Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 401–410
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 401–410
पृष्ठ 401
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण में भी, आशीर्वाद देने से जय - जयकार करने से ही कुछ प्राप्ति होती है । इसलिए भी - वाक् को दक्षिणा कहा जाता है । यहां मातहत ही अभिप्रेत है । " दक्षिणा ह्येषा " " क्षत्रियासि यज्ञियासि । यह वाक् क्षत्रिया है । इसमें शासन की शक्ति है । जरा किसी को जोरदार शब्दों में डांट बतला दो उसी समय वह डर जायगा । शासन चूंकि क्षत्रिय का धर्म है - एवं वाक् से शासन होता है अतएव इसे क्षत्रिया कहते हैं । एवं यह यज्ञिया भी है । यज्ञिया के विषय में तो कुछ कहना ही नहीं है । यदि मन्त्र न बोले जाएँ तो यज्ञ ही न हो । " क्षत्रियाह्येषा । यज्ञियाह्यषा " । हे सोमक्रयणी! दोनों श्रोर दो मस्तक रखने वाली श्राप अदिति हैं, अर्थात् श्रखण्डनीया हैं | आपका कोई नाश नहीं कर सकता है । वास्तव में वाक् के दोनों ओर मस्तक हैं । वाक् ही सुख दिलवा देती है, वाक् ही दुःख का कारण बन जाती है । हम देख रहे हैं कि संसार बिल्कुल सच्चा है । सूर्य्य-चन्द्र - ग्रह - नक्षत्र इत्यादि सारे पदार्थों का हम खूब प्रत्यक्ष कर रहे हैं । परन्तु एक वेदान्तशास्त्र का पण्डितहम से आ कर कहता है कि यह सारा प्रपञ्श्व कुछ नहीं है । सब मिथ्या है । सूर्य्य, चन्द्र, ग्रह, नक्ष त्रादि नाना वस्तुएं हैं ही नहीं । सब एक ही हैं । केवल ब्रह्म ही सच्चा है । एवं सारा नानाभाव मिथ्या है । वेदान्ती महाशय ऐसा तर्क लड़ाते हैं, ऐसा तर्क लड़ाते हैं कि हमें नतमस्तक हो कर उनकी बात माननी पड़ती है । हम जिसे सच समझ रहे थे वाग्बल के कारण उसी को हमें मिथ्या मानना पड़ता है । एक वकील अपने फरीक ( पक्ष ) की ओर से अपने मुकदमे को दृढ़ करने वाले प्रमाण पेश करता है और उन पर बड़े जोर - शोर से बहस करता है । ऐसी बहस करता है कि सबको मान लेना पड़ता है-कि वास्तव में इसका कहना बिल्कुल दुरुस्त है । परन्तु प्रतिपक्षी का वकील उठ कर उन सारी दलीलों को अपने वाग्बल से नेस्तनाबूद कर देता है । उसी समय मालूम होने लगता है कि नहीं इसी का कहना सच है । कहना यही है - वाक् ही सब को झूठा साबित कर देती है । वाक् ही झूठे को सच्चा कर देती है । इसके दोनों ओर माथे हैं । यहीं राव को रंक बना डालती है - यही रंक को राव बना डालती है । इसीलिए - " बोली का ही फेर लाख टके का सेर " कहा जाता है । वाणी से शत्रु, मित्र बन जाता है; मित्र, शत्रु बन जाते हैं । वाणी शत्रु की तरफ भी है— मित्र की तरफ भी है । इसके दो माथे हैं । इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इस वाक् से ही व्यक्ति जो बात समान थी, अर्थात् पहले मौजूद थी, उससे विपर्य्यातया बोलने लगता है । अर्थात् जो बात उस वाक् से जैसी पहले साबित की गई थी उसी वाक् से अब दूसरी तरह ही बात साबित कर देता है । वाक् के बल पर ही कोई प्रतिवादी, सिद्धान्त-पक्ष को काट कर उसके स्थान पर प्रतिवाद को ही सिद्धान्त के रूप में स्थापित कर देता है । गोण को मुख्य बना डालता है, मुख्य को गौण बना डालता है । इसीलिए उभयतः शीष्ण है । यहां वाक् –स्थाना-पन गौ है इसके चूंकि दो सींग हैं इसीलिए भी " उभयतः शोष्ण " कह दिया गया है । स यदेनया समानं सद्विपर्यासं वदति, यदपरं तत् पूर्वं करोति यत्पूर्वं तदपरं तेनोभयतः शोष्णः तस्मादाहादितिरस्युभयतः शीर्ष्णाति ॥ १६ ॥
