Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 431–440

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 431–440

पृष्ठ 431

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 431 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोपनहनं ब्रह्मेणं! माध्यन्दिन सवन तथा सायं सवन इन तीन सवनों में ही होती है । उन में सर्वप्रथम शुक्र ग्रह की आहुति होती है । इसी प्रकार प्रकृतिवत् वैध यज्ञ में सोमवल्ली से रस निकाल कर उसे ४० पात्रों में भर दिया जाता है जिन्हें कि ग्रह कहा जाता है । इन ४० ग्रहों की आहुति प्रकृतियाग की तरह प्रातः सवनादि तीन सवनों में ही दी जाती है । सोमलता से निकाले हुए सोम में से थोड़ा नियत सोम लेकर उस के ४० भाग किये जाते हैं और शेष सोम उपांशु सवन आदि कर्मों के लिए रख लिया जाता है । इस के पश्चात् अध्वर्युं सोम का विभाग करने वाले विचित लोगों से कहता है कि आप लोग इस सोम का विभाग कर लें । यह सोम का विभाग केवल एक ग्रह के लिए नहीं करना अपितु ४० ग्रहों के लिए करना है । इसीलिए ' विचिन्वन्तु सर्वत्वायैव ' यह कहा गया है ॥७ ॥

कितने ही याज्ञिकों का मत है कि सोम की छाँट करते समय उसमें विजातीय तृण-काष्ठ आदि हो, उन को निकाल कर बाहर फेंक दें । किन्तु भगवान् याज्ञवल्क्य का कथन है कि ऐसा न करे क्यों कि सोम औषधियों का क्षत्र है । सारी औषधियों की स्थिति - परि-पुष्टि सोम पर ही निर्भर है । यह पहले काण्ड में बतलाया जा चुका है कि जिस रात्रि में चन्द्रमान उदयकाल में और न अस्तकाल में दिखाई दे उस रात्रि को सोम इन औषधि वनस्पतियों में प्रविष्ट हो जाता है । अत: सब औषधियों के प्राप्यायन का कारण सोम ही है । सोम राजा है और औषधियाँ उसकी प्राण हैं । राजा का जीवन प्रजा पर निर्भर है । सोम से जो औषधि आदि लिपट रही है । यह एक प्रकार से सोम द्वारा भुक्त अन्न है । उन को सोम से अलग करना मुँह में लिये हुए अन्न को मुँह से निकाल कर बाहर फेंकने के समान है । यह सोमवल्ली भी प्राकृतिक सोम की स्थानापन्न है, उसी का रूप है । अतः सोम के साथ लिपटी हुई औषधि को सोम की छाँट करते समय बाहर निकाल कर नहीं फेंकना चाहिए | अपि च सोम की छँटनी भी यजमान से भिन्न ऋत्विक् आदि ही करें जिन्हें कि विचित

( सोम छाँटने वाला ) कहा जाता है । यजमान तो केवल सोम का स्पर्श ही करे ॥ ८ ॥

तत्पश्चात् जितना बड़ा सोमोपनहन वस्त्र हो उसके अनुसार उसे दोहरा, तिहरा, या चौहरा कर वह अध्वर्यु बिछा देता है । यदि सोमोपनहन वस्त्र अधिक बड़ा हो तो तिहरा और चौहरा करके बिछा दे । यदि अधिक बड़ा न हो तो उसे दोहरा करके बिछा दे । उस वस्त्र के जो पल्ले हैं उन्हें पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख रख कर उस सोमोपनहन वस्त्र को बिछाना चाहिए । क्योंकि पूर्व दिशा देवताओं की है और सोम की दिशा उत्तर है । उत्तर से ही सोम आता है । तदनन्तर उस वस्त्र पर सोम को रख कर उसके विभाग किये [ ४२१ ]

