Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 381–390
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 381–390
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण [ ३६३ ] सोमाख्यान ब्राह्मणं ( ऋग्वेद ३।३०।२२ ) ( यजु ० ७ ५ ) प्रजापति रहता है - " ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्दशेऽर्जुन तिष्ठति " यह कहा जाता है । एवं प्रजापति कहते हैं पुरुष को इसीलिए — " पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् ” ( ऋग्वेद १०।१०।२ ) यह कहा जाता है । एवं जिस पिण्ड का यह पुरुष अधिष्ठाता है उसका नाम है पद और महिमामण्डल का नाम है, पुनः पद । पुरुष-पद, पुनः पद कहो अथवा आत्मा, शरीर एवं विभूति कहो, एक ही बात है । कहने का तात्पर्य यही है कि ' पुरुषपद और पुनः पद तीनों श्रविनाभूत हैं । प्रत्येक पदार्थ में तीनों वस्तु प्रविनाभूत रूप से रहती हैं । इसीलिए " त्रिवृद् वा इदं सर्वम् " यह कहा जाता है । विचार करना है हमें सिर्फ पृथिवी, चन्द्रमा एवं सूर्य्य का । तीनों पिण्ड चित्यापिण्ड हैं । तीनों ही का जो वाङ्मण्डल है वह चितेनिधे पृष्ठ है । प्रात्मा को अन्तःपृष्ठ कहा जाता है । पिण्ड को नित्यपृष्ठ कहा जाता है एवं महिमा को चितेनिधेपृष्ठ कहा जाता है । हमने बतलाया है कि प्रत्येक पिण्ड में उसका एक महिमामण्डल रहता है जो कि वाङ्मय होने के कारण वषट्कार नाम से व्यवहृत होता है । यह वाक रहती है यच्चयावत् पदार्थों में । परन्तु वस्तु है यह सूर्य्यं की । वाक् नाम है आकाश का । श्राकाश को शून्य कहा जाता है । शून्य का अर्थ खाली पोल नहीं समझना चाहिए । १४ प्रकार के इन्द्रों में से एक इन्द्र का नाम है ' श्वा ' - इसी को शुन कहते हैं । वही इन्द्र, इस स्थान में, इस आकाश में, सर्वत्र भरा हुआ है, अतएव “ शुने हितम् ” इस व्युत्पत्ति से इस आकाश को शून्य कहा जाता है । यह शुन- इन्द्र मघवा इन्द्र है न कि मरुत्वान् । अर्थात् आन्तरिक्ष्य मरुत्वान् इन्द्र सर्वत्र व्यापक नहीं है अपितु दिव्य इन्द्र जिसका कि नाम मघवान् है, जो कि शुन नाम से व्यवहृत होता है, वही सर्वत्र व्याप्त रहता है । इसी पुन के लिए कहा जाता है—
शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे नृतमं वाजसातौ ।
शृण्वंतमुग्रमृतये समत्सु घ्नंतं वृत्राणि संजितं धनानाम् ॥
अन्तस्ते द्यावापृथिवी दधाम्यन्तर्दधाम्युर्वन्तरिक्षम् ।
सजूर्देवेभिरवरैः परैश्चान्तर्यामे मघवन्मादयस्व ॥
इस इन्द्र से, जो वागात्मक है, अर्थात् श्राकाशात्मक है, एक बिन्दु भी खाली नहीं है - इसीलिए " नेन्द्रादृते पवते धाम किञ्चन " यह कहा जाता है । कहने का तात्पर्य्य यही है कि वाकू आकाश का नाम है । आकाश इन्द्र का नाम है । वाक् ही तो इन्द्र है । इसी वाक् से वीचीत रंगन्यायेन क - च - ट - त - प-नात्मिका वेद वाक् की उत्पत्ति होती है । इसीलिए तो इस वाक् को वेदों की माता बतलाया गया है । वाक्से शब्द उत्पन्न होता है । वाक् नाम है आकाश का, श्वाइन्द्र का - इसीलिए " शब्द गुरणकमाकाशम् ” यह कहा जाता है । यह वाक् उस इन्द्र की वस्तु है । इन्द्र की वस्तु क्या है -- दोनों प्रभिन्न हैं एकरूप हैं ।
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तृतीय काण्ड ( ० २ ) शतपथं ब्राह्मणं
इत एत उदारुहन्दिवः पृष्ठान्या रुहन् ।
प्र भूर्जयो यथा पथोद्यामङ्गिरसो ययुः ॥
