Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 331–340

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 331–340

पृष्ठ 331

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तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्राह्मणं प्रायणीयेष्टि ब्राह्मर्ण से मार्ग व्यवस्था कायम हुइ है उस स्थिर पदार्थ का ज्ञान हो । इसी प्रकार अग्नि सोम की परिस्थिति है । अग्नि से मतलब प्राणाग्नि का है, जो नीरुप है । जिसके लिए कि " श्रग्निमीळे पुरोहितं होतारं रत्नधा-तमम् " इत्यादि कहा जाता है । यह प्राणाग्नि प्रांख से नहीं पहचाना जाता । इसके लिए पहले उस वस्तु को समझ लेना आवश्यक है जिसमें से कि प्राणाग्नि निकलता है । यही दशा सोम की है । अग्नि के ऊपर सोम है । वह सोम हरवक्त इस २ ९ तक वितत रहने वाले प्राणाग्नि में बहुत प्राहुत होता रहता है । परन्तु इसका ज्ञान - अग्नि के ऊपर अवलम्बित है । अग्नि को पहले पहचान लिया जाता है । तदनन्तर अग्नि में आहुत होने वाले सोम का ज्ञान होता है । इसी प्रकार सविता का ज्ञान भी किसी वस्तु पर अवलम्बित है । सविता प्राण प्रेरणा करता है । नोदना का नाम ही धक्के का नाम ही प्रेरणा है । इस प्रेरणा का स्वरूप तब समझ में आ सकता है जब कि किसी वस्तु में प्रेरणा को होते देखे । प्रेरणा स्वयं अदृश्य है । इसका प्रत्यक्ष स्थिर वस्तु में, जब यह घुस जाती है तभी होता है । और भी कई ऐसे सापेक्ष पदार्थ हैं जिनको अप्राकृतिक समझ कर हम छोड़ते हैं । यज्ञ में इन्हीं का सम्बन्ध है अतएव इन्हीं का स्वरूप बतलाया गया है । पथ्यास्वस्ति के बिना अर्थात् वाक् के बिना, मन्त्र के बिना भी यज्ञ नहीं हो सकता एवं अग्नि और सोम तो प्रधान ही हैं एवं सविता की प्रेरणा बिना भी यज्ञ अछूता ही है । यज्ञ स्वरूप इन्हीं चारों में बंटा हुआ है । जब तक इनके स्वरूप को पहचान कर इनके प्राणों को आहुति द्वारा आत्म-सात् न कर लिया जाय तब तक यज्ञ करना सर्वथा निरर्थक है । यह यज्ञ चतुष्टयी अदिति पृथिवी में छुपी हुई है । इस यज्ञ को अदिति ने छुपा रक्खा है जो कि प्रदिति पुनर्वसु के तृतीय चरण में है, एवं जिससे कि पूर्वक्षितिज पर स्वाति नक्षत्र है एवं पश्चिम क्षितिज पर पूषा अर्थात् रेवती है । इसलिए " देवस्त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णोहस्ताभ्याम् श्राददे नार्य्यसि " यह कहा गया है । पथ्यास्व-ति अर्थात् सूर्य जिस लाइन पर घूमता है - उन लाइनों का जो कि रेखाएं वाङ्मयी है ज्ञान इस अदिति पर ही अवलम्बित है, एवमेव अग्नि सोम के स्वरूप का पता भी इसी अदिति पृथिवी से लगता है एव-मेव प्रेरयिता सविता प्रारण का ज्ञान भी इसी स्थिर अदिति बिन्दु पर अवलम्बित है । पहले प्रदिति का ज्ञान हो तब आगे की यज्ञ - चतुष्टयी का ज्ञान हो । यज्ञ स्वरूप को इसी प्रदिति पृथिवी ने छुपा रखा है दिति ने नहीं छुपा रखा है, अदिति ने छुपा रखा है जिसके कि सात पुत्र हैं । अतः यज्ञ के लिए पहले उस अदिति बिन्दु को पहचानना आवश्यक हैं । जहाँ अदिति को पहचानना कि प्रदिति ने आपको यज्ञ स्वरूप दिखलाया । देवता लोग अदिति को न जानने से यज्ञ भूल गए थे अर्थात् उन्हें प्राकृतिक यज्ञ रहस्य का - यज्ञ स्वरूप का ज्ञानन था अतएव उनका यज्ञ ( अग्नि में आहुति डालना ) व्यर्थ गया तब देवताओं ने खोज करनी शुरू की । अन्त में उन्हें पता लग गया कि इस पृथिवी को यज्ञ मूला अदिति बिन्दु को हमने नहीं पहचाना था । इसलिए इस पृथिवी ने अपने से यज्ञ को छुपा लिया था । अन्त में देवताओं ने अदिति के द्वारा सारा यज्ञ स्वरूप समझ लिया । चूंकि इन्हीं पांचों देवताओं ने ( प्राण - देवताओंों ने ) देव-तायों को, भुवस्वर्गीय, यज्ञ का ज्ञान करवाया था प्रतएव इन्होंने अपने सोम यज्ञ के प्रारम्भ में ही इन पाँचों का यजनकर पांचों को आत्मसात् किया । चूंकि पाँचों का यजन यज्ञ प्रारम्भ में ही किया था अतएव इस