पृष्ठ 432

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 432 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोपनन ब्राह्मण जाते हैं कि इतना सोम - भाग उपांशु, सवन ग्रह के लिए, इतना उपांशु ग्रह के लिए, इतना सोम अन्तर्याम ग्रह के लिए है । इस प्रकार चालीसों ग्रहों के लिए सोम का विभाग कर लिया जाता है | अध्वर्युं द्वारा इस प्रकार सोम का विभाग करने से ही मनुष्य के अंगुलि, हाथ, पाद, नासिका, कान, इत्यादि विभाग बनते हैं । अग्नि में सोम की आहुति से ही संसार के याव न्मात्र पदार्थों का निर्माण होता है । स्त्री का अक अग्नि है, अग्नि के समान उष्ण है । पुरुष का वीर्य्य साक्षात् सोमस्वरूप है, क्यों कि सोममय अन्न से ही वीर्य्य बनता है । यज्ञकर्ता पुरुष स्त्री के अग्निरूप रक्त में ही इस सोमरूप वीर्य्य की आहुति देता है । उसके बाद स्त्री की योनि में सिक्त रेत को नाभानेदिष्ठ प्रारण योनि में प्रतिष्ठित करता है, क्यों कि योनि में प्रतिष्ठित सोम से वस्तु उत्पन्न नहीं हो सकती । यह नाभानेदिष्ठ प्राण पुरुष के सोममय वीर्य्य में ही रहता है । योनि में वीर्य्यसेचन के बाद वह प्राण योनि की वस्तु बन जाता है । तदनन्तर बाल के समान सूक्ष्म वालखिल्य उस प्रतिष्ठित वीर्य्य को हस्तपादादि अवयवों में विभक्त करता है । तत्पश्चात् वृषाकपि नामक इन्द्रप्रारण उन विभक्त अवयवों में बलाधान करता है । बलाधान के बाद उन में आदान विसर्गात्मक क्रिया होने लगती है । इससे उन सोम की मात्राओं पर अर्थात् हस्तपादादि अवयवों पर लोम, त्वक् आदि का चयन होता है और इन लोम - त्वगादि चितियों में बलधान भी इन्द्ररूप वृषाकपि प्राण ही करता है । इस चयन के अनन्तर गर्भ का स्वरूप निष्पन्न हो जाता है । किन्तु अभी तक गर्भ, प्रतिष्ठा से रहित है । उसमें स्वप्रतिष्ठा उत्पन्न नहीं हुई है । वह माता की प्रतिष्ठा से ही प्रतिष्ठित है । इसमें एवया नामक मरुत् प्रतिष्ठा उत्पन्न करता है, जो कि श्लथ गर्भ में रुक्षता उत्पन्न कर उस को कठिन पिण्ड बना देता है । जब एवया मरुत् इस गर्भ में प्रतिष्ठा उत्पन्न कर देता है तब वह स्वप्रतिष्ठा से प्रतिष्ठित होकर मातृ - गर्भाशय से बाहर निकल आता है । इस प्रकार नाभानेदिष्ठ, वालखिल्य, वृषाकपि तथा एवया मरुत् - ये चार प्राण अध्यात्म में सहचर भाव से रहते हैं । वीर्य्य को प्रतिष्ठित करना, हस्तपादादि अवयवों में वीर्य्य का विभाजन कर उन में आत्मा का संस्थापन तथा गर्भ में प्रतिष्ठा उत्पन्न करना ही इन का काम है । ये चारों सहचारी हैं । अतः इन चारों का प्रसङ्गतः निरूपण कर दिया है किन्तु प्रकृत नाभानेदिष्ठ, वालखिल्य प्रारण से ही सम्बन्ध है । क्यों कि सोम को प्रतिष्ठित करने तथा उसे ४० विभागों में विभक्त करने का ही प्रकरण है । यह सब प्रकृतियाग में होता है, जिससे मानव की उत्पत्ति होती है । यहाँ भी यजमान को यज्ञ द्वारा नवीन दिव्यात्मा उत्पन्न करना है तो इन प्राणों की आवश्यकता है । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यहाँ वैध यज्ञ में श्रध्वर्यु सोमोपनहन वस्त्र पर सोमरूप सोमलता को रख कर उसे विभाजित करता है । प्रकृति में सोम - विभाजन का प्रत्यक्ष प्रमाण उस सोम से उत्पन्न मानव के हस्तपादादि अवयव विभाग ही हैं । केवल मनुष्य में नहीं - संसार के यावत् पदार्थों में - मात्रा - विभाग इसी सोम के विभाजन के कारण ही है ॥ ॥ [ ४२२ ]

पृष्ठ 433

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 433 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मणी सोमोपनन ब्राह्मण वह अध्वर्यु सावित्री छन्द से अर्थात् सवितृदेवताक अतिछन्द से इस सोमवल्ली का माप करता है । क्योंकि सविता देवता ही देवताओं को सभी कार्यों के लिए प्रेरित करने वाले, अनुज्ञा देने वाले हैं । अतः सोम का क्रय तथा उसका विभाजन भी उन्हीं की अनुज्ञा से हो सकता है, अन्यथा नहीं । इसलिए सवितृदेवताक सावित्री रूप प्रतिछन्दा से ही अध्वर्यु सोम का क्रयण व उसका विभाजन करता है ॥ १० ॥

एक चरण में १२ अक्षरों से अधिक अक्षरों वाला छन्द प्रतिच्छन्द कहलाता है । गायत्री से ले कर जगती तक सभी छन्दों का समावेश छन्द में हो जाता है । इसलिए प्रति च्छन्द में ये सभी छन्द आ जाते हैं । प्रतिच्छन्द से सोम का माप करना इन सभी छन्दों से माप करना है अतः अतिच्छन्द छन्द से ही सोम को मापा जाता है ॥११ ॥

