Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 361–370
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 361–370
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तृतीय काण्ड ( अ ०२ ) शर्तपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्म अवश्य ही सोम खरीदना पड़ता है । खरीदे हुए सोम से ही यजमान यज्ञ कर सकता है क्योंकि भुवनं -त्रिलोकी के देवताओं ने खरीद कर ही यज्ञ किया था । यजमान तो इसलिए खरीदता है, परन्तु भुवन त्रिलोकी के देवता क्यों खरीदते थे? जब कि बिना खरीदे पास में बच रहने वाले सोम से भी यज्ञ हो सकता था । बस एकमात्र यह प्रश्न बच जाता है । इसी प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य प्राकृतिक प्राण - देवताओं के सोमक्रमण का रहस्य बतलाते हैं । वनत्रिलोकी के देवताओं ने प्रकृति के अनुसार यज्ञविद्या का आविष्कार किया था । प्राकृतिक प्राण देवता सोम को खरीद करके ही सोमयज्ञ किया करते थे । अतएव उन देवताओं ने भी अपने वैध यज्ञ में सोम खरीद कर ही यज्ञ व्यवस्था कायम की थी । प्राणदेवता किस सोम को खरीदते हैं, कैसे खरीदते हैं एवं उनके यज्ञ का स्वरूप कैसा है यही इस सोमक्रयण आख्यान में बतलाया जाएगा । जो सोम आज देवताओं में मौजूद है, जिस सोम को आज देवता प्रतिदिन खाते हैं वह सोम सृष्टि के प्रारम्भ में द्युलोक में था । इस प्रकार सोम तो द्युलोक में था । और देवता इस पृथिवी मण्डल पर थे । एक दिन सारे देवताओं ने मिल कर एक सभा की और उसमें उन्होंने इच्छा प्रकट की कि कोई ऐसा उपाय होना चाहिए जिससे द्युलोकस्थ यह सोम अपने पास आ जाय एवं उस प्रगत सोम से हम यज्ञ करें । इस प्रकार सोम लाने का विचार करके देवताओं ने सुपर्णी और कद्र नाम की दो माया उत्पन्न कीं । दूसरे को मोहित करने वाली शक्ति का नाम माया है । देवता जानते थे कि सांम की रक्षा में २७ गन्धर्व बैठे हैं । रात - दिन गन्धर्व उस सोम के पहरा लगा रहे हैं । अतएव आसानी से वे लोग सोम नहीं लेने देंगे अतः सोम को लेने के लिए ऐसों को भेजना चाहिए जिन्हें देखते ही गन्धर्व अपनी सुध - बुध भूल जाएं । बस, जहां गन्धर्व गाफिल हुए नहीं कि इन दोनों मायाओं ने सोमाहरण किया नहीं । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि सुपर्णी और कद्र कैसे सोम लाने में समर्थ हुई, इसका सारा प्रपञ्च " धिष्ण्या ब्राह्मण में बतलाएँगे " । सृष्टि के प्रारम्भ में जैसे - जैसे यह लीला हुई थी वह सब सौपर्ण - काद्रव प्राख्यान में वहीं बतलाएँगे । " दिवि वै सोम श्रासीत् । अथेह देवाःस्ते देवाश्रकामयन्ता नः सोमो गच्छेत्तेनागतेन यजेमहीति । तएते मायेऽसृजन्त सुपर्णी च कद्रं च तद्विष्ण्यानां ब्राह्मणे व्याख्यायते, सौपर्णीकाद्रवं यथा तदास ॥ १ ॥
सौपर्णीकाप्रवाख्यान का रहस्य विस्तृतरूपेण यद्यपि धिष्ण्याब्राह्मण में ही बतलाएँगे, तथापि सूक्ष्मरूपेण उसका रहस्य बतलाना यहां भी अनुचित न होगा । धिष्ण्याब्राह्मण में यह प्राख्यान इस प्रकार है: -सृष्टि के प्रारम्भ में द्युलोक में सोम था और इस पृथिवी लोक में देवता थे । देवतानों ने विचार किया कि कोई उपाय करना चाहिए जिससे वह सोम अपने पास आ जाए और उस आये हुए सोम से [ ३४३ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० २ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण हम सोमयज्ञ करें । यह विचार कर देवताओं ने सुपर्णी और कद्रू इन दो मायात्रों को उत्पन्न किया । ये सुपर्णी श्रौर कद्र दोनों सगी बहनें थीं । दोनों ही माया स्वरूप थीं । देवताओं ने अपनी कार्यसिद्धि के लिए सुपर्णी और कद्रू दोनों में परस्पर झगड़ा उत्पन्न करा दिया । उन दोनों में खूब ही झगड़ा शुरू हो गया । लड़ते - लड़ते उन्होंने एक दूसरे को कहा कि अपना झगड़ा यों नहीं समाप्त होगा । एक उपाय ऐसा है जिससे अपनी लड़ाई मिट सकती है । वह उपाय यही है कि अपने दोनों में से जो अत्यन्त दूर की वस्तु देख लेगी, वह हम दोनों में से एक की आत्मा को जीत लेगी । अर्थात् जिसे बहुत दूर क वस्तु दीख जायगी, हम दोनों में से एक उसी की मातहत बन जाएगी । यदि तुम ज्यादा दूर क वस्तु देख लोगी तो मैं तुम्हारी मातहत हो जाऊंगी और मैं देख लूंगी तो तुम्हें मेरी मातहती स्वीकार करनी पड़ेगी । यह बात सुपर्णी