Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 371–380

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 371–380

पृष्ठ 371

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तृतीय काण्ड ( श्र ० २ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मणं बस स्वयम्भू के बाद का जो प्रापोमयमण्डल है वही परमेष्ठिमण्डल कहलाता है । यह परमेष्ठि-मण्डल सूर्य्य से भी परस्थान में है । अतएव " परमेस्थानेसीदति " इस व्युत्पत्ति से इस प्रापोमय मण्डल को परमेष्ठिमण्डल कहा जाता है । इसके बाद फिर पानी में घर्षण होता है । पानी के घर्षण से अग्नि उत्पन्न होता है । महा - महा पोमय परमेष्ठि- मण्डल के बीचों - बीच यह अग्नि अपनी स्थिति कायम करता है । करते - करते यह अग्नि एकदम से प्रज्वलित हो पड़ता है । बस, इसी प्रज्वलित अग्नि का नाम सूर्य्य है । " तासु बीजमवासृजत् " में बीज शब्द से यही सूर्य्यं प्रभिप्रेत है । इसी सूर्य्यमण्डल को वाङ्मय मण्डल कहते हैं । इसी वाङ्मयमण्डल से ऋग्यजुः सामात्मिका त्रयीविद्या का प्रादुर्भाव होता है - श्रतएव यह सौरी वाक् वेदों की माता बतलायी जाती है । जैसा कि श्रुति कहती है-" वागक्षरं प्रथमजा ऋतस्य वेदानां माताऽमृतस्य नाभिः । सा नो जुषारगोपयज्ञमागादवन्ती देवी सुहवा मेऽस्तु " इसी अभिप्राय से ब्राह्मण श्रुति कहती है-( तै ० ब्रा ० २२८८५ ) " साया सा वाक् । असौ स श्रादित्यः । स एष मृत्युः, तद्यत्कचार्वा -चीनमादित्यात् सर्वं तन्मृत्युनाप्तम् । शतपथ: १० | ५ | १ | ४ ) ( यदेतन्मण्डलं तपति । तन्महदुक्थं ता ऋचः स ऋचां लोकः । अथ यदेत-चिप्यते तन्महाव्रत । तानि सामानि । स साम्नां लोकः । श्रथ य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषः सोऽग्निः । तानि यजूंषि । स यजुषां लोकः । सैषा त्रध्येव विद्या तपति । ( शतपथ १०।५।२।१-२ ) कहने का तात्पथ्यं यही है कि सूर्य्य वाङ्मय है इन्द्र का ही विकार वाक् है । एवं वाङ्मण्डल का नाम ही सूर्य्यं है । यह वाक् चार प्रकार की है । -- १ - सत्यावाक्, २- परमेष्टिनी वाक ३ - बृहती-वाक्, ४ - प्रनुष्टुप् वाक् । स्वयम्भू - मण्डल की जो वाक् है उसे ही सत्यावाक् कहते हैं । वेदत्रय समष्टि का नाम ही - वाक् है । स्वयम्भूमण्डल की जो वाक् है - वह ' ब्रह्म निःश्वसिता वाक् ' कहलाती है । इसी सत्यावाक् से परमेष्ठिनी वाक् उत्पन्न होती है । इसी का नाम ' ग्राम्भृणीवाक् है । सत्यावाक् का मैथुनी सृष्टि से कोई सम्बन्ध नहीं है । मैथुनी सृष्टि का प्रारम्भ आम्भृणीवाक् से ही होता है । पानी ही से सृष्टि उत्पन्न होती है । मैथुनी सृष्टि का मूल तत्त्व पानी है । संसार का स्वरूप पानी से बना हुआ है । अतएव " सर्वमापोमयं जगत् " यह कहा जाता है । पानी का संसार में व्याप्त होना परमेष्ठिनी ग्राम्भृणी वाक् का व्याप्त होना है । संसार की अपेक्षा से त्रिभुवन अधिष्ठातृ - यही ग्राम्भृणी वाक् है । पृथिवी, सूय्यं, चन्द्रमा, सारी रोदसी, त्रिलोकी, इस श्राम्भृगी वाक् के पेट में हैं । इसी प्राम्भृणीवाक् की महिमा बतलाते हुए वेद भगवान् कहते हैं— [ ३५३ ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण

अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः ।

श्रहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिद्राग्नी ग्रहमश्विनोभा ॥

