Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 391–400

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 391–400

पृष्ठ 391

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तृतीय काण्ड ( 9 शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मणं .८ आएगी । यह निश्चय कर देवताओं ने वाकू को भेज दिया । वाक् उन गन्धर्वों के साथ वापस लौट आई । गायत्री ने जिस सोम का आहरण किया था, वह बीच ही में रह गया । कुछ थोड़ा सा सोम ही पार्थिवाग्नि में आहुत हो पाया । इस थोड़े से सोम से अग्नि को अर्थात् वाक् को मदद मिली तो उसमें और अधिक बल आया । जब दुबारा वाक् ने सोम पर आक्रमण किया तो सोम गन्धर्वप्राण सहित पृथिवी में आ गया । गन्धर्व सौम्य प्राण ही का नाम है । पहले वाले सोम का तो आना न आना समान था परन्तु अब जो सोम प्राया वह अधिक मात्रा में आया । अतएव सौम्यप्राण गन्धर्वो का भी देव-मण्डली में, पार्थिवाग्नि में समावेश हो गया । बस यही तात्पर्य है — योषित्कामा वै गन्धर्वा वाचमेवैभ्यः प्रहिणवाम सा नः सह सोमेनागमिष्य-तीति तेभ्यो वाचं प्राहिण्वन्त्सैनान्त्सह सोमेनागच्छत् ॥३ ॥

वे गन्धर्व लोग इन पार्थिव देवताओं से आ कर बोले कि हे देवताओ! सोम आपका हो और वाक् हमारी हो । देवताओं ने कहा- बहुत अच्छा, इसमें हमारा कोई नुकसान नहीं है । हमें तो सोमयज्ञ करने के लिए सोम चाहिए । देवताओं का सम्बन्ध वास्तव में सोम से है । देवता अग्निमय हैं । अग्नि सोम ही की अपेक्षा रखता है । यदि अग्नि में सोम की आहुति पड़ जाती है तो अग्नि की सत्ता नष्ट नहीं हो पाती । एवमेव वाक् का अधिक सम्बन्ध गन्धर्वप्राण के साथ है । वाक् से ही क - च - ट - त - प-श्रात्मिका शब्दात्मिका वाक् उत्पन्न होती है । गन्धर्वों का वाकू से अधिक सम्बन्ध है । इसमें प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि जो मनुष्य गन्धर्व होते हैं वे गाने - बजाने को ही अधिक पसन्द करते हैं । बस इसी को लक्ष्य में रख कर कहा है-ते गन्धर्वा अन्वागत्याब्रुवन् । सोमो युष्माकं वागेवास्माकमिति त देवा ब्रुवनि ॥ ४ ॥।

देवताओं ने गन्धर्वो से कहा कि हे गन्धर्वो! वाक् को आप ले अवश्य जा सकते हैं परन्तु बला-त्कार से नहीं । आप बलात्कार से इसे मत बुलाओ, मीठे शब्दों से बुलाओ । हम भी बुलाते हैं । आप भी बुलाइए । इसकी मर्जी होगी, उधर चली जाएगी । स्त्री के साथ बलात्कार कभी नहीं करना चाहिए, यही इससे शिक्षा मिलती है । इह आगता हे गन्धर्वाः एनां अभीवहेव, नष्ट विपामहाऽइति । इस प्रकार देवता और गन्धर्व दोनों ही उस वाक् को अपनी ओर बुलाने लगे । इसमें पहले गन्धर्वों ने उसको बुलाने के लिए वेदों का प्रवचन किया अर्थात् बुलाने के लिए गन्धर्वो ने वेद की मधुर वाणी का प्रयोग किया । हम यह विद्या जानते हैं । हम यह कला जानते हैं । इस प्रकार नाना प्रकार

