Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 421–430
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 421–430
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमक्रयणी ब्राह्मण उस स्थान पर पानी छिड़कने की क्या आवश्यकता है - यह बतलाते हैं । इस भूमि का हिस्सा खोदते समय ऋत्विक् लोग जो क्रूर कर्म करते हैं अर्थात् स्पय - स्वरूप वज्र से उसमें घाव करते हैं एवं उसका सर्वथा नाश कर उसका ( मिट्टी का ) अंश उठा लेते हैं अतएव वहां शान्ति के लिए पानी छिड़-कने की आवश्यकता है । भूमि को खोदना उसकी हिंसा करना है, उसमें जलन पैदा करना है । पानी शान्ति - स्वरूप है श्रतएव उस जले हुए तथा विष्कलित पृथिवी के भाग को पानी से शान्त करता है एवं उसे जोड़ता है । शान्ति करना ओर बिखरे को वापस मिला देना, पानी के ये दो ही काम हैं । यदि कोई मनुष्य रो रहा है तो उसकी प्रांखें पानी से धो डालिए - उसी समय तांप मिट जाएगा । यदि किसी को प्रति क्रोध आ रहा है तो उसे एक गिलास पानी पिला दीजिए, उसी समय शान्ति आ जाएगी । यदि अंगुली में जलन हो रही है तो पानी की भीगी पट्टी बांध दीजिए त्वरित ही शांति हो जाएगी । ताप-शान्ति करना ही पानी का काम है । एवमेव चून ( घाटे ) को इकट्ठा करना चाहते हैं तो पानी डालिए, बिखरा हुआ चून पिण्ड - रूप में परिणत हो जाएगा । संधान भी इसी पानी से होता है । मिट्टी में तलवार चलाई गई थी प्रतएव उसमें ताप हो गया था एवं मिट्टी की समतलता नष्ट हो गई थी । पानी दोनों को ठीक कर देता है । इसीलिए उस स्थान पर पानी डाला जाता है । जड़ - चेतन में कोई फर्क नहीं है, सब चेतन ही है, यह भी इससे सिद्ध होता है । " यत्र वाऽग्रस्यै खनन्तः क्रूरीकुर्वन्त्यपघ्नन्ति शान्तिरापस्तदद्भिः शान्त्या शमयति तदद्भिः संदधाति तस्मादप उपनिनयति " ॥७ ॥
इसके अनन्तर वह अध्वर्यु उस स्थालीय पदपांशु को " त्वे रायः " - यह बोलता हुआ यजमान को सौंप देता है । " अथ यजमानाय पदं प्रयच्छति । त्वे राय इति " । पशु को ही ' राय ' कहते हैं । रायः का नाम है सम्पत्ति । पशु से गाय - बैल ही नहीं समझना चाहिए अपितु उपकरण एवं साधन का नाम, भोग्यजात का नाम, पशु है । तुम्हारे में पशु हो, अर्थात् तुम सम्पत्तिवान् बनो, मालदार बनो - यही " वे रायः " का तात्पर्य है । " पशवो वै रायः त्वयि पशव इत्येवैतदाह " । यजमान “ मे रायः ” कहता हुआ उस पांशु को, खुर की मिट्टी को, दोनों हाथों में ले लेता है ।
मेरे में पशु हों । मैं इससे दौलतमन्द बनूं यही " मे रायः " का तात्पर्य है ।
" मयि पशव इत्येवैतदाह " ॥ ८ ॥