श्रहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवेभिरुत मानुषेभिः ।

यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषि तं सुमेधाम् ॥

श्रहमेव वात इव प्र वाम्यारभमाणा भुवनानि विश्वा ।

परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना सं बभूव ॥

सोमाख्यान ब्राह्मण ( ऋग्वेद म ० १०।१२५।१ - ५-८ ) वेद भगवान् कहते हैं कि इस पृथिवी से और द्युलोक से अर्थात् सूर्थ्य से भी बाहर तक इस पर -foot वाक् की महिमा फैली हुई है । परमेष्ठिमण्डल की महिमा का क्या ठिकाना है जिसके कि पेट में एक बुदबुद् के समान महिमामण्डलमय सूर्य ' सोलर सिस्टम ' युक्त पृथिवी और चन्द्रमा को साथ लिए हुए है । इसीवाक् से ' सौरी वाक् ' उत्पन्न होती है । हमारा सम्बन्ध चूंकि सूर्य्यं से अधिक है - प्रतएव हम अपनी अपेक्षा से सूर्य ही को वाङ्मण्डल कहेंगे । यह सूर्य्य ही वाकून है । मंसार में जो भी वाक् देखते हो वह असल में सूर्य्य की वाक् है । सूर्य की वाक् ही प्रवर्ग्य बनकर यच्चयावत् पदार्थों में घुसी हुई है । इस सौरीवाक् से ब्रह्माण्ड का एक बिन्दु भी खाली नहीं है । वाक् इन्द्र का विकार है अतएव हम इस वाक् को ' इन्द्र ' कह सकते हैं । इसी मूल पर " नेन्द्रादृते पवते धाम किञ्चन " यह कहा जाता है । आधुनिक वैज्ञानिक जिसे ईथर कहते हैं, वह यही हमारा इन्द्र है । अर्थात् इन्द्र वाक् है । सारा विश्व इस वाक् से वाङ्मय हो रहा है । देवता - असुर - गन्धर्व - पितर - इत्यादि - इत्यादि सब इस वाक् के आधार पर ही स्थित हैं । देवता आग्नेय हैं । श्रसुर श्राप्य हैं । गन्धर्व और पितर सौम्य हैं । सब की स्थिति वाक् से है । यदि परमेष्ठिनी वाक् न हो तो असुर - गन्धर्व - पितर, तीनों मर जायं । सूर्य्य वाक् न रहे तो सारे देवता मर जायं एवं सारे मनुष्य भी सूर्य के न रहने से नेस्तनाबूद हो जायें । कहां तक कहें यदि वाक् न रहे तो सारा विश्व रसातल में समा जाय । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है-वाचं देवा उपजीवन्ति विश्वे, वाचं गन्धर्वाः पशवो मनुष्याः । वाचीमा विश्वा भुवनान्यपिता, सा नो हवं जुषतामिन्द्रपत्नी ॥ ( तै ० ब्रा ० २२८८४ ) इसी अभिप्राय से ऐतरेय श्रुति भी कहती है-" वाचा वै वेदाः संधीयन्ते, वाचा छन्दांसि वाचा सर्वाणि भूतान्यथो वागेवेदं सर्वमिति " वाचा मित्रारिण संदर्भात ( ऐ ० आरण्यक ३।१।६ ) वाक् को इन्द्र पत्नी कहा है । इससे सिद्ध होता है कि वास्तव में वाक्- इन्द्र ही का नाम है । इन्द्र ही का विकार वाक् है । वाक् ही का नाम सूर्य्यं है । अतएव हम इस सूर्य्य ही को वाङ्मय कहने [ ३५४ ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण

अभिप्राय से श्रुति कहती है ।

सृजा इति ॥

देवेभ्यस्तु जगत्सर्वं चरं स्थाण्वनुपूर्वशः ॥

[ ३५५ ] सोमाख्यान ब्राह्मण ( ऐ ० उ ० १1१-२ ) ( मनुस्मृति: ३।२० ९ ) के लिए तैय्यार हैं । इसीलिए तो स्पष्ट शब्दों में श्रुति कहती है- " साया सा वाक् श्रसौ स प्रादित्यः " || बस सृष्टि - क्रम में यही तीसरा वाङ्मण्डल है । इसके अनन्तर सूय्यं रश्मियों के घर्षण से, एक पानी उत्पन्न होता है । इसका नाम है, " मरीचि " । मरीचि सूय्यं किरणों का नाम है । चूंकि यह पानी इन किरणों के संघर्ष से उत्पन्न होता है श्रतएव इसका नाम है मारीच इसी मारीच को कश्यप भी कहते हैं । कैसे कहते हैं, इसका विवेचन ' ऋषिरहस्य ' में देखना चाहिए । इस कश्यप से ही, मारीच से ही - " मर पानी " उत्पन्न होता है । मर उस पानी का नाम है— जो कि रुद्रवायु के प्रवेश से अपने मूल स्वरूप को छोड़ देता है । पारमेष्ठय पानी का नाम " ग्रम्भ " है, सोर पानी का नाम मरीचि एवं पार्थिव पानी का नाम " मरः " है । सौरचान्द्र पानी का नाम " आप " है । इसीलिए " चन्द्रमा प्रप्स्वन्तर सुपर्णोधावते दिवि " - यह कहा जाता है । बस, पृथिवी - - म मण्डल भर में पानी चार ही प्रकार का है । इसी " आत्मा वा इदमेक एवात्र प्रासीन्नान्यत्किंचन मिषत् स ईक्षत लोकान्नु स इमांल्लोकानसृजत ॥ अम्भो मरीचीर्मरमापोऽदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्ठाऽन्तरिक्षं मरीचयः ॥ पृथिवी मरो या श्रधस्तात्ता श्रापः ॥ इसमें से जो मर श्राप है उसमें जब रुद्रवायु का प्रवेश होता है तो पानी और वायु दोनों के मर जाने से आप:, फेन, उवा, सिकता, शर्करा, श्रश्मा, अपः, हिरण्य इन आठों व्याहृतियों में अपना स्वरूप परिणत करने वाली पृथिवी उत्पन्न होती है । पानी का ठंडापन मारा जाता है । अग्नि की उष्णता मारी जाती है | इससे जो एक श्रनुष्णशीत द्रव्य उत्पन्न होता है- यही पृथिवीमण्डल स्वयम्भू, परमेष्ठि और सूय्र्यमण्डलों के बाद चौथा अन्नादमण्डल है । पांचत्र है -वन्द्रमण्डल जिसे कि अन्नमण्डल कहते हैं । इस प्रकार से पांचों मण्डलों में प्राण प्राप् वाक्, अन्नाद, अन्न – ये पाँच " यज्ञक्षर " विभक्त रहते हैं । यहां पर इतनी बात प्रोर समझ लेनी चाहिए कि स्वयम्भूमण्डल का जो प्राण है उसे ऋषिप्राण कहते हैं । परमेष्ठिमण्डल के प्राण को असुरप्राण, पितरप्राण और गन्धर्वप्राण कहते हैं । सूय्यंप्राण को देवप्राण कहते हैं । पार्थिवप्राण को मनुष्यप्राण कहते हैं । पूर्व - पूर्व - प्राण संभोग से उत्तरात्तर के प्राणों की उत्पत्ति होती है । इसी अभिप्राय से भगवान् मनु कहते हैं— ऋषिभ्यः पितरो जाताः पितृभ्यो देवमानवाः । स्वयम्भू भी एक पिण्ड है, परमेष्ठि, चन्द्रमा भी पिण्ड हैं । पांचों पिण्डस्वरूप हैं । इन पिण्डों की स्थिति जिसके आधार पर रहती है उसे वैदिक परिभाषा में " मनोता " कहा जाता है । यदि यह पदार्थ इन पिण्डों में से निकाल दिया जाता है तो इन पदार्थों का स्वला ही नष्ट हो जाता है । इन्हीं में इन पिण्डों के मन अर्थात् केन्द्र ओत - प्रोत रहते हैं अतएव इनको मनोता कहते हैं । प्रत्येक मण्डल में भिन्न-