वह अध्वर्यु निम्नलिखित सवितृदेवताक मन्त्र का उच्चारण करना हुआ सोम का विभाजन करता है— ' अभित्यं देवं सवितारमोण्योः कविक्रतुमर्चामि सत्यसवं रत्नधामभि प्रियं मतिं कविम् । ऊर्ध्वा यस्याऽमतिर्भा अदिद्य तत्सवीमनि हिरण्यपाणिरमिमीत सुक्रतुः कृपा स्वः ॥ इति ( यजु: ० ४।२५ ) अर्थात् मैं उस सविता ( सूर्य्य ) देवता की पूजा करता हूँ, स्तुति करता हूँ, जो द्युलोक, पृथिवीलोक तथा उन दोनों के मध्यवर्ती अन्तरिक्ष लोक का शासक है, जो कि सुचतुर प्रेक्षा-पूर्वक कार्य करने वाला है, जिस की अनुज्ञा का कोई निवारण नहीं कर सकता, जो सुवर्ण हीरक आदि बहुमूल्य वस्तुओं का धारण करने वाला, निर्माण करने वाला है क्यों कि सभी बहुमूल्य वस्तुओं का निर्माण सूर्य्यरश्मियों से ही होता है जो अभिप्रिय अर्थात् सर्वतः प्रिय हैं, जो कि बुद्धिस्वरूप है, जो सब को क्रान्तदर्शी बनाने से कविरूप है, जिसकी ऊपर की भा विचार में आने योग्य नहीं है, जिसकी अनुज्ञा में सारा विश्व चमक रहा है, ऐसे सविता देवता की मैं अर्चना करता हूँ । तात्पर्य यह है कि सूर्य से ऊपर स्वयंभू तथा परमेष्ठीलोक हैं । ये ऊर्ध्व लोक है । सूर्य्य से नीचे चन्द्रमा तथा पृथवीलोक हैं । ये अधोलोक हैं । हमारी ओर अर्थात् नीचे की ओर आने वाली सूर्य की भा है उसको तो हम कुछ जान सकते है किन्तु सूई से ऊपर जाने वाला सूर्य का प्रकाश है, उसका हमें कुछ भी ज्ञान नहीं है अतएव वह सर्वथा अमति है । सूर्य के ऊपर का स्वयंभू व परमेष्ठी अमृतरूप है तथा सूर्य्य के नीचे का भाग चन्द्रमा और पृथिवी मर्त्यरूप हैं । सूर्य्य इन अमृत व मर्त्य दोनों का विभाजक है । इनमें ऊपर का अमृत भाग प्रधान है । वही सब का शासन करने वाला है । इसी अभिप्राय से मन्त्र में ' ऊर्ध्वा यस्यामतिर्भा दिद्युतत् सवीमनि ' यह कहा है । वह सविता ( सूर्य्य ) सुवर्णमय हाथों वाला है क्यों कि रश्मियाँ उसके हाथ हैं और वे रश्मियाँ सुनहरी हैं । वह सविता सुक्रतु - अच्छे विचार वाला है । उसने कृपापूर्वक अपने रश्मिरूपी हाथों से स्वर्ग को नाप लिया है ॥१२ ॥

[ ४२३ ]

पृष्ठ 434

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 434 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( श्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोपनन ब्राह्मण वह अध्वर्यु प्रथम ' आदित्यं देवं सवितारमोण्यो ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ पाँचों अङ्गलियों से सोम को नापता है, फिर इसी मन्त्र को बोल कर चारों अंगुलियों से सोम को नापता है, फिर तीनों अंगुलियों से, पश्चात् दो अंगुलियों से और अन्त में १ अंगुलि से सोम को नापता है, सोम का विभाजन करता है । सोम को नापने में यह अवरोह-क्रम है । तदनन्तर आरोहक्रम से इसी मन्त्र का उच्चारण करते हुए सोम को नापता है -पहिले एक अंगुलि से, फिर दो अंगुलियों से, फिर तीन अंगुलियों से, पश्चात् चार अंगुलियों से और अन्त में सब अंगुलियों से अर्थात् पांचों अंगुलियों से नापता है । इस प्रकार दस बार अंगुलियों से नाप कर पश्चात् दोनों हाथों को मिलाकर अञ्जलि से सारे सोम का स्पर्श करता है, अर्थात् सोम का नाप करता है ॥१३ ॥

इस प्रकार यह अध्वर्यु अंगुलियों को ऊँचा - नीचा करके आरोह - अवरोहक्रमानुसार सोम को नापता है | आरोह - अवरोहक्रम का १३ वीं कण्डिका में निरूपण किया जा चुका है । इसी अभिप्राय से ' स वा उदाचं न्याचं मिमीते ' यह कहा है । यहाँ उदाच का अर्थ आरोही तथा न्याच का अर्थ अवरोहक्रम है ॥१३ ॥

वह् अध्वर्यु अवरोह- क्रम में ५, ४, ३, २, १ इस रूप से ५ बार अंगुलियों से सोम को नापता है तथा आरोह- क्रम में १, २, ३, ४, ५ इस रूप से ५ बार अंगुलियों से सोम को नापता है । इसीलिए अंगुलियाँ दोनों हाथों में १० होती हैं और भिन्न - भिन्न स्थान से उत्पन्न होती हैं । प्रकृति के सृष्टि - निर्माण में सोम उदाच व न्याच रूप से ही परि-गत रहता है । यदि सोम एकरूप ही होता तो अंगुलि एक ही होती और एक स्थान से ही उत्पन्न होती । आज यजमान को यज्ञ द्वारा दिव्यात्मा उत्पन्न करना है अतः प्रकृति-मण्डल की तरह इस सोमवल्ली - रूप सोम को उदाच - न्याच किया जाता है । अतएव दस अंगुलियाँ उत्पन्न होती हैं और भिन्न - भिन्न स्थान से उत्पन्न होती हैं । वह अध्वर्यु १० अंगुलियों को साथ मिला कर अञ्जलि रूप से एक बार सोम को नाता है अतः अंगुलियाँ भिन्न - भिन्न होती हुई भी परस्पर सम्बद्ध रहती हुई उत्पन्न होती हैं । यह सब प्रकृति के अनुकरण पर किया जाता है । प्रकृति में सोम का अलग अलग विभाजन होता है किन्तु वे विभाग अन्त में एक प्रारण से सम्बद्ध रहते हैं - उसी प्रकार यहाँ वैध यज्ञ में भी सोम का पृथक् - पृथक् १० बार विभाजन किया जाता है किन्तु अन्त में अध्वर्यु उन सब को मिला कर एक बार सब से नापता है ॥ १४ ॥

