Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 411–420

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 411–420

पृष्ठ 411

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमक्ररणी ब्राह्मण वह अध्वर्यु ' अस्मे रमस्व ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ भूमि का परिलेखन करता है । है पदधूलि अर्थात् सोम! आप यजमान से रमरण करो । आप यजमान से आत्म-सात् हो जाओ । उपर्युक्त मन्त्र को बोल कर ' अस्मे ते बन्धुः ' यह मन्त्र बोलता हुआ एक पात्र में उस पदधूलि को रख देता है । अर्थात् आप यजमान के बन्धु बन जाएँ । अर्थात् आप की बन्धुता हमारे यजमान से हो ॥ ६ ॥

इसके अनन्तर अध्वर्यु उस भू - प्रदेश पर, जिसे खोद कर जिसने मिट्टी निकाली है, पानी छिड़कता है । क्यों कि स्पयरूप वज्र से भूमि को खोद कर उसे मिट्टी से अलग कर जो क्रूरता का कार्य ऋत्विजों ने किया है उसकी शान्ति इस जल को छिड़क कर की जाती है । शान्ति करना जल का कार्य है । खोद कर मिट्टी निकालने से पृथ्वी का जो भाग पृथक् हो गया है उसका जल से सन्धान करता है क्यों कि विशकलित अवयवों का सन्धान करना - मिलाना - जल का कार्य्य है । जैसे आटे के बिखरे हुए कणों को जल के द्वारा जोड़ा जाता है ठीक वही कर्म्म यहाँ किया जाता है ॥७ ॥

इस के बाद अध्वर्यु उस पदपांशु ( पदधूलि ) को ' त्वे रायः ' यह मन्त्र बोलकर यजमान को सौंप देता है मन्त्र में रै शब्द पशुसम्पत्ति का बोधक है । अतः इस मन्त्र का यही अर्थ है कि पशु - धन तुम्हारा है । यजमान में पशु के रहने से यह यजमान पशुसम्पति से युक्त हो । और यजमान ‘ मे रायः ' अर्थात् यह शुसम्पत्ति मेरी हो, यह कहता हुआ उसे स्वीकार कर लेता है ॥८ ॥

उपर्युक्त रीति से यजमान को पदपांशु दे कर अध्वर्यु " मा वयं रायस्पोषेण वियोष्म " हम इस पशुसम्पति से वियुक्त न हों, यह कहता हुआ अपने वक्षस्थल का स्पर्श करता है । यदि इस मन्त्र का अध्वर्यु उच्चारण न करेगा तो पदपांशु यजमान को समर्पित करने से अध्वर्यु की सम्पत्ति यजमान में चली जाएगी और अध्वर्यु दरिद्र हो जाएगा । किन्तु इस मन्त्र को बोल कर छाती का स्पर्श करने से उसकी यह भावना हो जाती है कि मैं पशुसम्पत्ति से वियुक्त नहीं हुआ हूँ । इसी अभिप्राय से कहा है- तथो हाध्वर्युः पशुभ्य आत्मानं नान्तरेति ॥ 8 ॥

इसके बाद ऋत्विक् उस पदपांशु को यजमान से उसकी पत्नी को दिला देता है । क्यों कि यजमान के जो घर हैं वे पत्नी की प्रतिष्ठा हैं । अतः यजमान की पत्नी को पदपांशु दिलाते हुए अध्वर्युगृरूप प्रतिष्ठा में ही उसे प्रतिष्ठित कराता है ॥१० ॥

जिस समय यजमान - पत्नी पदपांशु को लेती है उस समय नेष्टा ऋत्विक् - पत्नी से ' तोतो रायः ' यह मन्त्र कहलवाता है । अर्थात् यह सम्पत्ति आपकी है । आप से मैंने प्राप्त की है अतः आप की है । आप इसका यथेच्छ भोग कर सकते हैं । " तत्पश्चात् नेष्टा सोमक्रयणी गाय से यजमान - पत्नी को चौनजर कराता है । क्यों कि सोम वृषा अर्थात् पुरुष - प्रारण है तथा पत्नी योषा अर्थात् स्त्री - प्राण है । यहाँ पर जो सोम-[ ३ ९ ७ ]

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमकयरण ब्राह्मण ऋयणी गाय है, वही सोम है, क्योंकि यही गाय सोमक्रयण का साधन है । अत: सोम साधन-त्वेन यही गाय सोम है । सोम ही पुरुष - प्रारण है और यजमान पत्नी योषा ( स्त्री - प्राण ) है | यज्ञ के द्वारा यजमान दिव्यात्मा का प्रजनन चाहता है । प्रजनन के लिए - योषा और वृषा का-स्त्रीप्राण- पुरुषप्राण का मिथुन आवश्यक है । अतः सोमक्रयणी गाय का यजमान - पत्नी के साथ दृष्टि - सम्बन्ध कराता है ॥११ ॥

नेष्टा सोमक्रयणी गाय का यजमान पत्नी के साथ संख्यापन ( दृष्टि - सम्बन्ध ) कराता हुआ निम्नलिखित मन्त्र यजमान - पत्नी द्वारा बुलवाता है: : —

