Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 351–360
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 351–360
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तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्राह्मरण सोमाख्यान ब्राह्मणं जब त्रिष्टुप भी सोम को न ला सकी तब गायत्री को सोम लाने के लिए सुपर्णी ने भेजा 1 । गायत्री पृथिवी लोक का छन्द है उसका पृथिवी से साक्षात् सम्बन्ध है । वह पृथिवी केन्द्र से बद्ध है । वह सत्य है, ऋत नहीं । सत्य में ऋत की अपेक्षा अधिक बल होता है । अतः उसने श्येन रूप धारण कर बलशाली बनकर जोर से सोम रक्षक गन्धर्वों पर आक्रमण किया । वे गन्धर्व डर कर इधर उधर भाग गये और वह सोम को लेकर पृथिवी पर आ गई साथ ही जगती के तीन पैर व त्रिष्टुप् का एक पैर भी उठा लाई । इन ४ पाद रूप ४ अक्षरों के मिल जाने से चतुरक्षरा गायत्री अष्टाक्षरा बन गई । इसीलिए गायत्री को अष्टाक्षरा कहा जाता है । जगती तथा त्रिष्टुप् द्वारा अपने पैर मांगने पर गायत्री ने वे पैर उनको नहीं दिये । किन्तु उन दोनों छन्दों को भी अपने में सम्मिलित कर लिया । सम्मिलित करने से तीन पैर वाली त्रिष्टुप् गायत्री के ८ पैरों से अर्थात् अक्षरों से मिलकर एकादशाक्षरा बन गई तथा जगती इसमें सम्मिलित होकर एक पैर वाली, एकादश पैरों अर्थात् अक्षरों से मिलकर द्वादशा-क्षरा बन गई । प्रत्येक छन्द के चतुरक्षरात्मक होने पर गायत्री के प्रष्टाक्षरा त्रिष्टुप के एका-दशाक्षरा तथा जगती के द्वादशाक्षरा बनने का यही रहस्य है । ' धिष्ण्या ब्राह्मरण ' में सौपर्ण काद्रवोपाख्यान का संक्षेप से यही वैज्ञानिक रहस्य है । यह रहस्य विस्तार से हिन्दी विज्ञान-भाष्य में बतलाया गया है । उसी से लेकर संक्षेप में सौपर्णी काद्रवोपाख्यान को समझने के लिए वर्णित कर दिया है ॥ १ ॥
पृथिवी लोक के देवताओं के लिए सोम लाने के लिए गायत्री श्येन पक्षी का रूप धारण कर सोम की तरफ झपटी और सोम को उसने ले लिया किन्तु सोम रक्षक विश्वावसु गन्धर्व ने उसका अपहरण कर लिया । उन देवताओं ने देखा कि परमेष्ठि लोक से तो सोम प्रच्युत हो चुका है किन्तु हम तक नहीं पहुँचता मालूम पडता है, सोम रक्षक गन्धर्व ने उसका अपहरण कर लिया है ॥ २ ॥
देवताओं ने विचार किया कि गन्धर्वो से इस सोम को कैसे प्राप्त करें । अन्त में उन्हें मालूम हुआ कि गन्धर्व स्त्री कामुक होते हैं । प्रकृति में गन्धर्व प्रारण एक विशेष प्रकार का वृषा प्राण है तथा स्त्री योषा प्राण है । वृषा प्रारण सदा योषा प्रारण की इच्छा करता है किन्तु जिसमें गन्धर्व नामक वृषा प्राण होता है वह अत्यधिक स्त्री कामुक अर्थात् स्त्रैण होता है | अतः गन्धर्व प्रारण की जिनमें प्रधानता है ऐसे गन्धर्व को मोहित करने के लिए योषा प्राण प्रधान स्त्री का उपयोग करना चाहिए । वाक् चूँकि स्त्री है, योषा प्रारण है अत: गन्धर्वों के पास योषा प्रारण रूप वाक् को ही भेजना चाहिये । वह गन्धर्वों से सोम लेकर अपने पास आ जायगी । गन्धर्व सौम्य प्रारण है । वाक् गन्धर्वो के साथ आई । इससे गन्धर्व रूप सौम्य प्राण का समावेश भी पार्थिव देवताओं में हो गया ॥ ३ ॥
वाक् के साथ आये गन्धर्वो ने देवताओं से कहा कि देवताओं! सोम आपका है और वाक हमारी हो क्योंकि गन्धर्व स्त्रीकाम हैं और वाक् स्त्री है । देवताओं ने कहा- ठीक है । [ ३३३ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मणं तात्पर्य इसका यह है कि पार्थिव देवता अग्नि रूप हैं । अग्नि का सोम के साथ घनिष्ठ सम्-बन्ध है अग्नि में सोम की आहुति न हो तो अग्नि की सत्ता नहीं रहेगी अर्थात् आग्नेय देव-ताओं का अस्तित्व नष्ट हो जायगा और गन्धर्वों का सम्बन्ध वाक् से है क्योंकि वाक् गीतिरूप हैं गीति शब्द समूह है । इसीलिए गन्धर्व गान व वादन को पसन्द करते हैं । देवताओं ने कहा कि वाक् को तुम ले जा सकते हो किन्तु बलात्कार व भय से नहीं अपितु मधुर शब्दों से । आप लोग भी वाक् को अपनी बनाने के लिए बुलाओ और हम भी बुलाते हैं इसके बाद इसकी मर्जी जिधर जाना चाहे उधर चली जाय । अतः गन्धर्वों और देवताओं दोनों ने ही वाक् का आह्वान किया ॥ ४ ॥