अंगुलियों के उदाच - न्याच रूप से अर्थात् आरोह - अवरोह क्रम से सोम को नापने क दूसरा प्रयोजन भी है । इससे अंगुलियों को भिन्न - भिन्न वीर्य्य से युक्त करना है । किसी गुलि में कम वीर्य्य ( शक्ति ) है और किसी में अधिक वीर्य्य । इस का कारण यह उदाच - न्याच मान [ ४२४ ]

पृष्ठ 435

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 435 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोपनन ब्राह्मणं अंगुलियों से सोम को नापना ही है । इसी प्रकार अंगुलियों में कोई छोटी है और कोई बड़ी है, इसका कारण भी यह उदाचन्याच भाव से नापना ही है ॥ १५ ॥

सोम को उदाच - न्याच रूप से नापने का तीसरा प्रयोजन बतला रहे हैं कि विराट् नाम सोम का है । क्यों कि सूर्य्यमण्डल से ऊपर परमेष्ठिमण्डल है । परमेष्ठिमण्डल पृथिवी से २६ वें अहर्गण पर । सूर्य्य पृथिवी से २१ वें अहर्गण तथा परमेष्ठि २६ वें अहर्गण पर है । सोम इसी परमेष्ठिमण्डल में रहता है । इसीलिए ' तृतीयस्यामितो दिवि सोम आसीत् ' यह तैत्तिरीय श्रुति तृतीय द्युलोक अर्थात् परमेष्ठी में सोम की सत्ता बतला रही है । २१ वें अहर्गण तक पृथिवी का रथन्तर साम है, २६ वें अहर्गण तक वैराज साम है तथा ३३ वें अहर्गण तक शाक्वर साम है । पृथिवी के २६ वें अहर्गण का साम इस विराट् सोम के कारण ही वैराज कहलाता है । वह अध्वर्यु पहले अवरोहक्रम से तथा बाद में आरोहक्रम गुलियों द्वारा सोम को नापता है । इस प्रकार नापता हुआ वह देवताओं तथा मनुष्यों दोनों को तृप्त करता है । २६ वें अहर्गण पर अर्थात् तृतीय द्युलोक परमेष्ठी में रहने वाला सोम पहले सूर्य द्वारा पृथिवी पर आता है । उस से पार्थिव पदार्थों और मनुष्यों की रक्षा होती है, क्योंकि सोम से ही अन्न उत्पन्न होता है और उसके खाने से मनुष्य जीवित रहते हैं । किन्तु वही सोम पुनः सूर्य्य - रश्मियों के आकर्षण से द्युलोक में पहुँचता है उससे देवताओं की तृप्ति होती है, उन का जीवन रहता है, सत्ता रहती है । इसीलिए ' इतः प्रदानाद्धि देवा उपजीवन्ति यह कहा गया है । प्रकृति में सोम इसी प्रकार नीचे व ऊपर जाया करता है । उसी के अनुकरण पर अवरोह व आरोह क्रम से अंगुलियों से सोम को इस वैध यज्ञ में अध्वर्यु नापता है । किन्तु प्रकृति में पहले सोम ऊपर से नीचे आता है और बाद में नीचे से अर्थात् पृथिवी से ऊपर सूर्य की ओर जाता है । अतः वैध यज्ञ में अध्वर्यु पहले अवरोहक्रम से अ ंगुलियों से सोम को नापता है पश्चात् आरोहक्रम से ॥१६ ॥

वह अध्वर्यु पाँच बार अवरोहक्रम से तथा पाँच बार आरोहक्रम से - इस प्रकार दस बार सोम को नापता है । क्यों कि विराट् छन्द दस अक्षरों का होता है अर्थात् विराट् दशाव-यव होता है । २६ वें अहर्गण पर रहने वाला सोम विराट् है अतएव दशावयव है । अतः पूर्ण सोम की प्राप्ति के लिए दस बार ही सोम को नापा जाता है ॥ १७ ॥

इसके बाद वह अध्वर्यु सोम के नीचे बिछाये हुए सोमोपनहन वस्त्र के प्रान्त भागों के किनारे की एक पट्टी फाड़ कर उसे उष्णीष वस्त्र से बाँध दे तथा ' प्रजाभ्यस्त्वा ' इस मन्त्र का उचारण करे । अर्थात् मैं प्रजा के लिए आप को खरीदता हूँ । मस्तक और स्कन्ध का अन्तराल प्रदेश जैसे संलग्न सा रहता है उसी प्रकार उष्णीश ग्रन्थिबन्धन से सोम का अन्त-रालप्रदेश से संलग्न सा सम्बन्ध बन जाता है ॥ १८ ॥

[ ४२५ ]

पृष्ठ 436

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 436 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोपनहन ब्राह्मण तदनन्तर उस ग्रन्थि के बीच में दो अंगुलियाँ डाल कर उन्हें चौड़ी कर अगुल्याकाश बनाता है । यह अंगुल्याकाश ' प्रजास्त्वाऽनुप्रारणन् ' यह मन्त्र बोलते हुए करना चाहिए । सोमोनहन वस्त्र की पट्टी लेता हुआ सोमोपनहन वस्त्र के अन्य भागों का संग्रह करता हुआ यह अध्वर्यु सोम को ग्लानि पहुँचाता है, प्राण रहित करता है, उस का दम घोटता है । इस प्रकार सोमग्रन्थि में अंगुलि से अवकाश बनाता हुआ अध्वर्यु उस सोम में प्रारण का प्रधान करता है, प्राणदान करता है । इस के बाद उस सोम को सोम बेचने बाले को दे देता है । अब आगे सोमविक्रय की विधि बतलाई जाती है ॥ १६ ॥