" समख्ये देव्या धिया सन्दक्षिणयोरुचक्षसा ।

मायुः प्रमोषीर्मोऽहं तव वीरं विदेय तव देवि संदृशिरा ॥ इति ॥

अर्थात् जो वाग् देवी धीस्वरूपा है, दक्षिण है अर्थात् परछन्दानुवर्तनी ( परतन्त्रा ) है, उरुचक्षसा है अर्थात् जिस की दृष्टि दूर तक जाने वाली है । वाक् ३३ वें अहर्गण तक जाती है अतः उसे उरुचक्षसा कहा गया है । ऐसी देवी के समक्ष में खड़ी हुई हूँ । हे सोमऋयरणी! आप मेरी आयु को नष्ट न करें । हम और आप दोनों मिल जाएँ, एक हो जाएँ । हे देवि! आपकी सुदृष्टि में, निगरानी में, मुझे पुत्र प्राप्त हो । इसी फल की कामना यजमान की पत्नी करती है ॥१२ ॥

यह सोमक्रयणी गाय बभ्रु ( भूरे ) वर्ण की, पीले नेत्रवाली होनी चाहिए । क्यों कि संसार का निर्माण ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि व सोम इन पाँच अक्षरों से होता है । अव्यय-रूपी आलम्बन पर न बैठ कर ये पाँचों अक्षर सृष्टि का निर्माण व संचालन करते हैं । ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र ये तीनों अक्षर वस्तु के केन्द्र में रहते हैं तथा अग्नि व सोम ये दोनों अक्षर बाहर रहते हैं । अग्नि और सोम से वस्तु के बाह्य स्वरूप का निर्माण होता है । इसीलिए ' अग्नि-षोमात्मकं जगत् ' यह श्रुति सब पदार्थों को अग्निसोममय बतला रही है । इन दोनों में अग्नि २१ वें अहर्गण तक जाती है तथा सोम ३३ वें अहर्गण तक जाता है । इन्द्र बाहर से विष्णु प्राण द्वारा लाये हुए अन्न को बाहर फेंकता है । विष्णु बाहर से अन्न ला कर वस्तु के केन्द्र में रख कर उसकी क्षतिपूर्ति करता है । विष्णु आदानधर्मा है तथा इन्द्र विसर्गधर्मा है । अमृताग्नि ही वाक् है - यह कद्रू और सुपर्णी का स्वरूप बतलाते हुए कहा जा चुका है । अमृताग्निरूप वाक् इन्द्र व विष्णु की स्पर्धा से तीन विभागों में विभक्त हो जाती है । विभक्त वाक् ही गौ कहलाती है । अतः इस गौ के, अर्थात् विभक्त वाक् के सहस्र विभाग होते हैं । अतः गौ प्रारण एक हजार कहलाते हैं । ये हजार गो - तत्त्व इन्द्र व विष्णु की स्पर्धा से ३३३, ३३३, ३३३, इस प्रकार तीन विभागों में विभक्त हो जाते हैं । इन्द्र व विष्णु की स्पर्धा से केन्द्र से बाहर इन्द्र के द्वारा निकाली जाती हुई अग्नि - घन, तरल, विरल इन तीनों भावों में परिणत हो जाती है । धनावस्था वसु, तरलावस्था रुद्र तथा विरलावस्था आदित्य कहलाती है । ३३३, ३३३, ३३३, भेद से तीन विभागों में विभक्त गो - तत्त्व में ३३३ गो तत्त्व वसुओं [ ३ ९ ८ ]

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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमक्रयणी ब्राह्मण से, ३३३ ही रुद्रों से तथा ३३३ ही आदित्यों से सम्बन्धित हैं । इस प्रकार ६६६ गो तत्त्व हो जाते हैं । हजार में जो एक गोतत्त्व बचा रहता है, उसे कामगवी कहते हैं । यही गौ अर्थात् विभक्त वाक् सोम लाने के लिए गई थी । इस गौ को बभ्रु, अरुण, रोहिणी इन तीन रूपों में उत्पन्न किया गया था । जैसा कि तैत्तिरीय संहिता में बतलाया गया है - " तामप्सु प्रावेश-यन्त्सोमायोदेहीति - सा रोहिणी पिङ्गलैकहायनी रूपं कृत्वा त्रयस्त्रिशता च त्रिभिश्च शतैः

सहोदैत् ” ( तै ० सं ० ७।१।६।२ ) इति ॥

भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि एक हजार गो - तत्त्वों को ३३३, ३३३, ३३३, इस प्रकार त्रिघा विभक्त कर वसुनों, रुद्रों व श्रादित्यों में दे देने पर केवल एक गोतत्त्व बचता था

जिसे कामगबी कहा जाता है । उसे बभ्रु, अरुण, रोहिणी रूप से त्रिधा विभक्त किया था ।

वही स्थिति अब भी है । अत: इसे त्रिधा विभक्त कर उत्पन्न किया जाता है ॥१३ ॥

जो बभ्रुवर्ण की तथा पीले नेत्र वाली गाय है वह सोमणी गाय । जो रोहिणी अर्थात् लाल रङ्ग की गाय है वह इन्द्रदेवापा गाय है । वार्त्रघ्नी का अर्थ इन्द्रदेवापा है, क्योंकि वृत्र को मारने वाले इन्द्र से सम्बन्ध रखती है । संग्राम में विजय प्राप्त कर राजा पर राष्ट्र से जिस गाय को लाता है वही वार्त्रघ्नी कहलाती है । और जो काली आखों वाली गाय है, वह पितृदेवत्या गौ है । सोम काला है और सौम्य प्रारण ही पितर कहलाता है अतः