गन्धर्वों ने वाक् को बुलाने के लिए वेदों का प्रवचन किया अर्थात् उन्होंने मधुर वाणी
का प्रयोग किया, हम यह विद्या जानते है । हम इस कला को जानते हैं ॥ ५ ॥
देवताओं ने वीणा का निर्माण किया और गाते बजाते स्थिर भाव से बैठ गये । और वाक् का आह्वान करने लगे कि हम तुम्हें गाना बजाना सुनाकर प्रानन्दित करेगें । देवताओं के इस संगीत और वाद्य की मधुर ध्वनि सुनकर वाक् देवताओं की ओर चली आई । वह् मधुरता के कारण ही गन्धर्वों का परित्याग कर देवताओं की ओर आई । किन्तु यह वाक् व्यर्थ ही देवताओं की ओर आई । क्योंकि स्तोत्र शास्त्र रूप वेद का परित्याग कर मधुर गीत व नृत्य के पीछे देवताओं की ओर आई । इसीलिए जैसे वर्तमान काल में अन्य स्त्रियों नृत्य गीत पर रीझा करती हैं उसी प्रकार वाक् भी देवताओं के नृत्य वाद्यमय संगीत पर रीझ कर देवताओं की ओर आईन कि यथार्थ प्रेम के कारण । इसीलिए जो नाचता है गाता है उसी पुरुष पर ये स्त्रियां अत्यन्त अनुरक्त होती हैं । उससे एक जीव हो जाती हैं । नाचने गाने वालों से प्रेम करना स्त्री का स्वभाव है इसी को यहां बतलाया है । स्त्रियां सौम्य होती है और सोम में माधुर्य होता है । अतः स्त्रियां माधुर्य पर विशेष अनुरक्त रहती हैं । इस स्त्री स्वभाव का यहां बोधन किया गया है ॥। ६ ॥ इस प्रकार वाक् तथा सोम देवताओं के अधिकार में आ गये । देवताओं ने जिस वाक् को देकर गन्धर्वों से सोम खरीदा था वह वाक् और सोम दोनों देवताओं के अधिकार में आ गये । क्योंकि पारमेष्ठ्य सोम को तो उन्होंने गन्धर्वो को वाक् देकर खरीदा ही था और वाक् भी देवताओं के मधुर गीत व वाद्य को सुनकर उनकी ओर आ गई । जिस प्रकार पार्थिवप्राण देवताओं ने सोम को खरीद कर तथा परमेष्ठि लोक से पार्थिव देवताओं के पास आगत सोम से यज्ञ किया था उसी प्रकार आज यजमान भी क्रीत सोम से ही सोम याग करे, न कि बिना खरीदे हुए सोम से ॥। ७ ॥ प्रकृति मण्डल के प्राण देवताओं ने वाक् द्वारा ही सोम खरीदा है । अतः आज यजमान इस वैध यज्ञ में प्राकृतिक यज्ञ के अनुकरण पर निदानविधया वाक् द्वारा सोमक्रयण करता [ ३३४ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण इस वाक् के लिए आहुति देता है । उसी आहुति के प्रकार का निरूपण इस कंडिका में किया जा रहा है । अर्थात् यह यजमान ध्रुवापात्र में रखा हुआ घृत, जो कि प्रायणीय-याग में उपयोग में आने से बचा हुआ है उसे जुहुपात्र में चार बार लेकर और दर्श के साथ सोने की टिकिया को मोली से बांधकर, उस कुशा को प्राज्ययुक्त जुहू में रखकर सावधानी हुति दे । किन्तु यह ध्यान रखे कि सोने कीटि किया प्राहुति में न चली जाय । आहुति देते समय सोने की टिकिया इसलिए बांधी जाती है कि सारे पय की अर्थात् घृत की आहुति दूं । आाज्य ( घृत ) का कारण दूध है अतः पयः प्रकृतिक होने से यहां प्राज्य के लिए पयस् शब्द का प्रयोग लक्षणया कर दिया है । पय और हिरण्य दोनों अग्निरूप हैं । अतः समान - जन्मा हैं क्योंकि पय भी अग्नि रूप है अग्नि का रेत है क्योंकि जैसे अग्नि शुक्ल है वैसे दूध भी शुक्ल है । क्योंकि कृष्णा गाय का या कपिला गाय का दूध हो तो वह भी शुक्ल ही होता है तथा जब गाय से दूध दुहा जाता है उस समय उष्ण ( गर्म ) होता है और उष्णता अग्नि का धर्म है अतः दूध अग्नि का रेत है । इसी प्रकार हिरण्य भी अग्नि का रेत है इसी -लिए " अग्नेरपत्य प्रथमं हिरण्य " कहा जाता है । शतपथ ब्राह्मण के द्वितीय काण्ड में पय और हिरण्य दोनों की अग्निरूपता निम्न श्रुति वचनों के द्वारा बतलाई गई है । " अग्ने र्हि रेतः तस्माद् यदि रोहिण्यां शुक्लमेव भवति । अग्निसंकाशम् । अग्ने हि. रेतः । तस्मात् प्रथमदुग्धमुष्णं भवति । अग्नि हि रेतः - इति । अथ हिरण्यं संभरति । अग्नि र्ह वा प्रपोऽभिदध्यौ मिथुन्याभिः स्यामिति । ताः संब-भूव । तासु रेतः प्रासिञ्चत् । तद्धिरण्यमभवत् । तस्मादेतदग्नि संकाशम् । अग्ने हि रेत इति । पय और हिरण्य दोनों अग्नि के रेत है अतः समानजन्मा होने से हिरण्य को कुशा में बांध कर पकी आहुति देने से कृत्स्न पय की आहुति हो जाती है ॥ ८ ॥