[ विज्ञान भाष्य ] सोमक्रयणी गाय कैसी होनी चाहिए, इसका निर्णय हो चुका है । अब आगे का कर्म बतलाते हैं । वह अध्वर्यु उस पद को, ( गाय के मिट्टी में अंकित खुर को ) एक तरफ फेंक कर पानी से अपने दोनों हाथ धो लेता है । पदं समुप्य ( प्रक्षिप्य ) पाणी अवनेनिक्त ( अव-जनमुदकेन शोधनम् ) इस कर्म में जिस कारण वह पद को फेंक कर हाथ धोता है उसका अभिप्राय बतलाते हैं— " तत् ( तत्र ) यत् ( यस्मात् ) पाणीऽश्रवनेनिक्ते ( तदुच्यते इति शेषः ) " । इस खुर में ' आज्य ( घृत ) की आहुति दी गई है । आाज्य वज्रस्वरूप है । वरुण से बद्ध अग्नि का नाम आज्य है । अग्नि इन्द्र के बिना रह नहीं सकता । इन्द्र की शक्ति - जिससे कि वह आधिदैवतमण्डल पर शासन करता है— वज्र है । अतएव इन्द्र - सम्बन्धेन हम आज्य को वस्त्र कह सकते हैं । वज्रोवा श्राज्यम् । एवं यह सोम रेतस्वरूप है । इसी रेत की अग्नि में जब प्राहुति दी जाती है तो इससे दिव्यात्मा उत्पन्न होता है । यही दिव्यात्मा - यही यज्ञात्मा - यजमान के मानुष - आत्मा का स्वर्ग से ( २१ वें स्थान से ) सम्बन्ध करता है । हमारा वीर्य्य भी सोमस्वरूप ही है । अन्न में सोम भरा रहता है । अन्न खाने से ही वीर्य्य बनता है । वह वीर्य्यं साक्षात् सोम है । यहाँ पर खुर में आज्य डालना, सोम पर वज्र-प्रहार करना है, आहुति द्वारा सोमक्रयणी से सोम मंगवाना है । सोम रेत है । आाज्य वज्र है । ऐसी अवस्था में यदि उस घृतयुक्त खुर को, पद को, फेंक कर हाथ बिना धोए ही यदि सोमवल्ली का स्पर्श कर लिया जाएगा तो आज्य रूपी वज्र से सोम का नाश हो जाएगा । सोम गर्मी पाते ही पिघल जाता है । पिघल जाने से उसकी वह शक्ति जाती रहती है जिससे कि प्रजनन - क्रिया होती है । अग्नि - विद्युत् से सोम के तात्त्विक अंश में विकृति हो जाती है । आज्य साक्षात् अग्नि है । अतएव इसकी गर्मी यदि सोम में प्रविष्ट हो जाएगी तो सोम यातयाम हो जाएगा । अतएव हाथ धो लेने चाहिए । पानी में शांत करने का धर्म है । अग्नि के ताप को पानी उसी समय शान्त कर देता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं । कि आज्य वज्रस्वरूप है । सोम रेतस्वरूप है । हम प्राज्य - वज्र से सोम - रेत का नाश न कर डालें, बस इसीलिए, इसी खयाल से, अध्वर्यु आज्य युक्त पद को मिट्टी के खुर को फेंक कर अपने दोनों हाथ धो डालता है— " वज्रो वाऽश्राज्यं रेतः सोमो नेद्वज्रेणाज्येन रेतः सोमं हिनसानीति तस्मात् पारणीऽवनेनिक्ते " ॥१ ॥

[ ४२६ ]