उस गाय को पितृदेवत्या कहा है, जिसका श्राद्ध में पितरों के लिए आलम्भन करते हैं ।

॥१४ ॥

सोमक्रयणी के लिए बभ्रु, वर्ण की पिङ्गाक्षी गाय को ग्रहण करना चाहिए । यदि वह न मिले तब अरुण वर्ण वाली गाय को लेना चाहिए । वह भी न मिले तो इन्द्रदेवत्या रोहिणी गाय लेनी चाहिए यदि वह भी न मिल सके तो लाल वर्ण की श्वेताक्षी गाय का ग्रहण करना चाहिए । इसकी आशा में नहीं बैठना चाहिए कि उसकी आँखें काली ही हों ॥१५ ॥

यह गाय गर्भवती नहीं होनी चाहिए । यह जो सोमक्रयणी गाय है वह निदानेन वाक् है । वह प्रयातयाम्नी हो, गतरसा नहीं हो । अतः सोमक्रयणी गाय गर्भिणी नहीं होनी चाहिए । क्यों कि जो गर्भिणी नहीं होती वह अगतरसा होती है । गर्भिणी होने पर तो उसका रस वत्स में बँट जाने से गतरसा हो जाती है । वह गाय अवण्डी हो, अर्थात् वर्धिष्णु होनी चाहिए । एक सींग वाली नहीं चाहिए । काणी अर्थात् एकाक्षी नहीं चाहिए । कटे हु कान वाली नहीं होनी चाहिए । गर्म शलाका से चिह्नित नहीं होनी चाहिए । उसके पैरों से एक खुर वाला पैर नहीं होना चाहिए । गाय के पैर में दो खुर होते हैं । चार पैरों में मिला कर आठ खुर होते हैं । किसी पैर में एक खुर की कमी से वह सात खुर वाली होती है, ऐसी नहीं होनी चाहिए । वह सब दोषों से रहित अर्थात् सम्पूर्ण अवयवों वाली एकरूपा होनी चाहिए । जैसा कि कात्यायन ने कहा है: -[ ३६ ९ ]

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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमक्ररणी ब्राह्मण " सोमक्रयरणी तिष्ठत्यन्तक्षिताऽव्यङ्गाऽप्रवीवाड रज्जुबद्धा वभ्रु, पिङ्गला, पिङ्गलाधावे अरूणा, अरूणाभावे रोहिण्यश्येताक्षी " ( का ० श्री ० सू ० ७ १६६ ) इति ॥ किन्तु याज्ञवल्क्य ने कह दिया है कि रोहिणी यदि काली आखों वाली न मिले तो श्वेताक्षी को भी ले लेना चाहिए ॥ १६ ॥

[ विज्ञान भाष्य ] सोम खरीद करके ही यज्ञ करना चाहिए इसकी उपपत्ति बतला दी गई है । प्राकृतिक यज्ञ में सोम लेने के लिए पृथिवी की गायत्री वाक् जाया करती है । गायत्री ही सोमापहरण करती है । वाक् पृथिवी में से निकल कर पृथिवी के ३३ अहर्गण तक जाती है । गायत्री ही त्रिष्टुप् -जगती बन जाती है । यही वाक्, सोम लाने में समर्थ होती है । इस वाक् द्वारा सोम खरीदा जाता है और इस वाक् द्वारा खरीदे हुए सोम से देवता लोग अपना यज्ञ करते हैं । इस प्रकार अनवरत सोम खरीदा जा रहा है एवं अनवरत प्राकृतिक सोमयज्ञ हो रहा है । सूर्य्यं उत्तर में माना जाता है । पृथिवी दक्षिण में मानी जाती है । यहां दक्षिण का अर्थ है - नीचा और उत्तर का अर्थ है ऊँचा । सूर्य्य ऊँचा है, पृथिवी नीचे है । सोम सूर्य्यं से भी परली तरफ है । सूर्य्यं के ऊपर है - प्रभिजित् । अभिजित के ठीक उत्तर में है परमेष्ठी - पिण्ड । उसी में से सोम आया करता है । - दक्षिण में रहने वाली जो पृथिवी है-उसकी वाक् सूर्य्यं से भी ऊपर ३३ अहर्गण तक वितत रहती है । इससे सिद्ध हो जाता है कि वाक् दक्षिण से उत्तर की ओर सोमापहरण के लिए आक्रमण करती है । सोम लेने के लिए वाक् दक्षिणस्थ पृथिवी से निकल कर सूर्य्य से भी ऊपर तक जाती है । यह है प्रकृति की परिस्थिति । श्राज यजमान को भी वाक् द्वारा सोम खरीदना है । अतएव निदानेन वाक्- स्थानापन्न गौ से यजमान सोम खरीदने में समर्थहोता | संकेत को ही निदान कहते हैं । वस्तुत्रों की सही पहचान ही निदान है । तन्त्रशास्त्र में निदानविद्या का अधिक उपयोग होता है । देवता के हाथ में कमल का पुष्प है - तो उसे पृथिवी समझो | पृथिवी पद्माकार है । अतएव कमल को निदान ने ( संकेत ने ) पृथिवी मान लिया है । कमल देवता के हाथ में है - इससे यही तात्पय्यं है कि सारी पृथिवी देवता के वश में है । इसी समझ - पहचान का नाम निदान है । भगवती सरस्वती के हाथ में पुस्तक है— इससे तात्पर्य्य यह है कि सारी विद्या सरस्वती के अधीन है । देवतानों के जो चित्र बने हुए हैं वे सारे के सारे - इसी निदान के आधार पर बने हुए हैं । संकेतविद्या का नाम ही निदानविद्या है । यह निदान नदी - पर्वत - नक्षत्रादि पर अधिक रूप से किया जाता था | मनुष्यों में जो - जो बातें होती थीं- उन्हें स्थिर रखने के लिए नक्षत्रों के आधार पर उस कथा को - बनावटी बना दिया जाता था, उदाहरणार्थ - त्रिशंकु और विश्वामित्र के चरित्र को ही लीजिए । विश्वामित्र ने त्रिशंकु को स्वर्ग में भेजना चाहा था परन्तु इन्द्र ने अघबीच में ही उसे रोक दिया । बस, कथा को सदा बना रखने के लिए नक्षत्रों पर प्रारोपण है । आकाश में तीन नक्षत्रों को त्रिशंकु मान रक्खा है । वहीं नीचे की भोर के एक नक्षत्र को विश्वामित्र मान रक्खा है, ऊपर के एक नक्षत्र को इन्द्रमान रक्खा है । इसी का नाम निदानविद्या है । उसी निदान के आधार पर गौ को वाक् मान लिया जाता है । यह गौ - निदानेन वाक् ही है । एक बात और समझ लेनी चाहिए कि, निदान प्रारण - सम्बन्ध से ही कायम किया जाता है । सर्वथा कल्पित होने पर भी निदान प्रारण का स्वरूप बतलाता है । उदाहरणार्थ - विश्वामित्र का जो नक्षत्र है उसमें वास्तव में विश्वामित्र - प्राण रहता है । इन्द्र - नक्षत्र [ ४००]