इष्टि का नाम प्रायणीय इष्टि पड़ गया । प्रारम्भणीय ही को प्रायणीय कहते हैं । बस प्राय-इष्टि का यही रहस्य है जिसका कि विवेचन पूर्व में कर दिया गया है । इस यज्ञ स्वरूप ज्ञान के [ ३१३ ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मरण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मणं पहले देवताओं को ऋतु और दिशाओं का भी ज्ञान न था । यज्ञ ही से देवताओं ने सब कुछ जाना । यज्ञ, अदिति, पथ्यास्वस्ति, अग्नि, सोम, सविता इनके कारण पाङक्त्य हैं । इन से अर्थात् पांचों देवताओं से ही देवताओं को ऋतुज्ञान हुआ एवं इन्हीं पांचों से दिशा ज्ञान हुम्रा । श्रग्नि सोम के संमिश्रण का नाम ही ऋतु है ऋत - सत्यभेदेन अग्नि दो प्रकार का है । इस ऋताग्नि में जब सोम का सम्बन्ध होता है तो इसका नाम ऋतु पड़ जाता है । इसी अग्नि सोम के तारतम्य से एक ही ऋतु के वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरत्, हेमन्त यह पांच भेद हो जाते हैं, जिनका कि विस्तृत विवेचन ऋतु ब्राह्मण में कर दिया गया है । शिशिर का हेमन्त में समास कर लिया जाता है इसीलिए पांच ही ऋतुएं हो जाती है । पाक्त यज्ञ से पांच ही ऋतु का सम्बन्ध है । इसीलिए कहा जाता है— " सप्तदशो वै प्रजापतिः, द्वादश मासाः पञ्चर्तवो हेमन्त शिशिरयोः समासेन । तावान् संवत्सरः । संवत्सरः प्रजापतिः ( ऐ. बा. १ ) कहना यही है कि इन ऋतुत्रों का ज्ञान भी इन्हीं अदिति अग्नि सोमादि देवताओं से ही हुआ था इसीलिए - " ऋतवो मुग्धा श्रासन् पञ्च । तामेताभिरेव पञ्चभिर्देवताभिः प्रजानन् ” – यह कहा गया है । जिस प्रकार ऋतुज्ञान सापेक्ष है उसी प्रकार दिशाज्ञान भी सर्वथा सापेक्ष ही है । पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊर्ध्व, अधर् इत्यादि १० दसों दिशाओं का ज्ञान किसी आलम्बन की अपेक्षा रखता है । स्थिर वस्तु से पूर्व पश्चिम की व्यवस्था हुना करती है । वास्तव में पूर्व पश्चिम अपना कोई स्वरूप नहीं रखते । १०-१० गज के फासले पर १० मनुष्य बैठे हुए हैं । जो सबसे अन्त का मनुष्य है उसकी अपेक्षा से उसके आगे का स्थान पूर्व कहलाता है एवं पीछे का स्थान पश्चिम कहलाता है, परन्तु इस अन्त वाले मनुष्य के १० गज पश्चिम भाग की और बैठा हुआ जो दूसरा मनुष्य है उसकी अपेक्षा से वही भाग पूर्व हो जाता है जो कि अन्तिम मनुष्य का था । इससे इधर पश्चिम इससे उधर पूर्व – इस प्रकार दिशाएं इससे उससे की अपेक्षा रखती हैं । किससे पूर्व, किससे पश्चिम इस पर्वत से पूर्व, उसपर्वत से पश्चिम । सबसे पहले देवताओं को दिशाज्ञान भी इन्हीं पांचों देवताओं से हुम्रा था । यद्यपि दिशा कुल १० हैं परन्तु यज्ञ में सम्बन्ध कुल पांच ही दिशाओं का है । अतएव प्रकृत में पांच ही का विवेचन किया जायगा । ऋतुओं को धर्मवत् समझना चाहिए | जैसे पूर्व - पश्चिम कोई चीज नहीं है ठीक उसी प्रकार धर्म भी कोई नियत वस्तु नहीं है । धर्म सापेक्ष पदार्थ हैं । देशकालपात्रानुसार धर्म की व्यवस्था होती है । अहिंसा, सत्य, अस्तेयादि को नित्यधर्म समझना भूल है । देशकाल के अनुसार अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अधर्म हो जाते हैं एवं हिंसा - मिथ्या - स्तेय धर्म बन जाते हैं । एक निरपराधी को मारना उसकी हिंसा करना पाप है, यहां अहिंसा ही पुण्य है, अहिंसा ही धर्म है । परन्तु जिसने रुपये के लोभ में हजारों मनुष्यों के गले काट डाले हैं, उसे मारना, उसकी हिंसा करना, पाप नहीं पुण्य ही है । पुण्य ही नहीं महापुण्य है । इसीलिए धर्मशास्त्र स्पष्ट शब्दों में आज्ञा देता है । " एकस्मिन् निधनं यत्र बहूनां क्षेमकारणम् । तस्य पुण्यप्रदो वधः ' " } 1 शास्त्र कहता है कि उस अपराधी को हम नहीं मारते - प्रपितु उसका पाप ही उसके विनाश क कारण बनता है । इसीलिए भगवान् मनु स्पष्ट शब्दों में आज्ञा देते है— [ ३१४ ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण

गुरु वा बालवृद्धौ वा ब्राह्मणं वा बहुश्रुतम् ।

श्राततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन् ॥

इसी प्रकार सत्य के विषय में लीजिए । जिससे सारे भूतों का हित हो, सबका उपकार हो- वही बोलना चाहिए । उसी का नाम सत्य है—

“ सत्यस्य वचनं श्र ेयः सत्यादपि हितं वदेत् ।

यद् भूतहितमत्यन्तमेतत्सत्यमतं मम " ॥

कहना इस प्रपंच से हमें यही है कि धर्म कोई नित्य वस्तु नहीं है । देश काल पात्र की अपेक्षा पर धर्म को स्थिति - धर्म का स्वरूप निर्भर है । बस ठीक इसी प्रकार दिग् व्यवस्था किसी नियत वस्तु पर है । जब देवताओं ने पांचों नियत देवताओं को जान लिया तो उनकों पांचों दिशाओं का भी ज्ञान हो गया । जब तक देवताओं ने पाङ्क्त यज्ञाधिष्ठाता आदित्यादि पांचों देवताओं को न पहचाना था तब तक उन्हें ऋतु की तरह दिशा का भी ज्ञान न था । बस इसी अभिप्राय से— " दिशो मुग्धा श्रासन् पंच । ता एताभिरेव पंचभिर्देवताभिः प्राजानन् ” यह कहा गया है किस देवता से किस ऋतु का ज्ञान हुआ – एकमात्र यह प्रश्न बच जाता है । इसका उत्तर देकर इस प्रकरण को समाप्त करेंगे । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि देवताओं में पथ्यास्वास्ति में मार्गीया स्थिति से उत्तर दिशा को पहचाना । पृथिवी का दक्षिण भाग की ओर झुकना सूर्य का उत्तर की ओर चढ़ना है, जैसा कि पूर्व में बतला जाये हैं । सूर्य से ही यज्ञ का सम्बन्ध है । इसी में अग्नि सोमात्मक यज्ञ होता है । अतएव इस उत्तरायण काल को ही यज्ञ के लिए उपयुक्त माना जाता है । यज्ञ ही नहीं सारे धार्मिक कार्य उत्तरायण में ही किये जाते हैं । दक्षिणायन में कोई भी देवकार्य नहीं होता । इसीलिए हम दक्षिण भाग को प्रासुर-मण्डल कहते हैं । उस पर भी सूर्य चलता है एवं सूर्य के परिभ्रमण लाइन का मार्गीया स्थिति का नाम ही पथ्यास्वस्ति है । इस प्रकार दक्षिणभाग में भी पथ्यास्वस्ति है, परन्तु उसका चूकि यज्ञ से सम्बन्ध नहीं है व विश्वत् से उत्तरभाग की जो पथ्यास्वस्ति है उसी का ग्रहण किया गया है । यह पथ्या-स्वस्ति अर्थात् मार्गीया स्थिति विष्वत् से उत्तरोत्तर आगे बढ़ती जा रही है । एक लाइन के बाद दूसरी, दूसरी लाइन के वाद तीसरी, तीसरी के बाद चौथी इस प्रकार से ६० लाइनें उत्तरोत्तर चली गई हैं । बस विष्वर से उत्तरोत्तर जाने वाली इस पथ्यास्वस्ति से ही देवताओं ने उत्तर दिशा को पहचाना - यह आगे - आगे जाती है । आगे का नाम ही उत्तर है । अतएव उस आगे वाले हिस्से को देवता लोग उत्तर नाम से कहने लग गये । इस प्रकार से उत्तर जाने वाली पथ्यास्वस्ति से देवताओं को उत्तर दिशा का ज्ञान हो गया । [ ३१५ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० २ ) शतपथ ब्राह्मरण " उदी चिमेव दिशं । पथ्यया स्वस्त्या प्राजानन् " प्रायणीयेष्टि ब्राह्मणं पथ्यास्वस्ति को वाक् कहते हैं । अदिति जैसे खाली कल्पित बिन्दु है वैसे पथ्यास्वस्ति मार्गीया स्थिति कल्पित नहीं है । इसमें पृथिवी का मर्त्याग्नि - सूर्य द्वारा आकृष्ट होकर आसमान्त सारी मार्गीया स्थिति पर भरा हुआ है । अग्नि का नाम ही वाक् है । इस वाक् की प्रधानता उत्तर भाग में ही है । पथ्यास्वस्ति वाक् के बिना नहीं रह सकती । दोनों परस्पराविनाभूत हैं । अतएव पथ्यास्वस्ति को वाक् ही कहा जाता है । इस वाक् से ही क - च - ट - त पात्मिका वाक् बनती है | शरीरस्थ अध्यात्मश्रग्नि मुख के बाहर निकल कर धक्के खाने से कण्ठतालवाद्यभिघात से क - च - ट - त- प स्वरूप में परिणत हो जाती है । इसीलिए " अग्निर्वाग् भूत्वा मुखं प्राविशत् " यह कहा जाता है । इसी अभिप्राय से भगवान् पाणिनि कहते हैं । श्रात्माबुध्या समेत्यार्थान् मनोयुड्. क्ते विवक्षया । मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम् । मारुतस्तूरसिचरन् मन्द्रं जनयति स्वरम् ॥ इति वाक् वास्तव में अग्नि ही है । क - च - ट - त- प शब्द हैं वाक् नहीं । इस वाक् से चूंकि शब्द उत्पन्न होते हैं अतएव घटमृत्तिकावत् शब्द को भी वाक् कह दिया जाता है । वाक् अग्नि है, अतएव यदि अधिक बोला जाता है अथवा अधिक परिश्रम किया जाता है तो शरीर शिथिल हो जाता है । इसका एकमात्र कारण अग्नि का अधिक मात्रा से निकल जाना ही है । वाक् अग्नि है अग्नि में सोमाहुति पड़ने का नाम ही यज्ञ है, अतएव " वाग्वै यज्ञः " यह कहा जाता है । भाष्यकार लोग वाग का मन्त्रपरक अर्थ लगाते हैं । इसमें कोई विरोध नहीं समझना चाहिये । क्योंकि वह वागाग्नि ही — पथ्यास्वस्ति ही तो शब्द बनकर बाहर निकलती है । यह वाक् पथ्यास्वस्ति है एवं यह विष्वत् से उत्तर में रहती है । इसमें सबसे बड़ा भारी प्रमाण यही है कि दक्षिण की अपेक्षा उत्तर में बहुत ही स्फीत और मधुर बोला जाता है । उस वाक् से ही तो क - च - ट - त- पात्मिका वाक् उत्पन्न होती है । चूंकि दक्षिण की अपेक्षा उत्तर में स्फीत और शुद्ध बोली जाती है, अतएव मानना पड़ता है कि प्राकृतिक पथ्यास्वस्तिप्राण वर्णा-त्मिका शब्द वाक् वाली मूलभूतावाक् उत्तर में ही अधिक भाग में रहती है । सारे पदार्थों का निर्माण सूर्य से होता है । सूर्य प्राणधन है । इसलिए " प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः " - " नूनं जनाः सूर्येण प्रसूताः " यह कहा जाता है । सूर्य में अनन्त प्रकार के प्राण हैं । अतएव पदार्थ भी अनन्त प्रकार के ही उत्पन्न होते परन्तु इससे विशेष और समझ लेना चाहिए कि सारे प्राण सर्वत्र समान रूप से नहीं गिरते । सब जगह सब वस्तुएं ऊपलब्ध नहीं होने का यही कारण है । जहां जो प्रारण अधिक मात्रा से गिरता है वहीं वह वस्तु अधिक मात्रा में पैदा होती है । कई पदार्थ हमारे देश में मिलते ही नहीं परन्तु वही पदार्थ अन्य देश में इतने उपलब्ध होते हैं उन्हें वहां कोई मुफ्त में भी लेना पसन्द नहीं करता । कहने का तात्पर्य यही है कि सब प्राण सर्वत्र समान रूप से नहीं गिरते । बस यही हालत इस पथ्यास्वस्ति प्राण - की भी समझनी चाहिए | पथ्यास्वस्ति प्राण जिसे कि वाक् कहेंगे, विष्वत् से उत्तर भाग में अधिक मात्रा से गिरता है, गिरता है दक्षिण भाग में भी परन्तु दक्षिण यज्ञिय मण्डल है । आसुर भाव युक्त है अतएव वहां की वाकू बड़ी ही कर्कश और माधुर्य रहित होती है । [ ३१६ ]