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तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्राह्मण [. ३५६ ] सोमाख्यान ब्राह्मण ( ऐ ० ब्रा ० ६।१० ) ( ऋग्वेद म ० ६८३।१ ) भिन्न जाति के पदार्थ उत्पन्न होते हैं । बस इन उत्पन्न पदार्थों से ही तत्तत्मण्डलों की स्थिति रहती है, इसीलिए इन पदार्थों को मनोता कहा जाता है । इन पदार्थों में तत्तत्मण्डलों के मन श्रोत - प्रोत रहते हैं अतएव वे पदार्थ मनोता कहे जाते हैं । जैसा कि श्रुति कहती है-" तिलो वं देवानां मनोतास्तासु । हि तेषां मनांस्योतानि वाग्वै देवानां मनोता तस्यां हि तेषां मनांस्योतानि गौर्वै देवानां मनोता तस्यां हि तेषां मनां-स्योतान्यग्निर्वै देवानां मनोता तस्मिन्हि तेषां मनांस्योतानि " । कहने का तात्पर्य यही है कि प्रत्येक मण्डल में मण्डल की स्थिति रखने वाले जो पदार्थ होते हैं उन्हें मनोता कहा जाता है । स्वयम्भूमण्डल के जो मनोता हैं उनका नाम है सूत्र, वेद, अन्तर्यामी । अन्तर्यामी जो चित् है एवं जो ब्रह्म - निश्वसित वेद है एवं जिस सूत्र द्वारा यह वेद - रश्मियाँ सर्वत्र फैलती हैं- बस यह तीन ही स्वम्भूमण्डल की स्थिति के कारण हैं । भृगु, अंगिरा, श्रत्रि, ये तीन मनोता परमे-ष्ठिमण्डल के हैं । भृगु - अप्, वायु, सोम भेदेन तीन प्रकार का है एवं अङ्गिरा - अग्नि, वायु, आदित्य, भेदेन तीन प्रकार का है । तीसरा मनोता चूंकि तीन प्रकार का नहीं है अतएव उसे " नत्रिः ” इस व्युत्पत्ति के अनुसार अत्रि कहा जाता है । अप्, वायु, सोम, पितरप्राण और गन्धर्वप्राण से सम्बन्ध रखते हैं । अप्, असुरप्राण से सम्बन्ध रखते हैं एवं जो वायु है वह " साम्ब सदाशिव " नाम से व्यवहृत होता है । परमेष्ठि का श्रापोमयमण्डल भृगु - प्रङ्गिरा से अर्थात् अग्नि - सोम से अभिव्याप्त रहता है । इसी अभिप्राय से— श्रापो भृग्वङ्गिरोरूपमापो भृग्वङ्गिरोमयम् । श्रन्तरेते त्रयो वेदा भृगूनङ्गिरसोऽनुगाः । ( गो ० ब्रा ० १।३ ९ ) यह कहा जाता है । पारमेष्ठ्य सोम को ब्रह्मणस्पति भी कहते हैं । संसार को पवित्र करना इसी सोम का काम है । फिल्टर शक्ति यही पवित्र सोम है । इसीलिए तो इसे पवित्र कहा जाता है । इसी ब्राह्मणस्पत्य पारमेष्ठ्य पवित्र नाम के सोम को लक्ष्य में रख कर भगवान् वेदपुरुष कहते हैं—

" पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः ।

प्रतप्ततनूनं तदामो अश्नुते शृतास इद्वहन्तस्तत्सभाशत " ॥

पृथिवीलोक पृथिवी ही कहलाता है एवं अन्तरिक्ष और सूर्यलोक दोनों " लोक " कहलाते हैं । " नभोन्तरिक्षं गगन " इत्यादि ग्रन्तरिक्ष नामों में अमरकार ने " धुरपिस्यात्तदव्ययम् " से प्रन्तरिक्ष को भी द्युलोक बतलाया है एवं सूर्यलोक तो द्युलोक में है ही । परमेष्ठी चूंकि सूर्य्य से भी ऊपर है एवं ब्राह्मणस्पत्य सोम इसी में रहता है प्रतएव " दिवि वै सोम आसीत् " यह कहा जाता है । चूंकि पर-