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तृतीय काण्ड ( अ ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमक्रबणी ब्राह्मण में वास्तव में इन्द्रप्राण रहता है । त्रिशंकु वास्तव में त्रिशंकु प्राणयुक्त है । निदान से प्राचीन आख्यानों के रहस्यों को समझाया जा सकता है । नक्षत्रों के गुण - धर्मं भी स्पष्ट किए जा सकते हैं । प्रजापति नक्षत्र पर दृष्टि डालिए - वास्तव में उसका रस सर्वत्र प्राता है । सारा विश्व उसके रस से व्याप्त है । अग्नि के नक्षत्र में, वास्तव में अग्नि प्राण है । कहने का तात्पर्य यही है कि निदान कोरा कल्पित ही नहीं होता है, पितु वह प्राणविद्या भी सिखलाता है । इसी प्रकार से यह वाक्- निदान समझना चाहिए । जो निदा-नेन वाक् है वह कोरी कल्पना ही नहीं है । प्राकृतिक वाक् का नाम भी गौ ही है । प्रविभक्ता वाक् " वाक् " कहलाती है । विभक्तावाक् " गौ " कहलाती है, एक वाक् में एक सहस्र विभाग होते हैं । प्रत्येक विभाग गौ नाम से व्यवहृत होता है । गौ किस पदार्थ का नाम है, इसका विवेचन - " परमेष्ठी - कृष्ण रहस्य " में किया गया है । पशु - गौ में वाक्- गौ उत्वरण रहती है अतएव उसका नाम भी गो रख दिया गया है । वास्तव में यह गौ वाक् ही है । निदान होते हुए भी सत्यभाव है । हमने बतलाया है कि पृथिवी से वाक् प्रकृति - मण्डल में ऊपर तक जाती है एवं सोम ला कर वापस लौट आती है । उसी की प्रतीकस्वरूप यह गौ ( गाय ) सोम लाने वाली वाक् है । यह वाक् - स्वरूप गौ उत्तर को जा कर वापस लौट आती है अतएव निदानेन वाक् - स्वरूपा इस गौ को यह अध्वर्यु दक्षिण भाग से उत्तर की ओर ७ कदम ले जा कर वापस लौटा लाता है । प्रकृति में दक्षिणस्थ पृथिवी से वाक् उत्तर की ओर जाती है एवं सोमला कर वापस लौट श्राती है । बस, इसी के अनुसरण में इस वाक् ( गो ) को उत्तर की ओर ७ कदम ले जाते हैं और फिर वापस लौटा लाते हैं । " सप्तपदान्यनु निक्रामति " - उत्तर की ओर सात कदम ले जा कर वापस लौटा कर लाता हुआ अध्वर्यु, स्वर्गलोक में सोम लेने गई हुई वाक् को वहां से प्रत्यावृत्त करता है क्योंकि यदि वापस न लौटाए तो सोम लेने के लिए गई यह वाक् वहीं रह जाए । वाक् रूप गौ सोम लेकर वहां से सम्बन्ध तोड़ कर वापस इस यज्ञ में आ जाए जैसा कि प्रकृति - यज्ञ में सोम लेकर वापस लौट आती है । वाक् को निदानेन इसी की अनुरूपता के लिए सात कदम उत्तर में ले जा कर प्रध्वर्युं वापस लौटा लाता है । सोम लाने वाली वाक् वापस लौट आए वहीं न रह जाए- इसी भाव के लिए यह विधि अपनाई जाती है-" वृङ्क्तऽए वैनामेतत् । तस्मात् सप्तपदान्यनुनिक्रामति " । अब यहाँ पर एकमात्र प्रश्न यही शेष रह जाता है कि सात पद पर ले जा कर ही वापस क्यों लौटा लाए? इसीका उत्तर देते हैं-कद्रू का नाम पृथिवी है । सुपर्णी का नाम वाक् है । यह वाक् ३३ अहर्गण तक वितत रहती है । इसी वाक् से गायत्री, त्रिष्टुप् आदि छन्द उत्पन्न होते हैं । छन्द नाम है आयतन का । इस वाङ् -मण्डल में भिन्न - भिन्न प्रकार के प्राण रहते हैं । इसका एकमात्र कारण छन्द ही है । छन्द ही से प्राण-भेद होता है । इस छन्द की जननी यही वाक् है । वाक् ही छन्द का आधार है । हमने बतलाया है कि संसार के यच्चयावत् पदार्थ अग्नि- सोमात्मक हैं । अग्नि और सोम प्रत्येक पदार्थ में रहते हैं । अग्नि-सोम का फैलाव वाक् - मण्डल तक रहता है । वाक्- मण्डल ३३ अहर्गण तक वितत रहता है । ३३ में से [ ४०१ ]