यजमान को पदपांशु दे कर उसी समय श्रध्वर्यु " मा वयं रायस्पोषेण वियौष्म " यह बोलता हुआ अपनी छाती का स्पर्श करता | अध्वर्यु यजमान को मिट्टी नहीं सौंपता है अपितु पशु सौंपता है, सारी दौलत सौंपता है । ऐसी अवस्था में यदि वक्ष ( ग्रात्म ) का स्पर्श न करेगा तो श्रध्वर्युं की भी सारी संपत्ति [ ४०६ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण “ सा या बभ्रुः पिङ्गाक्षी । सा सोमऋयरणी " । ऐसी ही गाय क्यों लेनी चाहिए इसका कारण बतलाते हैं— सोमक्रयणी ब्राह्मणं इन्द्र संसार का निर्माण ब्रह्मा - विष्णु- इन्द्र - प्रग्नि और सोम इन पाँचों अक्षरों से होता है । अव्य-यालम्बन पर बैठ कर ये पांचों प्रक्षर सारी सृष्टि का संचालन करते हैं । इनमें ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र तीन तो केन्द्र में रहते हैं एवं अग्नि- सोम केन्द्र के बाहर ३३ अहर्गण तक रहते हैं । अग्नि २१ तक रहता है, सोम ३३ तक रहता है । ब्रह्मा प्रतिष्ठा है । इस प्रतिष्ठालम्बन पर इन्द्र और विष्णु सदा लड़ा करते हैं, इन्द्र बाहर से लाये हुए अन्न को बाहर फेंका करते हैं । विष्णु अन्न कोला कर आहुत किया करते हैं । प्रदान करना विष्णु का काम है, विसर्ग करना का काम है । इन्द्र विक्षेपणधर्म्मा है । विष्णु प्रादान - धर्मा है । प्रत्येक पदार्थ में ये पांचों प्रक्षर रहते हैं । श्रादान - विसर्गात्मक क्रिया प्रत्येक पदार्थ में हुआ करती है । आय - व्यय होना दोनों धर्म्म नित्य हैं । हमने बतलाया है कि अमृताग्नि को वाक् कहते हैं । यह वाक् अर्थात् अमृताग्नि इन्द्र - विष्णु की स्पर्धा से तीन भागों में विभक्त हो जाती है । विभक्ता वाक् को गौ कहते हैं । वाक् में चूंकि सहस्र विभाग होते हैं अतएव इसमें हजार गौएँ मानी जाती हैं । ये हजार गौएं इन्द्र - विष्णु की स्पर्द्धा से ३३३-३३३-३३३ इन तीन भागों में विभक्त हो जाती हैं । अग्नि को बाहर करना इन्द्र का काम है । अग्नि में सोम की आहुति डालना विष्णु का काम है । यदि अग्नि में सोम की आहुति न पड़े तो अग्नि प्रज्वलित होकर कभी ऊपर तक अर्थात् २१ तक नहीं जाए । एवं इन्द्र कभी गति न करे तो सोमाहुति की भी आव-श्यकता न हो । इन्द्र विष्णु की स्पर्द्धा से ही अग्नि - घन - तरल - विरल तीन अवस्थाओं में परिणत हो जाता है । बस, इसी कारण वे हजार गौएं ३३३ के हिसाब से तीन भागों में विभक्त हो जाती हैं । अग्नि की घनावस्था का नाम वसु है, तरलावस्था का नाम रुद्र है, विरलावस्था का नाम आदित्य है । इस प्रकार ३३३ गौ वसु से सम्बन्ध रखने वाली हैं, ३३३ रुद्रदेवता हैं ३३३ श्रादित्यदेवताक हैं । इस प्रकार EEE तो विभक्त हो जाती हैं । एक गौ बच जाती है । इसी का नाम कामगवी है । तीनों से ( वसु - रुद्र - श्रादित्य से ) फल नियत रूप से मिलता है । कामगवी से तीनों की सम्पत्ति मिल जाती है । इसी का नाम अमृतगवी भी है । यही सोम लाती है । सोम का रंग बभ्रु है, अतएव बभ्रु रंग वाली गाय को ही सोमक्रयिणी बनाना चाहिए । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " यत्र वाऽइन्द्राविष्णू त्रेधा सहस्रं व्यैरयेतां तदेकात्यरिच्यत तां त्रेधा प्राजनयतां तस्माद्योप्येतहि त्रेधा सहस्रं व्याकुर्यादेकै वातिरिच्येत " ॥१३ ॥
