अंश पर है । इसीलिए क्रांतिवृत्तीय पृष्ठि केन्द्र को " कदम्ब " कहा जाता है, एवं विष्ववृत्तीय पृष्ठि को ध्रुव कहा जाता हैं । पृथिवी ध्रुव से बद्ध है । सूर्य कदम्ब से बद्ध है । प्रकृति मण्डल में ध्रुव और कदम्ब का २४ अंश का अन्तर है अतएव इन दोनों से बद्ध पृथिवी और सूर्य पिण्ड का अन्तर भी २४ अंश का ही है । पृथिवी सूर्य के २४ अंश उत्तर एवं २४ अंश दक्षिण घूमा करती है । इस प्रकार ४५ अंश के परिसर पर पृथिवी सूर्य के चारों ओर घूमा करती है । यहां इतना और समझ लेना आवश्यक होगा कि उत्तर ध्रुव से दक्षिण ध्रुव ठीक १८० अंश पर है । इसमें बीच के ४५ अंश तो इस क्रांतिवृत्त में ही रुक जाते हैं । इसके अलावा ६४ अंश उत्तर ध्रुव में बच जाते हैं एवं ६४ अंश दक्षिण में बच जाते हैं । इन चौसठों में ४२ अंश का जो उत्तर का मार्ग है वह देवयान कह-बाकी बचते हैं २४ - २४ अंश । इनमें से लाता है एवं ४२ अंश का दक्षिण मागं पितृयाण कहलाता है उत्तर के २४ अंश को स्वर्ग कहते हैं, एवं दक्षिण भाग के चौबीस अंश को नर्क कहते हैं । उत्तर कदम्ब का नाम स्वर्ग है, दक्षिण कदम्ब का नाम नर्क है । प्रसंगागत इतना और समझ लेना चाहिए कि सूर्य जब उत्तर गोल में जाता है तो दक्षिण गोल में अंधेरा हो जाता है । ६ महीने सूर्य उत्तर गोल में रहता है, अतएव उत्तर गोल में ६ महीने का दिन ही दिन रहता है । ऐसा प्रदेश ध्रुव प्रदेश । ध्रुव का अर्थात् सुमेरु का जो २४ अंश का मार्ग है वहां तब तक दिन रहता है जब तक कि सूर्य उत्तर गोल में ही रहता है | कारण इसका यही है कि सूर्य उत्तर गोल में ही उदय होता है अतएव उसके अन्तिम भाग ध्रुव स्थान पर सदा प्रकाश ही रहता है । इधर दिन रहता तो उस दक्षिण गोल में बिलकुल अंधेरा हो जाता है एवं सूर्य जब विष्वत् पर आता है तो दोनों ध्रुव प्रदेशों की सन्ध्या होती है । कुछ प्रकाश इधर होता है कुछ उधर होता है । यह है प्राकृतिक परिस्थिति । बिना इसे समझें अदिति समझ में नहीं आ सकती है, अतएव हमें इतना प्रपंच करना पड़ा है । अस्तु अब हम प्रकृति का अनुसरण करते हैं । किसी में किसी में चीज की प्राहुति पड़ने का नाम ही यज्ञ है । यह यज्ञ की सामान्य परिभाषा समझनी चाहिए । अग्नि में सोम की आहुति पड़ने का नाम ही यज्ञ है । पृथिवी में सौर पदार्थ आहुति होते रहते हैं । पृथिवी हर समय सम्बन्ध पृथिवी से है और कदम्ब सूर्य का चलना माने तब क्रांतिवृत्त सूर्य की वस्तुओं को खाया करती है । हमें बतलाना था कि ध्रुव का का सम्बन्ध सूर्य से है । विषुववृत्त पृथिवी की अपनी चीज है । सूर्य की वस्तु है । वस्तुतस्तु क्रान्तिवृत्त भी पृथिवी के सांवत्सरिक परिभ्रमण वृत्त का ही नाम है | क्रांति-से पर वृत्त भी पृथिवी की ही वस्तु है । पूर्व के ब्राह्मणों में हमने कई स्थानों पर बतलाया है कि स्वयम्भू मेष्ठि पैदा होता है । परमेष्ठि के अनन्तर सूर्य पैदा होता है । सूर्य के अनन्तर पृथिवी उत्पन्न होती है । पृथिवी के अनन्तर चन्द्रमा पैदा होता है । इन्हीं पांचों को पञ्चपुण्डरीक " प्राजापत्यबल्शा - कहा जाता है । इस बल्शा क्रम में सारे पिण्ड संघस्थरूपेण अर्थात् समधरातल रूपेण स्थिर हैं । स्वयम्भू पिण्ड के समधरातल में परमेष्ठि पिण्ड है । परमेष्ठि के समधरातल में सूर्य पिण्ड है । एवं सूर्य के समधरातल में पृथिवी पिण्ड है । एवं पृथिवी के समधरातल में चन्द्रपिण्ड है । असली स्थिति इन पिण्डों की बिल्कुल सम-धरातल रूप से है । औरों के विषय में हमें कुछ नहीं कहना । कहना है कि केवल पृथिवी और सूर्य ही के [ ३०३ ]