पृष्ठ 416

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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमक्रयणी ब्राह्मण २१ तक तो अग्नि रहता है एवं ३३ तक सोम रहता है । भास्वर और दिक् भेद से सोम दो प्रकार का है । इनमें त्रिणवस्तोम तक अर्थात् २७ तक भास्वरसोम रहता है, ३३ तक दिक्सोम रहता है । इस प्रकार एक ही वाक् में अग्नि - सोम के भेद से २१-२७-३३ ये तीन विभाग हो जाते हैं । इन तीनों में भी २६ तक रहने वाला जो अग्नि है उसके घन - तरल - विरल अवस्था - विशेष के कारण श्रग्नि, वायु, आदित्य तीन स्वरूप हो जाते हैं । इनमें जो अग्नि का छन्द है, उसका नाम गायत्री है । वायु के छन्द का नाम त्रिष्टुप् है । श्रादित्य के छन्द का नाम जगती है । इन छन्दों का प्रकृत से सम्बन्ध नहीं है, सम्बन्ध है २१-२७-३३ से । जहाँ तक पृथिवी का वाक् जाता है उस वाक् के अन्तिम मण्डल की परिधि को रथन्तर साम किंवा रथन्तर छन्द कहा जाता है । चूंकि रथन्तर - सामयुक्ता वाक् में अग्गि और दो सोमों के कारण २१-२७-३३ ये तीन विभाग हो जाते हैं, अतएव एक रथन्तर साम के तीन साम हो जाते हैं । जो २१ तक का साम है उसे तो रथन्तरसाम ही कहा जाता है एवं २७ तक के साम को वैरूप साम कहा जाता है एवं ३३ तक के साम को शाक्वर साम कहते हैं । साम को पृष्ठ शब्द से भी व्यवहृत किया जाता है । एस प्रकार एक ही वाक् से अग्नि - सोम भेदेन तीन साम उत्पन्न हो जाते हैं, जिन्हें कि छन्द भी कहते है । तीनों इसी वाक् से उत्पन्न होते हैं । इन तीनों में जो सब से अन्तिम छन्द है, उसका नाम शाक्वर छन्द है । असल में इस छन्द का नाम है शक्वरी । चूंकि साम इसी शक्वरी छन्द से बनता है अतएव इस साम को शाक्वर साम कहा गया है । प्रत्येक छन्द में भिन्न - भिन्न विभाग माने जाते हैं । रथन्तर छन्द के विभाग और ही हैं । वैरूप के विभाग और ही हैं । शक्वरी छन्द के विभाग श्रीर ही हैं । इन तीनों में से प्रकृत में शक्वरी ही विवेच्य है । इस शक्वरी छन्द को ७ विभागों में बाँटा जाता है । यही ७ विभाग इस शक्वरी के सात पैर माने जाते हैं । इसी अभिप्राय से कहा गया है " सप्त-पदा शक्वरी " ( तंति ० संहिता ६ | १ | ८ | १ ) कहना यही है कि वाक् से उत्पन्न होने वाले छन्दों में सबसे अन्तिम छन्द शक्वरी है एवं वह सप्तपदा है । यह गौ ( गाय ) निदानेन वाक् है । प्रकृति - मण्डल में पार्थिव वाक् की गति ३३ तक है एवं ३३ तक व्याप्त शक्वरी छन्द सप्तपदा है अतएव वाक् को साम खरीदने के लिए अन्तिम शक्वरी छन्द तक पहुँचाने हेतु उत्तर की ओर सात पदों तक ही ले जाते हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं कि जिस वाङ्मण्डल में जिस वाक् से जो छन्द उत्पन्न हुए हैं, उन में सप्तपदा शक्वरी छन्द ही सबसे अन्तिम छन्द है । अतएव अध्वर्यु प्रकृतिवत् वाक्रूपा गौ को उत्तर की ओर सप्त पद तक अन्तिम स्थान पर ले जा कर वहाँ से अपनी ओर लौटाता है । प्रकृति में वाक् सति पद वाली शववरी पर जा कर सोमापहरण कर वापस लौट आती है । उसी की अनुकृति पर अध्यर्यु निदानेन वाक् को सत्तपदा शक्वरी छन्द तक संपत्ति प्राप्ति के लिए ले जा कर वापस लौटा लाता है— " यत्र वै वाचः प्रजातानि छन्दांसि सप्तपदा वै तेषां परार्ध्या शक्वरी

तामेवैतत् परस्तादर्वाचीं वृङ्क्ते । तस्मात् सप्तपदान्यनुनिक्रामति ॥ १ ॥

............. याज्ञवल्क्य कहते हैं कि अध्वर्यु इस गाय को गाय न समझ कर अपितु वाक् समझ कर ही उत्तर की ओर ले जाकर वापस लौटाता है अर्थात् गाय में उस वाक् का भाव रखना चाहिए, जो कि [ ४०२ ]