याज्ञवल्क्य कहते हैं कि हजार के तीन विभाग करोगे तो एक ही शेष बचेगा । इसी अर्थ को मन्त्र - श्रुति बतलाती है—
उभा जिग्यथुर्न परा जयेथे न परा जिग्ये कतरश्चनैनोः ।
इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्रं वितदैरयेथां " ॥
( ऋग्वेद मं ० ६ | ६ | 5 ) [ ४१२ ]
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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमश्रवणो ब्राह्मण कहने का तात्पर्य यही है कि जो गौ बभ्रु और पिंगाक्षी है वही सोमक्रयिणी है एवं जो लाल रंग की गाय है वह इन्द्रदेवत्या है । संग्राम में जीत कर परकीय राष्ट्र से राजा जिस लाल गौ को लाता है वह वानी है अर्थात् उसे इन्द्र - देवत्या समझना चाहिए । जिसकी आँखें काली हों वह पितृदेवत्या है । काला सोम है । सौम्य प्राण को ही पितर-प्रारण कहते हैं । इसी का श्राद्ध के दिनों में पितरों के लिए आलम्भन किया जाता है || १४ ॥ यहां कौन सी गाय लेनी चाहिए - इसका निर्णय करते हैं । जो बभ्रु और पिंगाक्षी है वही सोम-font होनी चाहिए । यदि यह न मिले तो अरुणा अर्थात् गुलाबी हो सकती है । यह भी न मिले तो लाल हो सकती है । याज्ञवल्क्य कहते हैं, लाल रंग मात्र पर ध्यान देना चाहिए । उसकी आँख भी काली हो । वह श्वेताक्षा हो, बभ्रु की आशा में नहीं बैठे रहना चाहिए ॥ १५ ॥
यह गाय प्रवता अर्थात् गृहतीगर्भा हो । यह सोमक्रयिणी गाय निदानेन वाक् है । वाक् प्रयातयाम्नी है अर्थात् अगतरसा है । जो अप्रवीता होती है वह गाय भी प्रगतरसा ही होती है । बच्चे हुए बाद तो उसका रस बच्चे में बँट जाता है, अतएव अप्रवीता ही होनी चाहिए । यह गाय अवक्रा होनी चाहिए अर्थात् बांडे सींग नहीं होने चाहिए । एवं अक्रूरा हो अर्थात् सुडौल सींग वाली हो । अकारणा हो । श्रकर्ण से अलक्षित हो । अर्थात् कान वगैरह कटा हुआ न हो । एवं पूरे खुरों वाली हो । इस प्रकार सम्पत्ति सम्पन्न एवं एकरूपा हो । क्योंकि वाक् एकरूपा ही है एवं निदानेन यह गाय वाक् ही है ॥ १६ ॥
। इति सोमक्रयणीब्राह्मणं समाप्तम् ।
॥ इति तृतीयाऽध्याये प्रथमं ब्राह्मणं समाप्तम् ॥
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तृतीयाध्याये द्वितीयं ब्राह्मणम् ' सोमोपनहन ब्राह्मणम् ' [ मूल ] पदं समुप्य पारणीऽश्रवनेनिक्ते । तद्यत्पारणी अवनेनिक्ते वज्रो वाम्राज्यं रेतः सोमो नेद्वत्रेणाज्येन रेतः सोमं हिनसानीति तस्मात्पारणीऽनव-नेनिक्ते ॥१ ॥
श्रथास्यां हिरण्यं बध्नीते । द्वयं वाऽइदं न तृतीयमस्ति सत्यं चैवानृतं च सत्यमेव देवा अनृतं मनुष्या श्रग्निरेतसं वै हिरण्यं सत्येनांशूनुपस्पृशानि सत्येन सोमं पराहरणानीति तस्माद्वाऽस्यां हिरण्यं बध्नीते ॥ २ ॥