" सा नः सुप्राची सुप्रतीच्येधीति " हे वाक्! प्राप सुप्राची जा कर सुप्रतीची हो कर हमें समृद्ध बनाए । अर्थात् हमारी श्रोर से पूर्व की ओर सोम लेने जाइए परन्तु वहीं न रह जाइए अपितु वापस लौट कर [ ३८७ ]
पृष्ठ 402
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण सोम द्वारा हमारे यज्ञ को सम्पन्न कीजिए । सोम लेने के लिए यहां से जाइए और सोम को साथ ले कर
वापस हमारे पास लौट आइए - यही तात्पर्य है ।
सोमेन नः सह पुनरेहीत्येवैतदाह - तस्मादाह सा नः सुप्राची सुप्रतीच्ये-धोति ॥ १७ ॥
" मित्रस्त्वा पदि बध्नीताम् " मित्र देवता आपके पैर बाँध दें । रज्जु से बाँधना वरुण - बंधन कह-लाता है । रस्सी से जो बाँधा जाता है, वह बन्धन वरुणदेवताक है । रस्सी से बाँधना वारुण्य है । वरुण असुर है । ऐसी अवस्था में रस्सी से अर्थात् श्रभिधानी से हम तुम्हारे पैर बाँधते हैं - यह तो कह नहीं सकते - क्योंकि ऐसा कहने से यह यज्ञ वरुण देवता सम्बन्ध से दिव्य न रह कर आसुर हो जायगा । और यदि नहीं बाँधते हैं तो यह वाक् उन्मर्थ्याद हो जाती । इसीलिए कोई ऐसा बन्धन लगाना चाहिए जिससे यह वाक् उन्मर्थ्याद भी न हो - अर्थात् असंयता भी न हो और आसुरी भी न हो । जो असंयता वाक् होती है वह प्रासुरी कहलाती है । दस हाथ की हरें ( हरीतकी ) जैसे निष्फल है - वैसे ही उन्म-र्य्याद वाक् असंयता कहलाती है । यज्ञ में ऐसी वाक् का उपयोग नहीं होता । अतएव इसे संयत करना चाहिए । रज्जु से तो कर नहीं सकते क्यों कि वह तो वरुण्य है अतएव मित्र ( सूर्य्यं ) से बन्धन करवाना चाहिए । मित्र- बन्धन प्रवरुण्य है । इससे दोनों काम हो जाते हैं । आसुरभाव का प्रवेश भी नहीं होता है, वाकू - मर्यादित भी हो जाती है । जैसे रज्जु से बाँधने से - वाक् संयता हो जाती है । तथैव मैत्र बन्धन से संयता हो जाती है । इसी श्रभिपाय से कहते हैं-वरुण्या वाऽएषा यद्रज्जुः सा यद्रज्ज्वाभिहिता स्याद्वरुण्या स्याद्यद्व-नभिहिता स्यादयतेव स्यादेतद्वाऽप्रवरुण्यं यन्मंत्रं सा यथा रज्ज्वाभिहिता य वमस्यै ( स्या ) तद्भवति यदाह मित्रस्त्वा पदि बध्नीतामिति ॥ १८ ॥
पूषाध्वनस्पात्विति — पूषा अर्थात् माता पृथिवी मार्ग में आपकी रक्षा करे । वाक् पृथिवी से निकल कर ही तो सूय्यं के उस पार सोम लेने जाती है - प्रतएव उसी पृथिवी पर रक्षा का भार डाला है । पृथिवी से सबका भरण - पोषण होता है अतएव इसका नाम पूषा है । जिसके मार्ग में यह रक्षा करने वाली बन जाती है उसे फिर कोई आपत्ति या बाधा नहीं सता सकती । पृथिवी पर ही तो प्रापत्तियाँ होती हैं । जब यही रक्षा का भार ले लेती है तो फिर बाधा का क्या डर रह सकता है? इयं वै पृथिवी पूषा यस्य वाऽइयमध्वन् ( श्रध्वनि ) गोप्त्री भवति तस्य न का चन ला ( बाधा ) भवति तस्मादाह " पूषाध्वनस्पात्विति ॥१९ ॥
" इन्द्रायाध्यक्षायेति ” - – हमने बतलाया है कि वाक् श्राकाश का नाम है । श्राकाश ही में जो तत्त्व भरा रहता है उसीका नाम इन्द्र है । इन्द्र ही वाक् का अधिष्ठाता है । इन्द्र ही वाक् का, स्वामी है । इसीलिए - " सा नो हवं जुषतामिन्द्र पत्नी " यह कहा जाता है । हमारे लिए पृथिवी इसकी रक्षा करे-[ ३८८ ]