पृष्ठ 322

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तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण विषय में । क्योंकि प्रकृत में इन्हीं दोनों का सम्बन्ध है - बल्शाक्रम है । पृथिवी सूर्य के समधरातल पर है, एवं पृथिवी का विष्वद्वृत्त और सूर्य का विष्वद्वृत्त बिलकुल एक लाइन में हैं । बस यही पृथिवी का असली स्वरूप है विष्वद्वृत्त ही — ग्रहोरात्र परिभ्रमणवृत्त ही पृथिवी का प्राकृतिक स्वरूप है अतएव हम इस विषुववृत्त को ही पृथिवी कहेंगे । पृथिवी का दक्षिण भाग में जाना एवं उत्तर भाग में जाना इस विषुववृत्त से व्यवस्थित है । विष्वत् पृथिवी ऊपर नीचे जाती है । यह विष्वत् ही असली चीज है । यदि उत्तर चली जाती है तो पृथिवी देवताओं के कब्जे में चली जाती है एवं दक्षिण चली जाती है तो पितरों के कब्जे में चली जाती है । दोनों ही जगह पराधीन है यदि स्वतन्त्रता है, तो विष्वद् पर । उस समय पृथिवी अपने स्वरूप में स्थित है । न इस समय यह देवताओं की तरह है और न पितरों को तरह । श्रत-एव विवत् को हम पृथिवी कहने के लिए तैयार है । पृथिवी ध्रुव से बद्ध है एवं विष्ववृत्तीय पृष्ठि केन्द्र को कहते हैं ध्रुव, इसलिए भी हम विष्वद्वृत्त को " पृथिवी " कहने के लिए तैयार है । इस प्रकार से जब यह सिद्ध हो जाता है कि विष्वद्वृत्त ही पृथिवी है तो फिर यह भी सिद्ध हो जाता है कि पृथिवी से ही यज्ञ प्रारम्भ होता है और पृथिवी पर ही समाप्त होता है । अर्थात् विष्ववृत्त से ही यज्ञ प्रारम्भ होता है और विष्वद्वृत्त पर ही समाप्त होता है । पृथ्वी जब तक दक्षिण गोल में रहती है तभी तक सौर पदार्थों की इसमें आहुति होती रहती है सूर्य जब ऊपर गोल में रहता है तो पृथिवी दक्षिण गोल में रहती है । ऐसी अवस्था में सूर्य ऊंचा रहता है एवं पृथिवी नीचे रहती है । इस नीचे रहने वाली पृथिवी में ऊपर रहने वाले सौर पदार्थों की आहुति होती रहती है । यह प्राहुति पृथिवी के दक्षिण गोल में घुसने के साथ ही प्रारम्भ हो जाती है । आहुति नाम है ऊपर से गिरने का । पृथिवी जब दक्षिण में प्रावेगी तभी सूर्य ऊपर जावेगा एवं तभी सौर पदार्थों की आहुति इसमें पडेगी । दक्षिण भाग में झुकती हुई पृथिवी पर सूर्य के पदार्थ इसमें बहुत होते रहते हैं प्रतएव हम कह सकते हैं कि यज्ञ पृथिवी से ही प्रारम्भ होता है । विष्वद्वृत्त का नाम पृथिवी है । यहीं से पृथिवी दक्षिण की ओर झुकती है । नीचे ऊपर जाने की व्यवस्था इसी विष्वत् से होती है । जहां विष्वत् से पृथिवी दक्षिण की ओर झुकी कि सौर पदार्थ इसमें प्राहुत होने लगे । यह आहुतिक्रम तबतक जारी रहता है जब तक कि पृथिवी दक्षिण गोल को समाप्त कर वापस विष्वत् पर न चली जाय । जहां दक्षिण गोल को समाप्त कर उत्तर गोल में प्रविष्ट होने के लिए पृथिवी विष्वत् पर पहुंची कि ऊपर से प्राहुति का आना बन्द हुआ । क्योंकि इस समय सूर्य और पृथिवी दोनों समधरातल पर रहते हैं । विष्वत् से ही आहुति प्रारम्भ होती है, विष्वत् पर ही जाकर समाप्त हो जाती है । विष्वत् से उत्तर गोल में जब पृथिवी चली जाती है तो सूर्यं नीचे आ जाता है । अतएव सौर पदार्थ पृथिवी में प्राहुत नहीं हो । आहुति उसी को कहते है जो कि ऊपर से डाली जाय । चूंकि पृथिवी ऊपर चली जाती है । अतएव आहुति क्रम नष्ट हो जाता है । विष्वत् से ही अर्थात् पृथिवी से यज्ञ अर्थात् श्राहुतिक्रम प्रारम्भ होता है एवं विष्वत् पर ही अर्थात् पृथिवी पर ही यज्ञ समाप्त होता है । इस के विरूद्ध जो उत्तर गोल है उसमें आहुति नहीं पडती तएव वह प्रयज्ञिय मण्डल है । दक्षिण मण्डल यज्ञिय मण्डल है, उत्तर गोल अयजिय मण्डल है । पृथिवी से ही यज्ञ प्रारम्भ होता है अतएव पृथिवी ही प्रायणीय है और पृथिवी पर ही यज्ञ समाप्त होता है अतएव पृथिवी ही उदयनीय है । इस यज्ञ को - आहुतिक्रम को पहचानने का एक मात्र [ ३०४ ]

