Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 51–60
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 51–60
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तृतीय काण्ड अ ० १ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षा ब्राह्मण दीक्षाकर्म में ही प्रविष्ट होना है । यह यजमान मनुष्य है— तब तक यह सोमयाग का अधिकारी नहीं बन सकता जब तक कि दीक्षा न ले ले । जब दीक्षा से यह मनुष्य - भाव से हटा कर देव - भाव में शामिल कर दिया जाता है तब सोमयाग का अधिकारी होता है । कहने का तात्पर्य यह है कि har ममश्र के वपन के पहिले चूं कि यह श्रदीक्षित रहता है, सामान्य मनुष्य रहता है अतः भोजनादि में इसके लिए कामचार है । केशश्मश्रु वपन से पहिले इसकी इच्छा हो, वही खाय । उस समय जो बन पड़े, जो उसे खाने को मिले वही खा ले । अर्थात् चाहे जो खा ले । केशश्मश्रु वपन से पहिले भोजन में नियन्त्रण नहीं है— " पुराकेशश्म श्रोर्वपनात् यत् कामयेत् तदश्नीयात्, यद्वा सम्पद्येत " । अर्थात् भोजन में यथेच्छाचार है । अन्न, सर्पि, दधि, मधु इत्यादि सब कुछ खा सकता है, यही " यद्वा संपद्येत " का तात्पर्य है । परन्तु जब यह मुण्डन करवा लेता है तो वह अट्ट - सट्ट नहीं खा सकता । मुण्डनान्तर इस यजमान का भोजन केवल गौ का दूध ही होता है । सिवाय दूध के और कुछ नहीं पी सकता । परन्तु जो यजमान मुण्डनान्तर पूर्ण भेदभावप्राप्त्यर्थं खाना ही न चाहे, वह भले ही न खाय । अर्थात् मुण्डनान्तर उपवास करने में भी कोई हानि नहीं है । अन्न खाने में - प्रट्ट - सट्ट खाने में - अवश्य ही हा है | यदि खावे तो केवल दूध ही खावे --" व्रतं ( दुग्धं ) ह्य ेवास्यातो ( केशवपनादुर्ध्वम् ) अशनं भवति । यद्युना -शिशिषेदपि कामं नाश्नीयात् " ॥ १ ॥
इस देवयजन भूमि में जो प्राचीनवंशशाला बनाई गई है— उसके उत्तर भाग में - शाला के बाहर शाला के समीप ही यजमान पुरुष एक कनात अथवा टाटी वगैरह लगा कर क्षौर वास्ते जगह बना देते हैं । दीक्षित मनुष्य, मनुष्य नहीं है, देवता है । देवताओं का सारा काम पर्दे में होता है । उनका कोई काम मनुष्य अपनी आँखों से नहीं देख सकते, इसीलिए " परोक्षप्रिया इव हि देवाः ” कहा जाता है । अतएव यजमान का सारा काम परोक्ष में ही होता है । इसीलिए क्षौर के लिए भी शाला के उत्तर भाग में पर्दा लगाया जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं- " प्रयोत्तरेण शालां परिश्रयन्ति । तदनन्तर क्षौर के लिए एवं स्नान के लिए उसी स्थान में एक जगह पानी से भरा हुआ घड़ा रखते हैं— “ तत् ( तत्र ) उदकुम्भमुपनिदधति " –— एवं उसी स्थान पर क्षौर के लिए नापित बैठ जाता है, एवं वहाँ बैठ कर वह यजमान के केश ( सिर के बाल ) और श्मश्रु ( दाढी मूँछ के बाल ) काटता है और नाखूनों को कतरता है— " तत् ( तत्र ) नापित उपतिष्ठते । तत् ( तत्र ) केशश्मश्रु च वपने नखानि च निकृन्तते " ॥ [ ३३ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण दोक्षा ब्राह्मण केश और नाखून काटने की क्या आवश्यकता है, यह बतलाते हैं । सबसे पहिला स्वयम्भू-मण्डल है । उसके बाद परमेष्ठिमण्डल है । उसके बाद सूर्य्यमण्डल है । उसके बाद चन्द्रमण्डल है । उसके बाद पृथिवीमण्डल है । इस प्रकार सारा विश्वप्रपञ्च इन पाँच मण्डलों में विभक्त माना जाता है । इसी को, वैदिक परिभाषानुसार प्रश्वत्थ वृक्ष की " पञ्चपुण्डीराबल्शा " कहा जाता है । इन पाँचो मण्डलों में जड़ और चेतन, यह दो ही क्लास हैं । पाँचों