पृष्ठ 403
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्याने ब्राह्मण यह बात नहीं है अपितु अपने अध्यक्ष इन्द्र के लिए पूषा इसकी रक्षा करे । वाक् - सत्ता पर ही इन्द्र - सत्ता निर्भर है । इन्द्र ही यज्ञ के देवता हैं । वाक् की रक्षा करना इन्द्र की रक्षा करना है । स्वध्यक्षासदित्येवैतदाह यदाहेन्द्रायाध्यक्षायेत्यनु त्वा माता । वाक् देवते! माता - पिता, सगर्थ्य अर्थात् सहोदर भाई - मित्र - पार्टी के मित्र इतनों की अनु-मति लेकर आप जाइए । इन सब में माता का दर्जा पहला है इसीलिए तो माता का नाम पहले लिया है । इससे याज्ञवल्क्य शिक्षा देते हैं कि यदि तुम्हें दूर देश जाना हो तो तुम्हे इतनों की आज्ञा अवश्य ले लेनी चाहिए । वाक् तो माता पृथिवी ही है । पिता द्यौ है । भाई वसु है । जैसा कि श्रुति कहती है-द्यौष्पितःपृथिवी मातर गग्ने भ्रातर्वसवो मूळता नः । विश्व श्रादित्या दिते सजोषा अस्मभ्यं शर्म बहुलं वियंत ॥ ( ऋग्वेद म ० ६।५१ / ५ ) माता - पिता भाई जन्म के साथी हैं । इनसे अनुमत होकर ही हे वाग् देवते! आप सोम लेने जाइए । यही तात्पर्य है— यत्ते जन्म तेन नोऽनुमता सोममच्छे हीत्येवैतदाह - सा देवि देवमच्छेहीति - जो वाक् सोम की ओर जाती है वास्तव में वह देवी का देवता के पास जाना है । इसीलिए देविदेवच्मछ कहा है | देवी ह्येषा देवमच्छेति यद् वाक् सोमम् । तस्मादाह सा देवमच्छेदीति । " इन्द्राय सोममिति " इन्द्र ही यज्ञ के देवता हैं । आप इन्द्र के लिए - अपने स्वामी के लिए सोम ला रही हैं, न कि मेरे लिए । अर्थात् देवताओं के लिए आप सोम लेने जा रही हैं — न कि मेरे लिए । यज्ञ के लिए देवताओं के लिए प्रापको सोम लाना ही चाहिए यही तात्पर्य है -" इन्द्रो वै यज्ञस्य देवता - तस्मादाहेन्द्राय सोममिति । रुद्रस्त्वावर्तयतु ". ' रुद्र आपको वापस लौटा दे । रुद्र - सूर्य्य से नीचे रहता है । सोम - सूर्थ्य के ऊपर है । यहीं पर इस वाक् को सोम के लिए जाना पड़ता है । रुद्र पशुओं के देवता हैं, रोधनकर्ता हैं । इनकी नजर से बच कर पशु न निकल जाय अतः वाक् से प्रार्थना करते हुए सचेत किया गया है कि रुद्र तुम्हें वापस सकुशल लौट आने दें, बीच ही में न रोक लें, तुम्हारी हिंसा न कर डालें । " श्रप्रणाशायैतदाह " नाति पशवः " ' स्वस्ति सोमसखा पुनरेहीति-क्षेम - कुशलपूर्वक - सोमसखा बनकर अर्थात् सोम को साथ ले कर वापस हमारे यज्ञ में पधारिए । स्वस्ति नः सोमेन सह पुनरेहीत्येवैतदाह ॥२० ॥
याज्ञवल्क्य कहते हैं कि जैसे सृष्टि के प्रारम्भ में प्राणदेवतात्रों ने सोम की ओर इसे भेळा था-एवं यह देवताओं के पास सोम सहित वापस लौट आई थी तथैव आज यह यजमान निदानेन वाग्भूता
इस गौ को सोम के लिए भेजता है । यह सोम के साथ वापस इसके यज्ञ में लौट आए ॥२१ ॥
इस वाक् को सृष्टि के प्रारम्भ में जैसे देवताओं ने बुलाया था एवं वह इन्द्र के वीणावाद्य से -गान से प्रसन्न हो – गन्धर्वों को छोड़कर इन देवताओं के पास लौट आई थी, तथैव आज यह यजमान -[ ३८६ ]
पृष्ठ 404