पृष्ठ 323

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म ० २ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण साधन अदिति ही है । सूर्य के समसामुख्य की जो कल्पित बिन्दु है, उसी का नाम अदिति है । सूर्य को उत्तर की परम क्रान्ति पर समझो एवं पृथिवी को दक्षिण की परम क्रान्ति पर समझो । ऐसी अवस्था में सूर्य का प्रकाश पृथिवी के आधे भाग पर पड़ा करता है चूंकि प्रकाश अनवच्छिन्न रूप से इस समय पृथिवी पर पडता है अतएव इस दक्षिणायन बिन्दु को हम ' प्रदिति " कहने के लिए तैयार हैं । बस इस यज्ञ की व्यवस्था इसी अदिति बिन्दु से कायम होती है । अदिति माता है अर्थात् माप करने वाली है । अदिति से ६० अंश इधर और ६० अंश उधर का जो एक १८० अंश का मार्ग परिसर है वही यज्ञ मण्डल है । इस अदिति बिन्दु को केन्द्र में रखकर जो सौर प्रकाश इस प्राधे मण्डल में जाता है वह इसी विभाग से ७ विभागों में परिणत हो जाता है । “ पश्यन्ति सप्तमं सर्वे पुनः " के अनुसार दृष्टि सदा अपने से सातवें पर पड़ा करती है । सामने सातवां ही रहा करता है । सातवें का कुछ हिस्सा इधर रहता है कुछ उधर रहता है । बस यही तो दिति मण्डल के सात प्राण हैं । इन्हीं को प्रदिति के पुत्र कहा जाता है । इसी अभिप्राय से श्रुति

कहती है-अष्टौ पुत्रासो श्रदिते ये जातास्तन्यस्परि ।

देवां उपप्रैत् सप्तभिः परामार्तण्डमास्थत् ॥

अदिति के आठ पुत्र हैं । इनमें ७ तो अदिति के साथ रहते हैं एवं आठवां मार्तण्ड नाम का पुत्र अदिति से अलग रहता है यही इस मन्त्र श्रुति का तात्पर्य है । बात वास्तव में ठीक है । इस अदिति में तो ७ ही प्राण हैं ८ वां सूर्य तो अदिति से बहुत दूर ठीक उत्तरक्रान्ति पर है इसलिए " परामात्तं-ण्डमास्थत् " यह कहा है । इस विषय का विस्तृत विवेचन हमने दीक्षणीयेष्टि ब्राह्मण में कर दिया है अतः वहीं देखना चाहिए । यहां सिर्फ इतना ही कहना है कि आहुति स्वरूप यज्ञक्रम तभी समझ में आ सकता है जबकि इस अदिति बिन्दु को पहचान लिया जाय । इस अदिति की पहचान बतलाती हुई श्रुति कहती है-" देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे ऽश्विनोर्बाहुभ्यां । पूष्णोः हस्ताभ्यमाददेनार्य्यसि " । ( यजु ० १।३० ) स्वाति पूर्व क्षितिज में उदय हो गया हो एवं पूषा अर्थात् रेवती का तारा डूब चुका हो एवं अश्विनी का डूबने वाला हो ऐसी अवस्था में जो आकाश का ' ख ' स्वास्तिक है अर्थात् ठीक केन्द्र है वही कल्पित बिन्दु अदिति नाम से व्यवहृत होती है यह स्थान पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण पड़ता है । बस इतना ही देवाकाश कहलाता है एवं इससे विरुद्ध जो हिस्सा है वह असुराकाश कहलाता है । कहने का तात्पर्य यही है कि जब तक पृथिवी के इस आदि भाग को - दैवाकाश को नहीं पहचान लिया जाता तो तब तक यज्ञ करना एकदम व्यर्थ है । अदिति के अलावा यज्ञ करना दैत्य भाव से यज्ञ करना है इसलिए यज्ञसंपत्ति प्राप्ति के लिए अदिति को पहचानना परम आवश्यक है । अन्यथा यज्ञ हो ही नहीं सकता । यज्ञ का स्वरूप ही इस अदिति से समझ में आता है । यह अदिति पृथिवी ही यज्ञ का प्रारम्भ स्थान है एवं यही [ ३०५ ]