ने कही थी । कद्रू ने कहा- बहुत अच्छा, ऐसा ही होना चाहिए । इस प्रकार सुपर्णी औरकद्रू में परस्पर बाजी लग गई । कद्रू ने सुपर्णी से कहा कि सुपर्णी, तुम्हें ज्यादा दूर की वस्तु दीखने का ज्यादा घंमड है अतएव पहले तुम्हीं दूर की ओर देखो अर्थात् अपनी दृष्टि - शक्ति को दूर से दूर चला कर बतलानो - आकाश में क्या है? सुपर्णी ने श्राकाश की ओर देखकर कहा कि इस सलिल के उस पार अर्थात् वेदी - स्वरूप पृथिवीमण्डल के उस पार एक स्थाणु से अर्थात् काष्ठ के थूरण से एक सफेद घोड़ा बंध रहा है - उसे ही मैं देख रही हूं । मैं अनुमान करती हूँ शायद तुम भी उस सफेद घोड़े ही को देख रही हो । कद्रू ने कहा, हाँ, मैं अवश्य उस सफेद घोड़े ही को देख रही हूं, परन्तु मैं तुमसे इतना और अधिक देख रही हूँ कि उस घोड़े की पीठ पर काले बाल भी चिपक रहे हैं एवं वे बाल कभी - कभी वायु से इधर - उधर लहराने लगते हैं । जब कद्रू ने कहा कि मैं बाल भी देखती हूं जो हवा से हिल रहे हैं तो सुपर्णी ने कहा कि हम यों नहीं मान सकते, हम दोनों ही उठकर इस घटना को देखने चलें । देखें हम दोनों में कौन जीतता है । कद्रू बड़ी चालाक थी । उसने कहा, हम क्यों जाने लगे, तुम्हीं जाओ क्योंकि सन्देह तुम्हीं को है । हमें तो उस घोड़े के बाल हवा में हिलते हुए साफ दिखलाई दे रहे हैं, इसलिए तुम्हीं जाम्रो । तुम्हीं आ कर कह देना कि हम दोनों में से कौन जीता । सुपर्णी लाचार थी । अतएव वही उस स्थिति को देखने के लिए आकाश में उड़ी । वह सफेद घोड़ा वास्तव में वैसा ही था जैसा कि कद्रू ने बतलाया था । वास्तव में उसके काले बाल थे और वे हवा से हिल रहे थे । सुपर्णी वापस लौट आई और वापस आ कर उसने कहा कि कद्रू वास्तव में तुम्हीं जीतीं और मैं हारी । इस प्रकार सुपर्णी को शर्त के अनुसार कद्रू की दासी बनना स्वीकार करना पड़ा । एक दिन कद्रू ने सुपर्णी से कहा कि सुपर्णी मैंने शर्त के अनुसार तुम्हें खरीद कर दासी बना लिया है । यदि तुम दासीपने से मुक्त होना चाहती हो तो मुझे में निवास करने वाले देवताओं के लिए द्यौ में से सोम निकालो । उसी समय मैं तुम्हारा दासीपने से छुटकारा कर दूंगी । सुपर्णी कद्रू के अत्याचारों से तंग आ गई थी, अतएव उसने इस बात को सहर्ष स्वीकार कर लिया । उसने उसी समय छन्दों को उत्पन्न किया । उन छन्दों में से गायत्री छन्द ने द्युलोक से सोमापहरण किया । वह सोम द्युलोक में सोने की दो दीवारों के बीच में सुरक्षित रक्खा था अर्थात् सोने के किले में वह सोम रक्खा था । ये दोनों क्षुरमयी अर्थात् तीक्ष्णधार-वाले सोने के लम्बे - लम्बे खण्ड प्रतिपल उस सोम की निगरानी कर रहे थे । इतना ही नहीं अपितु गन्धर्व लोग भी अहर्निश उस सोम की रक्षा करते थे । क्या मजाल, उनकी रक्षा में से सोम निकल जाय । परन्तु गायत्री बहुत ही बलशालिनी थी । उसने बड़े वेग से अपने पंखों का झपाटा मार कर इन दोनों कुशियों में से एक कुशी को छिन्न - भिन्न कर दिया । [ ३४४ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण बस, उस टूटी हुई कुशी को गायत्री ने देवताओं को दे दिया । वही कुशी देवताओं की दीक्षा बनी । देवताओं ने उसी से दीक्षा ली । फिर दुबारा झपट्टा मारा । उससे दूसरी कुशी को भी तोड़ डाला एवं उसे भी देवताओं को दे दिया । वह देवताओं का तप बना । इस दूसरी कुशी से देवताओं ने तप किया । इस प्रकार जब गायत्री ने सोमापहरण कर उसे देवताओं को पिला दिया तो प्रतिज्ञानुसार कद्रू को सुपर्णी को दासीभाव से मुक्त करना पड़ा । बस, धिष्ण्याब्राह्मण में यही सौपर्णक आख्यान है । ऐतरेय ब्राह्मण में यह श्राख्यान इस प्रकार है— ब्राह्मणों का राजा सोम, सृष्टि के प्रारम्भ में द्युलोक में था । देवता और ऋषियों ने पर-स्पर विचार किया कि ऐसा कौन सा उपाय करें कि जिससे यह सोम अपने पास आ जाए । आखिर उन्हें एक तरकीब सूझ गई | उन्होंने अपने सवारी के घोड़ों से कहा कि हे छन्दो, हे अश्वो, तुम जाओ और द्युलोक में रक्खे हुए सोम को उठा लाओ । छन्दों ने कहा, जो श्राज्ञा । हम अभी आज्ञानुसार सोम लाते हैं । यह कहकर वे छन्द सुपर्ण बन गए अर्थात् बाज बन गए । चूंकि यह छन्द सुपर्ण बनकर अर्थात् बाज बन कर सोम लेने के लिए उड़े थे प्रतएव प्रख्यानवेत्ता महर्षि इस आख्यान को सौपर्ण नाम से