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मणे सोमाख्यानं ब्रह्मणं प्राप्त चित् है प्राप्तमना है -- इस प्रकार की वीणास्वर के समान मधुर वाणी से इसे बुलाता है । ऐसा करने से इन स्तुतिवाक्यों से प्रसन्न हो कर वाक् इस यजमान की ओर लौट आती है । निदानेन वाग्भूता सोमक्रयणी गाय को अध्वर्यु वगैरः ऋत्विक् उत्तरमुख करके खड़ी करते हैं । कारण इसका यही है कि उत्तर दिशा मनुष्यों की दिक् है एवं यजमान मनुष्य है, अतएव इसकी वही दिक् है । अतः उसे उदङ्मुख कहते हैं ॥ २२ ॥
। इति सीमाख्यानब्राह्मणं समाप्तम् ।
॥ इति तृतीयकाण्डे द्वितीयोऽध्यायश्च समाप्तः ॥
[ ३६० ]
पृष्ठ 405
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
I तृतीयाध्याये प्रथमं ब्राह्मणम् ' सोमक्रयणी ब्राह्मणम् ' [ मूल ] सप्त पदान्यनुनिक्रामति । वृङ्क्तएवैनामेतत्तस्मात्सप्त पदान्यनु निक्रामति यत्र वै वाचः प्रजातानि छन्दांसि सप्तपदा वै तेषां पराद्धर्चा शक्वरी तामेवैतत्परस्तादर्वाचीं वृङ्क्त े तस्मात्सप्त पदान्यनु निक्रामति ॥ १ ॥
स वै वाच एव रूपेणानु निक्रामति । वस्व्यस्यदितिरस्यादित्यासि रुद्रासि चन्द्रासीति वस्वी ह्येषादिति षादित्या ह्येषा रुद्रा ह्येषा चन्द्रा ह्येषा बृहस्प-तिष्ट्वा सुम्ने रम्णात्विति ब्रह्म वै बृहस्पतिबृहस्पतिष्ट्वा साधुनावर्तयत्वि-त्येवैतदाह रुद्रो वसुभिराचक ऽइत्यप्ररणाशायैतदाह रुद्रं हि नाति पशवः ॥ २ ॥
अथ सप्तमं पदं पर्युपविशन्ति । स हिरण्यं पदे निधाय जुहोति न वा s नग्नावाहुति तेऽग्निरेतसं वै हिरण्यं तथो हास्यैवाग्निमत्येवाहुति ता भवति वज्रो वाऽप्राज्यं वज्ज्र णैवैतदाज्येन स्पृणुते तां स्पृत्वा स्वीकुरुते ॥ ३ ॥
स जुहोति । प्रदित्यास्त्वा सूर्द्धन्नाजिघर्मीतीयं वै पृथिव्यदितिरस्यै हि मूर्द्धन् जुहोति देवयजने पृथिव्याऽइति देवजयने हि पृथिव्यै जुहोतीडायास्पदमसि घृतवत् स्वाहेति गौर्वाऽइडा गोहि पदे जुहोति घृतवत्स्वाहेति घृतवद्धये तदभिहुतं भवति ॥४ ॥
अथ स्पयमादाय परिलिखति । वस्त्रो वं स्पयो वस्त्र णत्रैतत्परिलिखति त्रिष्कृत्वः परिलिखति त्रिवृतैवैतद्वज्रेण समन्तं परिगृह्णात्यनतिक्रमाय ॥५ ॥
स परिलिखति । अस्मे रमस्वेति यजमाने रमस्वेत्येवैतदाहाथ समुल्लि -ख्य पदं स्थाल्यां संवपत्यस्मे ते बन्धुरिति यजमाने ते बन्धुरित्येवैतदाह ॥६ ॥
[ ३६१ ]
पृष्ठ 406
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मणं सोमक्रयणी ब्राह्मणं प्रथाप उपनिनयति । यत्र वाऽश्रस्यै खनन्तः क्रूरीकुर्वन्त्यपघ्नन्ति शान्तिरापस्तदद्भिः शान्त्या शमयति तदद्भः संदधाति तस्मादप उपनिनयति ॥७ ॥
अथ यजमानाय पदं प्रयच्छति । त्वे राय इति पशवो वै रायस्त्वयि पशव इत्येवैतदाह तद्यजमानः प्रतिगृह्णाति मे राय इति पशवो वै रायो मि पशव इत्येवैतदाह ॥८ ॥
प्रथाध्वर्युरात्मानमुपस्पृशति । मा वयं रायस्पोषेण वियौष्मेति तथो हाध्वर्युः पशुभ्य श्रात्मानं नान्तरेति ॥९ ॥
अथ पत्न्यै पदं प्रतिपराहरन्ति । गृहा वै पत्न्यै प्रतिष्ठा तद् गृहेष्वेवैना मेतत् प्रतिष्ठायां प्रतिष्ठापयति तस्मात् पत्न्यै पदं प्रतिपराहरन्ति ॥ १० ॥
तां नेष्टा वाचयति । तोतो राय इत्यथैनां सोमक्रयण्या संख्यापयति वृषा वै सोमो योषा पत्न्येष वाऽत्र सोमो भवति यत् सोमकयरणी मिथुन मेवैतत् प्रजननं क्रियते तस्मादेनां सोमक्रयण्या संख्यापयति ॥११ ॥
स संख्यापयति । समख्ये देव्या धिया सं दक्षिणयोरुचक्षसा । मा म-श्रायुः प्रमोषीर्मोऽहं तव वीरं विदेय तव देवि संदृशीत्याशिष मेवैतदाशास्ते पुत्रो वै वीरः पुत्रं विदेय तव संदृशीत्येवैतदाह ॥१२ ॥