वह अध्वर्यु “ एषा ते शुक्रतनूरेतद् वर्चस्तया संभव भ्राजं गच्छ " यह मन्त्र बोलता हुआ: सोने की टिकिया कुशा के साथ बांध देता है । अर्थात् हे शुक्र, यह वीर्यवान् हिरण्य प्रापका शरीर हैं और यह प्राज्य आपका तेज है । हे वाक्, आप इस हिरण्य व प्राज्य के साथ संगत हो जाइये और भ्राज की ओर जाइये । सोम ही भ्राज है अतः आप हिरण्य और आज्य से बलवान बनकर सोम की ओर जाइये । सोमापहरण बिना बल के नहीं हो सकता अतः आग्नेय हिरण्य और प्राज्य ( धृत ) के द्वारा गायत्री वाक् को सबल बना कर सोमापहरण के लिए सोम की ओर जाने की प्रार्थना की गई है ॥ ६ ॥
जिस प्रकार प्राकृतिक आग्नेय प्राण देवताओं ने पार्थिव वाक् सुपर्णी को इस सोम की ओर जाओ - इस प्रेरणा से प्रेरित कर पारमेष्ठय लोक में सोम की ओर भेजा था । उसी प्रकार आज यह यजमान निदानविधया सोमक्रयणी गायत्रीरूप वाक् को सोम लाने के लिए [ ३३५ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोनाख्यान ब्राह्मण प्रेरित करता हैं । उसको उपर्युक्त अर्थात् ८ वीं कण्डिका में प्रतिपादित आहुति के द्वारा तृप्त करता है और प्रीत सोमक्रयणी के द्वारा सोम को खरीदता है ॥ १० ॥
वह अध्वर्यु— " जूरसि धृता मनसा जुष्टा विष्णवे । तस्यास्ते सत्यसवसः प्रसवे तन्वो मन्त्रमशीय स्वाहा ॥ " इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ आज्य की आहुति देता है । याज्ञवल्क्य इस मन्त्र की व्याख्या स्वयं कर रहे हैं । प्रकृत काण्डिका में " जूरसि धृता मनसा " मन्त्र के इतने श्रंश की व्याख्या कर रहे हैं । अर्थात् “ जू ” इस वाक् का एक नाम है जैसा कि - जूराकाशे सरस्वत्यां पिशाच्यां यवने स्त्रियाम् " इस उक्ति के द्वारा अमरकोषकार भी बतला रहा है । यद्यपि अमरकोष में आकाश का नाम “ जू ” बतलाया है न कि वाक् का, किन्तु यहां आकाश से ऐन्द्री वाक् ही अभिप्रेत है । अर्थात् इस आकाशरूप रिक्त स्थान में सर्वत्र श्वानामक इन्द्र परिपूर्ण है । उस इन्द्र का नाम ही वाक् है । यह वाक् मन से धारण की हुई है । मन ही इस वाक् का आधार है क्योंकि वाक् व्यापार से पूर्व ऐसा कहो, ऐसा मत कहो - इत्याकारक मानस संकल्प होता है तभी वाक् का उच्चारण होता है । इसीलिए " यद्वै मनसा ध्यायति तद् वाचा वदति " ऐसा कहा गया है । पहले मन के द्वारा अचिन्तित वाक् अर्थहीन होती है, निरर्थक होती है । अर्थ के साथ उसका सम्बन्ध नहीं होता । इसी अभिप्राय से कहा है- धृता मनसा - इति ॥ ११ ॥
" धृता मनसा " के बाद का मंत्राश ' जुष्टा विष्णवे ' है । अर्थात् सोम आपसे प्रसन्न हैं-मन्त्र में विष्णु शब्द का अर्थ सोम है इसलिए - जुष्टा सोमाय - ऐसा अर्थ " जुष्टा विष्णवे " का किया है । मैं ( वाक् ) सोम की ओर जा रही है । अतः यह सोम उससे प्रसन्न हो जाय । पश्चात् “ तस्यास्ते सत्यः सवसः प्रसवे " - इस मन्त्रांश का उच्चारण करता है । अर्थात् सत्यस्वरूप आप सोम की ओर हमारे लिए जावें । आप हमारे लिए सोम लावें । यहाँ वाक् के लिए जाने वाली गायत्री वाक् सत्यस्वरूप अर्थात् केन्द्र से बद्ध है । क्योंकि सत्यवाक् केन्द्र से सम्बद्ध होती है अतः उसमें बल है । गायत्री वाक् ने बल से ही गन्धर्वों से रक्षित सोम का हरण किया था । इसके बाद " तन्वो मन्त्रमशीय स्वाहा " इस मन्त्रशेष का अध्वर्यु उच्चारण करता है अर्थात् आप इस प्रकार से सोम लाइये जिससे हमारे शरीर को शान्ति प्रदान कर सकें । जो यज्ञ की समाप्ति कर लेता है, वही शारीरिक शान्ति प्राप्त करता है क्योंकि यजमान यज्ञ करने जा रहा है यज्ञ समाप्त न होने तक उसे शरीर आदि का कुछ ध्यान नहीं रहता । उसका तो ध्यान यज्ञ समाप्ति पर लगा है और यज्ञ तभी हो सकेगा जब कि आप सोम लाकर प्रदान करेंगे इसी अभिप्राय को ध्यान में रखकर - तन्वो मन्त्रमशीय स्वाहा " इस मन्त्रांश का अध्वर्यु उच्चारण करता है ॥ १२ ॥