से प्रलोभन देना शुरू किया ।

तस्यै गन्धर्वाः । वेदानेव प्रोचिरइति वै वयं विमेति वयं विमेति ॥५ ॥

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बृतीय काण्ड ( ०.२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मणं एक कुशा ले कर उसके अग्र भाग में एक सोने की टिकिया मोली ( मौलि ) से बाँध कर एवं उस कुशा को उस आज्ययुक्त जुहू में रख कर उस घृत की अवधानपूर्वक आहुति दे देता है । क्रुशा से बँधी हुई सुवर्ण की टिकड़ी उस आहुति में न चली जाय - इस बात का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए - इसीलिए " अवधाय " पद दिया है --" बहिषा हिरण्यं प्रबध्यावधाय जुहोति " कुश में सोने की टिकड़ी क्यों बाँधनी चाहिए इसकी उपपत्ति बतलाते हैं । मैं सारे पय से अर्थात् घृत से आहुति दूं । इसीलिए इसमें सोने की टिकड़ी बाँधी जाती है । आज्य पयः प्रकृतिक है अतएव आज्य को भी पय कह दिया गया है । पय अग्निस्वरूप । दूध साक्षात् अग्निस्वरूप है । अग्नि शुक्ल है । दूध अग्नि का रेत है । इसमें यही प्रमाण है कि चाहे काली गाय का दूध है अथवा लाल का वह सफेद ही होगा । अपिच जब गाय की पहली धार निकाली जाती है तो वह अग्नि के समान गर्म होती है । अतएव इस दूध को हम अग्नि का रेत कहने को तैय्यार हैं इसीलिए अग्निहोत्रब्राह्मण में कहा गया है— अग्ने रेतस्तस्माद्यदि कृष्णायां यदि रोहिण्याम् शुक्लमेव भवति अग्निसङ्काशम् । अग्नेहि रेतः । तस्मात् प्रथमदुग्धमुष्णं भवति श्रग्नेहि रेतः । ( शत ० २।२।४।१५ ) जिस प्रकार दूध अग्नि का रेत है उसी प्रकार सुवर्ण भी अग्नि का ही रेत है । एक खास प्रकार की मिट्टी में जब सूर्य्य - रश्मियाँ बद्ध हो जाती हैं तो वही मिट्टी सुवर्ण बन जाती है । सोना साक्षात् सूर्य की रश्मियाँ हैं । इसीलिए कहा जाता है— अथ हिरण्यं सम्भरति, अग्निर्ह वायपोऽभिदध्यौ मिथुन्याभिः स्यामिति ताः सम्बभूव तासु रेतः प्रासिञ्चत्तद्धिरण्यमभवत्तस्मादेतदग्निसंकाशमग्नेहि रेतः । ( शत ० २।१।१।५ ) कहने का तात्पर्य यही है कि दूध और सोना दोनों का जन्म एक वस्तु से हुआ है । दोनों ही अग्नि - रेत हैं । जो वाक् सोम लाने वाली है, वह गायत्री हैं । गायत्री का ही नाम अग्नि है । अतएव अग्निरेत - स्वरूप आज्य की आहुति दी जाती है । ऐसी हालत में यदि इस आज्य में अग्निरेतस्वरूप सुवर्णं का सम्बन्ध और कर दिया जाय तो अग्नि प्रबल हो जाएगा । बस, इसीलिए सोना बाँधा जाता है— कृत्स्नेन पयसा जुहवानीति समानजन्म वै पयश्च हिरण्यं चोभयं ह्यग्निरेतसम् || ८ || आहुति में सुवर्णं क्यों रखना चाहिए इसका कारण बतला दिया, अब पद्धति बतलाते हैं । वह अध्वर्यु – “ एषाते शुक्र तनूरेतद्वर्च इति वर्चो वा एतद्यद्धिरण्यं तथा सम्भव भ्राजं गच्छेति ॥६ ॥

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मणं यह मन्त्र बोलता हुआ इस सोने की टिकडी को कुशा के साथ बाँध देता है । शुक्र एषा ( एतद्यद्धिरण्यं ) ते तनूः शरीरम् । अथवा - एषा जुहूस्ते-तनूः । एवं एतत् ( ाज्यमेव ) तेवर्चः ( तेजः ) तया सम्भव तया भ्राजं गच्छ । शुक्र, हे वीर्यवान् - यह सुवर्ण आपका शरीर है । अग्नि ही सुवर्ण बनता है - यह बात हम पूर्व में कह आये हैं । वीर्य्यं संसार में कुल तीन ही प्रकार के होते हैं । १ - ब्रह्मवीर्थ्य, २ - क्षत्रवीर्य्यं, ३ – विश-वीर्य्य- इन तीनों में से ब्रह्मवीर्य्याधिष्ठाता यही अग्नि है । उसीसे प्रार्थना कर रहे हैं कि - हे शुक्र! वीर्य्य-वान् अग्नि! सुवर्णं ही आपका शरीर है । अर्थात् आज श्राप सुवर्णरूप में परिणत हो रहे हैं । अग्नि से मतलब वाक् का समझना चाहिए । प्रमृताग्नि का नाम ही वाक् है । वही तो सोम लेने जाएगी, उसी के लिए यह आहुति दी जारही है । यह प्राज्य इस अग्नि का वर्च है, अर्थात् तेज है । ब्रह्मतेज का नाम ही वर्च है । अग्नि में जब घृत डाला जाता है- अग्नि अधिक प्रज्वलित हो जाता है, अधिक तेजस्वी हो जाता है अतएव मानना पड़ता है कि यह आाज्य अवश्य ही वाग्रूप अग्नि का तेज है । सुवर्ण उस वाक् का शरीर है । आज्य बर्च है अर्थात् तेज है । बिना तेज और शरीर के वाक् कोई काम नहीं कर सकती श्रतएव कहते हैं कि हे वाक् - आप इस तनू के साथ संगत कीजिए अर्थात् इन दोनों से मिल जाइए और मिल कर अपने को सबल बनाइए । भ्राज की ओर जाइए । अर्थात् सोम लेने पधारिए । सोना भी आग है । आाज्य भी आग है । इसीलिए तो " तेजो वा श्राज्यम् ' यह कहा जाता है । वाक् भी अग्नि है । गायत्री - वाक् अग्निस्वरूपा ही तो है । यही सोम लाती है । प्रतएव सुवर्णमिश्रित प्राज्याहुति देना एक प्रकार से अग्नि से उस वागाग्नि का बल बढ़ाना है । यही मन्त्र का तात्पर्य है— सहिरण्यमवदधाति एषा ते शुक्र तनूरेतद्वचं इति वर्चो वाऽएतद्यद्धिरण्यं तया सम्भव भ्राजं गच्छेति स यदाह तया सम्भवेति तया सम्पृच्यस्वेत्येवैतदाह भ्राजं गच्छेति सोमो वै भ्राट् सोमं गच्छेत्येवैतदाह ॥ ९ ॥