साया बभ्रुः पिङ्गाक्षी । सा सोमकयरणी यत्र वाऽइन्द्राविष्णू त्रेधा सहस्रं व्यैरयेतां तदेकात्यरिच्यत तां त्रेधा प्राजनयतां तस्माद्योऽप्येतहि त्रेधा सहस्र व्याकुर्यादेवातिरिच्येत ॥१३ ॥
सा या बभ्रुः पिङ्गाक्षी । सा सोमक्रयण्यथ या रोहिणी सा वार्त्रघ्नी या मिदं राजा संग्रामं जित्वोदाकुरुतेऽथ या रोहिणी श्येताक्षी सा पितृदेवत्या या मिदं पितृभ्यो घ्नन्ति ॥ १४ ॥
सा या बभ्रुः पिङ्गाक्षी । सा सोमक्रयणी स्याद्यदि बभ्रु पिङ्गाक्षों न विन्देदरुणा स्याद्यद्यरुणां न विन्देद्रोहिणी वार्त्रघ्नी स्याद्रोहिण्यै ह त्वेव श्येताक्ष्याऽप्राशां नेयात् ॥१५ ॥
[ ३ ९ २ ]
पृष्ठ 407
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमक्रयणी ब्राह्मण सा स्यादप्रवीता । वाग्वाऽएषा निदानेन यत्सोमक्रयण्ययातयाम्नी वाइयं वागयातयाम्न्यप्रवीता तस्मादप्रवीता स्यात् सा स्यादवण्डाकूटाकाणा-कर्णालक्षिता सप्तशफा सा ह्यकरूपैकरूपा हीयं वाक् ॥ १६ ॥
[ अनुवाद ] पृथ्वी की गायत्री वाक् प्राण देवताओं के लिए सूर्य्यं से भी ऊपर परमेष्ठि-लोक में विद्यमान सोम को लाया करती है । गायत्री वाक् पृथिवी से निकल कर पृथिवी के ३३ वें अहर्गण तक जाया करती है । सूर्य्य की स्थिति उत्तर में है तथा पृथिवी की स्थिति दक्षिण में है । उत्तर ऊँचे को कहते हैं तथा दक्षिण नीचे को । अतः सूर्य्य पृथिवी से बहुत ऊपर है । परमेष्ठी में विद्यमान सोम सूर्य्य से भी ऊपर है । दक्षिण में रहने वाली पृथिवी की वाक् दक्षिण से उत्तर की ओर सोमापह के लिए आक्रमण करती है । वह वाक् दक्षिण में स्थित पृथिवी से निकल कर सूर्य से ऊपर विद्यमान सोम के अपहरण के लिए जाती है । आज यजमान भी सोमयाग के लिए निदानरूप से वाग् - रूप सोमक्रयणी गाय द्वारा सोम खरीदना चाहता है । अतः जिस प्रकार प्रकृतियज्ञ में वाक् दक्षिण से उत्तर की ओर जाती है । उसकी नकल पर ‘ यद्देवा अकुर्वंस्तत् करवाणि ' इस सिद्धान्त के अनुसार यजमान जिस सोमक्रयणी गाय से यज्ञ के लिए सोम खरीदना चाहता है उसे दक्षिण से उत्तर की तरफ भेजता है । इसी तथ्य का प्रतिपादन करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि वह अध्वर्यु निदानेन वाग्रूप गाय को सात कदम उत्तर की ओर ले जा कर उसे वापस ले आता है । क्योंकि प्रकृति में जिस प्रकार पृथिवी की वाक् दक्षिण से उत्तर अर्थात् ऊपर परमेष्ठिलोक तक जा कर सोम ले कर वापिस आ जाती है, उसी प्रकार इस सोमक्रयणी गाय को भी अध्वर्यु दक्षिण से सात कदम उत्तर की ओर ले जा कर पुनः वहाँ से लौटा लाता है । इस गाय को सात कदम उत्तर की ओर ले जा कर वहाँ से पुनः लौटाता हुआ वह अध्वर्यु तृतीय लोक द्युलोक में सोम लाने के लिए गई हुई वाक् को सोमलोक से पृथक् करता है । यदि उस लोक से इसको विभक्तन किया जाए तो वह वाक् वहीं रह जाए और सोम पार्थिव प्राण - देवताओं को प्राप्त न हो पाए । संसार के यावन्मात्र पदार्थ अग्नीषोमात्मक हैं । अग्नि व सोम का प्रसार ३३ अहर्गण तक अर्थात् वाङ्मण्डल तक रहता है । क्यों कि वाक् ३३ वें अहर्गण तक जाती है, अतः यहीं तक वाङ्मण्डल है । यहीं तक अग्नि और सोम वितत हैं । २१ वें अहर्गण तक अग्नि जाता है । उस से ऊपर ३३ वें अहर्गण तक भास्वरसोम व दिक्सोम भेद से द्विविध सोम का फैलाव है । २७ वें अहर्गण तक भास्वर सोम का तथा उससे ऊपर ३३ वें अहर्गण तक दिक्सोम का फैलाव है । पृथिवी से निकलने वाली वाक् से गायत्री आदि छन्द उत्पन्न होते हैं । पृथिवी से निकलने वाली वाक् की अन्तिम अवधि को रथन्तर साम - रथन्तर छन्द - कहते हैं । किन्तु इस रथन्तरसाम - युक्त वाक् में २१ वें अहर्गण तक अग्नि, २७ वें अहर्गण तक भास्वर सोम तथा ३३ वें अहर्गण तक दिक् सोम की सत्ता होने से एक ही रथन्तर साम [ ३६३ ]