अथ सम्प्रेष्यति । सोमोपनहनमाहर सोमपर्यारणहन माह रोष्णीषमाहरेति स यदेव शोभनं तत्सोमोपनहनं स्याद्वासो ह्यस्यैतद्भवति शोभनं ह्येतस्य वासः स यो हैनं शोभनेनोपचरति शोभते हाथ य श्राह यदेव किं चेति यद्वैव किंच भवति तस्माद्यदेव शोभनं तत्सोमोपनहनं स्याद्यदेव किंच सोमपर्यारणहनम् ॥३ ॥
यद्युष्णीषं विन्देत् । उष्णीषः स्याद्यद्युष्णीषं न विन्देत्सोमपर्याणहन-स्यैव द्वयङ्गुलं वा त्र्यङ्गुलं वावकृन्तेदुष्णीषभाजनमध्वर्युर्वा यजमानो वा सोमोपनहमादत्ते य एव कश्च सोमपर्यारणहनम् ॥४ ॥
प्रथाग्रेण राजानं विचिन्वन्ति । तदुदकुम्भ उपनिहितो भवति तद्ब्राह्मरण उपास्ते तदभ्यायन्ति प्राञ्चः ॥५ ॥
तदायत्सु वाचयति । एष ते गायत्रो भाग इति मे सोमाय ब्रूतादेष ते त्रैष्टुभो भाग इति मे सोमाय ब्रूतादेष ते जागतो भाग इति मे सोमाय ब्रूता-च्छन्दोनामानां साम्राज्यं गच्छेति मे सोमाय ब्रूतादित्येकं वाऽएष क्रीयमाणोऽभि-[ ४१५ ]
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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मरण सोमोपनन ब्राह्मण क्रीयते छन्दसामेव राज्याय छन्दसां साम्राज्याय घ्नन्ति वाऽएनमेतद्यदभिषुण्वन्ति तमेतदाह छन्दसामेव त्वा राज्याय कीरणामि छन्दसां साम्राज्याय न बधायेत्य-थेत्य प्रापविशति ॥६ ॥
सोऽभिमृशति । श्रास्माकोऽसीति स्व - इव ह्यस्यैतद्भवति यदागतस्त-स्मादाहास्माकोऽसीति शुक्रस्ते ग्रह्य इति शुक्रं ह्यस्माद्ग्रहं ग्रहीष्यन्भवति विचित-स्त्वा विचिन्वन्तिति सर्वत्वायैतदाह || ७ || श्रत्र हैके । तृणं वा काष्ठं वा वित्त्वापास्यन्ति तदु तथा न कुर्यात्क्षत्रं सोमो विन्या श्रोषधयोऽन्नं वै क्षत्रियस्य विट् स यथा ग्रसितमनुहायाछिय परास्येदेवं तत्तस्मादभ्येव मृशेद्विचितस्त्वा विचिन्वन्त्विति तद्यएवास्य विचेता-स्तनं विचिन्वन्ति ॥८ ॥
श्रथ वासः । द्विगुणं वा चतुर्गुणं वा प्राग्दशं वोदग्दशं वोपस्तृणाति तद्राजानं मिमीते स यद्राजानं मिमीते तस्मान्मात्रा मनुष्येषु मात्रो यो चाप्य-न्या मात्रा ॥९ ॥
सावित्र्या मिमीते । सविता वै देवानां प्रसविता तथो हास्माऽएष सवितृप्रसूत एव ऋयाय भवति ॥ १० ॥
प्रतिछन्दसा मिमीते । एषा वै सर्वारिण छन्दांसि यदतिछन्दास्तथो हास्यैष सर्वैरेव छन्दोभिमतो भवति तस्मादतिछन्दसा मिमीते ॥ ११ ॥
समिमीते । अभित्यं देवं सवितारमोण्योः कविक्रतुमर्चामि सत्यसवं रत्नधामभि प्रियं मति कविम् । ऊर्ध्वा यस्यामतिर्भा दिद्युतत्सवी मनि हिर-पाणिरमिमीत सुक्रतुः कृपा स्वरिति ॥१२ ॥
एतया सर्वाभिः । एतया चतसृभिरेतया तिसृभिरेतया द्वाभ्यामेतयैकयै-तयैवैकतया द्वाभ्यामेतया तिसृभिरेतया चतसृभिरेतया सर्वाभि: समस्याञ्ज-लिनाध्यावपति ॥१३ ॥
