Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 341–350
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 341–350
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) अग्निना सोमेन सवित्रा पथ्ययास्वस्त्या श्रदित्या ॥२० ॥
प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण प्राचीं दक्षिणां च । दक्षिणां प्रतीचीं च । प्रतीचीमुदीचीच | उदीचीं प्राचीं च । ऊर्ध्वा च । प्राचीमूर्ध्वा च । [ ३२३ ] प्रायणीय इष्टि के अनन्तर आतिथ्येष्टि की जाती है । यज्ञ को पुरुष माना जाता है इसीलिए " यज्ञो वै पुरुष: यह कहा जाता है । जिस प्रकार पुरुष के हाथ, पैर, मस्तक वगैरह होते है उसी प्रकार यज्ञ में भी मस्तक हस्तादि की कल्पना की जाती है । इसी अभिप्राय से कहते है कि सोमयज्ञ का अंगभूत जो श्रातिथ्य कर्म है, आतिथ्येष्टि है वह इस सोम यज्ञपुरुष का मस्तक हैं एवं प्रायणीय और उदयनीय इस यज्ञपुरुष के हाथ हैं । हाथ मस्तक के दोनों ओर होते हैं । इधर भी हाथ होता है उधर भी हाथ होता है एवं दोनों हाथों के बीच में मस्तक रहता है । इसीलिए प्रायणीय और उदयनीय दोनों हविएं इस प्रातिथ्य के दोनों ओर होती हैं । पहले प्रायणीय होता है बाद में प्रातिथ्येष्टि होती है एवं अन्त में उदयनीय होती है । इस प्रकार प्रायणीय उदयनीय हाथों के बीच में प्रातिथ्य स्वरूप मस्तक आ जाता है । प्राकृतिक यज्ञ से ही हमारी उत्पत्ति होती हैं । प्राकृतिक सोमयाग में भी प्रायणीयादि सारे कर्म होते हैं उन्हीं की नकल पर हम प्रायणीयादि करते हैं । " यद्वै देवा प्रकुर्वंस्तत् करवाणि यही हमारे यज्ञ का मूल है । प्रकृति में जो प्रायणीय- उदयनीय होता है उस इष्टि से हमारे हाथ बनते है, एवं प्रातिथ्येष्टि से मस्तक निर्माण होता है । प्रकृति में प्रायणीय - उदयनीय के बीच में आतिथ्य होता । इसलिए हमारा मस्तकं प्रामणीय - उदयनीय स्वरूप हाथों के बीच में है । प्रकृति यज्ञ का ऐसा स्वरूप है । इसमें हमारे शरीर निर्माण का तरीका ही प्रमाण है । हम उसी यज्ञ से बने हुए हैं । इसीलिए तो " पुरुषो वै यज्ञः " कहा जाता है । प्रकृति यज्ञ में प्रातिथ्येष्टि प्रायणीय - उदयनीय के मध्य में होती है अतएव हमें भी ऐसा ही करना चाहिए । बस यही तो तात्पर्य है इसी अभिप्राय से कहते हैं “ शिरो वै यज्ञस्यातिथ्यम् । बाहू प्रायणीयोदयनीयौ । अभितो व शिरो बाहू भवतः । तस्मादभितमातिथ्यमेते हविषी भवतः प्रायरणीयोदयनीयश्च । ". प्रकृति यज्ञ जैसे हमें उत्पन्न करता है ठीक उसी प्रकार उसकी नकल कर उन्हीं पदार्थों की ग्राहुति देकर यह यजमान स्वर्ग साधनभूत एक नया देवात्मा उत्पन्न करता है । प्रकृति यज्ञ से निर्मित हमारे हाथ एकसार होते हैं । वही पांच अंगुली इसमें होती है । इन हाथों का निर्माण प्राकृतिक प्रायणीय- उदयनीयेष्टि से ही होता है । आज यह यजमान इन दोनों से दिव्यात्मा के हाथ पैर उत्पन्न कर रहा हैं । श्रतएव जो कुछ काम प्रायणीय में करे, इसे चाहिए वही काम उदयनीय में करे, क्योंकि तभी तो दोनों हाथ समानाकार होंगे । प्रायणीय की जो बहि होती है वही बहि उदयनीय की होती है ।