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण यह पहले बतला दिया गया है कि आज्याहुति के साथ कुशा में बँधे हुए सुवर्ण की प्राहुति नहीं देनी चाहिए । इसी की उपपत्ति इस कण्डिका में बतलायी जा रही है । वह श्रध्वर्युं आज्य की माहुति के समय कुणा से बँधे हुए हिरण्य को निकाल लेता है । हिरण्य को अलग करता हुआ श्रध्वर्यु यजमान तथा उसके पुत्र - पौत्रादि में हिरण्य को स्थापित करता है । यदि अध्वर्यु आाज्य के साथ कुशा में बँधे हुए हिरण्य की भी आहुति दे देगा तो वह यजमान तथा उसके वंशजों से उसे पृथक् कर देगा और उसके वंश को हिरण्य की प्राप्ति नहीं होगी । हिरण्य सम्पत्ति का उपलक्षण है । हिरण्य सहित भाज्य की श्राहुति दे कर अध्वर्युं यजमान तथा उसके पुत्रपौत्रादि को सम्पत्ति - रहित निर्धन बना देगा । अतः हिरण्य की आहुति नहीं देनी चाहिए ॥ १३ ॥
हिरण्य को प्राहुति से अलग करता हुआ निम्नांकित मन्त्र का उच्चारण करता है " शुक्ल मसि चन्द्रमस्य मृतमसि वैश्वदेवमसि ' इति । हे हिरण्य, श्राप शुक्ल हो, अर्थात् चमक दार हो । सब को ग्राह्लादित करने वाले हो, आप अमरणधर्मा हो, नष्ट नहीं होते हो, सर्वदेवस्वरूप हो क्यों कि हिरण्य अग्निरेत होने से अग्निस्वरूप है और तेतीसों आग्नेय देवता भी अग्नि की अवस्था विशेष हैं । इसके अनन्तर जिस कुशतृरण से हिरण्य बँधा हुआ था, उस कुशतृरण को बर्हि में रख देता है और हिरण्य को एक डोर से बाँध देता है ॥ १४ ॥
इसके बाद अध्वर्यु प्रायणीय इष्टि से बचे हुए ध्रुवापात्रस्थ घृत को फिर चार बार जुहू में ले कर यजमान से " यजमान अन्वारभस्व " हे यजमान, हाथ से इसका स्पर्श करो - ऐसा कहता है । तदनन्तर देवयजनशाला के द्वार पर अर्थात् आहवनीय कुण्ड से पूर्व की ओर दक्षिण प्रदेश में सोमऋयणी गाय को अवस्थित करते हैं, खड़ी करते हैं । प्रकृतियाग में प्रारण-देवताओं द्वारा सोमकरण के लिए पहले से भेजी हुई इस सोमकयरणी को यजमान ने आज पुनः प्रेषित किया । सोमक्रयणी गौ निदानविधया वाक् है । प्राणदेवताओं ने वाक् के द्वारा ही गन्धर्वों से सोम का क्रयरण किया था । सोमकयरण का साधन होने से उसे सोमक्रयणी कहा गया था । किन्तु आज अपने वैध यज्ञ में सोमकयरण गाय से करता है अतः निदानविधया सोमक्रयण - साधन यह गौ वाक् ही है । इसी को यजमान ग्राज सोमऋण के लिए प्रेरित करता है और इस बृप्त सोमक्रयणी गाय के द्वारा सोम का क्रयरण करता है । ग्रर्थात् जिस तरह प्राण - देवताओं ने आहुति से वाक् को तृप्त करके पारमेष्ठ्य सोम को लाने को भेजा था उसी प्रकार आज यह यजमान इस वैध यज्ञ में सोमक्रयणी गाय को, निदानविधया वाक् को, आहुति से तृप्त कर, सोमक्रयण के लिए इसे प्रेषित करता है और उसके द्वारा सोम खरीदता है । प्राणदेवताओं ने कब और किस प्रकार प्राहुति द्वारा तृप्त वाक् को पारमेष्ठ्य सोम को लाने के लिए भेजा था, यह बात सामान्य पुरुषों से तिरोहित थी । यजमान [ ३३७ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण सोमक्रयरण के लिए सोमक्रयणी गाय को प्रेषित करता हुआ, देवयजन - शाला के द्वारों को बन्द करता हुआ, प्राण देवताओं द्वारा सोमक्रयण के लिए वाक् को भेजने की उसी प्रक्रिया का अभिनय करता है जो सामान्य मनुष्य के लिए अज्ञात है । तत्पश्चात् देवयजन - शाला से