में सिवाय जड़ चेतन के कोई तीसरी वस्तु नहीं है । यह चेतना यद्यपि पाँचों मण्डलों में रहती है तथापि इसका प्रातिस्विक स्थान स्वयम्भूमण्डल ही है । इसी चेतना मण्डल के अर्थात् स्वयम्भूमण्डल के उदर में अवशिष्ट चारों मण्डल भुवत हैं । चारों मण्डलों में इसी स्वयम्भूमण्डल की चेतना अभिव्याप्त है । स्वयम्भूमण्डल के अनन्तर सबसे पहिला नम्बर आता है परमेष्ठि मण्डल का । जैसे चित्, सूत्र, नियतिः यह तीन मनोता स्यम्भू के हैं तद्वत् भृगु, श्रङ्गिरा और श्रत्रि, यह तीन मनोता परमेष्ठि के हैं । इन तीनों में जो भगु और श्रङ्गिरा हैं वह प्, वायु, सोम और श्रग्नि, वायु, श्रादित्य, इन भेदों से, तीन तीन प्रकार के हैं । चूँकि तीसरा मनोता एकल्ला है – भृगु अङ्गिरावत् तीन नहीं हैं - प्रतएव इसे " नत्रिः ” के लिहाज से “ अत्रिः ” कहा जाता है । इस श्रत्रिप्राण का सुविशद निरूपण श्रीगुरु -प्रणीत " श्रत्रिख्याति " नाम के पौराणिक ग्रन्थ में किया गया है । यहाँ हमें सिर्फ यही बतलाना है कि जो भृगु मनोता है वह पानी, वायु और सोम, इन तीन विभागों में बँटा हुआ है । तीनों ही भृगु हैं— इस परमेष्ठिमण्डल पानी-वायु - सोम का समुद्र है । तीनों भृगु हैं — इस परमेष्ठि के देवता वरुण हैं - प्रतएव " भृगुर्वै वारुरिण ” कहा जाता है । हमने जिस चेतना का जिकर किया है, उसका सम्बन्ध केवल भृगु से ही होता है । चेतनाग्रहणशक्ति पानी में, हवा में और सोम में ही है । संसार में जहाँ भी कहीं चेतना उपलब्ध होगी, इन तीनों ही के सम्बन्ध से होगी । जैसे सूर्य्य का प्रतिबिम्ब काच किंवा पानी अर्थात् तरल पदार्थों के अलावा और किसी में नहीं पड़ सकता — ठीक उसी प्रकार से पानी - वायु और सोम, इन तीनों को छोड़ कर, दूसरे स्थान पर चेतना का प्रतिबिम्ब हर्गिज - हर्गिज नहीं पड़ सकता । चूँकि चेतना का सम्बन्ध तीन ही से होता है अतएव सारे विश्व में प्राणी भी कुल तीन ही प्रकार के उत्पन्न होते हैं । वे ही तीनों प्राप्य - वायव्य और सौम्य नाम से व्यवहृत होते हैं । जो पानी के जीव हैं । वे श्राप्य कहलाते हैं, जो वायु के जीव हैं, वे वायव्य कहलाते हैं । हम ( मनुष्यादि ) वायव्य हैं एवं जो चन्द्रमा की चाँदनी में रहते हैं, वे सौम्य कहलाते हैं । इन्हीं सौम्य जीवों को " देवता " कहते हैं । सारा सृष्टिक्रम इन्हीं तीन सर्गों में विभक्त समझना चाहिए । इन तीनों के अवान्तर भेदों से १४ प्रकार का भूतसर्ग हो जाता है जैसा कि सांख्यकारिका में लिखा है—
अष्टविकल्पो दैवतैर्यग्योनश्च पञ्चधा भवति ।
मानुष्यश्चैकविधः समासतो भौतिकः सर्गः ॥ सां ० का ० ५३ ॥
ऊर्ध्वं सत्वविशालस्तमोविशालश्च मूलतः सर्गः ।
मध्ये रजो विशालो ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तः ॥ सां ० का ० ५४ ॥
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षा ब्राह्मण दैवतसर्गः अष्टविधः ८ तैर्यग्योनः पश्वधा ५ मानुष्यः एकविधः > इत्थं चतुर्दशविधो भूतसर्गः । १ कुल योग १४ कहने का तात्पर्य यही है कि — सारा भूतसर्ग पानी, वायु और सोम, इन भागों में बँटा हुआ है | चेतना का सम्बन्ध तीन ही से होता है । जहाँ यह चेतना रहती है वहाँ का भाग मेध्य होता है । पवित्र होता है । जहाँ जिस हिस्से में चेतना नहीं होती, वहाँ का भाग अपवित्र होता है । चेतना रहती है पानी में, तो जहाँ पानी नहीं रहता वहाँ चेतना नहीं रहती, एवं चेतना नहीं रहती वहाँ का भाग पवित्र रहता है, यह बात स्वतः सिद्ध हो जाती है । मनुष्य के शरीर में केश, श्मश्र