पृष्ठ 324

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मरण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण समाप्ति स्थान है । अदिति को केन्द्र में रखकर जो दक्षिण गोल में व्याप्त प्रकाश है, वह अदिति ही तो है । इसी से यज्ञ प्रारम्भ होता है इसी पर समाप्त होता है । बस इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर याज्ञवल्क्य कहते हैं— " ते देवा अब्र वन्- तवैव प्रायरणीयस्तवैवोदयनीय इति तस्मादेष श्रादित्य एव प्रायणीयो भवत्यादित्य उदयनीयः । इयं ह्य्वादितिः । ततो यज्ञमपश्यन्-तमतन्वत । ” वास्तव में बात सच है । पृथिवी से ही यज्ञ का प्रारम्भ है इसी पर समाप्ति है एवं इस यज्ञ की पहचान करवाने वाला यह अदिति बिन्दु ही है । इसी से दैवाकाश स्वरूप यज्ञ का पता चल सकता है । देवताओं ने यज्ञ को व्यर्थ जाते देख खोजकर इसी अदिति का पता लगाया था । इसी से उन्होंने यज्ञ प्रारम्भ किया था । वे जानते थे कि जब तक अदिति को न पहचान लिया जायगा तब तक यज्ञ स्वरूप समझना कठिन ही नहीं असाध्य है । अतएव यज्ञ के पहले पहल उन्होंने प्रारम्भ स्वरूप प्रायणीय श्रादित्यचरु के निर्वाप ही का विधान किया । जिससे कि यज्ञ करने वाला पहले अदिति के स्वरूप को पहचान जाए । प्रादित्यचरु के विधान का प्रयोजन यही है कि आदित्यचरु यजमान जब करने लगेगा तो पहले अदिति क्या है - यह पहचानने की कोशिश करेगा । उसे अदिति को — यज्ञस्वरूप जानने के लिए समझना पड़ेगा । जहां अदिति उसके समझ में आई कि सारा यज्ञ पुनः रहस्य इसे मालूम हुआ । इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं - वह यजमान दीक्षानन्तर सबसे पहले - यज्ञस्वरूप को पहचानने के लिए प्रायणीय प्रादित्यचरु का निर्वाण करता है । " स यदादित्यं चरु प्रायणीयं निर्वपति यज्ञस्यैव दृष्टयै " । खरीदे । बाद में यज्ञ प्रारम्भ करे । व्यर्थ है एवं यज्ञवितान करना भी प्रारम्भ में यज्ञ स्वरूप की मूलभूता यज्ञस्वरूप को पहचान ले तब सोमयाग के लिए सोम को यदि यज्ञ का स्वरूप ही समझ में न आवेगा तो सोम खरीदना भी व्यर्थ है । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यह यजमान इसी खयाल से यज्ञ के अदिति को पहचानने के लिए ही प्रायणीय प्रादित्य चर का निर्वाण करता है । " यज्ञं दृष्ट्वा क्रीणानि तं तनवा ( तनवे ) ऽइति तस्मादादित्यं चरु प्रायणीयं निर्वपति । जिस देवता के लिए जो हवि दी जाती है उस हवि को देवता ग्रहण कर लेता है । ' अग्नये स्वाहा ' - अग्नि के लिए जो हवि दी जाती है वह अग्नि में जाकर शामिल हो जाती है । यच्चयावत् आहुतियों में यही क्रम है । श्राहुतिएं देवता में जाकर मिल जाती है परन्तु प्रदिति के लिए निरुप्त प्रर्थात् निवेदित जो हवि है वह अनिष्ट देवता ही होती है । देवता से ग्रहीत जो हवि है वह इष्टा देवता होती है । परन्तु जिस हवि को देवता नहीं लेते वह अनिष्ट ही रहती है । अदिति के लिए जो हबि - जो चरु दिया जाता [ ३०६ ]

पृष्ठ 325

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण है वह अनिष्टा ही रह जाती है । अदिति चरु को नहीं लेती । सूर्य के समसामुख्य बिन्दु का नाम - दक्षिण के ठीक बीच की बिन्दु का नाम अदिति है । यह बिन्दु कल्पित बिन्दु है । वास्तव में अदिति कोई देवता नहीं है । देवताओं ने वैज्ञानिकों ने यज्ञस्वरूप की व्यवस्था समझाने के लिए यह कल्पित स्थान कायम कर रखा है । देवता हो तब न उसे प्राहुति मिले । जव देवता ही नहीं है तो फिर ग्राहुति मिले किसको बस इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर कहते हैं: -तद्वै निरुप्तं हविरासीदनिष्टा देवता ॥ ७ ॥

जब अदिति को पहचान लिया जाता है तो अदिति के साथ ही पथ्यास्वस्ति का भी पता लग जाता है । जहां अदिति को पहचाना कि पथ्यास्वस्ति का भी पता लगा । मार्गीया स्थिति का नाम ही पथ्यास्वस्ति है । सूर्य क्रान्तिवृत्त पर घूमा करता है । सूर्य नहीं घूमता, सूर्य तो स्थिर ही रहता है । परन्तु दृश्यमण्डल के हिसाब से हम सूर्य को घूमता हुआ बतला सकते हैं । प्रत्येक वृत्त में ३६० अंश होते हैं यह बात पूर्व के प्रकरणों में बतला दी गई है । यह क्रान्तिवृत्त भी उसी नियम के कि गायत्री आदि नाम अनुसार ३६० अंश का है । क्रन्तिवृत्त पर ही सात अहोरात्र वृत्त हैं जिन्हें से व्यवहृत किया जाता है । ऋन्तिवृत्त पर घूमते हुए सूर्य के अहोरात्रवृत्त यद्यपि हैं सात परन्तु समझना चाहिए इन्हें ३६० । सूर्य प्रतिदिन पूर्व में उगता है और पश्चिम में अस्त होता है । बस उदय से अस्त तक की जो लाइन है उसी का नाम अहोरात्र है । यह उदयास्त प्रतिदिन बदलता रहता है । आज जिस बिन्दु पर सूर्य का उदयास्त है दूसरे दिन ठीक उसके श्रागे कि बिन्दु पर उदयास्त होगा । तीसरे दिन तीसरी बिन्दु पर होगा । इस प्रकार दक्षिण गोल में जिसे कि हमने यज्ञमण्डल कहा था जिस समय सूर्य ( पृथ्वी ) प्रविष्ट होता है अर्थात् वसन्त संपात पर आकर दक्षिण भाग की ओर झुकता है उस समय से लेकर दक्षिण की परमक्रान्ति पर पहुंचने के लिए उसे ६० दिन लग जाते हैं । ६० वें दिन आधे दक्षिण गोल को समाप्त करता है । प्रतिदिन की परिभ्रमण रेखा चूंकि भिन्न भिन्न होती है अतएव कुल ६० लाइन हो जाती हैं । परमक्रान्ति पर पहुंचने के अनन्तर फिर सूर्य उत्तर भाग की ओर आरूढ़ होता है । जहां से उसे उन्हीं पूर्व लाइनों पर होकर चलना पड़ता है, जिससे कि नीचे की ओर श्राया था । उन्हीं पूर्व -पूर्व की लाइनों पर उदयास्त करता हुआ ठीक ६० दिन में ही वह शारत संपात पर विष्वद् वृत्त पर पहुंच जाता है । इस प्रकार ६० लाइन यह हो जाती हैं । यह तो हुआ दक्षिण गोल का विभाग । यह का यही क्रम उत्तर गोल में समझना चाहिए । इस प्रकार से ७ अहोरात्र, ३६० ग्रहोरात्र वृत्तों में परिणत हो जाते हैं इसीलिए तो एक संपात के ३६० दिनरात होते हैं । हमें विचार केवल दक्षिण गोल का करना है क्योंकि यज्ञ का सम्बन्ध इसी से है । इसलिए गोल में १५० अहोरात्र वृत्त होते हैं परन्तु वास्तव में देखा जाय तो ६० ही होते हैं । क्योंकि जिन पर से आता है दक्षिण क्रान्ति पर पहुंच कर वापस उन्हीं ग्रहो -रात्रों पर तो वह जाता है । पूर्व में सूर्य उदय होता है पश्चिम में भरत होता है! इस उदयारत की रेखा सर्वथा भिन्न - भिन्न है । बस इन ९ ० रेखाओं को ही जो जिन पर सूर्य चलता है, दृश्यमण्डल के हिसाब से " पथ्यास्वस्ति " कहते [ ३०७ ।