व्यवहृत करते हैं । इस प्रकार वे छन्द सोम राजा को लेने के लिए द्युलोक की ओर उड़े । ऐतरेय महर्षि कहते हैं कि वे छन्द और घोड़े चार - चार पैरों के थे । प्रत्येक के चार - चार ही पैर थे । सोम को लाने के लिए जगती - त्रिष्टुप् और गायत्री ये तीन ही घोड़े गये थे । इन तीनों में से चार पैर वाली जगती ने पहले - पहल सोम को लेने के लिए द्युलोक की ओर प्रस्थान किया । परन्तु वह कृतकार्य न हो सकी । इतनी दूर जाते वह थक गई अतएव पूरी तौर से वह झपट्टा मारने में समर्थ न हो सकी । केवल सोम के दोनों प्रोर जो दीक्षा और तप थे उन्हीं को ला सकी एवं साथ में अपने तीन पैर और खो आई । सोम-रक्षक गन्धर्वो ने उसके तीन पंख काट लिए और उसे क्षत - विक्षत कर जमीन पर डाल दिया । इसके बाद नम्बर आया त्रिष्टुप् का । परन्तु वह छन्द भी कृतकार्य न हो सका । सोमरक्षक गन्धर्वो ने उसका एक पंख काट लिया और उसे जमीन पर डाल दिया । जब जगती और त्रिष्टुप् दोनों को ही देवताओं ने सोम लाने में असमर्थ देखा तो उन्होंने गायत्री से कहा, हे गायत्री, तुम्हीं सोम राजा को हमारे पास लाओ । गायत्री ने कहा- बहुत अच्छा मैं अवश्य ही आपके लिए सोम लाऊंगी परन्तु मेरे पीछे से श्राप सब लोग स्वस्तिपाठ अवश्य करते रहना जिससे कि मैं क्षेमकुशलपूर्वक सोम ले आऊं । जिस मन्त्र से स्वस्तिपाठ करना चाहिए वह " प्रेति श्रौर चेति " यही है । देवताओं ने इस बात को स्वीकार कर लिया, उन्होंने प्रेति चेति करना प्रारम्भ कर दिया । इधर गायत्री ने देवताओं के मंगलपाठ के बल से श्राकाश में उड़ कर बड़े जोर से एक झपट्टा मार कर सोमरक्षक गन्धर्वों को डरा दिया । उन्हें डरा कर मुख और पैरों से सोम को ले कर एवं साथ ही में जगती और त्रिष्टुप् के जो ४ र थे उन्हें भी लेकर देवताओं के पास आ गई । जब वह सोम ले कर देवताओं के पास आई तो जगती और त्रिष्टुप् दोनों ही गायत्री के पास प्रार्थना करने आये कि हे गायत्री, हमने सुना है कि आप हमारे पैर भी लाई हैं । हम उनके बिना बहुत ही दुःख पा रही हैं । अतएव आप कृपा कर हमारे पैरों को लौटा दीजिए । गायत्री ने कहा, यह नहीं हो सकता । अति परिश्रम से लाई हुई वस्तु तुम्हें नहीं लौटा सकती । इस प्रकार एक जगती [ ३४५ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण के पैर से और ३ त्रिष्टुप् के पैर से चार पैरों वाली गायत्री ग्राठ पैर वाली बन गई । इसीलिए " अष्टाक्षरा व गायत्री " यह कहाँ जाता है । जब जगती और त्रिष्टुप् निराश हो कर जाने लगीं तो गायत्री ने कहा कि अच्छा, पैर तो हम तुम्हें वापस नहीं लौटा सकते यदि तुम चाहो तो हमारे में शामिल हो सकती हो, " भागते चोर की लंगोटी ही भली " के अनुसार जगती और त्रिष्टुप् ने इसे ही गनीमत समझा । दोनों गायत्री में शामिल हो गईं । त्रिष्टुप् के तीन पैर भी इसी अष्टाक्षरा गायत्री में शामिल हो गये । इसीलिए त्रिष्टुप् को ११ अक्षर की कहा जाता है एवं एक पैर जगती का मिल गया प्रतएव जगती को १२ अक्षर का बतलाया जाता है । इसी अभिप्राय से कथा का उपसंहार करते हुए महर्षि महीदास कहते हैं-" ततो वा अष्टाक्षरा गायत्र्यभवत् । एकादशाक्षरा त्रिष्टुप् द्वादशाक्षरा जगती " ॥ ( ऐ ० ब्रा ० १३।५।२८ ) इसी वैदिक आख्यान का पौराणिक लोग निम्नलिखित प्रकार से वर्णन किया करते हैं-. दक्ष प्रजापति के कद्रू और विनता दो लड़कियां थीं । ये दोनों ही मरीचि के पुत्र कश्यप को ब्याही थीं । एक दिन कश्यप ने प्रसन्न होकर इनसे कहा कि वर मांगो । यह सुनकर कद्रू ने कहा कि महाराज! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरे एक हजार पुत्र हों यह वरदान दीजिए । कश्यप ने कहा-तथास्तु | उधर विनंता ने कहा कि महाराज! मुझे हजार पुत्र नहीं चाहिए, मुझे तो दो ही चाहिए | परन्तु वे दोनों ही कद्रू के हजार पुत्रों से अधिक बलशाली हों । कश्यप ने कहा - तथास्तु । समय पाकर कद्रू ने हजार अंडे दिए और विनता ने दो । इधर हजार ग्रण्डे थोड़े ही समय में फूट गए और उनसे हजार सर्प उत्पन्न हुए । परन्तु विनता के अण्डे तब भी ज्यों के त्यों ही रहे । यह देख विनता को क्रोध आया और उसने एक अण्डे को फोड़ कर दूर डाल दिया । उस अण्डे के भीतर जो प्राणी था अभी वह अधकच्चा ही था, उसका पूर्वार्द्ध भाग अर्थात् पैरों से ऊपर का हिस्सा ही