बाहर आकर निदानेन वाग् रूप उस सोमक्रयणी की निम्न मन्त्रों से स्तुति करता है— " चिदसि, मनासि, घीरसि, दक्षिणासि, क्षत्रियासि यज्ञियास्यदितिरस्युभयतः शीर्णी सानः सुप्राची सुप्रतीच्येधि मित्रस्त्वापदेवघ्नीतां पूषाऽध्वनस्पात्विन्द्रायाध्यक्षाय । श्रनु त्वा माता मन्यतामनुपिता अनुभ्राता सगर्भ्योऽनुसखा सयूथ्यः । सा देवि देवमच्छे हि इन्द्राय सो-मम् रुद्रस्त्वावर्तयतु, स्वस्ति सोमसखा पुनरेहि । " भगवान् याज्ञवल्क्य ने इन्हीं दोनों मन्त्रों की व्याख्या आगे की १६ वीं कण्डिका से २० वीं कण्डिका तक की है । जैसे " चिदसि ".......... । चित् मन को कहते हैं अतः “ चिदसि " का अर्थ है मन द्वारा ज्ञात अर्थ का ही वाक् अनुवाद करती हैं अर्थात् मनोभावों को बा ही प्रकाशित करतो है । यदि वाक् न हो तो मन कुछ भी नहीं कर सकता, उसके भाव कभी पूरे नहीं हो सकते । अतः हे सोमक्रयणी वाक्, आप: चेतनावस्थापन्न हैं । श्रीर यही वाक् " मनसि " अर्थात् मननशीला भी है क्यों कि वाक् के बिना मनन नहीं होता । मन से मनन करते समय सूक्ष्म उच्चारणरूप वाक् रहती है । इसीलिए वाक्यपदीयकार भर्तृहरि ने कहा है - " न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते'- अर्थात् ऐसा कोई ज्ञान नहीं है जिसमें शब्द का सम्बन्ध न हो । “ धीरसि ’ ' ' । हे वाक् आप धी हैं । अर्थात् विचारों को प्रकट करने का साधन भी आप ही हैं । संसार में जीवन की इच्छा वोले अपना प्रत्येक विचार वाक् द्वारा ही प्रकट करते हैं । तात्पर्य यह है कि वा तीन प्रकार की होती है - प्रथम वाक् अनुवचन से सम्बन्ध रखने वाली है, जैसे आचार्य शिष्य को महाभारत पढ़ाते हुए कहते हैं - भगवान् पाणिनि का यह अभिप्राय है, यह मत है, यही अनुवचन है । क्यों कि इसमें दूसरे के द्वारा कही हुई वाक् का अनुवाद मात्र है । दूसरी वाक् प्रकाम वाक् है । अपनी प्रातिस्विक वाक् ही प्रकाम वाक् कहलाती है । अर्थात् हमारा यह मत है, हम यह कहना चाहते हैं, इस प्रकार की जो अपनी स्वतन्त्र वाक् है उसे ही प्रकाम वाक् कहा जाता है । तीसरी वाक् गाथा है । अर्थात् न जिस वाक् से कहने वाले का पता चले और न वह अपनी वाक् हो ऐसी वाक् को गाथा कहते हैं । आभाणक या कहावत का नाम ही गाथा है । आभाणक में अभिप्राय अपना होता है और वाक् किसी दूसरे अज्ञात व्यक्ति की होती है, जैसे " मान घटे नित ही घर जाये " यह उक्ति । इसके द्वारा कहने वाला अपना अभिप्राय प्रकट [ ३३८ |
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान- ब्राह्मणं करता है कि दूसरे के घर हमें हमेशा नहीं जाना चाहिए | परन्तु इसके समर्थन के लिए जो ' मान घटे नित ही घर जाये ' यह उक्ति है वह किसी श्रज्ञात पुरुष की है । इस प्रकार तीन ही प्रकार की वाक् है - १ अनुवचनरूप २ प्रकामवादरूप ३ गाथारूप । अर्थात् मनुष्य अपने विचारों को इन तीन प्रकार की बाकू से ही प्रकट करता है । " दक्षिणा सि "....। यह वाक दक्षिण प्रर्थात् परच्छन्दानुवर्ती अर्थात् दूसरे के अधीन है । यह वाक् सदा मन के अधीन रहती है । ग्रतः कहा है, हे वाक्, आप दक्षिणा हैं । मन् परतन्त्र है । तथा वाक् द्वारा सोम प्राप्त होता है । सोम से याग होता है और याग मैं ऋत्विजों को दक्षिणा मिलती है । अतः परम्परया वाक् के दक्षिण साधन होने से भी वाक् को दक्षिणा कहा गया है । “ क्षत्रियासि, यज्ञियासिं …….। हें वाक् । ग्राप क्षत्रियां हैं, क्यों कि ग्रापमें शासनश क़्ति है । वाक् से ही शासन होता है । शासन करना क्षत्रिय का धर्म ह अतः वाक् को क्षत्रिया कहा गया है । यह वाक् यज्ञियां भी है क्यों कि मन्त्रोच्चारण - रूप वाक् के बिना यज्ञानुष्ठान सम्भव नहीं है अतः इस वाक् को यज्ञिया कहा गया है । " प्रदितिरसि उभयतः शीर्णी हे वाक्, ग्राप दोनों श्रोर मस्तक रखने वाली दि हो । अखण्डनीय हो । तात्पर्य यह है कि वाणी नित्य है उसका कभी नाश नहीं होता और तर्कों द्वारा सत्य को मिथ्या तथा मिथ्या को सत्यं सिद्ध कर देना वाक् का ही कार्य है । सत्य को मिथ्या तथा मिथ्या को सत्य सिद्ध करना ये ही उस वाक् के दो मस्तक हैं । बाक ही पूर्व-पक्ष को अपरपक्ष अर्थात् सिद्धान्त - पक्ष बना देती है तथा अपर अर्थात् सिद्धान्त पक्ष को पूर्वपक्ष बना देती है । गौण को प्रधान तथा प्रधान को गौण बना देना वाक् का ही काम है । अतः वाक् को उभयतः शीर्णी कहा गया है ॥ १६ ॥