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण " तदाहु: - यदेव प्रायणीये क्रियेत तदुदयनीये क्रियेत । यदेव प्रायणीयस्य बह र्भवति तदुदयनीयस्य बहि भवति " प्रायणीय के और उदयनीय के बीच में तो प्रातिथ्येष्टि स्वरूप कार्यान्तर ग्रा जायगा फिर उसी को उदयनीय के लिए कैसे रख सकते हैं, इसका समाधान करते हुए कहते है बहि का अग्नि में प्रह-रण मत करो श्रपितु अलग बचा कर रख ले इसमें कुछ भी हर्ज नहीं है । " तदपोद्धृत्य निदधाति " वह यजमान उसी कुशा को, उदयनीय के लिए पानी से धोकर नियत स्थान में रख देता है एवमेव चरू बनाने के काम में आने वाला जो मेक्षण है उसके चरु का लेप कर उसे सक्षाम-कर्षा स्थाली के साथ रख देता है एवं जो ऋत्विज प्रायणीय के होते है ये ही ऋत्विज उदयनीय के होते हैं । इस प्रकार इस यज्ञ में चूंकि यजमान समानभावेन उन्हीं साधनों उन्हीं ऋत्विजों से प्रायणीय - उदय-नीय करता है अतएव दोनों हाथ सरूप होते हैं अर्थात् एकसार होते हैं " परन्तु याज्ञवल्क्य उसका खण्डन करते हुए कहते हैं कि नहीं ऐसा कभी न करें-" तदुतथा न कुर्यात् " प्रायणीय बहि के यथेच्छ अग्नि में डाल के एवं मेक्षण को भी डाल दे । क्षामकर्ष रखने की भी कोई श्रावश्यकता नहीं है । थाली को साफ करके रख दे । परन्तु ऋत्विज वे ही हो जो कि प्रायणीय में थे । यदि वे भी विप्रेत होगा- समय पर न ना सके तो फिर ऋत्विज भी और बुलाए जा सकते है । यह यजमान समान देवताओं का यजन करता है, एवं समान द्धि होती है इसी से दोनों हाथ समान रूप वाले हो जाते है श्रपि च यदि तु उसी द्रव्य को उदयनीय में भी काम में लाओगे तो एक ही हाथ बनेगा दो नहीं । दो के लिए भिन्न - भिन्न द्रव्य होना चाहिए । हो वही द्रव्य, परन्तु अलग - अलग हो तभी दो हाथ बनेंगे ॥२ ॥
यह यजमान श्रदित्यादि पांच प्रायणीय देवताओं का यजन करता है एवं पांच ही का उदयनीयेष्टि में करता है । इसीलिए पांच अंगुली इस हाथ से उत्पन्न होती है एवं पांच अंगुली इस हाथ में होती है । यह प्रायणीय विकृति यज्ञ है । " प्रकृतिवद् विकृतिः कर्तव्या " यह सिद्धान्त है । अतएव इसमे सारे काम होते हैं । परन्तु इस प्रायणीय में संयुवाक् पर्यन्त तो सारे कर्म प्रकृतिवत् होते हैं । परन्तु ऋत्विक लोग इस प्रायणीय में पत्नी संयाज नहीं करते है । कारण इसका यही है कि दोनों बाहु शरीर के पूर्वाद्ध है । पत्नी यज्ञ का उत्तर भाग है । ऐसी हालत में यदि पत्नी संयाज कर दिया जायगा तो सारे देवता वापस चले जायेंगे । इसलिए युवा पर्यन्त ही कर्म होता है पत्नी संयाज नहीं होता है ॥ २३ ॥
। इति प्रायणीयेष्टिः समाप्ता ।
॥ इति द्वितीयाध्याये तृतीयं ब्राह्मणं समाप्तम् ॥
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अर्थ द्वितीयाध्याये चतुर्थं ब्राह्मणम् ' सोमाख्यान ब्राह्मणम् ' ( मूल ) - दिवि वै सोम श्रासीत् । प्रथह देवास्ते देवा श्रकामयन्ता नः सोमो गच्छेत्तेनागतेन यजेमहीति तएते मायेऽसृजन्त सुपरर्णी च कद्रं च तद्धिष्ण्-यानां ब्राह्मणे व्याख्यायते सौपर्णीकाद्रवं यथा तदास ॥१ ॥
तेभ्यो गायत्री सोममच्छापतत् । तस्याऽग्राहरन्त्यै गन्धर्वो विश्वावसुः पर्यमुष्णात्ते देवा विदुः प्रच्युतो व परस्तात्सोमोऽथ नो नागच्छति गन्धर्वा वै पर्य मोषिषुरिति ॥२ ॥
ते होचुः । योषित्कामा वै गन्धर्वा वाचमेवेभ्यः प्रहिरणवाम सा नः सह सोमेनागमिष्यतीति तेभ्यो वाचं प्राहिण्वन्त्सैनान्त्सह सोमेनागच्छत् ॥३ ॥