परिपक्व हो पाया था । नीचे का हिस्सा बिल्कुल कच्चा था । अण्डे के फूटते ही क्रुद्ध होकर उसने कहा कि माता तुमने अल्प समय में ही अण्डे को फोड़ कर मेरा सत्यानाश कर डाला, अतएव मैं शाप देता हूं कि तुम्हें ५०० वर्ष तक कद्रू की दासी बन कर रहना पड़ेगा । परन्तु खबरदार अब उस दूसरे अण्डे का स्पर्श न करना, वह अपने आप फूट जाएगा । उस अण्डे से जो पैदा होगा वही तुम्हें दासीपने से मुक्त करेगा । यह कहकर वह श्राकाश में उड़ कर सूर्य का सारथी बन गया, जो कि आज अरुण नाम से प्रसिद्ध है । इसके पैर नहीं हैं । इधर समय पा कर वह दूसरा अण्डा फूटा और उससे महाबलशाली गरुड़ नाम का बच्चा उत्पन्न हुआ । गरुड़ की प्रख्यात बहुत ही होने लगी । इससे सर्पों की माता कद्रू को डाह होने लगा । उसने विनता को परास्त करने की एक तरकीब निकाली । उसने एक दिन बातों ही बातों में विनता से कहा कि विनता! बतलाओ, इन्द्र का उच्चैःश्रवा घोड़ा और उसका रंग कैसा है? विनता ने कहा- सफेद है । वास्तव में वह घोड़ा सफेद ही था । इस पर कद्रू ने कहा उसका सारा शरीर तो अवश्य ही सफेद है, परन्तु उसकी पूंछ काली है । विनता ने कहा, हर्गिज नहीं । यदि नहीं मानती हो तो शर्त ठहरा लो । कद्रू को यही चाहिए था । उसने [ ३४६ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण भट अपने पुत्रों को बुला कर चुपके कह दिया कि हे पुत्रो, तुम जा कर घोड़े की पूंछ से लिपट जाओ. नहीं तो मुझे ५०० वर्षं तक विनता की दासी रहना पड़ेगा । माता की आज्ञा पाकर सर्प गये और घोड़े की पूंछ से लिपट गये । आखिर विनता को हारना पड़ा और शर्तों के अनुसार उसे कद्रू की दासी बनना पड़ा । इतना ही नहीं अपितु विनता के पुत्र गरुड़ पर कद्रू के पुत्र सर्प हुकूमत करने लगे । एक दिन गरुड़ ने माता से दुःखी होकर कहा कि माता! क्या कारण है कि कद्दू और उसके पुत्र दोनों ही अपने ऊपर हुकूमत करते रहते हैं । विनता ने सारा किस्सा गरुड़ को सुना दिया और कहा कि पुत्र! यदि तुम अमृत लाकर कद्रू को दे सकते हो तो मैं इस दासीपने से छुटकारा पा सकती हूं । इतना और समझ लेना चाहिए कि सर्प गरुड़ पर सवार हो कर चला करते थे । कहना यही है कि गन्धर्वों की रक्षा में एवं इन्द्र की रक्षा में रखने हुए अमृत को गरुड़ छीन लाए । परन्तु इन्द्र ने उनसे यह शर्त कर ली थी कि. तुम इसे पृथिवी - लोक में अपने को सेवा भाव से मुक्त करने को ले अवश्य ही जा सकते हो परन्तु हम उसी समय उसे उठा लायेंगे । ऐसा ही हुआ । मृत को पा कर विनता मुक्त हो गई । उधर इन्द्र आँख चुरा कर अमृत को उठा ले गए । तब से गरुड़ सर्पों के वैरी हो गए । सर्पों को पाना ही गरुड़ का एकमात्र पेशा रह गया । हमने सूक्ष्मरूपेण यह कथा बबलाई है । पुराण में बहुत विस्तार से इसकाः । वर्णन किया गया है । कहना यही है कि इस प्रकार सोम का अपहरण हुआ था । ये तीनों ही कथाएं बिलकुल झूठी बनावटी समझनी चाहिए-उपायाः शिक्षमाणानां बालानामुपलालनाः सत्ये वर्त्मनि स्थित्वा ततः सत्यं समीहते ॥ ( भर्तृहरि वाक्यपदीयम् ) इन झूठी कथाओं की रचना प्राकृतिक विज्ञान को समझाने के लिए की गई हैं । पूर्वकथा से प्राकृतिक विज्ञान बतलाया गया है जिसे देखकर भारतीय महर्षियों की बुद्धि पर महा - प्राश्चर्य होता है । आख्यान का सारा रहस्य बतलाना असंभव है । इस प्रकरण में इसका केवल दिग्दर्शन मात्र कर दिया जाता है । इसे देख कर एवं समझ कर पुराण के प्रख्यानों के ऊपर आरोप करने वाले तथा इन्हें पोपलीला कह कर सम्बोधन करने वाले आधुनिक विद्वान् अवश्य ही शिक्षा लेंगे । इस आख्यान का रहस्य बतलाएँ उसके पहले प्रख्यान सम्बन्धी कुछ परिभाषाओं से परिचय प्राप्त कर लेना आवश्यक होगा । बिना परिभाषा ज्ञान के इस रहस्य का समझना कठिन ही नहीं अपितु असंभव है । सृष्ट, प्रविष्ट, प्रविविक्त - ब्रह्म के ये तीन स्वरूप माने जाते हैं । ब्रह्म व्यापक है, शान्त है, पूर्ण -स्वरूप है । इस व्यापक ब्रह्म को ही वैदिक परिभाषानुसार " आभू " कहा जाता है । यह आसमन्तात् व्यापकरूपेण रहता है, अतएव इसे " प्रभु " कहा गया है । इस प्रभू ब्रह्म के साथ - साथ ही एक तथ्य अविनाभूतेन और रहता है, जिसका नाम है " अभ्व " । इसी अभ्व को वैदिक परिभाषा में ', तुच्छ " शब्द से भी व्यवहृत किया जाता है, इसीलिए " तुच्छेनाभ्वपिहितं