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तृतीय काण्ड ( श्र ० २ ) शतपथ ब्राह्मरण [ ३५७ ] सोमाख्यान ब्राह्मणे ( छा ० उ ० २।२१।३-४ ) अतएव ये ही त्रिसत्य हैं - यह रखने पर ही सौपर्णक आख्यान मेष्ठी तीसरा द्यौ है अतएव कई ब्राह्मणों में " तृतीयस्यामितोदिवि सोम श्रासीत् " यह कहा जाता है । भाष्यकार " तृतीयस्याम् " का सूर्य्य - लोक अर्थ करते हैं । परन्तु हमारे खयाल से यह अर्थ अशुद्ध है । पृथिवी को कहा जाता तो अवश्य ही " तृतीयस्यां " का सूर्य्यलोक अर्थ हो सकता था । अस्तु-कहना प्रकृत में इतना ही है कि परमेष्ठिमण्डल के भृगु - अंङ्गिरा - अत्रि ये तीन मनोता हैं । ज्योतिः, गौ, आयुः तीन ही मनोता सूर्य्य के हैं । ज्योतिर्भाग का नाम देवता है । ज्योति से देवता बनते हैं । अतएव - चित्रं देवानामुदगाहनीकम् यह कहा जाता है । गो से भूत बनते हैं । अतएव पृथिवी को गौ कहा जाता है एवं आयु से जड़ - चेतन यच्चयावत् प्राणियों का प्रात्मा बनता है - अतएव " सूर्य्य ग्रात्मा जगतस्तस्थुषश्च " यह कहा जाता है - गौ- द्यौ -सूर्य्य - ज्योति - प्रायु गौ की समष्टि है । अतएव सूर्य्य - लोक प्राप्त करने के ज्योतिष्टोम गोष्टोम प्रायुष्टोम – ये तीन ही साधन हैं । वाक् - गौ-यह तीन मनोता पृथिवी के हैं एवं रेतः श्रद्धा यशः ये तीन मनोता चन्द्रमा के हैं । इस प्रकार पांच मण्डलों के १५ मनोता हो जाते हैं । बस, अखिल ब्रह्माण्ड में ये १५ ही पदार्थ हैं । इनको जान लेने पर कुछ भी बाकी नहीं बचता है । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है-" यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति ॥ यस्तद्वेद स वेद सर्वं सर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति " । प्रत्येक मण्डल की स्थिति तीन - तीन मनोताओं पर ही है । कहा जाता है । बस, प्रकृतिमण्डल की यही स्थति है । इसको ध्यान में समझ में आ सकता है । याज्ञवल्क्य कहते हैं - दिवि वै सोम आसीत् प्रथेह देवा: - इसका तात्पर्य यही है कि सृष्टि के प्रारम्भ में द्युलोक में अर्थात् परमेष्ठिमण्डल में सोम था एवं इस पृथिवीमण्डल में देवता थे । दीक्षणी-येष्टि ब्राह्मण में हम बतला प्राये हैं कि देवता श्राग्नेय हैं । अग्नि का नाम ही देवता है । एक ही अग्नि अवस्था - भेद से ३३ अवस्थाओं में परिणत हो जाता है । अग्नि दो प्रकार का होता है । चित्य और चितेनिधे । चित्य अग्नि वह है जो कि पृथिवी - पिण्ड में रहता है । चितेनिधे अग्नि वह है जो कि साम तक रहता है । साम तक रहने वाला जो अग्नि है, वही घन - तरल - विरल भेद से अग्नि वायु -आदित्य नाम धारण कर लेता है । घनावस्था का नाम अग्नि है । तरलावस्था का नाम वायु है । विरलावस्था का नाम आदित्य है | इन तीनों में भी प्रोर और अवस्थाएं हो जाती हैं । जो घन अग्नि है - वह आठ अवस्थाओं में परिणत रहता है । यही आठ वसु हैं एवं तरलाग्नि अर्थात् वायु ११ अवस्थानों में परि-गत रहता है । यही ग्यारह रुद्र हैं एवं विरलाग्नि अर्थात् आदित्य १२ भागों में परिणत रहता है, इन्हीं का नाम द्वादशादित्य है । एवं प्रजापति और वषट्कार- ये दो देवता और होते हैं । इस प्रकार एक ही अग्नि, अवस्था विशेष के कारण ३३ रूप धारण कर लेता है । इन देवताओं का स्वरूप विशदरूपेण पूर्व के ब्राह्मणों में बतला दिया गया है ।