ते गन्धर्वा श्रन्वागत्याब्रुवन् । सोमो युष्माकं वागेवास्माकमिति तथेति देवा ब्रुवन्निहो चेदागान्मैनामभोषहेव नैष्ट विह्वयामहाऽइति तां व्यह्वयंत ॥४ ॥
तस्यै गन्धर्वाः । वेदानेव प्रोचिरइति वै वयं विद्य ेति वयं विद्यति ॥५ ॥
अथ देवाः । वीणामेव सृष्ट्वा वादयन्तो निगायन्तो निषेदुरिति वै ते वयं गास्याम इति त्वा प्रमोदयिष्यामह इति सा देवानुपाववर्त सा वै सा तन्मोघमुपाववर्त या स्तुवद्भयः शंसद्द्भ्यो नृत्तं गीतमुपाववर्त तस्मादप्येतह मोघसंहिता एव योषा एवं हिं वागुपावर्तत तामु ह्यन्या अनु योषास्तस्माद्य एव नृत्यति यो गायति तस्मिन्नर्वता निमिश्लतमा इव ॥६ ॥
तद्वा एतदुभयं देवेष्वासीत् । सोमश्च वाक्च स यत्सोमं क्रीणात्या-गत्याऽएवागतेन यजाऽइत्यनागतेन ह वै स सोमेन यजते योऽक्रीतेन यजते ॥७ ॥
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तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मणे अथ यद् ध्रु वायामाज्यं परिशिष्टं भवति । तज्जुह्वां चतुष्कृत्वो विगृह-राति बहिषा हिरण्यं प्रबध्यावधाय जुहोति कृत्स्नेन पयसा जुहवानीति समान-जन्म वै पयश्च हिरण्यं चोभयं ह्यग्निरेतसम् ॥८ ॥
स हिरण्यमवदधाति । एषा ते शुक्र तनूरेतद्वर्च इति वर्चो वा एतद्यद्धि-रण्यं तया सम्भव भ्राजं गच्छेति स यदाह तथा सम्भवेति तया सम्पृच्यस्वेत् येवै-तदाह भ्राजं गच्छेति सोमो वै भ्राट् सोमं गच्छेत्येवैतदाह ॥९ ॥
तां यथैवादो देवाः । प्राहिण्वन्त्सोममच्छेवमेवैनामेष एतत्प्रहिणोति सोम-मच्छ वाग्वै सोमक्रयणी निदानेन तामेतयाहुत्या प्रीणाति प्रीतया सोमं क्रीणा-नीति ॥ १० ॥
/ स जुहोति । जूरसीत्ये तद्ध वाऽप्रस्या एकं नाम यज्जूरसीति धृता मन-सेति मनसा वाऽइयं वाग्धृता मनो वा ऽइदं पुरस्ताद्वाच इत्थं वद मैतद्वादीरित्य-लग्लमिव ह वै वाग्वदेद्यन्मनो न स्यात्तस्मादाह धृता मनसेति ॥ ११ ॥
जुष्टा विष्णव इति । जुष्टा सोमायेत्येवैतदाह यमच्छेम इति तस्यास्ते सत्य सवसः प्रसवऽइति सत्यप्रसवा न एधि सोमं नोऽछेहीत्येवैतदाह तन्वो यन्त्र-मशीय स्वाहेति स ह वै तन्वो यन्त्रमश्नुते यो यज्ञस्योदृचं गच्छति यज्ञस्योदृचं गच्छामीत्येवैतदाह ॥१२ ॥
अथ हिरण्यमपोद्धरति । तन्मनुष्येषु हिरण्यं करोति स यत्सहिरण्यं जुहूयात्वरागु हैवैतन्मनुष्येभ्यो हिरण्यं प्रवृज्यात्तन्न मनुष्येषु हिरण्यम-भिगम्येत ॥ १३ ॥
सो s पोद्धरति । शुक्रमसि चन्द्रमस्यमृतमसि वैश्वदेवमसीति कृत्स्नेन पयसा हुत्वा यदेवैतत्तदाह शुक्रमसीति शुक्रं ह्ये तच्चन्द्रमसीति चन्द्रं ह्येतदमृतमसीत्य-मृतं तद्वैश्वदेवमसीति वैश्वदेव ह्य ेतत्प्रमुच्य तृणं बहिष्य पिसृजति सूत्रेण हिरण्यं अब्रध्नीते ॥१४ ॥
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यानं ब्राह्मणे अथापरं चतुर्गृ हीतमाज्यं गृहीत्वा । अन्वारभस्व यजमानेत्याहापोर्णु-वन्ति शालायै द्वारे दक्षिणतः सोमक्रयण्युपतिष्ठते तत्प्रहितामेवैनामेतत्सतीं प्राहै-बीद्वाग्वै सोमकयरणी निदानेन तामेतयाहुत्याप्रैषीत्प्रीतया सोमं क्रीणानीति । १५ । अथोपनिष्क्रम्याभिमन्त्रयते । चिदसि मनासीति चित्तं वाऽइदं मनो वाग़-नुवदति धोरसि दक्षिणेति धिया - धिया तया मनुष्या जुज्यूषन्त्यनूक्त नेव प्रका मोद्येनेव गाथाभिरिव तस्मादाह धीरसीति दक्षिणेति दक्षिणाह्यषा क्षत्रियासि यज्ञियासीति क्षत्रिया ह्येषा यज्ञिया ह्येषादितिरस्युभयतः शीर्ष्णाति स यदेनया समानं द्विपर्यासं वदति यदपरं तत्पूर्वं करोति यत्पूर्वं तदपरं तेनोभयतः शीर्णी तस्मादाहादितिरस्युभयतः शीर्ष्णाति ॥ १६ ॥