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मणं सोमोपनहन ब्राह्मण स वाऽउदाचं न्याचं मिमीते । स यदुदाचं न्याचं मिमीतऽइमा एवैतद गुलीर्नानाजानाः करोति तस्मादिमा नाना जायन्तेऽथ यत्सह सर्वाभिर्मिमीते संश्लिष्टा - इव हैवेमा जायेरंस्तस्माद्वाऽउदाचं न्याचं मिमीते ॥ १४ ॥
यद्वेवोदाचं न्याचं मिमीते । इमा ऐवैतन्नानावीर्याः करोति तस्मादिमा नानावीर्यास्तस्माद्वाऽउदाचं न्याचं मिमीते ॥१५ ॥
यद्वेवोदाचं न्याचं मिमीते । विराजमेवैतदर्वाचीं च पराचीं च युनक्ति पराच्यह देवेभ्यो यज्ञं वहत्यर्वाची मनुष्यानवति तस्माद्वाऽउदाचं न्याचं मिमीते ॥१६ ॥
अथ यद्दश कृत्वो मिमीते । दशाक्षरा वै विराड्वैराजः सोमस्तस्माद्दश कृत्वो मिमीते ॥ १७ ॥
श्रथ सोमोपनहनस्य समुत्पार्यान्तान् । उष्णीषेण विग्रथ्नाति प्रजाभ्य-स्त्वेति प्रजाभ्यो येनं क्रीणाति स यदेवेदं शिरश्चां सौ चान्तरोपेनितमिव तदेवास्यैतत्करोति ॥ १८ ॥
अथ मध्येऽङ्गुल्याकाशं करोति । प्रजास्त्वानुप्रासन्त्विति तमयतीव वाऽएनमेतत्समायछन्नप्रारणमिव करोति तस्यैतदत एव मध्यतः प्राणमुत्सृजति तं ततः प्रारणन्तं प्रजा अनुप्राणन्ति तस्मादाह प्रजास्त्वानुप्राणन्त्विति तं सोमवि-क्रयिणे प्रयछत्यथातः पणनस्यैव ॥ १ ९ ॥ [ अनुवाद ] वह ग्रध्वर्यु उस पद को अर्थात् गाय के खुर से अंकित मिट्टी को एक तरफ फेंक कर अपने दोनों हाथों को धोता है । क्यों कि जैसा पूर्व ब्राह्मण में बतलाया गया है, आज्य वज्रस्वरूप है और जिस सोम की अग्नि में आहुति दे कर नवीन दिव्यात्मा उत्पन्न करने जा रहा है वह सांम रेत ( वीर्य्यं ) रूप है । अध्वर्यु आगे सोम का स्पर्श करने वाला है | गाय ने जहाँ अपना सातवां पद रखा है उस में आज्य की आहुति देकर उसकी मिट्टी अध्वर्यु ने बाहर निकाल कर फेंकी है । इससे अध्वर्यु के हाथ का ग्राज्य - रूप वज्र से सम्पर्क होने के कारण उस में वज्र का धर्म्म आ गया है । जल से बिना धोये अध्वर्यु के हाथ का सम्पर्क हो जाएगा तो उस से रेत - रूप वीर्य्यं का नाश हो जाएगा और नवीन दिव्यात्मा की उत्पत्ति नहीं होगी अतः अध्वर्यु गाय के खुर- प्रदेश की मिट्टी को बाहर फेंक कर अपने [ ४१७ ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोपनन ब्राह्मण दोनों हाथों को धो लेता है जिससे प्राज्यरूप वज्र के संस्पर्श से आई हुई हिंस्रता का शमन हो जाता है ॥१ ॥
तदनन्तर अध्वर्यु अनामिका अंगुलि में उस हिरण्य की टिकिया को बाँध लेता है, जिसे हिरण्य को आहुति देते समय अलग निकाल कर रख लिया था । इसका कारण यह है कि संसार में सत्य व अनृत दो ही प्रकार के पदार्थ हैं । तीसरे प्रकार का कोई पदार्थ नहीं है । उन दोनों में देवता सत्यस्वरूप हैं सत्यधर्म्मा हैं तथा मनुष्य अनृतरूप व अनृतधर्म्मा हैं । इसीलिए ' सत्य संहिता वै देवा ग्रनृतसंहिता मनुष्याः, यह श्रुति देवताओं को सत्यसंहिता - सत्यधर्म्म का पालन करने वाला तथा मनुष्यों को अनृतसंहिता - अनृतधर्म