यदासीत् " यह कहा गया है, प्रभू का ही दूसरा नाम है रस एवं अभ्व का दूसरा नाम है बल । इस रस बल - समष्टि का नाम ही ब्रह्म है । " एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म " इस श्रुति का विरोध नहीं समझना चाहिए । श्रुति तो नानाभाव का खण्डन [ ३४७ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यानं ब्राह्मण करती है एवं तुम रस और बल भावद्वय को ब्रह्म बतलाते हो — इससे चौंक नहीं पड़ना चाहिए । इसके साथ बल के रहने पर भी अद्वैत भाव में कोई बाधा नहीं पड़ती है । सत्ताभेदेन द्वैत व्यवहार होता है, वस्तुभेद से द्वैत व्यवहार नहीं होता । पगड़ी में वैज्ञानिक भाव से देखने पर सूत - रुई - मलमल - कपास वृक्ष-मिट्टी इत्यादि अनेक पदार्थ मानने पड़ते हैं । परन्तु पगड़ी है एक ही । इतने पदार्थों के रहने पर भी नानात्व व्यवहार नहीं होता । यदि नानात्व व्यवहार होता तो " पगड़ी है " की तरह ही सूत है, रुई है, कपास है, वृक्ष है, मिट्टी है - यह व्यवहार भी होता । परन्तु ऐसा व्यवहार नहीं होता । श्रनन्त वस्तुनों के रहने पर भी पगड़ी है यह एकत्व व्यबहार ही लोक - प्रसिद्ध है । इसमें एकमात्र कारण सना है । सत्ता सब की एक है । मिट्टी ही कपास बनी हुई है । कपास ही रुई बनी हुई है । इस प्रकार पूर्व - पूर्व पदार्थ की सत्ता से उत्तरोत्तर की सत्ता बन रही है । एक ही सत्ता सर्वत्र अनुस्यूत है । अतएव नानाभाव को मौका नहीं मिलता | अद्वैत का विरोध नहीं होता । ठीक इसी प्रकार बल के रहने पर भी " एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म " में कोई विरोध नहीं श्राता । बल की अपनी सत्ता नहीं है । रस- सत्ता से ही बल सत् है । घड़े की सत्ता मिट्टी की सत्ता से पृथक नहीं है । कटक - कुंडलादि की सत्ता सुवर्ण सत्ता से भिन्न नहीं है । अतएव बलों के रहने पर भी द्वैतभाव को मौका नहीं मिल सकता । इसी रस को अमृत कहा जाता है एवं बल को मृत्यु कहा जाता है । पुस्तक, टेबल की तरह श्रमृत- मृत्यु में आघाराधेय भाव नहीं है, यदवच्छेदेन रस है, अमृत है, तदवच्छेदेन बल है अर्थात् मृत्यु है । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है-श्रन्तरं मृत्योरमृतं मृत्यावमृतमाहितम् । मृत्युविवस्वन्तंवस्ते मृत्योरात्मा विवस्वति ॥ ( शत ० १०।५।२।४ ) अपि च इसी अभिप्राय से " तवन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्य बाह्यतः " यह कहा जाता है । अस्तु, हमें इस विषय में अधिक कुछ नहीं कहना । कहना केवल इतना ही है कि यह जो सर्वबल विशिष्ट रस है जो कि असीम है, अपरिचित है, जिसे कि परात्पर नाम से व्यवहृत किया जाता है- प्रविविक्त ब्रह्म कहलाता है । उसका सृष्टि से कोई सम्बन्ध नहीं है । " न कर्मणा वर्धते नो कनीयान् " यह इसी प्रविविक्त ब्रह्म के लिए कहा गया है । यह सृष्टि से छँटा हुआ रहता है, अलग रहता है अतएव इसे प्रविविक्त कहा जाता है । इसी व्यापक परात्पर प्रविविक्त ब्रह्म का कुछ हिस्सा मायाबल के कारण परिच्छिन्न हो जाता है । बस, इस परिछिन्न रस को ही " अव्यय " कहा जाता है । इसी का नाम प्रविष्ट ब्रह्म है । माया के घेरे में यह रस प्रविष्ट हो जाता है, परिच्छिन्न हो जाता है, अतएव इसे प्रविष्टब्रह्म कहा जाता है । एवं यही प्रविष्टब्रह्म पृथिवी, सूर्य, चन्द्रमादि स्वरूप में परिणत होता है, बस, ब्रह्म का जो हिस्सा पृथिवी प्रादि में परिणत हो गया है वही सृष्टब्रह्म है । सृष्ट ब्रह्म को कार्यब्रह्म कहा जाता है । प्रविष्टब्रह्म को निमित्त ब्रह्म कहा जाता है । प्रविविक्त को श्रालम्बनब्रह्म कहा जाता है । उदाहरणार्थ, सुवर्ण की एक डली पर दृष्टि डालिए । सूर्य की रश्मियां जब पृथिवी की पकड़ में श्रा जाती हैं तो वे सुवर्ण बन जाती हैं । पार्थिव प्राण की पकड़ में सूर्य - रश्मियाँ जब द्ध हो जाती हैं तो सुवर्ण का जन्म हो जाता है । सुवर्ण मिट्टी से बद्ध सूर्य की रश्मियां हैं इसीलिए हम भारतीय सुवर्ण को बहुत ही पवित्र मानते हैं । तो बस, सूर्य की जो रश्मियाँ सुवर्ण बन गई वह सृष्ट ब्रह्म है, कार्य ब्रह्म है, एवं इस सोने में जो गर्मी ऊपर से घुस पड़ी है जिससे कि सोना गरम हो रहा है वही [ ३४८ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण प्रविष्टब्रह्म है