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शर्तपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण जहां तक अग्नि रहता है उसे पृथिवी - लोक कहते हैं । जहां तक वायु रहता है उसे अन्तरिक्ष-लोक कहते हैं एवं जहां तक प्रादित्य रहते हैं उसे द्युलोक कहते हैं । पृथिवी का अधिष्ठाता अग्नि है । अन्तरिक्ष का अधिष्ठाता इन्द्र है । वायु एक हिस्सा इन्द्र का रहता है । इसीलिए " इन्द्रसुरी या ग्रहा-गृह्यन्ते ' - यह कहा जाता है । यह इन्द्र मरुत्वान् इन्द्र कहलाता है एवं सूर्य्य - स्थानीय इन्द्र मघवा - इन्द्र कहलाता है । कहना यही है कि वायु अथवा मरुत्वान् इन्द्र अन्तरिक्ष के अधिष्ठाता हैं एवं द्युलोक के सू अधिष्ठाता है । इसीलिए – “ अग्निभू स्थानो वायुर्वेन्द्रोन्तरिक्षस्थानः सूर्योद्युस्थान: ' इति - यह कहा जाता है । एक ही अग्नि, अग्नि - वायु - इन्द्र ( सूर्थ्य ) स्वरूप में परिणत हो जाता है श्रतएव अग्निः सर्वाः देवताः, वायुः सर्वाः देवता एवं इन्द्र सर्वाः देवता: यह कहा जाता है । त्रिवृतस्तोम ( C ) तक नि रहता है | पञ्चदश ( १५ ) तक वायु किंवा मरुत्वान् इन्द्र रहता है एवं एकविंशस्तोम ( २१ ) तक सूर्थ्य रहता है | पृथिवी के ठीक २१ वें अहर्गण पर सूर्य है । तीनों कहने को अग्नि वायु आदित्य लोक हैं वास्तव में तीनों अग्निलोक ही हैं । एक अग्नि ही वहां तक अर्थात् २१ तक फैला हुआ है । इसीलिए — " इमे वा एते लोका अग्नयः " ( तै ० ब्रा ० १1१1८ ) यह कहा जाता है । प्रकृत में कहना यही है कि देवता सारे आग्ने यही हैं । अग्नि से ही देवता उत्पन्न होते हैं । " अग्नि वै देवयोनिः " ( ऐ ० ब्रा ० ४।५ ) यह सिद्धान्त प्रटल है । यह देवता पृथिवी के केन्द्र से बद्ध रहते हैं श्रतएव इन्हें पृथिवीलोक का देवता बतलाया जाता । देवता पृथिवी पर रहते हैं । इसका तात्पर्य यही है कि २१ तक वितत रहने वाले ३३ देवता केन्द्रीय पृथिवी प्रजापति से बद्ध रहते हैं । बस, यही प्राकृतिक परिस्थिति है । सोम, सूर्य्य से अर्थात् २१ से ऊपर परमेष्ठिमण्डल में रहता है एवं देवता इस पृथिवी में रहते हैं, अर्थात् पृथिवी - केन्द्र से बद्ध होकर २१ तक वितत रहते हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते है— " दिवि वै सोम श्रासीत् - श्रथेह देवा: " - पृथिवीलोक पर रहने वाले इन देवताओं ने इच्छा की कि - कोई ऐसा उपाय करना चाहिए जिससे कि यह सोम अपने पास आ जाय एवं इस आए हुए सोम से हम यज्ञ करें | यह विचार कर देवताओं ने सुपर्णी और कद्रू को पैदा किया । जिस प्रकार सुपर्णी और कद्रू द्वारा सोम देवताओं के पास आया था वह सारे का सारा सौपर्णव - काद्रव - प्रख्यान धिष्ण्या ब्राह्मण में बतलाएंगे — थेह देवास्ते देवा श्रकामयन्ता नः सोमो गच्छेत्तेनागतेन यजेमहीति त sed मायेऽसृजन्त सुपर्णी च कद्रू च तद्धिष्ण्यानां ब्राह्मणे व्याख्यायते सौपर्णी-काद्रवं यथा तदास ॥ ( शत ० ३।२।४।१ ) for ब्राह्मण में जो सोमापहरण आख्यान है उसे हमने पूर्व में बतला दिया है । वहां पर बतलाया गया है कि देवताओं ने सुपर्णी और कद्रू को पैदा किया । यह जो पृथिवी है, इसीका नाम कद्रू है । कद्रू सर्पों की माता बतलाई गई है । इसका रहस्य यही है कि पृथिवी प्रातिस्विक रूपेण सर्वथा काली है, सूर्य्य तथा नाना नक्षत्रादि में प्रकाश है । पृथिवी में प्रकाश नहीं है इस पृथिवी [ ३५८ ]

पृष्ठ 377

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 377 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्राह्मणं सोमाख्यान ब्राह्मणे में से जो रश्मियां निकलती हैं वे सर्वथा काली हैं । ये काली रश्मियाँ इसी पृथिवी में से निकलती हैं एवं पृथिवी में ' बद्ध रहती हैं । अतएव इन रश्मियों को सर्प बतलाया जाता है । किरणों का स्वभाव है प्राण - प्रपान क्रिया से चलने का । रश्मियाँ सर्पण करती हुई चलती हैं प्रतएव इन रश्मियों को सर्प कहा जाता है । पुराण में कहा गया है— कद्रू के हजार सर्प उत्पन्न हुए । वास्तव में बात सच वैदिक परि भाषानुसार सहस्र - शब्द का अर्थ है पूर्ण । इसीलिए " सहस्रं वै पूर्णम् " यह कहा जाता है । पृथिवी के केन्द्र से पृथिवी की काली रश्मियाँ सर्पण करती हुई पृथिवी के चारों ओर पूर्णतया वितत रहती हैं अतएव कद्रू के, कश्यप के वर- प्रभाव से १००० हजार पुत्र उत्पन्न हुए, यह कहा जाता है । वास्तव में बात ठीक है | कश्यप मरीचि से उत्पन्न होता है । यह बात पूर्व - प्रकरण में बतला दी गई है । कश्यप नाम है सूर्थ्य का । इस सूर्य की - दिति, दाना, कद्रू, विनता अर्थात् सुपर्णी, काला - इत्यादि १२ स्त्रियां हैं । संवत्सरात्मक मण्डल के १२ टुकड़े हैं । एक संवत्सर के १२ महिनों में कश्यप प्रजापति पूरा भोग कर लेते हैं । अतएव इन १२ विभागों को, १२ पत्नियां कहो जाता है । किसी - किसी पुराण में कश्यप के १३ स्त्रियां बतलाई जाती हैं । जिस रेखा पर चन्द्रमा घूमता है, उसका नाम है - दक्ष । इस दक्षरेखा के, दक्षवृत्त के भिन्न-भिन्न ग्रहों के हिसाब से कुल ६० टुकड़े हो जाते हैं । चन्द्रमा अपने इस दक्षवृत्त की परिक्रमा २७ दिन में कर डालते हैं । दक्ष के २७ टुकड़े करके प्रति दिन एक टुकड़े का भोग चन्द्रमा को जाता है । २८ वें दिन जाकर - चन्द्रमा की परिक्रमा समाप्त हो जाती है । बस यही २७ चन्द्रमा की स्त्रियाँ हैं । अश्विनी -भरणी श्रादि २७ नक्षत्र ही इस चन्द्रमा की २७ स्त्रियां हैं । धर्म के हिसाब से दक्ष वृत्त के १० टुकड़े होते हैं । इसीलिए १० स्त्रियां धर्म की कहलाती हैं । एवं कश्यप अर्थात् सूर्थ्य के हिसाब से दक्षवृत्त के १३ टुकड़े होते हैं । यही १३ विभाग इस कश्यप की १३ स्त्रियाँ हैं । इन १३ से भिन्न - भिन्न प्रारण उत्पन्न होते हैं । कद्रू से सर्पप्राण उत्पन्न होता है । विनता से गरुड़प्राण अर्थात् गायत्री उत्पन्न होती है एवं अङ्गिरा के हिसाब से दो टुकड़े होते हैं । कृशाश्व के हिसाब से भी दो ही टुकड़े होते हैं । भृगु के हिसाब से भी दो ही टुकड़े होते हैं एवं - ' स्वस्ति न इन्द्र: " -इत्यादि अरिष्टनेमि के हिसाब से ४ विभाग होते हैं । इस प्रकार एक ही दक्षवृत्त के ६० विभाग होते हैं । यही ६० दक्ष प्रजापति की कन्याएं कहलाती हैं एवं कश्यपादि जामाता कहलाते हैं । इसी विज्ञान को समझाते हुए भगवान् वेदव्यास कहते हैं-दक्षस्तु षष्टिकन्यास्तु सप्तविंशतिमिन्दवे । ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश ॥