सा नः सुप्राची सुप्रतीच्येधीति । सुप्राची न एधि सोमं नोऽच्छहीत्येवंत-दाह सुप्रतीची त एधि सोमेन नः सह पुनरेहीत्येवैतदाह तस्मादाह सा नः सुप्रा-ची सुप्रतीच्येधीति ॥१७ ॥
मित्रस्त्वा पदि बघ्नीतामिति । वरुष्या वाडएषा यद्रज्जुः सा यद्रज्ज्वा-भिहिता स्थाद्वरुण्या स्याद्यद्वनभिहिता स्यादयतेव स्यादेतद्वा ऽअवरुष्यं यन्मैत्रं सा यथा रज्ज्वाभिहिता यतैवमस्यै तद्भवति यदाह मित्रस्त्वा पदि बघ्नी-तामिति ॥१८ ॥
पूषाध्वनस्पात्विति । इयं वै पृथिवी पूषा यस्य वाऽइयमध्वन्गोप्ती तस्य न का चन ह्वला भवति तस्मादाह पूषाध्वनस्पात्विति ॥१ ९ ॥ इन्द्रायाध्यक्षायेति । स्वध्यक्षासदित्येवैतदाह यदाहेन्द्रायाध्यक्षायेत्यनु त्वा माता मन्यतामनु पितानु भ्राता सगर्भ्योऽनु सखा सयूथ्य इति सा यत्ते जन्म तेन नोऽनुमता सोममच्छहीत्येवैतदाह सा देवि देवमच्छेहीति देवी ह्येषादेवमच्छेति यद्वाक्सोमं तस्मादाह सा देवि देवमच्छेहातीन्द्राय सोममितीन्द्रो वै यज्ञस्य देवता तस्मादाहेन्द्राय सोममिति रुद्रस्त्वावर्तयत्वित्यप्रणाशायैतदाह रूद्रं हि नाति पशवः स्वस्ति सोमसखा पुनरेहीति स्वस्ति नः सोमेन सह पुनरेहीत्येवैतदाह ॥२० ॥
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यानं ब्राह्मणं तां यथैवादो देवाः । प्राहिण्वन्त्सोममच्छ सैनान्त्सह सोमेनागच्छदेवमेवै-नामेष एतत्प्रहिणोति सोममच्छ सैनं सह सोमेनागच्छति ॥२१ ॥
तां यथैवादो देवाः । व्यह्वयन्त गन्धर्वैः सा देवानुपावर्त्ततै वमेव नामेत्त-मानो विह्वयते सा यजमानमुपावर्तते तामुदीचीमत्या कुर्वन्त्युदीची हि मनु-व्यारणां दिक्सोऽएव यजमानस्य तस्मादुदीचीमत्याकुर्वन्ति ॥ २२ ॥
[ अनुवाद ] प्रायणीयेष्टि सम्पादन द्वारा प्राकृतिक ( प्राधिदैविक ) अदिति, पथ्यास्व-स्ति, अग्नि, सोम तथा सवितारूप पञ्चावयव यज्ञ को आत्मसात् कर यजमान ने सोमयाग करने का अधिकार प्राप्त कर लिया । अधिकार प्राप्त्यनन्तर अब वह सोमयाग का अनुष्ठान करता है । सोमयाग में सोमलता का क्रयण अत्यावश्यक है । उसके बिना सोमरस की प्राप्ति न होने से वह सोमयाग कर ही नहीं सकता । अतः भुवनस्वर्गवासी देवता शर्यणायत, हेमकूट व मूजवान् पर्वत पर उत्पन्न होने वाली सोमलता का क्रयण कर उसे कूट कर सोमरस निकालते थे, और उस सोम की सुत्या के दिन आहुति देते थे । यह सोमरस मादक होते हुए भी उत्साहवर्धक, बुद्धिवर्धक व शरीर में शक्ति को बढाने वाला है तथा निर्भयता प्रदान करने वाला है । जब कि सुरा, वारुणी आदि अन्य मादक पदा-बल, बुद्धि, धैर्य व विज्ञान को नष्ट करने वाले तथा मस्तिष्क को दूषित करने वाले हैं । जैसा कि श्रद्धेय गुरुवर्य ने सोम के प्रभाव का वर्णन करते हुए कहा है— सोमो. धृतिविज्ञाने वर्धयते संस्करोति मस्तिष्कम् माल्यं सुरा तु हरते तद् विज्ञानं शिरोऽपि दूषयति । बुद्धिः शौर्यसमृद्धी बलमारोग्यं महत्वमभयत्वम् रिपुदमन क्षमता सुखदीर्घायुष्ट्वे जयश्च सोमेन ॥ सोमलता में १५ पत्ते होते थे । शुक्लपक्ष में चन्द्रमा की जैसे प्रतिदिन कला बढ़ती है चन्द्रमा की इस कलावृद्धि के साथ सोमलता में एक एक पत्र आता जाता है । पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा में १५ कलाओं का उदय होने पर चन्द्रमा परिपूर्ण शरीर वाला बन जाता है । उसी प्रकार सोमलता भी पूर्णिमा के दिन १५ पत्तों से परिपूर्ण हो जाती थी । फिर कृष्ण पक्ष आने पर प्रतिदिन चन्द्रमा की एक एक कलाओं का ह्रास होता जाता था और अमावास्या में एक भी पत्र उसमें नहीं रहता था । इसीलिए श्रद्धेय गुरुवर्य ने इन्द्र विजय के श्रार्यदासीय प्रकरण में, निम्नश्लोकों के द्वारा इस तथ्य का स्पष्टीकरण किया है— सोमलताया दण्डे पञ्चदशैवच्छदा भवन्ति स्म I पञ्चदशाहं स्थित्वा ध्रुवं व्यशीर्यन्त षोऽशेऽहनि ते ॥ [ ३२८ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण
दर्श परर्णाभावः प्रतिपदि पर्णोदगमोऽन्वधः पर्व ।
प्रतितिथि पर्णोद्गमनात् पूर्णायां पञ्चदश तानि ॥
प्रतिपद्यधरे पर्वरिण पर्णनिपातः क्रमादुपर्येवम् ।
दर्श परर्णाभावो ज्योतिष्मन्त्यस्य पर्णानि ॥
इन्द्र ने इसी सोमरस का पान कर बलशाली बनकर असुरों का संहार किया था । इन्द्र ने हेमकूट पर्वत पर इस सोमवल्ली की रक्षा के लिए गन्धर्वो को नियुक्त कर रखा था, जैसा कि निम्नलिखित कौषीतकि श्रुति से प्रतीत हो रहा है— " गन्धर्वा ह वा इन्द्रस्य सोममप्सु प्रत्यायिता गोपायन्ति ” । भौमस्वर्गवासी देवताओं के यज्ञ की प्रतिकृति पर वैधयज्ञ करने वाले भारतीय भी “ यद्देवा प्रकुर्वंस्तत् करवाणि " इस सिद्धान्त के अनुसार ईरान से सोमवल्ली खरीदा करते थे । किन्तु भुवन स्वर्गवासी देवता जो यज्ञ सम्पन्न करते थे, वे प्राकृतिक यज्ञ की नकल पर वैष यज्ञ किया करते थे । प्रकृति के अनुसार उन्होंने यज्ञ विद्या का आविष्कार किया था । प्रकृति में प्राकृतिक पार्थिव देवताओं ने परमेष्ठि रूप तृतीय द्यलोक में स्थित सोम को प्राप्त कर उसी के द्वारा यज्ञ किया था क्योंकि प्रकृति में परमेष्ठी रूप तृतीय द्य लोक में यह रहता है । यह पारष्मेठ्य ब्रह्मणस्पतिरूप पवमान सोम है । जिसका निरूपण श्रुति में गया है—
पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः ।
अतप्ततनूर्न तदामो अश्नुते शृतास इद् वहन्तस्तत् समासत ॥
पार्थिव आग्नेय देवताओं ने विचारा कि यज्ञ साधनभूत यह सोम यहां से तृतीय द्युलोक में है, जैसा कि तैत्तिरीय श्रुति " तृतीयस्यामितो दिवी सोम् आसीत् " इस रूप से उसकी स्थिति तृतीय द्युलोक में बतला रही है । इस सोम की पृथिवी में स्थित आग्नेय देव-ताओं को कैसे प्राप्ति हो इसी बात का आख्यान द्वारा निरूपण किया जा रहा है । " दिवि वै सोम आसीत् " इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अर्थात् यहां से तृतीय द्युलोक में ब्रह्मणस्पति सोम था । प्राकृतिक पार्थिव आग्नेय देवतानों ने जो कि पृथिवी में थे उस सोम को प्राप्त करने की इच्छा की क्योंकि बिना सोम के सोमयाग नहीं हो सकता । उन्होंने विचार किया कि तृतीय लोक में स्थित सोम हमारे पास किस प्रकार आये, हमें किस प्रकार प्राप्त हो, जिससे कि हम सोमयाग कर सकें । विचार कर उन्होंने कद्रू व सुपर्णी नामक दो मायाओं को उत्पन्न किया । मर्त्य पृथिवी के केन्द्र से अमृताग्नि निकल कर २१ वें अहर्गण तक जाया करती है । यह