पृष्ठ 437

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 437 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोपनहन ब्राह्मणं इसके अनन्तर अध्वर्यु अनामिका में उस सोने को बाँध लेता है - " प्रथास्यां हिरण्यं बध्नीते ( अध्वर्युः ) । क्यों बाँधता है, इसका कारण बतलाते हैं । सारे विश्व में सत्य और अनृत ये दो ही पदार्थ हैं । तीसरा पदार्थ है ही नहीं । साँच और झूठ के अलावा वास्तव में कोई तीसरी वस्तु है ही नहीं । देवता और मनुष्य- इन दो के अलावा कोई तीसरा प्रजा नहीं है । अतएव सत्य - अनृत के अलावा कोई तीसरा धर्म नहीं है । देवता सत्य - धर्म का पालन करते हैं । देवता सत्य - स्वरूप हैं । मनुष्य मिथ्या-स्वरूप है । देवताओं का मन - प्राण - वाक् एक लीक पर चलता है । मनुष्यों का मन - प्राण - वाक् भिन्न-भिन्न लोकों पर वक्रित हो कर चलता है । सदा एक भाव से रहने का नाम ही सत्य है । जिसका भूत, भविष्यत्, वर्तमान- तीनों कालों में विपर्यय न हो उसी का नाम सत्य है । एवं जो सदा अपना रंग पल-टता रहे, कभी किसी रूप में आ जाय, कभी किसी रूप में आ जाय उसी का नाम अनृत है । अग्नि- वायु - सूर्य - वरुण - इन्द्र - वसु - रुद्र - प्रादित्य इत्यादि - इत्यादि अनन्त देवता हैं । सारे देवता अपने स्वरूप में सदा नियतरूपेण रहते हैं । अग्नि प्रातिस्विकरूपेण कभी ताप नहीं त्याग सकता । जिस दिन अग्नि में से ताप निकल जाएगा, उस दिन अग्नि, अग्नि ही न रहेगा । अग्नि का स्वभाव है कि वह ऊर्ध्वमुखी प्रज्वलित होता है । अग्नि अपनी ओर से कभी इस नियम से च्युत नहीं हो सकता । अग्नि को जब भी प्रज्वलित करोगे, उसकी ज्वाला सीधी और ऊपर ही जाएगी । वायु का धर्म है तिर्यग् रूप से बहना - स्वेद सुखा देना, इत्यादि । चाहे कुछ भी हो जाय, वायु अपने इन नियमों से विचलित नहीं हो सकती । जब चलेगी तिर्यक् ही चलेगी । सूर्य्यं प्रातः काल श्रवश्य पूर्व में ही दिखाई देगा एवं सायंकाल अवश्य ही पश्चिम में अस्त हो जाएगा । सूर्य्य- रश्मि एकदम सीधी जाएगी, यदि सामने तिल भी आ जाएगा तो उससे टक्कर खा कर वापस उसी सीधे मार्ग पर आ जाएगी । क्या मजाल, जरा भी लीक से इधर - उधर हो जाय । इसीलिए हम देवताओं को सत्य कहने के लिए तैय्यार हैं । वे अपने नियम से कभी विचलित नहीं हो सकते । परन्तु मनुष्य झूठे हैं । दिन में दस बार रंग पलटते हैं । कभी खुश होते हैं, तो कभी रोते हैं । कभी सोते हैं, तो कभी जागते हैं । कभी चलते हैं, तो कभी बैठ जाते हैं, कभी विद्याभ्यास जैसा पवित्र काम करते हैं, तो कभी अकर्मण्यता के पाश में बद्ध हो जाते हैं । कहते कुछ हैं, विचारते कुछ हैं, करते कुछ हैं । मन - प्राण - बाक् तीनों अलग - अलग रास्तों से जाते हैं । तीनों कुटिल मार्ग से जा सकते हैं । मनुष्य भी प्राणिमात्र का एक उपलक्षण है । घोड़े के चाबुक मार दीजिए । जरा दूर चल कर वह फिर सुस्त हो जाएगा । प्राणि - मात्र सदा एक नियम से रहना पसन्द ही नहीं करते । उनके स्वभाव में, आचार-व्यवहार में, हर वक्त परिवर्तन होता रहता है । जो तत्त्व सदा बदलता रहता है, नष्ट होता रहता है, उसे क्यों कर सत्य कहा जा सकता है? सत्य तो नियत - धर्म का, नित्य धर्म का नाम है । इसी अभि-प्राय को लक्ष्य में रख कर कहते हैं— " द्वयं वाऽइदं न तृतीयमस्ति सत्यं चैवानृतं च । सत्यमेव देवा अनृतं मनुष्याः ” । [ ४२७ ]

पृष्ठ 438

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 438 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोपनन ब्राह्मणे अध्वर्यु चूंकि मनुष्य है, अतएव मिध्याध से युक्त है । यज्ञ देवताओं के लिए किया जाता है । देवता सत्य - स्वरूप हैं । सोम, देवताओं की वस्तु है । सोम भी एक देवता है । भला देवताओं की वस्तु को, जो वस्तु स्वयं भी देवता है - मनुष्य क्यों कर सकता है? एक राजा के शरीर का स्पर्श मामूली अदना मनुष्य क्यों - कर कर सकता है? सोम राजा है । राजा ही नहीं बादशाह है । बादशाह ही नहीं शहंशाह है । उसका स्पर्शं एक मामूली मनुष्य ( अध्वर्यु ) क्यों - कर कर सकता है? हाँ, यदि किसी प्रकार अध्वर्यु अपनी आत्मा को सत्य - स्वरूप बना ले तो सोमांशु का ( प्रादेशमित सोमवल्ली की फलियों का ) स्पर्श कर सकता है । बस, इसीलिए वह अपनी अंगुली में सुवर्णं बाँधता है । सुवर्ण, अग्नि का रेत है । आग ही तो सोना बना हुआ है । अग्नि देवता है । देवता, सत्यमय है । सोने को अंगुली में बाँधना सत्य को आत्मसात् करना है । अध्वर्यु सोना बँधे हुए हाथ से जो सोम का स्पर्श करता है, वह सत्य से ही स्पर्श करता है । हाथ से स्पर्श नहीं करता, सत्य से स्पर्श करता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— यह हिरण्य अग्नि का रेज है । मैं सत्य से सोमांशुनों का स्पर्श करू सत्य से सोम को काम में लाऊँ, बस इसी अभिप्राय से वह अपनी अनामिका में उस सुवर्ण को बाँधता है -" ग्रग्निरेतसं वै हिरण्यं सत्येनांशनुपस्पृशानि सत्येन सोमं पराहणानीति तस्माद्वाऽस्यां हिरण्यं बध्नीते " - इति ॥ २ ॥।