और लोम - इन तीनों में चूँकि पानी नहीं रहता – प्रतएव चेतना अभावात् यह तीनों श्रमेध्य वस्तु हैं । नाखून को काट दीजिए, जरा दर्द नहीं होगा । बाल को काट दीजिए, जरा भी पीड़ा नहीं होती । हो कैसे? जब कि उनमें चेतना ही नहीं है । चेतना तो पानी में रहती है । जब नखाग्रभाग में एवं केशलोम में पानी ही नहीं ठहरता तो फिर उनमें चेतना कैसे रह सकती है । बस इसी विज्ञान को बतलाते हुए भगवान याज्ञवल्क्य कहते हैं- " प्रस्ति वै पुरुष- । स्यामेध्यं यत्रास्यापो नोपतिष्ठन्ते " । पुरुष का वह हिस्सा बिल्कुल अपवित्र है, जहाँ पर कि पानी नहीं ठहरता । अर्थात् पानी का ( रुधिर का ) जहाँ दौरा नहीं होता वह स्थान शुष्क है । शुष्क में चेतना का सम्बन्ध होता नहीं अतएव वह शुष्क स्थान प्रमेध्य है, अपवित्र है, नापाक है । इस मनुष्य के केशश्मश्र में और नखाग्रों में ही पानी नहीं ठहरता । अर्थात् खून का दौरा उनमें नहीं होता अतएव वह सर्वथा अमेध्य वस्तु हैं । चूँकि यह यजमान दीक्षा लेने वाला है, देवताओं में शामिल होने वाला है अत; पहिले अपने अमेध्य भाग को दूर कर देना आवश्यक है । इसी अभिप्राय से कहते हैं - " दीक्षा ग्रहण विधि में— जो कि यह यजमान केशश्मश्र, श्रौर नख कटवाता है वह — मैं मेध्य बन कर पवित्र हो कर दीक्षा ग्रहण करू ” —इसी अभिप्राय से कटवाता है-" तद्यत् केशश्मश्रु च वपते नखानि च निकृन्तते— मेध्यो भूत्वा दीक्ष " ( इत्यभिप्रायेणैव वपते निकृन्तते च ) । अस्थि पर होने वाले जो बाल हैं उन्हें " केश " कहते हैं एवं मांस पर पैदा होने वाले बाल " लोम " कहलाते हैं एवं हड्डी और माँस दोनों मिश्रित स्थान में पैदा होने वाले बाल " श्मश्रु " कहलाते [ ३५ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मरण दीक्षा ब्राह्मण हैं । ये तीनों एवं नाखून अमेध्य हैं क्यों कि इनमें खून का दौरा नहीं होता ( श्रापोनोपतिष्ठते ) अतः इन्हें कटवा कर, मुण्डन करवा के ही दीक्षा लेनी चाहिए ॥ २ ॥
यहाँ पर कई याज्ञिक — " हम सर्वात्मना पवित्र होकर ही दीक्षा ग्रहण करेंगे " - — यह कहते हुए लोम सहित शरीर के सारे बाल उतार डालते हैं । उनका खयाल है कि केशश्मश्रु वत् लोम भी तो श्रमेध्य ही है अतः उन्हें भी अवश्य उतार देना चाहिए - " तर्द्धके सर्व एव वपन्ते । सर्वएवमेध्या भूत्वा दीक्षिष्यामहे " इति वदन्तः । परन्तु भगवान याज्ञवल्क्य इस पक्ष का खण्डन करते हुए कहते हैं कि सारे शरीर का मुण्डन कभी नहीं करना चाहिए । यह यजमान केशश्मश्रु कटा लेता है एवं नाखून उतरवा देता है — इसी से पवित्र हो जाता है अतः हमारे खयाल से केशश्मश्र, ही कटवाने चाहिए और नखाग्रों को ही कतरवाना चाहिए । सर्वाङ्ग शरीर के मुण्डन की कोई आवश्यकता नहीं है, इसी अभिप्राय से कहते हैं— " तदु तथा न कुर्य्यात् । यद्वै केशश्मश्रु चैव वपते नखानि च निकृन्तते
तदेव मेध्यो भवति तस्मादु केशश्मश्रु चैव वपेत । नखानि च निकृन्तेत " इति ॥
बात वास्तव में ठोक है । जैसी - जितनी अपवित्रता केशश्मश्रु और नखाग्रों में होती है उतनी लोमों में नहीं होती । लोमों में एक प्रकार से रक्त का संचार होता रहता है अतएव वे एकदम काले नहीं पड़ते । एक बात । और दूसरी बात यह है कि सारे का मुण्डन कराना श्रमाङ्गलिक कार्य्य है । अपि च मुँह के बाल हरवख्त तंग किया करते हैं । यजमान को वेदमन्त्रों का उच्चारण करना पड़ता है । अतएव उस मुख के और मस्तक के प्रमेध्य भाग को हटाना ही पर्याप्त होता है ॥ ३ ॥