एवं बाकी बचा हुआ जो सौर ताप है वह प्रविविक्त ब्रह्म है । इन तीनों में से प्रविविक्त असीम है । वाङ्मनसागोचर है, अतएव शास्त्रानधिकृत है, एवं प्रविष्ट और सृष्ट दोनों ही परिच्छिन्न हैं अतएव इन दोनों का स्वरूप बतलाया जा सकता है । इस प्रविष्ट ब्रह्म को, जिसे कि हमने अव्यय पुरुष बतलाया है, आत्मा कहते हैं, एवं सृष्ट ब्रह्म को शरीर कहते हैं । आत्मा प्रविष्टब्रह्म है, शरीर सृष्टब्रह्म है । वही आत्मब्रह्म शरीर को बनाकर अर्थात् सृष्टरूप में परिणत हो कर श्राप उसके अन्तः प्रविष्ट हो जाता है । अतएव “ तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् " यह कहा जाता है - इस आत्मा को प्रजापति भी कहा जाता है । इस पुरुष प्रजापति की अक्षर और क्षर ये दो प्रकृतियाँ हैं । अक्षर उसकी पराप्रकृति है । क्षर अपराप्रकृति है । दोनों प्रकृतियों के साथ अविनाभावेन यह अव्यय पुरुष रहता है । पुरुष बिना प्रकृति के रह ही नहीं सकता । यह पुरुष प्रजापति अक्षररूपी कुम्हार से क्षररूपी मिट्टी द्वारा संसारस्वरूपी घर का निर्माण करता रहता है । अक्षर, क्षर का अर्थात् सृष्टि का निमित्त कारण है । अक्षर से ही सारी सृष्टियां उत्पन्न होती हैं एवं प्रक्षर में ही विलीन हो जाती हैं । अतएव कहा जाता है: -" यथा सुदीप्तात्पावकाद् विस्फुलिंगाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः ॥ तथाक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चंवापियन्ति ॥ ( मुण्ड ० उ ० २।१।१ ) अव्यय, अक्षर, क्षर, तीनों का स्वरूप गीता में विशदरूपेण बतलाया गया है । अतः वहीं देखना चाहिए | इनका विस्तृत विवेचन करना प्रकृत से दूर जाना है । यहां केवल इतना ही समझ लेना पर्याप्त होगा कि पूर्ण - बल - विशिष्ट रस का नाम परात्पर है एवं मायावच्छिन्न रस का नाम अव्यय पुरुष है । इस अव्यय पुरुष की अक्षर और क्षर ये दो प्रकृतियाँ हैं । इस प्रकृतिविशिष्ट पुरुष को ही प्रजापति कहा जाता है । इसी को ईश्वर कहते हैं । इस प्रकृति - विशिष्ट पुष की ही उपासना होती है । इसमें क्षर कार्यब्रह्म है, अक्षर काररण- ब्रह्म है । अव्यय आलम्बन - ब्रह्म है । इसी अव्यय के लिए कहा जाता है— एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् । एतदालम्बनं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ ( कठ ० उ ० १।२।१७ ) यह जो क्षरभाग है वह आत्मा, विकार और यज्ञभेदेन तीन प्रकार का है । इसके पहले इतना श्रीर समझ लेना चाहिए उस अव्यय की आनन्द, विज्ञान, मन, प्रा.ए, वाक् ये पांच कलाएँ है, अक्षर की ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि, सोम ये पांच कलाएँ है, एवं आत्मक्षर की भी वही पांच कलाएँ हैं जो कि अक्षर की पाँच कलाएँ हैं । अक्षर और क्षर उस अव्यय प्रजापति का शरीर है । इसमें अक्षर अमृतभाग है - क्षर मर्त्यभाग है । इसीलिए -" मधं वै प्रजापतेरात्मनो मत्यंमासीदर्द्धममृतम् ” ( ४० ब्रा ० ) यह कहा जाता है । क्षर है मर्त्य परन्तु अमृत अक्षर के साथ रहता है । अतएव यह मरने नहीं पाता । इसीलिए मर्त्य - स्वरूप होते हुए भी इसे प्रात्मक्षर कहा जाता है । नष्ट नहीं होने के कारण इस क्षर को [ ३४ ९ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० २ ) शतपथ ब्राह्मण [ ३५० ] सोमाख्यान ब्राह्मण उत्पन्न होते हैं, प्राहुति द्वारा अवस्था भेद से आत्मक्षर, जो कि अक्षर - संश्लिष्ट है आत्मक्षर कहा जाता है । यह क्षर उस अक्षर से उत्पन्न होता है । यही क्षर सारे वैकारिक जगत् का - यज्ञिय जगत् का प्रभव है अतएव तदपेक्षया इस अक्षर से उत्पन्न इस आत्मक्षर को • ब्रह्म कहा जाता है । इसीलिए " ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् " यह कहा जाता हैं । इस उत्तरोत्तर सृष्टि का कारण है एकमात्र इच्छा - बल । जब कि श्रानन्द :: विज्ञान, मन, प्राण, वाक् युक्त मन है उसी का यह इच्छा बल है । इच्छा का उक्थ वही मन है । " एकोऽहं बहु स्याम् " यह इच्छा अनवरत हुआ करती है । इच्छा के होते ही प्राण व्यापार होता है जिसे कि तप कहते हैं एवं तप के होते ही वाग् - व्यापार होता है । इसी वाग् व्यापार को श्रम कहते हैं । इस प्रकार इच्छा - तप - श्रम तीनों के एकीभाव से नई वस्तु उत्पन्न हो जाती है । इसीलिए सृष्टिप्रतिपादिका