[ ३६४ ] सोमाख्यान ब्राह्मणं ( तै ० सं ० ६ | १ | ६ | १ ) ( सामवेद पू ० १२ ) वाक्, बिना इन्द्र नहीं रहती । इन्द्र बिना वाक् नहीं रहता । इसीलिए वाक् को इन्द्रपत्नी भी कहा जाता है । इन्द्र द्युलोक के अधिष्ठाता हैं । सूर्य के द्वादश प्राणों में सर्वत्र व्याप्त रहने वाले एक अन्यतम प्राण का नाम ही इन्द्र है । इसी का नाम वाक् है । इससे सिद्ध हो जाता है कि संसार में जितनी भी वाक् है, वह इसी की वस्तु है । वाक् द्युलोक की वस्तु है । पृथिवी की वाक् भी - वास्तव में उसी की वाक् है । वाक् के अधिष्ठाता द्युलोकस्थ सूर्य ही हैं । इसीलिए तो प्राण - आप- वाक् प्रन्नाद - अन्न क्रम में सूर्य वाङ्मण्डल नाम से व्यवहृत होता है । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि सुपर्णी वाक् का नाम है । इससे सिद्ध हो जाता है कि लोक के अधिष्ठाता इन्द्र का नाम ही सुपर्णी है । पृथिवी कद्रू है तो वाक् अर्थात् लोक सुपर्णी है – इसी अभिप्राय से तैत्तिरीय श्रुति कहती है-" इयं वै कद्र रसौ सुपर्णी छन्दान्सि सौपर्णेयाः । बात वास्तव में सच है । पृथिवी जैसे अग्निगर्भा है, तथैव द्युलोक के अधिष्ठाता इन्द्र हैं । इसी -लिए - " यथाग्निगर्भा पृथिवी तथैव द्यौरिन्द्रेण गर्भेण ” यह कहा जाता है । इन्द्र का ही नाम तो वाक् है अतएव हम अवश्य ही द्युलोक को सुपर्णी कह सकते हैं । सुपर्ण नाम है — दूर तक उड़ने वाले बाज पक्षी का । पिण्ड अपने स्थान पर ही रहता है । परन्तु वाक् पिण्ड से बड़ी दूर तक ३३ तक धावा मारती है । वाङ्मण्डल बड़ी दूर तक जाता है । इसीलिए वाक् को सुपर्णी कहा जाता है । बस सोम लाने के लिए देवताओं ने इन दोनों को उत्पन्न किया । एवं उत्पन्न करके इन दोनों में झगड़ा उत्पन्न कर दिया । यहां इतना और समझना चाहिए कि जिसे हमने सुपर्णी कहा है उसे ही पौराणिक विनता कहते हैं । पृथिवी का जो अग्नि है वह अङ्गिरा कहलाता है । यह अङ्गिरा अग्नि पृथिवी - केन्द्र से ऊपर की ओर प्रतिक्षण जाया करता है । पृथिवी का अङ्गिरा अग्नि अनवरत द्युलोक की ओर जाया करता है । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है-साथ ही सौर प्रारण जिसे कि आदित्य कहेंगे हर पल पृथिवीलोक में आया करता है । ये आदित्य - सूर्य - रश्मियां पृथिवी पर आ कर टकराती हैं । टकरा कर प्रतिफलित हो कर वापस द्युलोक की श्रोर चली जाती हैं । इस प्रकार आदित्य भी द्युलोक की ओर जा रहा है — एवं अङ्गिरा भी द्युलोक की ओर जा रहा है । अङ्गिरा अमृत मर्त्य भेदेन दो प्रकार का है । जो मर्त्य अङ्गिरा है अर्थात् अग्नि है उसी का नाम कद्रू है और जाते हुए आदित्य का नाम सुपर्णी है । सुपर्णी वाक् को कहते हैं । वाक् ही का नाम आदित्य है अर्थात् इन्द्र है । सूर्य से आदित्य, पृथिवी - लोक में जाकर पृथिवी में टक्कर मारता है ।
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण चित्य अङ्गिरा और आदित्य दोनों में घर्षण होता है । इस संघर्ष को अश्वघर्षण भी कहा जाता है । बस चित्याग्नि की ओर आने वाले आदित्य का अर्थात् सूर्य्य - रश्मियों का और पार्थिव चित्याग्नि का जो संघर्ष होता है यही कद्रू और विनता की लड़ाई है । कद्रू और विनता अर्थात् सुपर्णी में सदा युद्ध होता रहता है । यह युद्ध होता है देवताओं को प्रेरणा से । देवताओं के अधिष्ठाता हैं इन्द्र । वे रहते हैं - द्युलोक में । उनकी प्रेरणा से सूर्य्य - रश्मियां पृथिवी के अङ्गिराग्नि से टकराती हैं । पृथिवी को ठोकर मार कर घुमा देना - यह इन्द्र का ही काम है । इन्द्र हर पल पृथिवी पर अपनी प्रेरणा का प्रयोग किया करते हैं । इसी -लिए श्रुति कहती है-यज्ञः इन्द्रमवर्धयद्यद्भूमिं व्यवर्तयत् । चकारण प्रपशं दिवि ॥ ( ऋग्वेद म ०८।१४।५ ) कहना यही है कि श्रङ्गिरा और आदित्य की अर्थात् कद्रू और सुपर्णी की स्पर्धा का एकमात्र कारण देवाधिपति इन्द्र ही है । देवता ही कद्रू और सुपर्णी में झगड़ा उत्पन्न करते हैं । आदित्य और अङ्गिरा में अर्थात् कद्रू और सुपर्णी में स्पर्धा चला करती है - इसी अभिप्राय से कहा जाता है: " श्रादित्याश्च ह वा अङ्गिरसश्च स्वर्ग लोकेऽस्पर्धन्त वयं पूर्व एष्यामो वयमिति ऐ ० ब्रा ० ३०१८ ) ॥ ( बस, कद्र और सुपर्णी अर्थात् विनता की लड़ाई का यही रहस्य है । पृथिवी का चित्य अङ्गिरा कद्रू है एवं आने वाला आदित्य और सूर्य्य - रश्मियां जिन्हें कि इन्द्र सम्बन्धेन वाक् कहा जाता है सुपर्णी है । दोनों का इस पृथिवी पिण्ड पर घर्षण होता रहता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहा जाता है-तऽएतेमायेऽसृजन्त सुपर्णी च कद्रू च । वागेव सुपर्णीयं कद्रूः ताभ्यां समदं चक्रुः । ( शत ० ३।६।२।२ ) परस्पर झगड़ा करती हुई वे दोनों ही बोलीं कि अच्छा यों तो अपना झगड़ा शान्त होगा नहीं अतएव एक शर्त लगानी चाहिए - जिससे यह झगड़ा शांत हो जाय । वह शर्त यही है कि जिसकी तेज निगाह हो, जो अधिक दूर की वस्तु देख सके, वही स्वामिनी बन जाय, दूसरी उसकी दासी बन जाय । दोनों ने इस बात को स्वीकार कर लिया । कद्रू ने सुपर्णी से कहा कि अच्छा, आकाश की ओर देख कर बतलाओ - कि तुम्हें क्या दिखलाई पड़ता? सुपर्णी ने कहा कि इस पृथिवी के उस पार मुझे एक सफेद घोड़ा दीख रहा है एवं वह एक थूण से बँध रहा है । विष्ववृत्तीय पृष्ठि - केन्द्र को जैसे ध्रुव कहते हैं, उसी प्रकार क्रान्तिवृत्तीय सृष्टि- केन्द्र को कदम्ब कहते हैं । यह कदम्ब ध्रुव से २४ अंश के अन्तर पर है । ध्रुब इस कदम्ब के चारों ओर परिक्रमा लगाता रहता है । इसी कदम्ब को विष्णु - स्थान कहते हैं । पृथिवी का जो १७ वां ग्रहरण है उससे १. विज्ञान चित्रावली प्रथम खण्ड में शतपथ ब्राह्मण ( द्वितीय खण्ड ) के अन्तर्गत ध्रुव - विद्युत् परिलेख देखें । [ ३६५ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० २ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मणं है - घोड़ा सफेद है परन्तु कद्रू कहती है सफेद घोड़े के काले बाल भी हैं और वे हवा से हिल भी रहे हैं । अर्थात् सूर्य्यं के हिरण्मय में पृथिवी का काला प्राण भी शामिल है । यदि काला रंग शामिल न होता तो सूर्य के सात रंग हो ही नहीं सकते । सुपर्णी को सफेद ही दीखता है, इसका अर्थ यही है कि सुपर्णी प्रतिफलित आदित्य का नाम है । मादित्य सूर्य्यं है । यह वास्तव में सफेद है । प्रतिफलित आदित्य ही तो सुपर्णी है, जिसका कि प्रभव सूर्य्यं है । सुपर्णी की अपेक्षा वास्तव में सूर्य सफेद है । परन्तु इसमें पृथिवी का काला भाग भी शामिल । यही काले बाल हैं एवं साथ ही ये हवा से हिल रहे हैं । सूर्य-रश्मियों में जैसे पृथिवी का काला प्रारण है उसी प्रकार उनमें अन्तरिक्ष का वायु भी घुसा हुआ है । यदि वायु न होता तो रश्मियों में प्राणादपानात् क्रिया न होती । गति के अधिष्ठाता वायु ही है । रश्मियों में जो चमचमाहट दीखती है वह इसी वायु का काम ' है । यदि वायु इस सूर्य्य - स्वरूप सफेद घोड़े में शामिल न होता तो घोड़े के रश्मिस्वरूप बाल कभी न हिलते । परन्तु हिलते हैं प्रतएव मानना पड़ता है कि इसमें वायु भी शामिल है । कहने का तात्पर्य यही है कि सूर्य्य- रश्मियों में काला प्रारण भी है । इसी से सूर्य में सात रंग हैं एवं वायु भी है— तभी रश्मियाँ चमाचम रहती हैं । सुपर्णी कहती है - सफेद ही है । कद्रू कहती है — काले बाल भी हैं और वे हवा से हिल भी रहे हैं । अर्थात् सूर्य्य में पृथिवी और अन्तरिक्ष दोनों ही वस्तु शामिल हैं । हमने सात रंग बतलाए हैं । कहने को सात हैं । मोटी नजर से सात रंग बतलाए गये हैं । वस्तुतस्तु बिन्दु - बिन्दु पर रंग बदल जाते हैं । परन्तु ध्यान रहे, इसका एकमात्र कारण यह पूषा पृथिवी ही है । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है-" शुक्रं ते श्रन्यद्यजतं ते अन्यद्विषुरूपे श्रहनी द्यौरिवासि । विश्वा हि माया श्रवसि स्वधावो भद्रा ते पूषन्निहरातिरस्तु ॥ ( ऋग्वेद ६।५८ ।