पृष्ठ 335

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण देवता प्राण का सम्बन्ध उत्तरभाग से है अतएव वहां की वाक् श्रोजस्विनी होती है । देवता आग्नेय हैं । श्रग्नि में ही बल है । अतएव उत्तरभाग की वाक् में बल है । वहां ही देवभाषा का - देववाणी का वेद भाषा का जन्म हुआ है । वेद के सारे ग्रन्थों का निर्माण उत्तर भारत में ही हुआ है । दक्षिण प्रदेश, दक्षिण भारत तो श्रनार्य देश है । भगवान् मनु ने श्रान्ध्र, कर्नाटक इत्यादि दक्षिण देशों को अनार्य देश बतलाया है । अतएव वहां के मनुष्य के मलिन और ढोंग के आचार्य होते हैं । ठीक इसके विरुद्ध उत्तर-भारत के मनुष्य दिखावे में - ढोंग में शून्य और आडम्बर से शून्य एवं हृदय से शुद्ध और भोले होते हैं । इसका एकमात्र कारण प्रकृतिमण्डल ही है । उत्तर में बड़ी मधुर और देवीवारणी बोली जाती है । यही पथ्यास्वस्ति से उत्तर को पहचानना -- इसमें बड़ा भारी प्रमाण है । वास्तव में उत्तर में पथ्यास्वस्ति का राज्य है | भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं इसीलिए इस पृथिवीलोक में कुरुपञ्चालाख्य जनपदों में अर्थात् देशों में उच्चतरा और मधुर वाक् बोली जाती है । गंगा यमुना कालिंदी जहां तीनों का संगम हुआ है उसे प्रयागराज कहते हैं । इसी का नाम त्रिवेणी है । इस त्रिवेणी से पश्चिम कम्पिला नगरी है । इसी स्थान का नाम कम्पिल्य था । पाण्डवों के श्वसुर महाराजा द्र ुपद की राजधानी यही काम्पिल्य नगरी थी । इस काम्पिल्य से सीधे उत्तर करीब ५० कोस के फासले पर अहिच्छत्रा नगरी थी । इसी अहिच्छत्रा को विश्वामित्र ने अपनी राजधानी कायम की थी । बस इसी का नाम कुरु - पञ्चाल देश था । यहाँ से उत्तर भाग में बड़ी ही मधुर और स्फीत देववाणी बोली जाती थी । वेदविद्या का यहाँ प्रचार था । अतएव काम्पिल्य से इस ओर रहने वाले मनुष्य इसी उत्तरभाग में इस पथ्यास्वस्ति की शिक्षा लेने के लिए, वेद विद्या पढ़ने के लिए आया करते थे जैसा कि अन्य ब्राह्मण में लिखा है । “ प्रथाब्रबीत् पथ्यास्वस्तिः । मह्यं कामाज्याहुति जुहुत । श्रहमेकां दिशं प्रज्ञास्यामि - इति । तस्या अजुहवुः । सोदीचीं दिशं प्राजानात् । वाग्वै पथ्यास्व-स्तिः । तस्मादुदीच्यां दिशि प्रज्ञाततरा वागुद्यत । उदञ्च उ एव यन्ति वाचं शिक्षितु यो वा तत् श्रागच्छति तस्य वा शुश्रूयत्ते इति ह स्माह । एषा हि वाचो दिग् प्रज्ञाता इति ॥ " ( को. ब्रा. ) विष्वत् से उत्तर वास्तव में पध्यास्वस्ति है । इसीलिए तो उत्तर में वाक् प्रज्ञाततरा उत्पन्न होती है । इधर के मनुष्य वाक् रहस्य में बड़े ही निपुण होते हैं । बस इसी अभिप्राय को लक्ष्य में रखकर याज्ञ-वल्क्य कहते हैं । " तस्मादत्रोत्तरा हि वाग् वदति कुरुपञ्चालत्राः ” उस पथ्यास्वस्ति वाक् का जो शब्दमूला है - प्रत्यक्ष नहीं कि या जा सकता । क्योंकि वह प्राणस्वरूप है । प्रत्यक्ष हम क - च - ट - त - प का ही करते हैं । शब्द वाकू का ही अनुभव होता है । यह जो शब्द -समष्टि है वही निदानेन वाक् है । अर्थात् उत्तर में बोली जाने वाली इस प्रज्ञाततरा वाक् से ही मानना पड़ता है कि यही पथ्यास्वस्ति वाक् उत्तर में है । " वाग्ध्येषा निदानेन " [ ३१७ ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण इसी वाक् से देवताओं ने उत्तर दिशा को पहचाना । इस मध्यास्वस्ति की वाक् उत्तर दिशा ही तो है " उदीचीं तया दिशं प्राजानन् - ऊदीच ह्य ेतस्यै दिक् " देवताओं को उत्तर दिशा का ज्ञान विष्वत्-वृत्त से उत्तर में रहने वाली इस पथ्यास्वस्ति से ही हुआ था - यही तात्पर्य है ॥ १५ ॥