पृष्ठ 326

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण हैं । जिस लाइन पर होकर सूर्य पूर्व से पश्चिम की ओर प्रतिदिन दिखलाई पड़ता है । उस लाइन का नाम तो पथया है एवं दक्षिणमण्डल के ठीक बीच में रेखा विभाजक जो अदिति बिन्दु है उसी का नाम स्वस्तिक है । इसी को खस्वस्तिक कहते हैं । प्रदिति की १८० बिन्दुओं को उत्तर क्रान्तिस्थ सूर्य से सीधे ले जाओ बस उन्हीं का नाम खस्वस्तिक है । यह बिन्दु ही - उसपथ्या का मार्गीया स्थिति का स्वरूप कायम करती है दक्षिण गोल की स्वस्तिक स्वरूप जो प्रदिति की बिल्कुल सीधी जाने वाली ६० बिन्दुएं हैं वे ही उन ६० रेखा की, जिन पर सूर्य चलता है व्यवस्थापिकायें हैं । यदि अदिति बिन्दु न हो तो पथ्या व्यवस्था ही न हो । पथ्यास्वस्ति का ज्ञान - मार्गीया स्थिति का ज्ञान, अदिति बिन्दुओं पर ही अवलम्बित है । श्रदिति को पहचानने पर सूर्य परिक्रमणरूपा मार्गीया स्थिति का ज्ञान होता है परन्तु ध्यान रहे - पूर्व से पश्चिम में प्रस्त होने वाले सूर्य की जो गति लाइन है उसी का नाम " पथ्यास्वस्ति " है । प्रकृति के हिसाब से सूर्य पश्चिम से पूर्व की ओर जाता है उस लाइन को हम पथ्यास्वस्ति नहीं कहेंगे । श्रपितु सर्वसाधारणदृष्ट पूर्वोदय पश्चिमास्त जो मार्ग है उसी को हम पथ्यास्वस्ति कहेंगे । इसी अभिप्राय से भगवान् ऐतरेय कहते हैं । " यत् पथ्यां यजति तस्मादास पुर उदेति पश्चास्तमेति । पथ्यां ह्येषोऽनु-संचरति " भुवन स्वर्गवासी देवताओं ने जब अपने विज्ञान द्वारा यज्ञमूला अदिति को पहचाना तो साथ ही में उन्हें पथ्यास्वस्ति का भी ज्ञान हो गया । पथ्यास्वस्ति भी अदिति के साथ ही झलक पड़ी । क्योंकि अदिति ही तो पथ्यास्वस्ति की व्यवस्थापिका थी । पथ्यास्वस्ति अदिति बिन्दु पर ही व्यवस्थित रहती है । तात्पर्य कहने का यही है कि बिना अदिति के सूर्य परिभ्रमणयुक्ता मार्गीया स्थिति का पता हर्गिज - हर्गिज नहीं लग सकता । जहां अदिति का ज्ञान हुआ कि पथ्यास्वस्ति अपने आप झलक पड़ती है । देवताओं ने जिस समय अदिति को पहचाना उस समय अदिति के साथ ही पथ्यास्त्रस्ति भी उनके लिए चमक पड़ी । अर्थात् श्रदिति के ज्ञान होते ही तन्मूलभूता पथ्यास्वस्ति का भी देवताओं को ज्ञान हो गया । इसी अभि-प्राय से कहते हैं— " अथैभ्यः पथ्यास्वस्तिः प्रारोचत् " श्रदिति को पहचानते ही जैसे अदिति के लिए आदित्य प्रायणीय चरु का निर्वपन किया था, तथैव देवताओं ने पथ्यास्वस्ति का भी यजन किया अर्थात् पथ्यास्वस्ति के लिए भी श्रज्याहुति दी -" तामयजन् ” । अदिति तो केवल कल्पित बिन्दुमात्र थी । अदिति कोई देवता न थी । परन्तु पथ्यास्वस्ति को केवल कल्पित रेखा ही नहीं समझ लेना चाहिए । यद्यपि मार्गीया स्थिति का, जिस पर से सूर्य प्रतिदिन चलता हुआ उदयास्त करता रहता है, नाम पथ्यास्वस्ति है एवं यह लाइन कल्पित ही है, परन्तु इनमें एक ऐसी वस्तु भरी हुई है व्याप्त हो रही है - जिसके कारण पथ्यास्वस्ति को कल्पित नहीं कहा जा सकता । [ ३०८ ]