इसके अनन्तर जिन वस्त्रों में सोम आएगा एवं जिससे सोमवल्ली बँधेगी, उनके लिए अध्वर्यु श्रन्यान्य ऋत्विजों को आज्ञा देगा | अध्वर्यु कहेगा— " सोमोपनहनमाहर - सोमपर्याणहनमाहर । उष्णीषमाहर " । हे ऋत्विजो! जिस वस्त्र में सोम आाएगा, उस सोमोपनहन वस्त्र को लाओ एवं सोम जिस शकट में रक्खा जाएगा एवं उसके चारों ओर जिस वस्त्र को लपेटा जाएगा उस सोमपर्याहरण नाम के वस्त्र को लाओ एवं जिससे सोमवल्लियाँ बाँधी जाएँगी उस उष्णीष को लाओ । इस प्रकार ग्रध्वर्यु उनको आज्ञा देगा, बाध्य करेगा — “ सम्प्रेष्यति । सोमोपनहनमाहर । सोमपर्यारणहनमाहर । उष्णीषमाहर " यहाँ हम प्रसंगागत शतपथ के इतिहास से सम्बन्ध रखने वाली दो - चार बात बतला देते हैं । इस शतपथ ब्राह्मण को माध्यन्दिनी शाखा का बतलाया जाता है । सम्पूर्ण भारतीय शास्त्र आगम और निगम दो भागों में विभक्त है | आगम के विषय में हमें कुछ नहीं कहना है- कहना है निगम के विषय में । निगम - ऋक्, साम, यजुः, अथर्व इन ४ भागों में विभक्त है । इनमें प्रत्येक वेद की कई - कई शाखाएँ हैं । ऋग्वेद की २१ शाखाएँ हैं । सामवेद की हजार शाखाएँ हैं, यजुर्वेद की १०१ शाखाएं हैं, प्रथर्ववेद की & शाखाएं हैं । भिन्न - भिन्न ऋषियों के कारण ही यह [ ४२८ ]

पृष्ठ 439

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 439 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोगोपनन ब्राह्मण खा - भेद हुग्रा है । यजर्वेद की १०१ शाखाओं में १६ शाखाऍ शुक्ल यजुर्वेद की कहलाती हैं । इन १६ के निम्नलिखित नाम हैं- " १ - काण्वाः, २ - माध्यन्दिना, ३ - जाबाला, ४ – बुधेया, ५ - शाकेया, ६ - तापनीया, ७ – कपोला, ८- पौण्ड्रवत्सा, ε- प्रात्रटिका, १० -परमावटिका, ११ - पाराशरीया, १२ - वैनया, १३ – वैधेया, १४ - औधेया १५ - गालवा १६ - इन सोलहों में से आज काण्व और माध्यन्दिनी दो ही शाखाएँ उपलब्ध हैं । कृष्ण यजुर्वेद की ८५ शाखाएँ हैं - चाक, आह्वरक, कठ, प्राच्यकठ, वादतन्तवीय, श्रव, पाता-ण्डिनेय, इत्यादि - इत्यादि नाम इन शाखाओं के हैं । इन सारी शाखाओं में से आज केवल एक मैत्रायणी संहिता उपलब्ध होती है । एक सहस्र शाखाएँ सामवेद की हैं । तृणापनीय, शाठ्यमुग्र, महाकापोल, जांगलिक, इत्यादि इन शाखाओं के नाम हैं । अथर्ववेद की 8 शाखाएँ हैं । प्रत्येक शाखा में संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक उपनिषद् - ये चार - चार विभाग होते हैं । प्राति-शाख्य संहिता भिन्न है— ब्राह्मण भिन्न हैं, आरण्यक भिन्न हैं, उपनिषद् भिन्न हैं । सारे निगम में ज्ञान-काण्ड, कर्मकाण्ड और उपासना काण्ड - इन तीन ही का विवेचन है । तीनों को अलग - अलग समझाने के लिए आरण्यकादि विभाग कर दिये गये हैं । ब्राह्मणग्रन्थ कर्मकाण्ड का प्रतिपादन करते है, आरण्यक उपासना काण्ड हैं, उपनिषद् ज्ञानकाण्ड हैं । उपनिषद् वेद का अन्तिम भाग है । अतएव इसे वेदान्त भी कहा जाता है । एवं जिनके आधार पर ज्ञान - कर्म - उपासना की स्थिति है उन मन्त्रों के संग्रह का नाम संहिता है । इस प्रकार प्रत्येक शाखा चार - चार भागों में विभक्त है । इससे सिद्ध हो जाता है कि जितनी शाखाएँ हैं उतनी ही संहिताएँ हैं, उतने ही ब्राह्मण हैं उतने ही प्रारण्यक हैं, उतने ही उपनिषद् । " एकशतमध्वर्यु शाखाः सहस्रवर्त्मा - सामवेदः, एक - विशतिधा बाह्यच्यं नवधा प्रथर्वणो वेदः ” । भगवान् भाष्यकार के इस कथन से कुल ११३१ शाखाएँ सिद्ध होती हैं । बस इतने ही ब्राह्मण समझिए, इतने ही आरण्यक समझिए, इतने ही उपनिषद् समझिए । कुल मिला कर केवल वेद की ४५२४ पुस्तकें हो जाती हैं जिनमें से आज मुश्किल से ५० पुस्तकें मिलती होंगी । बाकी सब काल के गाल में समा गई हैं । प्रकृत में हमें यह बतलाना है कि कितने ही मनुष्य शतपथ ब्राह्मण को माध्यन्दिनी शाखा का बतलाते हैं । परन्तु हमारे हिसाब से यह बात गलत है । ब्राह्मण - ग्रन्थों के अनुसार मन्त्र संहिताएं बनी हैं । ब्राह्मण पहले बने हैं, संहिताएँ बाद में बनी हैं । संहिता नाम है मन्त्र - संग्रह का । संस्कृत में जिसे संग्रह कहते हैं, वैदिक भाषा में उसे ही संहिता कहते है । स्वामी दयानन्द कहते हैं— संहिता के बाद ब्राह्मण बने हैं । इन महापुरुषों के विषय में तो हमें कुछ कहना ही नहीं है । जबकि आप -४ संहिताओं के अलावा अन्य संहिताओं को और ब्राह्मण भाग को वेद ही नहीं मानते । संहिता शब्द ही इस बात को सूचित करता है कि ब्राह्मणों में से मन्त्रों का संग्रह कर ये सहिताएँ बनी हैं । याज्ञबल्क्य शुक्लयजुर्वेद के अधिष्ठाता थे । उनके १६ शिष्य थे । सोलहों ने अलग - अलग पुस्तक बनाईं । अतएव शुक्ल यजुर्वेद की १६ शाखाएँ हो गईं । अस्तु, इस विषय का विस्तृत विवेचन करना प्रकृत [ ४२६ ]