आहुति क्यों डाली जाती है इसका स्पष्टीकरण कर देते हैं - सृष्टि के प्रारम्भ में पार्थिव आग्नेय प्रारणदेवताओं ने जैसे इस पार्थिव वाक् को, सुपर्णी को ' तुम सोम की श्रोर जाश्रो ' यह कह कर सोम के लिए उसे पारमेष्ठ्य लोक में भेजा था, तथैव आज यह यजमान ' हे वाक्! तुम सोम लानो ' यह भावना करता हुआ इस वाक् को सोम लेने भेजता है । अर्थात् " यद्वै देवा अकुर्वंस्तत् करवारिण, " के अनुसार जैसे देवताओं ने वाक् को भेजा था वैसे ही आज यह यजमान सोम खरीदने वाली इस वाक् को भेजता है । हमने बतलाया है कि यह प्राहुति वाक् के लिए दी जाती है । यहां पर वाक् - यह सोमक्रयणी गाय ही है । निदानेन गाय को सोमक्रयणी वाक् मान लिया जाता है । निदान का क्या अर्थ है? गौ - वाक् के समान ली जाती है इसका विवेचन हम सोमक्रयणी ब्राह्मण में करेंगे । यहां पर इतना ही समझ लेना पर्याप्त होगा कि - यह सोमक्रयणी गाय ही निदानेन वाक् है । प्रकृतियज्ञस्थ वाक् की नकल पर यह सोम-क्रयणी गाय है । प्राहुति से बृप्त होने वाली सोमक्रयणी वाक् से हम सोम खरीदें - अर्थात् वाक् को सोम [ ३७६ ]

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तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्रह्मण सौमाख्यान ब्राह्मणं बहुत दूर जाना है, अतएव इसमें बल प्रदान करके ही इसे सोम लेने भेजें । इस सोमक्रयणी वाक् आहुति से बृप्त करते हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं— ' तां यथैवादो देवाः प्राहिण्वन्त्सोममच्छ्वमेवैनामेष एतत्प्रहिणोति सोममच्छ वाग्वै सोमक्रयणी निदानेन तामेतयाहुत्या प्रीणाति प्रीतया सोमं क्रीणानीति ॥१० ॥

वह अध्वर्यु निम्नलिखित मन्त्र बोलता हुआ उस श्राज्य की आहुति डालता है । वह मन्त्र यह है-" जूरसि धृता मनसा जुष्टा विष्णवे " “ तस्यास्ते सत्यसवसः प्रसवे तन्वो यन्त्रमशीय स्वाहा " याज्ञवल्क्य मन्त्र के प्रत्येक पद का अर्थ बतलाते हैं " जूराकाशी सरस्वत्यो पिशाच्यां पवने " । अमरकार के वचन से जू का अर्थ आकाश होता है । आकाश का नाम ही वाक् है । लौकिक संस्कृत में जिसे आकाश कहते हैं - वैदिक भाषा में उसे ही वाक् कहते हैं । आकाश से पोल अर्थ अभिप्रेत नहीं है अपितु ईथर अभिप्रेत है । इन्द्र सारे आकाश में भरा रहता है । इस इन्द्र का नाम ही वाक् है । यह सर्वत्र भरी हुई है । हम जो शब्द बोलते हैं वह बीची-तरंगन्यायेन - इसी वाक् से अर्थात् आकांश से अर्थात् ईथर से उत्पन्न होता है । इसीलिए ' शब्दगुरणकमा काशम ' यह कहा जाता है । कहना यही है कि इस वाक् का एक नाम जू भी है अर्थात् इस वाक् को, आकाश को, जू शब्द से भी व्यवहृत किया जाता है । चूंकि यह श्राहुति उसी के लिए दी जाती है - इसी अभिप्राय से कहते हैं - आप जू हैं अर्थात् आकाशस्वरूप सर्वत्र वितत इन्द्रवाक् हैं । इसी अभिप्राय को लक्ष्य में रखकर कहते हैं-" एतद्ध वाऽस्य एकं नाम यज्जूरसीति " ' धृता मनसा ' इसका अर्थ करते हैं । यह वाक् मन से धृता रहती है । मन ही इसका आलम्बन है | बिना मन के वाक् कुछ नहीं कर सकती । पहले मन ही अपना व्यापार करता है । ' यह बोलो या मत बोलो ' इस प्रकार वाक् से पहले मन का व्यापार होता है । मन पूर्वरूप है - वाक् उत्तररूप है । मन वाक् पर शासन करता है । ' यह बोलो ऐसा मत बोलो ' इस प्रकार से मन के द्वारा वाक् निकलती है । इसीलिए कहा जाता है— " मनसा संकल्पयति तत् प्राणमपिवद्यते । प्राणोवातम् । वातो देवेभ्य प्राचष्टे यथा पुरुसस्य मनः । अपि च यद्वै मनसा ध्यायति तद् वदति । वास्तव में बे - मन की बोली रद्दी चीज है । वाक् की प्रतिष्ठा मन ही है । [ ३५० ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण मनसा वाऽइयं वाग्धृता मनो वाइदं तद्वादीः । " सोमाख्यान ब्राह्मण पुरस्ताद्वाच इत्थं वद-याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यदि मन न हो तो वाक् अलग्ल अर्थात् अलग्न बोलने लगे । अर्थात् अंट-संट बोलने लगे । बिना मन की वाक् का कोई अर्थ नहीं होता है । वह तो पागल की बोली कहलाती है । बे - मन का बोलना उन्मत्त प्रलाप है । यह वाक् ही सोम लाती है । यदि इसमें मन शामिल न होगा तो इसमें सोम लाने का सामर्थ्य ही न रहेगा । मनयुक्त वाक् ही में बल रहता है अतएव मनसा धृता वाक् यह कहा है । यहां पर इतना और समझ लेना चाहिए कि मन और वाक् को जोड़ने वाला प्राण है । हम जो क्रिया कर रहे हैं - वह तो प्राणव्यापार है । मन्त्र बोलना वाग्व्यापार है एवं उसमें मन लगा हुआ है । इस प्रकार मन, प्राण, वाक् तीनों शामिल हैं । जब तक तीनों नहीं मिलते हैं, तब तक कोई काम नहीं हो सकता है । मन प्राण का आधार है । प्राण ही मन को वाक् से मिलाने वाला सूत्र हैं । प्रारण द्वारा वाक् मनसाधुत रहती है-लग्लमिव ह वै वाग्वदेद्यन्मनो न स्यात्तस्मादाह धृता मनसेति ॥ ११ ॥