पृष्ठ 327

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण वह मार्गीय स्थिति उस पदार्थ के बिना कभी नहीं रह सकती है । अतएव पदार्थ विशिष्ट मार्गीया स्थिति को हम " पथ्यास्वस्ति " कहेंगे । जब पदार्थ विशिष्ट मार्गीया स्थिति का नाम पथ्यास्वस्ति है तो फिर इसे कल्पित कैसे कहा जा सकता है । बस इस मार्गीया स्थिति में जो पदार्थ भरा रहता है उसी का नाम “ वाक् ” है । पथ्यास्वस्ति - पृथ्वी से सूर्य तक - प्रर्थात् श्रदिति से मार्तण्डमण्डल तक फैली हुई है । उत्तर दक्षिण दोनों गोल मार्गीया स्थिति से व्याप्त हो रहे हैं । इस मार्गीया स्थिति में सूर्य परिभ्रमणोपयुक्ता रेखाओं में पृथिवी की वाक् भरी हुई है । अग्नि दो प्रकार का होता है अमृत और मर्त्य । जो अमृत अग्नि है वह चितेनिधे अग्नि कहलाता है एवं इसी अमृतग्नि को अन्नाद भी कहते हैं, एवं जो मर्त्याग्नि है उसे चित्याग्नि कहते हैं । वह चित्याग्नि अर्थात् मर्त्याग्नि श्रन्न कहलाता है । यह चित्य भाग पशु कहलाता है यह अप स्थान को स्वयं नहीं छोड़ता । जब कोई दूसरा अमृताग्नि इसे खींचता है तब यह उसमें आहुत हो जाता है । पृथिवी निदर्शन मात्र । संसार के यच्चयावत् पदार्थों में अन्न और अन्नाद दोनों भाव हैं । अन्न मर्त्य भाग है, अन्नाद अमृत भाग है । इस मर्त्याग्नि को ही वाक् कहते हैं । इसीलिए — " तस्य वा एतस्याग्ने वगेबोपनिषद् " यह कहा जाता है । इस पृथिवी का जो अमृत भाग है वह पृथिवी के २१ तक जाता है । यही अमृत भाग सौर पदार्थों को, - - पारमेष्ठ्य पदार्थों को हरवक्त खाया करता है परन्तु इसका जो मर्त्य भाग है वह सूर्य द्वारा खिंचता रहता है । जिस प्रकार पार्थिवामृताग्नि सौर वाक् भाग को खाता रहता है ठीक उसी प्रकार सूर्य पृथिवी के वाक् भाग को पानी मिट्टी - रस-उपरस धातु- उपधातु - विष उपविष इत्यादि यच्चयावत् पदार्थों को खाता रहता है । यच्चयावत् पदार्थ अमृतभागेन अन्नाद हैं अर्थात् अन्न खाने वाला है एवं मर्त्यभागेन अन्न भी है । पृथिवी - सूर्य निदर्शन मात्र हैं । यच्चयावत् पदार्थ अन्न खाने वाले हैं एवं सभी स्वयं अन्न भी हैं इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है-" ग्रहमस्मि प्रथमजा ऋतस्य । यो मा ददाति स इदेव यावत् । ग्रहमन्न-मन्नमदन्तमद्भि " कहना हमें यही है कि जैसे पृथिवी का अमृताग्नि सौर पदार्थों को खाया करता है ठीक उसी प्रकार सौर अमृताग्नि पार्थिव वाक् भाग को मर्त्य भाग को खाया करता है । वाक् स्वयं अगतिशील है परन्तु सूर्यामृत द्वारा खिंचकर उसे बाध्य होकर सूर्य के साथ रहना पड़ता है । सूर्य की सारी शक्तिएं पार्थिव वाग् भाग से व्याप्त हो रही हैं । जब ऐसी परिस्थिति है तो फिर सूर्य की लाइनें, जिस पर कि सूर्य चलता है कैसे इस वाक् से शून्य रह सकती है । सारी रेखाएं - सारी मार्गीया स्थिति, मार्गाधिष्ठाता सूर्य द्वारा खींची गई वाक् से श्रोत प्रोत रहती हैं । दोनों अविनाभूत हैं । अतएव इस वाक् को भी " पथ्यास्वस्ति " कह दिया जाता है | वास्तव में वाक् पथ्यास्वस्ति ही है । बस इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर कहते हैं-" वाग्वं पथ्यास्वस्तिः " अदितिवार कल्पित रेखा को ही कोई पथ्यास्वस्ति न समझ ले, इसीलिए " वाग्वै पथ्यास्वस्तिः " यह कहा है । यह पथ्यास्वस्ति ही अर्थात् वाग् ही तो यज्ञ का स्वरूप है । बिना वाक् के यज्ञ हो ही नहीं [ ३०६ ]