एवं अग्नि से पूर्व दिशा को पहचाना । पृथिवी ग्रग्निस्वरूप है । पृथिवी में से हरवक्त अग्नि निकला करता है जो कि २१ वें अहर्गण तक दितत रहता है । यह पृथिवी पूर्व की ओर चलती रहती है । सूर्य वास्तव में स्थिर है । परन्तु पृथिवी पूर्व की ओर चलती रहती है अतएव सूर्य प्रतिदिन पश्चिम जाता दिखलाई पड़ता है । जैसे केरल में बैठकर पूर्व की ओर जाते समय स्थिरवृक्ष भी पश्चिम की ओर जाते हुए दिखलाई पड़ते हैं । पृथिवी आगे - आगे चलती है । पृथिवी क्या चलती है अग्नि चलती है । आगे का नाम ही पूर्व है । बस इसी आगे जाने वाली अग्नि से देवताओं को पूर्व दिशा का ज्ञान हुआ । पृथिवी अर्थात् अग्नि प्रतिदिन पूर्व की ओर जा रही है । इसी अग्नि से देवताओं को पूर्व दिशा का ज्ञान हुआ । " प्राचीमेव दिशाभग्निना प्राजानन् " पूर्व की ओर जाता है इसीलिए पश्चिमस्थ गार्हपत्य में से अग्नि को लेकर उसे पूर्व के भाग में ग्राहवनीयकुण्ड में रखकर उस अग्नि की उपासना करते हैं । अर्थात् पश्चिम से पूर्व में अग्नि को लाकर वहाँ ( आहवनीय में ) आहुति डालना, प्रकृति में अग्नि पश्चिम से पूर्व को जा रहा है । अतएव इस यज्ञ में भी निदानेन उसी की नकल करने के लिए पहले गार्हपत्य में अग्नि रखते हैं । गार्हपत्य पृथिवी है । पूर्वस्थिति आहवनीय में इस गार्हपत्याग्नि को ले जाते हैं । गार्हपात्याग्नि को ग्राहवनीय में लगाना पृथिवी को अग्नि को पश्चिम से पूर्व की ओर ले जाना है । देवता आग्नेय हैं । अग्नि पूर्व की ओर जाता है । पूर्वा दिक् अग्नि की अपनी दिक् है । इसीलिए " प्राची वै देवानां दिक् " यह कहा जाता है इसी अभिप्राय से कौषीतकी श्रुति कहती है-" तस्मात् प्राञ्चर्माग्नि प्रणयन्ति । प्राग् यज्ञस्तायते । प्राञ्च उ एवास्मिन् श्रासीना जुहोति । एषा हि तस्य दिक् प्रज्ञाता " कहने का तात्पर्य यही है कि देवताओं ने पृथिवीस्वरूप ग्रग्नि से जो कि कर्म की ओर जाता रहता है - पूर्व दिशा को पहचाना । प्राची दिक् ही तो अग्नि की दिशा है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " तस्मादग्नि पश्चात् प्राञ्चमुद्धृत्योपासते । प्राचीं ह्य े तेन दिशं प्राजानन् प्राची तस्यै दिक् " ॥९ ६ ॥ अग्नि के बाद है सोम देवता । इस सोम से देवताओं ने दक्षिण दिशा को पहचाना । याम्य अग्नि जैसे दक्षिण से उत्तर की ओर जाया करती है उसी प्रकार सोम सदा उत्तर से दक्षिण को जाया करता है । पानी का शोषण कर लेता है अतएव दक्षिण के पर्वत प्रायः ठोस होते हैं । चूंकि उत्तर में सोम अधिक रहता है अतएव यहाँ के हिमालयादि पर्वत पोले होते । हल्के होते हैं । अग्नि दक्षिण से उत्तर की ओर [ ३१८ ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण जाता है | इसका प्रमाण यही है कि हमारे दाहिने भाग में अधिक बल होता है । वाम भाग में सोम रहता है । सोम में बल नहीं है । बल अग्नि में है । अग्नि दक्षिण भाग में से दक्षिण भाग में ही आता है | प्रत एव बाएं भाग की अपेक्षा हमारा दक्षिण भाग अधिक बलवान होता है है अतएव दक्षिण भाग की ओर से औषधियों का परिपाक पहले होता है । अग्नि के पूर्व भाग की ओर जाने से जैसे उससे पूर्व दिशा का ज्ञान हुआ था तथैव सोम के दक्षिण भाग में जाने से इससे देवताओं ने दक्षिण दिशा को पहचाना | सोम दक्षिण की ओर जाता है अतएव दक्षिण ही इसकी स्वदिक् है । प्रतएव खरीदे हुए सोम को दक्षिण दिशा की ओर ले जाते हैं । निदानेन जैसे अग्नि को पश्चिम से पूर्व को ले जाया जाता है तथैव सोम को उत्तर से दक्षिण ले जाना चाहिए । इसी अभिप्राय से कहते हैं । हरन्ति " " दक्षिरणामेव दिशं सोमेन प्राजानन् । तस्मात् सोमं क्रीतं दक्षिणा परि-सोम ही पितरों का प्राण है । सोम प्राण का नाम ही पितर है । पितर ही इसका देवता है । अतएव सोम पितृदेवत्य है — यह कहा जाता है । " तस्मादाहुः पितृदेवत्यः सोम इति ” । सोम को कूटकर- अभिषवकर इसका रस निकाला जाता है इसीलिए अभिषवादि सारे काम दक्षि-णाभिमुख होकर ही किए जाते हैं । इसीलिए कहा जाता है: -" तस्मात् सोमं क्रीतं दक्षिणा परिवहन्ति । दक्षिरणा तिष्ठन्नभिस्टौति । दक्षिणा तिष्ठन् परिदधाति दक्षिणा एवैनमासीना अभिसुद्यन्ति । एषाहितस्य दिक् प्रज्ञाता "

इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं ।

" दक्षिणां ह्य ेतेन दिशं प्रजानान् । दक्षिणा ह्य ेतस्य दिक् ” ॥१७ ॥

सोम के बाद था सविता देवता । सूर्य से ऊपर बृहस्पति है जैसा कि वृहस्पतिः पूर्वेषामुत्तमो भवति “ इन्द्र उत्तरेषां प्रथमः ” इस श्रुति से स्पष्ट है । इस बृहस्पति से ऊपर ब्रह्मणस्पति है । ब्रह्मणस्पति के भी ऊपर सविता है । सविता प्रेरयिता प्राण है । सूर्य ही सविता नहीं है । सविता की प्रेरणा के प्रविष्ट हो जाने से सूर्य भी सविता हो जाता है । यह सूर्य जिसे कि सविता प्राण प्रवेशात् सूर्य कहेंगे । दृश्य मण्डल के हिसाब से पश्चिम से पूर्व की ओर जाता दिखलाई पड़ता है । पूर्व में उदय होता है । पश्चिम में अस्त होता है । बस इस सविता से देवताओं ने पश्चिम दिशा को पहचाना । अग्नि पूर्व जाता है अतएव उससे प्राची को को पहचाना था । सूर्य पश्चिम में जाता है अतएव इसकी दिशा में पश्चिम ही है । सूर्य की अपनी पश्चिम दिशा है अतएव इसे हम प्रतिदिन पश्चिम की ओर ही जाते देखते हैं । इसी अभिप्राय से कहा जाता है: -[ ३१६ ]

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तृतीय काण्ड ( ग्र ० २ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण " सौ वै सविता योऽसौ तपति, तस्मादेनं प्रत्यञ्च महरहर्यन्तं पश्यन्ति न प्राञ्चम् । एषा हि तस्य दिक् प्रज्ञाता ॥ ( को. ब्रा. ) 1 इसी अभिप्राय से भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं- देवताओं ने पश्चिम दिशा को सविता देवता से पहचाना । यही सविता है जो कि आकाश में तप रहा है । इसकी दिशा प्रतीची है । प्रतएव यह पश्चिम की ओर ही जाता है । इसी से प्रतीची दिशा को पहचाना । यही इस सविता की अपनी दिक् है— " प्रतीचीमेव दिशं सवित्रा प्राजानन् । तस्मादेष प्रत्यङ ङति । प्रतीचीं एष वै सविता य एष तपति तेन दिशं प्राजानन् । प्रतीची ह्य ेतस्य दिक् " ॥१८ ॥