द्वयं वाङ्गिरसे प्रादाद् द्वे कृशाश्वाय धीमते ।

द्वयमेव भृगुपुत्राय चतस्त्रोऽरिष्टनेमिये ॥

प्रकृत कथा का सम्बन्ध केवल - कद्रू और सुपर्णी अर्थात् विनता से है । कद्रू इस पृथिवी का ही नाम है | यह पृथिवी सर्पण करती हुई आगे चलती है एवं सर्पण करती हुई रश्मियों की अधिष्ठात्री है प्रतएव इस पृथिवी को " सर्पराज्ञी " कहा जाता है । जैसा कि श्रुति कहती है - " इयं वै सर्पराज्ञी इयं [ ३५६ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० २ ) शतपथ ब्राह्मण भुवनं जजान यदस्यार्धं कतमः स केतुः ॥ आत्मा को लक्ष्य में रख कर भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-ईश्वरः सर्वभूतानां हृदेशेऽर्जुन तिष्ठति । सौमाख्यान ब्राह्मणे ( अथर्ववेद १०।८।१३ ) ( गीता १८।६१ ) इसी आत्मा को हमने प्रविष्ट - ब्रह्म बतलाया है । इसके बाद में वह पिण्ड रहता है, जिसका कि संचालक केन्द्र में बैठा हुआ है । यह पिण्ड सर्वथा मत्र्त्य है । इसी शरीर को वैदिक परिभाषा में पद कहा जाता है । इस पद अर्थात् पिण्ड के चारों ओर एक महिमामण्डल होता है । वह महिमामण्डल ३३ तक होता है । ३३ क्या चीज है? यह वषट्कारमण्डल - रहस्य को जानने पर मालूम होगा । इस वषट्कार का विवेचन हम किसी आगे के प्रकरण में करेंगे । यहां सिर्फ इतना ही समझ लेना पर्याप्त [ ३६० ] हि सर्वतो राज्ञी " ( ऐ ० ब्रा ० २४ अ ० ) ये सर्प वास्तव में कश्यप के अर्थात् सूर्य्यं के वरदान से उत्पन्न हुए हैं । यदि सू की प्रेरणा न होती तो - रश्मियां कभी नहीं निकल सकती थीं । " धियो योनः प्रचोद-यात् " यह सूर्य्यं का ही काम है । नोदना करना सूर्य्य का काम है । है तो वास्तव में नोदना करना सविता का काम परन्तु सविता परमेष्ठिमण्डल में रहते हैं । अतएव पृथिवी पर यह सूर्य्यं द्वारा ही प्राते हैं । इसीलिए प्रायणीय ब्राह्मण में - " एष वै सविताय एष तपत्ति " - यह कहा गया है । प्रेरणा से रश्मियाँ प्राणादपानात् करती हुई निकलती हैं । प्रेरणा सूर्य्य का अर्थात् कश्यप का काम है । बस कश्यप के वरदान से - सर्प उत्पन्न हुए- इस का यही रहस्य है । इस पूर्व कथन से हमें बतलाना यही है कि यह पृथिवी ही कद्र है । यह सर्पण करती हुई चलती है अतएव इसे सर्पराज्ञी कहा गया है । पृथिवी स्वयं काली है अतएव इसकी रश्मियाँ भी काली हैं यही आसमन्तात् व्याप्त होने वाली काली रश्मियां - इसकी पुत्रवत् हैं । चूंकि रश्मियां काली हैं एवं सर्पण करती हुई चलती हैं - अतएव इन्हें सर्प कहा जाता है । बस, इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहा जाता है-" इयं कद्रू: " ( धिष्ण्या ब्राह्मण ) । अब चलिए सुपर्णी की ओर । याज्ञवल्क्य सुपर्णी का अर्थ बतलाते हुए कहते हैं, वाक् ही सुपर्णी है - " वागेव सुपर्णी " । प्रत्येक वाक् पिण्ड में अमृताग्नि और मत्यग्नि ये दो अग्नियां रहती हैं । जो पिण्ड दिखलाई पड़ता है उसका नाम तो मर्त्याग्नि है । पिण्ड से बाहर २१ ग्रहण तक जाने वाला जो अमृता-ग्नि है - वही वाक् कहलाता है । २१ तक तो अग्नि ही जाता है, यह अमृता वाक् तो ३३ तक जाती है । इस वाङ्मण्डल को महिमामण्डल कहते हैं । प्रत्येक वस्तु में महिमा, शरीर और आत्मा ये तीन तत्त्व रहते हैं । आत्मा केन्द्र में रहता है, जिसके लिए— प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरदृश्यमानो बहुधा वि जायते । अर्धेन विश्वं यह कहा जाता है । इसी के आधार पर शरीर की, अर्थात् पिण्ड की स्थिति रहती है । इसी भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ इति