मनसाघृता के अनन्तर है - जुष्टाविष्णवे । इसका अर्थ करते हैं । सोम के लिए आप जुष्ट हों, सेवनीय हों । सोम श्राप से प्रसन्न होते हैं । यज्ञ ही को विष्णु कहते हैं । " यज्ञो वं विष्णुः " । यज्ञ का साधन यही सोम है | बिना सोम के चूंकि यज्ञ हो नहीं सकता - श्रतएव हम सोम को यज्ञ कह सकते हैं । सोम यज्ञ कहते हैं विष्णु को । ऐसी अवस्था में विष्णवे का सोमाग - यही अर्थ होता है । वाक् के पास जा रही है । वह सोम इसे अङ्गीकार करले यही " जुष्टा विष्णवे " का तात्पर्य है । याज्ञवल्क्य कहते हैं-" मैं वाक्, सोम की ओर जा रही हूँ " -" - - इस अभिप्राय को लक्ष्य में रख कर " जुष्टा विष्णवे " कहा है । वाक् सोम लेने जा रही है - प्रतएव यह सोम इससे प्रसन्न हो जाय - अर्थात् इसके साथ हो जाय - यही तात्पर्य है । जुष्टा सोमोयत्येवैतदाह यमच्छेम इति " - ( अभियेवेति शेषः ) यं ( सोमं ) अच्छ ( भिमुखम् ) इम ( गच्छेमः ) इत्यभिप्रायेणैव जुष्टा विष्णवे - इंत्युक्तमिति भावः ॥ १२ ॥

" तस्यास्ते सत्यसवसः " सत्य सवसा - सत्यरूपा जो आप हैं सोभ ला कर हमें दीजिए । सत्यप्रसवा आप - सोन की ओर जाइए और हमारी समृद्धि कीजिए - यही तात्पर्य है । जो सत्यावाक् होती है वह केन्द्र से बद्ध रहती है । ऋतावाक् - केन्द्र को छोड़ देती है । ऋत में बल नहीं रहता । सत्य में बल रहता है । अतएव सत्यसवसः कहा है । आपकी प्रेरणा मेरे लिए सत्य बने अर्थात् आप सोम लाने