१ ) सूर्य में जो सात रंग बतलाये गये हैं— उनमें से प्रायः हरित और लाल ही दीखा करते हैं । श्रव-शिष्ट रंग गौर करने से दीखता है । इसमें जो हरित रंग है वह पृथिवी की वस्तु है । लाल, सूर्य्य की वस्तु है एवं चमचमाहट वायु की वस्तु है । तीनों शामिल हैं । सूर्य्य में पृथिवी का हरित वर्ण शामिल है त -एव इन्द्र को हरिदश्व भी कहा जाता है । पौराणिक कथा में बतलाया गया है कि जब कद्रू और विनता में परस्पर शर्त ठहर गई — कद्रू कहती थी - घोड़े की पूँछ काली है एवं विनता कहती है कि घोड़ा बिल्कुल सफेद है तो इससे कद्रू को बड़ी चिन्ता हुई - क्योंकि घोड़ा वास्तव में सफेद था । अतएव कद्रू ने अपने पुत्रों ( सर्पों को ) को आज्ञा दी कि पुत्रो, तुम जा कर उस घोड़े की पूँछ के लिपट जाम्रो । सर्पों ने वैसा ही किया । विनता ने देखा तो वास्तव में घोड़े की पूँछ काली पाई । अतएव प्रतिज्ञानुसार उसे इस कद्रू की मातहती स्वीकार करनी पड़ी । इसका तात्पर्य्य यही है कि पृथिवी की जो काली रश्मियाँ हैं वे सर्पण करती हुई सूर्य में शामिल होती रहती हैं । इतना ही नहीं पृथिवी का जो साम है वह सूर्य्य से भी ऊपर तक चला जाता है । इसीलिए तो पृथिवी के साम को रथन्तर - साम कहा जाता है । इस प्रकार सूर्य्य अर्थात् सूर्य्य वाक् अर्थात् सुपर्णी, कद्रू अर्थात् पृथिवी के शासन में रहती है । बस इसी प्राकृतिक विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहा जाता है— [ ३६८ ।
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण " सा ह सुपर्ण्यवाच । श्रस्य सलिलस्य पारेऽश्वः श्वेत स्थारणौ सेवते तमहं पश्यामीति तमेव त्वं पश्यसीति । तं होत्यथ ह कद्रूरुवाच । तस्य वालो न्यषञ्जित ममुं वातो धूनोति त महं पश्यामीति । ( शत ० ३ । ६ । २२४ ) जब कद्रू ने कहा कि मैं काले बाल श्रीर देखती हूं तो सुपर्णी ने कहा कि हम यों नहीं मान सकते । चलो, हम दोनों ही उड़ कर असली बात का प्रत्यक्ष कर लें । कद्रू ने कहा कि यह नहीं हो सकता । संदेह तुमको है, तुम जाकर देख सकती हो । हम नहीं चलते, तुम देख आओ । अपन दोनों में से कौन जीता, यह तुम आ कर कह देना । हम तुम्हारी बात पर विश्वास कर लेंगे । सुपर्णी लाचार थी । वही आकाश में उड़ी । उसने जाकर देखा तो वास्तव में घोड़े के बाल काले थे । यह देख कर सुपर्णी वापस लौट आई जीती और कहा कि बहिन, मैं हारी और तुम । कद्रू पृथिवी - पिण्ड का नाम है । पिण्ड बाहर तक धावा नहीं मारता । पिण्ड में से निकलने वाली जो वाक् है - वही ३३ तक जाती है । प्रत्येक पदार्थ का महिमामण्डल ही बाहर की ओर जाया करता हैन कि पिण्ड । पिण्ड अपने स्थान पर रहता है । महिमामण्डल दूर तक जाता है । जैसे पिण्ड का नाम पृथिवी है— महिमामण्डल का नाम वाक् है । पृथिवी का नाम कद्रू है - वाक् का नाम सुपर्णी है । कद्रू अर्थात् पृथिवी सूतक नहीं जाती अपितु पृथिवी की वाक् – पृथिवी का साम अर्थात् सुपर्णी - सूर्य्य तक जाती है । सूतक ही नहीं जाती अपितु सूर्थ्य के रथ के भी उस पार तक चली जाती है । बस, इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहते हैं— " सा ह सुपर्ण्यवाच । एहीदं पताव वेदितुं यतरा नौ जयतीति सा ह कद्रूरुवाच त्वमेव पत त्वं वं न प्राख्यास्यसि यतरा नौ जयतीति । सा ह सुपर्णी पपात । तद्ध तथैवास यथा कद्रूरुवाच ता मागता मभ्युवाद त्व मजैषी ३ रहा ३ मिति त्वमिति होवाचैतद्धयाख्यानं सौपर्णीकाद्रव मिति ॥ ” ( शत ० ३।६।२।६-७ ) एक दिन कद्रू ने सुपर्णी से कहा, तुम मेरी दासी हो । यदि इस दासीपने से छुटकारा पाना चाहती हो तो देवताओं के लिए सोम ले आओ । सोम लाने पर हम तुम्हें दासीपने से छुटकारा दे देंगे । सुपर्णी ने इस बात को स्वीकार कर लिया । इस पर सुपर्णी वाक् ने गायत्री, त्रिष्टुप् और जगती नाम की तीन पत्नियों को पैदा किया । पृथिवी में से निकलने वाली जो वाक् है वह ३३ तक रहती है - जैसा कि पूर्व के प्रकरणों में बतला दिया गया है । इस वाक् से गायत्री, त्रिष्टुप् और जगती का जन्म होता है । हमने बतलाया है