पृष्ठ 408
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमक्रयणी ब्राह्मण एक अग्नि तथा द्विविध सोम के कारण तीन सोमों में विभक्त हो जाता है । २१ तक रहने वाला साम रथन्तर ही कहलाता है । २७ तक का साम वैरूप तथा ३३ वें अहर्गण तक के साम को शाक्वर साम कहते हैं । यह शक्वरी छन्द के सम्बन्ध से शाक्वर साम कहलाता है । प्रत्येक छन्द के विभिन्न विभाग होते हैं । इन में शक्वरी छन्द के सात विभाग हैं । ये शक्वरी छन्द के सात पैर हैं । इसीलिए इस शक्वरी छन्द को सप्तपदा कहा जाता है, जैसा कि सप्तपदा शक्वरी ( तै. सं. ६ | १८ | १ ) – यह तैत्तिरीय श्रुति बतला रही है । प्रकृतिमण्डल में पार्थिव वाक् की गति ३३ वें अहर्गण तक है । इस वाक् से गायत्री आदि विभिन्न छन्द उत्पन्न हुए हैं । उनमें वाक् का अन्तिम शक्वरी छन्द सप्तपदा है । वहीं तक प्रकृतिमण्डल में पार्थिव वाक् जाता है उससे आगे नहीं । इसलिए वाक् की प्रतिकृतिभूत सोमक्रमणी गाय को भी सात कदम तक ही उत्तर में ले जाया जाता है । प्रकृतिमण्डल में ३३ वें अहर्गण तक जा कर वाक्, सोम को लेकर लौट आई थी । उसकी नकल पर उस वाक् स्थानापन्न सोमक्रमणी गाय को भी ३३ वें अहर्गण के अन्त में विरचमान सप्तपदा शक्वरी छन्द तक अर्थात् सात कदम तक ही उत्तर में अध्वर्यु ले जा कर उसे वापिस ले आता है, क्योंकि ३३ वें अहर्गण तक जाने वाली वाक् की अन्तिम सीमा सप्तपदा शक्वरी छन्द ही है ॥१ ॥
भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि सोमक्रयणी गाय अनुनिक्रमण वाक् रूप ही है । अर्थात् इसे गाय न समझ कर वाक् ही समझो, क्यों कि यह गाय निदानेन वाक् ही है । वाक् ही प्रकृति में सोम को लाया करती है । सोमणी गाय को उत्तर की ओर सात कदम ले जा कर उसे लौटाते समय निम्ना-ङ्कित मन्त्र का उच्चारण अध्वर्यु करे: -वस्व्यस्य दितिरस्यादित्यासि, रुद्राऽसि चन्द्राऽसि । बृहस्पतिष्ट्वा सुम्ने रम्णानु रुद्रो वसुभिराचके ॥ इति ॥ हे सोमऋयणी वाग्देवते! आप वसुदेवताक हो, अदिति अर्थात् पृथिवी स्वरूप हो, आदित्य देवताक हो, रुद्रदेवताक हो, चन्द्रदेवताक हो । हे सोमकयरणी! मार्ग में बृहस्पति आप को सुख में रमण कराएँ तथा वसुओं के साथ रुद्र आपके सुख को चाहते रहें । ऊपर के मन्त्र में वाक् को वस्वादि सर्वदेवतामय बतलाया है उसका रहस्य यह है कि वाक् पृथिवी के केन्द्र से निकल कर ३३ वें अहर्गण तक वितत रहती है । इसमें २१ वें ग्रहरण तक अग्नि की सत्ता है । अग्नि - घन, तरल, विरल भेद से त्रिधा विभक्त है । घनाग्नि अग्नि ही कहलाता है । इसी के ८ अवस्था - भेद हैं जिन्हें ८ वसु कहा जाता है । तरलाग्नि वायु कहलाती है । इसकी ११ अवस्थाएँ हैं जिन्हें ११ रुद्र कहा जाता है । विरला ग्नि को आदित्य १. ' सप्तपदा वै शक्वरी ' ( अध्वरकाण्ड अ. ३, ब्रा. १, क. १ ) यह काण्वों की शतपथ श्रुति है । [ ३६४ ]