की सच्ची प्रतिज्ञा करें - यही तात्पर्य है ।

सत्यप्रसवान एधि सोमं नोऽछेहि ( सोममच्छ इति ) इत्यैवैतदाह ॥१२ ॥

" तन्वो यन्त्रमशीय स्वाहेति " - जिससे कि हम अपने शरीर की हिफाजत कर सकें अर्थात् आप उस प्रकार से सोम लाइए - जिससे हम अपने शरीर को आराम दे सकें । सोम से ही यज्ञ होता है । जब [ ३८१ ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण तक यज्ञ समाप्त नहीं होता है तब तक चित्त में व्यग्रता रहती है- अशान्ति रहती है । यज्ञ संसार के यच्च-यावत् कार्य्यो का उपलक्षण है । किसी भी काम को हाथ में लो - जब तक वह पूरा नहीं होता है - तब तक खाते - पीते, सोते - उठते चिन्ता सवार रहती है । शरीर की जरा भी सुध नहीं रहती । जब तक काम पूरा नहीं हो जाता तब तक शरीर की जरा भी संभाल नहीं रहती । श्राज यह यजमान यज्ञकर्म करना चाहता है अतएव व्यग्र हो रहा है । इसे अपने शरीर की जरा भी सुध - बुध नहीं है । इसे सुध - बुध तभी आएगी जबकि यज्ञ समाप्त हो जाएगा । समाप्ति - इसी वाक् के अधीन है । जब यह सोम लाए - तभी यज्ञ पूरा हो । इस प्रकार यजमान का यज्ञ समाप्त हो जाय एवं इसे शान्ति मिल जाय - यह अपने शरीर की संभाल कर सके । अतएव वाक् से प्रार्थना करता है कि हे वाक्! श्राप ऐसी कृपा कीजिए जिससे हम अपने शरीर की संभाल कर सकें । अर्थात् आप हमारा यज्ञ पूरा करो यही तात्पर्य्यं है । इसी अभिप्राय से कहते हैं - वह शरीर - सुख का अनुभव करता है । वह सुख भोगा करता है - जो कि यज्ञ की समाप्ति पर चला आता है — ' क्लेशः फलेन हि पुनर्नवतां विषत्ते " - यह अटल सिद्धान्त है । हम यज्ञ की समाप्ति सकुशल कर सकें - यही तात्पर्य है -स ह वै तन्वो यन्त्रं ( सुखं ) अश्नुते यो यज्ञस्योरचं गच्छति । यज्ञस्यो -दृचं गच्छानीत्येवैतदाह ॥१२ ॥

आहुति के साथ घृत भी डालना चाहिए । कुशा से बँधी हुई उस सोने की टिकड़ी को नहीं डालना चाहिए । इसीलिए - " बहिबाहिरण्यं प्रबध्य - श्रवधाय जुहोति " यह कहा गया है । आहुति के अनन्तर उस सुवर्ण को अध्वर्यु निकाल लेता है - " श्रथ हिरण्यमपोद्धाति " । सुवर्ण की प्राहुति क्यों नहीं न चाहिए, उसे क्यों निकालना चाहिए - इसका उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि हिरण्य को निका-लता हुआ अध्वर्यु मनुष्यों में यजमान और यजमान के बेटों - पोतों में सुवर्ण रखता है । यदि वह घृत के साथ हिरण्य की आहुति डाल देगा तो इन मनुष्यों से सुवर्ण को सदा के लिए विलग कर देगा । अर्थात् आज्याहुति के साथ सोने की आहुति देना, संपत्ति की आहुति देना है । सोने की आहुति से यज-मान सर्वथा दरिद्र हो जाएगा । उसकी सारी सम्पत्ति उच्छिन्न हो जाएगी । फल इसका यही होगा कि-हिरण्य की आहुति डालने से सुवर्ण अर्थात् सम्पनि मनुष्यों में लौट कर वापस कभी नहीं आएगी । यजमान और यजमान का कुटुम्ब सदा के लिए दरिद्र हो जाएगा । अतएव अध्वर्यु को चाहिए कि हिरण्य की प्राहुति न दे अपितु उसे निकाल ले— हिरण्यमपोद्धरति । तन्मनुष्येषु हिरण्यं करोति स यत्सहिरण्यं ( हिर-येन सार्हतनान्यम् ) जुहुयात्परागु हैवैतन्मनुष्येभ्यो हिरण्यं प्रवृज्यात् । तन्न मनुष्येषु हिरण्यमभिगम्येत ( तह हिरण्यं मनुष्येषु नानुवर्ततेतिभावः तस्मात् हिरण्यमपोद्धरतीति शेषः ) ॥ १३ ॥