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मणं होगा कि एक वस्तु को देखते हुए श्राप उससे दूर होते जाइए । कोई स्थान ऐसा आयेगा, जहाँ से वह वस्तु आपको बिन्दुमात्र दिखलायी पड़ने लगेगी । बस, वहां से उस वस्तु को केन्द्र बनाकर एक गोलमण्डल बनाइए । समझ लीजिए - उस वस्तु का ३३ यहीं पर समाप्त है । इस ३३ अहर्गण वाले मण्डल को ही महिमामण्डल कहा जाता है । इसी महिमामण्डल को पुनःपद भी कहा जाता है । इस प्रकार प्रत्येक वस्तुमें आत्मापद और पुनःपद अर्थात् आत्मा, शरीर और महिमा - ये तीन - तीन मण्डल रहते हैं । इन तीनों में महिमामण्डल को ही वाक् कहते हैं । पिण्ड से यह वाक् कितनी दूर तक रहती है— इसकी पहचान बतलाती हुई श्रुति कहती है-सहस्रधा पञ्चदशान्युक्था यावद्यावापृथिवी तावदित्तत् । सहस्रधा ( ऋग्वेद १०/११४८ ) महिमानः सहस्रं यावद्ब्रह्म विष्ठितं तावती वाक् ॥ जहां तक ब्रह्म प्रजापति रहता है वहां तक वाक् रहती है । श्रनिरुक्त, उद्गीथ, सर्व, भेदेन एक ही प्रजापति तीन स्वरूपों में परिणत हो जाता है । जो केन्द्रीय प्रजापति है वह अनिरुक्तप्रजापति कहलाता है । सप्तदश प्रजापति उद्गीथप्रजापति कहलाता है एवं ३४ वां प्रजापति सर्वप्रजापति कहलाता है । ३३ स्तौम्य देवताओं के अनन्तर ३४ वां यही ब्रह्मप्रजापति है । यहीं तक वाक् अर्थात् महिमामण्डल रहता है । वेदत्रयी - देवता - असुर - गन्धर्व सारा प्रपञ्च इसी वाङ्मण्डल में, इसी वषट्कार में रहता है । इसीलिए तो " वाचीमा विश्वा भुवनान्यपिता " - यह कहा जाता । बस, इस वाक् का नाम ही सुपर्णी है । इसी अभिप्राय से कहते हैं, " वागेव सुर्पारण: " प्रागे जा कर याज्ञवल्क्य कहते हैं कि देवताओं ने सोम के लालच से दोनों में झगड़ा करा दिया । " ताभ्यां समदं चकुः " फिर क्या था, कद्रू और सुपर्णी में परस्पर झगड़ा होने लगा । आखिर उनमें शर्त ठहरी कि जो कि दूर की वस्तु देख ले, वह दूसरी को दासी बना ले । कद्रू पृथिवी का नाम है । सुपर्णी वाक् का नाम है । अग्नि घन तरल - विरल भेद से तीन स्वरूपों में परिणत हो जाता है एवं उन तीनों के अग्नि वायु-श्रादित्य ये तीन नाम हो जाते हैं । यह बात हम पूर्व के प्रकरणों में बतला आये हैं । इससे सिद्ध हो जाता है कि अग्नि पृथिवी की वस्तु है, वायु अन्तरिक्ष की वस्तु है एवं आदित्य द्युलोक की वस्तु है । बायु में एक हिस्सा इन्द्र का रहता है और तीन हिस्से वायु के अपने रहते हैं । इस वायव्य इन्द्र का नाम है मरुत्वान् । इसी प्रकार द्वादश आदित्यों में भी एक इन्द्र है, इसका नाम है मघवाइन्द्र । आग्नेय - अग्नि पृथिवीलोक का अधिष्ठाता है । वायव्याग्नि अन्तरिक्ष का अधिष्ठाता है एवं ऐन्द्राग्नि ( सूर्य्याग्नि किंवा आदित्याग्नि ) द्युलोक का अधिष्ठाता है । तीनों ही अग्नि चित्य और चितेनिधे भेदन दो - दो प्रकार का हैं । चित्यग्नि को कहते हैं । चितेनिधे श्रमृताग्नि को कहते हैं । यह बात पूर्व में कही जा चुकी है । पिण्ड का नाम है मर्त्याग्नि । संसार में पिण्डस्वरूप जितने भी पदार्थ हैं उन सबका एक न एक दिन अवश्य ही विनाश होगा | पिण्ड विनाशी पदार्थ है, मर्त्य है, अतएव वह चित्य कहलाता है । पृथिवी - पिण्ड मर्त्य है क्योंकि कभी न कभी इसका विनाश अवश्य ही होगा । एवमेव आन्तरिक्ष्याग्नि भी मर्त्य है । प्रान्त-रिक्ष्य श्रग्नि से चन्द्रमा अभिप्रेत है । चन्द्रमा में जो प्रकाश भाग है वह चन्द्रमा का नहीं है अपितु इन्द्र का है | चन्द्रमा स्वयं कृष्ण है । इसीलिए " ब्रह्मा कृष्णश्चनोषाद " कहा जाता । प्राकृतिक यज्ञ के [ ३६१ । ]