F १७ वीं कण्डिका में प्रथम मन्त्र के " सा नः सुप्राची सुप्रतीची एधि " की व्याख्या की गई है । स नः सुप्रतीची एधि का अर्थ है - वाक्, आप हमारे यज्ञ के लिए पारमेष्ठ्य सोम की ओर अभिमुख होइए । सुप्रतीची वा एंधि " का अर्थ है कि ग्राप उस सोम के साथ पुनः हमारे पास आइए ॥१७ ॥
१८ वीं कण्डिका में " मित्रस्त्वा पादे वध्नीताम् " इस मन्त्रांश की व्याख्या की है । हे वाक | मित्र देवता आपके पैर बाँध दे । रज्जु से बाँधना वरुणदेवताक है, ग्रासुर है । ग्रसुर भाव का प्रवेश यज्ञ का नाश है । और यदि इस वाक् क नहीं बाँधते हैं, संयत नहीं करते हैं तो यह वाक् उन्मर्याद हो जाती है और यज्ञ में उन्मर्याद वाक् का उच्चारण करना भी मानुष भाव के प्रवेश द्वारा उसे अयज्ञीय बना देता है । अतः उसे संयत करना, बाँधना भी आवश्यक है । इन दानों प्रयाजनों की सिद्धि के लिए इस रस्सी से न बाँध कर मित्र ( सूर्य ) से बाँधते हैं । मूल में अभिहिता का अर्थ बद्ध है तथा अनभिहिता का अर्थ अबद्ध है ॥ १८ ॥
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण १६ व कण्डिका में पूषात्वाऽध्वनस्पातु – इस मन्त्रांश की व्याख्या है । वाक् पृथिवी से निकल कर सूर्य से ऊपर परमेष्ठी - लोक से सोम लाने के लिए जाती है । पृथिवी को ही मार्ग में उस वाक् की रक्षा का भार सौंपते हैं ता कि सब पदार्थों का पोषण करने के कारण पूषारूप यह पृथिवी मार्ग में वाक् की रक्षा करे । सभी बाधाएं पृथिवी पर ही आती हैं यदि यह पृथिवी वाक् की रक्षा का भार अपने श्राप ले लेती है तो उस पर किसी प्रकार की प्रापत्ति नहीं आ सकती । इस अभिप्राय से " पूषात्वाऽध्वनस्पातु " कहा गया है ॥१६ ॥
२० वीं कण्डिका में शेष सारे मन्त्र की व्याख्या की गई है । इसमें " इन्द्रायाध्यक्षाय " इस श्रंश की व्याख्या करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि पृथिवी इस सोमकयरणी वाक् की रक्षा केवल हमारे लिए ही नहीं करे अपितु इस वाक् के अध्यक्ष अर्थात् अधिपति इन्द्र की शोभनता अर्थात् सत्ता के लिए भी इस वाक् की रक्षा करे । तात्पर्य यह है कि वाक् आकाश को कहते हैं और ग्राकाश श्वा नामक इन्द्र से परिपूर्ण है । वह इन्द्र ही इस आकाश रूप वाक् का स्वामी है, अधिपति है । इन्द्र का अस्तित्व बिना वाक् के नहीं रह सकता । आकाश - रूप वाक् के आधार पर ही तो इन्द्र रहता है । अतः उस इन्द्र की सत्ता के लिए पृथिवी इस वाक् की रक्षा करे । इसी अभिप्राय से " स्वाध्यक्षाऽसत् " यह कहा है । तदनन्तर " अनु त्वा मातामन्यतामनुपिताऽनु भ्राता सगर्भ्योऽनुसखा सयूध्यः ॥ " इस मन्त्रशेष की व्याख्या की जा रही है । अर्थात् हे सोमक्रयणी वाक्, माता, पिता, सहोदर भाई, सजातीय तथा मित्र, ( सोम लाने के लिए जाती हुई ) तुम को अनुमति प्रदान करें । यहां निम्न श्रुति के आधार पर माता से पृथिवी, पिता से द्युलोक तथा भ्राता से वसु का ग्रहण है, जैसा कि श्रुति बतला रही है-" द्यौष्पितः पृथिवी मातरध्र गग्ने भ्रातर्वसवो मृळता नः ” । विश्व आदित्या दिते स जोषा अस्मभ्यं शर्म बहुलं वियन्त । ऋ ( मं ६।५१।