श्रुतियों में बार - बार प्रजापतिर्हवा इदलच एक एवास । सऐक्षत । स तपोऽतप्यत । सोऽश्राम्यत् - यह लिखा रहता है । इच्छा, तप, श्रम की समष्टि से ही नई सृष्टि होती है । इच्छा का अधिष्ठाता मन है । तप का अधिष्ठाता प्राण है । श्रम की अधिष्ठात्री क्षर वाक् हैं । इसी से सृष्टि होती है । इस मन - प्राण वाङ्मय श्रात्मा ही से सृष्टि होती है । श्रानन्द- विज्ञान- मनोमय आत्मा तो मुक्ति साक्षी है, एवं मन, प्राण, वाङ्मय श्रात्मा सृष्टि - साक्षी है । इसीलिए सृष्टिक्रम को लक्ष्य में रख कर कहा जाता है, “ स वा एष श्रात्मा वाङ्मयः प्राणमयी मनोमयः " । कहना प्रकृत में यही है कि मन, प्राण, वाङ्मय स्वरूप सृष्टि-( साक्षी आत्मा की प्रेरणा से अक्षर द्वारा इस आत्मक्षर में सर्वप्रथम विकारक्षर उत्पन्न होते हैं । . आत्मक्षर की ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि, सोम ये पांच कलाएँ है । इन पांचों से आप वाक्, अन्नाद, प्रन्न, ये पांच विकारक्षर उत्पन्न होते हैं । प्राण, ब्रह्म का विकार है । श्राप, विष्णु का विकार है; वाक्, इन्द्र का विकार है । अन्नाद अग्नि का विकार है । अन्न सोम का विकार है । ये पांचों ही स्वस्वरूप से अलग - अलग न रह कर पांचों ही पांचों में आहुत हो जाते हैं । अपञ्चीकृत प्रारण, आप, वाक्, अन्नाद, अन्न पञ्चीकृत हो जाते हैं । एक में एक के मिलने का नाम ही यज्ञ है । यहां पर विकारक्षर एक में एक मिल जाते हैं । अतएव हम इस प्रक्रिया को " यज्ञ " कहने के लिए तय्यार हैं । चूंकि सबमें सब की प्राहुति हो जाती है अतएव इस यज्ञ को " सर्वहुत " यज्ञ कहा जाता है । यज्ञों में सबसे पहला यज्ञ यही सर्वहुत यज्ञ है । गायत्री मात्रिकादि वेदत्रयी की ऋक्, यजु, साम की उत्पत्ति इसी सर्वहुत यज्ञ से होती है । अतएव " तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दान्सि जज्ञिरे तस्मात् " इत्यादि कहा जाता है । इस सर्वहुत यज्ञ से जो पांच क्षर उत्पन्न होते हैं वे यज्ञ द्वारा उत्पन्न होते हैं अतएव उन्हें यज्ञक्षर कहा जाता है । इस प्रकार एक ही क्षर, विकारक्षर और यज्ञक्षर इन तीन स्वरूपों में परिणत हो जाता है । पांचों ही यज्ञक्षर पञ्चीकृत हैं । प्राण, आप, वाक्, ग्रन्नाद अन्न प्रत्येक पांच - पांच हैं । इस प्रकार पञ्च यज्ञक्षरों के हिसाब से कुल २५ यज्ञक्षर हो जाते हैं । ये बचीसों के बचीस ही क्षराक्षर - विशिष्ट अर्थात् प्रकृति - विशिष्ट पुरुष - प्रजापति में रहते हैं । इन सब का आलम्बन यही श्रात्म प्रजापति है । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है-.
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बृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण [ ३५१ ] सोमाख्यान ब्राह्मण ( बृ ० आ ० ४।४।१७ ) 1
अस्मिन् पञ्च पञ्च जना प्रकाशश्च प्रतिष्ठितः ।
तमेव मन्य श्रात्मानं विद्वान् ब्रह्माऽमृतोऽमृतम् ॥ इति ॥
प्रत्येक यज्ञक्षर में यद्यपि पांचों हैं परन्तु पांचों में आधे हिस्से में एक रहता है और अवशिष्ट श्राघे में चारों रहते हैं । जैसे प्राण में जब चारों की आहुति होती है तो उस श्राघे मण्डल में प्राण रहता है एवं आधे में चारों रहते हैं । अतएव उस मण्डल का नाम प्रारण मण्डल ही हो जाता है । प्राधिक्यात् उसका यही नाम पड़ जाता है । इस प्रकार पञ्चीकृत पांचों यज्ञक्षरमण्डलों के प्राणमण्डल, आपोमण्डल, वाङ्मण्डल अन्नादुमण्डल और अन्नमण्डल ये नाम हो जाते हैं । परन्तु ध्यान रहे, प्रत्येक में पांचों हैं । बस इन पांचों मण्डलों को ही वैदिक परिभाषानुसार क्रमशः स्वयम्भूमण्डल,, परमेष्ठि मण्डल, सूर्यमण्डल, पृ पृथिवी-मण्डल, चन्द्रमण्डल कहा जाता है । यही पांचों विश्वसृट् नाम से व्यवहृत होते हैं । सबसे पहला मण्डल, स्वयम्भूमण्डल है । बाद में परमेष्ठीमण्डल है, बाद में सूर्य्यं मण्डल है । बाद में पृथिवीमण्डल है, अनन्तर • चन्द्रमण्डल है । ये पांचों दहरोत्तरभाव से स्थित हैं । अर्थात् एक के पेट में एक अर्थात् महिमामण्डल के पेट में दूसरा मण्डल है । स्वयम्भू महिमामण्डल में परमेष्ठि है । परमेष्ठि में सूर्य है । यही क्रम सर्वत्र " समझना चाहिए । इन्हीं पांचों मण्डलों में भूः भुवः स्वः महः जनः तपः, सत्य, यह सप्तलोक - व्यवस्था कायम की