पृष्ठ 417

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमक्रयणी ब्राह्मण वाक् प्रकृति में सोम लाया करती है । देवता के हाथ में रहने वाला कमल - पुष्प जैसे पृथिवी है- पुष्प नहीं है, तथैव निदानेन यह गाय, गाय नहीं है अपितु वाक् है-" स वै वाच एव रूपेणानु निक्रामति ” जिस समय गाय को उत्तर की ओर ले जा कर वापस लोटाता है - उस समय श्रध्वर्यु स्तुतिस्वरूप निम्नलिखित मन्त्र बोलता है-" वस्त्यस्य दितिरस्यादित्यासि रुद्रासि चन्द्रासि । बृहस्पतिष्ट्वा सुम्ने रम्णातु रुद्रो वसुभिराचके " । हे सोमणि! हे वाग् देवते! त्वं वस्वी असि । श्रदितिरसि । श्रादि-त्यासि । रुद्रासि । चन्द्रासि । हे वाग् देवते! त्वां बृहस्पतिः सुम्ने रम्रणात् । ( श्रपिच ) रुद्रो वसुभिः ( सह ) श्राचके । हे सोम क्रयिरिण - आप वस्वी हो, अर्थात् वसुदेवताक हो एवं अदिति हो, अर्थात् पृथिवी-स्वरूप हो, एवं रुद्रदेवताक हो, चन्द्रदेवताक हो, श्रादित्यदेवताक हो । हे सोमक्रयिरिण, मार्ग में बृह -स्पति आपको सुख से रमण कराएँ । वसु के साथ रुद्र भी प्रापके सुख को चाहते हैं । वाक् पृथिवी में से निकल कर ३३ अहर्गण तक जाती है, यह हम बतला आये हैं । इस वाक् पर ही अग्नि और सोम रहते हैं । इसमें अग्नि घन - तरल - विरल भेद से तीन स्वरूपों में परिणत रहता है । नाग्नि का नाम अग्नि है । तरलाग्नि का नाम वायु है, विरलाग्नि का नाम आदित्य है । इसमें भी अग्नि की आठ अवस्थाएँ होती हैं । इन्हीं के नाम प्राठ वसु हैं । वायु की ११ अवस्थाम्रों के नाम ११ रुद्र हैं । आदित्य की १२ अवस्थाओं के नाम १२ श्रादित्य हैं । इस प्रकार ये सारे देवता उसी वाक्-मण्डल में रहते हैं । वसु पृथिवीलोक की वस्तु है, रुद्र अन्तरिक्ष की वस्तु है, आदित्य द्युलोक को वस्तु है । जिस प्रकार रुद्र अन्तरिक्ष की वस्तु है तथैव चन्द्रमा भी अन्तरिक्ष की वस्तु है । इस तरह एक ही वाक्-पृथिवी अन्तरिक्ष - यो तीन स्वरूपों में परिणत हो जाती है । पृथिवी के अधिष्ठाता वसु हैं, अन्तरिक्ष के रुद्र और चन्द्रमा हैं, द्युलोक के आदित्य हैं । यह सारा विभाग होता है पृथिवी - पिण्ड से । पृथिवी - पिण्ड ही का नाम अदिति है । अदिति हो तो असली वाक् है, वही तो ३३ तक वितत रहती है । रुद्र, वसु, चन्द्रमा, आदित्य इसी प्रदिति वाक् पर अवलम्बित रहते हैं । एक ही वाक् इतने विभागों में परिणत हो वसु बन जाती है, रुद्र बन जाती है, आदित्य बन जाती है । वही ग्रदिति वाक् सत्र कुछ बन जाती है । अतएव श्रुति कहती है-श्रदितिद्यौरदितिरंतरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः । विश्वे देवा अदितिः पंच जना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वं ॥ [ ४०३ ] ( ऋग्वेद मं ० १५६।१० )