क्यों हिरण्य को निकाल लेना चाहिए - इसका कारण बतला दिया गया । अब पद्धति बतलाते हैं । वह अध्वर्यु – “ शुक्रमसि चन्द्रमस्यमृतमसि वैश्देवमसि ' इस मन्त्र को बोलता हुआ कुशा से बंधे हुए [ ३८२ ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण सुवर्ण को निकाल लेता है । हे हिरण्य, आप शुक्र हो अर्थात् चमकदार हो एवं प्राप चन्द्रमा भी हो अर्थात् सब को आह्लादित करने वाले हो । प्रापको देख कर सब की तबियत फड़क उठती है । आप अमृत हो अर्थात् आपका कभी भी नाश नहीं होता है । सोना मिट्टी में पड़ा हुआ अग्नि है । अग्नि, अग्नि को नहीं जला सकता । सोने को चाहे १० लाख वर्ष तक जलाते रहो वह जल कर नष्ट नहीं होगा । जले कैसे — जो वह अमृत मौलिक वस्तु है । मौलिक वस्तु का नाश नहीं होता । यौगिक का नाश होता । वस्तु १० के मेल से बनती है उसका नाश होता है - जो स्वयं एक है उसका नाश क्यों कर हो सकता है? एवं आप ( हिरण्य ) वैश्वदेव हैं । अर्थात् सर्वदेवस्वरूप हैं । सुवर्ण अग्नि है । अग्नि की अवस्था विशेषों का नाम ही ३३ देवता है, अतएव " वैश्य देवमसि " कहा है । वास्तव में सुवर्ण ऐसा ही है, जिन नामों से कि उसे व्यवहृत किया गया है । इसी अभिप्राय से कहते हैं - मन्त्रगत हिरण्य का जो शुक्राधारात्म-कत्व बतलाना है - वह स्तुत्यर्थ नहीं है । अर्थात् तुम शुक्र हो, तुम चन्द्रमा हो - यह खाली बनावटी बात नहीं है अपितु वास्तव में सुवर्ण ऐसा ही है । यह मन्त्र फेंटे हुए घृत से आहुति दे कर बाद में सुवर्ण लेते समय बोला जाता है— कृत्स्नेन पयसा हुत्वा यदेव एतत् ( हिरण्यस्य स्वाभाविकं रूपं तत् एष मन्त्र प्रह ) शुक्रमसीति शुक्रं तच्चन्द्रमसीति चन्द्रं ह्य ेतदमृतसीत्यमृतं ह्य ेतद्-वैश्वदेवमसीति वैश्वदेव ह्येतत् ॥ १४ ॥

इसके अनन्तर जिस तृण से वह सुवर्ण बँधा हुआ था उससे उसे निकाल कर उस बर्हि में कुशा के ढ़ेर में रख देता है एवं उसे एक डोरे से बांध देता है । इसी अभिप्राय से महर्षि कात्यायन कहते हैं-हिरण्यमुद्धृत्य वेद्यां तृणो विदधाति सूत्रबद्धं हिरण्यं कुरुते - ( का ० श्र ० ७ ६ । ११ ) इसी अभिप्राय से याज्ञ-वल्क्य कहते हैं— प्रमुच्य तृणं बर्हिष्यपिसृजति सूत्रेण हिरण्यं प्रबध्नीते ॥ १४ ॥

इसके अनन्तर प्रायणीय इष्टि से बाकी बचा हुआ ध्रुवा में जो घृत रखा है उसमें से दुबारा फिर चार बार जुहू में घृत लेकर अञ्वर्युं यजमान से कहता है - " यजमान श्रन्वारभस्व " यही अन्वार-भस्व का तात्पर्य है | अध्वर्यु को चार बार घृत लेकर यजमान से कहना चाहिए " यजमान अन्वारभस्व " अध्वर्यु के हाथ से यजमान का जो स्पर्श करना है यही अन्वारस्भ कहलाता है । अध्वर्यु यजमान का प्रति-है | परन्तु कई कार्य ऐसे होते हैं जिनमें यजमान को भी अध्वर्यु का स्पर्श करना पड़ता है | इसी का नाम अन्वारम्भरण है । अथापरं चतुर्गृ हीतमाज्यं गृहीत्वा । अन्वारभस्व यजमान - इत्याह ( अध्वर्युरिति शेषः ) ॥१५ ॥

इसके बाद उस देवयजन - शाला के दरवाजे बन्द कर देता है । अर्थात् यज्ञशाला के सारे द्वार बन्द कर देने चाहिए । पोर्णुवन्ति शालायै द्वारे । तदनन्तर द्वार में प्रर्थात् आहवनीय कुण्ड से पूर्व की ओर सोम [ ३८३ ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण खरीदने के लिए - दक्षिण प्रदेश में जो सोमक्रयणी गाय उपस्थित रहती है, उसे किंवाड़ बन्द कर शाला के दक्षिण भाग में खड़ी कर देनी चाहिए । द्वारे आहवनीयात् प्रास्तुते दक्षिणतः ( दक्षिण देशे ) सोमकयरणी ( गौः ) उपतिष्ठते-देवताओं द्वारा सोम के लिए प्रेषित इस वाक् को इस यजमान ने सोम लेने के लिए भेजा है । तात्पर्य यही है कि वस्तुतः वाक् सृष्टि के प्रारम्भ में ही प्रारण देवताओं द्वारा सोम लाने चली गई थी एवं आज भी जा रही है । यजमान उसे क्या भेजेगा वह तो अपने श्राप जा रही है । यजमान तो केवल नकल करता है | गाय निदानेन वाक् मान ली जाती है । जैसे देवता अर्थात् प्रारण देवता वाक् को आहुति से तृप्त कर परमेष्ठिसोमापहरण के लिए भेजा करते हैं, तथैव यह यजमान " यद्वैदेवाश्रकुवंस्तत् करवारिण " के अनुसार इसे प्राहुति के द्वारा प्रसन्न कर तृप्त होने वाली वाक् से ही सोम खरीदे । इस अभिप्राय से निदानेन वाक्भूता इस गौ के लिए आहुति देता है, प्रकृतिमण्डल की नकल करता है जिससे कि प्राकृत भाव प्रात्मसात हो जाय यही तात्पर्य है— " तत् प्रहिता मेवनामेतत् सतीं प्राहैषीद् । वाग्वै सोमक्रयणी निदा-नेन तामेतयात्या प्रेषीत् प्रीतया सोमं क्रीणानीति ( अभिप्रायेणेति शेषः ) ॥१५ ॥