अग्नि घन, तरल, विरल भाव से त्रिधा विभक्त है 1 । इनमें घनाग्नि जो कि त्रिवृत् स्तोम [ ३२६ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मणे तक रहती है अवान्तर आठ वस्तुनों में परिणत हो जाती है । पञ्चदशस्तोम तक जाने वाली तर लाग्नि जो कि वाय्वग्नि कहलाती है, ११ रुद्रों में और एकविश स्तोम तक जाने वाली विराग्नि १२ आदित्यों में परिणत हो जाती है । दो अश्विनीकुमार सामान्य देवता हैं । इस प्रकार ३३ आग्नेय देवता हैं । ये यद्यपि पृथिवी के २१ वें अहर्गण तक हैं तथापि पृथिवी केन्द्र से बद्ध रहने के कारण पार्थिव कहलाते हैं । अतः इनको पार्थिव आग्नेय देवता कहा है । देवता पृथिवी में रहते हैं इसका यही तात्पर्य है कि २१ वें अहर्गण तक वितत रहने वाले उपयुक्त ३३ देवता केन्द्रीय पृथिवी प्रजापति से बद्ध हैं, और सोम सूर्य से भी ऊपर परमेष्ठिमण्डल में रहता है । अतः अति दूरस्थ सोम उनको किस उपाय से प्राप्त हो सके, पृथिवी लोक के देवताओं ने यही विचार किया और अन्त में कद्रू व सुपर्णी नाम की दो माया-ओं को उत्पन्न किया । जिस प्रकार तृतीय द्युलोकस्थ ब्रह्मणस्पति सोम कद्र और सुपर्णी द्वारा देवताओं को प्राप्त हुआ, वह सौपर्णीकाद्रवोपाख्यान का वर्णन ' धिष्ण्या ब्राह्मण ' में किया जायगा । ' धिष्ण्या ब्राह्मण ' के अनुसार पिण्ड पृथिवी को कद्रू कहा गया है । " इयं वै कद्रू ” अर्थात् पृथिवी का मर्त्याग्नि अर्थात् चित्याग्नि पिण्ड कद्रू है । पृथिवी प्रकाश रहित होती है । सूर्य, चन्द्र आदि की तरह वह प्रकाशशील नहीं है । उससे निकलने वाली रश्मियां कृष्णवर्णं की होती हैं । अतः काली पृथिवी से निकलने वाली तथा पृथिवी पिण्ड के चौतरफ वितत रहने वाली काली रश्मियां कद्रू की सन्तान हैं । ये काली रश्मियां प्राणत् अपानत् रूप से सर्पण करती हैं । इसीलिए उन्हें सर्प कहा जाता है । ये काली रश्मियां पृथिवी पिण्ड के चौतरफ पूर्ण रूप से व्याप्त हैं, और " सहस्र वै पूर्णम् " इस श्रुति के अनुसार पूर्ण का नाम ही सहस्र है इसलिए पृथिवी से उत्पन्न इन काली रश्मिरूप सर्पों को सहस्र कहा गया है । इसी प्रकार पिण्ड पृथिवी के केन्द्र से निकल कर १३ वें अहर्गण तक व्याप्त वाक् को ही सुपर्णी बतलाया गया है । " वागेव सुपर्णी " इति । आत्मा, शरीर, महिमा अथवा आत्मा पद व पुनःपद, भेद से त्रिधा विभक्त वस्तु का ३३ तक व्याप्त वाङ्मण्डल ही महिमा मण्डल कहलाता है । ३३ पर जाकर वस्तु का महिमा-मण्डल समाप्त हो जाता है और उससे आगे उस वस्तु का दर्शन नहीं होता । वस्तु का यह महिमा मण्डल ही वाक्, वाङ्मण्डल या वषट्कार मण्डल कहलाता है । यह वाक् सभी पदा-र्थों में रहती है इसीलिए - वाचीमा विश्वा भुवनान्यपिता " यह श्रुति वाक् में सब भुवनों की स्थिति बतला रही है । वाक् नाम आकाश का है और आकाश को शून्य कहते हैं । किन्तु आकाश व शून्य रिक्तता का नाम नहीं है जिसे हम रिक्त स्थान मानते हैं वहां " श्वा ” या “ शुन " नाम का दिव्य इन्द्र व्याप्त रहता है । इसी का नाम मघवा इन्द्र है । इसीलिए " शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रम् " इस श्रुति में शुन इन्द्र को मघवा कहा गया है । इस श्वा या शुन [ ३३० ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण नामक इन्द्र से रिक्त स्थान कोई नहीं है । यह सर्वत्र रहता है इसीलिए - " नेन्द्राद ऋते पवते-धाम किञ्चन " यह श्रुति सर्व स्थानों में उसकी सत्ता को बतला रही है । आकाश को शून्य इसीलिए कहते हैं कि वह श्वा नामक इन्द्र का स्थान होने से उसके लिए हितकर प्रदेश है । इसलिए पाणिनीय व्याकरण में शून्य की व्याख्या " शुने हितम् " की गई है । इस सन्दर्भ से यह सिद्ध है कि वह वाक् दिव्य इन्द्ररूप है । दिव्य इन्द्र ही वाक् है, सुपर्णी है । इसीलिए तैत्तिरीय श्रुति में " इयं वै कद्रूः । असौ सुपर्णी, छन्दांसि सौपर्णेयाः । ( तै. मं. ६-१-६- १ ) द्युलोक को सुपर्णी कहा गया है । जिस प्रकार अग्नि प्राण से गर्भित है अर्थात् पृथिवी का प्राण अग्नि है उसी प्रकार द्युलोक का प्राण इन्द्र है अतः द्युलोक का अर्थ यहां इन्द्र है, अर्थात दिव्य इन्द्र ही सुपर्णी है । अतः चाहे वाक् को सुपर्णी कहा जाय या दिव्य इन्द्र को, इसमें कोई विरोध नहीं है । उन देवताओं ने इस कद्रू और सुपर्णी में झगड़ा करवा दिया । इसका तात्पर्य यह है कि पृथिवी का अग्नि, अंगिरा, पृथिवी से निकल कर निरन्तर द्युलोक की ओर जाया करता है और दूसरी तरफ सूर्य की रश्मियां निरन्तर पृथिवी की ओर आया करती हैं । वे सौर रश्मियां पृथिवी से टकरा कर पुनः सूर्य की ओर जाती हैं इन्हीं सौर रश्मियों को आदित्य की वस्तु होने से प्रादित्य कहा जाता है । पृथिवी से सूर्य की ओर जाती हुई पृथिवी की अग्नि अंगिरा तथा द्युलोक से पृथिवी तक आकर तथा उसमें टकरा कर द्युलोक की ओर लौटती हुई सौर रश्मिरूप आदित्य अग्नि में निरन्तर संघर्ष चलता रहता है । जिस संघर्ष का वर्णन " आदित्याश्च ह वा अंगिरसश्च स्वर्गे लोकेऽस्पर्धन्त वयं पूर्वे एष्यामो वयम् - इति । इसमें पृथिवी की चित्याग्नि अंगिरा ही कद्रू है, तथा द्युलोक से आने वाली सौर रश्मि प्राणों का नाम ही सुपर्णी है । वही सौर इन्द्र प्राण वाक् कहलाता है । अतः वाक् को सुपर्णी कह दिया गया है । कद्रू और सुपर्णी के परस्पर कलह का यही संक्षिप्त वैज्ञानिक रहस्य है । ' धिष्ण्या ब्राह्मण में प्रतिपादित कद्रू और सुपर्णी का तथा उनके परस्पर कलह विज्ञान का संक्षिप्त निरूपण कर इस प्रकरण को यहीं समाप्त किया जाता है । आगे जाकर इस विवाद में सुपर्णों की पराजय हुई और अपनी शर्त के अनुसार सुपर्णी को कद्रू की दासी बन-ना पड़ा । पश्चात् कद्रू के यह कहने पर कि यदि तुम तृतीय द्युलोक से सोमरूप अमृत लाकर मेरे पुत्र सर्पों को दे दो तो मैं तुम्हें दासीपन से मुक्त कर सकती हूँ । तब सुपर्णी ने सौमरूप अमृत लाने के लिए गायत्री, त्रिष्टुप् जगती इन छन्दों को उत्पन्न किया । इसका तात्पर्य यह है कि वाग्रूप सुपर्णी पृथ्वी केन्द्र से निकल कर २१ वें अहर्गण तक अग्नि के रूप में जाती है “ तस्य वा एतस्याग्नेर्वागेवोपनिषत् " इस श्रुति के अनुसार वाक् ग्रग्नि ही है । इस अग्नि की घन - तरल - बिरल भेद से तीन अवस्थायें हैं । त्रिवृत्स्तोम तक घनाग्नि अग्निरूप है । इससे आगे तरल रूप अग्नि वायु में परिणत हो जाती है वह अवस्था पञ्चदशस्तोम तक रहती है । इससे आगे जाने पर अग्नि प्रति विशकलित हो जाने से विरल रूप में परिणत होकर आदि-[ ३३१ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण त्य कहलाने लगती है । अग्नि की यह विरलावस्था एकविंशस्तोम तक रहती है । इससे आगे अग्नि नहीं जाता । अमृताग्नि के इन तीनों रूपों के तीन मण्डल बन जाते हैं । त्रिवृत् स्तोम तक रहने वाला घनाग्नि मण्डल पृथिवी लोक है | पञ्चदशस्तोम तक रहने वाला तरलाग्नि रूप मण्डल अन्तरिक्ष लोक है । अग्नि का यह तरल रूप ही वायु है । इससे आगे का अग्नि का विरल रूप आदित्य है । यह मण्डल द्य लोक है पृथिवी अंतरिक्ष व द्युलोक इन तीनों के तीन पृथक पृथक छन्द हैं, पृथिवी चूंकि अग्नि है, अग्नि का छन्द गायत्री है | और अग्नि भ्रष्ट वसु रूप है । अतः उसको ग्रहण करने वाला गायत्री छन्द भी अष्टाक्षर है । अन्तरिक्ष लोक में रुद्रों की सत्ता मानी गई है और रुद्र एकादश हैं तथा उनको ग्रहण करने वाला त्रिष्टुप् छन्द भी एकादशाक्षर है जो कि अन्तरिक्ष का छन्द कहलाता है । द्युलोक में रहने वाले देवता आदित्य कहलाते हैं, और आदित्य संख्या में १२ हैं । अतः इनको ग्रहरण करने के लिए द्य ुलोक का छन्द जगती द्वादशाक्षर माना गया है । भिन्न भिन्न छन्दों के द्वारा भिन्न देवता पकड़ में आ जाते हैं । अष्टाक्षरा गायत्री छन्द के द्वारा प्रष्ट वसु रूप अग्नि एकादशा-क्षरा त्रिष्टुप् के द्वारा एकादश रुद्ररूप वायु तथा द्वादशाक्षरा जगती के द्वारा द्वादश आदित्य देवता पकड़ में आ जाते हैं । इसीलिए तैत्तिरीय ब्राह्मण में कहा है— “ वसवस्त्वा पुरस्तादभिषिञ्चन्तु गायन्त्रेण छन्दसा, रुद्रास्त्वा दक्षिणतो अभिषिञ्चन्तु त्रैष्टुभेन छन्दसा । आदित्यास्त्वा पश्चादभिषिञ्चन्तु जागतेन छन्दसा । इति । अमृताग्निमय सुपर्णी रूप ऐन्द्री वाक् के ही पृथिवी, अन्तरिक्ष व द्युलोक रूप तीन मण्डल हैं । और इन तीनों मण्डलों वाले या तीनों लोकों वाले देवताओं को पकडने वाले ये तीन गायत्री आदि छन्द हैं अतः यह कहा गया है कि सुपर्णी ने गायत्री आदि छन्दों को उत्पन्न किया । उस सुपर्णी ने सर्वप्रथम जगती को ही सोम लाने के लिए भेजा, क्योंकि सोम जगती के समीप पडता है । सोम तृतीय द्यलोक परमेष्ठी में है, और जगती द्वितीयद्य लोकवर्ती आदित्यका छन्द है । किन्तु सोम रक्षक गन्धर्वो ने जगती के तीन पैर तोड़ डाले । प्रत्येक छन्द " चतुरक्षराणि वै छन्दांसि भवन्ति " के अनुसार चार अक्षरों का होता है । ये चार अक्षर ही उनके ४ पैर हैं । जगती के ३ पैरों को तोड़ने का अभिप्राय यह है कि जगती छन्द द्युलोक का है, अर्थात् सूर्य का है । सूर्य की ऊर्ध्ववर्ती तथा उभय पार्श्ववर्ती रश्मियां ऊपर लोक में ही रह जाती हैं । केवल अधोवर्ती किरणें ही पृथिवी की ओर अर्थात् पृथिवी के देवताओं की ओर आती है जब जगती तीन पैर तुड़ा कर आ गई और सोम को न ला सकी तब सुपर्णी वाक् ने अन्तरिक्ष लोक के छन्द त्रिष्टुप् को सोम लाने के लिए भेजा किन्तु वह भी एक पैर तुड़ा कर आ गई । इसका अभिप्राय यह है कि त्रिष्टुप के द्वारा जो सोम पृथिवी पर आता है वह तीन भाग वाला है । अधोवर्ती पाद के द्वारा लाया हुआ सोम तो पृथिवी पर आता ही है किन्तु ऊपर से आने वाली सूर्य रश्मियां दोनों पार्श्वों को तिरछा कर त्रिष्टुप् के दोनों पार्श्व भागों के सोम को भी पृथिवी पर गिरा देती हैं । ऊर्ध्वपाद का सोम ऊपर चला जाता है वह पृथिवी पर नहीं आने पाता । [ ३३२ ]