पृष्ठ 328

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 328 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण सकता । पार्थिव मर्त्याग्नि को हमने वाक् कहा है । यही पार्थिव मर्त्याग्नि क च ट त प इन वर्णों में परिणत होता है । इसी वाक् को अनुष्टुप् वाक् भी कहते हैं । शरीर में से धक्का खाकर निकलने वाली यह मर्त्या वाक् अर्थात् मर्त्याग्नि ही क च ट त प स्वरूप में परिणत होती है । यह क च ट त - पात्मिका जो वाक् है वही तो यज्ञ है । बिना वर्णात्मिका वाक् के अर्थात् मन्त्र के यज्ञ हरगिज नहीं हो सकता । मन्त्र द्वारा अग्नि में डाली हुई प्राहुति को ही देवता ग्रहण करते हैं अतएव यज्ञ साधनत्वात् अवश्य ही हम इस मन्त्र वाक् को यज्ञ कह सकते हैं । इस क - च - ट - त-पात्मिका वाक् का मूल वही मर्त्या वाक् है जो कि पथ्यास्वस्ति कहलाती है । उसी से यही मन्त्र बनते हैं अतएव हम उस पथ्यास्वस्ति वाक् को ही यज्ञ कहेंगे । देवताओं ने पथ्यास्वस्ति को क्या देखा, साक्षात् यज्ञ को देखा । बस इसे देखकर इसे भी यज्ञ में शामिल कर लिया । जिस प्रकार बिना अदिति के यज्ञ नहीं हो सकता, उसी प्रकार बिना वाक् के भी यज्ञ स्वरूप नहीं बन सकता - यही तात्पर्य है । “ वाग्यज्ञः । तद्यज्ञमपश्यन् तमतन्वत " ॥८ ॥।

एवं अदिति के साथ ही देवताओं के लिए अग्नि भी झलक गया अर्थात् जैसे अदिति के ज्ञान होते ही पार्थिव मर्त्याग्नि का - वाक् का - पथ्यास्वस्ति का ज्ञान हो गया, तथैव उसी अदिति पृथिवी के आधार पर रहने वाले अमृताग्नि का भी पता लग गया । यह अमृताग्नि ही तो प्रधान वस्तु है । आहुति तो इस में लगती है— " अथैभ्योग्निः प्रारोचत " पथ्यास्वस्ति की तरह अग्नि का भी यजन किया । हमारे यज्ञ में यह अग्नि शामिल है । इस बात को हम कैसे जानें । यज्ञ में ही क्यों संसार में अग्नि के स्वरूप को कहां ढूढ़ े , इसका उत्तर देने के अभिप्राय से कहते हैं कि देवताओं ने अदिति के सहारे अग्नि को क्या देखा, इस सोमयाग का जो श्राग्नेय भाग था, उसे देखा । अर्थात् उस अग्नि को पहचान कर, समिधादि में प्रविष्ट जो वही अग्नि था उसे अपने यज्ञ में शामिल किया । यज्ञ का जो सूखा हिस्सा है -- समिध वगैरह, जितने भी शुष्क हैं वही आग्नेय है । " तमयजन् । स यदाग्नेयं यज्ञस्यासीत् तदपश्यन् । यद्वै शुष्कं यज्ञस्य तदाग्नेयम् । यज्ञ में जितनी सूखी चीजें हैं सबको प्राग्नेय समझो । यज्ञ में ही नही अपितु संसार में जो सूखी वस्तु हैं उन सब को अग्नि समझो । बस इसी अग्नितत्त्व को देवताओं ने पहचाना । यदि इसे नहीं पहचानते

तब भी यज्ञ नहीं होता, अतः पहचान कर इसे अपने यज्ञ में शामिल किया ।

“ तदपश्यन् । तदतवन्त ” ॥९ ॥

इसके अनन्तर अदिति के साथ ही देवतात्रों के लिए सोम भी झलक पड़ा । इस प्रमृताग्नि में सोम की प्राहुति होती रहती है । अमृताग्नि को पहचानते ही सोम का ज्ञान अपने आप हो जाता है । अमृता-[ ३१० ]

पृष्ठ 329

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) तद्यज्ञभपश्यन् । तमतन्वत । " उसे ग्रहण नहीं किया । करे कैसे जब कि प्रायणीयेष्टि ब्राह्मणे शतपथ ब्राह्मण अतएव पशु भी यज्ञ स्वरूप ही है । बस पहचाना एवं उसे भी श्रौरों की तरह [ ३११ } ग्नि २१ तक रहता है | इसके ऊपर ही सोम है । वही सोम इस अमृताग्नि में बहुत होता रहता है । जब २१ तक व्याप्त रहने वाले ग्रमृताग्नि को पहचान लिया जाता है तो २१ के पास ही रात दिन इसमें आहुत होने वाला सोम क्यों कर छुपा रह सकता है । सोम को पहचानते ही देवताओं ने सोम को क्या पहचाना - यज्ञ का जो सौम्य भाग था उसे पहचाना । यज्ञ जितनी भी गीली वस्तुएं हैं, सब सौम्य ही हैं । इसी को देवताओं ने देखा और देखकर अपने यज्ञ में शामिल किया । जिस प्रकार बिना अग्नि के यज्ञ नहीं हो सकता वैसे ही बिना सोम के भी यज्ञ नहीं हो सकता । नहीं क्या हो सकता - अग्नि और सोम ही यज्ञ की प्रधान वस्तु है । “ अर्थभ्यः सोमः प्रारोचत । तमयजन् । स यत् सौम्यं यज्ञस्यासीत् तद-पश्यन् । यद्वा आर्द्रं यज्ञस्य तत् सौम्यम् । तदपश्यन् । तदतन्वत " ॥१० ॥