प्रकृतिमण्डलस्थ प्राणदेवता वाक् को सोम लाने के लिए कब भेजते हैं, कैसे भेजते हैं, कब - कैसे बाक सोम ले आती है - यह सारा काम सामान्य मनुष्यों की दृष्टि से छुपा हुआ है । प्रकृति ने अपने नाटक को पर्दे में छुपा रक्खा है । आज यह यजमान उसी की नकल करता है । अतएव वाक् को सोम लेने के लिए भेजते समय - यज्ञशाला के सारे द्वार बन्द कर दिये जाते हैं - जिससे कि सामान्य मनुष्य इस प्रकृति की लीला को न देख सकें ॥१५ ॥

इसके बाद यज्ञशाला में से निकल कर निम्नलिखित मन्त्र से निदानेन वाग्भूता उस सोमक्रयणी की स्तुति करते हैं- " थोपनिष्क्रम्याभिमन्त्रयते " वह मन्त्र यह है— चिदसि मनासी, ति चित्तं वाऽइदं मनो वागनुवदति धीरसि दक्षिणेति X xx क्षत्रियाऽसि यज्ञियासीति क्षत्रिया ह्येषा यज्ञिया ह्येषादितिरस्युभयतः शीति स यदेनया समानं सद्विपर्यासं वदति Xxx सा नः सुप्राची सुप्रती-धीति ॥१६-१७ ॥ मित्रस्त्वा पदि बध्नीतां वरुण्या XXX पूषाऽध्वनस्पात्विति । इन्द्रायाऽद्ध्य क्षायेति । XX अनुत्वामाता मन्यतामनु पिताऽनु भ्राता सगर्भ्योऽनु सखा सयूथ्य [ ३८४ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० २ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण XXX सा देवि देवमच्छेहातीन्द्राय सोमं XXX रुद्रस्त्वावर्त्तयतु XXX स्वस्ति सोमसखा पुनरेहीति । ( शत ० ३।२।४ । १८-२० ) इन्हीं दो मन्त्रों से अध्वर्युळे उस सोमक्रयणी वाक् की स्तुति करता है । मन्त्र के प्रत्येक पद का अर्थ करते हैं । चिदसि - चित् नाम है मन का । मन के भाव का अनुवाद वाक् ही करती यदि वाक् न हो-जबान न हो तो मन कितनी ही इच्छा किया करे उसकी इच्छा पूरी नहीं हो सकती । बिना वाक् के मन कुछ नहीं कर सकता । हमारे दिल में आई कि हम लडडू खाएँ – जब तक आप मुंह से न बोलेंगे — मुँह से न माँगेंगे तब तक आपके मन की बात कौन जान सकता है? मन के चित्त के अभिप्राय प्रकट करने का एकमात्र साधन वाक् ही है । कदाचित् कहो कि साहब, बिना बोले भी इच्छा पूरी हो सकती है । हमारे सामने वस्तु रक्खी हुई है-है - मन में आई और झट से मुँह में रख ली । इसके लिए वाक् की क्या श्रावश्यकता है? हम कहते हैं - आप भूलते हैं- मन बिना वाक् के रह ही नहीं सकता । संसार में ऐसा कोई भी नहीं है जिसमें वाक् शामिल न हो । आप मन ही मन में विचार करते समय यह न समझ लें, वाक् नहीं है । नहीं, उत्प्रेरण अवश्य ही है । केवल सूक्ष्म - स्थूल का तारतम्य है । इसी अभिप्राय से भगवान् भर्तृहरि कहते हैं— न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्व शब्देन भाषते ॥ ( वाक्यपदीयम् ) प्रकृत में हमें यही कहना है कि वाक् क्या है - मन ही है, चित् ही । वाक् क्या बुला रही है - मन ही तो बुला रहा है । चित् ही वाक्रूप में परिणत हो रहा है । बस इसी अभिप्राय से ' विदसि ' कहा है एवं यही वाक् मन भी है अर्थात् मननशीला भी है । वाक् के बिना मनन होता ही नहीं है । सूक्ष्म उच्चारण वहां भी रहता ही है । ' न सोऽस्ति प्रत्ययः ' यह अटल सिद्धान्त है । चित्त ही का नाम मन है । मन के प्रभिप्रायको - वाक् ही बतलाती है । अतएव यह चित् भी है - और मन भी है " चित्त ं वा इदं मनो ' वाग-नुवदति " । धीर दक्षिणोस । आप धी हैं, आप दक्षिणा हैं । खयाल या विचार का नाम बुद्धि है । बुद्धि का साधन भी यही वाक् है । हर खयाल में वाक् ही से काम लेना पड़ता है । अपने विचारों को प्रकट करने का एकमात्र साधन वाक् ही है । यदि वाक् न हो, भाषण- सामर्थ्य न हो तो चाहें महापण्डित ही क्यों न हो, उसकी कोई कीमत नहीं है । वाणी ही में करामात है । बुद्धि से - हर खयाल से - इस वाक् द्वारा ही-मनुष्य जीने की इच्छा करते हैं । अर्थात् संसार में जीवन चाहने वाले मनुष्य अपना हर विचार इस वाक् द्वारा ही प्रकट करते हैं— " धिया धिया तया ( वाचा ) मनुष्या जुज्यूषन्ति ( जीवितुमिच्छन्ति ) व्यवहरन्तीतिभावः ” । संसार में वाकु तीन तरह की होती है । तीन के अलावा चौथी कोई वाकू है ही नहीं । [ ३८५ ]