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काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण ब्रह्मा यही चन्द्रमा हैं । चन्द्रमा का प्रकाश इन्द्राग्नि का प्रकाश है । चन्द्रमा स्वयं काला है । यह निम्न-लिखित श्रुति से स्पष्ट ही सिद्ध हो जाता है-अत्राह गोरमन्वत नाम त्वष्टुरपीच्यं । इत्था चन्द्रमसो गृहे । ( ऋग्वेद मं. १८४ | १५ ) कहने का तात्पर्य्यं यही है कि जिसे हमने वायव्याग्नि बतलाया था, उसके अधिष्ठाता यही चन्द्रमा हैं, चन्द्रमा का प्रकाश भाग अग्नि है । जैसे पृथिवीपिण्ड चित्यपिण्ड कहलाता है, उसी प्रकार चन्द्रमा का गोला भी अवश्य ही मर्त्य है । चन्द्रमा का मरणधर्म तो प्रतिदिन प्रत्यक्ष ही देखने में आता है । पूर्णिमा के बाद से ही देवता लोग चन्द्रमा की एक - एक कला को खाने लगते हैं । अन्ततोगत्वा अमा-वस तक जाते - जाते सारा चन्द्रमा देवताओं के पेट में चला जाता है । चन्द्रमा तो देवताओं का अन्न है अतएव अवश्य ही मर्त्य है । " एतद्वै सोमो राजा, देवान ं यच्चन्द्रमाः " यह श्रुति मर्त्यत्व को ही सूचित करती है । तीसरा है ऐन्द्राग्नि । सूर्य्य का जो पिण्ड दीख रहा है वह भी मर्त्य ही है । जिस दिन सोमाहुति होना बन्द हो जायेगा उस दिन सूर्य्यं नेस्तनाबूद हो जायगा । जब तक वह अन्न खा रहा है तभी तक जिन्दा है । इस प्रकार पृथिवी, चन्द्रमा और सूर्य्य ये तीनों ही पिण्ड चित्यपिण्ड हैं - मर्त्यपिण्ड हैं । ये पिण्ड बने किसके हैं, इसका एकमात्र उत्तर है अग्नि । बछड़ा ज्यों - ज्यों अन्न खाने लगता है, त्यों - त्यों बड़ा होने लगता है । अन्न में सोम - अग्नि दोनों हैं । इसमें अग्निभागश्रात्माग्नि पर जा कर सवार हो जाता है | अग्नि, अग्नि को पचा नहीं सकता । अतएव अन्न द्वारा प्रागन्तुक अग्नि का आत्माग्निपर चुनाव होने लगता है । इसी चुनाव से चेजे से एक हाथ का बच्चा 3½ हाथ का युवा पुरुष हो जाता है । यह श्रग्नि के चुनाव का ही प्रताप है । मनुष्य अग्नि का चेजा मात्र है । मनुष्य पिण्ड ही नहीं, पिण्ड जितने भी हैं, सब अग्नि के चयन हैं । पिण्ड सिवाय अग्नि के चुनाव के बन ही नहीं सकता । श्रतएव पिण्ड-मात्र को हम अग्निपिण्ड कह सकते हैं । चूंकि यह पिण्ड विनाशी है अतएव इस अग्नि को जिससे कि पिण्ड बना है मयग्नि कहने के लिए तैय्यार हैं । इसी मर्त्याग्नि को वैदिक परिभाषानुसार " चित्याग्नि " कहा जाता है । सम्पूर्ण कथन का तात्पर्य यही है कि पृथिवी, अन्तरिक्ष अर्थात् चन्द्रमा और सूर्य्य तीनों गोले, तीनों पिण्ड, चित्याग्नि हैं । इस चित्याग्नि के साथ - साथ ही एक दूसरा अग्नि और रहता है जिसका नाम है चितेनि अग्नि । इसी का दूसरा नाम है अमृताग्नि । यह अमृताग्नि पिण्ड के केन्द्र से बद्ध होकर पिण्ड के बाहर तक, बड़ी दूर तक, मण्डल बना कर अपनी स्थिति कायम करता है । इसी मण्डल को महिमामण्डल कहते हैं । पिण्ड के बाहर निकलने वाला जो यह महिमामण्डल है वह किसका है, यदि यह पूछा जाए तो इसका एकमात्र उत्तर है वाक् । इसीलिए इस महिमामण्डल को वषट्कारमण्डल भी कहा जाता है । केन्द्रस्थ प्रजापति वहां तक जाता है जहां तक वाक्- मण्डल जाता है । " यावद् ब्रह्मविष्ठितं तावती वाक् " यह अटल सिद्धांत है । एक तिल में भी यह महिमामण्डल श्रर्थात् वाङ् मण्डल मौजूद है और एक पर्वत में भी यह महिमामण्डल मौजूद है । पिण्ड के भीतर का जो केन्द्रस्थ प्रजापति है, जिसकी पकड़ में, जिसके शासन में, चित्यपिण्ड और महिमामण्डल है उसका नाम है आत्मा । इसी को वैदिक परिभाषानुसार पुरुष कहते हैं । संसार के यच्चयावत् पदार्थों में यह [ ३६२ ]