यह यजमान देवताओं की मण्डली में जाने वाला है । भुवन स्वर्गवासी देवताओं की व्यवस्था भारतीय मनुष्यों से सर्वथा जुदा थी । यज्ञविद्या उन्हीं की थी । अतः यज्ञ करते समय उन्हीं की मर्यादा का पालन करना उचित है— अथवा यों समझना चाहिये कि मनुष्य जैसा करते हैं, यजमान को देव भाव-सम्पत्ति के लिए ठीक इससे उलटा करना चाहिए इसी अभिप्राय से कहते हैं - वह नापित सबसे पहिले यजमान के नखाग्रों को ही काटे - " स वै नखान्येवाग्रे निकृन्तेत " इसमें भी दाहिने हाथ के नाखून ही पहिले काटे – “ दक्षिणस्यैवाग्रे ” – कारण इसका यही है कि मानुषकर्म में मनुष्य के बाएँ हाथ के नाखून ही पहिले काटे जाते हैं । चूँकि यजमान देवाधीन है— देवतात्रों की मण्डली में शामिल है-अतएव इसके पहिले दाहिने हाथ के नाखून काटे जाते हैं— " सव्यस्य वा अग्रे मानुषे । अथैव देवत्रा " । इसमें भी पहिले अगूठे के नाखून ही काटता है – “ प्रङ्ग ष्ठयोरेवाग्रे " — क्योंकि मानुषकर्म में पहिले कनिष्ठिका के ही काटे जाते हैं- " कनिष्ठिकयोर्वाश्रग्रे मानुषे " । चूँकि यह यजमान देवता है अतः इसके पहिले अगूठे के नाखून काटे जाते हैं । [ ३६ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) दीक्षा ब्राह्मणं शतपथ ब्राह्मण अथैवं देवत्रा " ॥ ४ ॥
एवं नाखून काटने के अनन्तर पहिले सिर के दक्षिण भाग के बाल ही उतारता है " सदक्षिण-मेवाग्रे गोदानं वितारयति " । मनुष्यों के पहिले बाएँ हिस्से के बाल उतारे जाते हैं - चूँकि यह देवता अतः इसके पहिले दक्षिणभाग के बाल उतारने चाहिए—
" सव्यं वा अग्रे मानुषे । अथैवं देवत्रा " ॥ ५ ॥
जिसका पहिले वपन किया जाता है, पानी से पहिले उसी हिस्से को भिगोना चाहिए इसी अभिप्राय से कहते हैं - वह पहिले दक्षिण भाग को ही पानी से भिगोता है - " स दक्षिणमेवाग्रे गोदानं ( केश समूहं ) प्रभ्युनत्ति ( सिञ्चति ) " । तात्पर्य सम्पूर्ण कथन का यही है कि मनुष्य सम्प्रदाय में पहिले बाल कटाए जाते हैं, उनमें भी पहिले बाएँ हाथ के नाखून कटाए जाते हैं, पश्चात् दक्षिण हाथ के कटाए जाते हैं । उसमें भी पहिले चिट्टी आँगली से नाखून कटाना शुरू किया जाता है । बस मनुष्यों में क्षौरकर्म की यही व्यवस्था है । चूँकि यह यजमान मनुष्य नहीं है, यह तो भावी देवता है अतः इसे सारा काम मनुष्यों से विपरीत करवाना चाहिए । मनुष्य चौड़े में बैठ कर क्षौर करवाते हैं तो यह पर्दे में क्षौर करवाता है । एवं पहिले नाखून कटवाता है, उसमें भी दाहिने हाथ के, उसमें भी पहिले अंगूठे के । बाद में बाल कटवाता है । उसमें भी पहिले दक्षिण भाग के, बाद में वाम भाग के । बाल काटने के लिए जिस समय नाई पानी से बालों को आर्द्र करता है उस समय यजमान " इमा श्रापः शमु मे सन्तु देवी: ( वाज ० सं ० ४। १ ), यह मन्त्र बोलता है - यह देवी श्रापः मेरे लिए शान्ति देने वाले बनें - । भगवान याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यह यजमान जो कि " इमा प्रापः शमु मे सन्तु देवी: " यह बोलता है, इसे इस पानी स्वरूप वज्र का स्वहिंसा भावार्थ - प्रार्थना से शान्त करता है । पानी वज्र है । " वज्रो वा प्रापः ” याज्ञवल्क्य कहते हैं - हँसी - मजाक नहीं है । - वास्तव में पानी वज्र ही है- " वज्रो हि वा " । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि जहाँ यह पानी वेग से प्रविष्ट होते हैं वहाँ गहरा खड्डा कर आपः देते हैं जिसे कि भाषा में " खाल " कहते हैं । एवं जहां यह ( सर्दी में ) ठहर जाते हैं वहाँ वृक्ष समूह को जला देते हैं । सर्दी में इसी पानी की कृपा से वन के वन सूख जाते हैं— जल जाते हैं । बस वज्र से भी तो यह दो ही काम होते हैं । वह जहाँ गिरता है, खड्डा कर देता है एवं उस स्थान को जला देता है बस इस कर्मसादृश्यात् अवश्य ही हम पानी को वज्र कह सकते हैं । पानी से जब तक बाल नहीं भिगोए जायँ तब तक उनके उतरने में पीड़ा होती है । क्यों — छुरे के घर्षण से अग्नि पैदा हो जाती है । इस अग्नि को शमन करने का सामर्थ्य इस पानी में ही है । इसी [ ३७ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षा ब्राह्मण अभिप्राय से “ शान्तिरापः " भी कहा जाता है । परन्तु साथ ही में यह पानी स्वरूप से वज्र भी है अतः इससे प्रार्थना कर इसकी क्रूरता का शमन भी कर दिया जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " स यदाहइमा आपः शमु मे सन्तु देवीः " इति ( तस्यैतद्द्वारणं ) वज्रो वाप्रापः । वज्रो हि वा प्रापः । तस्मात् येन ( मार्गेण ) एता यन्ति निम्नं कुर्वन्ति । यत्रोपतिष्ठन्ते - निर्दहन्ति तत् । तदेतमेवैतद् वज्रं शमयति । तथो हैनमेष वज्रः शान्तो न हिनस्ति ॥ ६ ॥
तदनन्तर जो दर्भ तरुण ( सूक्ष्म कुशाग्र ) है उसे उस छुरे और बालों के बीच में रखते हैं । अर्थात् बालों पर कुशा रखते हैं एवं साथ ही में मन्त्र बोलते हैं । " श्रोषधे त्रायस्व " ( वा ० स ० ४।१ ) हे औषधे! श्राप मेरी छरे से रक्षा कीजिए " । इस प्रार्थना से मन्त्रशक्ति से क्षुर इस यजमान की हिंसा नहीं करता है । इसके बाद क्षुर को बालों पर रख के नाई बाल उतारता है और ऋत्विक् मन्त्र बोलता है " स्वधिते मैनं हिंसी: " – ( वा ० सं ० ४५१ ), यह क्षुर वज्र है अतः इससे प्रार्थना करते है कि हे स्वधिते! श्राप इस यजमान की हिंसा मत कीजिए । इस प्रार्थना से यह वज्र स्वरूप क्षुर यजमान को कोई हिंसा
नहीं पहुँचाता है ।
" वज्रो वै क्षुरः । तयो हैनमेष वज्रः क्षुरो न हिनस्ति " ॥ ७ ॥
इसके अनन्तर उन बालों को काट कर पानी से भरे हुए पात्र में डाल देता है । तात्पर्य यही है कि जैसे मनुष्यों के बाल नीचे गिरा दिए जाते हैं - इसके बाल जमीन पर नहीं गिराने चाहिए । " प्रच्छिद्योदपात्रे प्रास्यति " । इस प्रकार से दक्षिण भाग के बालों का सिञ्चन - काटना इत्यादि काम मन्त्र से होते हैं । उसमें भी जब पहिले छुरा लगाते हैं— उसी समय मन्त्र बोले जाते हैं । उसके अनन्तर सारे बाल तूष्णीमेव काट दिए जाते हैं, इसी अभिप्राय से कहते हैं - " इसके अनन्तर चुपचाप ही बाकी बालों का सिञ्चन करते हैं, एवं चुपचाप ही कुशाग्र भाग रखते हैं, चुपचाप ही क्षुर से बाल काट कर उन्हें पानी भरे पात्र में डाल देते हैं-" तूष्णीमेवोत्तरं गोदानमभ्युनत्ति । तुष्णीं दर्भत रुरणकमन्तर्दधाति । तूष्णीं क्षुरेणाभिनिधाय प्रच्छिद्योदपात्रे प्रास्यति ॥ ८ ॥
ब पद्धति बतलाते हैं — समन्त्रक पहिले इसके थोड़े से बाल काट कर पानी में डाल देते हैं, बाद में वह छुरा नाई को दे दिया जाता है । नाई अवशिष्ट केशश्मश्र को काट डालता है । जब नाई क्षौर कर चुकता है तो तदनन्तर यजमान स्नान करता है— [ ३८ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मणं दीक्षा ब्राह्मणं " अथ नापिताय क्षुरं प्रयच्छति । स केशश्मश्रु वपति । स यदा केशश्मश्रु
वपति " ॥। ९ ॥