बाकी बची अदिति खस्वस्तिक बिन्दु का नाम अदिति है । जैसा कि पूर्व में बतला दिया गया गया है । स्वस्तिक मस्तक से बिलकुल ऊपर है । इसी अभिप्राय से कहते हैं । ऊर्ध्वा दिशा को प्रदिति से खस्वस्तिक बिन्दु से पहचाना । इस पृथिवी का नाम ही तो अदिति है । यही ऊर्ध्वा दिशा की अधिष्ठात् अतएव इसमें ऊपर की ओर ही औषधियाँ उत्पन्न होती हैं । एवं वनस्पतिएं भी ऊपर की ओर ही मुंह किये उत्पन्न होती हैं । इसी से उन्होंने ऊर्ध्वा दिशा को पहचाना । यही अदिति की अपनी दिक् है । जिस प्रकार औषधि वनस्पतिएं इसके ऊपर ही उठती हैं ठीक उसी प्रकार मनुष्य भी ऊपर ही रहते हैं अग्नि भी ऊपर ही जाता है । ऊंचे सींग के मालीक यही अदिति है । इसीलिए कहा जाता है " इयं वाऽदितिः ” तस्मादस्यामूर्ध्वा औषधम, ऊर्ध्वा वनस्पतय, ऊर्ध्वा मनुष्या उत्तिष्ठन्ति, ऊध्वोऽग्नि र्दीप्यते, यदस्यां किं चोर्ध्वमेव तदायत्तम् । एषा हि तस्यै दिक् द्रज्ञाता " इसी से देवताओं ने ऊर्ध्वा दिशा को पहचाना था - इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं— ऊर्ध्व एव दिशमदित्य प्रजानन् । इयं वाऽदिति तस्मादस्यामूर्ध्वा प्रोषधयो जायन्ते ऊर्ध्वा वनस्पतयः ऊर्ध्वा तया दिशं प्रजानन् ऊर्ध्वा ह्य ेतस्यै दिक् ॥१९ ॥