पृष्ठ 440

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 440 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोपनहन ब्राह्मण से दूर जाना है । यहाँ सिर्फ यही कहना है कि यह शतपथब्राह्मण माध्यन्दिनी शाखा का नहीं है । कारण इसका यही है कि कितने ही मन्त्र इस ब्राह्मण में ऐसे आये हैं जिनका प्रचलित संहिता में पता भी नहीं है । काण्व और माध्यन्दिनी शुक्लयजुर्वेद की दो ही शाखाएँ प्रचलित हैं । दोनों ही संहितानों में ये मन्त्र नहीं हैं | इससे मानना पड़ता है कि यह शतपथ दोनों शाखाओं से भिन्न किसी तीसरी ही शाखा का है । यदि इस शतपथ को माध्यन्दिनी शाखा का ही माना जाता है तो संहिता माध्यन्दिनी शाखा को नहीं मानी जा सकती । उदाहरणार्थ " सोमोपनहनमाहर " यह मन्त्र प्रचलित मन्त्र - संहिता में नहीं है । अतएव मानना पड़ता है कि शतपथ माध्यन्दिनी शाखा का नहीं है । प्रसंगागत हमने यह बात बतला दी है । अब पुनः प्रकृत का अनुसरण करते हैं । हमने कहा था कि अध्वर्यु ऋत्विजों से सोमोपनहन इत्यादि मन्त्र से प्रेष करता है । सोमोपनहन किसे कहते हैं? सोमपर्याणहन किसे कहते हैं? उष्णीष की क्या जरूरत पड़ती है? - यह बतलाते हैं । सोम की बेलें कट - कट कर भारतवर्ष में ईरान की ओर से बिकने को आती थीं जैसा कि हमने सोमाख्यान ब्राह्मण में बतला दिया है । उस सोम के लिए ग्रध्वर्यु सोमभाग हेतु वहाँ जाता है जहाँ कि सोम बेचने वाले बैठे हैं । सोम, बेचने वालों की दृष्टि में भले ही मामूली सी चीज हो परन्तु जो याज्ञिक मनुष्य हैं उनका तो सोम ही सर्वस्व है । यज्ञ - विद्या का आधार एकमात्र सोम ही है । प्राणदेवताओं तक का जीवन इसी सोम से रहता है । सोम, प्राण देवतानों तक का आराध्य है । फिर हम मनुष्यों की तो कथा ही क्या है? सोम यज्ञकर्ता मनुष्यों का सम्राट् है, बादशाह है । आज यह श्रध्वर्यु उस बादशाह को लेने जा रहा है । बादशाह के लिए जो बिछायत होती है उसीका नाम है सोमोपमहन । सोम को यों ही चाहे जैसे नहीं लाया जाता है, अपितु बिछायत बिछाकर ऊपर से छत्र लगाकर चारों ओर वेष्टन करके बड़ी धूम - धाम से सोमराजा की सवारी निकाली जाती है । बस उस सोम के लिए नीचे बिछाने का जो वस्त्र है, उसी का नाम है सोमोपनहन । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि जो बहुमूल्य, श्रतिसुन्दर वस्त्र है वही सोमोनहन होना चाहिए । अर्थात् सोम जिस पर रक्खा जाएगा वह वस्तु बहुमूल्य, बेलबूटेदार, जरी का काम की हुई होनी चाहिए । मामूली वस्त्र न हो, अपितु बेशकीमती वस्त्र हो, उसे ही सोमोपनहन बनाना चाहिए— " स यदेव शोभनं तत् सोमोपनहनं स्यात् " । सोम को रखने के लिए ऐसे बहुमूल्य वस्त्र की क्या आवश्यकता है? इसका कारण बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि भाई, यह सोमोपनहन सोम की पोशाक है । सोम राजा ही नहीं, महाराजा है । क्या महाराजा लोग मामूली पोशाक पहना करते हैं? नहीं, उनकी पोशाक बेशकीमती होती है अतएव सोमो-पनहन बहुमूल्य और प्रतिसुन्दर ही होना चाहिए । " वासो ह्यस्यैतद्भवति । शोभनं ह्येतस्य वासः ” । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि जो मनुष्य इस सोमराजा का उपचार बहुमूल्य वस्त्रों से करता है, वह स्वयं भी शोभा को प्राप्त होता है । सोम की इज्जत करना अपनी इज्जत करना है । राजा की प्रतिष्ठा [ ४३० ]