अथ स्नाति । स्नान क्यों करना चाहिए इसकी उपपत्ति बतलाते हैं । चूँकि यह मनुष्य झूठ बोलता है अतएव यह अमेध्य रहता है । इसका अन्तःकरण मलिन रहता है । पानी मेध्य है - पवित्र है । अतः “ मैं मेध्य बन कर — पवित्र बन कर - दीक्षा ग्रहण करू " । बस इसीलिए क्षौरान्तर स्नान करता है । " अमेध्यो वं पुरुषो यदनृतं वदति । तेन पूतिरन्तरतः । मेध्या वाऽश्रापः । मेध्यो भूत्वा दीक्ष " इति । पवित्रं वा श्रापः पवित्रपूतो दीक्षा इति " तस्माद्वै स्नाति । पानी मेध्य कैसे है – पवित्र कैसे है —झूठ बोलने से मनुष्य अमेध्य कैसे हो जाता है । झूठ बोलने से इसका अन्तःकरण मलिन कैसे हो जाता है । इस सबका वैज्ञानिक तत्त्व प्रथमकाण्ड के प्रारम्भ में ( भाषा शतपथ में ) बतला दिया गया है अतः तज्जिज्ञासुत्रों को वहीं देखना चाहिए ॥ १० ॥
इसके बाद निम्नलिखित मन्त्र बोलता हुआ यह यजमान स्नान करता है— “ प्रापोऽस्मान् मातरः शुन्धयन्तु घृतेन नो घृतप्वः पुनन्तु " ( वा. स. ४१२ ) हे मातरः! हे आपः! आप हमारे को शुद्ध कीजिए । हे घृतप्व! आप घृत से हमें पवित्र कीजिए— पानी से सारी श्रोषधियें प्राप्यायित होती हैं एवं औषधियों से घृत बनता है अतएव पानी को घृतव कहा गया है । पानी को वेद में घृत शब्द से भी व्यवहृत किया गया है जैसा कि ि
कहती है-" कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा अपो वसाना दिवमुत्पतन्ति ।
त आववृत्रन्सदनादृतस्यादिद् घृतेन पृथिवी व्युद्यते ॥
( ऋक् सं ० १।१६५ ) भगवान याज्ञवल्क्य कहते हैं वही सुपूत है जो कि घृत से पूत किया जा सकता है । बस इस सुपूतत्व सम्पत्ति प्राप्ति के लिए ही " घृतेन नो घृतप्वः पुनन्तु ", यह कहा है-" तद्वै सुतं यं घृतेन पुनंस्तस्मादाह घृतेन नो घृतप्वः पुनन्त्विति " । फिर मन्त्र का शेष भाग बोलता है— " विश्वं हि रिप्रं प्रवहन्ति देवी: " । ( वा. स. ४।२ ) यह देवी आपः सारी अमेध्यता को बहा ले जाती है । इसी अभिप्राय से कहते हैं जो " विश्व " है, वही " सर्व " कहलाता है अर्थात् विश्व, सर्व का पर्य्याय है " यद्व विश्वं तत् सर्वम् " एवं प्रमेध्य को रिप्र कहते हैं इसीलिए यास्क मुनि कहते हैं-[ ३६ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० १ ) शतपथ ब्राह्मरण दीक्षा ब्राह्मण " रपो रिप्रमिति पाप नामनी भवतः " ( नि ० ४।३।५ ) चूँकि इसके सारे अमेध्य भाग को पानी बहा ले जाता है इसीलिए " विश्वं हि ० " इत्यादि कहा है-" सर्वं ह्यस्मादमेध्यं प्रवहन्ति तस्मादाह-विश्वं हि रिप्रं प्रवहन्ति देवीरिति ॥ ११ ॥
देवकर्म्म में कई स्थानों पर - पूर्व दिक् की ओर - उत्क्रमण किया जाता है अर्थात् कई कम ऐसे होते हैं जिनमें यजमान को गार्हपत्य से पूर्व की ओर जाना पड़ता है । तो बस जैसे और और कर्मों में यह पूर्व की ओर उत्क्रमण करता है तद्वत् यहाँ स्नान करे, स्नानान्तर उत्तर की ओर उत्क्रमण करता है । एवं उधर जाता हुआ यह मन्त्र बोलता है— " उदिदाभ्यः शुचिरापूत एमि " । उत् - उत् - प्राभ्यः - शुचिः - श्रा - पूतः - सन - एमि । श्राभ्यः ( श्रद्भ्यः ) - शुचिः- सन् -प्रा- समन्तात् पूतः सन् - इत् एव उदेमि " । इन पानियों से सारे मल को दूर कर अतएव आ – समन्तात् पूत हो कर ही मैं वस्त्र पहिनने के लिए उत्तर की ओर जाता हूँ । याज्ञवल्क्य इस मन्त्र का खुलासा अर्थ बतलाते हुए कहते हैं कि यह यजमान इन पानियों से स्वच्छ एवं पवित्र होकर ही वस्त्र पहनने के लिए जाता है— " आभ्यः शुचिः पूत एति ॥ १२ ॥
तदनन्तर यह यजमान मनुष्यत्व सम्पत्ति - प्राप्ति के लिए अपने अधूरेपने को मिटाने के लिए वस्त्र पहिनता है । जो त्वचा इसकी उखाड़ ली गई थी उसी अपनी त्वचा को सर्वत्व के लिए फिर धारण करता है— " अथ वासः परिधत्ते सर्वत्वायैव । स्वामेवास्मिन् एतत् त्वचं दधाति " । याज्ञवल्क्य कहते हैं — जो त्वक् आज गौ में देखी जाती है वह पहिले पुरुष में थी— या वाऽइयं गौस्त्वक् पुरुषे हैषाऽग्रास ॥ १३ ॥