कि पृथिवी का अमृताग्नि २१ प्रहर्गण तक जाता है । २१ के बाद ३३ अहर्गण तक भास्वर सोम और दिक्सोम रहता है । यह अग्नि, घन तरल- विरल भेद से तीन स्वरूपों में परिणत हो जाता है । घन - अग्नि त्रिवृत् तक अर्थात् पृथिवी के 8 वें ग्रहण तक रहता है । तरलाग्नि पञ्चदशस्तोम तक रहता है एवं विरलाग्नि एक-[ ३६ ९ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण विश स्तोम तक रहता है । जो घन - अग्नि है, उसे अग्नि ही कहते हैं । तरलाग्नि को इन्द्र किंवा वायु कहते हैं एवं विराग्नि को प्रादित्य कहते हैं । इस प्रकार एक ही अग्नि इन घन - तरल - विरलावस्थाओं में परिणत होकर अग्नि- वायु - आदित्य इन तीन स्वरूपों में परिणत हो जाता है । एक वषट्कार के— तीन वषट्कार बन जाते हैं । अग्नि का अर्थात् पृथिवीपिण्ड का वषट्कार - मण्डल अलग बन जाता है । वायु का अर्थात् अन्तरिक्ष का वषट्कार अलग बन जाता है एवं द्युलोक का अर्थात् सूर्य का वषट्कार पृथक् वन जाता है । एक वाक् तीन वषट्कारों को उत्पन्न कर देती है । एक ही वाक् पृथिवी अन्तरिक्ष-यो तीन भागों में परिणत हो जाती है । पृथिवी के वषट्कार का जो छन्द है, उसका नाम है गायत्री । अन्तरिक्ष के छन्द का नाम है त्रिष्टुप् एवं द्यौ के छन्द का नाम है जगती । छन्द उस पदार्थ का नाम है जिसमें कि सारे पदार्थ रहते हैं । श्रायतन का नाम छन्द है । छन्द से ही देवता का स्वरूप बनता है । छन्दित करने वाले को छन्द कहते हैं । वयोनाध ही को छन्द कहते हैं । पुस्तक का जो एक प्रकार है, उसी का नाम छन्द है । यदि उस आकार को नष्ट कर दिया जाएगा तो पुस्तक उसी समय नष्ट हो जाएगी । छन्द के ग्राधार पर, पैमाने के आधार पर, वस्तु की सत्ता रहती है । अग्नि वायु आदि पदार्थ ही देवता कहलाते हैं । ये उस छन्द पर ही रहते हैं । इसीलिए इन छन्दों को देवताओं का घोड़ा बतलाया जाता है । प्रत्येक पदार्थ का छन्द भिन्न - भिन्न होता । यदि उस छन्द में अणुमात्र भी कम ज्यादा हो जाता है । तो उस वस्तु का स्वरूप नष्ट जाता है । ऋग्यजु साम ये तीनों छन्द पर रहते हैं । चूंकि बिना छन्द के वेद - सत्ता रह नहीं सकती श्रतएव छन्द ही को वेद कह दिया जाता है । वेद अभिप्राय से ही -" छन्दोवत् सूत्राणि भवन्ति " यह कहा जाता है । प्रत्येक वस्तु का एक महिमामण्डल होता है । यह बात हम पूर्व के प्रकरण में बतला श्राए हैं । मण्डल जितने भी होते हैं वे गोल होते हैं या चतुर्भुज होते हैं । प्रत्येक मण्डल चाहे छोटा हो, चाहे बड़ा हो ३६० अंश में परिणत होता है । ३६० के ६० - ६०-६०-६० के हिसाब से चार टुकड़े किये जाते हैं । खगोल के जो चार हिस्से हैं उन्हें स्वस्तिक कहा जाता है । यही चारों हिस्से चार भुजाएँ कहलाती हैं । खगोल की इन्हीं चार भुजाओं का वर्णन करती हुई श्रुति कहती है—
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
( ऋग्वेद मं ० १८६/६ ) वृद्धश्रवा नाम का इन्द्र जो कि चित्रा का स्वामी है, वह अर्थात् चित्रा ही और पूषा अर्थात् रेवती दोनों ठीक १८० अंश पर हैं । चित्रा से रेवती १८० अंश पर है एवं रेवती चित्रा से १८० अंश पर है । इसी प्रकार ता अर्थात् श्रवण- बृहस्पति से प्रथात् लुब्धकबन्धु से १८० अंश पर है । इस प्रकार सारा आकाश ४ भागों में विभक्त है । ( चित्र पृष्ठ ३७१ पर देखें ) निर्देशन मात्र है - संसार के यच्चयावत् मण्डलों में यही चतुर्भुज व्यवस्था होती है । मण्डल जिसके ग्राधार पर रहता है उसी का नाम छन्द है । छन्द ही तो सव का आलम्बन है । इस प्रकार मण्डल के चार भाग करना उस छन्द के चार भाग करना है । इससे सिद्ध हो जाता है कि प्रत्येक छन्द चार - चार भागों में विभक्त है । भाग को वैदिक परिभाषा में अक्षर कहा जाता है । इसी अभिप्राय से महर्षि महीदास कहते हैं-[ ३७० ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण पश्चिम विश्ववेदाः पूषा रेवती नः स्वस्ति ६० उत्तर श्रवण स्वस्ति नस्तादयौः अरिष्टनेमि ne 101 स्वस्ति न चित्रा इन्द्रो वृद्धश्रवा पूर्व ६० 03 छन्दांसि वै तत्सोमं राजानमच्छाचरंस्थानि ह तर्हि चतुरक्षराणि । चतु-रक्षराण्येव च्छन्दांस्यासन्सा जगती चतुरक्षरा ॥ ( ऐत ० ब्रा ० १३।१ ) प्रत्येक वृत्त के पूर्वापर एक वृत्त होता है । एक याम्योत्तर होता है । इन दोनों वृत्तों से प्रत्येक मण्डल चार विभागों में विभक्त हो जाता है । यही उस मण्डल के छन्द के चार प्रक्षर हैं । हमने बतलाया है कि पृथिवी, अंतरिक्ष और द्यौ तीन मण्डल हैं । अतएव तीनों के तीन छन्द हैं एवं प्रत्येक छन्द चार-चार अक्षर का है । जो पृथिवी का छन्द है उसका नाम ' गायत्री ' है । अंतरिक्ष के छन्द का नाम ' त्रिष्टुप ' है एवं द्यौ के छन्द का नाम जगती है । पृथिवी के अधिष्ठाता अग्नि हैं, अन्तरिक्ष के अधिष्ठाता वायु हैं एवं द्यौ के अधिष्ठाता आदित्य हैं । जो श्रग्नि है उसकी विशेष आठ अवस्थाओं का नाम ही आठ वसु हैं । वायु की ग्यारह अवस्थाओं का नाम ही ग्यारह रुद्र हैं एवं श्रादित्य की १२ श्रवस्थाओं का नाम ही १२ प्रादित्य हैं । वसुत्रों का छन्द अर्थात् अग्नि का छन्द गायत्री है, रुद्र का त्रिष्टुप् है, द्यौ का जगती है । इसी अभिप्राय से कहा गया है-[ ३७१ ]
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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण " वसवस्त्वा पुरस्तादभिषिञ्चन्तु गायत्रेरण छन्दसा | रुद्रास्त्वा दक्षिण-तोऽभिषिञ्चन्तु त्रैष्टुभेन छन्दसा । श्रादित्यास्त्वा पश्चादभिषिञ्चन्तु जागतेन छन्दसा इति ॥ ( तै ० ब्रा ० २ | ७ | १५ | ५ ) सम्पूर्ण प्रपञ्च से हमें बतलाना यही है कि उस सुपर्णी वाक् में जो कि ऐन्द्री वाक् कहलाती है, ३ मण्डल उत्पन्न होते हैं । तीनों के तीन छन्द उत्पन्न होते हैं, बस यही सुपर्णी का तीन छन्द उत्पन्न करना है । परन्तु तीनों उत्पन्न हुए हैं - पृथिवी ( कद्र ) की प्रेरणा से । पृथिवी का अग्नि ही अग्नि वायु प्रादित्यस्वरूप में परिणत हुआ है । इस प्रकार सुपर्णी ने सबसे पहले जगती को सोम लाने के लिए भेजा परन्तु रक्षक गन्धर्वो ने जगती के तीन पैर तोड़ पृथिवी की ओर फेंक दिया । वह बेचारी अपनी एक टांग को वापस ले कर आ गई और कह दिया कि हमसे सोम नहीं आ सकता । सबसे पहले पृथिवी है । बाद में अन्तरिक्ष है उसके बाद में द्यौ है । पृथिवी का गायत्री छन्द है, अन्तरिक्ष का त्रिष्टुप छन्द है एवं द्यो का जगती छन्द है । द्यौ के अधिष्ठाता सूर्य्य | सोम परमेष्ठिमण्डल में रहता है । इस सोम के नजदीक जगती ही है अर्थात् सूर्य ही है । पारमेष्ठ्य सोम का सम्बन्ध पहले द्युमण्डलस्थ जगती छन्द से होता है परन्तु तीन हिस्से तो उधर ही चले जाते हैं एवं एक हिस्सा पृथिवी लोक की ओर चला आता है | सूर्य्यं के ऊर्ध्व भाग की किरणें ऊपर की ऊपर ही निकल जाती हैं । दक्षिण - उत्तर पार्श्व की दक्षिणोत्तर निकल जाती हैं । पृथिवी की तरफ जगती छन्द का एक हिस्सा ही जा पाता है । सूर्य्य के तीन हिस्से इधर - उधर तथा ऊपर निकल जाते हैं । केवल एक पाद हमारे ऊपर आ पाता है । इसी अभिप्राय
श्रुति कहती है-त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः ।
ततो विष्वविप्रक्रामत्साशनानशने श्रभि ॥