५ ) अर्थात् जन्म के साथी माता, पिता, भ्राता, इत्यादि से अनुमत हो कर वाक् सोम लाने के लिए जाए । इसके बाद " देवि देवमच्छेहि " इस मन्त्रशेष का अर्थं बतलाया जा रहा है कि वह वाग्देवो सोम देवता की ओर जाती है । यहाँ देवी से वाक् का तथा देव से सोम का ग्रहरण है । इसीलिए इसकी व्याख्या करते हुए मूल में " देवी ह्य ेषा देवमच्छेहि यद् वाक् सोमम् " यह कहा गया है । तत्पश्चात् " इन्द्राय सोमम् " इस मन्त्रभाग की व्याख्या की जा रही है । अर्थात् इन्द्र यज्ञ के देवता हैं अतः प्राप इन्द्र के लिए सोम ला रही हैं न कि हम प्रारण देवता-श्रों के लिए । तदनन्तर " रुद्रस्त्वाऽऽवर्तयतु " इस मन्त्रभाग की व्याख्या की जा रही है । ग्रर्थात् रुद्र पशुओं का देवता, अवरोध करने वाला है । उस रुद्र से प्रार्थना की जाती है कि वह रुद्र देवता तुम्हारा सोम लाने के लिए जाते समय अवरोध न करे, तुम्हें सकुशल लौटा दे । अर्थात् वह तुम्हारी हिंसा न करे । इसके पश्चात् " स्वस्ति सोमसखा पुनरेहि ” इस मन्त्रभाग [ ३४० ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शेतपथं ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण की व्याख्या की जाती है । अर्थात् हे वाक्, आप सोमसखा बन कर, सोम के साथ कुशलता-पूर्वक हमारे पास पुनः आएँ ॥ २० ॥
भगवान - याज्ञवल्क्य कहते हैं कि जैसे सृष्टि के प्रारम्भ में प्रारण - देवताओं ने सोम लाने के लिए इस वाक् को भेजा था और वह सोम लेकर देवताओं के पास लौट आई थी, उसी प्रकार यह यजमान आज यज्ञार्थ सोम लाने के लिए निदानविधया वाग्रूप इस सोमऋयणी गाय को भेजता है और वह सोम के साथ पुनः यजमान के पास लौट आती है ॥ २१ ॥
सृष्टि के प्रारम्भ में जैसे सोमक्रयणी वाक् को प्राणदेवताओं ने अपनी ओर बुलाया था और वह गन्धर्वों को छोड़ कर देवताओं की वीरणाध्वनि से प्रसन्न हो कर देवताओं पास आ गई थी, उसी प्रकार यजमान भी आज वीणास्वर के समान मधुर वाणी से उस सोमऋणी गाय को अपनी ओर बुलाता है और वह यजमान की ओर लौट आती है । निदानेन वागुरूप इस सोमक्रयणी गाय को अध्वर्यु आदि ऋत्विक् उसे उत्तर की तरफ मुख करके खींचते हैं क्योंकि उत्तर दिशा मनुष्यों की है और यजमान मनुष्य है । अत: उसकी भी उत्तर दिशा ही है । इसलिए उसे उत्तर की ओर मुंह करके खड़ी करते हैं ॥२२ ॥
[ विज्ञान भाष्य ] प्रायणीय इष्टि द्वारा प्राकृतिक श्रदिति, पथ्यास्वस्ति, अग्नि, सोम, सवितात्मक पात यज्ञ को श्रात्मसात् करके यजमान सोमयज्ञ का अधिकारी बन गया । प्राकृतिक यज्ञस्वरूप को पह-चाने बिना एवं आत्मसात् किये बिना सोमयज्ञ करना सर्वथा व्यर्थ है । अतएव दीक्षणीयेष्टि - प्रदि दीक्षाकवत् प्रायणीय को भी हम अधिकार - समर्पणरूपा दीक्षा में शामिल कर लेते हैं । अधिकार-समर्पणरूपा प्रायणीय इष्टि समाप्त हो चुकी; अब सोमयज्ञ की कर्तव्यता प्रारम्भ होती है । पूर्व के ब्राह्मणों में हमने बतलाया है कि सोमयाग में दीक्षा, सुत्या, उपसत्, ये तीन प्रधान कर्म हैं । तीनों में से दीक्षाकर्म समाप्त हो चुका । अब सुत्याकर्म का प्रारम्भ होता है । सुत्या कहते हैं सवन को, सवन कहते हैं अग्नि में सोम की प्राहुति डालने को । चूंकि सुत्या में सोम की आवश्यकता पड़ती है प्रतएव सर्वप्रथम सोमक्रयण किया जाता है । सोम खरीदा जाता है । सोम की लताएं हुआ करती हैं । इसके कुल १५ ही पत्ते होते हैं । जैसे फासफोरस अन्धकार में चमका करता है उसी प्रकार सोम भी अंधेरे में चमका करता है । प्राकृतिक सोम से ही वल्ली - सोम की पुष्टि होती है । प्राकृतिक सोम के अधिष्ठाता चन्द्रमा हैं । चन्द्रमा एक - एक कला के हिसाब से बढ़ते रहते हैं । बस ज्यों - ज्यों इनकी एक - एक कला बढ़ती है त्यों - त्यों उस सोमलता में कला के क्रम से एक - एक पत्ता बढ़ने लगता है । आखिर १५ वीं कला में जा कर जब चन्द्रमा पूर्णकलोपेत हो जाता है तो उस दिन अर्थात् पूर्णिमा को उस वल्ली में भी १५ पत्ते हो जाते हैं । बस दूसरे दिन से ज्यों - ज्यों चन्द्रमा क्षीण होता जाता है त्यों - त्यों एक - एक पत्ता उस वल्ली का भी झड़ता जाता