पृष्ठ 409
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( श्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमक्ररणी ब्राह्मण कहते हैं । इसकी १२ अवस्थाएँ जिन्हें १२ आदित्य कहा जाता है । इन में घनाग्नि पृथिवी -लोक है । तरलाग्नि अन्तरिक्षलोक है । विरला ग्नि द्युलोक है । पृथिवी के अधिष्ठाता ८ वसु हैं । अन्तरिक्ष के अधिष्ठाता ११ रुद्र हैं । चन्द्रमा भी अन्तरिक्षलोक में है । द्युलोक के अधि-ष्ठाता १२ श्रादित्य हैं, यह सारा व्यापार पृथिवीपिण्ड से होता है । पृथिवीपिण्ड को अदिति कहते हैं और अदिति ही वास्तव में वाक् है । इस तरह वसु, रुद्र, ग्रादित्य, चन्द्रमा सब कुछ यह वाक् ही है । इसी अभिप्राय से भगवान् याज्ञवल्क्य ने कहा है - वस्त्री ह्येषा, अदिति ह्यषा, आदित्य ह्येषा, रुद्रा ह्येषा, चन्द्रा ह्येषा ' इति । यह अदितिरूप वाक् सूर्य्य से भी ऊपर परमेष्ठिमण्डलस्थ ब्रह्मणस्पति सोम को लाने के लिये जाती है । इस सूर्य और ब्रह्मणस्पति सोम के मध्य में बृहस्पति है । सूर्य्य से नीचे का भाग उत्तरसृष्टि तथा सूर्य्य से ऊपर का भाग पूर्वसृष्टि कहलाता है । उत्तरसृष्टि में प्रथम सूर्य अर्थात् इन्द्र है । सूर्य्य में इन्द्रप्रारण रहता है अतः सूर्य्य को इन्द्र कहा जाता है । पूर्वसृष्टि में स्वयम्भू परमेष्ठि ब्रह्मणस्पति आदि में सब से अन्तिम बृहस्पति है इसलिए ' बृहस्पतिः पूर्वोषमुत्तमो भवति, इन्द्र उत्तरेषां प्रथमः ' यह श्रुति बतला रही है । विभक्त वाक् गौ कहलाती है । इस गोतत्त्व के अधिष्ठाता देवता बृहस्पति और रुद्र हैं । सूर्य्य से नीचे की गौ का अधिष्ठाता रुद्र तथा सूर्य्य से ऊपर की गौ का अधि-ष्ठाता बृहस्पति है । गौ के अधिष्ठाता इन दोनों रुद्र और बृहस्पति को प्रार्थना से प्रसन्न किया जाता है, जिससे सोमाहरण करने वाली गौ ( वाक् ) को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँचे । ग्रर्थात् बृहस्पति तुम्हें साधुमार्ग से ( अच्छे मार्ग से ) लौटा दें । जैसे सूर्य्य से ऊपर की गौ के अधिष्ठाता बृहस्पति हैं वैसे ही सूर्य्य से नीचे की गौ के अधिष्ठाता रुद्र है । रुद्र पशुपति हैं । संसार में यावन्मात्र पशुओं के स्वामी रुद्र ही हैं । बाक् भी पशु है । वह भी रुद्र के अधीन है । अतः रुद्र से भी गोरूप वाक् को सकुशल लौटाने की प्रार्थना की जाती है । अन्यथा अप्रसन्न रुद्र उसका नाश कर सकता है । इसी अभिप्राय से ' रुद्रो वसुभिराचके ' कहा गया है । स्वामी का अधीनस्थ को चाहना ही उसकी प्रसन्नता है । इसलिए ' आचके ' कहा है । वाक् रूप गौ पृथिवीपिण्ड से चल कर परमेष्ठिलोक में सोम लाने के लिए जाती है । उसके रास्ते में वसु देवता भी आते हैं अतः उनको प्रसन्न करने के लिये रुद्र वसुओं के साथ प्रसन्न हों - यह प्रार्थना की गई है ॥२ ॥
अध्वर्यु जब सोमक्रयणी गाय को उत्तर की तरफ सात डग ले जाता है तब गाय के सातवें डग के पास यजमान और ऋत्विक् आ कर बैठ जाते हैं । इसके पश्चात् अध्वर्यु गाय के सातवें कदम में रखे हुए गोखुर में हिरण्य की टिक्की रख कर उस पर आज्य ( घृत ) की आहुति डालता है । आहुति अग्नि में डाली जाती है । अग्नि से अतिरिक्त स्थान में आहुति देना सर्वथा निरर्थक है । यह सातवें कदम में स्थित गोखुर अग्नि भिन्न है इसमें आहुति कैसे संभव है? इस प्रश्न के समाधान के लिए सातवें डग के स्थान में सुवर्ण की टिक्की रखी जाती है क्यों कि सुवर्ण अग्नि से उत्पन्न होने के कारण अग्नि ही है । गोखुर [ ३ ९ ५ ]