सृष्टिनिर्माण करने बाले देवताओं ने विचार किया कि यह गौ संसार के प्राणिमात्र का भरण-पोषरण करती है । गौ से दुग्ध होता है । उससे तो छोटे बच्चों का पालन होता है एवं गौ से उत्पन्न बलवर्दों से खेती करा के अन्न उत्पन्न कराया जाता है जिससे कि मनुष्यादि अन्य पशु - पक्षियों का पेट भरता है । इस प्रकार से यह गौ सबका पालन - पोषण करती है - ' गौर्वाऽइदं सर्वं विभत्ति " भला इस उपकार के बदले जो त्वक् पुरुषों मे है – उसे गाय में रख दें । यह निर्दोष अखिल जगत् का पालन करने वाली गौ - माता इस त्वचा से बरसात - शीत - प्रातप - सबको सह सकने में समर्थ [ ४० ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षा ब्राह्मण हो जायगी । ऋतु कुल तीन हैं, अतएव उनके सर्दी, गर्मी, वर्षा यह तीन ही दुःख हैं । बिना त्वक् के– संसार का पालन करने वाली इन गौत्रों को — गर्मी - सर्दी - वर्षा का कष्ट सहना पड़ता है अतः इस कष्ट की निवृत्ति के लिए पुरुष के शरीर की जो त्वचा है— उसे इनके ऊपर लगा देनी चाहिए । इससे यह गर्मी - सर्दी सारी पत्तियों को सहने में समर्थ हो जायंगी -" हन्त येयं पुरुषे त्वक् - गवि एतां दधाम । तयैषा वर्षन्तं तया हिमं तया घृरिंग तितिक्षिष्यते 9 इति " ॥ १४ ॥
बस यह विचार कर देवताओं ने पुरुष के शरीर पर से त्वचा को उतार कर उसे गाय के शरीर में लगा दी । उसी त्वचा से यह गौमाता वर्षात्, सर्दी और गर्मी सब को सहती है । त्वचा के प्रभाव ही से सर्दी - गर्मी - वर्षा किसी का असर इसके शरीर पर नहीं होगा— " तेऽवच्छाय पुरुषं गव्येतां त्वचमदधुः तयैषा वर्षन्तं, तया हिमं, तथा घृरिंग तितिक्षते " ॥ १५ ॥
! " जायमानो वै जायते सर्वाभ्यो एताभ्य एव देवताभ्यः " - यह वैदिक सायन्स का अटल सिद्धान्त है । संसार के जितने भी पदार्थ उत्पद्यमान हैं— उत्पन्न होने वाले हैं - वे सब इन्हीं देवताओं से उत्पन्न होते हैं । " देवता " कोई विग्रहधारी नहीं है अपितु पदार्थ - विशेष का नाम देवता है । वैज्ञानिक परि भाषा में देवता को विग्रहवान् समझना नितान्त भूल है । अग्नि, वायु, इन्द्र, वसु, रुद्र, आदित्य यह सब पदार्थ हैं—– जिनके - श्रवयजन - यजन ( सम्मिश्रण - विशकलन ) से सारे पदार्थ बनते और बिगड़ते रहते हैं । देवता कुल ३३ माने जाते हैं – इनमें ८ वसु, ११ रुद्र एवं १२ आदित्य हैं । यदि इन ३३ देवताओं का असली स्वरूप पूछा जाय तो " अग्नि " है । अग्नि की घन, तरल, विरल अवस्था भेद से ३३ देवता बन जाते हैं । जो अग्नि की घनावस्था है उसे " अग्नि " ही कहते हैं, जो अग्नि की तरलावस्था है उसे " वायु " कहते हैं, जो अग्नि की विरलावस्था है उसे प्रादित्य कहते हैं, जो कि प्राणस्वरूप है अतएव रूपरसगन्धस्पर्शशब्द रहित है । एक दीपक को श्रोर ध्यान दीजिए— उसकी जो लौ है वह अग्नि स्थानापन्न है, उसका जो प्रकाश मण्डल है वह लौ की अपेक्षा तरल होने के कारण वायुस्थानापन्न है, एवं उस प्रकाशमण्डल के बाहर जो प्रकाश अदृश्य रूप में बिल्कुल निराकार रूप में परिणत हो निकलता रहता है वह श्रादित्य स्थानापन्न है । स्थानापन्न समझाने के लिए कहा है, वास्तव में वह आदित्य है । दीपक तो दूर रहा । संसार के यच्चयावत् पदार्थों में – अग्नि वायु प्रादित्य - रहते हैं । सब अपनी - अपनी पृथक् संस्था रखते हैं । इस संस्था ही का तो — जिसे कि ऋग्यजुः साम कहते हैं - हमें प्रत्यक्ष होता है । पार्थिव जितने भी पदार्थ हैं, उनके केन्द्र में अग्नि रहती है । इसी को तप्त पुरुष पुरुष - प्रजापति कहा जाता है । यह पदार्थ के केन्द्र में बैठा हुआ उस पदार्थ की सत्ता कायम रखता है । पदार्थ पिण्ड का स्वरूप अपने चुनाव से अग्नि ही बनाता है अतएव यह पिण्ड उसकी कहलाती है । एवं चूँकि वही प्रजा का अधिष्ठाता है अतएव उसे प्रजापति कहते हैं । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है— [ ४१ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण देवयजनं ब्राह्मण
प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा विजायते ।
तस्य योनि परिपश्यन्ति धीरास्तस्मिन्ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा " ॥
( यजु ० सं ० ३१।१६ ) यह अग्नि मर्त्य अमृत भेदेन दो प्रकार का है । जो पिण्डाग्नि है अर्थात् जो अग्नि पिण्डस्वरूप में ( चयन क्रियया ) परिणत हो गया है, वह तो मर्त्य है । किसी न किसी दिन अवश्य ही उस पिण्ड का नाश होगा | एवं उस पिण्ड के बाहर ३३ तक जो अपना मण्डल बनता है --जो कि मण्डल वाक् - प्राण-मनोमय होने के कारण " वषट्कार मण्डल " कहलाता है - वही अमृताग्नि है । इसी प्रसृताग्नि द्वारा हम पदार्थ का प्रत्यक्ष करने में समर्थ होते हैं । जहाँ तक इस अमृताग्नि का सोलर - सिष्टम रहता है- = उस पदार्थ का उसी स्थान तक प्रत्यक्ष होता है । जहाँ उस अमृत - मण्डल की सीमा से बाहर निकले कि वह पदार्थ अदृश्य हुआ । किसी पुरी श्रास्थित वस्तु को आप देखते हुए दूर हटते जाइए । हटते - हटते जहाँ वह वस्तु बिन्दु मात्र दिखाई देने लगे वहीं उसके अमृताग्नि मण्डल की समाप्ति समझनी चाहिए । परन्तु जब वह वस्तु सर्वथा दिखाई न दे तो समझ लीजिए कि हम उसके अमृताग्नि मण्डल के बाहर हैं । प्रत्येक पिण्डाग्नि का हमें विचार नहीं करना । करना है केवल पार्थिवाग्नि, सौर्याग्नि और अन्त -रिक्ष्याग्नि का । इससे पहिले इतना और समझ लेना चाहिए कि यह अग्नि ऋत - सत्य भेदेन दो प्रकार का होता हैं । पिण्ड - केन्द्र में रह कर अमृतमण्डल तक एक सूत्र में बँधे रहने वाला अग्नि ' सत्य ' है अर्थात् सकेन्द्र अग्नि सत्य है एवं केन्द्र - रहित इधर - उधर पानी की तरह व्याप्त रहने वाला श्रग्नि ' ऋत ' है । सोम मिश्रित यही ' ऋताग्नि " ऋतु " शब्द से व्यवहृत होता है । पृथिवी का अग्नि पृथिवी के केन्द्र से बद्ध रहता है, सूर्य्य का अग्नि सूर्य के केन्द्र से बद्ध रहता है अतएव पार्थिव और सौर दोनों अग्नि सत्य हैं । परन्तु अन्तरिक्ष का अग्नि अपना केन्द्र न रख कर इधर - उधर व्याप्त रहता है अतएव हम इसे " ऋताग्नि " कहने के लिए तैयार हैं । बस प्रकृत में इन्हीं पार्थिव सौर ( सत्य ) एवं अन्तरिक्ष्य ( ऋत ) अग्नि से हमारा प्रयोजन है । एक ही अग्नि स्थानभेद से, अवस्थाविशेष से नाना नाम धारण कर लेता है । इसीलिए जो पृथिवी का अग्नि है, उसे अङ्गिरा कहने लगते हैं एवं सूर्य के अग्नि को सावित्राग्नि कहने लगते यह पार्थिवाग्नि अर्थात् अङ्गिरा हर वस्तु केन्द्र में से निकल कर किन्तु केन्द्र में बद्ध रह कर सूर्य की र, द्युलोक की ओर जाया करता है, जैसा कि श्रुति कहती है-" इत एत उदारुहन् दिवः पृष्ठान्यारुहन् । प्रभुर्जयो यथा पथ द्यामङ्गिरसो ययुः " इति ॥ ( साम. सं ० पू ० १।२ ) तो जिस प्रकार से यह अङ्गिरा ' द्य ' की ओर हर वख्त जाता रहता है वख्त द्यलोक की ओर से पृथिवी की ओर आता रहता है । जैसे पार्थिवाग्नि का [ ४२ ] तद्वत् सावित्राग्नि हर-एक सोलर सिष्टम है