जाती हैं । पृथिवी भूर्लोक है । सूर्य स्वर्लोक है । पृथिवी श्रोर स्वः के बीच का जो अन्तरिक्ष है वही भुवर्लोक है एवं परमेष्ठी जनए - लोक है और सूर्य - परमेष्ठि के बीच का अन्तरिक्ष महलोंक है । स्वयम्भू सत्यलोक हैं । एवं स्वयम्भू - परमेष्ठि के बीच का श्रन्तरिक्ष तपोलोक है । इन्हीं पांचों में त्रैलोक्य-व्यवस्था है । पृथिवी, पृथिवी लोक है, सूय्यं स्वर्ग लोक है दोनों के बीच का अन्तरिक्ष लोक है । इस प्रकार पृथिवी से सूर्य तक पहली त्रिलोकी समाप्त हो जाती हैं । इस पहली त्रिलोकी को वेद में " रोदसी " - त्रिलोकी कहा जाता है । बाद में रोदसी को समझो पृथिवी और परमेष्ठि को समझो स्वर्गं । दोनों के मध्य - स्थान को समझो अन्तरिक्ष, जिसे कि हमने तपोलोक कहा था । बस, यह दूसरी त्रिलोकी है । इसका नाम क्रन्दसी - त्रिलोकी है । एवं क्रन्दसी को समझो पृथिवीं । स्वयम्भु को समझो स्वर्ग । मध्य - स्थान को समझो अन्तरिक्ष । यही तीसरी " संयति " नाम की त्रिलोकी है । इस प्रकार तीन त्रिलोकी हैं । यद्यपि तीन त्रिलोकियों के ६ लोक होने चाहिए थे – परन्तु सूर्य और परमेष्ठी दोनों पृथिवी और स्वर्ग बन जाते हैं अतएव ७ ही लोक रह जाते हैं । वैदिक परिभाषानुसार स्वर्ग को अर्थात् द्युलोक को पिता कहा जाता है एवं पृथिवी को माता कहा जाता है । जैसा कि श्रुति कहती है-द्यौर्वः पिता पृथिवी माता सोमो भ्राता दितिः स्वसा । विश्वष्टास्तिष्ठतेळयाता सु कम् ॥ ( ऋ ० १।१६१।६ ) चूंकि तीन ही पृथिवी हैं तीन ही द्यौ हैं -- इसी अभिप्राय से कहा जाता है— तिस्त्रो मातृ स्त्रीन् पितृन् बिभ्रदेक ऊर्ध्वस्तस्थौ नेमव ग्लापयन्ति । मन्त्रयन्ते दिवो अमुष्य पृष्ठे विश्वविदं वाचमविश्वमिन्वां ॥ इति ॥ ( ऋ ०१ । १६४।१० )
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण सारे प्रपञ्च से बतलाना हमें यही है कि विकारक्षरों के सर्वहुतयज्ञ से प्राणादि पांच यज्ञक्षर उत्पन्न होते हैं । इन पांचों यज्ञक्षरों में सबसे पहले प्रारणमण्डल की ही उत्पत्ति होती है । प्राण ही मौलिक वस्तु है । गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द, रहित जो एक मौलिक तत्त्व विशेष है उसी का नाम प्रारण है । इसी मौलिक तत्त्व को प्राण कहा करते हैं । वैदिक परिभाषानुसार इसी प्राण को ऋषि कहा जाता है । इस सृष्टि के प्रारम्भ में सृष्टि का मौलिक सत्य यज्ञक्षर स्वरूप यही प्राण रहता है । जैसा कि श्रुति कहती है-असद्वाऽइदमग्रश्रासीत् । तदाहुः किं तदसदासीदिति । ऋषयो वाव तेऽग्रेसदासीत् । तदाहुः तेऽॠषय इति । प्राणा वाऽऋषयस्ते यत् पुरास्मात् सर्वस्मादिदमिच्छन्तः, श्रमेण तपसारिषंस्तस्माद् “ ऋषयः ” ॥ ( श ० ब्रा ० ६।१।१।१ ) सृष्टि के पहले असत् के अलावा और कुछ न था । श्रसत् क्या था - पूछने पर श्रुति उत्तर देती है कि उस समय ऋषि ही असत् थे । ऋषि कौन थे— इसका उत्तर देती हुई श्रुति कहती है कि प्राण ही ऋषि थे । जिस वस्तु में प्राण रहता है उसे सत् कहा जाता है । " सामान्ये सामान्याभावः " के अनुसार प्राण में प्राण नहीं रहता अतएव प्राण को असत् कहा जाता है । बस, सृष्टि के पहले यही प्राणतत्त्व था । मौलिकतत्त्व किसी से उत्पन्न नहीं होता । अतएव इस प्राणमण्डल को ' स्वयम्भूमण्डल ' कहते हैं । इसी प्राणात्मक जगनिर्माता भगवान् स्वयम्भू से आगे की सारी सृष्टियाँ उत्पन्न होती हैं । सबसे पहले इस स्वयम्भू से पानी ही उत्पन्न होता है । पानी घर्षण से पैदा होता है । जब विजातीय अननानन्त ऋषियों का अर्थात् प्राणों का घषण होता है तो उससे पानी पैदा होता है । इस प्रकार स्वयम्भू से अर्थात् ऋषि प्राण से सर्वप्रथम पानी ही पैदा होता है । इसी सृष्टि प्रक्रिया को लक्ष्य में रख कर
भगवान् मनु कहते हैं-" आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् ।
प्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥
ततः स्वयम्भूर्भगवानव्यक्तो व्यंजयन्निदम् ।
महाभूतादिवृत्तौजाः प्रादुरासीत्तमोनुदः ॥
योऽसावतीन्द्रियग्राह्यः सूक्ष्मोऽव्यक्तः सनातनः ।
सर्वभूतमयोऽचिन्त्यः स एव स्वयमुद्बभौ ॥
सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुविविधाः प्रजाः अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत् ॥ ( मनुः स्मृति १५ - ८ ) [ ३५२ ]