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तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण १ - पहली वाक् तो अनुवचन से सम्बन्ध रखती हैं । आचार्य शिष्य को महाभाष्य पढ़ा रहे हैं और कहते जाते हैं — इसका यह अभिप्राय है । इस पंक्ति से भाष्यकार यह बात बतलाते हैं । भगवान् पाणिनि का यह मत है । इसी वाक् को अनुवचन कहते हैं । दूसरे की कही हुई वाक् का अनुवाद मात्र है । कह रहे हैं स्वयं ही - परन्तु उनका यह कहना है - उनका यह कहना है, यह साथ में कहते जाते हैं । बस, शास्त्र सम्बन्धी वाक् अनुवचन की कोटि में ही आती है । यह वाक् ऐसी है— जो हमारी नहीं है, दूसरे की है । उसी वाक् का हम अनुवाद किया करते हैं । २– दूसरा कहलाता है - प्रकामवाद । अपनी प्रातिस्विक् वाक् को प्रकामवाक् कहते है । हमारा इसमें यह मत है - हम यों कहना चाहते हैं - इस प्रकार की जो स्वतन्त्रावाक् है वही प्रकामवाद कहलाती । हम दूसरे की कही हुई न कहें, अपितु अपनी ओर से जो अपनी वाक् बोलें, यही प्रकामवाद है । ३ - तीसरी है गाथावाक् । न जिसके कहने वाले का पता हो, न अपनी ही वह बात हो - ऐसी बोल को गाथा कहते हैं । श्राभाणक का नाम - कहनावत का नाम - ही गाथा । प्रभाणक में अभिप्राय अपना है - वाक् दूसरे किसी अज्ञात पुरुष की है । किसी ने कहा अजी, तुम रोज - रोज किसी के घर मत जाया करो इससे मान घटता है । " मान घंटे नित ही घर जाये " क्या तुमने यह नहीं सुना है? बस इसी का नाम गाथावाक् है । इसमें अभिप्राय - सिद्धि अपनी है । यह दूसरे के घर न जाय – यह अभिप्राय अपना सिद्ध करना है । परन्तु बोली दूसरे की है । वस्तु अज्ञात है । " मान घटे नित हो घर जाये " यह किसने बनाया है -- इसका पता नहीं है । अतएव हम इसे गाथा कहने के लिए तैयार हैं । इसीलिए कहावत के लिए किसी व्यक्ति का नाम न ले कर देखो - किसी ने क्या अच्छा कहा है - यह कहा जाता है । यदि नाम ले लिया जाता तो यही अनुवचन हो जाता । बस, संसार में तीन ही तरह की बोली है । या तो हम किसी दूसरे का कहा बोलते हैं - इसका नाम अनूक्तवाद है या हम अपना ही बोलते हैं, इसका नाम प्रकामवाद है । अभिप्राय सिद्ध्यर्थं प्राभाणक बोलते हैं, इसी का नाम गाथावाक् है, कुछ अनुक्त से बोलते हैं, कुछ प्रकामवाद से बोलते हैं, कुछ गाथाओं से बोलते हैं । बस यही तीन वाक् हैं । तीन ही तरह से अपने विचार प्रकट किये जा सकते हैं । विचार ही का नाम बुद्धि है । बुद्धि का साधन वाक् ही है अतएव " धीरसीति " - कहा है | -नूक्तेनेव, प्रकामोद्येनेव गाथाभिरिव तस्मादाह धीरसी इति । यह वाक् दक्षिणा भी है । दक्षिण शब्द के निम्नलिखित अर्थ होते - सरल, उदार, परच्छन्दा-नुवर्ती अर्थात् मातहत । " दक्षिणा सरलोदारं परच्छन्दस्तुवतिषु " इन तीनों में से प्रकृत में मातहत अर्थ ही अभिप्रेत है । वाक् सदा मन के ग्रधीन रहती है । वाक् बिना मन के वेकार है - परच्छन्दानुवर्ती है अर्थात् परतन्त्र है । अतएव इसे दक्षिणा कहा जाता है । ग्रपिच वाक् द्वारा ही सोम आता है । सोम से ही यज्ञ होता है । तदनन्तर दक्षिणा मिलती है । अतएव दक्षिणा - साधनत्वात् भी यह वाक् दक्षिणा है । अपितु लोक [ ३८६ ]