पृष्ठ 418

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तृतीय काण्ड ( अ ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमक्रयणी ब्राह्मण यह अदिति ही सब कुछ है । अतएव वस्वी इत्यादि मन्त्र का अर्थ करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं— " वस्वी ह्येषा । श्रदिति ह्येषा । श्रादित्या ह्येषा । चन्द्रा ह्येषा " । सूर्य्यं से ऊपर परमेष्ठिमण्डल है । यह अदिति वाक् सोम लाने के लिए इसी परमेष्ठिमण्डल में जाती है । सूर्य्य के ऊपर जो सोम है उसका नाम है ब्रह्मणस्पति । ब्राह्मणस्पत्य सोम ही को यह वाक् लाती है । इस बृह्मणस्पति और सूर्य के बीच में बृहस्पति है । सूर्य्य से नीचे का भाग उत्तरसृष्टि कह-लाता है, ऊपर का भाग पूर्वा - सृष्टि कहलाता है । जिस प्रकार इस उत्तर - सृष्टि के पहले अधिष्ठाता सूर्य्य हैं, अर्थात् इन्द्र हैं, तथैव उस स्वयम्भू - परमेष्ठि- स्वरूप पूर्वा - सृष्टि के अन्त में बृहस्पति है । इसी-लिए श्रुति कहती है-" बृहस्पतिः पूर्वेषामुत्तमो भवति इन्द्र उत्तरेषां प्रथमः " । श्रविभक्ता वाक् का नाम वाक् है और विभक्ता वाक् का नाम गौ है, यह बात हम पूर्व में बतला आए हैं । कहना यही है कि वाक् का नाम गो है । इस गौ के अधिष्ठाता देवता - रुद्र और बृहस्पति-दो ही हैं । रौद्री श्रोर बार्हस्पत्या - दो ही प्रकार की गो होती हैं । सूर्य्यं के नीचे की जो गौ है वह रौद्री है । उसे रोद्री इसीलिए कहा जाता है कि पानी चूंकि सूर्य्यं के ऊपर है एवं रुद्र सूर्य्यं के नीचे है, अत-एव इस गौ में रुद्रता रहती है । शरीर को फाड़ देने के कारण ही इसे रौद्री गौ कहते हैं । यही गो जब से बाहर परमेष्ठिगण्डल में, मापोमण्डल में, चली जाती है तो इसकी रुद्रता मिट जाती है । तब इसे शिवा गौ कहा जाता है । इस प्रकार पराध्यं - अपराध्यं - भेदेन गौ दो स्वरूपों में परिणत हो जाती है । परार्ध्या के स्वामी बृहस्पति तथा अपरार्ध्या के रुद्र हैं । सोम लाने के पक्ष के बीच में, इसके अधिष्ठाता बृहस्पति रहते हैं । यदि इनकी प्राज्ञा न ली जाएगी तो यह गौ सोम - लाने में असमर्थ हो जाएगी । बृह-स्पति से आगे सोम है । वहाँ जाती हुई वाक् को बृहस्पति रोक न दें प्रतएव उनसे भी प्रार्थना करते हुए ' सुम्ने ' कहा है - जिससे यह माशय है कि बृहस्पति सुख में रमण कराएँ । सुख में रमण की वास्तविक स्थिति क्या है? किसी तोते को जब पिंजड़े में वन्द कर दिया जाता है तो उस बेचारे को झक मार कर उसी में रमण करना पड़ता है । परन्तु यह रमण दुःख में रम है । एवं स्वतन्त्र होकर वह जो रमण करता है, वही सुख में सच्चा रमण है । याज्ञवल्क्य - ' सुम्ने रम्णातु ' का अर्थ करते हुए कहते हैं कि आपको बृहस्पति साधुमार्ग से अच्छे मार्ग से, वापस हमारे पास लौटा दें । " ब्रह्म वै बृहस्पतिः " बृहस्पतिष्ट्वा साधुना ( मार्गेण ) श्रावर्तयत्वित्येवैतदाह " । जैसे सूर्य्य से ऊपर की गौ के अधिष्ठाता बृहस्पति हैं तथैव सूर्य्य से नीचे की गौ के अधिष्ठाता रुद्र हैं । बाकू भी पशु है अतएव रुद्र पशुपति हैं । संसार में जितने भी पशु हैं, सबके अधिष्ठाता रुद्र ही हैं । वाक् भी रुद्र के अधीन है । यदि रुद्र की आज्ञा में पशु नहीं रहते तो तो रुद्र उसी समय उनका नाश कर डालते हैं । रुद्र की नजर बचा कर कोई भी पशु नहीं निकल सकता है । इस वाक् पशु को रुद्र के रास्ते में से हो कर जाना है । कहीं रुद्र इसे मार न बैठें प्रतएव उनसे प्रार्थना की जाती है । क्रोधी [ ४०४ ]

पृष्ठ 419

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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मणं सोमक्रयणौ ब्राह्मणं अफसर का जाने की अनुमति दे देना ही उसकी प्रसन्नता समझनी चाहिए । यदि वह मातहत के काम A को चाहने भी लगे तो समझ लो, वह पूर्ण प्रसन्न है । इसीलिए " श्राचकः " - यह कहा है । जाती हुई वाक् का विरोध न करे, उसके काम को चाहें, यही गनीमत है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " रुद्रो वसुभिराचकः " – यह रुद्र वाक् का नाश न कर डाले । पशु रुद्र का अतिक्रमण नहीं कर सकते । रुद्र की नजर से कोई भी पशु छुपा हुआ नहीं है । अतएव उससे प्रार्थना कर लेना अत्या-वश्यक है-" अप्ररणाशायैतदाह रुद्रं हि नाति पशवः " ॥ २ ॥

इस प्रकार पूर्वोक्त मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु सोमक्रयिणी गाय को उत्तर ( ऊपर ) की घोर सात पांवडे ( कदम ) ले जाकर वापस दक्षिण में ला कर उसके ठीक सातवें कदम के पास आ कर बैठ जाता है । यजमान एवं ऋत्विक् भी उस सातवें डग पर गाय के खुर के पास आ कर बैठ जाए, इसलिए " पर्युप-विशन्ति " कहा है । इसके अनन्तर अध्वर्यु उस गाय के खुर में सोने की टिकड़ी रख कर उस पर ग्राज्य की आहुति डालता है--" अथ सप्तमं पदं पर्युपविशन्ति । स हिरण्यं पदे निधाय जुहोति " । हुति [ अग्नि में ही डाली जाती है । आहुति सोम है । सोम अग्नि के अलावा और कहीं नहीं डाला जा सकता । अग्नि के अतिरिक्त अन्य स्थान में डाला हुआ सोम सर्वथा व्यर्थ जाता है । एवं यहां है गाय का खुर । इसमें अग्नि रखना एक प्रकार से गाय के पैर को जलाना है । अतएव कोई ऐसा उपाय निकालना चाहिए जिससे प्राहुति भी दी जा सके और गाय का पैर भी न जले । बस, ऐसा उपाय एकमात्र सुवर्ण ही है | सुवर्ण अग्नि का रेत है । एक खास प्रकार की मिट्टी में धर्म्म जब प्रवर्ग्य हो जाता है तो वही धर्म्म सुवर्ण कहलाने लगता है । सुवर्ण साक्षात् अग्नि है । विशिष्ट सूर्यरश्मियाँ ही विशेष प्रकार की मिट्टी से संयुक्त हो कर सुवर्ण में परिणत हो जाती हैं । सुवर्ण अग्नि है । इसमें सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि चाहे दो लाख वर्ष तक सुवर्ण को अग्नि में जलाओ - वह नहीं जल सकता । कारण इसका यही है कि सुवर्ण स्वयं श्रग्नि - रूप है । आग, आग को कभी नहीं जला सकती । जिसे सुवर्णं की भस्म कहा जाता है वह केवल वही मिट्टी है जिसने सूर्य्यं रश्मियों को पकड़ रखा है । औषधियों द्वारा उस मिट्टी को विशकलित मात्र किया जाता है । इस प्रक्रिया से रश्मियाँ उसी समय पकड़ से निकल कर अपने प्रभव सूर्य्यं में जा मिलती हैं । उस औषधि और अवशिष्ट मिट्टी को ही सोने की भस्म कहा करते हैं । परन्तु विश्वास रखिए, सोने की खाक कभी नहीं हो सकती । सोना आग है । आग दिव्य-लोक की वस्तु है । वह तभी तक यहाँ पर रहती है जब तक कि किसी पदार्थ में आबद्ध हो । बन्धन टूटते ही उसी समय वह दिव्याग्नि में शामिल हो जाती है । अतएव श्रुति कहती है-शेषे वनेषु मात्रोः सं त्वा मर्तास तंद्र हव्या वहसि हविष्कृत आदिदेवेषु