इसके ग्रनन्तर देवताओं के लिए सविता देवता झलक गया । अर्थात् सविता देवता का ज्ञान हो गया । अग्नि और सोम को परस्पर मिलाने का काम इसी सविता का है । बिना सविता की प्रेरणा के संसार का कोई भी काम नहीं हो सकता है । इसीलिए --" सविता वै देवानां प्रसविता " यह कहा जाता है । प्रवर्ग्य भाग को पशु कहा करते हैं । एक ढेले में अभी जाने की शक्ति नहीं थी, परन्तु हमारे हाथ के बल से वह बड़ी दूर तक चला जाता है । इसमें हमारा हाथ सविता है, एवं जो प्रेरणा, जो बल उस ढेले में जाकर उस ढेले की वस्तु बन गया वह बल प्रवर्ग्य कहलाता है । अब हाथ का उसमें उससे कोई सम्बन्ध नहीं रहता है | प्रवर्ग्य भाग को ही पशु कहते हैं । अग्नि और सोम में मिलने का जो प्रेरणा बल घुस गया है जिससे कि दोनों परस्पर मिल जाते हैं वह सविता ही का बल है । इस प्रवर्ग्य बल को ही हम " पशु " कहते हैं । जिस प्रकार अग्नि सोम के बिना यज्ञ नहीं हो सकता अग्नि सोमानन्तर देवतात्रों ने इसी पशु को - सविता प्राण को ज्याहुति दे अपने यज्ञ में शामिल किया " प्रथैभ्यः सविता प्रारोचत । तमयजन् । पशवो वै सविता । पशवो यज्ञः हमने बतलाया था कि प्रदिति के लिए जो चरु दी गई थी वह अकृतयागा ही रहा । श्रदिति ने 1 अदिति कोई देवता ही नहीं है । परन्तु इन चारों देवताओं के लिए जो हवि दी जाती है वह चारों में मिल जाती है । यह हवि कृतयाग हो जाती है । हो क्यों नहीं जब कि चारों वास्तव में देवता हैं । देवताओं ने इन चारों देवताओं के लिए जो हवि नियत था उससे

यजन कर दिया अर्थात् यह उत्तर की चारों आहुति उन देवताओं में जा मिली ।

" थ यस्यै देवतायै हविनिरुप्तमासीत तामयजन् ( देवतासमष्टि-मयजन् ) " ॥११ ॥

पृष्ठ 330

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तृतीय काण्ड ( ०२ )

सकता था ।

प्राजानन् ॥१३ ॥

प्राजानन् ॥१४ ॥

प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण " ता वा एताः पञ्चदेवता यजति " [ ३१२ ] इस प्रकार देवताओं ने यज्ञ के प्रारम्भ में - यज्ञ के मूलभूत पांच देवताओं का यजन किया था, तथैव आज यह यजमान पहले इन पांचों देवताओं का यजन करता है । जो यज्ञ मुग्ध था - अर्थात् छुपा हुआ था वह पाङ्क्त था, अर्थात् पञ्चावयव था । यह यज्ञ १ अदिति २ पथ्यास्वस्ति ३ अग्नि ४ सोम ५ सविता - इन पांचों अवयवों में बँटा हुआ था । इन्हीं पांचों देवताओं की कृपा से पहचाना । यदि इन पांचों का ज्ञान न होता तो यज्ञ रहस्य का पता कथमपि नहीं लग “ यो वै स यज्ञो मुग्ध प्रासीत् पाड़. क्तो वै स प्रासीत् तमेताभिः पञ्चभि देवताभिः प्राजानन् ” ॥१२ ॥

याज्ञवल्क्य कहते हैं यज्ञ ही मुग्ध था, सो बात नहीं । यज्ञ की तरह वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरत्, हेमन्त शिशिर आदि ऋतुस्रों का भी ज्ञान न था । देवताओं ने विद्वानों ने इन्हीं पांचों देवताओं की कृपा से इन ऋतुनों को भी पहचाना । अग्नि सोम के सम्बन्ध से ही ऋतुएं बनती हैं । जिनका कि विस्तृत विवेचन द्वितीय काण्ड के ऋॠतु ब्राह्मण में कर दिया गया है । जब अग्नि सोम ही का पता न था तो तन्मूलभूता ऋतुओं का ज्ञान क्यों कर हो सकता था । ऋतवो मुग्धाः आसन् पञ्च । तानेताभिरेव पञ्चदेवताभिः इसी प्रकार से पांचों दिशाओं का भी पता न था । पता हो कैसे? कोई स्थिर स्थान पहले मा-लूम हो तब न । इधर - उधर - स्वरूप दिशा का ज्ञान हो । इधर - उधर किससे इधर - उधर, बस जिससे इधर - उधर है वह यही अदिति है । इसी के ज्ञान से ही दिशा ज्ञान होता है । दिशो मुग्धा आसन् पञ्च । ता एताभिरेव पञ्चभिर्देवताभिः संसार में पदार्थ कुल दो प्रकार के हैं, सापेक्ष और निरपेक्ष । सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र, पृथिवी वायु, जल, आकाश इत्यादि इत्यादि पदार्थ सर्वथा निरपेक्ष है । इनका ज्ञान, इनका स्वरूप परिचय इन्हीं पर अवलम्बित है । सूर्य के पहचानने के लिए किसी लालटेन की आवश्यकता नहीं होती । सूर्य अपने आप ही अपना प्रत्यक्ष करवा देता है । चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र, पृथिवी आदि भी ऐसे ही पदार्थ है । जिनके ज्ञान के लिए किसी अन्य की अपेक्षा हो वे पदार्थ सापेक्ष कहलाते हैं । पथ्यास्वस्ति, अग्नि, सोम, सविता, दिशा, ऋतुएं इत्यादि पदार्थ सर्वथा सापेक्ष हैं । मार्गीया स्थिति का नाम पथ्यास्वस्ति है । परन्तु मार्गीया स्थिति का ज्ञान तब हो सकता है जबकि मार्ग का पता हो, एवं मार्ग का ज्ञान तब हो सकता है जब कि जहां