तात्पर्य कहने का यही है कि देवताओं को - जिस प्रकार इन देवताओं से दिशा ज्ञान हुआ था वैसे ही इन्हीं देवताओं से आज भी तुम दिशाओं को पहचान सकते हो । जिस ओर सूर्य जाता है, समझ लो वह पश्चिम दिशा है जिस ओर अग्नि अर्थात् पृथिवी जाती है समझलो यही सूर्य दिशा है । जिस ओर सोम जाता है समझलो वह दक्षिण दिशा है । जिस ओर पथ्यास्वस्ति जाती है, समझलो वही उत्तर दिशा है, एवं पृथिवी की औषधियों पर वनस्पतियों पर मनुष्यों पर, अग्निज्वाला पर दृष्टि डालो इनका जो सीधा ऊपर का भाग है जिसे कि खस्वस्तिक कहा जाता है समझलो वही ऊर्ध्वा दिशा है--इस प्रकार यह पूर्वोक्त विभाग भगवान् याज्ञवल्क्य के महर्षि कौषितकी के अनुसार समझना चाहिए । ऐतरेय और तित्तिरि दिशा विभाग और तरह से करते हैं । [ ३२० ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण तित्तिरि के मतानुसार पथ्यास्वस्ति से पूर्व दिशा का ज्ञान होता है । अग्नि से दक्षिण दिशा का ज्ञान होता है । सोम से पश्चिम दिशा का ज्ञान होता है । सविता से उत्तर दिशा का ज्ञान होता है एवं अदिति मे ऊर्ध्वा दिशा का ज्ञान होता है, एवं ऐतरेय के मतानुसार अदिति से पूर्व दिशा का ज्ञान होता है । अग्नि से दक्षिण दिशा का ज्ञान होता है । सोम से पश्चिम दिशा का ज्ञान होता है । सविता से उत्तर दिशा का ज्ञान होता है एवं पथ्यास्वस्ति से ऊर्ध्वा दिशा का ज्ञान होता है - तीनों मत बिल्कुल ठीक हैं । तीनों में परस्पर कोई विरोध नहीं है । जिस प्रकार से अग्नि घन, तरल, विरल भेद से तीन प्रकार का होता है तीनों अवस्थाओं के कारण अप्, वायु, सोम तीन स्वरूपों में परिणत हो जाता है । वायु भी सोम है । सोम सोम है ही । हुए है । तथैव सोम भी इन्हीं पानी भी सोम है । इसी प्रकार अग्नि भी अग्नि है, वायु भी अग्नि है, अग्नि अग्नि है ही । ये दोनों ६ स्थानों में बंटे हैं । अग्नि की जो विरलावस्था है उसे अग्नि न कहकर प्रारण किंवा आदित्य कहा जाता है । इसी का नाम इन्द्राग्नि भी है । यह इन्द्राग्नि जो कि प्रादित्य नाम से व्यवहृत होती है, पूर्व दिशा में रहती है अतएव इन्द्र पूर्व दिशा के दिक्पाल कहलाते हैं, एवं जिसे अग्निकोण कहते हैं वह अग्नि की तरला-वस्था हैं, एवं ठीक दक्षिण में अग्नि की घनावस्था है । इस अग्नि को अग्नि न कहकर यम कहा जाता है । यह दक्षिणाग्नि शरीर को फाडकर मृत्यु का कारण बनती है । अतएव इसे यम कहा जाता है । अग्निकोण के मालिक अग्नि है, दक्षिण दिशा के लोकपाल यम है । यह अग्नि अर्थात् यम दक्षिण से उत्तर की ओर जाया करता है । इस प्रकार पूर्व, दक्षिण और पूर्व दक्षिण का मध्य ही तीनों अग्निस्थान है । तीनों ही अग्नि है । अब इधर आइए । पश्चिम में सोम की घनावस्था है जिसका कि नाम पानी है । इस पश्चिम दिशा के लोकपाल वंरुरण हैं, एवं उत्तर दिशा में सोम की प्राणावस्था है जो कि सोम ही कहलाता है । यह सोम उत्तर से दक्षिण की ओर जाया करता है एवं उत्तर पश्चिम के बीच के कोणों में सोम की तरलावस्था है । इसी को वायु कहते हैं । इस प्रकार ३ अग्नि और ३ सोम, पूर्व दिशा, अग्निकोण, दक्षिण दिशा, पश्चिम दिशा, वायु कोण एवं उत्तर दिशा इन ६ दिशाओं में बंटे हुए हैं । बाकी बची ' ईशान और नैऋत,, ऊर्ध्वा और अधः । इन में ऊर्ध्वा के स्वामी बृहस्पति है अधरा के व ईशान के महादेव है । नैऋत है । बस यह विभाग समझ लेने पर पूर्वोक्त तीनों मतों में कोई विरोध नहीं आता है । याज्ञवल्क्य, अग्नि से अर्थात् पृथ्वी से दक्षिण दिशा का ज्ञान बतलाते है । तैत्तिरि पथ्यास्वस्ति से ६ बतलाते है । ऐतरेय श्रदिति से बतलाते है । अग्नि अर्थात् पृथिवी वास्तव में पूर्व की ओर जाती है । इसलिए तो याज्ञवल्क्य का मत ठीक हैं एवं मार्गीया स्थिति को ही पथ्यास्वस्ति कहते है । जिस लाइन • से सूर्य पूर्व से पश्चिम को जाया करता है इसी लाइन का नाम पथ्यास्वस्ति है । इसका प्रारम्भ पूर्व से होता है । पया का प्रारम्भ विष्वत् के पूर्व से है समाप्ति पश्चिम पर है । सूर्य पूर्व से चलता है । यदि पूर्व को पहचानना चाहते हो, तो पध्यास्वस्ति के प्रारम्भ की बिन्दु पर ध्यान दो । यही तित्तिरि का तात्पर्य [ ३२१ ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण हैं । इसीलिए तिज़िर का पथ्यास्वस्ति से पूर्व का ज्ञान बतलाना भी ठीक है । से पूर्व का ज्ञान होता है । अदिति पृथिवी है । यही तो पूर्व की ओर जाती है भी इसमें कोई श्रापत्ति नहीं है । प्रायणीयेष्टि ब्राह्मणं ऐतरेय कहते है - प्रदिति अतएव ऐतरेय के मत से आगे चलिए - याज्ञवल्क्य सोम से दक्षिण दिशा का ज्ञान मानते हैं । तैत्तिरीय और ऐतरेय दोनों ही अग्नि से दक्षिण दिशा का ज्ञान होना बतलाते हैं । सोम जिधर जाता है उसे दक्षिण समझो | इससे भी दक्षिण का ज्ञान हो सकता है, एवं जहां से अग्नि चलता है जो अग्नि का स्थान है उसे ही दक्षिण समझो उससे भी दक्षिण दिशा का ज्ञान हो सकता है । श्रतएव इसमें भी कोई विरोध नहीं है । याज्ञवल्क्य सविता से पश्चिम दिशा का ज्ञान होना बतलाते हैं । तैत्तिरीय और ऐतरेय दोनों सोम से पश्चिम का ज्ञान होना बतलाते हैं । जिस ओर सविता जाता है उसे पश्चिम दिशा समझो । इससे भी पश्चिम दिशा का ज्ञान हो सकता है एवं जहां सोम अर्थात् सोम की घनावस्थास्वरूप पानी रहता हो, उसी को पश्चिम दिशा समझो । इससे भी पश्चिम दिक् का ज्ञान हो जाता है । इस प्रकार इसमें भी कोई विरोध नहीं है । याज्ञवल्क्य - पथ्यास्वस्ति से उत्तर का ज्ञान होना बतलाते है । तैत्तिरीय और ऐतरेय सविता से उत्तर दिशा का ज्ञान मानते हैं । पथ्यास्वस्ति विष्वत् से जिधर जाती है उसे ही उत्तर दिशा समझो । इससे भी उत्तर दिशा का ज्ञान हो सकता है । सूर्य अभिजित के सीध में है । अभिजित उत्तर में है । सूर्य से अभिजित की ओर का जो स्थान है वही उत्तर समझो । इससे भी उत्तर का ज्ञान हो सकता है । याज्ञवल्क्य और तैत्तिरीय प्रदिति से ऊर्ध्वा दिक् का ज्ञान मान रहे हैं, एवं ऐतरेय पथ्यास्वस्ति से ऊर्ध्वा का ज्ञान होना बतलाते हैं । खस्वस्तिक नाम अदिति है यही ऊर्ध्वा दिक् है । हमने बतलाया है कि सूर्य पूर्व से पश्चिम की ओर जिस मार्ग से जाता है । उसका नाम तो पथ्या एवं जिस अदिति बिन्दु के आधार पर पथ्या की स्थिति रहती है उसका नाम स्वस्ति है । अदिति की बिन्दु का नाम-खस्वस्तिक का नाम - ही स्वस्थिति है । यह पथ्यास्वस्ति से अभिन्न है । अतएव इससे भी अवश्य ही ऊर्ध्वा का ज्ञान हो सकता है । इस प्रकार तीनों मतों में कुछ भी विरोध नहीं प्राता है । दिश: शतपथ तैत्तिरीय ऐतरेय: १– प्राची श्रग्निना पथ्यया- स्वस्त्या अदित्या २– दक्षिणा सोमेन अग्निना ग्रग्निना ३– प्रतीची सवित्रा सोमेन सोमेन ४-उदीची पथ्यया- स्वस्त्या सवित्रा सबित्रा ५– ऊर्ध्वा श्रदित्या अदित्या पथ्यया स्वस्त्या [ ३२२ ]