पृष्ठ 410
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( अ ० ३ ) शतपथ ब्राह्मरंग सोमक्रयणी ब्राह्मण मेंदी हुई उसकी आहुति अग्नि में ही मानी जाती है । इसी अभिप्राय से कहा है, अग्निरेतसं वै हिरण्यम् तथा हास्यैषाऽग्निमत्येवाहुति ' ता भवति इति । गाय के खुर में सोने की टिकड़ी रखकर उस पर घृताहुति का कारण बतलाते हुए कहा है कि आज्य ( घृत ) वज्र है । जैसा कि ' घृतं वै देवा वज्र ं कृत्वा सोममघ्नन् ' ( तै ० सं ० ६।२।२।४ ) यह तैत्तिरीयश्रुति बतला रही है । निदानेन सोमकयरणी गाय वागुरूप है । यह दक्षिण से सात डग उत्तर जा कर सोमवल्ली को लाती है । सोमवल्ली गाय के सातवें डग में, गाय के खुर में रक्खी हुई है अर्थात् उगी हुई है । पृथिवीरूप गाय के सातवें डग में उत्पन्न इस सोम-वल्ली को आज्यरूप वज्र से काट कर यज्ञ के लिए उसे ग्रहण करते हैं, क्यों कि यज्ञार्थ सोम
प्राप्त करने के लिए सोमवल्ली को काटकर उसे कूटकर उससे सोमरस निकाला जाता है ।
और उसकी आहुति से सोमयाग होता है ॥ ३ । ।
वह अध्वर्युं निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करता हुआ आज्याहुति प्रदान करता है: -" अदित्यास्त्वा मूर्द्धन्ना जिर्घामि देवयजने पृथिव्याः । इडायास्पदमसि घृतवत् स्वाहा ॥ " ॥ इति ॥ आज्य! मैं तुम्हें पृथिवी के देवयजन भाग में डाल रहा हूँ । अर्थात् यह आहुति देव-ताओं को मिल रही है न कि असुरों को । क्यों कि सूर्य्यं के प्रकाश से युक्त जो पृथिवी का आधा मण्डल है उसी का नाम अदिति है । देवगण ' चित्रं देवानामुदगादनीकम् ' इस मन्त्र के अनुसार सूर्य के सैनिक हैं । यद्यपि इस प्रकार सौरप्रकाशयुक्त अतएव देवप्रारणों से युक्त पृथिवी के मस्तक पर तुम्हें ( आज्य को ) डाल रहा हूँ पुनः देवयजन की क्या आवश्यकता है? किन्तु ' इयं वै पृथिव्यदिति: ' इस श्रुति के अनुसार अदिति से पृथिवीमात्र का ग्रहण मान कर पृथिवी के आसुर अर्थात् सौरप्रारण रहित भाग की व्यावृति के लिए ' देवयजने ' का प्रयोग किया है । आहुति प्रदान कर उससे प्रार्थना करते हैं कि आप इडा के अर्थात् गौ के स्थान हो और घृत-युक्त हो । यहाँ इडा से तात्पर्य्य गाय है । इसीलिए गौर्वा इडा कहा गया है | गाय के पैर में ही आहुति दी जाती है । यह गाय का पैर ( खुर ) घृताहुति देने के बाद घृतयुक्त हो जाता है । अतः उसे ' घृतवत् ' कहा है । इसके बाद स्फ्य अर्थात् काष्ठ की तलवार से गाय के सातवें डग की भूमि को कुरेदते हैं । स्पय वज्र का नाम है जैसा कि ' इन्द्रो वृत्राय वज्रं प्राहरत् स त्रेधा व्यभ-वत् स्फ्यस्तृतीयं, रथस्तृतीयं, यूपस्तृतीयम् ' ( तै ० सं ० ६ | १ | ३ | ४ ) यह तैत्तिरीय श्रुति बतला रही है । अतः स्फ्य से भूमि को कुरेदना वज्र से कुरेदना है । स्फ्य से गाय के ७ वें डग की भूमि का तीन बार परिलेखन करता है क्यों कि वज्र त्रिवृत होता है, 4 इस आकार का होता है । अतः वज्रत्वसम्पत्ति के लिए तीन बार ही भूमि का परिलेखन करना चाहिए । तीन बार परिलेखन से सोम का सार भाग आ जाय, कोई भी सोम का हिस्सा बाहर न जाय, अतः तीन बार परिलेखन करता है ॥५ ॥
[ ३ ९ ६ ]