इंधते ।

राजसि ॥

( ऋग्वेद मं ० ८ । ६० । १५ ) [ ४०५ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण " अथ स्पयमादाय परिलिखति " । सोमक्रयणी ब्राह्मण यह स्पय वज्र है, इन्द्र का शस्त्र है । अतएव स्फ्य से कुचरना वज्र से कुचरना है । घृत से सोम वल्ली को काटा जाता है एवं वज्र से सोम को सुरक्षित कर अपने कब्जे में किया जाता है अतएव खुर को वज्र - स्वरूप स्पय से कुचरा जाता है । स्पय से कुचरना ही वज्र से कुचरा जाना है— " वज्ञो वै स्पयो । वज्रेणवंतत् परिलिखति " । उस स्पय से तीन बार खुर की मिट्टी को कुचरा जाता है । वज्र त्रिवृत् होता है । एक ही इन्द्राग्नि के विद्युत्, उल्का, धिष्ण्या, वज्र और तारा ये पाँच भेद हो जाते हैं । आकाश में जो लकीर सी चमक जाती है उसका नाम है विद्युत् । वही विद्युत् यदि " त्रिवृत् " ( 4 ) हो जाती है तो वज्र कहलाने लगती है । यही वज्र का आकार है । इसमें से यदि तीनों ओर ज्वालाएँ निकलने लगती हैं तो यह महा-वज्र कहलाता है । यही महावज्र का स्वरूप है । यही हजारों वर्षों के अन्तर से पृथिवी पर पड़ा करता है । कहना हमें यही है कि वज्र त्रिवृत् होता है । प्रतएव वज्र स्वरूप सम्पत्ति के लिए स्पय से तीन बार ही परिलेखन करना चाहिए । यदि एक ही बार किया जाएगा तो वज्र नहीं होगा, विद्युत् हो जाएगा । विद्युत् में कम बल होता है । वज्र में अधिक बल होता है । अतएव वज्र से ही परिलेखन करना चाहिए । इसी अभिप्राय से कहते हैं कि त्रिवृत जो वज्र है उससे कोई सोम का हिस्सा श्रतिक्रमण कर बाहर न चला जाए अतएव समन्तात् ( चारों ओर से ) उस सोम को ले लेते हैं-" त्रिवृतैर्वतद्वत्रेण समन्तं परिगृह्णात्यनतिक्रमाय " ॥५ ॥

क्यों परिलेखन करना चाहिए - इसका कारण बतला दिया । अब पद्धति बतलाते हैं । वह अध्वर्यु " अस्मे रमस्वेति " यह बोलता हुआ उस मिट्टी को कुचरता है । सुपां सु लुक् से ' शे ' आदेश होकर अस्मे बना है । इसके अस्मभ्यं मया, मयि ये अर्थ हो सकते हैं । यहाँ पर सप्तम्यन्तार्थे ही अभिप्रेत है । इसी अभि प्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं - " यजमाने रमस्व! " अर्थात् हे पदपांशो अर्थात् सोम! आप हमारे यज-मान में रमण कीजिए । अर्थात् यजमान से आत्मसात् होइए । यही तात्पर्य है । सोम कहो, वाक् कहो -एक ही बात है । यह वाक् सौम्या - वाक् है अतएव हे वाक्! आप यजमान में रमण कीजिए - यह भी अर्थ हो सकता है । इस प्रकार मिट्टी को कुचर कर उस मिट्टी को " प्रस्मे ते बन्धुः " यह मंत्र बोलता हुआ एक पात्र में रख देता है । हे पदपांशो! आप का जो स्नेह - बन्धन है, यह हमारे यजमान से हो । अर्थात् आप

हमारे यजमान के बन्धु बन जाएँ, उनके हो जाएँ ।

" यजमाने ते बन्धुरित्येवैतदाह " ॥ ६ ॥

इसके अनन्तर अध्वर्यु ' जिस स्थान से कुचर कर मिट्टी निकालता है, उस परिलिखित प्रदेश में पानी छिड़क देता है- " तस्मादप उपनिनयति " । [ ४०८ ]