है । इस प्रकार १५ दिन बाद सारे पत्ते झड़ जाते हैं । यह क्रम अनवरत चला करता है । सोम एक प्रकार का मादक पदार्थ है । जैसे असुर लोग वारुणी पिया करते थे उसी प्रकार भुवन स्वर्गवासी देवता सोम पिया करते थे । संसार में [ ३४१ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण जितने भी मादक पदार्थ हैं वे सब ही करीब - करीब मस्तिष्क - शक्ति को नष्ट कर देते हैं । परन्तु सोम में यह बात नहीं है । सोम मादक होते हुए भी शरीर के सारे रोगों को नष्ट कर बुद्धि को तीव्र कर देता है । इसीलिए इसे औषधियों का स्वामी कहा जाता है । अतएव वैज्ञानिक क्षेत्र के अधिष्ठाता ब्राह्मण इसे अपना राजा मानते हैं । इसीलिए - " सोमो अस्माकं ब्राह्मणानां राजा " यह कहा जाता है । यह सोमलता पृथिवी मण्डल भर में सिर्फ तीन ही पर्वतों पर होती थी - मुञ्जवान्, शर्याणवत और वसोर्धारा (? ) इन तीनों पर्वतों पर ही सोम सुलभ था । इसी सोम के बल से इन्द्र असुरों को परास्त किया करते थे । अतएव मसुर इस सोम को बार - बार नष्ट किया करते थे । अन्त में प्रकृति देवी के कोप से सोम के रक्षक चन्द्रमाने गुरुपत्नी तारा का अपहरण कर सोमनाश में असुरों को मदद पहुंचा कर असुरों द्वारा सारे सोम का विध्वंस करा डाला, जिसका कि विस्तृत विवेचन " अत्रिरुषाति " में किया गया है । सोम ही देवताओं का बल था । इसके नष्ट होते ही सारे देवता नष्ट हो गये । आज सर्वत्र असुरों का ही राज्य हो रहा है । सोम कहां पर था, सोम में क्या - क्या गुण थे इत्यादि बातों का विस्तृत विवेचन श्री गुरुप्रणीत " इन्द्र विजय " नामक ग्रन्थ के प्रार्थदासीय प्रकरण में देखना चाहिए । हमें सिर्फ बतलाना यहीं है कि यह सोम शर्याणवत् और मुञ्जवान् और वसोर्धारा में ही होता है । यह पर्वत ईरान प्रदेश में है । " इस ईरान का प्राचीन नाम श्रार्यायरण है । वरुण और इन्द्र के कलह के कारण वैदिक काल में इस भारतवर्ष के प्रायविर्त श्रीर आर्यायण ये दो विभाग कर डाले गये थे । आर्यावर्त की प्रजा इन्द्र को अपना राजा मानती थी । प्रार्यायण की प्रजा वरुण को अपना अधिपति मानती थी । इन्द्र ही यज्ञ के अधिष्ठाता थे । अतएव आर्यावर्त में ही यज्ञविद्या का प्रचार था । यज्ञ में सोम की आवश्यकता पड़ती थी - एवं सोम होता था आर्यायण में अर्थात् ईरान के मुजवान शर्याणवतादि पर्वतों में, अतएव उस समय वहां से सोम लाने की व्यवस्था कर दी गई थी । आर्यायण से - आर्यावर्त में सोमवल्ली को लाने के लिए एक खास जाति नियत थी, वही सोमवल्ली को आर्यावर्त में लाया करती थी उस जाति के अलावा और कोई भी सोम नहीं ला सकता था । यह सोम यहां आ कर बिका करता था । सोम के आने के दिन भी नियत थे । जिस समय सोम यहां आता था उस समय सर्वत्र कोलाहल मच जाता था । जैसे राजा की सवारी देखने के लिए प्रजाजन दौड़ा करते हैं उसी प्रकार इस सोम को देखने के लिए हजारों मनुष्यों की भीड़ हो जाती थी । आर्यावर्त वालों की दृष्टि में सोम की बहुत ही प्रतिष्ठा थी क्योंकि इसके बिना यज्ञ हो ही नहीं सकता था एवं यज्ञविद्या ही इन लोगों का सर्वस्व था । जिस समय सोम बिकने के लिए आता था उस समय यज्ञाधिष्ठाता ब्राह्मरंग लोग सोम को खरीदा करते थे । खरीद कर गाजे - बाजे के साथ अपने घर लाया करते थे । इस प्रकार प्राचीन समय में देवता लोग, वैज्ञानिक महर्षि, यज्ञ के लिए सोम खरीदा करते थे । वे देवता सोम को खरीद कर ही यज्ञ किया करते थे । यदि उनके पास पहले का सोम रहता था तो उसे काम में न लेते थे अपितु जब यज्ञ करते तभी वे सोम खरीदते थे । खरीदे हुए सोम को ही यज्ञ में शामिल किया जाता था " यह देवा प्रकुवंस्तत् करवा रिण " यह हमारा सिद्धान्त है । चूंकि भुवन - स्वर्गनिवासी खरीद कर ही यज्ञ किया करते थे श्रतएव आज यह यजमान भी सोमयज्ञ के लिए: सोम खरीदता है । यज्ञ के लिए यजमान को [ ३४२ ]