का पालन करने वाला बतला रही है । श्रग्नि, इन्द्र, वरुरण, सूर्य्य आदि की तरह सोम भी देवता है तथा देवताओं की वस्तु है अतः वह् सत्यस्वरूप है, सत्यधर्म्म वाला है, उसका अनृत धर्म्मवाला मनुष्य कैसे स्पर्श कर सकता है? इसलिए उसे सत्यस्वरूप बनने के लिए हिरण्य को अंगुलि में बाँधना पड़ता है । हिरण्य अग्नि का रेत है । अतः अग्निरूप है । मैं सत्य से सोमवल्ली के अंशुनों का स्पर्श करू, इस भाव से अनामिका अंगुलि में हिरण्य को बाँधता है ॥ २ ॥
पश्चात् अध्वर्यु अन्य ऋत्विजों से कहता है कि ' सोमोपनहनमाहर ' सोमपर्याहरानमा-हर ' ' उष्णीषमाहर ' अर्थात् सोमोपनहन वस्त्र लामो, सोमपर्याहणन वस्त्र लानो, उष्णीष-वस्त्र लाओ । सोमोपनहन, सोमपर्याहरणन व उष्णीष की व्याख्या करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यज्ञ करने वाले अतिशय सम्मान के साथ सोमविक्रय करने वालों के पास सोम-वल्ली को लाने के लिए जाते थे 1 । क्यों कि सोम कोई सामान्य वस्तु नहीं है किन्तु सोमयाग का तथा प्राणदेवताओं का भी सर्वस्व है । बिना उसके सोमयाग निष्पन्न नहीं हो सकता और सोमयाग के बिना नवीन दिव्यात्मा की उत्पत्ति नहीं होती । जो दिव्यात्मा यजमान को स्वर्ग के देवताओं में स्थान दिलाता है । इसी प्रकार प्रकृति में, अग्नि में २१ वें अहर्गण से आगे रहने वाले सोम की आहुति न होती तो आग्नेय प्राणदेवताओं की स्थिति ही नहीं रह सकती थी । अतः सोम देवताओं का भी देवता है, महान् है । महान् पुरुष के बैठने के लिए जो वस्त्र बिछाया जाता है उसे सोमोपनहन कहते हैं । अतः यज्ञकर्ता जब सोम खरीदने के लिए जाता है उस समय सोम को खरीद कर जिस वस्त्र पर सोमवल्ली को रखता है वही वस्त्र सोमोपनहन है । यह वस्त्र बहुत सुन्दर व बहुमूल्य होना चाहिए । इसीलिए भगवान् याज्ञवल्क्य ने कहा है- ' यदेवशोभनं तत् सोमोपनहनंस्यात् ' इति । जो मनुष्य इस सोम राजा का सत्कार बहुमूल्य वस्त्र बिछा कर करता है वह स्वयं भी शोभा को प्राप्त होता है । जो इस सोम की प्रतिष्ठा करता है, वह स्वयं भी प्रतिष्ठा को प्राप्त होता है । जो इस सोम के लिए सामान्य वस्त्र बिछाता है, वह स्वयं भी सामान्य ही हो जाता है । [ ४१८ ]
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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोपनहन ब्राह्मण सोम को खरीद कर बहुमूल्य वस्त्र पर उसे शकट से लाया जाता है । उस शकट के चौ-तरफ जो पर्दा लगाया जाता है, जिस वस्त्र से सोम को वेष्टित किया जाता है उस वस्त्र को सोम पर्याहन कहते हैं । सोमपर्याहरणन वस्त्र सामान्य भी हो सकता है । उसका बहुमूल्य होना आवश्यक नहीं है ॥३ ॥