( ऋग्वेद मं ० १०1०1४ ) सबसे पहिले जगती छन्द गया । उसके तीन पैर सोमरक्षक गन्धर्वों ने तोड़ डाले । इसका यही रहस्य है । बाद में त्रिष्टुप् गई । उसका एक पैर तोड़ डाला और तीन पैरों सहित उसे पृथिवी पर डाल दिया । सूय्यं से नीचे – अन्तरिक्ष के छन्द का नाम है त्रिष्टुप् । इसके द्वारा जो सोम पृथिवी पर आता है वह तीन हिस्से युक्ताता है | आता तो है एक ही तरफ का परन्तु ऊपर से आने वाली सूर्य्य- रश्मियाँ दोनों पाश्र्व को तिरछा कर त्रिष्टुप् को- दोनों पार्श्वो के सोम को भी पृथिवी पर ही डाल देती । बस यही त्रिष्टुप् की एक टांग के टूटने का रहस्य है । बाकी बचती है गायत्री । गायत्री सत्य - अग्नि है । क्योंकि पृथिवी केन्द्र से बद्ध है । सत्य में ऋत् की अपेक्षा अधिक बल रहता है । इसलिए गायत्री ने जोर से झपट्टा मारा और सोमरक्षक गन्धर्वों को डरा कर झट सोम ले लिया और वहाँ पर जो जगती की और त्रिष्टुप की टांगें थीं उन्हें भी उठा लाई । तीन जगती की टाँगें थीं और एक त्रिष्टुप की थी । इन चारों के श्रा जाने से गायत्री आठ पैर वाली हो गई । बम तभी से " अष्टाक्षरा वै गायत्री " यह बात प्रसिद्व हो गई । गायत्री ही सोमला सकी । इसमें जगती का और त्रिष्टुप् का सोम भी शामिल हो जाता है । शेष सोम सूर्य्यं के ऊपर और पार्श्व में चला जाता है । यही ग्रष्टाक्षरा गायत्री का तात्पर्य है । [ ३७२ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मणं जब गायत्री सोम ले आई तो सुपर्णी इसके दासीपने से मुक्त हो गई । यदि सोम की आहुति इस चित्याग्नि में न पड़ती तो पृथिवी का यह अग्नि यवाक् कभी ऊपर तक नहीं जा सकता था । इसका एक-मात्र कारण यह सोम ही है । अग्नि, वायु, आदित्य तीनों अग्नि ही हैं । तीनों देवता हैं । ये सोम को चाहा करते हैं । यह चाह उस गायत्र्याग्नि के द्वारा पूरी हुआ करती है । इस अग्नि में उस सोम की आहुति अनवरत पड़ा करती है । चन्द्रमा सोम- पिण्ड है । यह परमेष्ठिमण्डल की वस्तु है । चन्द्रमा पृथिवी और गायत्री के चौतरफा ही घूमता है । पृथिवी अन्तरिक्ष और द्यौ अर्थात् गायत्री, त्रिष्टुप, जगती तीनों ही सोम को चाहते हैं । परन्तु सोम मिलता है गायत्री को । इस का प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि सोम अर्थात् चन्द्रमा पृथिवी से ही बद्ध रहता है । इस प्रकार वाक सुपर्णी ने तीनों को पैदा कर गायत्री द्वारा अर्थात् गम्ड़ द्वारा अपना दासीपना छुड़ाया था । देवताओं ने गायत्री द्वारा आगत सोम से ही यज्ञ किया था । एक बात और कहकर हम इस प्रकरण को समाप्त करते हैं । गरुड़ - रूपा गायत्री जिस समय सोम लेने गई उस समय इन्द्र ने कहा था कि तुम सोम ले तो जाओ परन्तु हम उसी समय इसे उठा लाएँगे । गरुड़ ने इस बात को स्वीकार कर लिया । गरुड़ ने अमृत ला कर कद्रू को सौंपा । इधर इन्द्र आये और चुपके से उस अमृत को उठा ले गये । में सोम की आहुति पड़ती है परन्तु साथ ही वह सोम आधिदैविक इन्द्र द्वारा वापस भी चला जाता है । प्रदान- विसर्ग समानरूपेण हुआ करता है । आगे जा कर कहा है कि गरुड़ सर्पों के वैरी बन गए । वास्तव में बात सत्य है । सूर्य्य वाक् सुपर्णी अपनी रश्मियों से पृथिवी के प्राणमय पदार्थों को सदा चूसा करती है । जब सुपर्णी कमजोर होती है - चातुर्मास्य आता है - सूर्य का प्रकाश धीमा पड़ जाता है अर्थात् गरुड़, क्षीण - तेज हो जाते हैं तो धरातल पर उन सर्पों का राज्य अधिक हो जाता है । उस प्राकृ-तिक सर्प - प्रारण की अधिक प्रबलता चातुर्मास्य में ही होती है । अतएव इन दिनों में सांप अधिक उत्पन्न होते हैं । बस, धिष्ण्याब्राह्मण के सौपर्णीकाद्रवाख्याना का यही वैज्ञानिक रहस्य है । इसका विस्तृत विवेचन इसी ब्राह्मण में किया जायगा यहां पर केबल इतना ही समझ लेना पर्याप्त होगा कि देवतानों ने सोम के लिए कद्रू और सुपर्णी को उत्पन्न किया एवं सुपर्णी ( वाक् ) ने दासीपने से मुक्त होने के लिए गायत्री, त्रिष्टुप् और जगती को उत्पन्न किया । इन तीनों में से देवताओं के लिए गायत्री ने गरुड़ बन कर सोम की ओर धावा मारा । " तेभ्यो गायत्री सोममध्यापतत् " एक झपट्टा मारकर गायत्री ने वहां से सोम उठा लिया । जिस समय गायत्री सोम ला रही थी उस समय सोम लाती हुई उस गायत्री के सोम को - सोमरक्षक गन्धर्वों में से विश्वावसु नाम के गन्धर्व ने चुरा लिया । देवताओं ने विचार किया कि जब सोम परमेष्ठी से च्युत हो गया है - तो फिर क्या कारण है कि वह हमारे पास नहीं प्राता । आखिर देवताओं ने इसका कारण समझ लिया कि सोम को अवश्य गन्धर्वो ने छीन लिया है । अग्नि ग्यारह प्रकार का होता है । गार्हपत्य, आहवनीय और धिष्ण्याग्नि । गार्हपत्य, पार्थिवाग्नि का नाम है, आहवनीय दिव्याग्नि का नाम है, एवं धिष्ण्याग्नि, अन्तरिक्ष्याग्नि का नाम है । यह धिष्ण्याग्नि कुल आठ हैं । इस प्रकार ये ग्यारहों अग्नि, रुद्र कहलाते हैं । संसार की उत्पत्ति इन्हीं ग्यारह रुद्रों से [ ३७३ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण होती है । पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्यौ त्रिलोकी के रस से ही सारे विश्व की उत्पत्ति होती है । इनमें से जो आठघण्याग्नि हैं, वे ही आठ गन्धर्व कहलाते हैं । जैसा कि धिष्ण्याब्राह्मण में स्वयं याज्ञवल्क्य कहते हैं— " तमेते गन्धर्वाः सोमरक्षा जुगुपुः । इमे धिष्ण्या ऽइमा होत्रा: " ( शत. ३ | ६ | २ | E ) सृष्टि के प्रारम्भ में पृथिवी की गायत्री अग्नि में सोम आया नहीं था, अतएव वह निर्बल थी । यह गायत्री जब सोम लाई तो वह पृथिवी तक न आ पाया और आकाश में, अन्तरिक्ष में ही रह गया ।-अन्तरिक्ष में धिष्ण्याग्नि थे । अग्नि, सोम को खाने वाला होता है । सोम अत्यल्प मात्रा में श्राया था । अतएव वह पृथिवी पर नहीं आ पाया और अन्तरिक्ष में ही धिष्ण्याग्नि द्वारा मुक्त हो गया । बस, इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर कहते हैं । " तस्याऽप्रहरन्त्यं गन्धर्वो विश्वावसुः पर्यमुष्णात् ते देवा श्रविदुः " प्रच्युतो वै परस्तात्सोमोऽथ नो नागच्छति गन्धर्वा वै पर्यमोषिषुरिति ॥२ ॥
इसी आख्यान के द्वारा भगवान् याज्ञवल्क्य " इंगितेन चेष्टितेन निमिषितेन ” – इत्यादि न्यायानु-सार स्त्रियों के स्वभाव - विज्ञान को बतलाते हैं । जब देवताओं को यह मालुम हुआ कि सोम श्राया अवश्य था परन्तु गन्धर्वो ने चुरा लिया तो उन्होंने कहा कि गन्धर्व लोग योषित् - काम होते हैं अर्थात् स्त्रंण होते हैं । इसमें प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि गन्धर्वप्राण से उत्पन्न होने वाले ईरान - निवासी वास्तव में स्त्रैण ही थे । इनमें विवाह प्रथा नहीं थी । केवल प्रेममात्र था । जिसे जो पसन्द प्राई उसने उसी को रख लिया एवं मन में आई तभी उसे छोड़ दूसरी को रख लिया । प्राकृतिक देवप्राण से जिनका श्रात्मा बनता है वे देवता कहलाते हैं, एवं गन्धर्वप्राण से जिनका आत्मा बनता है वे गन्धर्व कहलाते हैं । यद्यपि प्राण रहते सब में सब हैं परन्तु जिसमें जो प्रारण उल्वण रहता है वह उसी नाम से, उसी जाति से व्यवहृत होता है | स्त्री से मतलब योषाप्रारण है और गन्धर्व से एक विशेष प्रकार का वृषाप्राण अभिप्रेत है । गन्धर्व वृषाप्राण योषा को प्रकृति से बहुत चाहा करता है । यही कारण है कि गन्धर्व वृषाप्रारण से जिनका आत्मा बना हुआ था वे गन्धर्व लोग अत्यन्त ही स्त्रैण होते थे । — इतना ही नहीं, अपितु आज भी जिसे तुम स्त्रैण देखो - समझ लो इसमें गन्धर्वप्राण अधिक मात्रा में उत्वरण है । गन्धर्व सौम्यप्राण का नाम है । परमेष्ठिमण्डल के सौम्यप्रारण का नाम ही गन्धर्व है । सोम को ही शुक्र कहते हैं । शुक्रग्रह सोमघन है । जिसके लग्न में शुक्र बैठा रहता है वह मनुष्य अत्यन्त ही स्त्रैण होता है, कामी होता है । बस गन्धर्व-प्राण के विज्ञान को बतलाने के अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं— ते होचुः योषित् कामा वै गन्धर्वाः - इति इसलिए हम स्त्रैण गन्धर्वो को मुग्ध करने के लिए अपनी वाक् ही को भेजें । वाक् स्त्री है एवं गन्धर्व स्त्री - काम हैं अतएव उसे भेजने पर वे इससे युक्त हो जाएँगे तथा सोम के साथ वह वाक् अपने [ ३७४ ]