सोमोपनहन व सोमपर्याहरणन के अतिरिक्त जो तीसरा वस्त्र, जिसका कि सोम लाते समय उपयोग किया जाता है, वह वस्त्र ' उष्णीष ' है । यह वस्त्र जरीदार पगड़ी के समान होना चाहिए । इस उष्णीष वस्त्र से शकट में बिखरी हुई सोमलता को बाँधा जाता है, यह बाँधना बन्धन नहीं है किन्तु जैसे महान् प्रतिष्ठित पुरुष के शिर पर पगड़ी धारण की जाती है, उसके समान है । सोम पर एक प्रकार की पगड़ी वेष्टित करना उष्णीष से सोमलता को बाँधना है । यह वस्त्र उष्णीष ही होना चाहिए । यदि समय पर उष्णीष उपलब्ध न हो तो सोमपर्याहणन वस्त्र से दो अंगुल या तीन अङ्गुल चौड़ी पट्टी उष्णीष जितनी लम्बी काट कर उसके द्वारा सोमलता को बाँधना चाहिए । सोम के लिए बिछाने का, सोम के बैठने का, जो वस्त्र सोमोपनहन है उसे अध्वर्यु या यजमान ही सोम खरीदने के स्थान पर ले जाते हैं, अन्य सामान्य पुरुष नहीं, किन्तु सोमपर्याहन वस्त्र को कोई भी ले जा सकता है । क्यों कि वह सामान्य वस्त्र है ॥४ ॥
इसके पश्चात् प्राचीन वंश के अग्रभाग में अर्थात् पूर्व की ओर सोमलता को रखते हैं और साफ करते हैं । अर्थात् सोम के साथ जो अनुपादेय अंश आ गया है उसे बाहर निकाल देते हैं । सोम खरीदने के स्थान पर एक जल से भरा हुआ घड़ा रहता है तथा उसी घड़े के पास सोम बेचने वाला ब्राह्मण बैठा रहता है । इस घड़े से पानी ले कर सोमलता को साफ किया जाता है । बाद में उसकी अशु ( पूलियाँ ) बनाई जाती हैं । उस स्थान पर ऋत्विक् प्राङमुख हो कर अर्थात् जिधर सोम रखा है उधर मुख करके सोम लेने के लिए जाते हैं॥५ ॥
सोम प्रकृति में वाक् द्वारा लाया जाता है । यह वाक् पृथिवी - केन्द्र से ३३ वें अहर्गण तक वितत रहती है । वाङमण्डल ही संवात्सरमण्डल है । संवत्सरमण्डल में गायत्री आदि सात छन्द हैं । त्रिवृतस्तोम तक गायत्री छन्द है । पश्चात् पञ्चदश स्तोम तक त्रिष्टुप छन्द है । इस के ग्रागे एकविंश स्तोम तक जगती छन्द हैं । इन तीनों छन्दों से अतिरिक्त संवत्सर मण्डल में उष्णिक् अनुष्टुप् बृहती, पंक्ति ये चार छन्द और हैं । इस प्रकार जैसे प्रकृतिमण्डल में ' वाक् द्वारा लाया हुआ सोम सात विभागों में विभक्त हो जाता है, उसी प्रकार इस वैध यज्ञ में सोमक्रयणी गायरूप वाक् के द्वारा लाया हुआ एकरूप सोम ही देवतानुसार सात भागों में विभक्त किया जाता है । अर्थात् देवताओं की प्रकृति के अनुसार सोम के टुकड़े काट कर गायत्री आदि ७ भागों में विभक्त कर लिया जाता है । किन्तु इस प्रकार सोम को ७ खण्डों में विभक्त करना सोम को दुःख देने के लिए नहीं अपितु उसे राजा व सम्राट् बनाने [ ४१६ ]
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तृतीय काण्ड ( ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोपहन ब्राह्मण के लिए है । राजा अथवा सम्राट् की सत्ता प्रजा पर निर्भर है । बिना प्रजा के कोई राजा या सम्राट् नहीं कहलाता । प्रजा एकरूपा नहीं है अपितु नानारूपा है । अग्नि में सोम की ही प्रजा उत्पन्न होती है । अतः नानारूपा प्रजा की उत्पत्ति के लिए उसे उपयुक्त ७ भागों में विभक्त होना पड़ता है । और इस प्रकार प्रजा की उत्पत्ति होने पर ही वह सोम इस नानारूपा प्रजा का राजा या सम्राट् बन सकता है । मैं आपको सम्राट् बनने के लिए ही विभाग करता हूँ न कि आपके वध के लिए । इसलिए सोम को काट कर उसे सात भागों में विभक्त किया जाता है । उस समय अध्वर्यु के द्वारा सोम से यह प्रार्थनाकी जाती है कि हे सोम! मैं आप की गायत्री आदि छंदोरूप जो प्रजा है उसके निर्माण के लिए आपको इन भागों में विभक्त करता हूँ जिस से आप उस प्रजा के द्वारा उसके अधिपति, राजा या सम्राट् बन सकें । अतः जब यजमान और ऋत्विक् सोम खरीदने के स्थान पर जाते हैं तब यजमान अध्वर्यु द्वारा सोम से प्रार्थना करता है कि हे सोम राजा! यह आपका गायत्र विभाग है, यह त्रैष्टुभ विभाग है और यह जागत विभाग है । इसी प्रकार उष्णिक् आदि छन्दों के लिए भी कहलवाता है । अर्थात् आप के ये विभाग आपकी प्रजा गायत्री आदि छन्दों की तृप्ति के लिए किये जा रहे हैं । यह प्रार्थना यद्यपि यजमानही करता है किन्तु साक्षात् न बोल कर पर्दे के पीछे से बोलता है । सोम का सम्बन्ध साक्षात् यजमान से न रह कर सोम के समक्ष बैठे हुए अध्वर्यु से है । अतः यह कहा गया है कि अध्वर्यु के द्वारा यह प्रार्थना यजमान कराता है । अर्थात् आप इस प्रकार गायत्री आदि छन्दों में विभक्त हो कर अपनी छन्दोरूप प्रजा के साम्राज्य को प्राप्त करें ॥६ ॥
इस प्रकार मन्त्र बोल कर अध्वर्यु सोम के पास जा कर पूर्व की ओर मुख कर अर्थात् सोम की ओर मुख कर बैठ जाता है । तदनन्तर वह अध्वर्यु ' हे सोम! अब आप हमारे हैं, यह कह कर सोम का स्पर्श करता है । अर्थात् सोम जब सोम बेचने वाले से यजमान के घर आ गया है तो अब वह उसका बन गया है । यह सोम दिव्यलोक की वस्तु है जैसा कि ' तृतीयस्यामितो दिवि सोम आसोत् ' यह तैत्तिरीय श्रुति बतला रही है । जब तक यह दिव्यलोक में रहता है तब तक इसकी ध्रुव, धर्म, धरुण, धर्म्म ये चार ही अवस्थाएँ होती है । किन्तु अन्तरिक्ष में आने पर उसकी ४० अवस्थाएँ हो जाती हैं जिनको ग्रह ( गैस ) कहते हैं । अन्तरिक्ष अर्थात् आकाश में आने और सूर्य में इस सोम की आहुति होने पर इस सोम के ४० भेद हो जाते हैं जिन्हें ग्रह कहते हैं । ग्रह की कुल ४० जातियाँ हैं जिनके नाम उपांशुसवन, उपांशु, अन्तर्याम, शुक्र, मन्वी आदि हैं । इन ४० ग्रहों में शुक्र और मन्वी में दो ग्रह ही प्रधान हैं । सूर्य्य जिरा सोम को अन्तरिक्ष में से खींचता है, आकर्षण करता है, उसे शुक्र कहते हैं एवं चन्द्रमा सम्बन्धी सोम मन्वी कहलाता है । सूर्य और चन्द्रमा ही आकाश के अधिष्ठाता हैं । ग्रतः आन्तरिक्ष्य ४० ग्रहों में शुक्र और मन्वी दो ग्रह ही प्रधान हैं । प्रकृति में ४० अन्तरिक्ष्य ग्रहों की आहुति प्रातः सवन [ ४२० ]